प्रधानमंत्री मोदी ने लोकसभा में परिसीमन समेत 3 संविधान संशोधन बिल पर बोलते हुए राज्यों को भरोसा दिलाया है कि किसी भी राज्य को परिसीमन से घाटा नहीं होगा। इसके बावजूद प्रोपेगेंडा फैलाने में माहिर ‘द क्विंट’ ने दुष्प्रचार करते हुए इसे ‘3-चरणों वाली वोट चोरी’ करार दिया है।
पीएम मोदी ने परिसीमन को लेकर किया वादा
लोकसभा में पीएम मोदी ने कहा कि वह राज्यों से वादा करते हैं और गारंटी देते हैं कि किसी की राज्य के साथ भेदभाव नहीं होगा, अन्याय नहीं होगा। पहले के अनुपात को मेंटेन किया जाएगा। उन्होंने कहा कि अतीत में जो सरकारें रही, जिनके कालखंड में परिसीमन हुए जो उस समय अनुपात चल रहा है उसी अनुपात का पालन किया जाएगा।
Speaking in the Lok Sabha. https://t.co/AsiBPaaoEg
— Narendra Modi (@narendramodi) April 16, 2026
इससे पहले गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि परिसीमन बिल को लेकर भ्रम फैलाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि दक्षिणी राज्यों को भी इससे फायदा होगा। उदाहरण देते हुए कहा कि कर्नाटक राज्य में 28 सीटें हैं। यह संविधान संशोधन होने के बाद कर्नाटक की सीटों की संख्या 28 से 42 हो जाएगी।
‘द क्विंट’ ने किया भ्रामक प्रचार
‘द क्विंट’ में एक लेख छपा है, जिसका शीर्षक ‘परिसीमन विधेयक विपक्ष के विरुद्ध 3-चरणों वाली वोट चोरी’ है। पत्रकार आदित्य मेनन ने प्रस्तावित परिसीमन को मोदी सरकार द्वारा की गई 3-चरणों वाली वोट चोरी करार दिया। उन्होंने दावा किया कि इसमें जनसंख्या के आँकड़ों का इस्तेमाल होगा। चुनावी क्षेत्रों की मनमानी सीमाबंदी होगी और उन क्षेत्रों की सीटों की संख्या में जानबूझकर कटौती की जाएगी, जहाँ विपक्ष मजबूत है। खासकर दक्षिणी राज्यों में।
इस्लाम कबूल करने वाले आदित्य मेनन ने असम और जम्मू-कश्मीर में हुए परिसीमन का उदाहरणों देते हुए दावा किया है कि किसी न किसी तरह परिसीमन की प्रक्रिया बीजेपी को फायदा पहुँचाने के लिए ही किया जाता है।

मेनन ‘द हिंदू’ की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहते हैं कि उत्तर प्रदेश की सीटें 80 से बढ़कर 138 हो जाएँगी, बिहार की सीटें 40 से बढ़कर 72, तमिलनाडु की सीटें 39 से बढ़कर 50, और केरल की सीटें 20 से बढ़कर 23 हो जाएँगी। इसके आधार पर उनका दावा है कि प्रस्तावित परिसीमन के बाद न केवल दक्षिणी राज्यों में, बल्कि उन जगहों के सीटों के अनुपात में कमी आएगी, जहाँ BJP का प्रदर्शन कमजोर रहता है।
‘द क्विंट’ के लेख के मुताबिक, “उत्तर प्रदेश, जिसकी 543-सदस्यीय लोकसभा में अभी 80 सीटें हैं, नई 850-सदस्यीय लोकसभा में 125 सीटें होनी चाहिए थीं। ज़्यादा जनसंख्या वृद्धि दर के कारण अब इसकी सीटें 138 होंगी। बिहार, जिसकी 62 सीटें होनी चाहिए थीं, अब 72 होंगी। राजस्थान, जिसकी 39 सीटें होनी चाहिए थीं, अब 47 होंगी। इसके विपरीत, तमिलनाडु, जिसकी बढ़ी हुई लोकसभा में 61 सीटें होनी चाहिए थीं, अब 50 होंगी। केरल की 31 के बजाय 23 सीटें होंगी। आंध्र प्रदेश की 39 के बजाय 34 सीटें होंगी।”
