तुलसी बाबा ने यूॅं ही नहीं लिखा- झूठइ लेना झूठइ देना, झूठइ भोजन झूठ चबेना

दलीलें देने और सुनने की हमारी परंपरा पुरानी है। कैकेयी ने भी मंथरा और खुद राम ने धोबिन की दलीलें सुनी थी। नतीजा दोनों में एक जैसा ही निकला था- वन गमन!

तुलसीदास भी गजबे थे। राम पर पूरा रामचरितमानस लिख दिया। जन्म से लेकर कलयुग तक का खाका खींच दिया। पर जो लिखना था वो न लिखा। नहीं बताया कि राम किस गली के कितने नंबर मकान में पैदा हुए। कायदे से दशरथ के प्लॉट (राजमहल) का खतिहान ही लिखा जाना चाहिए था।

लेकिन, तुलसी बाबा उत्तर कांड में केवल इतना लिख ठहर गए;
जन्मभूमि मम पुरी सुहावनि। उत्तर दिसि बह सरजू पावनि॥
जा मज्जन ते बिनहिं प्रयासा। मम समीप नर पावहिं बासा॥

यानी, यह सुहावनी पुरी मेरी जन्मभूमि है। इसके उत्तर दिशा में जीवों को पवित्र करने वाली सरयू नदी बहती है, जिसमें स्नान करने से मनुष्य बिना परिश्रम मेरे समीप निवास अर्थात मुक्ति पा जाते हैं।

इससे साबित क्या होता है? यह किस बात का साक्ष्य है? जानने से पहले इन दलीलों पर गौर करें,

  • यह विश्वास है कि भगवान राम वहॉं पैदा हुए थे। हमें साक्ष्य देकर बताया जाए कि आखिर किस जगह भगवान राम पैदा हुए थे।
  • ये दलील काफी नहीं है कि भगवान राम के जन्मस्थान के बारे में आस्था है कि वह अमुक जगह है और इसी आधार पर जन्मस्थान को कानूनी व्यक्ति मान लिया जाए।
  • पिलर पर भगवान की कोई तस्वीर नहीं है। कमल, गरूड़ की तस्वीर और सिंहद्वार होने भर से वह हिंदुओं का स्थान हो जाएगा ऐसा नहीं है। ये सजावट के लिए हो सकता है।
  • पूरे जन्मस्थान को पूजा की जगह बता मुस्लिम पक्ष के दावे को कमजोर करने की कोशिश की जा रही।
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ये चुनिंदा दलीले हैं वरिष्ठ वकील राजीव धवन की। वे अयोध्या मामले की सुप्रीम कोर्ट में चल रही नियमित सुनवाई के दौरान सुन्नी वक्फ बोर्ड की तरफ से अपना पक्ष रख रहे हैं। वैसे, दलीलें देने और सुनने की हमारी परंपरा पुरानी है। कैकेयी ने भी मंथरा और खुद राम ने धोबिन की दलीलें सुनी थी। नतीजा दोनों में एक जैसा ही निकला था- वन गमन!

राजीव धवन को बतौर वकील दलीलें पेश करने का अधिकार भी है और उसे सुनना मी लॉर्ड का दायित्व। दलीलों से यह भी जाहिर होता है कि धवन भी राम को मानते हैं। सुनवाई के दौरान उन्होंने कहा भी है, “भगवान राम की पवित्रता पर कोई विवाद नहीं है। इसमें भी विवाद नहीं है कि भगवान राम का जन्म अयोध्या में कहीं हुआ था।” उनकी आपत्ति केवल जन्मस्थान को कानूनी तौर पर व्यक्ति मानने को लेकर है। आपत्ति केवल यह है कि किसी भी पुस्तक में ये वर्णित नहीं है कि अयोध्या के किस खास जगह पर भगवान राम का जन्म हुआ था। राम में उनकी आस्था इतनी है गहरी है कि उन्होंने अदालत में इकबाल का एक शेर भी पढ़ा, “है राम के वजूद पे हिन्दोस्ताँ को नाज़, अहल-ए-नज़र समझते हैं उसको इमाम-ए-हिंद।”

कहने को कबीर भी कह गए हैं;
कबीर निरभै राम जपि, जब लग दीवै बाति।
तेल घट्या बाती बुझी, (तब) सोवैगा दिन राति॥

कहते हैं कि अवध के वाजिद अली शाह के कृपानिधान भी राम ही थे। किस्सा यूॅं है कि वाजिद अली शाह बेदखल हो कलकता जाने लगे तो अफवाह उड़ी कि अंग्रेज उन्हें लंदन ले जा रहे हैं। तब औरतों ने जमा होकर गाया था-हजरत जाते लंदन, कृपा करो रघुनंदन।लेकिन, जो सबसे जरूरी था वह किसी ने न लिखा, न गाया। राम किस प्लॉट में पैदा हुए थे?

हालाँकि, रामलला के वकील एससी वैद्यनाथन सुप्रीम कोर्ट को बता चुके हैं कि राम का जन्म बाबरी मस्जिद के गुंबद के नीचे हुआ था। भारतीय पुरातत्व विभाग की खुदाई से मिले सबूत भी बताते हैं कि बाबरी मस्जिद के नीचे जो स्ट्रक्चर था उसकी बनावट उसमें मिली भगवान की तस्वीरें, मूर्तियॉं सब पहले से मंदिर के होने की गवाही देते हैं। लेकिन, आपत्ति जताने वाले यह भी पूछते हैं कि एक ही कालखंड में होने के बावजूद तुलसीदास ने राम मंदिर को तोड़ कर मस्जिद बनाए जाने का जिक्र क्यों नहीं किया?

वैसे, तुलसी बाबा यह भी लिख गए हैं;
झूठइ लेना झूठइ देना। झूठइ भोजन झूठ चबेना॥
बोलहिं मधुर बचन जिमि मोरा। खाई महा अहि हृदय कठोरा॥

यह भी कि;
ऐसे अधम मनुज खल कृतजुग त्रेतॉं नाहिं।
द्वापर कछुक बृंद बहु होइहहिं कलजुग माहिं॥

यानी, ऐसे नीच और दुष्ट मनुष्य सतयुग और त्रेता में नहीं होते। द्वापर में थोड़े से होंगे और कलियुग में तो इनके झुंड-झुंड होंगे।

खैर, बहस जारी रहे…क्योंकि हमने तो पाहुन राम से कहा था- जो आनंद विदेह नगर में, देह नगर में कहूॅं ना।

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