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बच्चे अपना जेंडर चुनने पर कर पाएँ विचार इसलिए लड़के-लड़कियों का यौवन रोकने के प्रयास: जानिए क्या है ‘प्यूबर्टी ब्लॉकर्स’, UK में जिसके ट्रायल के खिलाफ उतरीं हस्तियाँ

जेंडर डिस्फोरिया का मतलब होता है कि कोई बच्चा या युवा अपने जन्म के समय दिए गए जेंडर से खुद को असहज महसूस करता है। ऐसे मामलों में कुछ समय से 'प्यूबर्टी ब्लॉकर्स' नाम की दवाओं का इस्तेमाल किया जाता रहा है जो शरीर में यौवन (प्यूबर्टी) की प्रक्रिया को कुछ समय के लिए रोक देती हैं।

यूनाइटेड किंगडम में इस समय बच्चों और युवाओं के जेंडर डिस्फोरिया के इलाज को लेकर बहस चल रही है। जेंडर डिस्फोरिया का मतलब होता है कि कोई बच्चा या युवा अपने जन्म के समय दिए गए जेंडर से खुद को असहज महसूस करता है। ऐसे मामलों में कुछ समय से ‘प्यूबर्टी ब्लॉकर्स’ नाम की दवाओं का इस्तेमाल किया जाता रहा है जो शरीर में यौवन (प्यूबर्टी) की प्रक्रिया को कुछ समय के लिए रोक देती हैं। 2024 में आई ‘कैस रिव्यू’ नाम की एक सरकारी रिपोर्ट में कहा गया कि इन दवाओं के फायदे और नुकसान को लेकर पुख्ता वैज्ञानिक सबूत नहीं हैं। इसके बाद ब्रिटेन की सरकारी स्वास्थ्य सेवा NHS ने बच्चों पर इन दवाओं के सामान्य इस्तेमाल पर रोक लगा दी।

अब विवाद इसलिए फिर बढ़ गया है क्योंकि जनवरी 2026 से ‘पाथवे’ नाम का एक नया क्लिनिकल ट्रायल शुरू किया जा रहा है, जिसमें इन प्यूबर्टी ब्लॉकर्स को दोबारा बच्चों पर आजमाया जाएगा। Christian Today की रिपोर्ट के मुताबिक, इसमें 10 से 16 साल की उम्र के लगभग 220 बच्चों को प्यूबर्टी ब्लॉकर्स दिए जाएँगे। इसी के विरोध में एक ऑनलाइन पिटीशन शुरू की गई है, जिस पर अब तक 1 लाख से ज्यादा लोग साइन कर चुके हैं और सरकार से इस ट्रायल को रोकने की माँग कर रहे हैं।

याचिका में की गई है क्या माँग?

8 जनवरी 2025 को संसद की आधिकारिक वेबसाइट पर यह याचिका डाली गई थी। हैरी पॉटर की लेखिका जे.के. रोलिंग जैसी हस्तियों द्वारा समर्थन के बाद इसे भारी समर्थन मिला। जे.के. रोलिंग ने कहा कि उन्होंने इस याचिका पर हस्ताक्षर किए हैं और यह बच्चों पर किया जा रहा एक अनैतिक प्रयोग है।

इस याचिका को डालने वाले थेरेपिस्ट जेम्स ऐस्स ने बताया कि इस याचिका पर एक लाख लोगों का समर्थन जुटाने के लिए 6 महीनों का समय था लेकिन ऐसे 4 दिन में ही हो गया।

इस याचिका में माँग की गई है, “सरकार जानती है कि ‘प्यूबर्टी ब्लॉकर्स’ से बच्चों के शरीर और मन पर ऐसे असर पड़ सकते हैं जो बाद में पूरी तरह ठीक न हों। ‘कैस रिव्यू’ के बाद खुद सरकार ने माना है कि इनमें जोखिम हैं। इसके बावजूद सरकार की अनुमति से होने वाले एक ट्रायल के तहत सैकड़ों बच्चों को ‘प्यूबर्टी ब्लॉकर्स’ दिए जाने की तैयारी की जा रही है।”

याचिका में कहा गया है, “इस ट्रायल को रद्द किया जाए। जो बच्चे अपने शरीर को लेकर असहज महसूस करते हैं, जिनमें से कई ऑटिज़्म से भी प्रभावित होते है उनके लिए सही रास्ता समय देना, प्यूबर्टी को स्वाभाविक रूप से आगे बढ़ने देना और उन्हें समझने-सहजने वाली थैरेपी देना है। समाधान यह नहीं हो सकता कि बच्चों को ऐसी मेडिकल प्रक्रिया में डाल दिया जाए जो दिमाग के विकास, हड्डियों की बढ़त, यौन क्षमता को नुकसान पहुँचा सकती है और भविष्य में बाँझपन तक का खतरा पैदा कर सकती है।”

‘प्यूबर्टी ब्लॉकर्स’ क्या हैं?

