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ब्रज के गौरक्षक चंद्रशेखर महाराज, जिनकी ट्रक से कुचलकर गई जान: जानिए कैसे मिला था उन्हें ‘फरसा वाले बाबा’ का नाम

ब्रज के गाँवों में चंद्रशेखर महाराज की छवि एक रक्षक की थी, जो गोवंश की सुरक्षा के लिए अपनी जान हथेली पर लेकर चलते थे। उनके अनुयायियों का मानना है कि उन्होंने अपना पूरा जीवन श्री कृष्ण की लाडली गायों की सेवा में समर्पित कर दिया था।

धर्मनगरी मथुरा में गौरक्षा के सबसे बड़े नायक माने जाने वाले संत चंद्रशेखर, जिन्हें ब्रज के लोग सम्मान से ‘फरसा वाले बाबा’ पुकारते थे, अब हमारे बीच नहीं रहे। शुक्रवार (20 मार्च 2026) तड़के करीब 4 बजे, जब पूरा इलाका नींद में था, तब बाबा अकेले ही गोतस्करों के एक काल बनकर उनका पीछा कर रहे थे।

इसी दौरान एक हादसे में उन्हें ट्रक ने कुचल दिया, जिससे मौके पर ही उनकी मृत्यु हो गई। इस घटना ने पूरे उत्तर प्रदेश को झकझोर कर रख दिया है और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने खुद इस मामले का संज्ञान लेते हुए आरोपितों के खिलाफ पाताल से ढूँढकर कड़ी कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं।

कौन थे ‘फरसा वाले बाबा’ संत चंद्रशेखर?

संत चंद्रशेखर महाराज मथुरा के कोसीकलां क्षेत्र के एक समर्पित गौ सेवक और संत थे, जो पिछले कई वर्षों से ब्रज की गायों को तस्करों से बचाने के लिए एक दीवार की तरह खड़े थे। उन्हें ‘फरसा वाले बाबा’ इसलिए कहा जाता था क्योंकि वे हमेशा अपने साथ एक छोटा फरसा रखते थे, जो उनके साहस और अधर्म के प्रति कड़े विरोध का प्रतीक था। वे केवल प्रवचन देने वाले संत नहीं थे, बल्कि वे जमीन पर उतरकर आधी रात को भी तस्करों की सूचना मिलते ही अपनी बाइक से उनका मुकाबला करने निकल पड़ते थे।

ब्रज के गाँवों में उनकी छवि एक रक्षक की थी, जो गोवंश की सुरक्षा के लिए अपनी जान हथेली पर लेकर चलते थे। उनके अनुयायियों का मानना है कि उन्होंने अपना पूरा जीवन श्री कृष्ण की लाडली गायों की सेवा में समर्पित कर दिया था। स्थानीय गौरक्षा संगठनों में उनकी बात पत्थर की लकीर मानी जाती थी और वे युवाओं के लिए प्रेरणा के सबसे बड़े स्रोत थे। उनके जाने से गौरक्षा आंदोलन को एक ऐसी क्षति हुई है, जिसकी भरपाई कभी नहीं की जा सकेगी।

साजिश के तहत हुई निर्मम हत्या

घटनाक्रम के अनुसार, शुक्रवार (20 मार्च 2026) तड़के बाबा को गुप्त सूचना मिली थी कि तस्कर गायों से भरा एक ट्रक लेकर नवीपुर गाँव के पास से गुजरने वाले हैं। बिना किसी डर के, बाबा ने अपनी बाइक उठाई और अकेले ही उस ट्रक को रोकने के लिए निकल पड़े। पीछा करने के दौरान जब तस्करों को लगा कि वे पकड़े जा सकते हैं, तो उन्होंने अपनी गाड़ी रोकने के बजाय जानबूझकर बाबा की बाइक में जोरदार टक्कर मारी और उन्हें रौंदते हुए फरार हो गए।

टक्कर इतनी जबरदस्त थी कि बाबा चंद्रशेखर की मौके पर ही मौत हो गई। हालाँकि, मौके पर मौजूद कुछ स्थानीय लोगों ने हिम्मत दिखाते हुए ट्रक का पीछा किया और भाग रहे एक मुस्लिम आरोपित को दबोचकर पुलिस के हवाले कर दिया, जबकि उसके तीन अन्य साथी अंधेरे का फायदा उठाकर भागने में सफल रहे। इस घटना को लोग महज एक हादसा नहीं, बल्कि गोतस्करों द्वारा रची गई एक सोची-समझी साजिश और प्रतिशोध का हिस्सा मान रहे हैं।

हालाँकि बाद में पुलिस ने बताया कि बाबा चंद्रशेखर की मौत हादसे में हुई थी। पुलिस ने बताया कि वो जिस ट्रक को रुकवा कर तलाशी रहे थे, उस पर किराने का सामान लदा था और बाबा को कुचलने वाला ट्रक दूसरा था, जिसपर सरिया लदा था। हादसे में ट्रक ड्राइवर गंभीर रूप से घायल हो गया था, जिसकी अस्पताल में मौत हो गई थी।

हाईवे पर संग्राम और सुलगता आक्रोश

बाबा की हत्या की खबर जैसे ही मथुरा और आसपास के जिलों में फैली, हजारों की तादाद में गौरक्षक और ग्रामीण दिल्ली-आगरा हाईवे पर जमा हो गए। लोगों का गुस्सा इतना ज्यादा था कि उन्होंने हाईवे को पूरी तरह ठप कर दिया, जिससे गाड़ियों की कई किलोमीटर लंबी कतारें लग गईं। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि जब तक फरार तीनों हत्यारों की गिरफ्तारी नहीं होती और पीड़ित परिवार को न्याय नहीं मिलता, वे पीछे नहीं हटेंगे।

हालात उस समय और बिगड़ गए जब भीड़ और पुलिस के बीच तीखी नोकझोंक हुई। आक्रोशित लोगों ने हाईवे पर खड़े वाहनों पर पथराव शुरू कर दिया, जिसमें कई गाड़ियाँ क्षतिग्रस्त हो गईं और कुछ पुलिसकर्मी भी घायल हुए। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए प्रशासन को आंसू गैस के गोले छोड़ने पड़े और पूरे इलाके को छावनी में तब्दील करना पड़ा। वर्तमान में मथुरा के चप्पे-चप्पे पर सुरक्षा बल तैनात है, लेकिन बाबा के समर्थकों की आँखों में आँसू और दिल में सुलगता गुस्सा अभी भी बना हुआ है।

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