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लखनऊ अग्निकांड के दौरान आखिरी कॉल्स, धुएँ में घुटती साँसें और 15 जिंदगियों का अंत: पढ़ें पीड़ित परिवारों की दर्दनाक दास्तां

आग लगने के बाद लोग बाहर निकलने के लिए दौड़े लेकिन गलियारे धुएँ से भर चुके थे। जो लोग सीढ़ियों की तरफ पहुँचे, उन्हें सामने कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। कुछ वापस कमरों में लौटे, कुछ खिड़कियों की तरफ भागे और कुछ वहीं फँस गए। बाद में डॉक्टरों और शुरुआती रिपोर्टों में यही सामने आया कि बड़ी संख्या में मौतें सीधे आग से नहीं बल्कि दम घुटने के कारण हुईं।

सोमवार (22 जून 2026) की दोपहर किसी और दिन जैसी ही थी। लखनऊ के अलीगंज इलाके में उषा मेहता मार्ग स्थित उस तीन मंजिला इमारत के भीतर रोज की तरह जिंदगी चल रही थी। कहीं कंप्यूटर स्क्रीन पर काम हो रहा था, कहीं छात्र अपने नोट्स लेकर बैठे थे, कहीं कोई लाइब्रेरी में अगले एग्जाम की तैयारी कर रहा था।

किसी ने घर पर फोन करके कहा होगा कि शाम तक लौट आएँगे, किसी ने माँ से पूछा होगा कि खाने में क्या बना है और किसी ने अगले महीने की योजना बना ली होगी। किसी को अंदाजा नहीं था कि कुछ घंटों बाद इन्हीं फोन कॉल्स में से कुछ आखिरी साबित होंगी और कुछ लोग उस इमारत से कभी बाहर नहीं निकल पाएँगे।

दोपहर बीतते-बीतते उस इमारत में अचानक अफरातफरी मच गई। कुछ लोगों ने पहले धुआँ देखा, कुछ ने जलने की गंध महसूस की और कुछ को समझ ही नहीं आया कि आखिर हुआ क्या है। लेकिन कुछ ही मिनटों में पूरा माहौल बदल गया। दोपहर करीब 3 बजे इसी प्रॉपर्टी में आग लगी, जिसमें 15 लोगों की मौत हो गई।

भीषण अग्निकांड के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अलीगढ़ में चल रहे सभी कार्यक्रम छोड़ सीधे लखनऊ पहुँचे। मुख्यमंत्री के निर्देश पर राहत एवं बचाव कार्य को तेज किया गया, घायलों के इलाज की विशेष व्यवस्था की गई और कुछ ही घंटों के भीतर आरोपितों की गिरफ्तारी व जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई भी शुरू कर दी गई।

आग नहीं, धुआँ बना लोगों की जिंदगी का सबसे बड़ा दुश्मन

शुरुआती जाँच में आग की शुरुआत एसी डक्ट से होने की आशंका जताई गई है, लेकिन इस हादसे को सिर्फ आग का हादसा कहना पूरी तस्वीर नहीं बताता। इस घटना में सबसे घातक चीज आग नहीं बल्कि धुआँ साबित हुआ। आग ने कुछ हिस्सों को अपनी चपेट में लिया, लेकिन उससे पहले धुएँ ने पूरी इमारत को भर दिया।

उस समय बिल्डिंग में अलग-अलग गतिविधियां चल रही थीं। बेसमेंट और निचली मंजिलों पर अन्य व्यावसायिक काम थे, जबकि ऊपर लाइब्रेरी, कोचिंग और एनिमेशन से जुड़ी गतिविधियां चल रही थीं। ऊपर मौजूद लोगों को शायद शुरुआत में लगा कि नीचे उतर जाएँगे, लेकिन धुआँ इतनी तेजी से फैला कि कुछ ही मिनटों में साँस लेना मुश्किल हो गया।

लोग बाहर निकलने के लिए दौड़े लेकिन गलियारे धुएँ से भर चुके थे। जो लोग सीढ़ियों की तरफ पहुँचे, उन्हें सामने कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। कुछ वापस कमरों में लौटे, कुछ खिड़कियों की तरफ भागे और कुछ वहीं फँस गए। बाद में डॉक्टरों और शुरुआती रिपोर्टों में यही सामने आया कि बड़ी संख्या में मौतें सीधे आग से नहीं बल्कि दम घुटने के कारण हुईं।

इसका मतलब था कि कई लोगों के पास जिंदा रहने का मौका था, लेकिन बाहर निकलने का रास्ता उनके पास नहीं पहुँच पाया।

