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NEET-UG पेपर लीक और कोचिंग माफिया, CBI ने सॉल्वर गैंग से जुड़े 45 के खिलाफ दाखिल की चार्जशीट: पढ़ें मेडिकल एंट्रेन्स टेस्ट की व्यवस्था कैसे की गई ध्वस्त

नीट परीक्षा लीक मामलों ने देश की शिक्षा प्रणाली और सुरक्षा पर बड़े सवाल खड़े किए हैं, जिससे अंदरूनी सूत्रों और कोचिंग माफिया के बीच फैले गहरे व्यावसायिक नेटवर्क का खुलासा हुआ है।

साल 2024 का NEET-UG पेपर लीक किसी एक व्यक्ति द्वारा प्रश्नपत्र से भरा ट्रंक खोल देने से शुरू नहीं हुआ था। केंद्रीय जाँच ब्यूरो (CBI) के अनुसार, यह एक ऐसे संगठित नेटवर्क का नतीजा था, जिसने एडमिशन कंसल्टेंट्स, करियर काउंसलिंग ऑपरेटरों, परीक्षा केंद्र के अधिकारियों, अभ्यर्थियों तक पहुँच बनाने वाले एजेंटों, सॉल्वर के रूप में नियुक्त MBBS छात्रों, गेस्ट हाउस संचालकों, ड्राइवरों, प्रिंटरों और वित्तीय बिचौलियों को एक-दूसरे से जोड़ रखा था।

दो साल बाद तरीका भले ही बदल गया, लेकिन जाँच एजेंसी के अनुसार इस पूरे कारोबारी तंत्र का अस्तित्व बना रहा। NEET-UG 2026 मामले में CBI ने कहा कि राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) द्वारा विषय विशेषज्ञ के रूप में नियुक्त लोगों ने गोपनीय प्रश्नों को निजी कोचिंग क्लासों और कोचिंग से जुड़े बिचौलियों के माध्यम से आगे पहुँचाया।

केमिस्ट्री के व्याख्याता पीवी कुलकर्णी को इस पूरे मामले में एक प्रमुख स्रोत बताया गया। जाँच के अनुसार, उनके घर पर आयोजित विशेष कक्षाओं के दौरान बताए गए प्रश्न 3 मई 2026 को आयोजित NEET-UG परीक्षा में पूछे गए प्रश्नों से मेल खाते थे।

ये दोनों मामले दिखाते हैं कि पेपर लीक को केवल सीलबंद प्रश्नपत्रों की आवाजाही में हुई चूक के रूप में नहीं देखा जा सकता। कोचिंग माफिया एक संगठित बाजार की तरह काम करता है।

यह ऐसे परिवारों की तलाश करता है जो पैसे देने को तैयार हों, गोपनीय जानकारी तक पहुँच रखने वाले अंदरूनी लोगों को खोजता है, प्रश्न हल करने या पढ़ाने में सक्षम लोगों की भर्ती करता है, उम्मीदवारों के रहने और आने-जाने की व्यवस्था करता है, पैसे और जरूरी दस्तावेज इकट्ठा करता है और परीक्षा शुरू होने से पहले ही उन्हें अनुचित लाभ पहुँचाने का काम करता है।

यहाँ कोचिंग माफिया शब्द का इस्तेमाल किया गया है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि देश के सभी कोचिंग संस्थान, शिक्षक या करियर काउंसलर परीक्षा से जुड़े अपराधों में शामिल हैं।

इस शब्द का उपयोग केवल उन संगठनों और व्यक्तियों के लिए किया गया है, जिन्होंने CBI के बयानों और अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार शिक्षा, काउंसलिंग या एडमिशन से जुड़े अपने नेटवर्क का इस्तेमाल अभ्यर्थियों की भर्ती करने और नकल या परीक्षा में धांधली कराने के लिए किया। ऑपइंडिया देशभर के पूरे कोचिंग नेटवर्क पर किसी भी तरह की आपराधिक गतिविधियों में शामिल होने का आरोप नहीं लगा रहा है।

