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किसी को बेल मिली तो घर नहीं जा सका, कोई अब तक जेल में… संसद की सुरक्षा में सेंधमारी को सामान्य बनाना चाह रहे कॉकरोच, युवा समझें- भड़कावे में आने का क्या होता है अंजाम

आंदोलन नए आ जाते हैं, मुद्दे बदल जाते हैं, नेता नए भाषण देने लगते हैं, लेकिन मुकदमे में फँसा युवा वहीं रह जाता है। इसलिए लोकतंत्र में सबसे बड़ा साहस बैरिकेड तोड़ना नहीं, बल्कि भावनाओं के बजाय विवेक से निर्णय लेना है।

किसी भी देश का भविष्य उसके युवाओं के कंधों पर टिका होता है। युवाओं की सोच, उनका जोश और उनकी वैचारिक शक्ति ही समाज को नई दिशा देती है। लेकिन जब इसी जोश को कुछ असमाजिक तत्व, अवसरवादी राजनीतिक दल और वामपंथी तंत्र अपने स्वार्थ के लिए इस्तेमाल करने लगते हैं, तो नतीजा केवल तबाही होता है।

आज युवाओं के मन में असंतोष का जहर इस कदर घोला जा रहा है कि वे कानून तोड़ने, संस्थाओं पर हमला करने और उपद्रव मचाने को ‘क्रांति’ समझने की भूल कर बैठते हैं। युवाओं को यह समझने की सख्त जरूरत है कि सोशल मीडिया के जरिए या सड़कों पर जो लोग उन्हें व्यवस्था के खिलाफ उकसाते हैं, वे वास्तव में उनका इस्तेमाल केवल मोहरे की तरह करते हैं।

संसद की सुरक्षा में हुई सेंधमारी से लेकर हाल ही में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के उग्र विरोध प्रदर्शनों तक, हर जगह यही पैटर्न देखने को मिल रहा है। जब तक युवा सड़कों पर नारा लगाते हैं, तब तक वे इन आकाओं के काम आते हैं। लेकिन जैसे ही उन पर पुलिस की लाठी गिरती है, जेल के दरवाजे खुलते हैं और भविष्य दांव पर लगता है, तब उकसाने वाले तमाम लोग गायब हो जाते हैं।

संसद की सुरक्षा में सेंध: एक साजिश जिसे सामान्य बनाने की हुई कोशिश

13 दिसंबर 2023 की तारीख देश के इतिहास में एक काले दिन की तरह दर्ज है। 2001 के संसद आतंकी हमले की 22वीं बरसी पर सागर शर्मा और मनोरंजन डी नाम के दो युवक मैसूर के सांसद से जारी पास के आधार पर लोकसभा की दर्शक दीर्घा में पहुँचे। दोपहर ठीक 1 बजकर 1 मिनट पर वे सदन के भीतर कूद गए। उन्होंने अपने जूतों में छिपाकर रखे स्मोक कनस्तर से पीला धुआँ फैलाया और नारेबाजी की। उसी समय संसद परिसर के बाहर नीलम आजाद और अमोल शिंदे ने भी रंगीन धुआँ छोड़कर उपद्रव किया।

जो युवा उकसावे में आकर यह सोचते हैं कि वे जेल जाकर रातों-रात हीरो बन जाएँगे, उन्हें अदालत की शर्तों और हकीकत को देखना चाहिए। जब दिल्ली हाई कोर्ट से नीलम आजाद को जमानत मिली, तो उस पर सख्त पाबंदियाँ लगाई गईं। कोर्ट का स्पष्ट आदेश था कि वह मीडिया या सोशल मीडिया पर कोई बयान नहीं दे सकती, जाँच एजेंसी के सामने नियमित पेश होगी और बिना अनुमति दिल्ली से बाहर नहीं जाएगी। 2 जुलाई 2025 को जाकर कोर्ट ने शर्तों में ढील दी और उसे अपने गृह जिले हरियाणा के जींद जाने की अनुमति मिली।

इस केस में उन पर गंभीर धाराएँ लगाईं गईं, UAPA सहित कई प्रावधानों के तहत मामला दर्ज हुआ, लंबी पूछताछ हुई, चार्जशीट दाखिल हुई और महीनों तक अदालतों में जमानत के लिए लड़ाई चलती रही। आज भी वह मामला पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। उस समय सोशल मीडिया पर क्रांति के गीत गाने वाले अधिकांश लोग अब उस बहस में दिखाई नहीं देते, लेकिन जिन युवाओं ने वह कदम उठाया, वे अब भी कानूनी प्रक्रिया का सामना कर रहे हैं। यही लोकतंत्र की वास्तविकता है- नारे कुछ मिनट चलते हैं, मुकदमे कई वर्षों तक।