‘पापा मुझे बचा लो…’ – वे फोन कॉल्स जो अब कभी नहीं कटेंगी

इस हादसे का सबसे दर्दनाक हिस्सा वह नहीं था जो बाहर से दिखाई दिया, बल्कि वह था जो मोबाइल फोन के जरिए परिवारों तक पहुँचा। जब लोगों को लगा कि अब हालात हाथ से निकल रहे हैं, तो उन्होंने अपने सबसे करीब लोगों को फोन किया। 23 वर्षीय सुखमणि सिंह ने अपने पिता को फोन किया, कहा, “पापा आग लग गई है, मुझे आकर बचा लो।”

आवाज में डर था और उम्मीद भी थी कि शायद कुछ मिनट में कोई पहुँच जाएगा। पिता तुरंत निकले लेकिन रास्ते और हालात दोनों उनसे तेज थे। 25 साल के आदित्य श्रीवास्तव ने भी मदद की गुहार लगाई। उसके दोस्त बताते हैं कि वह लगातार संपर्क करने की कोशिश कर रहा था। किसी ने माँ को फोन किया, किसी ने भाई को, किसी ने दोस्त को।

अपने बेटे की तलाश में भटक रहे पारिजोत सिंह ने बताया कि उनके पास फोन आया था। उनका बेटा आग में फंसा था, उसने उन्हें फोन कर कहा, “पापा, आग लग गई है..मुझे बचा लो..” पारिजोत ने कहा कि बेटे की आवाज सुनकर उनके पैरों के नीचे से जमीन निकल गई और वो भागते हुए वहाँ पहुँचे लेकिन, पुलिसवालों ने उन्हें आगे नहीं जाने दिया।

एक माँ लगातार रोते हुए कह रही थी कि उसे उसके बेटे तक जाने दिया जाए। लेकिन अंदर हालात ऐसे थे कि किसी को जाने नहीं दिया जा सकता था। जो लोग बाहर खड़े थे, वे सिर्फ इंतजार कर सकते थे और कई लोगों के लिए यही इंतजार आखिरी साबित हुआ।

सुरक्षा व्यवस्था ही बन गई मौत का जाल, खुद को बचाने की कोशिश में लगे रहे लोग

हादसे के बाद जो जानकारियाँ सामने आईं, उन्होंने कई सवाल खड़े कर दिए। बताया गया कि जिस एनिमेशन सेंटर में कई छात्र और कर्मचारी मौजूद थे, वहाँ पूरी व्यवस्था काफी हद तक ऑटोमेटिक और बायोमीट्रिक सिस्टम पर आधारित थी। एंट्री नियंत्रित थी और दरवाजे भारी थे।

लेकिन हादसे के दौरान बिजली चली गई। परिजनों और शुरुआती जानकारी के मुताबिक, बिजली जाते ही सिस्टम ठप हो गया और गेट लॉक जैसी स्थिति में आ गया। अंदर मौजूद लोगों ने बाहर निकलने की कोशिश की, लेकिन हालात उनके खिलाफ थे। कुछ लोगों ने दरवाजा धक्का देकर खोलने की कोशिश की, लेकिन सफलता नहीं मिली।

जब लगा कि अब दरवाजा रास्ता नहीं बनेगा, तो लोगों ने दूसरी दिशा तलाशनी शुरू की। कुछ युवाओं ने शीशे तोड़े। कुछ ने पाइप पकड़कर नीचे उतरने की कोशिश की। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में कुछ लोग तार पकड़कर नीचे आते दिखाई दिए। कुछ लोग नीचे गिर गए। कुछ घायल हो गए। कुछ शायद उतर ही नहीं पाए।

इस बीच एक के बाद एक साथ चार-पाँच बच्चों ने छलांग लगा दी। इनमें एक बच्चा नीचे लगी ग्रिल पर गिर गया, जिसकी सरिया उसके पेट में धंस गई। कुछ लोगों ने तीसरी मंजिल से छलांग लगाने का फैसला किया, क्योंकि अंदर रहना उन्हें ज्यादा खतरनाक लग रहा था। यह वह पल था जहाँ हर व्यक्ति अपने तरीके से जिंदगी बचाने की कोशिश कर रहा था।

संयम, सूरजभान, आदित्य, रहमान: 15 नामों के पीछे छूट गई पूरी दुनिया

इस हादसे में जिन लोगों की जान गई, वे सिर्फ आँकड़े नहीं थे। हर नाम के पीछे एक घर था, एक संघर्ष था और किसी का पूरा भविष्य था। कानपुर के संयम विज के घर में कुछ दिन पहले ही दादी का निधन हुआ था। घर में तेरहवीं की तैयारी चल रही थी। परिवार को उम्मीद थी कि संयम आएगा और सारी जिम्मेदारियाँ संभालेगा।

