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SIR में जहाँ कटे सबसे ज्यादा वोट वहाँ भी जीती TMC, आँकड़ों ने खोली विपक्ष के दावों की पोल: बंगाल चुनाव में नहीं चला ममता का ‘विक्टिम कार्ड’

नतीजों के बाद चुनाव आयोग पर लगातार हमले करने के बावजूद, ममता बनर्जी की पार्टी समशेरगंज, लालगोला, भगवानगोला और रघुनाथगंज जैसी सीटों पर जीत हासिल करने में कामयाब रही। गौर करने वाली बात यह है कि ये वही इलाके हैं, जहाँ वोटर लिस्ट से सबसे ज्यादा नाम हटाए जाने की बात सामने आई थी।

भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने 4 मई को पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) को उसके ही घर में हराकर इतिहास रच दिया। दो चरणों में हुए चुनावों और 91% की रिकॉर्ड वोटिंग के बाद, BJP ने विधानसभा की 296 में से 208 सीटों पर जीत दर्ज की। जैसे ही सोमवार को नतीजे आने शुरू हुए, विपक्ष और वामपंथी उदारवादियों ने TMC की हार के लिए चुनाव आयोग द्वारा राज्य में किए गए विशेष सुधार (SIR) को जिम्मेदार ठहराना शुरू कर दिया।

हालाँकि, आँकड़े कुछ और ही कहानी बयाँ कर रहे हैं। जिन 20 विधानसभा सीटों पर जाँच के बाद सबसे ज्यादा वोटर्स के नाम काटे गए थे, उनमें से 13 सीटों पर ममता बनर्जी की पार्टी ने ही जीत हासिल की है। वहीं, BJP को इनमें से 6 और कॉन्ग्रेस को सिर्फ 1 सीट मिली है।

ये आँकड़े इसलिए अहम हैं क्योंकि सोशल मीडिया पर एक ऐसा माहौल बनाया जा रहा था, जिसमें चुनाव आयोग को TMC के खराब प्रदर्शन का विलेन (दोषी) बताया जा रहा था।

नतीजों के बाद चुनाव आयोग विपक्ष और लिबरल गैंग के निशाने पर

चुनाव के नतीजे आते ही विपक्ष और उनके समर्थक सोशल मीडिया पर सक्रिय हो गए। पूरे दिन विपक्षी खेमे और वामपंथी उदारवादियों (लेफ्ट लिबरल्स) ने चुनाव आयोग और वोटर लिस्ट सुधार (SIR) की प्रक्रिया पर जमकर हमला बोला।

चुनाव हारने के बाद पश्चिम बंगाल की कार्यवाहक मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने ‘विक्टिम कार्ड’ खेलते हुए दावा किया कि BJP ने बंगाल में उनकी 100 सीटें ‘चोरी’ कर ली हैं। उनके इस सुर में सुर मिलाते हुए कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने भी समर्थन किया। राहुल गाँधी ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग की मदद से BJP ने टीएमसी की 100 सीटें झटक लीं।

रेडियो मिर्ची की RJ सायमा ने ‘एक्स’ (ट्विटर) पर लिखा, “चुनाव आयोग जीत गया।” उनका इशारा साफ था कि BJP की जीत आयोग की वजह से हुई है।

वहीं, द वायर की आरफा खानम शेरवानी ने तंज कसते हुए चुनाव आयोग को “आजाद भारत के सबसे निष्पक्ष चुनाव” कराने के लिए बधाई दी और TMC की हार का ठीकरा एजेंसी पर फोड़ दिया। हालाँकि, उन्होंने इस बात को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया कि आँकड़े इस थ्योरी का साथ नहीं दे रहे हैं।

पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने एक Video साझा किया, जिसमें योगेंद्र यादव ने दावा किया कि 27 लाख लोगों को गलत तरीके से वोट देने से रोका गया। उन्होंने सवाल उठाया कि फाइनल लिस्ट आने के बाद 6 लाख वोट कैसे जुड़ गए।

आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह ने भी मोर्चा खोलते हुए कहा कि 27 लाख वोटर्स को उनके अधिकार से वंचित रखा गया।

हालाँकि, अगर सीटों के हिसाब से असल आँकड़ों को देखा जाए, तो वे इन तमाम दावों को पूरी तरह गलत साबित करते हैं। सिर्फ वोटर्स के नाम कटने की वजह से TMC चुनाव नहीं हारी है।

जहाँ कटे सबसे ज्यादा वोट, वहाँ भी जीती TMC

‘द इंडियन एक्सप्रेस’ के आँकड़ों के मुताबिक, जिन 20 सीटों पर जाँच के बाद सबसे ज्यादा वोट काटे गए थे, उनमें से ज्यादातर पर TMC ने ही कब्जा जमाया है। इन सीटों में समशेरगंज, लालगोला, भगवानगोला, रघुनाथगंज, मटियाबुर्ज, सूती, मोथाबाड़ी, गोलपोखर, मालतीपुर, चोपड़ा, सुजापुर, राजारहाट न्यू टाउन और बशीरहाट उत्तर शामिल हैं। इन सभी 13 सीटों पर ममता बनर्जी की पार्टी को जीत मिली है।

अन्य सीटों की बात करें तो फरक्का सीट पर सबसे ज्यादा 38,222 वोट काटे गए थे, लेकिन वहाँ से कॉन्ग्रेस ने जीत दर्ज की। वहीं BJP को जंगीपुर, रतुआ, करनदिघी, केतुग्राम, मानिकचक और मोंतेश्वर जैसी 6 सीटों पर जीत मिली।

सीधे शब्दों में कहें तो, जिन 20 क्षेत्रों में सबसे ज्यादा नाम हटाए गए थे, उनमें से 13 सीटें ममता बनर्जी की पार्टी ने जीतीं। यह अकेला आँकड़ा ही उस प्रोपेगेंडा की हवा निकाल देता है जिसमें यह दावा किया जा रहा था कि वोटर लिस्ट में सुधार (SIR) से सिर्फ TMC को नुकसान हुआ और BJP को फायदा पहुँचा।

क्या कहते हैं बड़े आँकड़े?

