‘नो किंग्स’ का मतलब क्या है
अमेरिका में ‘नो किंग्स’ प्रदर्शन का यह तीसरा दौर है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि वे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों का विरोध कर रहे हैं। इन नीतियों में ईरान के साथ युद्ध, संघीय इमीग्रेशन कानून, फ्यूल की बढ़ती कीमत के साथ साथ देश में बढ़ रही महँगाई हैं।
“No Kings” protesters assembled to form a message reading “TRUMP MUST GO NOW!” at Ocean Beach in San Francisco, California today pic.twitter.com/4xq9PicSvh
— Brendan Gutenschwager (@BGOnTheScene) March 28, 2026
प्रदर्शनकारियों का कहना है कि ट्रंप हम पर एक तानाशाह की तरह राज करना चाहते हैं, लेकिन यह अमेरिका है। यहाँ असली ताकत आम लोगों के हाथों में है, न कि उन लोगों के हाथों में जो खुद को राजा समझना चाहते हैं और न ही उनके अरबपति साथियों के हाथों में है।
अमेरिका के न्यूयॉर्क, वॉशिंगटन DC और लॉस एंजिल्स सहित हर बड़े शहर में ट्रंप विरोधी प्रदर्शन हुए हैं।
28 मार्च 2026 को राजधानी वॉशिंगटन DC के डाउनटाउन की सड़कों पर मार्च निकाला गया। प्रदर्शनकारियों ने लिंकन मेमोरियल की सीढ़ियों पर कतार लगा कर खड़े हुए और ट्रंप की नीतियों का विरोध किया।
राष्ट्रपति ट्रंप, जेडी वेंस समेत कई लोगों की गिरफ्तारी की माँग
प्रदर्शनकारियों ने ट्रंप, उपराष्ट्रपति जेडी वेंस समेत कई प्रशासनिक अधिकारियों के पुतले लहराए और उन्हें पद से हटाने के साथ-साथ गिरफ्तार करने की माँग की।
‘नो किंग्स’ विरोध प्रदर्शनों का असर सबसे ज्यादा मिनेसोटा में दिखा, जहाँ जनवरी में फेडरल इमिग्रेशन एजेंट्स ने रेनी निकोल गुड और एलेक्स प्रेटी नाम के दो अमेरिकी नागरिकों की हत्या कर दी थी। उनकी मौत से लोगों में भारी गुस्सा भड़का और ट्रंप प्रशासन की इमिग्रेशन नीतियों का पूरे देश में विरोध शुरू हुआ।
देश विदेश में हो रहे प्रदर्शनों को व्हाइट हाउस ने जनता की आवाज मानने से इनकार कर दिया। इनका कहना है कि यह वामपंथी फंडिंग का नेटवर्क है। व्हाइट हाउस के प्रवक्ता के मुताबिक, यह ‘ट्रंप डेरेजमेंट थेरेपी सेशंस’ (ट्रंप-विरोधी पागलपन के सत्र) है। उन्होंने कहा कि इन प्रदर्शनों की परवाह सिर्फ वे रिपोर्टर करते हैं, जिन्हें इन्हें कवर करने के लिए पैसे मिलते हैं।
ट्रंप की रेटिंग में आ रही गिरावट
अमेरिका में ट्रंप की लोकप्रियता और रेटिंग लगातार गिर रही है। हालाँकि कई सर्वे अलग अलग रेटिंग दे रहे हैं। जानकारों के मुताबिक, अमेरिका में एप्रूवल रेटिंग वैश्विक घटनाओं के लेकर घरेलू मुद्दों तक की वजह से होती है, जो हमेशा बदलती रहती है। हालाँकि अमेरिका में बढ़ती महँगाई, फ्यूल की कमी आम लोगों को काफी परेशान कर रही है। इसका असर रेटिंग पर पड़ा है।
सिल्वर बुलेट के मुताबिक, ट्रंप के दूसरे कार्यकाल का अभी सबसे खराब रेटिंग है। ईरान युद्ध , व्यापार, टैरिफ और इमिग्रेशन से लेकर महँगाई को लेकर जनता राष्ट्रपति ट्रंप से नाराज है।
