दुनिया की सियासत आजकल इतनी तेज रफ्तार से भाग रही है कि पलक झपकते ही पुराने समीकरण ध्वस्त हो जाते हैं और नए गठजोड़ आकार ले लेते हैं। आज पूरी दुनिया का ध्यान मिडिल ईस्ट के तनाव, ईरान और इजरायल के बीच छिड़ी जंग और पश्चिमी देशों की अंदरूनी उठापटक पर टिका हुआ है। लेकिन इसी वैश्विक शोर-शराबे के बीच भारत के पूर्वी छोर पर एक ऐसी खामोश मगर बेहद आक्रामक और रणनीतिक बिसात बिछाई जा रही है, जो आने वाले समय में पूरे एशिया की भूगोल और अर्थव्यवस्था को हमेशा के लिए बदलकर रख देगी।
अभी कुछ दिन पहले ही म्यांमार के राष्ट्रपति अपने पहले आधिकारिक विदेश दौरे पर किसी और देश जाने के बजाय सीधे भारत की धरती पर कदम रखते हैं। नई दिल्ली के गलियारों में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और म्यांमार के शीर्ष नेतृत्व के बीच आमने-सामने की बातचीत हुई, तो कई ऐसे मुद्दों पर जमी हुई बर्फ पिघली जो सालों से ठंडे बस्ते में अटके पड़े थे। इस रणनीतिक और कूटनीतिक मुलाकात ने भारत की ‘लुक ईस्ट’ और ‘एक्ट ईस्ट’ पॉलिसी में एक नया बारूद भरने का काम किया है, जिसकी गूंज बीजिंग से लेकर इस्लामाबाद तक सुनाई दे रही है।
इस पूरी भू-राजनीतिक हलचल के केंद्र में एक ऐसा महा-प्रोजेक्ट है, जो चीन के सबसे महात्वाकांक्षी और प्रचारित प्रोजेक्ट यानी चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे के घमंड को चूर-चूर करने का दम रखता है। हम बात कर रहे हैं इंडिया-म्यांमार-थाईलैंड हाईवे की, जिसे संक्षेप में आईएमटी हाईवे भी कहा जाता है। यह सिर्फ कोलकाता से बैंकॉक को जोड़ने वाली कोई साधारण पक्की सड़क नहीं है, बल्कि यह भारत का वो ब्रह्मास्त्र है जो दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के विशाल बाजारों में भारत की आर्थिक धाक जमाने की नीव रखने जा रहा है।
क्या है IMT हाईवे और इसका पूरा मास्टरप्लान?
अगर आप भारत का नक्शा ध्यान से देखें, तो हमारे पूर्वोत्तर के राज्य चारों तरफ से जमीन से घिरे हुए हैं और उनके पास अपना कोई स्वतंत्र समुद्र तट नहीं है। अब तक की स्थिति यह रही है कि अगर पूर्वोत्तर के राज्यों से कोई सामान विदेश भेजना हो या देश के बाकी हिस्सों में लाना हो, तो उसे ‘चिकन नेक’ कहे जाने वाले बेहद संकरे सिलीगुड़ी कॉरिडोर से घुमाकर कोलकाता बंदरगाह तक लाना पड़ता है। इसके बाद ही उसे पानी के जहाज के जरिए दुनिया भर में भेजा जाता है, जिससे समय और पैसा दोनों पानी की तरह बहते हैं।
लेकिन प्रकृति ने भारत को पूर्व की तरफ एक और ऐसा रास्ता दिया है जो सीधे तौर पर अंतरराष्ट्रीय बाजारों का द्वार खोलता है। मणिपुर की सीमा सीधे म्यांमार से लगती है और म्यांमार की भौगोलिक सीमाएँ आगे बढ़कर सीधे थाईलैंड को छूती हैं। भारत ने इसी भूगोल का रणनीतिक फायदा उठाने के लिए आज से लगभग चौबीस साल पहले यानी साल 2002 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के दौर में एक ऐतिहासिक और दूरदर्शी प्लान तैयार किया था, जिसे आज हम कोलकाता-बैंकॉक एक्सप्रेसवे के नाम से भी जानते हैं।
कोलकाता से बैंकॉक का सफर कार से पूरा करने का रूट मैप
