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भारत की मान्यता से दशकों पहले ही वीर सावरकर ने किया था यहूदियों के ‘अपने राष्ट्र’ के सपने का समर्थन: पुण्यतिथि पर जानें- कैसे वामपंथी गिरोह ने फैलाई गलत बातें

वीर सावरकर ने 1923 में ही हिंदुत्व किताब में यहूदियों के अपने देश वापस पाने के अधिकार का समर्थन किया। उन्होंने लिखा कि अगर फिलिस्तीन यहूदी राज्य बन जाए तो हमें भी बहुत खुशी होगी। यह इजरायल बनने से 25 साल पहले था। वे इतिहास और सभ्यता से जुड़े राष्ट्रवाद के बड़े पक्षधर थे।

आजादी के महान नायकों में से एक वीर सावरकर की पुण्यतिथि (26 फरवरी ) पर आज के समय को ध्यान में रखते हुए एक महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा जरूरी है। वो चर्चा है भारत और इजरायल को लेकर। हिंदुओं की पुण्यभूमि और यहूदियों की पुण्यभूमि को लेकर। वैसे भी, उनकी जिंदगी और काम देश की आजादी की लड़ाई और अपनी सभ्यता को मजबूत करने से बहुत गहरे जुड़े हैं।

चूँकि पीएम मोदी भी इजरायल के महत्वपूर्ण दौरे पर रहे। ऐसे में ये सही समय है, जब उनकी सोच के महत्वपूर्ण बिंदु पर चर्चा की जाए। वैसे भी, भारत और इजरायल की दोस्ती मौजूदा समय में दो देशों, दो सभ्यताओं की सबसे मजबूत दोस्ती में बदल चुकी है।

दरअसल, पहले भारत की विदेश नीति में जो साफ-साफ बात नहीं दिखती थी वो अब भारत-इजरायल के रिश्ते में साफ दिख रही है। ये रिश्ता रक्षा, खुफिया जानकारी बाँटने और टेक्नोलॉजी पर आधारित है।

अक्सर लोग वीर सावरकर को सिर्फ राजनीतिक विवाद के नजरिए से याद करते हैं लेकिन वे एक विचारक थे जो राष्ट्र, सभ्यता की पहचान और दुनिया की राजनीति को अच्छे से समझते थे। 1923 की शुरुआत में ही वीर सावरकर ने यहूदियों के अपने पुराने देश को वापस पाने का खुलकर समर्थन किया था। ये इजरायल बनने से 1948 से भी 20 साल पहले की बात है।

सावरकर का ये स्टैंड दिखाता है कि वे राष्ट्रों के खुद फैसला करने के अधिकार पर कितना भरोसा रखते थे जो इतिहास और सभ्यता से जुड़ा हो। उस समय यहूदी सवाल अभी खुला था और दुनिया भर में राय बंटी हुई थी।

फिर भी वामपंथी गिरोह हमेशा सावरकर को नाजी जर्मनी का समर्थक बताता रहा है भले ही उन्होंने यहूदियों के राष्ट्र का साफ समर्थन किया हो। ये आरोप बिना पूरी जानकारी और उनके असली लेखों को देखे ही लगाए जाते हैं। असली इतिहास और राजनीतिक कहानी में फर्क समझने के लिए जरूरी है कि सावरकर के यहूदियों, जियोनिज्म और उस समय की दुनिया की स्थिति पर क्या लिखा है जब भारत इजरायल के साथ अपना रिश्ता और गहरा कर रहा है।

वीर सावरकर: क्रांतिकारी, विद्वान और सख्त राष्ट्रवादी

वीर सावरकर का जन्म 28 मई 1883 को नासिक जिले के भगुर गांव में श्रीमती राधा और श्री दामोदर सावरकर के यहाँ हुआ। बचपन से ही उन्हें पढ़ना बहुत पसंद था और कविता लिखने में भी वे माहिर थे। वे सबसे पहले और सबसे मजबूत उन लोगों में से थे जिन्होंने ब्रिटिश राज से पूरी आजादी यानी पूर्ण स्वराज की माँग की जब ये बात भारतीय राजनीति में अभी लोकप्रिय नहीं हुई थी। छोटी उम्र से ही सावरकर में जबरदस्त दिमाग था। वे इतिहास, साहित्य और राजनीति के विचारों में बहुत रुचि रखते थे। उनकी पढ़ाई की ताकत उनके देश की आजादी के लिए जुनून के बराबर थी जो जल्दी ही संगठित क्रांतिकारी काम में बदल गया।