अगर बड़े पैमाने पर देखें, तो जिन 187 सीटों पर 5,000 से ज्यादा वोटर्स के नाम काटे गए थे, वहाँ BJP ने 119 और TMC ने 65 सीटों पर जीत दर्ज की। इसके अलावा कॉन्ग्रेस को 2 और AJUP को 1 सीट मिली।

इन 187 सीटों में से 47 सीटें ऐसी थीं, जहाँ कटे हुए वोटों की संख्या जीत के अंतर से ज्यादा थी। BJP ने जो 119 सीटें जीतीं, उनमें से 28 सीटों पर जीत का अंतर कटे हुए वोटों से कम था। खास बात यह है कि इनमें से 26 सीटें 2021 के चुनाव में TMC ने जीती थीं। दूसरी तरफ, TMC की जीती हुई 65 सीटों में से भी 18 सीटें ऐसी थीं, जहाँ जीत के अंतर से ज्यादा वोट काटे गए थे।

इन आँकड़ों से साफ है कि कई सीटों पर कांटे की टक्कर थी और वहाँ कटे हुए वोटों की संख्या जीत के मार्जिन से ज्यादा रही। लेकिन हार का पूरा ठीकरा सिर्फ वोटर लिस्ट सुधार (SIR) की प्रक्रिया पर फोड़ देना और इसे ही हार की एकमात्र वजह बताना पूरी तरह से भ्रामक और गलत है।

बंगाल में कैसे हुई वोटर लिस्ट की छंटनी (SIR)?

वोटर लिस्ट में सुधार की यह प्रक्रिया (SIR) आम लिस्ट अपडेट से काफी अलग और खास थी। इसमें पंजीकृत वोटर्स को नए फॉर्म भरने थे और अपनी योग्यता व नागरिकता साबित करने के लिए जरूरी दस्तावेज जमा करने थे। चुनाव आयोग ने इस अभियान की शुरुआत पिछले साल जून में बिहार से की थी। बाद में इसे पश्चिम बंगाल सहित नौ अन्य राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों में भी लागू किया गया।

पश्चिम बंगाल में फरवरी में जारी हुई फाइनल लिस्ट के करीब 60.06 लाख वोटर्स (लगभग 8.5 प्रतिशत) को जाँच के घेरे में रखा गया था। लगभग 700 न्यायिक अधिकारियों ने इन मामलों की बारीकी से जाँच की, जिसके बाद 27.16 लाख वोटर्स के नाम लिस्ट से हटा दिए गए। जिन लोगों के नाम काटे गए हैं, उन्होंने इसके खिलाफ अपील भी की है, जो फिलहाल 10 अपीलीय ट्रिब्यूनल (अदालतों) में लंबित हैं।

प्रोपेगेंडा बनाम हकीकत: आँकड़ों ने खोली पोल

चुनाव नतीजों के बाद विपक्षी नेताओं, ड्राइंग रूम में बैठकर खबरें लिखने वाले पत्रकारों और टीवी कमेंटेटर्स ने मिलकर एक खास माहौल बनाने की कोशिश की। उन्होंने यह दिखाने की कोशिश की कि TMC के खराब प्रदर्शन के पीछे वोटर लिस्ट से नाम हटाना (SIR) ही सबसे बड़ी वजह है और यह चुनाव आयोग की गड़बड़ी का सबूत है। हालाँकि, जब सीटों के हिसाब से आँकड़े सामने आए, खासकर उन 20 सीटों के जहाँ सबसे ज्यादा नाम काटे गए थे, तो इन दावों की पूरी तरह हवा निकल गई।

अगर विपक्षी खेमे और खास इकोसिस्टम की ये ‘थ्योरी’ सच होती कि नाम कटने से TMC हार गई, तो जिन 20 सीटों पर सबसे ज्यादा नाम कटे थे, वहाँ से TMC 13 सीटें कभी नहीं जीत पाती। इससे यह साफ हो जाता है कि हार के लिए आँकड़ों को तोड़-मरोड़कर पेश किया जा रहा है। बंगाल चुनाव में मिली करारी शिकस्त को छिपाने के लिए SIR प्रक्रिया को एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है, और आने वाले कई महीनों तक हार के बहाने के रूप में इसे बार-बार दोहराया जाएगा।

(यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है। अंग्रेजी की रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

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Anurag
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Anurag is a Chief Sub Editor at OpIndia with over twenty one years of professional experience, including more than five years in journalism. He is known for deep dive, research driven reporting on national security, terrorism cases, judiciary and governance, backed by RTIs, court records and on-ground evidence. He also writes hard hitting op-eds that challenge distorted narratives. Beyond investigations, he explores history, fiction and visual storytelling. Email: [email protected]

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