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आज PDA का अखिलेश यादव दे रहे झाँसा, सरकार में रहते ‘D’ का अस्तित्व भी नहीं था कबूल: योगी राज में मिला ‘छत्र’, जानिए- सपा शासन में कैसे होता था दलितों का उत्पीड़न

अखिलेश यादव के काल में जो दलित भुला दिए गए, जिन नायकों का अपमान किया गया और जिन समुदायों को बस वोट का साधन मानकर छोड़ दिया गया उन्हें अब योगी सरकार में सम्मान और पहचान मिल रही है।

देशभर में कल (14 अप्रैल 2026) को डॉक्टर भीमराव अंबेडकर की जयंती मनाई जाएगी। उनकी जयंती से पहले ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली उत्तर प्रदेश सरकार ने बाबा साहेब से जुड़े कई बड़े ऐलान किए हैं। योगी कैबिनेट ने ‘डा बीआर अंबेडकर मूर्ति विकास योजना’ को मंजूरी दी है जिसके तहत बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर और अन्य सुधारकों और महापुरुषों की मूर्तियों का संरक्षण और सौंदर्यीकरण किया जाएगा।

यह योजना सामाजिक सम्मान और ऐतिहासिक विरासत को मजबूत करने का ठोस कदम है। जिन महापुरुषों ने समाज के सबसे वंचित वर्गों को आवाज दी, उनके योगदान को योगी सरकार में जमीन पर उतारने का काम हो रहा है। अखिलेश यादव के काल में जो दलित भुला दिए गए, जिन नायकों का अपमान किया गया और जिन समुदायों को बस वोट का साधन मानकर छोड़ दिया गया उन्हें अब योगी सरकार में सम्मान और पहचान मिल रही है।

दलितों के नायकों को योगी सरकार का सम्मान

सबसे पहले बात योगी सराकर की सबसे नई योजना से ही शुरू करते हैं। योगी सरकार प्रदेश में डॉ. भीमराव अंबेडकर, संत रविदास, कबीर, ज्योतिबा फुले, महर्षि वाल्मीकि जैसे महानायकों की मूर्तियों का सौंदर्यीकरण और संरक्षण करने जा रही है। योजना के तहत प्रदेश के सभी 403 विधानसभा क्षेत्रों में 10-10 स्मारकों का विकास किया जाएगा और इसके लिए 403 करोड़ रुपए खर्च किए जाएँगे।

इन स्मारकों के आसपास बाउंड्री वॉल, छतरी, सौंदर्यीकरण, हरियाली और लाइट की व्यवस्था की जाएगी। इस योजना का उद्देश्य केवल मूर्तियों की सुरक्षा करना नहीं है, बल्कि आसपास के क्षेत्र को विकसित कर रोजगार के अवसर बढ़ाना भी है। निर्माण कार्यों के जरिए ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियों को सीधा बढ़ावा मिलेगा। यह पहल मूर्ति स्थलों को केवल प्रतीकात्मक स्थान तक सीमित नहीं रखेगी बल्कि उन्हें उपयोगी और जानकारी देने वाले केंद्र के रूप में विकसित करेगी।

गोरखपुर में BJP के स्थापना दिवस (6 अप्रैल 2026) पर एक कार्यक्रम में सीएण योगी आदित्यनाथ ने ऐलान किया था कि प्रदेश में जहाँ भी बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर की प्रतिमा होगी उसके ऊपर छत्र लगाया जाएगा। उन्होंने कहा था, “हमारी सरकार ने तय किया है कि 14 अप्रैल को भारत के संविधान के शिल्पी बाबा साहब की पावन जयंती पर भाजपा के कार्यकर्ता बूथ स्तर पर बाबा साहब की मूर्तियों के पास एक दिन पहले साफ-सफाई करेंगे। 14 अप्रैल को प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित करेंगे।”

एक ओर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की दलितों और दलित नायकों के प्रति संवेदना है तो दूसरी तरफ उनसे पूर्ववर्ती सपा का शासनकाल था। अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली उस सरकार में दलितों का खूब उत्पीड़न हुआ तो दलित नायकों का भी अपनाम किया गया।

अखिलेश यादव के काल में दलित नायकों का अपमान

उत्तर प्रदेश में 2012 में सत्ता सँभालने के कुछ ही दिनों के भीतर अखिलेश यादव का दलित विरोधी चेहरा सामने आने लगा था। जुलाई 2012 में अखिलेश यादव ने मायावती के काल के 8 जिलों के नाम बदल दिए थे। इनमें से कुछ नवगठित थे जबकि कुछ के मायावती ने नाम बदले थे। हैरानी की बात ये है कि अखिलेश ने जिन जिलों के नामों को बदला उनमें से अधिकतर बहुजन नायकों से जुड़े नाम थे।