यह अंतरराष्ट्रीय हाईवे कुल 1,360 किलोमीटर लंबा है और इसका पूरा खाका इस तरह तैयार किया गया है कि यह भारत के पूर्वोत्तर को दक्षिण-पूर्व एशिया का प्रवेश द्वार बना दे। यह पूरा रूट कोलकाता से शुरू होकर पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी, असम के गुवाहाटी और नागालैंड के कोहिमा शहर से गुजरता हुआ मणिपुर के सीमावर्ती और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण कस्बे मोरेह तक पहुँचता है। भारत के अंदर-अंदर ही इस हाईवे की कनेक्टिविटी का दायरा लगभग 2,800 किलोमीटर तक फैल जाता है।
जैसे ही कोई वाहन मणिपुर के मोरेह की अंतरराष्ट्रीय सीमा को पार करता है, वह म्यांमार के तामू शहर में एंट्री कर जाता है। इसके बाद यह हाईवे म्यांमार के कालेवा, मांडले, और म्यावाडी जैसे प्रमुख व्यापारिक शहरों, दुर्गम पहाड़ों और घने जंगलों से गुजरता है। म्यांमार की सीमा खत्म होते ही यह सड़क सीधे थाईलैंड के माए सोट शहर में दाखिल होती है और वहां से थाईलैंड के बेहतरीन रोड नेटवर्क के जरिए सीधे राजधानी बैंकॉक को जोड़ देती है।
सबसे दिलचस्प और रणनीतिक बात यह है कि भारत का इरादा सिर्फ थाईलैंड की सीमा पर जाकर रुकने का बिल्कुल नहीं है। भारत सरकार की आने वाले समय की योजना इस हाईवे को और आगे विस्तार देने की है, जिसके तहत इसे कंबोडिया, लाओस और अंततः वियतनाम तक ले जाने का एक बड़ा मेगा प्लान तैयार किया जा चुका है। इसका सीधा मतलब यह हुआ कि भविष्य में आप कोलकाता या गुवाहाटी से अपनी गाड़ी में बैठकर सीधे वियतनाम के समुद्र तट तक का सफर सड़क मार्ग से तय कर सकेंगे।

चीन के CPEC को कैसे पटखनी देगा यह हाईवे?
जब भी दुनिया में कनेक्टिविटी, इंफ्रास्ट्रक्चर या नए व्यापारिक रास्तों की बात होती है, तो वैश्विक मीडिया में चीन के ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ और पाकिस्तान में बन रहे सीपीईसी का बहुत ढोल पीटा जाता है। चीन ने पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर से जबरन रास्ता निकालकर अरब सागर के ग्वादर पोर्ट तक एक बड़ा कॉरिडोर खड़ा कर लिया है ताकि वह अपने शिनजियांग प्रांत को सीधे समुद्र से जोड़ सके। चीन इसी तर्ज पर म्यांमार और बांग्लादेश में भी भारी निवेश करके भारत को तीनों तरफ से घेरने की गहरी साजिश रच रहा था।
लेकिन भारत का यह त्रिपक्षीय हाईवे चीन के इसी चक्रव्यूह को तार-तार करने का सबसे अचूक और ठोस कूटनीतिक जवाब बनकर उभरा है। चीन का सीपीईसी प्रोजेक्ट पूरी तरह से कर्ज के बोझ और तानाशाही शर्तों पर टिका हुआ है, जिसने पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को पूरी तरह वेंटिलेटर पर ला खड़ा किया है। इसके विपरीत, भारत का यह हाईवे एक ‘साझा समृद्धि’ और समान विकास के मॉडल पर आधारित है, जहां भारत म्यांमार को वित्तीय और तकनीकी मदद दे रहा है, न कि उसे किसी कर्ज के जाल में फंसा रहा है।
इसके अलावा चीन का सीपीईसी जिस इलाके से गुजरता है, वह अत्यधिक अशांत, आतंकी हमलों से ग्रस्त और स्थानीय विद्रोह का सामना कर रहा है, जिससे उसका भविष्य हमेशा अधर में लटका रहता है। इसके उलट, भारत-म्यांमार-थाईलैंड रूट एक प्राकृतिक, ऐतिहासिक और बेहद सुरक्षित व्यापारिक गलियारा साबित होने जा रहा है। यह दक्षिण-पूर्व एशिया की लगभग सत्तर हजार करोड़ डॉलर की संयुक्त अर्थव्यवस्था को सीधे भारत के एक अरब से ज्यादा आबादी वाले विशाल बाजार से जोड़कर चीन के आर्थिक वर्चस्व को सीधी चुनौती देगा।
बांग्लादेश आउट… कैसे पलटी शतरंज की बाजी?
