प्रोपेगेंडाई पत्रकार आशुतोष के यूट्यूब चैनल ‘सत्य हिंदी’ पर हाल ही में एक लाइव चर्चा प्रसारित हुई। इस चर्चा के दौरान पत्रकार मुकेश कुमार और वामपंथी विचारक अपूर्वानंद ने हिंदू समाज, उनके रीति-रिवाजों और हिंदू संगठनों को लेकर बेहद गंभीर और विवादित बयान दिए।
‘बात बोलेगी’ नाम के इस शो में देश की सांप्रदायिक स्थिति पर बात हो रही थी, लेकिन धीरे-धीरे पूरी बातचीत का रुख हिंदू समाज की आलोचना की तरफ मुड़ गया। चर्चा के दौरान अपूर्वानंद ने भारत में होने वाली हर तरह की हिंसा के लिए सीधे तौर पर हिंदुओं को जिम्मेदार ठहराने की कोशिश की।
उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS), हिंदू त्योहारों, देश की पुलिस, अदालतों और मुख्यधारा की मीडिया पर भी कई आपत्तिजनक टिप्पणियाँ कीं। उन्होंने पूरे हिंदू समाज को हिंसक, जातिवादी और मुस्लिम-विरोधी मानसिकता से ग्रसित बताने का प्रयास किया।
इस बातचीत का सबसे विवादित हिस्सा वह था जब अपूर्वानंद ने सामान्य हिंदू परिवारों को लेकर एक बड़ा दावा कर दिया। उन्होंने कहा कि आज हर हिंदू घर के अंदर एक संभावित हत्यारा या संभावित बलात्कारी छिपा हुआ है। इस बयान के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएँ देखने को मिल रही हैं और लोग इसे समाज में नफरत फैलाने वाला बयान बता रहे हैं।
हिंदुओं के कथित सामूहिक कट्टरपंथीकरण पर बात करते हुए अपूर्वानंद ने कहा, “भारत में हिंदुओं का बड़े पैमाने पर कट्टरपंथीकरण हो रहा है… ऐसी स्थिति बन गई है कि अब हर घर में इस तरह का एक हिंदू मौजूद है, जो एक संभावित हत्यारा है।”
इसके बाद भी वह नहीं रुके। उन्होंने आगे कहा, “अगर यह हिंदू संभावित हत्यारा नहीं है, तो वह संभावित बलात्कारी है। और यदि वह सीधे तौर पर बलात्कार नहीं कर रहा है, तो वह अपनी कल्पनाओं में या आभासी रूप से बलात्कार कर रहा है।”
अपूर्वानंद ने हिंदू परिवारों को लेकर की गई अपनी इन व्यापक टिप्पणियों को कुछ वर्ष पहले विवादों में रहे ‘सुल्ली डील्स’ और ‘बुल्ली बाई’ मामलों से जोड़ने की कोशिश की। उन्होंने दावा किया कि इन घटनाओं से यह संकेत मिलता है कि मुस्लिम महिलाओं के प्रति अपमानजनक रवैया और मुसलमानों के खिलाफ हिंसा को अब हिंदू परिवारों में सामान्य या स्वीकार्य मान लिया गया है।
उन्होंने आगे यह भी आरोप लगाया कि मुसलमानों के साथ बलात्कार और उनकी हत्या जैसी घटनाओं को हिंदू समाज के एक हिस्से में उचित ठहराया जा रहा है। इस दौरान उन्होंने पूरे हिंदू समाज और हिंदू परिवारों को लेकर व्यापक निष्कर्ष प्रस्तुत किए।
यह भ्रामक निष्कर्ष है कि यदि इसी प्रकार की भाषा किसी अन्य धार्मिक समुदाय के लिए इस्तेमाल की जाती, तो उसे तत्काल घृणा भाषण (हेट स्पीच), सामूहिक बदनाम करने और अमानवीयकरण के रूप में देखा जाता। लेकिन हिंदुओं के संदर्भ में की गई इन टिप्पणियों को चर्चा के दौरान शैक्षणिक विश्लेषण या बौद्धिक विमर्श के रूप में प्रस्तुत किया गया।
हिंदुओं को हमलावर और मुसलमानों को बताया पीड़ित
कार्यक्रम की शुरुआत से ही यह दावा किया गया कि देशभर में हर दिन सैकड़ों ऐसी घटनाएँ हो रही हैं, जिनमें मुसलमानों को पीटा जाता है, उनके साथ दुर्व्यवहार किया जाता है और उन्हें सार्वजनिक रूप से अपमानित किया जाता है। चर्चा के दौरान यह भी कहा गया कि इस कथित उत्पीड़न का शिकार केवल पुरुष ही नहीं, बल्कि बच्चे, महिलाएँ और बुजुर्ग भी बन रहे हैं।
अपूर्वानंद ने दावा किया कि मुसलमान अब कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं। उनके अनुसार, सड़कें, मोहल्ले, स्कूल, कॉलेज, बाजार, ट्रेनें और बसें तक मुसलमानों के लिए असुरक्षित हो चुकी हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि हिंदुओं के नाम पर नफरत फैलाने और हिंसा करने वाले लोग बिना किसी भय के कहीं भी पहुँच जाते हैं और हत्या जैसी घटनाओं को भी अंजाम देते हैं।
