Friday, October 23, 2020
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भाई का ‘जहर’ बिका नहीं, बहन नमक पर बनाने चली ‘लल्लू’: कॉन्ग्रेसी मुखपत्र में प्रियंका गाँधी का इमोशनल अत्याचार

कॉन्ग्रेस के मुखपत्र में प्रियंका गॉंधी ने एक कहानी लिखी है। इसमें उन्होंने उन्नाव रेप पीड़िता का दर्द बेचा है। फिर अपनी पार्टी के यूपी अध्यक्ष अजय सिंह लल्लू का संघर्ष। भावनाओं की चाशनी में लपेट यूपी सरकार पर आरोप मढ़ा है ताकि वे सवाल फिर से खड़े न हो जिसके कारण बीते दिनों उनकी भारी फजीहत हुई थी।

कॉन्ग्रेस का मुखपत्र है नेशनल हेराल्ड। इसका हिंदी वर्जन है नवजीवन। नवजीवन में एक लेख कॉन्ग्रेस महासचिव प्रियंका गाँधी का छपा है। शीर्षक है- प्रियंका गाँधी का लेख: अडिग और अजय ‘लल्लू’।

उत्तर प्रदेश कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू को यह कहानी (लेख की बजाए इसे कहानी कहना ज्यादा समुचित होगा) समर्पित है। इसमें प्रियंका कहती हैं, “अजय लल्लू कक्षा 6 के छात्र थे जब उन्होंने सड़क पर ठेला लगाया। दीवाली में पटाखे बेचे, बुआई के मौसम में खाद और बाकी के दिनों में नमक।”

भावनाओं में पिरोए इस कहानी पर चर्चा करने से पहले वक्त को थोड़ा पीछे ले जाते हैं। जनवरी का महीना था और साल था 2014। दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में कॉन्ग्रेस का सम्मेलन चल रहा था। मनमोहन सरकार में मंत्री रहे और गाँधी परिवार के वफादार माने जाने वाले मणिशंकर अय्यर ने इसी सम्मेलन में कहा था, “मैं आपसे वादा करता हूँ कि 21वीं सदी में नरेंद्र मोदी कभी भी देश के प्रधानमंत्री नहीं बनेंगे। लेकिन अगर वो यहाँ चाय बेचना चाहते हैं तो हम उनके लिए एक जगह तलाश लेंगे।”

हालॉंकि जब उस साल हुए आम चुनावों में कॉन्ग्रेस को अपने इतिहास की सबसे शर्मनाक पराजय मिली तो अय्यर इस बयान से पलट गए। मई 2014 में एक इंटरव्यू के दौरान बीबीसी के सलमान रावी ने इस बयान को लेकर अय्यर से सवाल किया तो उनका जवाब था, “माफ कीजिएगा, इस तरह की भाषा का इस्तेमाल कर रहा हूँ। मगर यह आपका सवाल बिल्कुल बकवास है। मैंने उनको कभी चायवाला नहीं कहा और न वह कभी चायवाले ही थे। वह तो खुद अपने भाषणों में जगह-जगह इस बात को कहा करते थे। अहमद पटेल ने मुझे बताया कि वह ठेके पर कैंटीन चलाया करते थे। मैंने तो बस इतना कहा था कि प्रधानमंत्री बनने की क्षमता उनमें नहीं है।”

ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि आप एक बार फिर अय्यर को सुने और जान लें कि उन्होंने कहा क्या था। वीडियो कॉन्ग्रेस के ही ‘अघोषित’ चैनल एनडीटीवी से लिया गया है, ताकि कोई यह न कह सके कि इसके साथ छेड़छाड़ की गई है।

असल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बेहद सामान्य पृष्ठभूमि के परिवार से हैं। बचपन में वे वडनगर रेलवे स्टेशन पर चाय बेचा करते थे। इस तरह की पारिवारिक पृष्ठभूमि से निकलकर संघर्ष में तपकर ऊँचाइयों को छूने वाले बहुतेरे हैं। लेकिन, जब मोदी के बचपन में चाय बेचने की बात निकलकर पब्लिक डोमेन में आई तो कॉन्ग्रेस ने इसका खूब मजाक बनाया। मोदी उस समय भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार और गुजरात के मुख्यमंत्री थे। अय्यर का बयान ‘चायवाले का मजाक बनाने’ की कॉन्ग्रेस की उसी रणनीति की बानगी है।