साल 1904 में सावरकर ने अभिनव भारत सोसाइटी बनाई जो ब्रिटिश राज को हथियार से उखाड़ फेंकने के लिए गुप्त क्रांतिकारी संगठन था। जब वे लंदन पहुंचे तो भारत हाउस में उन्होंने बड़ी भूमिका निभाई जो भारतीय राष्ट्रवाद का केंद्र था। उनके लेख, भाषण और संगठन के काम से उन्होंने युवा भारतीयों को आजादी को दूर का सपना नहीं बल्कि तुरंत का काम मानने के लिए प्रेरित किया। अपनी किताब द इंडियन वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस 1857 में उन्होंने 1857 के विद्रोह को ब्रिटिश कहानी के खिलाफ एक पूरा राष्ट्रीय संघर्ष बताया न कि सिर्फ सिपाही बगावत।

सावरकर के क्रांतिकारी काम का उन्हें बहुत बड़ा नुकसान उठाना पड़ा। साल 1910 में ब्रिटिशों ने उन्हें गिरफ्तार किया और अंडमान-निकोबार के सेल्युलर जेल में आजीवन सजा दे दी जो उस समय की सबसे बुरी जेल थी। उन्होंने सालों तक अकेले बंद कमरे, मजबूरी का काम और सख्त सजा झेली। इतनी कड़ी हालत में भी वे दिमाग और राजनीति से सक्रिय रहे। उनकी कैद उपनिवेशवाद की ज्यादती और आजादी की लड़ाई की अडिग हिम्मत का प्रतीक बन गई।

क्रांतिकारी काम के अलावा सावरकर बहुत लिखने वाले थे। उन्होंने राष्ट्र की पहचान को राजनीतिक आजादी, सांस्कृतिक एकता और सभ्यता की निरंतरता पर आधारित एक पूरा विचार बनाया। दुनिया के मामलों पर उनकी राय खासकर यहूदियों के अपने पुराने घर को वापस पाने का शुरुआती और अडिग समर्थन इसी बड़े विचार से आया।

सावरकर का यहूदियों और यहूदी घर के लिए शुरुआती और साफ समर्थन

वीर सावरकर ने इजरायल बनने से 1948 में पहले और भारत के इजरायल को आधिकारिक मान्यता देने से कई दशक पहले ही यहूदियों के अपने पुराने देश को वापस पाने का खुलकर समर्थन किया था। सावरकर उन पहले भारतीय नेताओं में से थे जिन्होंने जियोनिस्ट आंदोलन को सही माना जब ज्यादातर देश इसे समर्थन देने से हिचक रहे थे। उनका स्टैंड उनके बड़े विश्वास पर आधारित था कि राष्ट्र सिर्फ राजनीतिक सिस्टम से नहीं बल्कि सांस्कृतिक पहचान, इतिहास और सभ्यता की निरंतरता से बनते हैं।

अपनी किताब हिंदुत्व: हू इज ए हिंदू? जो 1923 में छपी थी उसमें उन्होंने जियोनिज्म को साफ समर्थन दिया। उन्होंने लिखा, “अगर यहूदियों का सपना कभी सच हो जाए… अगर फिलिस्तीन यहूदी राज्य बन जाए तो हमें उतनी ही खुशी होगी जितनी हमारे यहूदी दोस्तों को।” ये बात तब कही गई जब यहूदी राज्य बनना दूर की बात लग रही थी। ये सावरकर के साफ और सिद्धांत वाले समर्थन को दिखाता है। उन्होंने फिलिस्तीन को यहूदियों का इतिहास और सांस्कृतिक जन्मस्थान माना और उनके घर बसाने के प्रयास को सही और जायज बताया।

सावरकर की सहानुभूति यहूदियों के पुराने दर्द और बेघर होने से भी आई। उन्होंने यहूदियों की हिम्मत की तारीफ की कि सदियों की सताए जाने और बेघर होने के बावजूद उन्होंने अपनी राष्ट्र की पहचान और संस्कृति बचाए रखी। भारतीय संदर्भ में सावरकर ने भारतीय यहूदियों का बहुत सम्मान किया। उन्होंने कहा कि वे सदियों से भारत में रह रहे हैं बिना किसी राजनीतिक या सामाजिक झगड़े के और शांतिपूर्वक भारतीय समाज में घुल-मिल गए।

