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286 किलो वजन, 08 फीट लंबाई, पंच धातु से निर्मित… क्या है ‘कोदंड’ जो अजानबाहु को किया समर्पित: जानिए इसके बारे में क्या कहते हैं धर्मग्रंथ

तमिलनाडु के काँचीपुरम में 48 महिला कारीगरों ने आठ महीने की कड़ी मेहनत से इस कोदंड धनुष को तैयार किया। इस पर कारगिल युद्ध सहित भारतीय सेना की वीरता की गाथाएँ उकेरी गई हैं, जो इसे आस्था के साथ राष्ट्रभक्ति का प्रतीक बनाती हैं।

रामभक्तों के लिए बुधवार (22 जनवरी 2026) का दिन बहुत खास है। श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा की दूसरी वर्षगांठ पर अयोध्या को एक अनमोल भेंट मिली है। ये भेंट है 286 किलोग्राम वजनी भव्य कोदंड। पंचधातु से बना यह धनुष ओडिशा से भव्य शोभायात्रा के साथ अयोध्या पहुँचा। मंदिर ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने इसे विधि-विधान से स्वीकार किया। हजारों श्रद्धालु, संत-महात्मा और ट्रस्ट के पदाधिकारी मौजूद थे। हर कोई इसकी भव्यता और दिव्यता देखकर अभिभूत हो गया।

यह कोदंड सिर्फ एक धनुष नहीं है, बल्कि भगवान श्रीराम के शौर्य, धर्म और मर्यादा का प्रतीक है। यह आस्था, भारतीय शिल्पकला, राष्ट्रभक्ति और नारीशक्ति का अद्भुत मिलन है। ओडिशा के सनातन जागरण मंच ने इसे रामलला को समर्पित किया।

कोदंड क्या है और रामायण में इसका महत्व क्या है

कोदंड भगवान श्रीराम के धनुष का नाम है। वाल्मीकि रामायण और तुलसीदास जी की रामचरितमानस में इसका बार-बार जिक्र मिलता है। श्रीराम को कोदंडधारी कहा जाता है, क्योंकि यह उनके बल, न्याय और अधर्म पर धर्म की जीत का प्रतीक है।

उदाहरण के लिए, सीता स्वयंवर में श्रीराम ने शिव जी का भारी धनुष (जो कोदंड जैसा ही था) आसानी से उठाया और उसकी डोरी चढ़ाते ही वह टूट गया। इससे राजा जनक की पुत्री माता सीता का विवाह श्रीराम से हुआ। यह घटना बताती है कि श्रीराम कितने बलशाली और मर्यादित थे। परशुराम जी भी गुस्से में आए, लेकिन श्रीराम ने शांतिपूर्वक उनका क्रोध शांत किया।

तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में श्रीराम के सौंदर्य का वर्णन करते हुए लिखा है-

“कोदंड कठिन चढ़ाइ सिर जट जूट बाँधत सोह क्यों।
मरकत सयल पर लरत दामिनि कोटि सों जुग भुजग ज्यों॥”

अर्थात, कठिन कोदंड को चढ़ाए हुए, सिर पर जटाजूट बाँधे श्रीराम कितने सुंदर लगते हैं, जैसे हरे पर्वत पर लाखों बिजलियाँ और साँप लहरा रहे हों। यह दोहा श्रीराम के वीर और सुंदर रूप को दिखाता है।

एक और प्रसिद्ध मंत्र राम रक्षा स्तोत्र से है-

“चारु कोदंडं चारु चापं चारु शरं चारु सायकं।
चारुं चारुं चारु रूपं चारु चारु नमो नमः॥”

यह स्तोत्र रोजाना पढ़ने से रक्षा और शक्ति मिलती है। कोदंड यहाँ श्रीराम के दिव्य हथियार के रूप में आता है।

