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स्वामी विवेकानंद जयंती पर विशेष: शिकागो से सनातन की पताका लहराने वाले महान संत, पश्चिम को भारतीय संस्कृति से जोड़ा; युवाओं को दिखाई राष्ट्रप्रेम की नई दिशा

स्वामी विवेकानंद ने केवल 39 वर्ष की आयु में 4 जुलाई 1902 को महासमाधि ली, लेकिन उनकी विरासत अमर है। राष्ट्रीय युवा दिवस हमें उनकी शिक्षाओं पर चलने का संकल्प दिलाता है।

स्वामी विवेकानंद की जयंती पूरी दुनिया में 12 जनवरी को मनाई जाती है। भारत में इस दिन को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है। साल 1984 में भारत सरकार ने यह निर्णय लिया ताकि युवाओं को स्वामी जी की शिक्षाओं से प्रेरणा मिले।

स्वामी विवेकानंद ने न केवल भारत को नई दिशा दिखाई, बल्कि पूरी दुनिया में सनातन धर्म की महिमा फैलाई। उन्होंने पश्चिमी देशों को भारतीय संस्कृति, वेदांत दर्शन और योग से परिचित कराया। उनके ओजस्वी भाषणों और कार्यों से हजारों लोग उनके शिष्य बने। आज भी उनकी शिक्षाएँ युवाओं को मजबूत बनाती हैं।

स्वामी विवेकानंद का प्रारंभिक जीवन और आध्यात्मिक जागरण

स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 को कलकत्ता (अब कोलकाता) में हुआ था। उनका बचपन का नाम नरेंद्रनाथ दत्ता था। वे एक संपन्न बंगाली परिवार से थे। पिता विश्वनाथ दत्ता वकील थे और माँ भुवनेश्वरी देवी धार्मिक प्रवृत्ति की महिला। नरेंद्र बचपन से ही बुद्धिमान, निडर और जिज्ञासु थे। वे पढ़ाई में तेज थे और खेलकूद में भी आगे। लेकिन उनका मन हमेशा बड़े सवालों में उलझा रहता- ईश्वर कहाँ है? जीवन का उद्देश्य क्या है?

युवावस्था में नरेंद्र ब्रह्म समाज से जुड़े, जहाँ एकेश्वरवाद की बात होती थी। लेकिन उन्हें संतुष्टि नहीं मिली। 1881-82 में उनकी मुलाकात श्री रामकृष्ण परमहंस से हुई। रामकृष्ण एक सरल संत थे, जो दक्षिणेश्वर काली मंदिर में रहते थे। नरेंद्र पहले तो उनके विचारों से असहमत थे, लेकिन रामकृष्ण की दिव्य अनुभूति ने उन्हें प्रभावित किया।

रामकृष्ण ने कहा, “ईश्वर को देखा जा सकता है, जैसे मैं तुम्हें देख रहा हूँ।” धीरे-धीरे नरेंद्र उनके शिष्य बन गए। रामकृष्ण ने उन्हें वेदांत का गहरा ज्ञान दिया और कहा कि सभी धर्म सत्य की ओर ले जाते हैं।

1886 में रामकृष्ण का महासमाधि हो गया। नरेंद्र और उनके गुरुभाइयों ने बारानगर में मठ स्थापित किया। नरेंद्र ने संन्यास लिया और नाम हुआ स्वामी विवेकानंद। इसके बाद वे पूरे भारत भ्रमण पर निकल पड़े। कन्याकुमारी में उन्होंने समुद्र तट पर ध्यान किया और भारत की दशा पर विचार किया। उन्हें लगा कि भारत को आध्यात्मिक ज्ञान तो है, लेकिन गरीबी और अज्ञानता से मुक्ति चाहिए। यहीं से उन्हें विचार आया कि विश्व मंच पर भारत की आवाज उठानी चाहिए।

शिकागो विश्व धर्म संसद के मंच से विश्व में फहराई सनातन की पताका

साल 1893 में अमेरिका के शिकागो में विश्व धर्म संसद का आयोजन हुआ। यह पहला मौका था जब दुनिया के सभी प्रमुख धर्मों के प्रतिनिधि एक मंच पर आए। स्वामी विवेकानंद भारत का प्रतिनिधित्व करने गए। यात्रा कठिन थी- पैसे नहीं थे, लेकिन कुछ शुभचिंतकों की मदद से वे पहुंचे।

11 सितंबर 1893 को उनका पहला भाषण हुआ। मंच पर खड़े होकर उन्होंने कहा, “मेरे अमेरिकी भाइयों और बहनों!” पूरा हॉल तालियों से गूँज उठा। उन्होंने हिंदू धर्म की उदारता बताई- सभी धर्मों का सम्मान, संप्रदायवाद का विरोध और कहा कि जैसे नदियाँ अलग-अलग रास्तों से समुद्र में मिलती हैं, वैसे ही सभी धर्म ईश्वर तक पहुँचाते हैं। उन्होंने सहिष्णुता की बात की और कहा कि हिंदू धर्म कभी दूसरे धर्मों को नष्ट करने की बात नहीं करता।

यह भाषण इतना प्रभावशाली था कि अखबारों ने उन्हें ‘साइक्लोन मॉन्क’ कहा। स्वामी जी ने कई भाषण दिए और वेदांत दर्शन समझाया। पश्चिमी लोग पहली बार भारतीय आध्यात्म को वैज्ञानिक और तार्किक रूप में सुन रहे थे। इससे सनातन धर्म की पताका पूरी दुनिया में लहरा गई।