बातचीत के दौरान यह भी कहा गया कि ‘लव जिहाद’, धर्मांतरण, घुसपैठ, गौ-रक्षा, खान-पान की आदतों, जीवनशैली और धार्मिक त्योहारों जैसे मुद्दों के नाम पर हिंसा को उचित ठहराया जा रहा है। साथ ही यह आरोप भी लगाया गया कि ऐसे तत्वों को सरकार, प्रशासन और पुलिस का संरक्षण प्राप्त है।
अपूर्वानंद ने आगे दावा किया कि मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक के नेता कथित रूप से भड़काऊ भाषणों, बुलडोजर कार्रवाई और धमकियों के जरिए हिंसा को बढ़ावा दे रहे हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि मुख्यधारा की मीडिया ने अपने प्राइम-टाइम कार्यक्रमों और बहसों के माध्यम से इस माहौल को मजबूत किया है।
पूरी बातचीत के दौरान यह स्पष्ट दिखाई दिया कि चर्चा का केंद्र हिंदू समाज, हिंदू संगठनों और हिंदुत्व से जुड़े विचारों को कठघरे में खड़ा करना था, जबकि मुसलमानों को एक संगठित और कथित रूप से कट्टर हिंदू तंत्र के पीड़ित के रूप में प्रस्तुत किया गया।
हिंदुओं पर सामूहिक रूप से चलाया गया मुकदमा
बातचीत के दौरान अपूर्वानंद ने दावा किया कि हिंदुओं की मूल प्रवृत्तियाँ स्वभावतः हिंसक, अश्लील और अभद्र हैं। चर्चा का मुख्य उद्देश्य यह दिखाना था कि हिंदू धर्म की रक्षा का दायित्व कथित तौर पर आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों के हाथों में चला गया है और धार्मिक नेतृत्व से जुड़े कई लोग भी हिंसक गतिविधियों में संलिप्त दिखाई देते हैं।
अपूर्वानंद ने यह भी दावा किया कि ये कथित प्रवृत्तियाँ लंबे समय तक दबे रूप में मौजूद थीं, लेकिन वर्तमान राजनीतिक और धार्मिक नेतृत्व द्वारा हिंदुओं को जिस प्रकार उकसाया जा रहा है, उसके कारण अब वे अधिक खुलकर सामने आने लगी हैं। उनके अनुसार, राजनीतिक और धार्मिक विमर्श ने हिंदू समाज के भीतर मौजूद इन कथित रुझानों को सार्वजनिक रूप से अभिव्यक्ति का अवसर प्रदान किया है।
पूरी चर्चा के दौरान अपूर्वानंद ने हिंदू समाज के चरित्र, धार्मिक नेतृत्व और हिंदुत्व से जुड़े संगठनों को लेकर व्यापक और विवादास्पद दावे किए, जिनमें हिंदुओं को सामूहिक रूप से हिंसा, कट्टरता और सामाजिक वैमनस्य से जोड़ने का प्रयास दिखाई दिया।
’33 करोड़ देवताओं’ के बहाने हिंदू बहुलवाद का उड़ाया गया मजाक
बातचीत के दौरान अपूर्वानंद ने दावा किया कि केवल 33 करोड़ देवी-देवताओं की पूजा करने से हिंदू सहिष्णु नहीं हो जाते, क्योंकि हिंदू धर्म न तो एकरूप (मोनोलिथिक) है और न ही किसी एक धर्मग्रंथ पर आधारित है। उन्होंने यह भी कहा कि हिंदू स्वभाव से कठोर, जातिवादी और विभाजित समाज में विश्वास रखने वाले होते हैं।
उनका यह कहना है कि हिंदू बहुलतावाद (प्लूरलिज्म) की एक सतही और भ्रामक व्याख्या है। हिंदू परंपरा में प्रचलित 33 करोड़ देवी-देवताओं की अवधारणा को अक्सर गलत तरीके से समझा जाता है।
वैदिक और उपनिषदकालीन संदर्भों में इसका अर्थ 33 प्रकार के देवताओं या 33 देव शक्तियों से है, न कि 33 करोड़ अलग-अलग देवताओं की पूजा से। पारंपरिक व्याख्या के अनुसार इनमें आठ वसु, ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य, इंद्र और प्रजापति शामिल हैं।
हिंदू बहुलतावाद देवी-देवताओं की संख्या पर आधारित नहीं है, बल्कि इस विचार पर आधारित है कि परम सत्य या ईश्वर तक अनेक रूपों, नामों, मार्गों और परंपराओं के माध्यम से पहुँचा जा सकता है।
ऐसे में इस अवधारणा को केवल 33 करोड़ देवी-देवताओं तक सीमित करके हिंदुओं को असहिष्णु बताना, उनके के अनुसार, गंभीर अकादमिक विश्लेषण नहीं बल्कि वैचारिक टिप्पणी अधिक प्रतीत होता है।
इसी क्रम में अपूर्वानंद ने यह दावा भी किया कि हिंदू धर्म में सेवा की कोई अवधारणा नहीं है। उनका कहना है कि यह दावा न केवल तथ्यात्मक रूप से गलत है, बल्कि हिंदू धर्मग्रंथों, परंपराओं और सामाजिक व्यवहार की अनदेखी भी करता है।
भगवद्गीता में लोकसंग्रह अर्थात समाज और विश्व के कल्याण को कर्म का महत्वपूर्ण उद्देश्य बताया गया है। वहीं सर्वभूतहित यानी सभी प्राणियों के कल्याण की अवधारणा भी हिंदू चिंतन का केंद्रीय तत्व मानी जाती है।