छत्रपति शाहूजी महाराज नगर जिले का नाम बदलकर गौरीगंज कर दिया गया जबकि रमाबाई नगर को फिर से उसके पुराने नाम कानपुर देहात में परिवर्तित कर दिया गया। अखिलेश ने भीमनगर, प्रबुद्धनगर और पंचशीलनगर जैसे जिलों के नाम भी बदले और इन्हें क्रमशः बहजोई, शामली और हापुड़ कर दिया। साथ ही, कांशीराम नगर, महामायानगर और जेपीनगर का नाम बदलकर क्रमशः कासगंज, हाथरस और अमरोहा कर दिया गया। इसी बैठक में छत्रपति शाहूजी महाराज चिकित्सा विश्वविद्यालय, लखनऊ का नाम फिर से ‘किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय’ किया गया था।

जब कांशीराम से अखिलेश ने निकाली ‘खुन्नस’

अखिलेश यादव ने कुछ दिनों पहले एक सियासी नाटक करते हुए कांशीराम जयंती को ‘PDA दिवस’ के रूप में मनाने का ऐलान किया था। हालाँकि, जब कांशीराम की जयंती मनाने की बारी आई तो रविवार (15 मार्च 2026) को अखिलेश यादव मुंबई में सितारों संग महफिल जमाने पहुँच गए। कांशीराम का यह अपमान और सपा का यह राजनीतिक पाखंड नया नहीं है। अखिलेश ने सत्ता सँभालते ही कांशीराम का अपमान करना शुरू कर दिया था।

अखिलेश यादव ने कांशीराम नगर जिले का नाम बदलकर तो कासगंज किया ही और इसके कुछ ही महीनों में लखनऊ के श्री कांशीराम जी उर्दू, अरबी-फारसी विश्वविद्यालय का नाम बदल कर ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती उर्दू, अरबी फारसी विश्वविद्यालय कर दिया गया। तब मायावती ने इस पर कड़ा एतराज जताया था। यहाँ तक कि अजमेर शरीफ दरगाह के सज्जादनशीन ने सूफी संत को सियासत में खींचे जाने पर आपत्ति जताई थी। लेकिन दलितों की भावनाओं को ताक पर रख अखिलेश जमकर मुस्लिम तुष्टिकरण में लगे थे और ऐसा आजम खान के कहने पर किया गया था।

अखिलेश का तुष्टीकरण यहीं नहीं थमा, 2013 के आखिर में अखिलेश सरकार ने सहारनपुर में कांशीराम के नाम पर बनाए जा रहे मेडिकल कॉलेज का नाम बदलकर ‘शेखुल हिन्द महमूदुल हसन मदनी’ के नाम पर कर दिया। यह मुजफ्फरनगर में दंगों के बाद का दौर था और अखिलेश किसी भी तरह अपने मुस्लिम वोट बैंक को खुश रखना चाहते थे। अखिलेश ने मायावती सरकार में कांशीराम की पुण्यतिथि पर शुरू की गई छुट्टी को भी रद्द कर दिया था।

अखिलेश यादव ने सत्ता संभालने के बाद मायावती के काल की 25 से अधिक योजनाएँ बंद की थीं जिनमें से कई दलित नायकों के नाम पर थीं। कांशीराम जी शहरी गरीब आवास योजना, कांशीराम ग्रीन (ईको) गार्डेन का निर्माण, कांशीराम शहरी दलित बाहुल्य बस्ती समग्र विकास योजना और अनुसूचित जाति-छात्रवृत्ति योजना जैसी योजनाएँ शामिल थीं।

अखिलेश के राज में दलितों का उत्पीड़न

अखिलेश के राज में दलितों पर उत्पीड़न चुनाव जीतते ही शुरू हो गया था। यूपी में 2012 में जैसी ही सपा लौटी तुरंत हिंसा का दौर लौट आया, फिर अराजकता वाले दिनों की आहट सुनाई देने लगी। मार्च 2012 की इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट में लिखा है, “पिछले 36 घंटों के दौरान पूरे राज्य में हुई हिंसा की घटनाओं में कम से कम 3 लोगों की मौत हो गई है और दर्जनों दलितों के घरों में आग लगा दी गई है और इनमें से कई घटनाओं में सपा कार्यकर्ता शामिल थे।”

जानते हैं इस समय मुलायम सिंह की चिंता क्या थी? मुलायम सिंह ने सपा कार्यकर्ताओं से कहा था, “अगर आप अनुशासन नहीं बनाए रखेंगे तो आप भविष्य में मुझे प्रधानमंत्री नहीं बना पाएँगे।”

NDTV की 12 मार्च 2012 की एक रिपोर्ट बताती है कि सपा की जीत के बाद पार्टी कार्यकर्ताओं ने जमकर उत्पाद मचाया। भदोही और सीतापुर में दलितों के घर में आग लगा दी गई। रिपोर्ट में कहा गया, “होली के दिन बाह के पार्वती पूरा गाँव में बीएसपी की प्रधान गुड्डी देवी के पति मुन्ना लाल जाटव की हत्या कर दी गई। हत्या से पहले घर में तोड़फोड़ भी की गई है। भदोही में समाजवादी पार्टी कार्यकर्ताओं पर दलितों के घर में आग लगाने का आरोप लगा है।”

