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आस्था और आजीविका की ‘रामबाण’ पहल: बस्ती में ‘रामजी के पेड़े’ से खुल रही महिला सशक्तिकरण की नई राह

जब 100 स्वयं सहायता समूहों की महिलाएँ 'रामजी का सोहर' गाते हुए 'रामजी के पेड़े' का निर्माण करेंगी, तो यह एक व्यवसाय होने के साथ-साथ आस्था, संस्कृति, आत्मनिर्भरता और सामुदायिक एकता का एक अनूठा सम्मिश्रण भी होगा।

भारत की आत्मा गाँवों में बसती है और गाँवों की रीढ़ हैं हमारी महिलाएँ। आज भी, जब देश तेजी से विकास के पथ पर अग्रसर है, ग्रामीण भारत की महिलाएँ आर्थिक और सामाजिक रूप से सशक्तिकरण की राह में अनेक चुनौतियों का सामना कर रही हैं। ऐसे में उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में ‘पहल’ संस्थान द्वारा शुरू की गई एक पहल न केवल इन महिलाओं के जीवन में बदलाव लाने वाली है बल्कि यह जनसेवा और राजनीति के आध्यात्मिकीकरण का एक सशक्त उदाहरण भी प्रस्तुत करती है।

जब 100 स्वयं सहायता समूहों की महिलाएँ ‘रामजी का सोहर’ गाते हुए ‘रामजी के पेड़े’ का निर्माण करेंगी, तो यह एक व्यवसाय होने के साथ-साथ आस्था, संस्कृति, आत्मनिर्भरता और सामुदायिक एकता का एक अनूठा सम्मिश्रण भी होगा।

‘पहल’ संस्थान का यह प्रयास सचमुच एक सार्थक पहल है। बस्ती के 100 स्वयं सहायता समूहों को 1-1 लाख रुपए की आर्थिक सहायता (जो 25-25 हजार की चार किश्तों में दी जाएगी) प्रदान करना एक साहसिक और दूरदर्शितापूर्ण कदम है। यह राशि इन महिलाओं के हाथों में एक ऐसा उपकरण है, जिससे वे न केवल अपनी बल्कि अपने परिवार और समाज की तकदीर बदल सकती हैं। यह पूँजी उन्हें एक ऐसे उद्यम से जोड़ती है जिसकी जड़ें भारतीय संस्कृति और आस्था में गहराई तक धँसी हुई हैं।

‘रामजी के पेड़े’ का निर्माण इस परियोजना की आत्मा है। यह कोई साधारण मिठाई नहीं है। यह प्रसाद है, जो अयोध्या के भव्य राम मंदिर में विराजमान भगवान श्रीराम को चढ़ाया जाएगा। जब महिलाएँ इन पेड़ों को बनाएँगी तो उस प्रक्रिया में वो ‘रामजी का सोहर’ (लोकगीत) गाएँगी। ‘रामजी का सोहर’ गीत केवल एक लोकगीत नहीं है बल्कि यह हमारी सांस्कृतिक विरासत का एक जीवंत दस्तावेज है।

जब ये महिलाएँ काम करते हुए इन गीतों को गाएँगी तो वे न केवल अपनी परंपराओं को संरक्षित करेंगी बल्कि उन्हें आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाने का काम भी करेंगी। यह सांस्कृतिक पुनरुत्थान का एक सुंदर उदाहरण है, जहाँ लोक कला और आधुनिक उद्यम साथ-साथ चलते हैं। यह परिदृश्य हमें उस भारत की याद दिलाता है, जहाँ हर काम में ईश्वर का स्मरण होता था, हर उत्सव में सामूहिकता होती थी और हर उपज में आस्था का समावेश होता था।

देश-विदेश से राम भक्तों द्वारा इस प्रसाद के लिए आने वाले ऑर्डर इस बात के प्रमाण होंगे कि आस्था की कोई सीमा नहीं होती और न ही उसकी कोई कीमत होती है। यह माँग इन महिलाओं के उत्पाद को एक वैश्विक पहचान देगी और उन्हें आर्थिक रूप से इतना सशक्त बनाएगी कि वे आत्मनिर्भर भारत के सच्चे निर्माता साबित होंगी।