आज जब भारत और इजरायल रक्षा, खुफिया, कृषि और टेक्नोलॉजी में अपनी साझेदारी और गहरी कर रहे हैं तो सावरकर का यहूदियों के राष्ट्र का शुरुआती समर्थन बहुत दूरदर्शी लगता है। पीएम मोदी की इजरायल यात्रा उस रिश्ते के पूरी तरह पकने को दिखाती है जो आपसी सम्मान और साझा रणनीतिक हितों पर टिका है।

यात्रा के दौरान इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने पीएम मोदी की तारीफ की और उन्हें सिर्फ दोस्त नहीं बल्कि भाई कहा। उन्होंने भारत के लंबे दोस्ती के लिए शुक्रिया कहा और बोला कि भारत वो एकमात्र सभ्यता है जहाँ यहूदियों का स्वागत हुआ और उन्हें कभी सताया नहीं गया। ये भी दिखाता है कि वो साझेदारी जिसके नैतिक और सभ्यता वाले आधार सावरकर के लेखों में दशकों पहले ही पहचाने गए थे वो अब आधिकारिक नीति बन गई है।

नाजी मिथक: सावरकर की स्थिति को उसके सही इतिहास के संदर्भ में समझना जरूरी

यहूदियों के राष्ट्र का लिखित समर्थन और उनके प्रति सहानुभूति होने के बावजूद वामपंथी गिरोह वीर सावरकर को नाजी जर्मनी का समर्थक बताता रहा है। ये आरोप ज्यादातर उनके 1 अगस्त 1938 के पुणे में दिए गए अध्यक्षीय भाषण की कुछ पंक्तियों पर टिका है जिसमें उन्होंने कहा कि जर्मनी को नाजीवाद अपनाने का अधिकार है ठीक वैसे ही जैसे दूसरे देश अपने हिसाब से सरकार का रूप चुनते हैं। लेकिन भाषण को पूरा और गहराई से देखने पर पता चलता है कि सावरकर का स्टैंड कोई विचारधारा का समर्थन नहीं बल्कि दुनिया की राजनीति को व्यावहारिक नजरिए से देखना था।

वीर सावरकर का मुख्य मुद्दा ये था कि भारत की विदेश नीति सिर्फ अपने राष्ट्र हित पर आधारित होनी चाहिए न कि किसी दूसरे देश की विचारधारा या भावना पर। उन्होंने कहा कि हर देश अपनी खास इतिहास और स्थिति के हिसाब से अपना शासन चुनता है और भारत के लिए ये न तो व्यावहारिक है न रणनीतिक कि वो दूसरे देशों के फैसलों में टांग अड़ाए।

आइए उनके बयान को सही इतिहास के संदर्भ में समझें। साल 1938 में नाजी जर्मनी की तानाशाही और यहूदियों के खिलाफ नीतियाँ तो पता थीं लेकिन होलोकॉस्ट यानी लाखों यहूदियों का व्यवस्थित नरसंहार अभी पूरा नहीं हुआ था। वो औद्योगिक हत्याकांड जो बाद में नाजी जर्मनी की पहचान बना वो दूसरे विश्व युद्ध के दौरान शुरू हुआ और पूरी दुनिया को 1945 में जब सहयोगी सेनाओं ने कंसंट्रेशन कैंप छुड़ाए तब पता चला

खास बात ये कि सावरकर के अपने लेखों में नाजीवाद की असली कट्टर विचारधारा को साफ खारिज किया गया है। अपनी किताब हिंदुत्व: हू इज ए हिंदू? में उन्होंने लिखा कि ‘एक ही जाति है मानव जाति’ जो नस्ल की शुद्धता और श्रेष्ठता के नाजी विचार को पूरी तरह नकारता है। ये दर्शन हिटलर के नस्लीय अलगाववाद से बिल्कुल उलटा था।

कुल मिलाकर सावरकर के लेख, काम और बड़े विचार फ्रेमवर्क एक बहुत सूक्ष्म और जटिल तस्वीर दिखाते हैं जो नाजी समर्थक का सरल आरोप नहीं है। उनके विचार ज्यादा भू-राजनीतिक यथार्थ और सभ्यता के सोच से आए थे जैसा उनके यहूदियों के राष्ट्र का शुरुआती समर्थन, नस्ल शुद्धता को खारिज करना और राष्ट्र हित पर जोर से साफ है।