इस पूरे क्षेत्र की भू-राजनीति में एक बहुत बड़ा और अप्रत्याशित मोड़ बांग्लादेश को लेकर आया है, जिसने भारत की रणनीति को और अधिक आक्रामक बना दिया है। शेख हसीना के शासनकाल के दौरान बांग्लादेश इस पूरे कनेक्टिविटी प्लान में बहुत गहरी दिलचस्पी दिखा रहा था और चाहता था कि वह त्रिपुरा के रास्ते इस नेटवर्क का हिस्सा बन जाए ताकि ढाका का व्यापार भी बढ़ सके। लेकिन बांग्लादेश में अचानक हुए तख्तापलट के बाद वहां जो नई कार्यवाहक सरकार बनी है, उसके तेवर थोड़े बदले-बदले और असहयोग वाले नजर आ रहे हैं।
बांग्लादेश के कुछ नए रणनीतिकारों को शायद यह गलतफहमी हो गई थी कि भारत के पूर्वोत्तर राज्यों के पास अंतरराष्ट्रीय व्यापार करने या समुद्र तक पहुँचने के लिए बांग्लादेश के अलावा कोई दूसरा भौगोलिक विकल्प ही नहीं है। वे इसी गुमान में बैठे थे कि भारत को अपनी जरूरतों के लिए हर हाल में उनके सामने झुकना ही पड़ेगा। लेकिन भारत ने म्यांमार के साथ अपनी बातचीत को तेज करके और इस हाईवे को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता बनाकर बांग्लादेश की इस गलतफहमी को पूरी तरह दूर कर दिया है।
देसी अंदाज में कहें तों बांग्लादेश सोच रहा था कि उनके बिना भारत का पत्ता भी नहीं हिलेगा, लेकिन भारत ने पूरब से म्यांमार का पत्ता खोलकर बांग्लादेश का झुनझुना बजा दिया।
भारत की इस कूटनीतिक चाल ने साफ कर दिया है कि आधुनिक विदेश नीति में किसी एक रास्ते या किसी एक पड़ोसी पर पूरी तरह निर्भर रहना आत्मघाती हो सकता है। अगर बांग्लादेश की नई सरकार अपने रुख को लेकर संशय में है या भारत विरोधी ताकतों को बढ़ावा देती है, तो भारत के पास म्यांमार के रास्ते थाईलैंड और पूरे दक्षिण-पूर्व एशिया में सीधे दाखिल होने का एक परमानेंट और बेहद मजबूत विकल्प तैयार है। अब यह पूरी तरह बांग्लादेश को तय करना है कि वह इस महाद्वीपीय विकास की रफ्तार में शामिल होना चाहता है या किनारे बैठकर पछताना चाहता है।
आखिर क्यों लग रहे 26 साल? पेच कहाँ फंसा था?