हिंदू परंपराएँ दान, करुणा, अहिंसा, अन्नदान, गौसेवा, अतिथि सत्कार, मंदिरों में सामुदायिक भोजन, धर्मशालाओं, यात्रियों की सेवा और जरूरतमंदों की सहायता जैसे मूल्यों पर विशेष बल देती रही हैं।
इतिहास में अन्नक्षेत्र, धर्मशालाएँ, गौशालाएँ, मठ, अखाड़े और तीर्थयात्रियों की सहायता की व्यवस्थाएँ लंबे समय से हिंदू समाज का हिस्सा रही हैं। आज भी देशभर के अनेक मंदिर निःशुल्क भोजन, चिकित्सा शिविर, शैक्षणिक संस्थान, गौशालाएँ और प्राकृतिक आपदाओं के दौरान राहत कार्य संचालित करते हैं। ऐसे में हिंदू धर्म में सेवा की कोई अवधारणा नहीं है, यह दावा ऐतिहासिक और धार्मिक साक्ष्यों से मेल नहीं खाता।
अपूर्वानंद ने एक अन्य दावा करते हुए कहा कि हिंदू धर्म में ‘पड़ोसी धर्म’ या पड़ोसी के प्रति कर्तव्य की अवधारणा नहीं है। उनके अनुसार यह निष्कर्ष भी हिंदू दर्शन को अब्राहमिक धार्मिक शब्दावली के सीमित ढाँचे में देखने का परिणाम है।
हिंदू परंपरा भले ही लव थाइ नेबर जैसी शब्दावली का प्रयोग न करती हो, लेकिन उसमें इससे भी व्यापक अवधारणाएँ मौजूद हैं। अतिथि देवो भव, वसुधैव कुटुम्बकम्, सर्वभूतहित, अहिंसा, दया, दान, मैत्री और करुणा जैसे सिद्धांत समाज और समस्त सृष्टि के प्रति उत्तरदायित्व का संदेश देते हैं।
तैत्तिरीय उपनिषद में माता, पिता, गुरु और अतिथि को देवतुल्य मानने की शिक्षा दी गई है। वहीं महाभारत, पुराणों और अन्य धार्मिक ग्रंथों में अतिथियों का सम्मान, यात्रियों की सहायता, भूखों को भोजन, प्यासों को पानी और समाज के कमजोर वर्गों की मदद को धर्म का हिस्सा बताया गया है।
उनका कहना है कि हिंदू नैतिकता केवल पड़ोसी तक सीमित नहीं रहती, बल्कि अतिथि, अजनबी, पशु-पक्षी, प्रकृति, पूर्वजों और समस्त जीवों तक अपने दायित्व का विस्तार करती है। इसलिए हिंदू धर्म में पड़ोसी के प्रति कर्तव्य का कोई विचार नहीं है, यह आलोचना नहीं बल्कि तथ्यात्मक रूप से भ्रामक निष्कर्ष प्रतीत होती है।
वर्ण के कारण हिंदू समाज को स्वाभाविक रूप से हिंसक बताया
बातचीत के दौरान अपूर्वानंद ने वर्ण व्यवस्था का उल्लेख करते हुए हिंदू धर्म और हिंदू समाज को हिंसा से जोड़ने का प्रयास किया। उन्होंने दावा किया कि हिंदू समाज मूल रूप से वर्ण व्यवस्था में विश्वास रखने वाला समाज है।
उनका कहना था कि हिंदू समाज और हिंदू धर्मग्रंथों का अध्ययन करने वाले कई विद्वान मानते हैं कि यदि वर्ण व्यवस्था को हटा दिया जाए, तो हिंदू धर्म की मूल संरचना ही समाप्त हो जाएगी।
अपूर्वानंद ने तर्क दिया कि जो समाज पदानुक्रम, ऊँच-नीच और अस्पृश्यता में विश्वास करता है, वह स्वाभाविक रूप से हिंसक होता है। उनके अनुसार, किसी व्यक्ति को सामाजिक रूप से दूर रखना या उसे बराबरी का दर्जा न देना ‘छिपी हुई हिंसा’ है, जबकि किसी की जान लेना ‘प्रत्यक्ष हिंसा’ का रूप है।
उन्होंने आगे कहा कि यदि किसी ब्राह्मण को यह लगता था कि किसी व्यक्ति ने उसे अपवित्र कर दिया है, तो उस व्यक्ति की हत्या तक की जा सकती थी। साथ ही उन्होंने यह भी दावा किया कि ऐसी प्रवृत्तियाँ कथित तौर पर हमारे भीतर पहले से मौजूद रही हैं।
इस बिंदु पर चर्चा केवल सामाजिक बुराइयों या जातिगत अन्याय की आलोचना तक सीमित नहीं रही, बल्कि पूरे हिंदू समाज और उसकी सभ्यतागत संरचना पर सवाल उठाने की दिशा में बढ़ती दिखाई दी।
हिंदू समाज की आलोचना केवल जाति-आधारित भेदभाव के संदर्भ में नहीं की गई, बल्कि उसे संरचनात्मक रूप से हिंसक तथा बहिष्कार और दमन की प्रवृत्ति वाला समाज बताने का प्रयास किया गया।
बाद में अपूर्वानंद ने कहा कि यह समस्या केवल ब्राह्मणों या तथाकथित उच्च जातियों तक सीमित नहीं है। उन्होंने दावा किया कि पिछड़ी जातियों, दलितों, वाल्मीकि समुदाय, यादवों और आदिवासी समुदायों के कुछ लोग भी मुसलमानों के खिलाफ हिंसा की घटनाओं में शामिल रहे हैं। उनके अनुसार, मुसलमानों के प्रति वैमनस्य या घृणा की भावना हिंदू समाज की लगभग सभी जातियों में किसी न किसी रूप में मौजूद है।