इस परियोजना के केंद्र में जनसेवा की भावना निहित है। यह कोई दान या हैंडआउट नहीं है बल्कि एक स्थायी आजीविका का माध्यम है। यह महिलाओं को उनके पैरों पर खड़ा होने का अवसर देता है। वे अब केवल परिवार की आर्थिक स्थिति में सहायक नहीं रहेंगी बल्कि वे स्वयं आय के मुख्य स्रोतों में से एक बन जाएँगी।इससे उनके परिवारों का जीवन स्तर तो ऊपर उठेगा ही, साथ ही समाज में उनकी स्थिति और सम्मान में भी अभूतपूर्व वृद्धि होगी।

एक आत्मनिर्भर महिला न केवल अपने बच्चों की शिक्षा का खर्च उठा सकती है बल्कि वह उनके स्वास्थ्य और पोषण पर भी ध्यान दे सकती है। इस तरह, यह एकल पहल सामाजिक विकास के कई आयामों को एक साथ छूती है।

इस पूरी अवधारणा में ‘राजनीति का आध्यात्मिकीकरण’ का गूढ़ दर्शन छिपा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी राजनीति में नैतिकता और अध्यात्म के समावेश पर बल दिया है। आज के संदर्भ में, राजनीति का आध्यात्मिकीकरण का अर्थ है, विकास की राजनीति को आस्था, संस्कृति और सामुदायिक मूल्यों से जोड़ना। यह केवल वोट बैंक की राजनीति से ऊपर उठकर, जनता की भावनाओं और आस्था को विकास की मुख्यधारा में शामिल करने का प्रयास है।

यहाँ ‘राम’ केवल एक देवता नहीं हैं बल्कि भारतीय सांस्कृतिक चेतना के प्रतीक हैं। उनसे जुड़कर यह आर्थिक गतिविधि एक पवित्र आयाम ग्रहण कर लेती है। जब राजनीतिक इच्छाशक्ति और सामाजिक संगठन मिलकर ऐसी परियोजनाओं को बढ़ावा देते हैं, जिनका सीधा संबंध लोगों की आस्था से हो, तो वह जनसेवा महज एक सरकारी योजना न रहकर एक जनांदोलन का रूप ले लेती है।

यह परियोजना दर्शाती है कि कैसे एक धार्मिक स्थल (राम मंदिर) और धार्मिक आयोजन को आर्थिक गतिविधियों के केंद्र में रखा जा सकता है। इससे एक ऐसा इकोसिस्टम तैयार होता है, जहाँ आस्था उत्पादन को बढ़ावा देती है, उत्पादन रोजगार पैदा करता है और रोजगार समृद्धि लाता है। यह राजनीति का वह रूप है जो विकास को धार्मिक आस्था से जोड़कर उसे अधिक समावेशी और प्रभावशाली बनाता है।

बस्ती की यह पहल केवल एक स्थानीय घटना नहीं है, यह एक विचार है – एक ऐसा विचार जो पूरे देश में दोहराया जा सकता है। यह दर्शाता है कि कैसे आस्था, संस्कृति और आधुनिक अर्थशास्त्र का सम्मिलन समाज के सबसे कमजोर वर्गों को सशक्त बना सकता है।

‘रामजी के पेड़े’ का निर्माण केवल एक मिठाई बनाने की प्रक्रिया नहीं है, यह आत्मसम्मान, आत्मनिर्भरता और आध्यात्मिकता का निर्माण है। जनसेवा का यह मॉडल, जो राजनीति के आध्यात्मिकीकरण की अवधारणा पर आधारित है, हमें सिखाता है कि सच्चा विकास वही है जो जनता की आस्था और आकांक्षाओं से जुड़ा हो।

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मनीष मिश्रा
मनीष मिश्रा
नेशनल कमिश्नर, भारत स्काउट एवं गाइड

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