पटना-हजारीबाग से जुड़े मुख्य मामले की शुरुआत शास्त्री नगर पुलिस स्टेशन में दर्ज एक FIR से हुई थी। इसके बाद 23 जून 2024 को यह मामला केंद्रीय जाँच ब्यूरो (CBI) को सौंप दिया गया, जहाँ एजेंसी ने एक नई FIR दर्ज की।

जाँच के दौरान CBI ने कुल 45 लोगों के खिलाफ कई चार्जशीट दाखिल कीं। इस रिपोर्ट को तैयार करने के लिए ऑपइंडिया ने मुख्य रूप से अदालत के आदेशों और FIR पर भरोसा किया है। इन सभी दस्तावेजों को लेख के अंत में उपलब्ध कराई गई एक ZIP फाइल में एक साथ जोड़ा गया है।

रिपोर्ट के मुताबिक, यह नेटवर्क 2024 की परीक्षा से पहले से था मौजूद

2024 के नीट पेपर लीक के घटनाक्रम उन दो लोगों द्वारा बनाई गई योजना से शुरू हुई जो 2015-16 से एक-दूसरे को जानते थे। CBI के अनुसार, मुख्य आरोपितों में से एक, अमित कुमार सिंह, राज कुमार सिंह उर्फ राजू सिंह को 2015-16 से जानता था।

दोनों कंसल्टेंसी या एजेंसी सेवाओं में काम करते थे जो प्रोफेशनल कोर्सेज में दाखिला दिलाने का काम करती थीं। पंकज कुमार उर्फ आदित्य उर्फ साहिल भी इसी क्षेत्र में काम करता था और 2021-22 के दौरान अमित के संपर्क में आया था।

जाँच एजेंसी ने अमित और रंजीत कुमार बेउरा उर्फ पिंटू के बीच एक पुराने जुड़ाव का भी जिक्र किया। बेउरा की जमानत कार्यवाही के दौरान, अभियोजन पक्ष ने कहा कि वे दोनों 2019 से एक-दूसरे को जानते थे और उसी साल ओडिशा यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चर एंड टेक्नोलॉजी परीक्षा में गड़बड़ी के एक मामले में गिरफ्तार हुए थे।

हालाँकि यह पुराना मामला नीट पेपर लीक से जुड़ा नहीं था, लेकिन यह इसलिए प्रासंगिक था क्योंकि CBI ने 2024 के इस ऑपरेशन को दाखिले और प्रतियोगी परीक्षाओं के इर्द-गिर्द पहले से बने संबंधों के विस्तार के रूप में पेश किया।

‘करियर एकेडमी एजुकेशन ट्रस्ट’ उम्मीदवारों की भर्ती करने वाले मुख्य चैनलों में से एक बन गया। यह 3 अगस्त 2023 को ओडिशा में रजिस्टर्ड हुआ था। बेउरा ने अदालत को बताया कि यह गरीब छात्रों को शैक्षिक सुविधाएँ और परामर्श प्रदान करने के लिए बनाया गया एक NGO था।

वहीं CBI का कहना था कि इसका इस्तेमाल नीट उम्मीदवारों की पहचान करने, उनके परिवारों से कमिटमेंट लेने और गारंटी के तौर पर असली शैक्षणिक सर्टिफिकेट और चेक इकट्ठा करने के लिए किया जाता था।

बेउरा को इस संगठन का मैनेजिंग डायरेक्टर बताया गया था। अमित प्रसाद महाराणा और धीरेन कुमार पांडा की पहचान इसके पदाधिकारियों के रूप में की गई थी। एजेंसी ने कहा कि अमित कुमार सिंह ने ओडिशा, बिहार, पश्चिम बंगाल, राजस्थान और मध्य प्रदेश से उम्मीदवारों का इंतजाम करने के लिए उनके और संजय कुमार के साथ मिलकर काम किया।