उन्होंने कहा कि इस प्रकार की दलील पहले ‘ब्राह्मणवाद’ की आलोचना से शुरू होती है, लेकिन धीरे-धीरे उसका दायरा बढ़ाकर सभी हिंदू जाति समूहों तक पहुँचा दिया जाता है।
उनके अनुसार, चर्चा का निष्कर्ष किसी एक वर्ग या समूह की हिंसक प्रवृत्तियों की आलोचना नहीं था, बल्कि पूरे हिंदू समाज को एक ऐसी सामाजिक संरचना के रूप में चित्रित करना था, जो कथित रूप से हिंसा, भेदभाव और वैमनस्य से ग्रस्त है।
RSS पर पुरानी सोच को संगठित हिंसा में बदलने का आरोप
अपूर्वानंद ने बातचीत के दौरान दावा किया कि हिंदुओं के मन में मुसलमानों के प्रति पूर्वाग्रह पहले से मौजूद थे, लेकिन अतीत में हिंदू और मुसलमान साथ रहते थे क्योंकि उन पूर्वाग्रहों को लगातार भड़काने और उन्हें हिंसा में बदलने वाली कोई संगठित शक्ति सक्रिय नहीं थी।
इसके बाद उन्होंने हिंदू महासभा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विनायक दामोदर सावरकर के लेखन, एम एस गोलवलकर, के बी हेडगेवार और श्यामा प्रसाद मुखर्जी का नाम लेते हुए उन्हें उस कथित सक्रिय शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया गया। उनके अनुसार, इस संगठित वैचारिक धारा ने हिंदुओं के भीतर मौजूद पूर्वाग्रहों को उकसाने और उन्हें सक्रिय हिंसा में बदलने का काम किया।
अपूर्वानंद ने आगे दावा किया कि भारत में पहले सांप्रदायिक हिंसा प्रायः छिटपुट या अवसर विशेष पर होने वाली घटनाओं तक सीमित रहती थी। उन्होंने उदाहरण के तौर पर ताजिया जुलूसों या रामनवमी के आसपास होने वाले हिंदू-मुस्लिम दंगों का उल्लेख किया। हालाँकि उनके अनुसार वर्तमान समय में सबसे बड़ा बदलाव यह है कि समाज के एक हिस्से ने हिंसा को न केवल उचित बल्कि स्वीकार्य और निर्लज्जता के साथ समर्थित मानना शुरू कर दिया है।
उन्होंने कहा कि सावरकर, हिंदू महासभा और RSS से जुड़ी विचारधारा, जो पहले मुख्यधारा के विमर्श का हिस्सा नहीं मानी जाती थी, अब प्रभावी और प्रमुख विचारधारा बन गई है। उनके अनुसार, इसका परिणाम यह हुआ है कि हिंसा अब केवल कभी-कभार होने वाली घटना नहीं रही, बल्कि लोगों के व्यवहार, भाषा और दैनिक गतिविधियों में भी दिखाई देने लगी है।
बातचीत के अंत में अपूर्वानंद ने यह दावा किया कि समाज के कथित अपराधीकरण को बढ़ावा देना RSS की सबसे बड़ी सफलता रही है। उनका कहना है कि इस प्रकार के दावों के माध्यम से हिंदुत्व से जुड़े संगठनों, नेताओं और विचारकों को सामाजिक हिंसा तथा सांप्रदायिक तनाव के लिए सामूहिक रूप से जिम्मेदार ठहराने का प्रयास किया गया।
बजरंग दल को आतंकवादी जैसा बताया गया, RSS इकोसिस्टम पर लगाया गया आरोप
बातचीत के दौरान मुकेश कुमार ने अपूर्वानंद से पूछा कि क्या बजरंग दल को एक आतंकवादी संगठन कहा जा सकता है। इसके जवाब में अपूर्वानंद ने कहा कि वह इस आकलन से सहमत हैं और बजरंग दल को एक संगठित समूह बताया।
इसके बाद उन्होंने दावा किया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने ऐसा वातावरण तैयार किया है, जिसमें अनेक संगठन विकसित हो सके हैं। उन्होंने इसकी तुलना एक ऐसे पारिस्थितिकी तंत्र (इकोसिस्टम) से की, जहाँ विशेष प्रकार के पौधे स्वाभाविक रूप से उगते हैं। उनके अनुसार, RSS द्वारा निर्मित इसी वातावरण में घृणा और वैमनस्य (द्वेष) की राजनीति पनपती है।
अपूर्वानंद ने इस संदर्भ में बजरंग दल, विश्व हिंदू परिषद (VHP), विद्या भारती, सरस्वती शिशु मंदिर, राम सेना, रुद्र सेना, हिंदू वाहिनी और अन्य संगठनों का उल्लेख किया। उन्होंने दावा किया कि इनमें से कुछ संगठनों का RSS से प्रत्यक्ष और औपचारिक संबंध भले न हो, लेकिन वे कथित रूप से उसी प्रकार का कार्य करते हैं और समान वैचारिक दिशा में सक्रिय हैं।
चर्चा के दौरान अपूर्वानंद का तर्क यह था कि इन संगठनों को अलग-अलग इकाइयों के रूप में देखने के बजाय एक व्यापक वैचारिक ढाँचे के हिस्से के रूप में देखा जाना चाहिए। उनके अनुसार, चाहे किसी संगठन का RSS से औपचारिक संबंध हो या न हो, वे सभी एक ऐसे वातावरण में कार्य करते हैं जिसे उन्होंने RSS की विचारधारा से प्रभावित बताया।
