“जब इस दौर का इतिहास लिखा जाएगा, नाइंसाफी की दास्तान लिखी जाएगी तो उमर खालिद का नाम सबसे ऊपर होगा। क्योंकि वे पिछले 10 से 15 साल में मोदी सरकार की भगवा राजनीति का शिकार हुए हैं।”
तो कुछ इस तरीके से आरफा खानुम शेरवानी अपने नए यूट्यूब वीडियो में दिल्ली दंगा 2020 के साजिशकर्ता उमर खालिद का परिचय देती हैं। नए वीडियो में आरफा ने प्रतिबंधित संगठन SIMI से जुड़े उमर खालिद के अब्बा एस कासिल रसूल इलियास का साक्षात्कार लिया है। खालिद के अब्बा से बातचीत में आरफा ने अपने ‘प्रिय’ जोहरान को भी याद किया, और उमर खालिद की तुलना स्वतंत्रता सेनानी भगत सिंह से भी की। यह साक्षात्कार कुछ और नहीं, बल्कि उमर खालिद को ‘स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ने वाले क्रांतिकारी का तबका’ देने का पूरा प्रयास है, जिससे एक और भारत-विरोधी उमर खालिद का जन्म हो।
पूरे इंटरव्यू में काफी अटपटी बातें कही गई हैं। जैसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उमर खालिद के नाम को बढ़ावा मिलने पर खुशी जताई गई है, तो वहीं बाहरी देशों में पीएम मोदी की छवि को बेकार बताया गया है। न्यूयॉर्क के नवनिर्वाचित मेयर जोहरान ममदानी की उमर खालिद को लिखी उस चिट्ठी की बारे में भी बात की गई। उमर खालिद को लेकर भारत की मोदी सरकार और न्यायपालिका को भी घेरे में रखा गया। कुल मिलाकर आरफा और उमर खालिद के अब्बा के बीच उस राजनीति और विजन की बात हुई, जिसे जेल में बैठे उमर खालिद ने साल 2020 में सुलगाने की कोशिश की थी।
जोहरान ममदानी से मुलाकात की बात छिपाई
हाल ही में उमर खालिद के अब्बा इलियास ने खुलासा किया था कि उन्होंने न्यूयॉर्क में नवनिर्वाचित मेयर जोहरान ममदानी से दिसंबर 2025 में मुलाकात की थी। आरफा के साथ इंटरव्यू में भी उन्होंने यह बात दोहराई और जोहरान की उमर खालिद के नाम चिट्ठी पर भी बात की।
इलियास कहते हैं कि उन्होंने जोहरान ममदानी से मुलाकात की बात को छिपाकर रखा, क्योंकि वह ‘मुनासिब’ समझते थे कि जोहरान के शपथ लेते ही इस बात को दुनिया के सामने लाया जाए। यहाँ अब्बा ने पूरी रणनीति के साथ जोहरान की उमर खालिद के नाम चिट्ठी को दुनिया के सामने पेश किया है।
वह जानते थे कि यह बात जोहरान के चुनाव जीतने के बाद सामने आनी ही बेहतर है, क्योंकि तब वह ‘रौला’ दिखा सकते थे कि विदेश तक से उमर खालिद को समर्थन मिल रहा है। वह भी उस व्यक्ति से जो भारत के इस्लामी कट्टरपंथी और लेफ्ट-लिबरल के बीच खूब चर्चित है। इसीलिए पूरी बातचीत में बार-बार जोर देकर कह रहे हैं कि देखो उमर खालिद को जोहरान जैसे ‘महान व्यक्ति’ का समर्थन मिल रहा है, और वह ऐसे व्यक्ति से भारतीय राजनेताओं को सबक लेने की सीख भी देते हैं।
आरफा खानुम और जोहरान ममदानी की जबरदस्ती वाली दोस्ती
यहाँ जोहरान के ‘अनपेड कैंपियन’ का हिस्सा आरफा खानुम भी हमेशा की तरह जोहरान का राग अलापते हुए कहती हैं कि उमर खालिद को जोहरान ममदानी ने खत इसीलिए लिखा, क्योंकि वे दुनियाभर में नाइंसाफी की परवाह करते हैं।
आरफा यहाँ बिल्कुल सही है। दुनियाभर की परवाह तो करते हैं जोहरान ममदानी। बिल्कुल उसी तरह जिस तरह आरफा करती हैं। मुस्लिमों की हिंसा पर चुप्पी और हिंदुओं से जुड़े मामूली सी बात पर खूब बवाल। इसीलिए तो आरफा की तरह ही जोहरान को एक भारत-विरोधी और मोदी-विरोधी उमर खालिद की परवाह हैं, लेकिन बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचार पर बोलना वह मुनासिब नहीं समझते।
असल में जोहरान और आरफा दुनिया के सामने एक मनगढ़ंत कहानी पेश करते हुए जबरदस्ती दोस्त बने बैठे हैं। क्योंकि एक ने मोदी-विरोधी छवि बनाकर न्यूयॉर्क में इस्लामी कट्टरपंथियों के वोट हासिल किए और दूसरी यहाँ भारत में बैठकर इस्लामी कट्टरपंथियों और आतंकवादियों की छवि सुधारती है। बदले में जोहरान मेयर तो बना, लेकिन आरफा तो अब भी आए दिन न्यूयॉर्क में तस्वीरें खिंचवाती है और वहाँ की नागरिकता मिलने का इंतजार करती है।
पीएम मोदी की छवि खराब, बेटा उमर विदेशों में ‘हीरो’
