10 दिसंबर तक ज़िले में धारा-144 लागू रहेगी। इस मामले में 17 नवंबर तक फ़ैसला सुनाए जाने की उम्मीद है। मुस्लिम पक्ष 14 अक्टूबर तक अपनी दलीलें पूरी करेंगे। हिंदू पक्षकारों को अपना जवाब पूरा करने के लिए 16 अक्टूबर तक का समय मिलेगा।
मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने मुस्लिम बुद्धिजीवियों व अन्य संगठनों द्वारा दिए गए सुझावों को ठुकरा दिया है। आज 'ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड' की बैठक भी हुई। संगठन ने साफ़ कर दिया है कि विवादित ज़मीन को छोड़ने का कोई सवाल ही नहीं है।
मध्यस्थता के लिए आयोजित इस बैठक का कुछ मुस्लिम संगठनों ने विरोध भी किया। इत्तेहादुल मुस्लिम मजालिस संगठन ने होटल के बाहर प्रदर्शन किया। उनका कहना है कि जब 18 नवम्बर तक फ़ैसला आ जाएगा तो उससे पहले मध्यस्थता का क्या मतलब है?
एएसआई की रिपोर्ट पर सुप्रीम कोर्ट के सवालों का साफ-साफ जवाब नहीं दे पाईं मुस्लिम पक्ष की वकील मीनाक्षी अरोड़ा। कमल के निशान, खुदाई में वराह की मूर्ति मिलने जैसे कई सबूतों पर अदालत ने पूछे थे सवाल। अष्टकोणों को भी हिन्दू धर्म का मानने से कर दिया इनकार।
पराशरण ने कहा कि अगर लोगों को विश्वास है कि किसी जगह पर दिव्य शक्ति है तो इसे न्यायिक व्यक्ति माना जा सकता है। उन्होंने कुड्डालोर मंदिर का उदाहरण देते हुए कहा कि वहाँ मंदिर में कोई मूर्ति नहीं है और केवल एक दीया जलता है जिसकी पूजा की जाती है।
पराशरण ने बताया कि मूर्ति अपने-आप में भगवान नहीं है, लेकिन स्थापना के बाद उसमें दिव्यता आ जाती है। उन्होंने बताया कि ऐसी मूर्ति में स्थापित ईश्वर लोगों की भावनाओं और आस्थाओं का प्रतीक होते हैं।
उन्हें समर्पित की गई चल व अचल संपत्ति के भी वह स्वामी होते हैं।
वरिष्ठ वकील ने कहा कि चूँकि, आर्किओलॉजी एक नेचुरल साइंस नहीं है, इसके रिपोर्ट्स में यथार्थता नहीं है। उन्होंने दावा किया कि पुरातत्व विभाग ने अभी तक ऐसा कोई निष्कर्ष नहीं दिया है, जिसे वेरीफाई किया जा सके। उन्होंने इसे त्रुटिपूर्ण और विरोधाभास भरा करार दिया।
"अगर विवादित स्थल पर इतिहास में कोई मंदिर था तो वह कब गायब हो गया होगा, किसी को नहीं पता। यह ढाँचा 19वीं सदी तक भारत के किसी अन्य सामान्य मस्जिद की तरह ही था, विवाद के बाद यह चर्चित हो गया।"
मुस्लिम पक्षकार ने दावा किया कि जन्मस्थान अयोध्या में ही है लेकिन विवादित स्थल पर नहीं है, कहीं और है। इससे पहले मुस्लिम पक्षकार राजीव धवन ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि पूरे अयोध्या को ही जन्मस्थान माना जाता है और इसके बारे में कोई सटीक स्थान का जिक्र नहीं है।
मंदिरों की संपत्ति तो पहले ही सरकारी कब्जे में है। सबसे ज्यादा ज़मीनों वाले चर्च और वक्फ बोर्ड को तो सरकारी नियंत्रण से मुक्त रखा गया है, लेकिन सरकार मंदिरों की जमीनें समय-समय पर, किसी न किसी बहाने से बेचती रही है।