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‘आवरण’ से मुगल इतिहास पर खड़े किए सवाल, ‘पर्व’ में महाभारत के किरदारों को बनाया आम आदमी: जानिए कौन थे कन्नड़ लेखक एसएल भैरप्पा, 94 साल की उम्र में निधन

एसएल भैरप्पा का सबसे विवादित उपन्यासों में से एक था आवरण (2007)। उन्होंने इसे कई सालों की गहरी रिसर्च के बाद लिखा था। इस किताब में उन्होंने भारत के मध्यकालीन इतिहास, खासकर मुगल काल को जिस तरह स्कूल की किताबों और सार्वजनिक चर्चाओं में दिखाया गया है, उस पर सवाल उठाए।

कन्नड़ के प्रसिद्ध लेखक और पद्म भूषण से सम्मानित एसएल भैरप्पा का बुधवार (24 सितंबर 2025) को 94 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। उन्होंने बेंगलुरु के जयदेव मेमोरियल राष्ट्रोत्त्थान अस्पताल और रिसर्च सेंटर में अंतिम साँस ली।

एसएल भैरप्पा का पिछले तीन महीनों से इलाज चल रहा था। मंगलवार (23 सितंबर 2025 ) को दोपहर 2.38 बजे उन्हें दिल का दौरा पड़ा। वे कुछ समय से उम्रदराज होने के चलते उससे जुड़ी बीमारियों से जूझ रहे थे। कुछ महीने पहले सुबह की सैर के दौरान गिर भी गए थे।

भैरप्पा को बेहतर इलाज के लिए मैसूर से बेंगलुरु लाया गया था लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद उनकी तबीयत बिगड़ती गई। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, उनका अंतिम संस्कार 26 सितंबर 2025 को मैसूर में किया जाएगा, वही शहर जहाँ उन्होंने अपने जीवन के कई साल बिताए। 25 सितंबर 2025 को उनका पार्थिव शरीर बेंगलुरु के रविंद्र कलाक्षेत्र में रखा जाएगा ताकि लोग उन्हें अंतिम श्रद्धांजलि दे सकें।

लेखक के निधन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी एक्स पर भावनात्मक पोस्ट लिख दुख जताया। पीएम ने लिखा, “श्री एसएल भैरप्पा जी के जाने से हमने एक महान व्यक्तित्व को खो दिया है, जिन्होंने हमारे अंतर्मन को जगाया और भारत की आत्मा को गहराई से छुआ।”

पीएम मोदी ने आगे लिखा, “वे निडर और समय से परे सोचने वाले लेखक थे, जिन्होंने अपनी उत्तेजक रचनाओं से कन्नड़ साहित्य को समृद्ध किया। उनकी लेखनी ने पीढ़ियों को सोचने, सवाल करने और समाज से गहराई से जुड़ने के लिए प्रेरित किया।”

प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि एसएल भैरप्पा को भारत के इतिहास और संस्कृति में गहरी रुचि थी, जो आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी। उन्होंने आगे लिखा, “इस दुख की घड़ी में मेरा दिल उनके परिवार और प्रशंसकों के साथ है। ओम् शांति।”

प्रारंभिक जीवन और करियर

एसएल भैरप्पा का जन्म सन्तेशिवरा लिंगन्नैया भैरप्पा के रूप में हासन जिले के चन्नरायपटना तालुक में हुआ था। उन्होंने अपना बचपन हासन और मैसूर में बिताया। वे भारत के कई हिस्सों जैसे गुजरात और नई दिल्ली में दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर रहे। उन्होंने NCERT (राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद) में भी काम किया और मैसूर के रीजनल इंस्टीट्यूट ऑफ एजुकेशन (RIE) से प्रोफेसर पद से रिटायर हुए।

हालाँकि उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में खूब मेहनत की लेकिन उनका असली जुनून उपन्यास लिखना था। उनका साहित्यिक सफर 1958 में ‘भीमकाय’ नाम की उपन्यास से शुरू हुआ, जब वे 27 साल के थे। उनकी किताबों की लोकप्रियता ऐसी है कि उनका पहला उपन्यास आज भी छपता और बिकता है।