सत्रह उम्मीदवारों को हजारीबाग भेजा गया और उन्हें ‘राज गेस्ट हाउस’ या ‘सिंदूर’ स्थित एक घर में ठहराया गया। बाकी उम्मीदवार भुवनेश्वर या पटना में ही रहे। CBI ने उम्मीदवारों, कर्मचारियों और ड्राइवरों के बयानों का हवाला दिया।

एक उम्मीदवार ने करियर एकेडमी को अपने शैक्षणिक सर्टिफिकेट सौंपे थे। एक अन्य ने कहा कि महाराणा ने हल किया हुआ नीट पेपर शेयर किया था। भुवनेश्वर की एक उम्मीदवार ने बताया कि उसे एक होटल में प्रिंटेड कॉपी मिली थी और उसने पांडा की पहचान की थी।

एजेंसी ने कहा कि महाराणा ने स्कोर्पियो से उम्मीदवारों को लाने-ले जाने का काम किया, ‘होटल ट्रीफो पैलेस’ में एक प्रिंटर की व्यवस्था की और हल किए गए पेपर बांटे। CBI ने उसके खाते में 2 लाख रुपए और ‘चिरंजीवी मल्टीवेंचर प्राइवेट लिमिटेड’ (जिसमें वह डायरेक्टर था) द्वारा प्राप्त 12 लाख रुपए का हवाला दिया।

पांडा को करियर एकेडमी का ट्रेजरर बताया गया था और वह भी ट्रांसपोर्ट, होटल ट्रीफो पैलेस में पेपर बांटने और 12 लाख रुपए के भुगतान से जुड़ा हुआ था। CBI ने कहा कि गारंटी के तौर पर असली सर्टिफिकेट और चेक लिए गए थे। इससे आयोजकों को उम्मीदवारों और उनके परिवारों पर काफी दबाव बनाने का मौका मिल गया होगा।

अगली कड़ी परीक्षा प्रणाली के भीतर थी। जमालुद्दीन उर्फ जमाल हजारीबाग का एक पत्रकार था जो ‘प्रभात खबर’ से जुड़ा हुआ था और ओएसिस स्कूल द्वारा आयोजित कार्यक्रमों को नियमित रूप से कवर करता था।

गौरतलब है कि ओएसिस स्कूल वही परीक्षा केंद्र था जहाँ से प्रश्नपत्र चोरी हुआ था। CBI ने कहा कि इस वजह से वह प्रिंसिपल डॉ अहसानुल हक और वाइस-प्रिंसिपल मो इम्तियाज आलम के करीब आ गया।

एजेंसी ने 3 जून 2023 से 18 जून 2024 तक हक और जमालुद्दीन के बीच 814 कॉल्स का हवाला दिया। हालाँकि केवल कॉल की संख्या ही साजिश साबित करने के लिए काफी नहीं थी, लेकिन CBI ने इसका इस्तेमाल उनके निरंतर जुड़ाव को स्थापित करने के लिए किया।

एजेंसी के अनुसार, जमालुद्दीन ने अमित कुमार सिंह की मुलाकात हक और इम्तियाज से कराई थी। अमित ने बाद में पंकज कुमार को उनसे मिलवाया। CBI ने अमित, हक, इम्तियाज, जमालुद्दीन, पंकज, राजू सिंह और अमन कुमार सिंह की बैठकों का भी जिक्र किया।

अभियोजन पक्ष की व्यापक थ्योरी साफ थी, जमालुद्दीन ने बाहर के दाखिला नेटवर्क को उस सुरक्षित केंद्र को नियंत्रित करने वाले अधिकारियों से जोड़ा, जबकि अमित ने पंकज को उस दायरे में शामिल किया।

पेपर चोरी होने से पहले सॉल्वर और कैंडिडेट हुए इकट्ठा

एक कोरे प्रश्नपत्र का तब तक कोई खास व्यावसायिक मूल्य  नहीं था जब तक कि उसे जल्दी से हल करके पैसे देने वाले उम्मीदवारों तक न पहुँचाया जाए। CBI ने कहा कि कम से कम तीन सॉल्वर ग्रुप्स  को हजारीबाग लाया गया था। इसके कई सदस्य MBBS छात्र थे।