नेहरू की हिचक और भारत का इजरायल को देर से अपनाना

जबकि सावरकर 1920 के दशक से ही यहूदियों के राष्ट्र की वकालत कर रहे थे उसी समय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में भारत की आधिकारिक रुख इजरायल के प्रति बहुत सतर्क रहा। 1947 में जब संयुक्त राष्ट्र ने फिलिस्तीन को बांटने का प्लान पास किया जिसमें यहूदी राज्य बनाने की बात थी तो भारत ने इसके खिलाफ वोट किया। उस समय के भारतीय नेतृत्व ने एक संघीय या एकीकृत व्यवस्था की वकालत की।

ये फैसला कई भू-राजनीतिक कारणों से था। नेहरू नए आजाद देशों का नेता बनना चाहते थे और अरब देशों से अच्छे रिश्ते बनाए रखना चाहते थे। घरेलू कारण भी थे जैसे देश के मुस्लिम आबादी की नाराजगी। ऐसे में भारत की विदेश नीति उन मुद्दों पर सावधानी से बनाई गई जो अंदर या आसपास तनाव बढ़ा सकते थे।

भारत ने सितंबर 1950 में इजरायल को औपचारिक मान्यता दी लेकिन पूरे राजनयिक रिश्ते दशकों बाद बने। 1992 में भारत और इजरायल ने एक-दूसरे की राजधानी में दूतावास खोले और पूरे स्तर पर रिश्ते सामान्य किए। आजादी के बाद 40 साल से ज्यादा समय तक रिश्ता सीमित और कम दिखने वाला रहा।

फर्क साफ है। सावरकर ने इजरायल के बनने से दशकों पहले ही यहूदी घर के विचार का खुलकर समर्थन किया था। फिर भी आजाद भारत ने किसी खास समुदाय को खुश रखने की लालच या नाराज होने के डर से यहूदी राज्य को अपनाने में देरी की। आज जब भारत और इजरायल रक्षा, खुफिया, कृषि और टेक्नोलॉजी में मजबूत साझेदारी साझा कर रहे हैं तो ये रिश्ता उस रणनीतिक स्पष्टता को दिखाता है जो भारत की आधिकारिक विदेश नीति में समय ले कर पकी।

भारत-इजरायल रिश्ते को सावरकर की दूरदृष्टि से देखने की जरूरत

वीर सावरकर भारतीय आजादी की लड़ाई के सबसे अहम किरदारों में से एक बने हुए हैं। उनकी जिंदगी राष्ट्र की संप्रभुता और सभ्यता को बचाए रखने के अडिग समर्पण से भरी थी जिसमें क्रांतिकारी हिम्मत और रणनीतिक सोच दोनों थे। सावरकर ने यहूदियों की राष्ट्र की आकांक्षा को वैध माना और उनके पुराने देश को वापस पाने के अधिकार का समर्थन किया था इजरायल आधुनिक राष्ट्र बनने से दशकों पहले।

उनके विचार उस बड़े दर्शन से मेल खाते थे कि राष्ट्रों को राजनीतिक खुद फैसला करने का अधिकार है क्योंकि वे साझा इतिहास और संस्कृति से जुड़े होते हैं। सावरकर के विचारों को सही इतिहास के संदर्भ में देखना भी उतना ही जरूरी है।

उनकी दुनिया की राजनीतिक व्यवस्थाओं पर टिप्पणियाँ भू-राजनीतिक यथार्थ पर आधारित थीं जिसमें राष्ट्र हित ही भारत की विदेश नीति का मार्गदर्शक होना चाहिए न कि कोई विचारधारा। नस्ल शुद्धता के विचारों को खारिज करना ये और साफ करता है कि उनका फोकस मुख्य रूप से भारत की रणनीतिक ताकत पर था न कि विदेशी विचारधाराओं के प्रति वफादारी पर।

दूसरी तरफ आजादी के बाद भारत का इजरायल के साथ औपचारिक रिश्ता धीरे-धीरे बदला। भारत ने 1950 में इजरायल को मान्यता दी लेकिन राजनयिक रिश्ते पूरे विकसित होने में दशक लग गए। आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इजरायल यात्रा व्यावहारिक और हित आधारित विदेश नीति की साफ दिशा दिखाती है क्योंकि इसमें सैन्य, टेक्नोलॉजी और साझा रणनीतिक हितों में सहयोग मजबूत हो रहा है।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित की गई है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

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Dhruv Mishra
Dhruv Mishra
Dhruv Mishra is a researcher and writer specializing in Indian politics and policy analysis. With a background in data-driven storytelling, he explores elections, governance, and India’s role in global affairs.

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