भाषण कोई देता है, भविष्य किसी और का बिगड़ता है

भारत में शायद ही कोई बड़ा आंदोलन ऐसा रहा हो जिसमें सबसे बड़ा कानूनी बोझ नेताओं ने उठाया हो। मंच से जोश भरे भाषण देने वाले नेता कैमरे बंद होने के बाद अपनी राजनीतिक यात्रा पर आगे बढ़ जाते हैं, लेकिन जिस छात्र ने बैरिकेड पार किया, जिसने पुलिस से धक्का-मुक्की की या जिसने भावनाओं में आकर कानून की सीमा लांघ दी, वही FIR में नामित होता है। वही अदालतों के चक्कर लगाता है, वही नौकरी के इंटरव्यू में अपने खिलाफ दर्ज मामलों का जवाब देता है, वही वर्षों तक जमानत और सुनवाई के बीच उलझा रहता है।

राजनीति में यह पैटर्न नया नहीं है, लेकिन सोशल मीडिया के दौर में यह और खतरनाक हो गया है। अब किसी युवा को ‘क्रांतिकारी’ घोषित करने में कुछ मिनट लगते हैं, लेकिन जब वही युवा कानूनी संकट में फँसता है तो उसकी मदद के लिए न सोशल मीडिया की भीड़ आती है और न मंच से भाषण देने वाले नेता। अदालत में लाइक्स और रीट्वीट नहीं चलते, वहाँ केवल कानून चलता है।

लोकतंत्र विरोध की आजादी देता है, लेकिन संस्थाओं पर दबाव बनाने की छूट नहीं

सरकार की आलोचना लोकतंत्र का आधार है। शिक्षा, रोजगार, पेपर लीक, भ्रष्टाचार या किसी भी सार्वजनिक मुद्दे पर आंदोलन करना नागरिकों का अधिकार है। लेकिन संसद की ओर बढ़ना, प्रतिबंधित क्षेत्र को राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन का मंच बना देना या यह संदेश देना कि संसद तक पहुँच जाना ही संघर्ष की अंतिम मंजिल है, लोकतांत्रिक संस्कृति के लिए स्वस्थ संकेत नहीं है। संसद केवल सांसदों की इमारत नहीं, बल्कि भारत की सर्वोच्च विधायी संस्था है।

2001 के आतंकी हमले के बाद इसकी सुरक्षा व्यवस्था इसलिए कठोर बनाई गई थी क्योंकि यह केवल एक भवन नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न भी है। यदि आज किसी एक आंदोलन के लिए संसद की सुरक्षा को चुनौती देना सामान्य बना दिया जाएगा, तो कल दूसरा संगठन भी यही करेगा और परसों तीसरा भी। इसका परिणाम यह होगा कि हर प्रदर्शन को सुरक्षा एजेंसियाँ संभावित खतरे की तरह देखेंगी और अंत में नुकसान शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक आंदोलनों का ही होगा।

कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का प्रोटेस्ट: वही पुराना मोहरा बनाने का खेल

संसद की सेंधमारी का मामला हो या फिर सड़कों पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) द्वारा किए जा रहे उग्र प्रदर्शन, युवाओं का इस्तेमाल करने का तरीका एक जैसा ही है। CJP के हालिया प्रदर्शनों में देखा गया कि कैसे युवाओं के हाथों में झंडे, डंडे, पत्थर थमाकर उन्हें पुलिस और आम जनता के सामने खड़ा कर दिया जाता है। प्रदर्शन के दौरान हिंसा होती है, पुलिसकर्मियों पर हमले किए जाते हैं और सरेआम कानून-व्यवस्था की धज्जियाँ उड़ाई जाती हैं।

CJP के नेता पीछे बैठकर अपना राजनीतिक एजेंडा सेट करते हैं और आगे की पंक्ति में साधारण परिवारों के युवाओं को धकेल दिया जाता है। जब पुलिस की तरफ हिंसा को रोकने के लिए वाटर कैनन और लाठियाँ चलती हैं, तो चोट इन युवाओं को लगती है। CJP या किसी भी उग्र संगठन के बड़े नेता कभी जेल की सलाखों के पीछे सड़ने नहीं जाते। आज कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन की तस्वीरें सबके सामने है। युवाओं को भड़काने ये खेल कैसे चलता है, इसे भी आप आज (21 जुलाई 2026) के ही उदाहरण से समझिए।

दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री और AAP के संयोजक अरविंद केजरीवाल CJP के प्रदर्शन में पहुँचे थे। उन्होंने इन आंदोलनकारी छात्रों से जिस तरह बात की वो बताता है कि नेता इन छात्रों को किसी भी हद तक जाने के लिए उकसा रहे हैं। उन्होंने कहा, “अब इस्तीफा धर्मेंद्र प्रधान का नहीं मोदी का इस्तीफा होना चाहिए। पुलिस ने प्रेस रिलीज दी है कि जो लोग आंदोलन में आए थे उन पर केस करेंगे, मैं मोदी को चैलेंज करता हूँ केस करके दिखा तेरे मैं दम है तो। आप लोग केस से मत डरना। बड़े से बड़ा वकील खड़ा कर देंगे। आप लोगों को छुड़ा के ले आएँगे। अपना डर निकाल दो। जिस दिन डर निकल गया उस दिन कोई आपको जीतने से नहीं रोक सकता।”

क्या आपको वाकई लगता है कि अगर यही छात्र कल संसद में घुस जाएँ, वहाँ वितंडा करें तो ये नेता उनके लिए खड़े होंगे? केस तो छोड़िए, दिपके से लेकर सौरव दास और विजेता दहिया तक या इस आंदोलन के सहारे युवाओं को भड़काने की कोशिश करने वाले कितने नेता आपको पुलिस से भिड़ते दिखे?

जिसने युवाओं को भड़काया, आंदोलन के ना पर उकसाया और अपनी माँगों को पूरा करने के लिए जोश भरा, वो ही इस प्रदर्शन में कहीं दिखने को नहीं मिला। पुलिस से हाथापाई करते, हिंसा का शिकार होते और अपने भविष्य को बर्बाद करते केवल और केवल युवा ही दिखाई दे रहे हैं, जिन्हें ये भी मालूम नहीं है कि ये साजिश रचने वाले आराम से कुर्सी पर बैठकर, हाथ में चाय का गिलास लेते हुए आपकी इस दशा को देखकर ठहाके मारकर हँस रहे हैं।

ऐसा भी नहीं है कि युवा इन्हें नहीं समझ रहे हैं। जो छात्र या युवा इन तिलचट्टों के समर्थन के लिए जंतर-मंतर पहुँचे थे, उन्होंने इनके तौर-तरीकों को देखकर इन्हें जमकर खरी खोटी भी सुनाई है। इस युवा प्रदर्शनकारी को देखिए। ये इस बात से बेहद खफा है कि कुछ लोगों ने इस आंदोलन को VIP बना दिया है। एक युवती इनके VIP रवैया से नाराज होकर पूछ रही है, “किसने लाठियाँ खाई हैं, यहाँ पर इतने लोगों को लाठियाँ पड़ी हैं। वहाँ पर इतने लोगों को मार पड़ी है। लेकिन वो सब किसने किया है।”

युवाओं के लिए सबसे बड़ा सबक: आंदोलन खत्म हो जाते हैं, लेकिन केस साथ चलता है

हर पीढ़ी में ऐसे युवा होते हैं जो व्यवस्था बदलना चाहते हैं। यह लोकतंत्र के लिए अच्छी बात है। लेकिन उतना ही जरूरी यह समझना भी है कि व्यवस्था बदलने और कानून तोड़ने में अंतर होता है। यदि कोई नेता आपको यह विश्वास दिला रहा है कि संसद की ओर बढ़ना ही लोकतांत्रिक संघर्ष का सबसे बड़ा प्रतीक है, तो पहले उससे यह भी पूछिए कि यदि आपके खिलाफ FIR हुई, यदि आपकी पढ़ाई प्रभावित हुई, यदि सरकारी नौकरी का सपना खतरे में पड़ा या वर्षों तक अदालतों के चक्कर लगाने पड़े, तो क्या वह आपके साथ खड़ा रहेगा? भारतीय राजनीति का इतिहास बताता है कि अधिकांश मामलों में इसका उत्तर ‘नहीं’ होता है।

आंदोलन नए आ जाते हैं, मुद्दे बदल जाते हैं, नेता नए भाषण देने लगते है लेकिन मुकदमे में फँसा युवा वहीं रह जाता है। इसलिए लोकतंत्र में सबसे बड़ा साहस बैरिकेड तोड़ना नहीं, बल्कि भावनाओं के बजाय विवेक से निर्णय लेना है। विरोध कीजिए, सवाल पूछिए, सरकार को कठघरे में खड़ा कीजिए, लेकिन किसी भी राजनीतिक रणनीति का मोहरा बनने से पहले यह जरूर सोचिए कि जब भीड़ छँट जाएगी और कैमरे चले जाएँगे, तब आपके साथ कौन खड़ा होगा। यही सवाल आज हर उस युवा को खुद से पूछना चाहिए, जिसे किसी भी मंच से संसद की ओर बढ़ने का आह्वान सुनाई देता है।

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