प्यूबर्टी ब्लॉकर्स जिन्हें वैज्ञानिक भाषा में गोनाडोट्रोपिन-रिलीजिंग हार्मोन (GnRH) एनालॉग्स कहा जाता है, ऐसी दवाएँ हैं जो शरीर में सेक्स हार्मोन्स (एस्ट्रोजन और टेस्टोस्टेरॉन) के उत्पादन को दबाती हैं। ये प्यूबर्टी से जुड़े शारीरिक बदलावों को रोकती हैं जिनमें लड़कियों में स्तनों का विकास, मासिक धर्म, कूल्हों का चौड़ा होना और लड़कों में वृषण का बड़ा होना, आवाज का गहरा होना, चेहरे पर बाल आना जैसे बदलाव शामिल हैं। ये दवाएँ इंजेक्शन, इम्प्लांट या नेजल स्प्रे के रूप में दी जाती हैं, और आमतौर पर हर 1-3 महीने में दोहराई जाती हैं।

अमेरिकी सरकार के स्वास्थ्य विभाग से जुड़े नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक, आमतौर पर प्यूबर्टी लड़कियों में 8 से 13 साल की उम्र के बीच और लड़कों में 9 से 14 साल की उम्र के बीच शुरू होती है और यह 5 चरणों में आगे बढ़ती है। इन दवाओं को शुरुआत में उन बच्चों के इलाज के लिए बनाया गया था जिनमें प्यूबर्टी सामान्य उम्र से बहुत पहले शुरू हो जाती थी। बाद के वर्षों में इनका इस्तेमाल जेंडर डिस्फोरिया से जूझ रहे बच्चों और युवाओं में भी किया जाने लगा। यह माना गया कि प्यूबर्टी को रोककर उन्हें समय मिलेगा ताकि वे बिना शरीर में होने वाले अनचाहे बदलावों के तनाव के अपनी जेंडर पहचान को समझ सकें और बाद में यह फैसला कर सकें कि आगे जेंडर-अफर्मिंग हार्मोन थेरेपी लेनी है या नहीं।

‘जेंडर आइडेंटिटी’ को लेकर बढ़ रहा है भ्रम!

UK में NHS की एक विशेष सेवा है जिसे ‘जेंडर आइडेंटिटी डेवलपमेंट सर्विस’ (GIDS) कहा जाता है। यह उन बच्चों और युवाओं की मदद करती है जिन्हें अपनी जेंडर पहचान को लेकर भ्रम, असहजता या मानसिक परेशानी महसूस होती है। नवंबर 2023 में यूके की संसद में एक रिपोर्ट पेश की गई जिसमें बताया गया कि साल 2011–12 में इस सेवा के पास केवल 210 बच्चों और युवाओं को भेजा गया था लेकिन 2021–22 तक यह संख्या बढ़कर 5,000 से भी ज्यादा हो गई।

यानी लगभग दस सालों में जेंडर पहचान से जुड़ी समस्याओं के लिए मदद लेने वाले बच्चों और युवाओं की संख्या में तेज बढ़ोतरी हुई है। GIDS पूरे UK के बच्चों और युवाओं की देखभाल करता है। इनमें से कुछ बच्चे और युवा ट्रांसजेंडर होते हैं जबकि कई ऐसे भी होते हैं जो केवल अपनी पहचान को लेकर उलझन या तनाव से गुजर रहे होते हैं।

जेंडर डिस्फोरिया और युवाओं में इसका इलाज

जेंडर डिस्फोरिया एक मानसिक स्थिति है जिसमें व्यक्ति अपने जन्म के समय मिले जेंडर को लेकर असहज महसूस करता है। इससे तनाव, चिंता और अवसाद जैसी समस्याएँ हो सकती हैं। ब्रिटेन में ऐसे मामलों की संख्या तेजी से बढ़ी है और विशेषज्ञ बताते हैं कि इन बच्चों में से कई ऑटिज्म या अन्य मानसिक समस्याओं से भी जूझ रहे होते हैं।