यह प्रोपेगैंडा लेख मुस्लिमों को ‘पीड़ित’ दिखाने पर जोर देता है। इसमें कहा गया है कि अगर ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ के सिद्धांत का सच में सम्मान किया जाता, तो 2023 के परिसीमन के दौरान असम की मुस्लिम-बहुल धुबरी में बरपेटा से 10 लाख अतिरिक्त वोटरों को नहीं जोड़ा जाता। इसका मकसद धुबरी को ‘रातों-रात हिंदू-बहुल सीट’ बनाया गया।
आदित्य मेनन, इस्लामी-वामपंथी प्रोपेगैंडा करने वालों की आजमाई हुई तरकीब का इस्तेमाल करते हैं। वे चुनिंदा आँकड़े उठाते हैं और उन्हें ‘पीड़ित’ दिखा कर मोदी सरकार को खलनायक की तरह पेश करते हैं।
परिसीमन के दौरान चुनावी क्षेत्रों की मनमानी सीमाबंदी कह कर यह दिखा जा रहा है कि ‘मुस्लिम वोटरों को कमजोर’ करने की कोशिश की जा रही है। दरअसल यह लोगों में दहशत फैलाने के लिए किया गया है। असम में चुनाव आयोग ने 2001 की जनगणना के आँकड़ों के साथ-साथ जनसंख्या घनत्व के आधार पर जिलों को A/B/C श्रेणियों में बाँटा था, जिसमें राज्य के औसत से ±10% तक बदलाव की छूट दी गई थी।

जम्मू और कश्मीर में 2022 के परिसीमन के दौरान आयोग ने जनसंख्या, सीमा से निकटता, प्रशासनिक कारक और भूगोल को ध्यान में रखा। अनंतनाग को पीर पंजाल के उस पार के राजौरी और पुंछ क्षेत्रों के साथ मिला दिया गया, जिससे अनंतनाग-राजौरी लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र बना। यह निर्वाचन क्षेत्र पीर पंजाल पर्वतमाला को जोड़ता है, और घाटी में स्थित अनंतनाग को जम्मू संभाग के सीमावर्ती जिलों राजौरी-पुंछ से मिलाता है।
हालाँकि परिसीमन प्रक्रिया में धार्मिक जनसांख्यिकी को शामिल नहीं किया जाता है, फिर भी इस विलय के बाद एक नया चुनावी परिदृश्य सामने आया। आदित्य मेनन की की सारी नाराजगी इसी को लेकर है।
The Quint सिर्फ मुसलमानों को पीड़ित दिखाने और ‘दक्षिण को सीटें गँवानी पड़ेंगी’ वाली अफवाहें फैलाने तक ही नहीं रुका। इसने तो ‘भाषाई अल्पसंख्यक’ का मुद्दा भी उठा दिया।
सरकार ने कहा है कि हर राज्य में सीटों की संख्या आनुपातिक आधार पर 50% बढ़ाई जाएगी, जिससे लोकसभा में उनकी मौजूदा आनुपातिक ताकत बनी रहेगी। न तो किसी दक्षिणी राज्य को, न पंजाब को, और न ही पश्चिम बंगाल को सीटों की कुल संख्या के मामले में एक भी सीट का नुकसान होगा।
यह बात तथ्यों के आधार पर सही है कि दक्षिणी राज्यों ने आबादी नियंत्रण के उपायों और आर्थिक मोर्चे पर अच्छा प्रदर्शन किया है। इस सराहनीय प्रदर्शन का इनाम उन्हें उनकी मौजूदा हिस्सेदारी के अनुपात में कुल सीटों में बढ़ोतरी के रूप में दिया जा रहा है। सीटों की कुल संख्या तो बढ़ने ही वाली है।