अब स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठता है कि अगर इस हाईवे का खाका साल 2002 में ही खींच लिया गया था, तो इसे पूरा होने में आखिर ढाई दशक का लंबा वक्त क्यों लग गया। इस असाधारण देरी के पीछे कोई एक प्रशासनिक कारण नहीं था, बल्कि इसके पीछे म्यांमार की जटिल आंतरिक राजनीति, बेहद कठिन भूगोल और कई अंतरराष्ट्रीय रोड़े जिम्मेदार थे, जिन्होंने इस प्रोजेक्ट की रफ्तार पर बार-बार ब्रेक लगाने का काम किया।
म्यांमार का गृहयुद्ध और तख्तापलट: इस देरी की सबसे बड़ी और मुख्य वजह म्यांमार की आंतरिक राजनीतिक अस्थिरता और वहां का गृहयुद्ध रहा है। साल 2021 में म्यांमार की सेना ने लोकतांत्रिक सरकार का तख्तापलट कर दिया, जिसके बाद म्यांमार के चिन और सागाइंग जैसे प्रांतों में सेना और स्थानीय अलग-अलग जातीय विद्रोही गुटों के बीच भयंकर सशस्त्र संघर्ष छिड़ गया। चूंकि इस हाईवे का एक बहुत बड़ा और महत्वपूर्ण हिस्सा इन्हीं अशांत इलाकों से होकर गुजरता है, इसलिए वहां काम कर रहे इंजीनियरों और मजदूरों की सुरक्षा के चलते काम बार-बार ठप होता रहा।
खतरनाक पहाड़ी और जंगली रास्ता: म्यांमार का भूगोल भी इस प्रोजेक्ट के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती साबित हुआ। म्यांमार के हिस्से में आने वाला कालेवा से यागी तक का जो एक सौ बीस किलोमीटर का खंड है, वह बेहद ऊंचे पहाड़ों, घने जंगलों और भूस्खलन वाले क्षेत्रों से भरा हुआ है। ऐसे दुर्गम और टेढ़े-मेढ़े रास्तों पर एक आधुनिक और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप पक्की सड़क का निर्माण करना दुनिया के बेहतरीन इंजीनियरों के लिए भी किसी बड़े इम्तिहान से कम नहीं था।
जर्जर बुनियादी ढाँचा: एक और बड़ी तकनीकी बाधा यह थी कि म्यांमार के इस रूट पर अंग्रेजों के जमाने के लगभग सत्तर पुराने और जर्जर लोहे के पुल थे, जो आज के भारी-भरकम ट्रकों और कंटेनरों का वजन संभालने में पूरी तरह अक्षम थे। भारत ने इस समस्या को भांपते हुए म्यांमार को करीब एक हजार करोड़ रुपये से ज्यादा की वित्तीय मदद दी ताकि इन सभी पुराने पुलों को तोड़कर उनकी जगह आधुनिक कंक्रीट के मजबूत पुल बनाए जा सकें, जिससे व्यापार में कोई बाधा न आए।
अब कैसे आएगी प्रोजेक्ट में रफ्तार?
हालाँकि अब म्यांमार के हालात में धीरे-धीरे एक सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहा है और वहां का सैन्य नेतृत्व भी इस बात को समझ चुका है कि विकास के बिना सत्ता को संभालना नामुमकिन है। म्यांमार के राष्ट्रपति का अपने पहले विदेश दौरे के लिए भारत को चुनना और प्रधानमंत्री मोदी के साथ इस प्रोजेक्ट को फास्ट ट्रैक पर डालने का संकल्प लेना यह साबित करता है कि अब दोनों देश इस हाईवे को हर हाल में पूरा करने के लिए कटिबद्ध हैं। इस समय इस पूरे हाईवे का लगभग सत्तर प्रतिशत से ज्यादा काम मुकम्मल हो चुका है और बाकी बचे काम को निपटाकर इसे अगले दो से तीन साल के भीतर पूरी तरह चालू करने का लक्ष्य रखा गया है।
परदे के पीछे का खेल: जापान की एंट्री और भारत की ‘सॉफ्ट पावर’