लेकिन शाम तक खबर बदल चुकी थी। जिस घर में रस्मों की तैयारी थी, वहाँ मातम फैल गया। सूरजभान सिंह अपने घर का बड़ा सहारा थे। पिता पहले ही नहीं रहे थे। माँ और छोटे भाई की जिम्मेदारी उनके कंधों पर थी। वह नौकरी के लिए बाहर रहते थे लेकिन घर आते रहते थे। इस बार भी माँ इंतजार कर रही थीं।

फर्क सिर्फ इतना था कि परिवार को सच पता था और माँ को नहीं। 24 वर्षीय अब्दुल रहमान परिवार का इकलौता कमाने वाला बेटा था। अब्बू लकवाग्रस्त बताए गए। अम्मी घर संभालती थीं। कुछ महीने पहले नौकरी मिली थी और परिवार को लगा था कि अब हालात सुधरेंगे।

आदित्य श्रीवास्तव थ्री-डी एनिमेशन सीख रहे थे। उनके सपनों की दिशा तय हो रही थी। लेकिन जिस जगह से करियर बनना था, वहीं उनकी जिंदगी रुक गई। मृतकों में सागर, नीलेश, अनामिका, संयम, अनुछा, सुखमनी, आदित्य श्रीवास्तव, ज्योति, भविष्य, अब्दुल रहमान, सूरज शाह, शाहजान, जयनिल चक्रवर्ती, मोहम्मद अम्मार और सुमाल्या के नाम सामने आए।

मृतकों और घायलों के लिए मुआवजे का ऐलान, अलीगंज थाने में मुकदमा, 4 आरोपित गिरफ्तार

हादसे में जान गँवाने वाले लोगों के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त करते हुए मुख्यमंत्री ने मृतकों के परिजनों को 5-5 लाख रुपए की आर्थिक सहायता देने की घोषणा की। इसके अलावा घायलों को 50-50 हजार रुपए की सहायता राशि देने का भी ऐलान किया गया। सरकार ने स्पष्ट किया है कि प्रभावित परिवारों को हर संभव मदद उपलब्ध कराई जाएगी।

मुख्यमंत्री ने मामले की गहन जाँच के लिए दो सदस्यीय विशेष जाँच दल (SIT) गठित करने का निर्देश दिया है। SIT को सात दिनों के भीतर रिपोर्ट देने का निर्देश दिया गया है। घटना के संबंध में थाना अलीगंज में 6 लोगों के खिलाफ मुकदमा भी दर्ज किया गया है और चार आरोपितों को गिरफ्तार भी कर लिया है।

प्रारंभिक जाँच में लापरवाही सामने आने पर मुख्यमंत्री के निर्देश पर चार अधिकारियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, लखनऊ विकास प्रधिकरण ने अलीगंज की उस इमारत को गिराने का नोटिस जारी कर दिया है। इससे पहले 10 मई 2016 को ध्वस्तीकरण का आदेश भी जारी किया था। 

सीएम योगी ने परिवारों को दिया कड़ी कार्रवाई का आश्वासन

घटना के बाद सरकार की तरफ से कार्रवाई तेज हुई। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ घटनास्थल पर पहुँचे, अधिकारियों से घटना की सारी जानकारी ली। इसके बाद उन्होंने किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) का दौरा किया और आग लगने की घटना में घायल हुए लोगों से मुलाकात की।

मुख्यमंत्री ने शोक-संतप्त परिवारों से बातचीत की, उनके प्रति संवेदना व्यक्त की और आश्वासन दिया कि हर जिम्मेदार के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।

अब इमारत की स्वीकृति से लेकर फायर सेफ्टी और प्रशासनिक जिम्मेदारियों तक हर पहलू की जाँच की जा रही है। लेकिन इन सबके बीच सबसे बड़ा सच यह है कि हादसे के बाद शुरू हुई कार्रवाई उन परिवारों की जिंदगी को पहले जैसा नहीं कर सकती, जिनके घरों के दरवाजे अब हमेशा के लिए अधूरे इंतजार में रह गए।

कहीं माँ अब भी फोन की स्क्रीन देख रही है, कहीं पिता आखिरी कॉल को बार-बार याद कर रहे हैं। लखनऊ का यह अग्निकांड सिर्फ एक हादसा नहीं बनकर रह गया है। यह उन सपनों की कहानी बन गया है जो नौकरी, पढ़ाई और बेहतर भविष्य की उम्मीद लेकर उस इमारत में गए थे, लेकिन वापस नहीं लौट सके।

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सौम्या सिंह
सौम्या सिंह
ख़ुद को तराशने में मसरूफ़

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