इस तरह के तर्क में यदि किसी संगठन का RSS से प्रत्यक्ष संबंध हो तो उसकी गतिविधियों के लिए RSS को जिम्मेदार ठहराया जाता है और यदि ऐसा संबंध न भी हो, तो उसे एक व्यापक ‘इकोसिस्टम’ का हिस्सा बताकर अंततः आरोपों का केंद्र RSS को ही बनाया जाता है।
उनके अनुसार, इस दृष्टिकोण के तहत विभिन्न संगठनों की स्वतंत्र पहचान और कार्यप्रणाली के बीच के अंतर को नजरअंदाज कर दिया जाता है।
1984 के सिख विरोधी दंगों के लिए हिंदुओं को ठहराया गया दोषी, कॉन्ग्रेस की भूमिका को धकेला गया पीछे
बातचीत का एक सबसे विवादास्पद हिस्सा तब सामने आया जब मुकेश कुमार ने 1984 के सिख विरोधी दंगों का मुद्दा उठाया। इस पर अपूर्वानंद ने दावा किया कि उस हिंसा में सामान्य लोगों ने भी भाग लिया था।
उन्होंने कहा कि यदि दिल्ली में लगभग 4000 सिखों की हत्या हुई थी, तो यह भी सोचना चाहिए कि उन्हें मारने में कितने हजार लोग शामिल रहे होंगे। इसी क्रम में उन्होंने कहा, “वे सभी हिंदू थे। वे सभी हिंदू थे और कोई दूसरा नहीं था।”
अपूर्वानंद ने आगे कहा कि उस समय हिंसा में शामिल लोग आज डॉक्टर, शिक्षक, दुकानदार, दादा या बुजुर्ग नागरिक के रूप में समाज में मौजूद हो सकते हैं, लेकिन उनके हाथ खून से सने हुए हैं। उन्होंने यह भी कहा कि हिंदू समाज ने कभी यह स्वीकार नहीं किया कि जिन सिखों को वह अपना रक्षक बताता है, उन्हीं सिखों को घेरकर मार डाला गया।
उन्होंने बताया की इस प्रकार की व्याख्या 1984 की त्रासदी को सांप्रदायिक दृष्टि से देखने का प्रयास करती है। उनके अनुसार, 1984 की हिंसा कोई अमूर्त ‘हिंदू बनाम सिख’ संघर्ष नहीं थी, बल्कि तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों में घटित एक संगठित हिंसक घटना थी, जो तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद भड़की और उस समय सत्ता में रही कॉन्ग्रेस सरकार के दौर में हुई।
1984 के सिख विरोधी दंगों को लेकर वर्षों तक पीड़ितों, प्रत्यक्षदर्शियों और विभिन्न जाँच आयोगों ने कई कॉन्ग्रेस नेताओं पर आरोप लगाए। पूर्व कॉन्ग्रेस नेता सज्जन कुमार को एक मामले में दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई।
वहीं जगदीश तीतलेर की भूमिका भी लंबे समय तक कानूनी और जाँच एजेंसियों की पड़ताल के दायरे में रही। ननवाती कमिशन ने भी अपनी रिपोर्ट में कुछ कॉन्ग्रेस नेताओं के खिलाफ विश्वसनीय साक्ष्यों का उल्लेख किया था।
उनके अनुसार, ऐसे में 1984 की हिंसा को केवल हिंदुओं द्वारा सिखों की हत्या के रूप में प्रस्तुत करना घटनाओं की राजनीतिक और प्रशासनिक पृष्ठभूमि को नजरअंदाज करता है।
उनका तर्क है कि इससे कॉन्ग्रेस नेतृत्व, राजनीतिक संरक्षण, प्रशासनिक विफलता और पुलिस की भूमिका पर से ध्यान हटाकर पूरे हिंदू समुदाय पर सामूहिक दोषारोपण करने की कोशिश होती है।
इस दृष्टिकोण के अनुसार, 1984 की हिंसा के पीड़ित सिख समुदाय के लोग थे, जबकि आरोपितों में राजनीतिक संरक्षण प्राप्त भीड़, स्थानीय तत्व और उस समय के सत्ता प्रतिष्ठान से जुड़े लोग शामिल थे।
उनका कहना है कि इसे एक राजनीतिक नरसंहार या पोग्रोम के बजाय पूरे हिंदू समाज के अपराध के रूप में चित्रित करना विश्लेषण नहीं, बल्कि वैचारिक निष्कर्ष थोपने का प्रयास माना जा सकता है।
मुसलमानों को हिंदुओं के आस-पास हमेशा असुरक्षित दिखाया गया
बातचीत के दौरान अपूर्वानंद ने दावा किया कि आज मुसलमान लगातार असुरक्षा और अनिश्चितता के माहौल में जी रहे हैं, क्योंकि उन्हें यह नहीं पता होता कि उनके आसपास मौजूद हिंदू व्यक्ति उनके साथ कैसा व्यवहार करेगा।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि ट्रेन में सफर कर रहा कोई मुसलमान यह नहीं जानता कि उसके बगल में बैठा व्यक्ति उसके टिफिन को देखकर कैसी प्रतिक्रिया देगा, अगले स्टेशन पर किसी को बुलाएगा या उसके खिलाफ हमला करवाने की कोशिश करेगा। उन्होंने यह भी दावा किया कि मुसलमानों के मन में यह आशंका तक रहती है कि कहीं कोई रेलवे सुरक्षा बल (RPF) का जवान सोते समय उन्हें गोली न मार दे।