इस पूरे खेल के पीछे एक और बहुत बड़ी वैश्विक महाशक्ति भारत के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी है, और वह देश है जापान। जापान इस पूरे इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट में भारत का सबसे भरोसेमंद और रणनीतिक पार्टनर बनकर उभरा है। जापान म्यांमार के भीतर कई बड़े रेलवे प्रोजेक्ट्स, पुलों के निर्माण और सड़कों के आधुनिकीकरण में भारी-भरकम निवेश कर रहा है, क्योंकि जापान का भी सीधा रणनीतिक मकसद हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की विस्तारवादी नीति और आर्थिक दादागिरी को मजबूती से रोकना है।
म्यांमार की मजबूरी और भारत की व्यावहारिक कूटनीति
दुनिया के कई पश्चिमी और यूरोपीय देशों ने म्यांमार में सैन्य शासन होने की वजह से उससे अपने सभी कूटनीतिक और व्यापारिक रिश्ते पूरी तरह तोड़ लिए हैं और उस पर कई तरह के कड़े प्रतिबंध लगा दिए हैं। लेकिन भारत ने यहां अपनी व्यावहारिक और यथार्थवादी कूटनीति का परिचय देते हुए म्यांमार की सरकार से बातचीत का रास्ता हमेशा खुला रखा। भारत इस बात को अच्छी तरह जानता है कि पड़ोसियों को बदला नहीं जा सकता और उनसे मुंह मोड़ना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए घातक हो सकता है।
भारत के कूटनीतिक विचारकों का मानना है कि किसी देश से पूरी तरह संबंध तोड़ लेने से वहां कभी भी लोकतंत्र की बहाली नहीं होती, बल्कि ऐसा करने से वहां एक बड़ा राजनीतिक और आर्थिक शून्य पैदा हो जाता है। अगर भारत म्यांमार से दूरी बना लेता, तो चीन तुरंत उस खाली जगह पर कब्जा कर लेता और म्यांमार की जमीन का इस्तेमाल भारत के खिलाफ करने लगता। इसलिए भारत ने म्यांमार की सेना और वहां के स्थानीय विद्रोही गुटों के बीच एक बेहद बारीक और चतुर संतुलन बनाकर अपने राष्ट्रीय हितों को सुरक्षित रखा है।
कालादान मल्टीमॉडल प्रोजेक्ट से ‘चिकन नेक’ की टेंशन खत्म
इस हाईवे के समानांतर भारत म्यांमार के ही भीतर एक और अत्यंत महत्वपूर्ण और गेम-चेंजर प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है, जिसे कलादान मल्टीमॉडल ट्रांजिट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट कहा जाता है। यह प्रोजेक्ट भी भारत के पूर्वोत्तर राज्यों के लिए एक जीवनरेखा साबित होने जा रहा है क्योंकि यह कोलकाता बंदरगाह को समुद्र के रास्ते म्यांमार के सितवे बंदरगाह से जोड़ता है। सितवे बंदरगाह को पूरी तरह भारत ने ही विकसित और फंड किया है ताकि चीन के बढ़ते समुद्री प्रभाव को बंगाल की खाड़ी में काउंटर किया जा सके।
सितवे बंदरगाह पर माल उतरने के बाद उसे कलादान नदी के जरिए अंतर्देशीय जलमार्ग से पलेटवा नामक स्थान तक ले जाया जाएगा, और फिर वहां से एक नए सड़क नेटवर्क के जरिए माल सीधे हमारे मिजोरम राज्य की सीमा में प्रवेश कर जाएगा। यह पूरा इंफ्रास्ट्रक्चर नेटवर्क तैयार होने के बाद भारत की सिलीगुड़ी कॉरिडोर पर निर्भरता हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी, और युद्ध जैसी किसी भी आपातकालीन स्थिति में भी हमारे पूर्वोत्तर राज्य पूरी तरह सुरक्षित और दुनिया से जुड़े रहेंगे।
इस हाईवे के पूरा होने से भारत के हाथ लगेगी कौन-कौन सी लॉटरी?