जेंडर डिस्फोरिया के इलाज के दो मुख्य तरीके हैं। इसमें पहला है- ‘एफर्मेटिव केयर’ जिसमें बच्चे की बताई गई जेंडर पहचान को स्वीकार कर हार्मोन या सर्जरी जैसे मेडिकल इलाज दिए जाते हैं। दूसरा है- ‘एक्सप्लोरेटिव थेरेपी’ जिसमें बच्चे की मानसिक स्थिति, परिवार, समाज और भावनात्मक कारणों को समझने की कोशिश की जाती है।

ब्रिटेन में पहले NHS की टैविस्टॉक क्लिनिक, जिसे GIDS भी कहते हैं, में प्यूबर्टी ब्लॉकर्स का खूब इस्तेमाल होता था लेकिन 2020 में कीरा बेल नामक मरीज का केस के बाद यह सवाल उठा कि क्या बच्चे इसके जोखिम समझ सकते हैं। इसके बाद ऐसे इलाजों पर रोक लगी। दूसरे देशों में भी रुख बदल रहा है। फिनलैंड और स्वीडन ने इन दवाओं पर पाबंदी लगाई है।

‘कैस’ रिव्यू में क्या सामने आया?

2020 में NHS ने एक रिव्यू शुरू करवाया जिसकी अुगआई डॉ. हिलेरी कैस ने की थी। इसका उद्देश्य युवाओं के लिए दी जा रही जेंडर आइडेंटिटी सेवाओं की गहराई से जाँच करना था, क्योंकि ऐसे मामलों में तेजी से बढ़ोतरी हो रही थी और इलाज से जुड़े ठोस सबूत कमजोर माने जा रहे थे। अप्रैल 2024 में इसकी फाइनल रिपोर्ट पब्लिश की गई।

इसमें पाया गया कि प्यूबर्टी ब्लॉकर्स के पीछे का वैज्ञानिक आधार अभी स्पष्ट नहीं है। जेंडर डिस्फोरिया, मानसिक स्वास्थ्य या सामाजिक-मनोवैज्ञानिक स्थिति पर इसके प्रभावों को लेकर ठोस सबूत बहुत कम हैं। दिमागी विकास और यौन-मनोवैज्ञानिक विकास पर इसके क्या असर पड़ते हैं, यह भी अभी ठीक से पता नहीं है। रिपोर्ट में कहा गया कि इन दवाओं से हड्डियों की मजबूती, दिमाग के विकास और प्रजनन क्षमता पर संभावित प्रभाव हो सकता है

रिपोर्ट में कहा गया, “18 साल से कम उम्र के बच्चों और युवाओं में मर्दाना या औरतों वाले हार्मोन देने को लेकर भी कई सवाल बने हुए हैं। कम उम्र में इलाज शुरू करने वालों पर लंबे समय तक किए गए अध्ययन उपलब्ध नहीं हैं, इसलिए इसके भविष्य के नतीजों को पूरी तरह समझना संभव नहीं है। डॉक्टर भी यह भरोसे से नहीं बता सकते कि कौन-से बच्चे आगे चलकर स्थाई रूप से ट्रांसजेंडर पहचान अपनाएँगे।”

ट्रायल के समर्थन और विरोध में तर्क

इस ‘प्यूबर्टी ब्लॉकर’ ट्रायल को लेकर कई तरह की चिंताएँ सामने आई हैं। आलोचकों का कहना है कि यह ट्रायल नैतिक रूप से सही नहीं है और बच्चों की सुरक्षा से जुड़े सवाल खड़े करता है। जेनस्पेक्ट जैसे समूहों के अनुसार, ट्रायल की योजना में उन बच्चों का जिक्र नहीं है जो बाद में अपना फैसला बदल सकते हैं। उनका कहना है कि लगभग 98 प्रतिशत बच्चे आगे चलकर हार्मोन इलाज पर चले जाते हैं, जिससे भविष्य में संतान पैदा करने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। ट्रायल केवल दो साल का है, जबकि पछतावे के मामले कई बार 7-11 साल बाद सामने आते हैं। इन समूहों ने दिसंबर 2025 में विरोध प्रदर्शन किए और सांसदों से इस ट्रायल को रोकने की माँग की।

वहीं, ट्रायल के समर्थकों का कहना है कि इससे ठोस जानकारी मिलेगी और परिवार बेहतर फैसले ले पाएँगे। सरकार ने इसे मंजूरी दी है लेकिन कई दलों के नेता इसके खिलाफ हैं। दूसरे देशों में भी ऐसे इलाजों को रोका जा रहा है। कुल मिलाकर यह बहस बच्चों की सुरक्षा और सही इलाज को लेकर है और फैसला इसी आधार पर होना चाहिए।

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शिव
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7 वर्षों से खबरों की तलाश में भटकता पत्रकार...

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