अपूर्वानंद ने आगे कहा कि यदि कोई मुसलमान ट्रेन यात्रा के दौरान कोई राजनीतिक राय व्यक्त करता है, तो उसे इसके कारण हिंसा का सामना करना पड़ सकता है या उसकी जान भी जा सकती है। उनके अनुसार, मुसलमान आज घर से निकलते समय भी संदेह और आशंका के साथ निकलते हैं तथा वापस लौटते समय भी उसी मानसिक स्थिति में रहते हैं। उन्होंने कहा कि उनके सामने बैठा हिंदू व्यक्ति अच्छा भी हो सकता है, लेकिन ऐसा नहीं भी हो सकता है।
उन्होंने बताया कि इस प्रकार के दावे हिंदुओं को एक व्यापक और स्थायी खतरे के रूप में तथा मुसलमानों को हमेशा भय और असुरक्षा में जीने वाले समुदाय के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
उनके अनुसार, ऐसी टिप्पणियाँ व्यक्तिगत घटनाओं या अपराधों की चर्चा से आगे बढ़कर पूरे समुदायों के बारे में सामान्यीकृत निष्कर्ष निकालती हैं, जिससे सामाजिक विभाजन और अविश्वास की भावना को बल मिल सकता है।
बहराइच में हुई हत्या को सेल्फ डिफेंस के तौर पर किया गया पेश
बातचीत के दौरान अपूर्वानंद ने बहराइच हिंसा का भी उल्लेख किया। उन्होंने दावा किया कि एक जुलूस के दौरान एक व्यक्ति मुस्लिम परिवार के घर में घुस गया, रेलिंग तोड़ दी और वहाँ लगा धार्मिक झंडा हटा दिया। इसके बाद उन्होंने कहा कि जाहिर तौर पर आत्मरक्षा में उस मुस्लिम परिवार या किसी अन्य व्यक्ति की ओर से गोली चलाई गई, जिसमें उसकी मौत हो गई।
यह संदर्भ बहराइच हिंसा के दौरान मारे गए राम गोपाल मिश्रा से जुड़ा था। उन्होंने कहा कि अपूर्वानंद ने घटना को जिस प्रकार दिखाया, उससे यह संदेश जाता है कि गोलीबारी आत्मरक्षा की स्वाभाविक या समझी जा सकने वाली प्रतिक्रिया थी।
उनके अनुसार, यह व्याख्या केवल नैतिक दृष्टि से ही विवादास्पद नहीं है, बल्कि मामले में बाद में आए न्यायिक फैसले से भी मेल नहीं खाती। राम गोपाल मिश्रा हत्याकांड में अदालत ने मुख्य आरोपित सरफराज उर्फ रिंकू को मृत्युदंड और अन्य नौ दोषियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। अदालत ने इस अपराध को गंभीर और जघन्य हत्या माना, न कि आत्मरक्षा के सामान्य मामले के रूप में देखा गया।
उनका तर्क है कि घटना को इस तरह प्रस्तुत करके, जिसमें गोली चलाने की कार्रवाई को आत्मरक्षा के रूप में सामान्य बनाने का प्रयास दिखाई देता है, अपूर्वानंद ने इसे अपने व्यापक तर्क के अनुरूप ढालने की कोशिश की।
उनके अनुसार, इस प्रस्तुति में हिंदू पक्ष को आक्रामक और मुस्लिम पक्ष को पीड़ित के रूप में दिखाया गया, जबकि घटना में मृतक एक हिंदू युवक था। उनका कहना है कि इस प्रकार की व्याख्या जटिल घटनाओं को पूर्वनिर्धारित वैचारिक ढाँचे में फिट करने के प्रयास जैसा प्रतीत होती है।
हिंदू त्योहारों को हिंसक प्रदर्शन के तौर पर दिखाया गया
बातचीत के दौरान अपूर्वानंद ने हिंदू धार्मिक आयोजनों और त्योहारों को लेकर भी तीखी टिप्पणियाँ कीं। उन्होंने दावा किया कि रामनवमी के अवसर पर 13-14 साल की आयु के बच्चे बड़ी संख्या में तलवारें लेकर मुस्लिम बस्तियों और घरों के सामने से गुजरते हैं तथा इसे अपना अधिकार समझते हैं।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कई स्थानों पर आयोजित होने वाले हिंदू जागरण अब देवी-देवताओं की महिमा का गायन करने के बजाय मुसलमानों और मुस्लिम महिलाओं के खिलाफ आपत्तिजनक तथा भड़काऊ गीतों के मंच बन गए हैं। उनके अनुसार, ऐसे आयोजनों में धार्मिक भक्ति की जगह वैमनस्य और आक्रामकता ने ले ली है।
अपूर्वानंद ने इन घटनाओं और प्रवृत्तियों को समाज के चरम पतन का उदाहरण बताया। उनका तर्क था कि धार्मिक आयोजनों और सार्वजनिक उत्सवों का स्वरूप बदलकर अब ऐसे रूप में सामने आ रहा है, जो सामाजिक सौहार्द को कमजोर करता है और समुदायों के बीच तनाव को बढ़ाता है।
उन्होंने आगे बताया कि इस प्रकार की टिप्पणियाँ कुछ घटनाओं या आरोपों के आधार पर पूरे हिंदू धार्मिक और सांस्कृतिक परिदृश्य को सामान्यीकृत कर प्रस्तुत करती हैं।