पश्चिम में भारतीय संस्कृति की स्थापना

शिकागो के बाद स्वामी विवेकानंद अमेरिका और यूरोप में कई वर्ष रहे। उन्होंने हजारों व्याख्यान दिए। न्यूयॉर्क में वेदांत सोसाइटी स्थापित की। योग और ध्यान की क्लासें शुरू की। पश्चिमी लोग योग को केवल शारीरिक व्यायाम समझते थे, लेकिन स्वामी जी ने बताया कि यह मन की शुद्धि और ईश्वर प्राप्ति का मार्ग है।

स्वामी विवेकानंद ने राजयोग, कर्मयोग, भक्तियोग और ज्ञानयोग की किताबें लिखीं। इनसे वेदांत दर्शन पश्चिम में घर-घर पहुंचा। अमेरिका में कई वेदांत केंद्र खुले। इंग्लैंड में भी उन्होंने व्याख्यान दिए। पश्चिमी बुद्धिजीवी हैरान थे कि एक युवा भारतीय संन्यासी इतना गहरा ज्ञान कैसे रखता है। स्वामी जी ने भारतीय संस्कृति की महानता बताई- त्याग, सेवा, एकता। उन्होंने गीता और उपनिषदों को सरल भाषा में समझाया। इससे पश्चिम में भारतीयता का सम्मान बढ़ा।

स्वामी विवेकानंद को चाहने लगे पश्चिमी दुनिया के विद्वान

स्वामी विवेकानंद की वाणी और व्यक्तित्व इतना आकर्षक था कि हजारों लोग उनके मुरीद हो गए। भारत में उनके गुरुभाई जैसे स्वामी ब्रह्मानंद, स्वामी तुरीयानंद उनके साथी बने। लेकिन पश्चिम में भी कई शिष्य बने। सबसे प्रसिद्ध हैं मार्गरेट नोबल, जो सिस्टर निवेदिता बनीं। मार्गरेट आयरिश मूल की थीं, लंदन में स्वामी जी से मिलीं। उनके विचारों से इतनी प्रभावित हुईं कि भारत आ गईं और शिक्षा और सेवा कार्य में लग गईं। उन्होंने कलकत्ता में लड़कियों का स्कूल खोला।

अमेरिका में कई महिलाएँ और पुरुष उनके शिष्य बने। जैसे मैरी हेल, सराह बुल आदि। स्वामी जी महिलाओं की शिक्षा और सम्मान पर बहुत जोर देते थे। उन्होंने कहा कि जब तक महिलाएँ मजबूत नहीं होंगी, राष्ट्र मजबूत नहीं होगा। उनके चाहने वाले प्रोफेसर, वैज्ञानिक और आम लोग थे। निकोला टेस्ला जैसे वैज्ञानिक भी उनके विचारों से प्रभावित हुए। स्वामी जी की सादगी, ओज और प्रेम ने लोगों को बांध लिया।

रामकृष्ण मिशन की स्थापना और सेवा कार्य

साल 1897 में स्वामी विवेकानंद जी भारत लौटे। लाखों लोगों ने उनका स्वागत किया। उन्होंने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। इसका उद्देश्य था- आत्मा की खोज और दूसरों की सेवा। उनका सूत्र था- “शिव ज्ञान में जीव सेवा”। मिशन ने शिक्षा, स्वास्थ्य और आपदा राहत में काम शुरू किया। आज दुनिया भर में इसके केंद्र हैं।

भारत के राष्ट्रवाद को दिखाई राह

स्वामी विवेकानंद ने भारत को गुलामी की नींद से जगाया। उन्होंने कहा, “उठो, जागो और तब तक न रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।” स्वामी विवेकानंद ने भारत के युवाओं से कहा कि तुममें असीम शक्ति है। भारत को आध्यात्मिक गुरु बनना है। उन्होंने हिंदू धर्म के पुनरुत्थान की बात की, लेकिन संकीर्णता का विरोध किया।

स्वामी विवेकानंद ने कहा कि भारत की संस्कृति सभी को जोड़ने वाली है। उनके विचारों से बाल गंगाधर तिलक, महात्मा गाँधी, सुभाष चंद्र बोस जैसे नेता प्रभावित हुए। स्वामी जी ने राष्ट्रवाद को आध्यात्मिक आधार दिया – सेवा ही राष्ट्रभक्ति है।

उन्होंने युवाओं से कहा, “मुझे सौ युवा दो, मैं भारत बदल दूँगा।” उनकी शिक्षाएँ आज भी प्रासंगिक हैं-मजबूत बनो, निडर बनो, दूसरों की मदद करो।

स्वामी विवेकानंद ने छोड़ी अमर विरासत

स्वामी विवेकानंद केवल 39 वर्ष जिए, लेकिन उनका योगदान अमर है। केवल 39 साल की उम्र में 4 जुलाई 1902 को उन्होंने महासमाधि ली। स्वामी विवेकानंद ने सनातन धर्म को विश्व मंच पर स्थापित किया, पश्चिम को भारतीयता से जोड़ा और भारत को आत्मविश्वास दिया। राष्ट्रीय युवा दिवस हमें याद दिलाता है कि युवा ही राष्ट्र की शक्ति हैं। स्वामी जी के शब्दों में “सबसे बड़ा धर्म है अपने देश से प्रेम करना।” उनकी जयंती पर संकल्प लें कि हम उनकी शिक्षाओं पर चलेंगे और भारत को विश्व गुरु बनाएँगे।

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श्रवण शुक्ल
श्रवण शुक्ल
I am Shravan Kumar Shukla, known as ePatrakaar, a multimedia journalist deeply passionate about digital media. I’ve been actively engaged in journalism, working across diverse platforms including agencies, news channels, and print publications. My understanding of social media strengthens my ability to thrive in the digital space. Above all, ground reporting is closest to my heart and remains my preferred way of working. explore ground reporting digital journalism trends more personal tone.

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