गुजरात के भरूच में पायनियर स्कूल के सामने स्थित जामा मस्जिद इन दिनों विवाद का केंद्र बन गई है। अखिल भारतीय संत समिति के संतों ने इस मस्जिद को लेकर विरोध शुरू किया है। उनका दावा है कि यह जगह दरअसल एक प्राचीन जैन मंदिर है और यहीं चक्रधर स्वामी का जन्म हुआ था। संत समिति का आरोप है कि यह मस्जिद भारतीय पुरातत्व विभाग (ASI) के संरक्षण में होने के बावजूद यहाँ नियमों के खिलाफ अवैध निर्माण किया गया है। पूरे मामले को देखते हुए भरूच के एसपी मौके पर पहुँचे और ASI अधिकारियों व संत समिति के प्रतिनिधियों से बातचीत की। उन्होंने सभी मुद्दों पर चर्चा कर सर्वे कराने का भरोसा दिया।
अखिल भारतीय संत समिति ने सोमवार (5 जनवरी 2025) को शक्तिनाथ मैदान में धरना दिया। संतों ने कहा कि जब तक ASI सख्त कार्रवाई नहीं करता, तब तक वे पानी भी नहीं पिएँगे। इससे पहले भी संत समिति इस जामा मस्जिद को समली विहार जैन मंदिर और चक्रधर स्वामी की जन्मस्थली बता चुकी है। वर्तमान में इस जामा मस्जिद में दिन में 5 वक्त की नमाज होती है और यहाँ मदरसे में बच्चों को शिक्षा भी दी जाती है।
बताया जाता है कि करीब 1905 में पुरातत्व विभाग ने इस मस्जिद को अपने अधीन ले लिया था और इसे संरक्षित स्मारक घोषित किया था। हालाँकि, संत समिति का कहना है कि इसके बावजूद यहाँ नियमों के खिलाफ निर्माण और गतिविधियाँ हो रही हैं। संतों का आरोप है कि मुस्लिम समुदाय के कुछ लोग कानून का उल्लंघन कर इस ऐतिहासिक स्थल की असली पहचान बदलने की कोशिश कर रहे हैं।
इस मामले को लेकर संतों ने विरोध प्रदर्शन किया। उन्होंने माँग की कि इस जगह को उसकी पुरानी मूल स्थिति में वापस लाया जाए और यहाँ चल रही सभी अवैध गतिविधियों को तुरंत रोका जाए। अखिल भारतीय संत समिति के अध्यक्ष संत अविचल देवाचारी ने कहा कि यह एक ऐतिहासिक धरोहर स्थल है और यहाँ किसी भी तरह का दूसरा धार्मिक या सांस्कृतिक चिह्न नहीं है।
उन्होंने कहा कि जब पुरातत्व विभाग ने इस स्थल को अपने कब्जे में ले रखा है, तो इसकी पूरी जिम्मेदारी भी उसी की है। अगर यहाँ कोई गतिविधि चल रही है तो उसे रोका जाना चाहिए। संतों ने यह भी माँग की कि जो भी नया निर्माण पहले मौजूद नहीं था और बाद में किया गया है, उसे तुरंत हटाया जाए। संत अविचल देवाचारी ने कहा कि सभी संतों और हिंदू समाज की यही माँग है कि इस स्थल को सिर्फ एक पुरातात्विक स्मारक के रूप में ही संरक्षित रखा जाए।
संतों ने क्या कहा?