उनके अनुसार, रामनवमी, जागरण और अन्य धार्मिक आयोजनों में करोड़ों लोग भाग लेते हैं, जिनका मुख्य उद्देश्य धार्मिक आस्था, भक्ति और सांस्कृतिक परंपराओं का पालन होता है। ऐसे में कुछ विवादित घटनाओं को आधार बनाकर पूरे समुदाय या समस्त धार्मिक आयोजनों को नकारात्मक रूप में चित्रित करना एकतरफा निष्कर्ष माना जा सकता है।
ईसाइयों को भी हिंदुओं का शिकार बताया गया
बातचीत के दौरान ईसाई समुदाय को भी हिंदू समाज और मीडिया को पीड़ित बताने का प्रयास किया गया। अपूर्वानंद ने दावा किया कि भारत में ईसाइयों पर हर दिन हमले हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि पादरियों की पिटाई की जाती है, कब्रों को नुकसान पहुँचाया जाता है, जन्मदिन समारोहों पर हमले होते हैं और धार्मिक सभाओं में तोड़फोड़ की जाती है।
अपूर्वानंद ने यह भी तर्क दिया कि ईसाई संस्थानों पर धर्मांतरण के आरोप बेबुनियाद तरीके से लगाए जाते हैं। उनके अनुसार, कई पीढ़ियों से भारतीय छात्र मिशनरी स्कूलों में पढ़ते रहे हैं और ईसाई अस्पतालों की सेवाएँ लेते रहे हैं, लेकिन इससे वे ईसाई नहीं बन गए। इस आधार पर उन्होंने धर्मांतरण को लेकर उठाई जाने वाली चिंताओं पर सवाल खड़े किए।
हालाँकि उनका मानना है कि धर्मांतरण को लेकर सालों से उठती रही बहस और शिकायतों को नजरअंदाज करता है। अलग-अलग राज्यों में समय-समय पर ऐसे आरोप लगाए गए हैं कि कुछ मामलों में प्रलोभन, दबाव, धोखाधड़ी या अन्य तरीकों से धर्मांतरण कराने की कोशिश की गई। इन आरोपों के आधार पर कई FIR दर्ज हुई हैं और जाँच एजेंसियों ने संगठित धर्मांतरण नेटवर्क, विदेशी फंडिंग तथा कमजोर और वंचित समुदायों को लक्षित करने से जुड़े मामलों की जाँच भी की है।
उन्होंने बताया कि प्रत्येक आरोप की सत्यता और वैधता का अंतिम निर्णय अदालतों को करना है, लेकिन धर्मांतरण को लेकर मौजूद सभी चिंताओं को केवल हिंदू समाज की आशंका या पूर्वाग्रह बताकर खारिज कर देना एकतरफा दृष्टिकोण माना जा सकता है।
इसी संदर्भ में आलोचक हाल के सालों में चर्चित रहे कुछ मामलों और संगठनों का उल्लेख करते हैं, जिन पर हिंदुओं के धर्मांतरण को बढ़ावा देने के आरोप लगाए गए। उनके अनुसार, ऐसे मामलों की मौजूदगी यह दर्शाती है कि धर्मांतरण को लेकर चल रही बहस को पूरी तरह निराधार बताना सही नहीं है।
उन्होंने तर्क दिया कि इस विषय पर निष्पक्ष चर्चा के लिए सभी पक्षों के दावों, आरोपों और मौजूद जानकारियों की समान रूप से जाँच की जानी चाहिए, न कि किसी एक पक्ष को पूरी तरह निर्दोष और दूसरे को पूरी तरह दोषी मान लिया जाना चाहिए।
न्यायपालिका, पुलिस, नौकरशाही और सेना पर बहुसंख्यकों से नफ़रत करने का आरोप
बातचीत के अंतिम हिस्से में अपूर्वानंद ने दावा किया कि बहुसंख्यकवादी घृणा अब न्यायपालिका, नौकरशाही, पुलिस और सेना जैसी संस्थाओं तक पहुँच चुकी है। उनके अनुसार, हिंसा अब केवल सामाजिक स्तर तक सीमित नहीं रही, बल्कि संस्थागत स्वरूप धारण कर चुकी है।
अपने दावों के समर्थन में उन्होंने ऐसे मामलों का उल्लेख किया, जिनमें पुलिस या अदालतों पर कथित रूप से घृणास्पद भाषणों को यह कहकर उचित ठहराने का आरोप लगाया गया कि संबंधित व्यक्ति केवल हिंदू समाज को संगठित या प्रेरित करने का प्रयास कर रहे थे।
अपूर्वानंद ने कुछ न्यायिक टिप्पणियों, न्यायाधीशों के रुख और राम जन्मभूमि मामले के फैसले की भी आलोचना करते हुए उन्हें बहुसंख्यकवादी दृष्टिकोण से प्रभावित बताया।
उन्होंने कहा कि यदि मुसलमानों का सामना किसी भीड़ या किसी हिंदू संगठन से होता है, तो सैद्धांतिक रूप से उनके पास पुलिस, जिलाधिकारी (DM) या पुलिस अधीक्षक (SP) जैसे संस्थानों तक पहुँचने का विकल्प होता है। लेकिन यदि यही संस्थाएँ कथित रूप से मुसलमानों के खिलाफ पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाने लगें, तो उनके पास न्याय पाने का कोई प्रभावी माध्यम नहीं बचता।
अपूर्वानंद ने यह भी दावा किया कि भारतीय पुलिस व्यवस्था में ऐतिहासिक रूप से मुसलमानों और ईसाइयों के प्रति पूर्वाग्रह मौजूद रहे हैं, लेकिन अब ये पूर्वाग्रह अधिक सक्रिय रूप में दिखाई दे रहे हैं क्योंकि उन्हें कथित तौर पर संरक्षण और प्रोत्साहन मिल रहा है।