इसी रिपोर्ट में कहा गया कि यूपी में बलिया के भुज छपरा गाँव में सपा कार्यकर्ताओं पर 5 दलित महिलाओं और बच्चों को बुरी तरह मारने-पीटने के आरोप लगे। जब सपा कार्यकर्ताओं को पता चला कि इस गाँव के ज्यादातर लोगों ने JDU को वोट दिया है तो 40+ सपा कार्यकर्ता गाँव में घुसे और मारपीट की। इसी दौरान बसपा सरकार में मंत्री रहे राम अचल राजभर की एक राइस मिल भी सपा समर्थित लोगों ने फूँक दी थी।

हिन्दुस्तान टाइम्स की 15 मार्च 2012 एक रिपोर्ट बताती है कि बसपा प्रमुख मायावती के पैतृक गाँव बादलपुर के पास दादरी इलाके में सपा के कार्यकर्ताओं ने दलित परिवारों पर हमला कर दिया। दलितों को लाठियों से पीटा गया। इस हमले में महिलाओं समेत 19 लोग घायल हुए थे। यह हमला इसलिए हुआ क्योंकि दादरी से बसपा के विधायक जीत गए थे और सपा का उम्मीदवार हार गया था।

2013 में सपा के दौर में एक दलित चिंतक और लेखक कंवल भारती को फेसबुक स्टेट्स के कारण गिरफ्तार कर लिया गया था। बीबीसी की रिपोर्ट में कहा गया है कि कंवल भारती ने इतना लिखा था कि आरक्षण के मामले में सपा सरकार पूरी तरह नाकाम हो गई है और अखिलेश-शिवपाल-आजम-मुलायम जनता से कट गए हैं। इसके बाद बनियान और पाजामे में कंवल भारती को अखिलेश की पुलिस ने घर से उठा लिया। अखिलेश सरकार का पूरा काल हिंसा की लपटों में बीता और इसमें दलितों को खूब निशाना बनाया गया।

योगी सरकार ने ली दलितों की सुध

मार्च 2017 में योगी आदित्यनाथ सरकार सत्ता में आई तो उसने समाज के सभी वर्गों को साथ लेने का बीड़ा उठाया। अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) छात्रों की 2016-17 की छात्रवृत्तियाँ जो बंद कर दी गई थीं उन्हें योगी सरकार ने फिर से शुरू किया DBT (डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर) के जरिए राशि सीधे खातों में पहुँचाई गई। इस योजना से लाखों दलित छात्रों को लाभ पहुँचा है।

प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY) के तहत दलित परिवारों को प्राथमिकता दी गई। सत्ता में आने के साल में ही 2017 के अंत तक लाखों दलित परिवारों को पक्के घर, राशन कार्ड, शौचालय और बिजली कनेक्शन मिलने शुरू हो गए। सरकार ने दावा किया कि दलित सबसे ज्यादा योजनाओं के लाभार्थी बने।

2018 में जब योगी आदित्यनाथ को सत्ता में आए बमुश्किल एक साल ही हुआ था तब तक भी दलितों के लिए किए जा रहे कार्यों का साफ-साफ असर दिखाई देने लगा था। अप्रैल 2018 की TOI की एक रिपोर्ट बताती है कि PMAY के तहत कुल 8.85 लाख घरों में से 6.50 लाख दलित परिवारों को दिए गए। 37 लाख दलितों को पहली बार राशन कार्ड जारी किए गए। स्वच्छ भारत मिशन के तहत 40 लाख शौचालयों में से 36 लाख दलित बस्तियों में बने और सौभाग्य योजना से 32 लाख दलित घरों को बिजली कनेक्शन मिले। यह पहले वर्ष तक का ही आँकड़ा था।

योगी सरकार ने शिक्षा, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में काम करके ना सिर्फ दलितों को बराबरी का अधिकार देने की कोशिश की है बल्कि उन्हें आत्मनिर्भर बनने के लिए भी प्रोत्साहित किया है। राज्य में अनुसूचित जाति (SC) के छात्रों के लिए 100 सर्वोदय स्कूल खोले गए हैं जिनमें 60% सीटें SC के लिए आरक्षित थीं। उत्तर प्रदेश अनुसूचित जाति वित्त एवं विकास निगम ने लाखों दलित युवाओं को स्वरोजगार के अवसर दिए हैं। दलितों को बड़ी संख्या में लोन दिए गए ताकि वे अपना व्यवसाय शुरू कर सकें और आत्मनिर्भर बन सकें। ऐसे कामों की एक लंबी फेहरिस्त है जो योगी सरकार में दलितों के उत्थान और उन्हें मुख्य धारा में लाने के लिए शुरू किए गए हैं।

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शिव
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7 वर्षों से खबरों की तलाश में भटकता पत्रकार...

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