भले ही विपक्ष परिसीमन के प्रस्ताव को दक्षिण के लिए ‘सजा’ के तौर पर पेश कर रहा हो, लेकिन असल में उत्तरी राज्यों के मतदाताओं का प्रतिनिधित्व व्यवस्थित रूप से कम है। सच तो यह है कि दक्षिणी राज्यों के सीटें खोने के डर से कहीं ज़्यादा, भाजपा-विरोधी गुट परिसीमन का विरोध इसलिए कर रहा है क्योंकि देश के सबसे ज़्यादा आबादी वाले राज्यों को ज्यादा प्रतिनिधित्व मिलेगा। वे परिसीमन की प्रक्रिया और उसके नतीजों को देश भर में भाजपा-समर्थक और भाजपा-विरोधी के चश्मे से देख रहे हैं।
भले ही भाजपा पहले कर्नाटक में सत्ता में रह चुकी है और आंध्र प्रदेश में सत्ताधारी गठबंधन का हिस्सा है, फिर भी दक्षिणी राज्यों को ऐतिहासिक रूप से भाजपा-विरोधी के तौर पर दिखाया जाता है, जबकि उत्तरी राज्यों—जिनमें से कई में अभी भाजपा की सरकार है—को भाजपा-समर्थक राज्यों के तौर पर पेश किया जाता है। यह सारा हंगामा, आबादी के मापदंडों को नजरअंदाज करते हुए दक्षिणी राज्यों के लिए उत्तरी राज्यों के बराबर सीटें हासिल करने की एक कोशिश जैसा लगता है।
अगर हम हिसाब लगाएँ और प्रति सांसद आबादी की गणना करें, तो राजस्थान में एक सांसद लगभग 27.42 लाख लोगों का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि तमिलनाडु में एक सांसद 18.50 लाख लोगों का प्रतिनिधित्व करता है। उत्तर प्रदेश में एक सांसद मोटे तौर पर 24.98 लाख लोगों का प्रतिनिधित्व करता है, और केरल में एक सांसद 16.70 लाख लोगों का प्रतिनिधित्व करता है।

इसका सीधा सा मतलब यह है कि केरल का एक सांसद, उत्तर प्रदेश के एक सांसद के मुकाबले लगभग आधे लोगों का प्रतिनिधित्व करता है। क्या इसका यह मतलब नहीं है कि केरल के एक वोटर का वोट, उत्तर प्रदेश के एक वोटर के वोट से 1.6 गुना ज़्यादा कीमती है? क्या यह ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ के सिद्धांत का मज़ाक नहीं है?
यह असमानता ‘सांसद स्थानीय क्षेत्र विकास योजना’ में भी देखी जा सकती है। हर सांसद को स्थानीय क्षेत्र के विकास के लिए 5 करोड़ रुपये मिलते हैं, चाहे उसके चुनाव क्षेत्र की आबादी कितनी भी हो। नतीजा? ज़्यादा आबादी वाले चुनाव क्षेत्रों के मुकाबले, कम आबादी वाले चुनाव क्षेत्रों में प्रति व्यक्ति खर्च काफ़ी ज़्यादा होता है। प्रस्तावित परिसीमन प्रक्रिया को इन्हीं असमानताओं को दूर करने के लिए बनाया गया है।
केंद्र सरकार ने भरोसा दिलाया है कि सीटों की संख्या आनुपातिक आधार पर बढ़ेगी। इसके लिए हाल ही में प्रकाशित जनगणना के आंकड़ों का इस्तेमाल किया जाएगा। भले ही परिसीमन प्रक्रिया 2026 की जनगणना के बाद हो, लेकिन दक्षिणी और उत्तरी राज्यों की आबादी में जो अंतर होगा, वह 2011 की जनगणना के मुताबिक ही होगा।
आदित्य मेनन: फेक न्यूज और BJP-विरोधी प्रोपेगैंडा के माहिर