अब थोड़ा आगे बढ़ते हैं। 2018 के आखिर में एक साक्षात्कार के दौरान पीएम मोदी ने कहा कि ‘पकौड़ा बेचना’ भी एक तरह का काम है। अगले साल आम चुनाव थे। इसलिए कॉन्ग्रेसियों ने इस बयान का भी जमकर मजाक उड़ाया। तत्कालीन कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गॉंधी ने इसका मखौल बनाते हुए कहा था, “मेक इन इंडिया, स्टार्ट अप इंडिया, सिट डाउन इंडिया, पकौड़ा…। शुरू में उन्होंने मेक इन इंडिया की बात की फिर स्टार्ट अप इंडिया की बात की, इसके बाद स्टैंड अप इंडिया की बात की और आखिर में वह पकौड़ा पर जाकर रुके।”

इससे आप समझ सकते हैं कि सामान्य पृष्ठभूमि के छोटे-छोटे रोजगार करने वाले लोगों के लिए कॉन्ग्रेस का शीर्ष नेतृत्व कितनी हीन भावना रखता है। लेकिन, समय का चक्र देखिए कि आज उसी राहुल गॉंधी की बहन, उसी गाँधी परिवार की सदस्य प्रियंका गॉंधी एक प्रदेश के अपने पार्टी अध्यक्ष के बचपन में ठेला लगाने, पटाखे, खाद और नमक बेचने की कहानी बेच रही हैं।

नवजीवन में प्रकाशित प्रियंका गॉंधी का कथित लेख

इतना ही नहीं इस कहानी में प्रियंका गाँधी ने यह भी बताया है कि लल्लू दिल्ली में एक झुग्गी में मजदूरों के साथ रहते थे। उनकी रोजाना कमाई थी 90 रुपया। फिर वह बताती है कि दो साल बाद लल्लू दिल्ली से लौटकर कैसे कॉन्ग्रेस में सक्रिय हुए और विधायक बने। वगैरह, वगैरह।

लल्लू ने अपने जीवन में क्या-क्या किया है और क्या-क्या पाया है, इस पर बात करने की बजाए हम यह जानते हैं कि वे फिलहाल चर्चा में क्यों हैं।

लल्लू मई में बसों की गलत जानकारी और धोखाधड़ी के आरोप में गिरफ्तार किए गए थे। उनकी जमानत याचिका पर 12 जून को इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने सुनवाई की। सरकार से जवाब मॉंगते हुए अदालत ने सुनवाई की अगली तारीख 16 जून की मुकर्रर की है। ध्यान देने वाली बात यह है कि 12 जून को ही लल्लू को समर्पित प्रियंका गॉंधी का लेख नवजीवन में प्रकाशित हुआ है।

लेकिन, इस पूरे लेख में प्रियंका गाँधी ने उन सवालों का जवाब नहीं दिया है जो लॉकडाउन के दौरान उनकी बस पॉलिटिक्स के कारण उठे थे। यहॉं तक कि रायबरेली की कॉन्ग्रेस विधायक अदिति सिंह ने भी इस मामले में पार्टी के स्टैंड का विरोध किया था। अदिति सिंह ने ट्वीट कर कहा था था, “आपदा के वक्त ऐसी निम्न सियासत की क्या जरूरत, एक हजार बसों की सूची भेजी, उसमें भी आधी से ज्यादा बसों का फर्जीवाड़ा। 297 कबाड़ बसें, 98 ऑटो रिक्शा व एबुंलेंस जैसी गाड़ियाँ, 68 वाहन बिना कागजात के, ये कैसा क्रूर मजाक है। अगर बसें थीं तो राजस्थान, पंजाब, महाराष्ट्र में क्यूँ नहीं लगाई।”

एक अन्य ट्वीट में उन्होंने कहा था, “कोटा में जब यूपी के हजारों बच्चे फँसे थे तब कहाँ थीं ये तथाकथित बसें। तब कॉन्ग्रेस सरकार इन बच्चों को घर तक तो छोड़िए, बॉर्डर तक ना छोड़ पाई। तब योगी आदित्यनाथ ने रातों रात बसें लगाकर इन बच्चों को घर पहुँचाया। खुद राजस्थान के सीएम ने भी इसकी तारीफ की थी।”

