मुँह ढके दो बाइक सवार आते हैं। सौ-सौ के पाँच नोटों पर थूक लगाते हैं और अलीगढ़ के एक गॉंव में फेंक फरार हो जाते हैं। उनकी यह हकरत एक महिला देख लेती है। ग्रामीणों को इसकी खबर देती है तो हड़कंप मच जाता है फिर...
बहराइच पुलिस ने शहर के ताज और कुरैश मस्जिद से 17 विदेशियों समेत 21 तबलीगी जमातियों को 31 मार्च को हिरासत में लिया था। क्वारंटाइन में रखने के बाद इन सबका मेडिकल टेस्ट किया गया। रिपोर्ट नेगेटिव आई। क्वारंटाइन अवधि ख़त्म होते ही इन्हें जेल भेज दिया गया।
कानपुर के चमनगंज में घर-घर जाकर नर्सें कोरोना संदिग्धों की जॉंच में जुटी थीं। इसी दौरान कलीम, अमजद अंसारी, बजी अहमद और सलीम ने उनके साथ छेड़खानी की। गाली-गलौज करते हुए उन पर फब्तियाँ कसी, साथ ही अश्लील हरकतें भी की।
“पुलिस जब मौके पहुँची तो मस्जिद के भीतर 20-25 लोग थे जो नमाज की तैयारी कर रहे थे। उनमें से सात को गिरफ्तार कर लिया गया है। बाकी लोग भाग गए, जिनमें एक मौलाना भी था।”
मेरठ में पुलिस ने 11 हॉटस्पॉट चिह्नित किए हैं, जिन्हें सील किया जाना है। ये 11 कोरोना हॉटस्पॉट 9 थानों के अंतर्गत आए हैं। इनमें से 3 मस्जिद वाले इलाक़े हैं। इनमें से एक जली कोठी वाला इलाक़ा भी है, जहाँ की दरी वाली मस्जिद में 3 जमाती रुके हुए थे।
पुलिस ने 28 मार्च की देर रात हाइवे पर जीरो प्वाइंट के पास भारी भीड़ जमा देखी। भीड़ देख पुलिस वहाँ पर पहुँची। भीड़ हटाने की कोशिश की तो वहाँ पर कॉन्ग्रेस नेता और उनके दोस्तों ने हंगामा शुरू कर दिया। साथ ही पुलिस के साथ अभद्रता भी की।
लखनऊ में रहने वाले जमातियों का पता लगाने के लिए 700 से अधिक मोबाईल नंबरों को सर्विलांस पर रखा गया था। इनमें से 200 से अधिक जमातियों के नंबर अचानक से बंद हो गए। इन जमातियों के सम्पर्क में रहे करीब 300 लोगों ने भी अपने मोबाइल बंद कर लिए हैं।
"अब अस्पताल में भर्ती संक्रमित जमातियों को अपनी भूल का एहसास हो गया है। इससे पहले वे संक्रमण फैलाने के लिए तरह-तरह के तरीके अपना रहे थे, लेकिन बिगड़ते हालात को देख उनके व्यवहार में बदलाव आया है। अब आसानी से वे दवाइयाँ खा रहे हैं, क्योंकि यह उनके भले के लिए ही है।"
सबसे बड़ी संख्या में जमाती बिजनौर जिले में छिपे पाए गए। बिजनौर जिले से असम की पाँच महिलाओं सहित 35 जमातियों को पकड़कर क्वारंटाइन किया गया है। जिले में अब तक 487 जमाती पुलिस द्वारा तलाशे जा चुके हैं।
पलायन अवसर भी है और अभिशाप भी। लेकिन देश की हिंदी पट्टी के लिए यह मजबूरी ही दिखती है। आर्थिक सुरक्षा के लिए ही महानगरों में पहुॅंचने वाले लोगों को जब यह सुरक्षा खतरे में दिखी तो उन्होंने घर लौटने में भलाई समझी। लॉकडाउन बढ़ने और घर तक जाने के लिए बस की व्यवस्था की अफवाहों ने उन्हें सड़क पर उतार दिया।