रॉयटर्स या इप्सोस सर्वे के मुताबिक, अमेरिका में मात्र 37 फीसदी लोग ही युद्ध का समर्थन कर रहे हैं जबकि 59 फीसदी इसके खिलाफ हैं। खास बात है कि डेमोक्रेट और स्वतंत्र वोटर तो इसका विरोध कर ही रहे हैं। 5 में से 1 रिपब्लिकन भी युद्ध के विरोध में हैं। ईरान में अमेरिका सेना भेजने के खिलाफ जनता का मत है।
व्हाइट हाउस में फूट पड़ा
इस सब के बीच व्हाइट हाउस में ईरान युद्ध को लेकर सिरफुटव्वल है। जानकारी के अनुसार, डोनाल्ड ट्रंप की अपनी टीम में ही इस समय दो गुट बन गए हैं और दोनों के बीच जबरदस्त खींचतान चल रही है।
एक गुट उन लोगों का है जो देश की अर्थव्यवस्था और राजनीति को संभालते हैं। इनका कहना है कि अगर यह युद्ध और लंबा खिंचा, तो पेट्रोल की कीमतें आसमान छूने लगेंगी। उन्हें डर है कि अगर आम जनता को महँगा पेट्रोल खरीदना पड़ा, तो वे ट्रंप के खिलाफ हो जाएँगे और उनका समर्थन करना बंद कर देंगे। इसलिए, ये सलाहकार ट्रंप को समझा रहे हैं कि हमें अब युद्ध रोक देना चाहिए और दुनिया से कह देना चाहिए कि हमने अपना काम पूरा कर लिया है।
वहीं दूसरी तरफ, ट्रंप की टीम में कुछ ऐसे नेता भी हैं जो युद्ध को जारी रखने के पक्ष में हैं। उनका मानना है कि अगर अभी हमला रोक दिया गया, तो ईरान इसे अपनी जीत समझेगा और बहुत जल्द परमाणु बम बना लेगा। उन्हें डर है कि अधूरा छोड़ा गया काम आगे चलकर अमेरिकी सैनिकों के लिए और भी बड़ा खतरा बन सकता है। उनका तर्क है कि ईरान को अभी पूरी तरह कमजोर करना जरूरी है।
अब राष्ट्रपति ट्रंप इन दोनों गुटों के बीच बुरी तरह फँसे हुए हैं। वे एक तरफ अपने उन समर्थकों को खुश रखना चाहते हैं जिन्होंने उन्हें इसलिए वोट दिया था क्योंकि उन्होंने दावा किया था कि वे अमेरिका को किसी नई जंग में नहीं फँसाएँगे। लेकिन दूसरी तरफ, वे दुनिया को यह भी दिखाना चाहते हैं कि वे एक मजबूत नेता है और दुश्मनों को किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ेंगे। इसी दुविधा की वजह से वे कोई एक ठोस फैसला नहीं ले पा रहे हैं।
ईरान युद्ध में फँसे ट्रंप
दरअसल ईरान को हल्के में लेकर राष्ट्रपति ट्रंप फँस गए हैं। उन्हें अंदाजा नहीं था कि ईरान इतने दिनों तक युद्ध खींचेगा। इतना ही नहीं वह हॉर्मुज स्ट्रेट को बंद कर देगा और अमेरिका उसे खुलवाने में नाटो से मदद माँगेगा। नाटो देश अमेरिका की मदद करने से इनकार कर देंगे। यह सब अमेरिका के लिए पहली बार हुआ है, जब ब्रिटेन, फ्राँस जैसा सहयोगी देश उसकी मदद से परहेज कर रहा है।
राष्ट्रपति ट्रंप ने 5 दिनों के लिए ईरानी पॉवर प्लांट पर आक्रमण नहीं करने की बात कही, लेकिन अब न तो इजरायल रुकने को तैयार है और न ही ईरान। राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान युद्ध में जीत के दावे भी कर दिए। इसके जवाब में ईरान क्लस्टर मिसाइल मार रहा है। होर्मुज स्ट्रेट को रोक रखा है। अब अमेरिका के लिए युद्ध से वापस निकलने का रास्ता दिख नहीं रहा। अगर अमेरिका जमीनी कार्रवाई करता है तो उसका विरोध अमेरिका के लोग और जोर-शोर से करेंगे। एयरस्ट्राइक से बात बन नहीं रही है। ईरान के बड़े बड़े नेताओं की मौत के बाद भी युद्ध की धार कमजोर नहीं पड़ रही है, अमेरिका के लिए यही चिंता का कारण है।