‘ऑपइंडिया’ से बात करते हुए आंदोलन का नेतृत्व कर रहे अखिल भारतीय संत समाज के संन्यासी स्वामी मुक्तानंद ने कहा कि भरूच के हेड पोस्ट ऑफिस के पास स्थित यह जामा मस्जिद असल में पहले समली विहार जैन मंदिर के नाम से जानी जाती थी और यहीं चक्रधर स्वामी का जन्म हुआ था। उन्होंने बताया कि यह ऐतिहासिक स्थल भारत सरकार की संपत्ति है और ASI के संरक्षण में आने वाला राष्ट्रीय स्मारक है। ऐसे में इसमें किसी भी तरह का बदलाव करना कानूनन अपराध है। इसके बावजूद यहाँ नियमों का खुलेआम उल्लंघन किया जा रहा है।
स्वामी मुक्तानंद ने कहा कि देश में ASI के संरक्षण में करीब 3800 स्मारक हैं, जिनमें से लगभग 820 स्मारक ‘लिविंग मॉन्यूमेंट’ यानी जीवित स्मारक माने जाते हैं। उन्होंने भोजशाला में माता सरस्वती मंदिर और काशी का ज्ञानवापी मंदिर का उदाहरण देते हुए कहा कि ये दोनों भी संरक्षित जीवित स्थल हैं और वहाँ कानून के अनुसार कोई बदलाव नहीं किया गया। उसी तरह भरूच का यह स्थल भी जीवित स्मारक की श्रेणी में आता है।
उन्होंने साफ कहा कि कानून के मुताबिक किसी भी जीवित स्मारक में एक कील तक ठोंकना गैरकानूनी है। इसके बावजूद भरूच की जामा मस्जिद में वजूखाना बनाया गया है, पंखे, लाइटें, बोर्ड लगाए गए हैं और मदरसे से जुड़ा सामान भी वहाँ रखा गया है, जो सीधे तौर पर कानून का उल्लंघन है।
उन्होंने आगे कहा कि अगर कोई स्थल ‘जीवित स्मारक’ है, तो वहाँ पूजा या नमाज की अनुमति हफ्ते में सिर्फ एक दिन होती है, जैसे ताजमहल में केवल शुक्रवार को नमाज की इजाजत है। उन्होंने बताया कि एक समय कुछ लोगों ने ताजमहल में दिन में 5 वक्त नमाज पढ़ने की कोशिश की थी जिसके बाद ASI ने अदालत का रुख किया और उसे रुकवाया। इसी तरह भोजशाला में भी मंगलवार को ही पूजा की अनुमति है। हफ्ते में केवल एक दिन ही धार्मिक गतिविधि की इजाजत होती है लेकिन भरूच की जामा मस्जिद में इन नियमों का लगातार उल्लंघन हो रहा है।
उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे संरक्षित स्मारकों में कुछ समय के लिए पूजा या नमाज की जा सकती है लेकिन वहाँ कोई धार्मिक चिन्ह नहीं रखा जा सकता। पूजा या नमाज तो हो सकती है लेकिन कोई निर्माण या स्थाई ढाँचा बनाना पूरी तरह मना है। उनके अनुसार भरूच की जामा मस्जिद में इन सभी नियमों को नजरअंदाज किया गया है और इस संरक्षित स्थल के अंदरूनी हिस्से को पूरी तरह एक मस्जिद की तरह बना दिया गया है, जो आमतौर पर किसी भी संरक्षित स्मारक में नहीं होता।
उन्होंने यह भी कहा कि कानून के मुताबिक इस स्मारक के 100 मीटर के दायरे में कोई भी निर्माण नहीं किया जा सकता। अगर ऐसा होता है तो ASI को कार्रवाई करनी होती है। इसके बावजूद भरूच की जामा मस्जिद से सटे हुए कई मकान बना दिए गए हैं। ये मकान स्मारक की दीवार से बिल्कुल चिपकाकर बनाए गए हैं।
संतों की मांगें क्या हैं?