उनके अनुसार इस प्रकार के दावों के माध्यम से चर्चा का दायरा केवल हिंदू समाज या कुछ संगठनों की आलोचना तक सीमित नहीं रहा, बल्कि न्यायपालिका, प्रशासन, पुलिस और अन्य सरकारी संस्थाओं सहित पूरे राज्य तंत्र को मुसलमानों और ईसाइयों के प्रति पक्षपाती के रूप में दिखाने का प्रयास रहा है। उनके अनुसार, इस तरह की प्रस्तुति भारतीय लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर व्यापक प्रश्नचिह्न लगाने वाली थी।
अपूर्वानंद का हिंदू विरोधी भावनाओं का इतिहास रहा है
अपूर्वानंद का हिंदुत्व, हिंदू संगठनों और हिंदू प्रतीकों को लेकर विवादित टिप्पणियाँ करने का एक लंबा इतिहास रहा है। उनके आलोचक उन्हें दिल्ली दंगों से जुड़े मामलों में आरोपित व्यक्तियों में भी गिनाते हैं और आरोप लगाते हैं कि उन्होंने समय-समय पर ऐसे बयान दिए हैं जिन्हें हिंदू विरोधी विमर्श का हिस्सा माना जाता है।
मई 2019 में वामपंथी झुकाव वाले समाचार पोर्टल द वायर में प्रकाशित एक लेख में अपूर्वानंद ने ‘जय श्री राम’ के नारे को गुंडागर्दी की अभिव्यक्ति बताया था। उस लेख में उन्होंने उस समय की पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के उस रुख का भी समर्थन किया था, जिसमें उन्होंने ‘जय श्री राम’ के नारों को अपने खिलाफ लगाए गए अपमानजनक नारों के रूप में दिखाया था।
इसी लेख में अपूर्वानंद ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उकसाने वाला बताया था। उनका कहना है कि इस प्रकार की भाषा केवल प्रधानमंत्री की आलोचना तक सीमित नहीं थी, बल्कि देश के सर्वोच्च निर्वाचित पद की गरिमा पर भी टिप्पणी के रूप में देखी गई।
उन्होंने वरिष्ठ भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी को बहुरूपिया कहकर भी संबोधित किया था। अपूर्वानंद का तर्क था कि जय श्री राम के नारे का राजनीतिक इस्तेमाल भारतीय जनता पार्टी द्वारा हिंदुओं के बीच मुसलमानों के प्रति नफरत पैदा करने के लिए किया गया।
अप्रैल 2023 में भी अपूर्वानंद ने ‘गजवा-ए-हिंद’ को लेकर अपनी राय व्यक्त की थी। उन्होंने दावा किया था कि ‘गजवा-ए-हिंद’ की अवधारणा को हिंदुत्ववादी समूह अपनी हिंसा को सही ठहराने के लिए बार-बार सामने लाते हैं, जबकि उनके अनुसार भारतीय मुसलमानों के बीच इस विचार की कोई वास्तविक चर्चा नहीं होती।
उन्होंने सामाजिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव की एक पोस्ट को उद्धृत करते हुए लिखा था कि खालिस्तान और हिंदू राष्ट्र जैसे विचारों की चर्चा के बीच ‘गजवा-ए-हिंद’ को शामिल करना निराशाजनक है।
अपूर्वानंद ने प्रश्न उठाया था कि क्या किसी भारतीय संगठन या व्यक्ति ने ‘गजवा-ए-हिंद’ के लिए उसी तरह खुला आह्वान किया है, जैसा अन्य विचारों के संदर्भ में देखा गया है। उन्होंने कहा था कि ‘गजवा-ए-हिंद’ का उल्लेख मुख्यतः हिंदुत्ववादी समूहों द्वारा किया जाता है और उनके अनुसार आम मुसलमान इस विषय पर बात नहीं करते।
उन्होंने कहा है कि इन बयानों और लेखों से यह साफ होता है कि अपूर्वानंद लंबे समय से हिंदुत्व, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, भाजपा और उनसे जुड़े प्रतीकों की आलोचना करते रहे हैं।
वहीं उनके समर्थकों का तर्क है कि वे राजनीतिक और वैचारिक आलोचना कर रहे होते हैं। इसी कारण उनके वक्तव्यों को लेकर सार्वजनिक और राजनीतिक चर्चा में लगातार विवाद बना रहता है।
आलोचना या सामूहिक बुराई?
जिसे अकादमिक आलोचना के रूप में दिखाया गया, उनके अनुसार वास्तव में हिंदुओं और पूरे हिंदू समाज को बदनाम करने का प्रयास था। उनका कहना है कि हर प्रश्न की रूपरेखा और अपूर्वानंद द्वारा दिए गए जवाबों की गंभीरता से जाँच होनी चाहिए और उन्हें कानूनी कसौटी पर भी परखा जाना चाहिए, विशेषकर वह दावा जिसमें कहा गया कि हर हिंदू घर में एक हत्यारा या बलात्कारी मौजूद है।
(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)