इन सवालों के जवाब देने की बजाए कॉन्ग्रेस ने अदिति सिंह को पार्टी की महिला विंग के महासचिव पद से हटा दिया था। तुर्रा ये कि अपने लेख में लल्लू की गिरफ्तारी की चर्चा करते हुए प्रियंका गॉंधी ने यूपी सरकार पर उनके खिलाफ कई धाराओं में फर्जी मुकदमे लादने का आरोप मढ़ दिया है।

प्रियंका बखूबी जानती थीं कि जब वे यूपी सरकार पर बदले की भावना से कार्रवाई के आरोप लगाएँगी तो वे सारे सवाल फिर खड़े होंगे जिसके कारण लॉकडाउन के दौरान प्रवासी मजदूरों के नाम पर सियासत करने को लेकर कॉन्ग्रेस और उनकी छीछालेदर हुई थी। इसलिए किसी किस्सागोई की तरह उन्होंने अपनी कहानी भावनाओं में लपेट कर शुरू की है।

उन्नाव रेप पीड़िता के दर्द को बेचने के साथ उन्होंने अपनी इस कहानी की शुरुआती की है। साथ ही साथ यह भी बताया है कि लल्लू उन्हें ‘दीदी’ और वे उन्हें ‘अजय भैया’ के नाम से संबोधित करती हैं। आगे उन्होंने 40 साल के लल्लू (2017 में लगातार दूसरी बार विधायक चुने गए थे) के बचपन और जवानी का संघर्ष बेचा है। आखिर में वे अपनी बस पॉलिटिक्स पर आती हैं। इस दौरान प्रियंका गॉंधी ने भरपूर कोशिश की है कि भावनाओं का डोज कम नहीं हो ताकि कोई वे सवाल नहीं पूछ सके जिसका वह जवाब नहीं देना चाहतीं।

ये वही प्रियंका गॉंधी हैं जो मैनपुरी में फसल काटने को लेकर ठाकुरों के दो समूहों के विवाद को दलित की पिटाई बताकर परोस चुकी हैं। ये वही प्रियंका गॉंधी हैं जिन्होंने बीते साल दिसंबर में लखनऊ में ड्यूटी कर रहीं महिला अधिकारी पर गला दबाने और जमीन पर गिराने का आरोप लगा दिया था। जबकि इस घटना के वीडियो में प्रियंका के साथ खड़े ‘गुंडे’ ही महिला अधिकारी के साथ धक्का-मुक्की करते नजर आए थे।

जाहिर है प्रियंका गॉंधी का संवेदनाओं से कोई साबका नहीं है। उन्होंने भावनाओं के चूल्हे पर अपनी सियासी रोटी सेंकने की कोशिश की है।

ऐसी ही कोशिश उनके भाई राहुल गॉंधी ने 20 जनवरी 2013 को किया था। पार्टी उपाध्यक्ष बनने पर जयपुर में कॉन्ग्रेस के चिंतन शिविर को संबोधित करते हुए राहुल गॉंधी ने भावना से सराबोर 38 मिनट का एक भाषण दिया था। ‘सत्ता जहर है’ वाले इस मशहूर भाषण पर उस समय मीडिया लहालोट हो गई थी।

लेकिन ये 2020 का भारत है। मेनस्ट्रीम मीडिया के प्रोपेगेंडा को हर कदम पर तार-तार करने के लिए एक पैरलेल मीडिया है। ऐसे में प्रियंका गॉंधी अपनी ही इमोशनल अत्याचार में उलझी नजर आतीं हैं। कहानी के अंत में उन्होंने लिखा है, “अजय लल्लू उस भारत के सच्चे नागरिक हैं जिसके लिए महात्मा गॉंधी ने लड़ाई लड़ी थी। वे इंसाफ के हकदार हैं। उनके साथ न्याय होना चाहिए।” यकीनन ये महात्मा गॉंधी का भारत है और कॉन्ग्रेस के कुकर्मों का इंसाफ भी कर रही है।

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अजीत झा
देसिल बयना सब जन मिट्ठा

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