अगले साठ वर्षों में उन्होंने कुल 25 उपन्यास लिखे। उनका आखिरी उपन्यास ‘उत्तरकांड’ (2017) था, जो रामायण की कहानी को महिलाओं के दृष्टिकोण से प्रस्तुत करता है। इसके बाद उन्होंने लेखन से संन्यास ले लिया।

भैरप्पा कन्नड़ के सबसे लोकप्रिय और सबसे ज्यादा बिकने वाले उपन्यासकार थे। उनकी किताबें कई बार छप चुकी हैं और शुरुआती रचनाएँ भी लगातार पुनः प्रकाशित होती रहती हैं। उनकी लोकप्रियता सिर्फ कर्नाटक तक सीमित नहीं रही। उनके सभी उपन्यास कई भारतीय भाषाओं, अंग्रेजी और यूरोपियन भाषाओं में भी अनुवाद किए गए हैं।

उनकी कुछ प्रसिद्ध रचनाओं में वंशवृक्ष (1965), गृहभंग (1970) और पर्व (1979), जो कि महाभारत की पुनर्कथा है, शामिल हैं। उन्हें मंद्र (2001) उपन्यास के लिए 2010 में सरस्वती सम्मान मिला और 2023 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया।

आवरण: उनकी उत्कृष्ट कृतियों में से एक

एसएल भैरप्पा का सबसे विवादित उपन्यासों में से एक था आवरण (2007)। उन्होंने इसे कई सालों की गहरी रिसर्च के बाद लिखा था। इस किताब में उन्होंने भारत के मध्यकालीन इतिहास, खासकर मुगल काल को जिस तरह स्कूल की किताबों और सार्वजनिक चर्चाओं में दिखाया गया है, उस पर सवाल उठाए।

भैरप्पा का मानना था कि धर्मनिरपेक्षता के नाम पर कई कड़वे सचों को दबा दिया गया या लोगों पर थोप दिया गया। इस उपन्यास में उन्होंने इतिहास की बहसों को आज के मुद्दों से जोड़ा- जैसे कि धर्मों के बीच शादी, धार्मिक स्वतंत्रता और पहचान से जुड़ी चिंताएँ।

हालाँकि कुछ आलोचकों ने एसएल भैरप्पा पर यह आरोप लगाया कि उनका उपन्यास ‘आवरण’ मुस्लिम विरोधी और राजनीतिक सोच से प्रेरित है। लेकिन उनके प्रशंसकों ने इस किताब को एक साहसी कोशिश माना, ऐसी कोशिश जो इतिहास के छिपाए गए पहलुओं को सामने लाती है।

विवादों के बावजूद ‘आवरण’ बहुत लोकप्रिय हुआ, बेस्टसेलर बना और कई भाषाओं में इसका अनुवाद भी हुआ। यह उपन्यास वर्तमान के भारतीय साहित्य में सबसे ज्यादा चर्चा में रहने वाली रचनाओं में से एक है।

पर्व: महाभारत की एक अलग तस्वीर

भैरप्पा की सबसे चर्चित रचनाओं में से एक पर्व (1979) भी है, जिसे उनकी उत्कृष्ट कृति माना जाता है। इस उपन्यास में उन्होंने महाभारत की कहानी को एक धार्मिक या चमत्कारी कथा की तरह नहीं बल्कि एक यथार्थवादी दृष्टिकोण से पेश किया है। इसमें इंसानों के बीच का संघर्ष, मनोवैज्ञानिक उलझनें और सामाजिक हालात को केंद्र में रखा गया है।

इस किताब में भगवानों और चमत्कारों को हटा दिया गया है। इसके पात्र जैसे भीष्म, द्रौपदी, कर्ण और कृष्ण को एक आम इंसान की तरह दिखाया गया है, जो महत्वाकांक्षा, पीड़ा, निजी दुख और नैतिक दुविधाओं से जूझते हैं। इस तरह ‘पर्व’ महाभारत को एक ऐतिहासिक और सामाजिक दस्तावेज की तरह प्रस्तुत करता है।

(मूलरूप से यह रिपोर्ट श्रीति सागर ने लिखी है। विस्तार से इस रिपोर्ट को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

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Shriti Sagar
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Journalist

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