संजय कुमार को उस व्यक्ति के रूप में बताया गया जिसने सॉल्वर, लाभार्थियों, परिवहन और लॉजिस्टिक्स की व्यवस्था की थी। अभियोजन पक्ष ने कहा कि उसने AIIMS पटना के छात्र चंदन सिंह से पढ़ाई में अच्छे मेडिकल छात्रों को भर्ती करने के लिए कहा था।

पटना ग्रुप में चंदन सिंह, कुमार शानू, राहुल आनंद, करण जैन, सुरभि कुमारी, रौनक राज और अमित कुमार शामिल थे। अमित अपने कॉलेज के साथी सनोज कुमार यादव को लाया था, हालाँकि CBI ने कहा कि सनोज पेपर हल करने के लिए ‘राज गेस्ट हाउस’ के अंदर नहीं गया था।

इन छात्रों से पहले ‘इम्पर्सनेशन’ (दूसरों के स्थान पर परीक्षा देने यानी डमी कैंडिडेट बनने) के लिए संपर्क किया गया था। CBI ने कहा कि संजय चंदन, कुमार शानू, राहुल आनंद और करण जैन को एम्स पटना के पास एक फोटो स्टूडियो में ले गया।

नीट आवेदनों के लिए उनकी तस्वीरें ली गईं। रौनक राज और अमित कुमार ने व्हाट्सएप के जरिए तस्वीरें और सिग्नेचर भेजे। डमी-कैंडिडेट की योजना को बाद में छोड़ दिया गया, लेकिन इन्हीं नए लोगों को सॉल्वर के रूप में फिर से काम सौंप दिया गया।

राजस्थान ग्रुप का संबंध अमित कुमार सिंह से था। CBI ने कहा कि उसने फरवरी 2024 में भरतपुर की यात्रा की और कुमार मंगलम विश्नोई, दीपेंद्र शर्मा और अन्य मेडिकल छात्रों से मुलाकात की।

श्री जगन्नाथ पहाड़िया सरकारी मेडिकल कॉलेज के MBBS छात्र कुमार मंगलम ने एक ग्रुप का इंतजाम किया, जिसमें दीपेंद्र शर्मा, संदीप कुमार, सुरेश कुमार और इशिता शामिल थे। इनसे भी शुरुआत में संभावित डमी उम्मीदवारों के रूप में संपर्क किया गया था। कुमार मंगलम ने बाद में ट्रेन टिकटों की व्यवस्था की और ग्रुप के सदस्यों को हजारीबाग लेकर आया।

यह ऑपरेशन परीक्षा से एक सप्ताह से भी अधिक समय पहले लोगों को एक जगह से दूसरी जगह भेजने लगा था। 26 अप्रैल की रात को संजय कुमार, चंदन सिंह, कुमार शानू और राहुल आनंद गंगा दामोदर एक्सप्रेस से पटना से रवाना हुए और कोडरमा पहुँचे।

सुरभि कुमारी रांची से अलग आई थी। यह ग्रुप पहले ‘रैमसन होटल’ और फिर ‘होटल तारा टॉवर’ में रुका। बुकिंग संजय और कुमार अभिषेक द्वारा की गई थी।

अमित कुमार 2 मई को चेन्नई से रांची गया और अगले दिन कोडरमा पहुँचा। रौनक राज मुंबई से आया था। करण जैन ने कुमार अभिषेक द्वारा बुक किए गए टिकट पर पटना से यात्रा की। 3 मई को पटना ग्रुप हजारीबाग के ‘होटल श्री विनायक’ में शिफ्ट हो गया।

उनका इतनी जल्दी आना CBI के इस दावे का समर्थन करता है कि उन्हें गोपनीय सामग्री की उम्मीद में पहले से ही वहाँ तैनात किया गया था। अभियोजन पक्ष ने कहा कि तैयारियाँ ओएसिस स्कूल के भीतर भी चल रही थीं।