इंटरव्यू के दौरान आरफा खानुम सवाल करती हैं कि यह जानने के बाद भी कि जोहरान ‘एंटी-मोदी’ हैं और वे पीएम मोदी को ‘वॉर क्रिमिनल’ तक कह चुके हैं। तो ऐसे व्यक्ति से मिलने का क्या कारण था? तो खालिद के अब्बा का जवाब आता है, “मोदी को प्रधानमंत्री बनने से पहले अमेरिका का वीजा तक नहीं मिला था, बाहर के देशों में मोदी के बारे में अच्छी राय तो पाई नहीं जाती है।”
उधर, अपने बेटे को अंतरराष्ट्रीय स्तर का ‘हीरो’ बताने में अब्बा ने कोई कसर नहीं छोड़ी है। उनके लिए देश का प्रधानमंत्री, जिसकी अमेरिका और रूस जैसे ताकतवर देशों से दोस्ती है वह मायने नहीं रखता। लेकिन एक भारत-विरोधी होने के नाते बेटे को अंतरराष्ट्रीय पहचान मिलना उनके लिए उपलब्धि हो जाती है। वह ऐसे कुछ किस्से भी सुनाते हैं, जिससे दर्शक उमर खालिद को अंतरराष्ट्रीय ‘हीरो’ मानने लगें।
एक किस्सा सुनाते हुए इलियास कहते हैं कि एक बार उनकी बीवी इंग्लैंड गई थी, उस दौरान बीवी ने जब टैक्सी ड्राइवर को बताया कि वह उमर खालिद की ‘मदर’ हैं, तो वह टैक्सी ड्राइवर तुरंत उमर को पहचान गया और कहने लगा- वही JNU वाला लड़का। लेकिन इलियास के इन किस्सों में एक बात अधूरी है कि उमर को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लोग पहचानते किस भाव से हैं? जिस छात्र पर देश-विरोधी धाराएँ लगी हो, उसे लोग अच्छी छवि के कारण तो पहचानते नहीं होंगे। ऐसे तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विजय मालया को भी लोग जानते हैं, लेकिन है तो वह ‘भगौड़ा’ ही न।
तो गुजारिश यह है कि उमर खालिद के अब्बा लोगो को न समझाए कि पीएम मोदी की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कैसी छवि है, क्योंकि यह पूरी दुनिया जानती है कि वह विश्व के ताकतवर नेताओं में गिने जाते हैं। यहाँ आपको स्पष्ट करने की जरूरत है कि उमर खालिद को किस छवि से विदेशों में जाना जाता है, बेशक है तो वह भारत-विरोधी तत्व ही।
आरफा के खुशी के आँसू और उमर के अब्बा की फेंकू बातें
पूरे इंटरव्यू में उमर खालिद के अब्बा इलियास लंबी-लंबी फेंकू बातें करते हैं। और उधर आरफा इन बातों को सुनकर खुशी के आँसू टपकाने ही वाली होती हैं। दोनों ने उमर को क्रांतिकारी साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। आरफा खानुम को उमर खालिद की आजादी वाली स्पीच को एक स्वतंत्रता आंदोलनकारी के नजरिए से देखती हैं। उधर, अब्बा कहते हैं कि कभी बेटे को रोकने की कोशिश नहीं की।
यहाँ तक कि आरफा खानुम ने उमर की तुलना स्वतंत्रता सेनानी भगत सिंह से तक कर दी। उमर खालिद को वे युवाओं का प्रेरणास्रोत बताते हैं। अगर उमर खालिद जैसा प्रेरणास्रोत युवाओं को मिल गया, तो शायद हर कॉलेज और यूनिवर्सिटी में टुकड़े-टुकड़े गैंग बन जाएगा। जैसे JNU में आए दिन जान से मारने की धमकी वाले सरकार-विरोधी नारे लगते हैं, ऐसा ही पूरे देश में दहशत फैलेगी। तब भी ये लोग सारा इल्जाम सरकार पर ही लगाएँगे कि सरकार ने समय पर युवाओं को क्यों नहीं रोका?
तिहाड़ जेल में बैठकर VIP ट्रीटमेंट ले रहे उमर खालिद के संघर्ष की गाथा तो उनके अब्बा इलियास ने आरफा खानुम के साथ इंटरव्यू में सुना दी। लेकिन कितने लोग इस पर यकीन करेंगे, यह एक बड़ा सवाल है। भारत-विरोधी नारे लगाने वाला उमर खालिद जब क्रांतिकारी और आजादी के लिए लड़ने वाला युवा बनकर पेश किया जाता है, तो कितने लोग चाहेंगे कि वह एक जेल में बैठे युवा से प्रेरणा लें। तो Gen Z को भी समझने की जरूरत है कि उमर खालिद को क्रांतिकारी दर्शाने वाला यह इंटरव्यू मात्र एक प्रोपेगेंडा है। वह चाहते हैं कि एक और उमर खालिद पैदा हो, जो भारत कि खिलाफ आवाज बने लेकिन यह नहीं बताते कि उस आवाज में सुर भारत-विरोधी नहीं, बल्कि भगत सिंह की तरह राष्ट्रहित में होने चाहिए।
तो आरफा खानुम को यह जानने की जरूरत है कि इस दौर का इतिहास जब लिखा जाएगा तो उमर खालिद का नाम नाइंसाफी की दास्तान में नहीं, बल्कि भारत-विरोधी तत्वों में सबसे ऊपर होगा। ये लोग देश का खाते हैं और उसी से छल करते हैं। उमर खालिद इसी तरह के तत्व हैं और पत्रकारिता का चोला पहनकर ऐसे लोगों का महिमामंडन करने वाली आरफा खानम भी इनसे कम नहीं हैं।