यह पहली बार नहीं है जब ‘द क्विंट’ के आदित्य मेनन ने BJP-विरोधी प्रोपेगैंडा और फेक न्यूज फैलाई हो। जनवरी 2022 में जब पंजाब में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सुरक्षा में चूक हुई थी, तब मेनन ने ‘द क्विंट’ के लिए एक लेख लिखा था और उस चूक को कम करने आँकने की कोशिश की। मेनन ने दावा किया था कि BJP-शासित उत्तर प्रदेश में PM मोदी 2 घंटे तक ट्रैफिक में फँसे रहे थे, लेकिन तब किसी को सुरक्षा में खामी नजर नहीं आई थी। उसने यहाँ तक दावा किया कि ये पंजाबियों के प्रति नफरत को दर्शाता है। यहाँ भी उसने गलत जानकारी दी, क्योंकि उत्तर प्रदेश में PM मोदी का काफिला ट्रैफिक में सिर्फ 2 मिनट के लिए फँसा था, न कि 2 घंटे के लिए, जैसा कि ‘द क्विंट’ ने दावा किया था।
2020 के हिंदू-विरोधी दिल्ली दंगों में हिंसा के आरोपित शरजील इमाम का समर्थन करते हुए मेनन ने कहा था कि उसने तो बस ‘चक्का जाम’ और ‘असम की ओर जाने वाले हाईवे और रेल मार्गों की नाकाबंदी’ करने को कहा था। इमाम का बचाव करने के दौरान मेनन ने 2008 के अमरनाथ आंदोलन से दिल्ली दंगे की तुलना की। उस समय हिंदू संगठनों पर जम्मू-श्रीनगर हाईवे को कथित तौर पर ब्लॉक करने का आरोप लगा था। मेनन ने तर्क दिया था कि अगर उस घटना को राजद्रोह नहीं माना गया था, तो इमाम द्वारा असम की ओर जाने वाली सड़कों और रेल मार्गों को ब्लॉक करने के आह्वान को भी राजद्रोह नहीं माना जाना चाहिए।
आदित्य मेनन का यह डर फैलाने वाला नैरेटिव कि परिसीमन से किसी न किसी तरह BJP को चुनावी फायदा पहुँचाने की कोशिश होगी, दरअसल बीजेपी और उसके समर्थकों के प्रति उसके नफरत को दर्शाता है। भारत के मध्यम वर्ग का बड़ा तबका मोदी सरकार का समर्थक है। हालाँकि उनकी अपनी कुछ शिकायतें भी हैं, लेकिन वोट बीजेपी को देता है। आदित्य मेनन जैसे लोग इनसे नफरत करते हैं।
दिसंबर 2020 में, मेनन ने X पर एक पोस्ट लिखा, जिसमें दिल्ली के मध्यम वर्ग को CAA-विरोधी और किसानों के विरोध प्रदर्शन का समर्थन न करने के लिए ‘खलनायक’ की तरह पेश किया। प्रोपेगैंडा फैलाने में माहिर रोहिणी सिंह ने भी इसका समर्थन किया था।

हिंदू कार्यकर्ता कमलेश तिवारी की जब 2020 में मुस्लिम पैगंबर के खिलाफ उनकी टिप्पणियों के नाम पर जिहादियों ने बेरहमी से कत्ल कर दिया था, तब आदित्य मेनन ने अपने साथी इस्लामिस्टों के साथ मिलकर इस क्रूरता से ध्यान भटकाने की कोशिश की थी। जहाँ एक तरफ एक हिंदू व्यक्ति की हत्या हुई थी, वहीं मेनन ने ‘हिंदुत्व ब्रिगेड’ पर मुसलमानों के खिलाफ ‘नफरत’ फैलाने का आरोप लगाया।
2017 में, आदित्य मेनन ने “कॉमरेड नांबियार” के आक्रामक सोशल मीडिया ट्रोल का समर्थन किया। इसमें 26 CRPF जवानों की मौत का जश्न मनाया गया था, जिन्हें नक्सलियों ने मार दिया था।


इतना ही नहीं मेनन ने 2016 में ‘कैच न्यूज’ में पत्रकार के तौर पर काम करने के दौरान सीरिया की तस्वीर को कश्मीर की तस्वीर बता कर पोस्ट किया था। इस तस्वीर में एक छोटी बच्ची एक मृत व्यक्ति की आँखें बंद करती हुई दिखाई दे रही थी। यह तस्वीर 2012 की सीरिया में विध्वंस की थी।
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