एक का विश्वास, दूसरे का अंधविश्वास: 5 जज, 6 वकील – SC में सबरीमाला पर दमदार दलील

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर सुबह 10:30 से सुनवाई शुरू की। 5 जजों की बेंच में मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के साथ जस्टिस रोहिंटन नरीमन, जस्टिस एएम खानविल्कर, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने की सुनवाई।

सबरीमाला विवाद की 65 याचिकाओं पर बुधवार (फरवरी 6, 2019) को सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने सुनवाई की। इसमें सितंबर 2018 के फैसले के ख़िलाफ़ 56 समीक्षा याचिकाएं, 4 ताजा रिट याचिकाएं और 5 अन्य याचिकाएं शामिल हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर सुबह 10:30 से सुनवाई शुरू की। 5 जजों की बेंच में मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के साथ जस्टिस रोहिंटन नरीमन, जस्टिस एएम खानविल्कर, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने की सुनवाई।

सुनवाई की शुरुआत करते हुए CJI रंजन गोगोई ने उपस्थित वकीलों से अपने तर्क को समीक्षा के आधार पर सीमित करने को कहा। इसके बाद सीनियर काउंसलर पराशरन ने सबसे पहले अपने तर्क रखे। सभी वकीलों के तर्क नीचे सिलसिलेवार ढंग से दिए गए हैं।

सीनियर काउंसलर पराशरन की मजबूत दलील

  • पराशरन ने कहा कि जब तक प्रैक्टिस बहुत ही वीभत्स नहीं होता, तब तक अदालत धार्मिक संस्थाओं से जुड़ी गतिविधि में आम तौर पर हस्तक्षेप नहीं करती है। उन्होंने यहोवा केस का हवाला दिया।
  • उन्होंने कहा कि मंदिर प्रथा पर प्रहार करना अनुच्छेद 15 के तहत एक त्रुटि है। उन्होंने कहा- “फ़ैसले ने इस महत्वपूर्ण पहलू पर विचार नहीं किया कि अनुच्छेद 15 (2) धार्मिक स्थानों को कवर नहीं करता है।”
  • सीनियर काउंसलर ने आगे कहा- ‘यह द्विपक्षीय विवाद नहीं है; इसके परिणाम अन्य धर्मों पर भी पड़ेंगे।
  • जस्टिस नरीमन जे ने टिप्पणी करते हुए कहा कि ये धारणा मत रखें कि महिलाओं पर लगे बैन को सिर्फ़ अस्पृश्यता (Untouchability) के आधार हटाया गया था।
  • परासरन ने कहा कि सबरीमाला में बहिष्कार प्रथा देवता के चरित्र पर आधारित है, जो कि ब्रह्मचारी हैं

वी गिरी के विचारणीय तर्क

  • सबरीमाला मंदिर के मुख्य पुजारी की तरफ से सीनियर काउंसल वी गिरी ने कहा कि कोई भी व्यक्ति जो अनुच्छेद 25 (2) (बी) के तहत पूजा करने का अधिकार रखता है, उसे देवता की प्रकृति के अनुरूप करना होगा।
  • उन्होंने कहा- “महिलाओं को प्रवेश की अनुमति देने के मामले में स्थायी ब्रह्मचर्य चरित्र नष्ट हो जाता हैहर भक्त जो मंदिर जाता है, मंदिर की आवश्यक प्रथाओं पर सवाल नहीं उठा सकता है। हर भक्त जो मंदिर जाता है, मंदिर की आवश्यक प्रथाओं पर सवाल नहीं उठा सकता है।”
  • गिरी ने कहा कि तंत्री को देवता का पिता माना जाता है, और देवता के आवश्यक चरित्र को संरक्षित करने के लिए उनके पास विशेष अधिकार हैं। अनटचेबिलिटी से कुछ लेना-देना नहीं है।
  • गिरी ने कहा- “याचिकाकर्ताओं में से किसी ने भी सबरीमाला में भगवान अयप्पा के भक्त होने का दावा नहीं किया। प्रथा का जाति से कोई लेना-देना नहीं है। इसलिए, सबरीमाला प्रथा को अस्पृश्यता के समान नहीं माना जा सकता है।”

अभिषेक मनु सिंघवी की दलीलें

  • सीनियर अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी की दलील- ‘विश्वास के कई पहलू तर्कहीन होंगे। लेकिन यह साइंस म्यूजियम नहीं बल्कि धर्म है। इसलिए संवैधानिक नैतिकता को इस सब में लागू नहीं किया जाना चाहिए। कोर्ट को धर्म के मामलों में संवैधानिक नैतिकता लागू करते समय सावधानी बरतनी चाहिए।’
  • उन्होंने आगे कहा- ‘न्यायालय ने यह मान लिया कि जब तक सार्वभौमिकता नहीं होगी तब तक यह आवश्यक धार्मिक अभ्यास नहीं होगा। हिंदू धर्म जैसे विविध धर्म में, कोई सार्वभौमिकता की तलाश नहीं कर सकता है। यह जजमेंट (पैराग्राफ को संदर्भित करते हुए) सही नहीं है।’

वरिष्ठ अधिवक्ता शेखर नफाड़े के तर्क

  • वरिष्ठ अधिवक्ता शेखर नफाड़े ने अदालत से कहा- ‘यह आस्था का विषय है। जब तक कि एक आपराधिक कानून नहीं है जो एक विशेष धार्मिक प्रथा को प्रतिबंधित करता है (जैसे सती), अदालतें हस्तक्षेप नहीं कर सकती हैं
  • उन्होंने आगे कहा- ‘अकेले समुदाय ही यह तय कर सकता है कि सदियों पुरानी मान्यता को बदला जाए या नहीं। कुछ एक्टिविस्ट्स को यह तय करने के लिए नहीं दिया जा सकता है।एक आवश्यक धार्मिक अभ्यास क्या है?, यह तय करने का अधिकार उस विशेष समुदाय के सदस्यों को होना चाहिए।’

आर वेंकटरमानी और वेंकटरमन के सबमिशन

  • आर वेंकटरमानी ने अदालत के समक्ष कहा- “या तो आप एक अनुष्ठान में विश्वास करते हैं या इसका हिस्सा नहीं बनने का विकल्प चुनते हैं। आप अपने आधार पर सवाल उठाकर अनुष्ठान का हिस्सा नहीं बन सकते।”
  • वेंकटरमन ने कहा- ‘एक का विश्वास दूसरे का अंधविश्वास हो सकता है। इन पहलुओं का तर्कसंगतता के साथ परीक्षण नहीं किया जा सकता है। आस्था आस्था होती है; इसे परमिशन वाली विश्वास और बिना परमिशन वाली आस्था में विभाजित नहीं किया जा सकता है।’
  • उन्होंने आगे कहा- “1991 के केरल HC के फैसले ने रिवाज को एक आवश्यक धार्मिक प्रथा के रूप में मानने के सबूतों पर विचार किया है। उस निर्णय में तथ्यात्मक खोज को चुनौती नहीं दी गई है, और इसलिए फाइनल हो गया है।”
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