लंबे इंतजार के बाद ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई को सुपुर्द-ए-खाक किया जा रहा है। अब यह जनाजा सिर्फ एक मजहबी रस्म नहीं है बल्कि यह ईरान के साथ-साथ इराक, शिया राजनीति और पश्चिम एशिया की बदलती ताकतों से जुड़ा बड़ा संदेश भी बनने जा रहा है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, उनका जनाजा तेहरान और कोम से होते हुए 8 जुलाई को इराक के नजफ और करबला ले जाया जाएगा फिर ईरान के मशहद में गुरुवार (9 जुलाई 2026) को दफनाया जाएगा। इस जनाजे को इराक ले जाने के पीछे कई वजह हैं जिन्हें इस लेख में खोजने की कोशिश करेंगे।
नजफ और करबला की मजहबी अहमियत
शिया मुसलमानों के लिए इराक के नजफ और करबला शहर बेहद मुकद्दस माने जाते हैं। नजफ में हजरत अली की दरगाह है, जिन्हें शिया मुसलमान पहला इमाम मानते हैं। करबला में इमाम हुसैन और हजरत अब्बास की दरगाहें हैं। करबला की घटना शिया इतिहास में सब्र, कुर्बानी और जुल्म के खिलाफ खड़े होने की सबसे बड़ी निशानी मानी जाती है।
इसी वजह से खामेनेई का जनाजा इन शहरों में ले जाना उनके समर्थकों के लिए सिर्फ रस्म नहीं है बल्कि यह उन्हें अहले-बैत की विरासत और शहादत की परंपरा से जोड़ने की कोशिश है। ईरान में खामेनेई को लंबे समय तक इस्लामी क्रांति, शिया नेतृत्व और अमेरिका-इजरायल विरोधी रुख के चेहरे के रूप में देखा गया। अब उनके जनाजे को नजफ और करबला ले जाकर यह दिखाने की कोशिश हो रही है कि उनका रिश्ता सिर्फ ईरानी सत्ता से नहीं बल्कि पूरी शिया उम्मत की मजहबी भावना से था।
खामेनेई के जनाजे को इन मुकद्दस शहरों में ले जाने का मतलब है कि ईरान उन्हें शिया इतिहास की उसी बड़ी कहानी में रखना चाहता है, जिसमें जुल्म के खिलाफ खड़े होने, बाहरी दबाव का मुकाबला करने और मजहबी पहचान बचाने की बात की जाती है। यही वजह है कि उनके समर्थक इस अंतिम यात्रा को सिर्फ एक नेता की विदाई नहीं, बल्कि मुकद्दस सफर के रूप में पेश कर रहे हैं।
अंतिम यात्रा के जरिए ईरान का ‘ताकत’ का संदेश
खामेनेई के जनाजे को इराक ले जाना इसी संदेश का हिस्सा है। ईरान दिखाना चाहता है कि उसके सबसे बड़े नेता की मौत के बाद भी उसका असर खत्म नहीं हुआ है। जनाजा जब ईरान की सीमा से बाहर निकलकर इराक के मुकद्दस शहरों तक जाएगा, तो यह एक तरह से ईरान के क्षेत्रीय प्रभाव का प्रदर्शन भी होगा। संदेश साफ है कि खामेनेई का असर सिर्फ तेहरान तक सीमित नहीं था बल्कि नजफ, करबला और उन शिया समूहों तक भी था जो ईरान को अपना राजनीतिक और धार्मिक सहारा मानते हैं।
इराक के लिए यह जनाजा अकीदत भी है और सियासी इम्तिहान भी
इराक के लिए यह मामला बहुत संवेदनशील है। एक तरफ इराक में बड़ी शिया आबादी है, जिसके लिए नजफ और करबला में किसी बड़े शिया नेता के जनाजे का आना अकीदत का मामला है। दूसरी तरफ इराक एक स्वतंत्र देश है, जिसे अपने रिश्ते ईरान और अमेरिका दोनों के साथ संभालने हैं। यह पूरा कार्यक्रम इराकी प्रधानमंत्री अली अल-जैदी की संभावित अमेरिका यात्रा से ठीक पहले हो रहा है। इसी वजह से इसे और अधिक राजनीतिक माना जा रहा है।
इराकी सरकार नहीं चाहती कि दुनिया को यह संदेश जाए कि बगदाद पूरी तरह तेहरान के प्रभाव में है। खासकर ऐसे समय में जब इराक अमेरिका से भी आर्थिक, सुरक्षा और कूटनीतिक रिश्ते मजबूत करना चाहता है। अगर इराक सरकार जनाजे में ज्यादा सक्रिय दिखती है तो अमेरिका और पश्चिमी देशों को यह संकेत मिल सकता है कि इराक अब भी ईरान की लाइन पर चल रहा है। अगर सरकार दूरी बनाती है तो ईरान समर्थक शिया गुट नाराज हो सकते हैं।
यही वजह है कि खामेनेई का जनाजा इराकी सरकार के लिए एक तरह का सियासी इम्तिहान बन गया है। उसे धार्मिक भावनाओं का सम्मान भी करना है और अपनी स्वतंत्र विदेश नीति की छवि भी बचानी है।
इराक के पॉपुलर मोबिलाइजेशन फोर्सेज (PMU) और शिया कोऑर्डिनेशन फ्रेमवर्क से जुड़े गुट इस जनाजे को इराक में आयोजित कराने के पक्ष में हैं। ईरानी पक्ष का दावा है कि इराकी नेताओं और समूहों ने यह अनुरोध किया था। वहीं, कुछ इराकी सूत्रों के मुताबिक यह माँग सीधे सरकार से नहीं बल्कि शिया राजनीतिक गुटों से आई। इसका मतलब यह है कि इराक के भीतर भी इस आयोजन को लेकर एकराय नहीं है।
सुलेमानी, रईसी और अब खामेनेई
मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया है कि कासिम सुलेमानी का जनाजा ईरान की सैन्य और क्षेत्रीय ताकत का प्रतीक था। इब्राहिम रईसी का जनाजा राज्य की निरंतरता दिखाने वाला आयोजन था। खामेनेई का जनाजा इन दोनों से बड़ा राजनीतिक अर्थ रखता है। यह ईरान की वैचारिक वैधता, शिया नेतृत्व की दावेदारी और क्षेत्रीय प्रभाव की परीक्षा है। इसलिए इराक की पवित्र धरती को इस यात्रा में शामिल करना ईरान के लिए बेहद सोचा-समझा कदम दिखता है।
खामेनेई का जनाजा इराक ले जाने के पीछे धार्मिक श्रद्धा, शिया प्रतीकवाद, ईरान की क्षेत्रीय राजनीति, इराकी सत्ता संतुलन और अमेरिका-ईरान तनाव, सब जुड़े हुए हैं। नजफ और करबला की यात्रा से ईरान यह दिखाना चाहता है कि खामेनेई सिर्फ ईरान के नेता नहीं थे बल्कि पूरे शिया राजनीतिक संसार में असर रखने वाली शख्सियत थे।
वहीं, इराक के लिए यह आयोजन सम्मान, दबाव और जोखिम तीनों का मिला-जुला मामला है। यही वजह है कि यह जनाजा एक अंतिम यात्रा से कहीं ज्यादा, पश्चिम एशिया की बदलती राजनीति का बड़ा संकेत बन गया है।