इस कोदंड की विशेषताएँ और निर्माण

यह कोदंड सोना, चाँदी, एल्युमिनियम, जस्ता और लोहे जैसी पाँच धातुओं से बना है। इसका वजन 286 किलो है और लंबाई-मजबूती देखते ही बनती है। सबसे खास बात यह है कि इस पर भारतीय सेना की वीर गाथाएँ उकेरी गई हैं। कारगिल युद्ध के बलिदानियों और अन्य युद्धों के चित्र बने हैं। इससे यह धनुष सिर्फ धार्मिक नहीं, बल्कि राष्ट्रभक्ति का भी प्रतीक बन गया है। श्रीराम का कोदंड अधर्म का नाश करता था, वैसे ही आज की सेना देश की रक्षा करती है।

निर्माण की कहानी भी प्रेरणादायक है। तमिलनाडु के कांचीपुरम में 48 महिला कारीगरों ने आठ महीने तक दिन-रात मेहनत की। ये महिलाएं पारंपरिक शिल्पकला की जानकार हैं। उनकी साधना और समर्पण से यह धनुष तैयार हुआ। यह नारीशक्ति की मिसाल है कि कैसे महिलाएं बड़ी से बड़ी चुनौती पूरा कर सकती हैं।

भव्य शोभायात्रा का सफर

यह कोदंड 3 जनवरी 2026 को ओडिशा के राउरकेला से रवाना हुआ। सनातन जागरण मंच के संतोष कुमार विश्वाल ने बताया कि शोभायात्रा ओडिशा के सभी 30 जिलों से गुजरी। रास्ते में जगह-जगह श्रद्धालुओं ने पुष्पवर्षा की, ढोल-नगाड़े बजाए और ‘जय श्रीराम’ के नारे लगाए। यह यात्रा सिर्फ धार्मिक नहीं थी, बल्कि सनातन संस्कृति और राष्ट्रीय एकता का संदेश लेकर चली।

19 जनवरी 2026 को कोदंड पुरी पहुँचा। वहाँ भगवान जगन्नाथ के मंदिर में दर्शन हुए। जगन्नाथ जी के आशीर्वाद के बाद यात्रा आगे बढ़ी। हर जगह भक्तों का उत्साह देखने लायक था। लोग दूर-दूर से आते और कोदंड को छूकर आशीर्वाद लेते।

अयोध्या में आगमन और समर्पण

बुधवार (22 जनवरी 2026) को कोदंड अयोध्या पहुँचा। राम मंदिर परिसर में हजारों लोग इकट्ठा हुए। चंपत राय जी ने इसे रामलला को अर्पित किया। संतों ने मंत्रोच्चार किया और पूजा-अर्चना हुई। यह दिन प्राण-प्रतिष्ठा की दूसरी वर्षगाँठ का भी था, इसलिए उत्सव दोगुना हो गया।

इस कोदंड का गहरा संदेश

यह कोदंड हमें कई बातें सिखाता है। पहला- भक्ति और समर्पण से कितना बड़ा काम हो सकता है। दूसरा- महिलाओं की शक्ति, 48 कारीगरों ने दिखाया कि नारीशक्ति क्या होती है। तीसरा- राष्ट्रभक्ति, सेना की गाथाएँ बताती हैं कि श्रीराम का शौर्य आज भी जीवित है। चौथा- एकता, ओडिशा से तमिलनाडु तक इसमें पूरे देश का योगदान दिख रहा है।

रामचरितमानस में तुलसीदास जी कहते हैं: “राम नाम जपना सब सुखों का मूल है।”

ऐसे आयोजन हमें राम नाम की महिमा याद दिलाते हैं।

प्रभु श्रीराम का यह कोदंड अयोध्या पहुँचकर रामभक्तों के दिलों को छू गया। यह बताता है कि राम राज केवल अतीत नहीं, बल्कि आज भी प्रेरणा है। धर्म की जीत, शौर्य की रक्षा और शिल्प की सुंदरता का यह संगम पूरे देश में नई उमंग भर रहा है।

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श्रवण शुक्ल
श्रवण शुक्ल
I am Shravan Kumar Shukla, known as ePatrakaar, a multimedia journalist deeply passionate about digital media. I’ve been actively engaged in journalism, working across diverse platforms including agencies, news channels, and print publications. My understanding of social media strengthens my ability to thrive in the digital space. Above all, ground reporting is closest to my heart and remains my preferred way of working. explore ground reporting digital journalism trends more personal tone.

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