संत समिति ने ऑपइंडिया को बताया कि यह साबित हो चुका है कि भरूच में मौजूदा जामा मस्जिद की जगह पर पहले एक हिंदू-जैन मंदिर था। यह बात वहाँ की निर्माण शैली और स्मारक की बनावट देखकर साफ तौर पर समझ में आती है। संतों का हालिया विरोध इस बात को लेकर है कि इस स्मारक में नियमों का उल्लंघन रोका जाए और ASI द्वारा एक नया सर्वे कराया जाए।
संतों ने कहा है कि इस समय उनकी केवल यही माँग है कि इस स्मारक का प्रबंधन ASI के हाथ में रहे और जो नियमों का उल्लंघन यहां किया जा रहा है, उसे पूरी तरह बंद किया जाए। संत समिति की मांगें इस प्रकार हैं:-
- जिस समय इस स्थल को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण अधिनियम 1904 के तहत विभाग ने अपने अधीन लिया था, उस समय का नक्शा, राजपत्र (गजट) अधिसूचना और यह बताते हुए कॉन्ट्रैक्ट लेटर सार्वजनिक किया जाए कि यह स्थान किससे और कैसे लिया गया था।
- भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण अधिनियम 1958 के अनुसार इस संरक्षित स्मारक के प्रवेश का समय तय किया जाए और नियमों के मुताबिक इसके खुलने और बंद होने की व्यवस्था की जाए।
- भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण अधिनियम 1958 के अनुसार नियमों के खिलाफ जो गतिविधियाँ यहाँ चल रही हैं, उन्हें तुरंत रोका जाए।
- भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण अधिनियम 1958 के तहत संरक्षित स्मारक में उसकी मूल संरचना बदलने के उद्देश्य से जो भी निर्माण किया गया है, उसे तुरंत हटाया जाए।
- भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण अधिनियम 1958 के अनुसार स्मारक की मूल संरचना और परिसर में सीमेंट का उपयोग प्रतिबंधित है। इसके बावजूद रेत, सीमेंट और ईंटों से कंक्रीट निर्माण कर अवैध गतिविधियों की व्यवस्था बनाई गई है, उसे तुरंत हटाया जाए।
- भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण अधिनियम 1958 तथा इसकी धारा 20A(1) और 20B (2010) के अनुसार 100 मीटर और 200 मीटर क्षेत्र को प्रतिबंधित और नियंत्रित क्षेत्र घोषित किया गया है लेकिन इसके बावजूद कई मकान और अन्य कंक्रीट संरचनाएँ बनाई गई हैं। इन्हें नियमों के अनुसार हटाया जाए और संरक्षित क्षेत्र की सुरक्षा की जाए।
- स्मारक के मुख्य प्रवेश द्वार पर नियमों के खिलाफ कंक्रीट मकान बना दिए गए हैं, जिससे मुख्य प्रवेश मार्ग संकरा हो गया है। इसे इसकी मूल स्थिति में बहाल किया जाए।
- भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण अधिनियम के तहत संरक्षित स्थलों की सुरक्षा और प्रबंधन के लिए बनाए गए नियमों का कई वर्षों से इस स्थल पर पालन नहीं किया गया है। इन नियमों के उल्लंघन के लिए संबंधित विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ पद के दुरुपयोग और आपराधिक लापरवाही के आरोप में कानूनी कार्रवाई शुरू की जाए और विभाग द्वारा इस संरक्षित स्थल पर पुलिस सुरक्षा की व्यवस्था की जाए।
दो दिन में सर्वे शुरू होगा: संत समाज
स्वामी मुक्तानंद ने आगे बताया कि आवेदन देने के बाद भी जब कोई कार्रवाई नहीं हुई तो अखिल भारतीय संत समिति के संन्यासियों ने 5 जनवरी से अनिश्चितकालीन उपवास शुरू कर दिया। इसके बाद प्रशासन ने तुरंत इस मामले को संज्ञान में लिया। स्वामी मुक्तानंद ने कहा कि एसपी अक्षय राज की मध्यस्थता में ASI अधिकारियों और संत समाज के बीच एक बैठक हुई जिसमें सभी मुद्दों पर कार्रवाई का आश्वासन दिया गया।
उन्होंने बताया कि स्थल पर जो अस्थाई व्यवस्थाएँ की गई हैं उन्हें 8 से 10 दिनों के भीतर हटा दिया जाएगा। वहीं, जो स्थाई निर्माण या व्यवस्थाएँ की गई हैं उन्हें अगले दो महीनों के भीतर हटाने की बात कही गई है। इसके अलावा, अगले 2-3 दिनों में सर्वे भी शुरू कर दिया जाएगा और सर्वे के दौरान संत समाज के कुछ लोगों को भी साथ रखा जाएगा।
(यह खबर मूल रूप से भार्गव राज्यगुरु ने गुजराती में लिखी है, जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ा जा सकता है।)