$7000 करोड़ डॉलर की इकोनॉमी और नौकरियाँ: आर्थिक विशेषज्ञों का अनुमान है कि इस रूट के पूरी तरह एक्टिव होते ही भारत और आसियान देशों के बीच व्यापार में 20 से 30 फीसदी का उछाल आएगा। इससे लगभग 2 करोड़ नए रोजगार पैदा होंगे और उत्तर-पूर्व के राज्यों में विकास की बाढ़ आ जाएगी। आर्थिक विशेषज्ञों का अनुमान है कि इस रूट के पूरी तरह एक्टिव होते ही भारत और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के बीच का द्विपक्षीय व्यापार कई गुना बढ़ जाएगा।
पूर्वोत्तर बनेगा ‘ग्लोबल ट्रेड हब’: मणिपुर, नागालैंड, मिजोरम और असम जैसे राज्य जो आजादी के बाद से भौगोलिक दूरी और बुनियादी ढाँचे की कमी के कारण देश की मुख्यधारा के आर्थिक विकास से थोड़े अलग-अलग से पड़े थे, वे अचानक से अंतरराष्ट्रीय व्यापार के सबसे बड़े और जीवंत हब बनकर उभरेंगे। इन राज्यों की सीमाओं पर बड़े-बड़े लॉजिस्टिक्स पार्क, अत्याधुनिक कोल्ड स्टोरेज, अंतरराष्ट्रीय होटल और मैन्युफैक्चरिंग फैक्ट्रियां स्थापित होंगी, जो वहां के युवाओं के पलायन को हमेशा के लिए रोक देंगी।
बौद्ध पर्यटन (Buddhist Tourism) को महा-बूस्ट: म्यांमार, थाईलैंड, कंबोडिया, लाओस और वियतनाम… ये सभी मुख्य रूप से बौद्ध संस्कृति वाले देश हैं। इन देशों के करोड़ों लोग हर साल बोधगया, सारनाथ और कुशीनगर जैसे पवित्र बौद्ध स्थलों के दर्शन करना चाहते हैं। इस हाईवे के बनने से बौद्ध सर्किट का ऐसा विकास होगा कि भारत के टूरिज्म सेक्टर की किस्मत बदल जाएगी। इस सड़क मार्ग के सुलभ होते ही इन देशों से लाखों की संख्या में तीर्थयात्री और पर्यटक सीधे अपनी गाड़ियों या बसों से भारत आ सकेंगे, जिससे हमारे सांस्कृतिक संबंध और मजबूत होंगे। खुद म्यांमार के राष्ट्रपति ने अपने इस दौरे में बोधगया जाकर इस बात के संकेत दे दिए हैं।
यूरोप जैसा सफर (IMT मोटर वाहन समझौता): वर्तमान में तीनों देश एक बेहद खास और ऐतिहासिक मोटर वाहन समझौते पर भी काम कर रहे हैं, जो इस हाईवे की सफलता की असली चाबी है। इस समझौते के लागू होते ही तीनों देशों के वाणिज्यिक और निजी वाहनों को सीमाओं पर किसी जटिल कागजी कार्रवाई, लंबी कस्टडी या बार-बार सामान उतारने की जरूरत नहीं पड़ेगी। गाड़ियां एक देश से दूसरे देश में इस तरह आ-जा सकेंगी जैसे यूरोपीय संघ के भीतर गाड़ियां बिना किसी बाधा के एक देश से दूसरे देश की सीमा पार कर जाती हैं।
पूरब का नया सुल्तान बनेगा भारत
देर से ही सही लेकिन भारत का यह पूर्वी कूटनीतिक दाँव अब पूरी तरह से सटीक और अचूक बैठ चुका है। म्यांमार के ऊँचे पहाड़ों को चीरकर, घने जंगलों के बीच से रास्ता बनाते हुए और चीन के तमाम मंसूबों को धूल चटाते हुए बन रहा यह हाईवे सिर्फ डामर और गिट्टी से बनी कोई सड़क नहीं है। यह नए भारत की उभरती हुई वैश्विक कूटनीति, उसके फौलादी इरादों और दुनिया की एक बड़ी आर्थिक महाशक्ति बनने की जिद का एक अटूट और जीता-जागता प्रतीक है।
बांग्लादेश अपनी राजनीतिक अस्थिरता और गलतफहमियों के दौर से गुजरता रहे या चीन अपनी तमाम आर्थिक और सैन्य ताकत के दम पर भारत को घेरने की साजिशें रचता रहे, भारत ने पूरब का वो अभेद्य रास्ता खोल दिया है जिसकी अंतिम मंजिल सीधे वैश्विक नेतृत्व की कुर्सी पर जाकर ही खत्म होती है। अब बस कुछ सालों का और इंतजार है, जिसके बाद इस ऐतिहासिक हाईवे पर भारत की प्रगति, समृद्धि और सामरिक शक्ति का पहिया पूरी दुनिया के सामने दहाड़ते हुए दौड़ने लगेगा।