इम्तियाज आलम की जमानत कार्यवाही में इसके जवाबी हलफनामे में कहा गया कि 3 मई को कंट्रोल रूम में एक टूलकिट बैग रखा गया था। बाद में इन टूल्स का इस्तेमाल NTA ट्रंक के पीछे के कब्जों से छेड़छाड़ करने, उसकी पैकेजिंग खोलने और पेपर की फोटो खींचने के बाद उसे वापस वैसे ही ठीक करने के लिए किया गया था।

इम्तियाज आलम के जमानत आदेश में शामिल CBI के जवाबी हलफनामे के अनुसार, आलम ने 3 मई को कंट्रोल रूम में टूलकिट बैग रखा था। एजेंसी ने कहा कि पंकज ने बाद में ट्रंक को खोलने और उसे वापस ठीक करने के लिए उन टूल्स का इस्तेमाल किया।

उम्मीदवारों का 3 और 4 मई को हजारीबाग में जुटना शुरू हो गया था। बेउरा करियर एकेडमी के कर्मचारी देबाशीष पाणिग्रही और ड्राइवर रंजन सेठी उर्फ मानस के साथ एक एमजी हेक्टर गाड़ी से पहुँचा था।

इस गाड़ी का इस्तेमाल उम्मीदवारों को लाने-ले जाने के लिए किया गया था। बेउरा ‘एके इंटरनेशनल होटल’ में रुका। ओडिशा के उम्मीदवारों को राज गेस्ट हाउस और सिंदूर भेजा गया।

राजू सिंह राज गेस्ट हाउस का प्रबंधन करता था। CBI ने कहा कि इस परिसर को जानबूझकर खाली और उपलब्ध रखा गया था। खाने-पीने की व्यवस्था की गई थी और उम्मीदवारों व सॉल्वरों को लाने-ले जाने के लिए गाड़ियों का इस्तेमाल किया गया था।

राजू ने अपना पक्ष रखा कि उसने केवल कमरे किराए पर दिए थे और उसे इसके पीछे का मकसद नहीं पता था। पटना हाई कोर्ट ने शुरुआत में अभियोजन पक्ष के इस मामले का हवाला देते हुए जमानत देने से इनकार कर दिया था कि उम्मीदवारों को तैयार करने के लिए जानबूझकर गेस्ट हाउस उपलब्ध कराया गया था।

पटना में सिकंदर यादवेन्दु ने अखिलेश कुमार, अवधेश कुमार, शिवनंदन कुमार और उम्मीदवार अनुराग यादव के साथ तालमेल बिठाया। CBI ने कहा कि उनसे 4 मई को रात करीब 10:30 बजे सेंट करेन्स हाई स्कूल के पास उम्मीदवारों को लाने के लिए कहा गया था।

उस रात तक इस नेटवर्क की अलग-अलग शाखाएँ अपनी-अपनी जगह पर तैनात थीं, स्कूल के भीतर के अंदरूनी लोग, पास के होटलों में सॉल्वर, गेस्ट हाउसों और निजी परिसरों में उम्मीदवार, और गाड़ियाँ, प्रिंटर व ठहरने की जगह पूरी तरह तैयार थीं।

5 मई को पेपर कैसे निकाला और बांटा गया

सुबह लगभग 5:30 बजे, चंदन सिंह, राहुल आनंद, सुरभि कुमारी और करण जैन एक काले रंग की हुंडई क्रेटा कार में ‘होटल श्री विनायक’ से निकले और ‘राज गेस्ट हाउस’ पहुँचे। उनके पीछे-पीछे कुमार शानू, अमित कुमार और रौनक राज भी वहाँ पहुँचे।

CBI ने कहा कि सनोज कुमार यादव को छोड़कर पटना सॉल्वर ग्रुप का हर सदस्य चोरी का पेपर आने से पहले ही गेस्ट हाउस के अंदर मौजूद था। मोबाइल लोकेशन, ट्रैवल रिकॉर्ड और गवाहों की पहचान के जरिए राजस्थान ग्रुप के दीपेंद्र शर्मा और संदीप कुमार की मौजूदगी भी वहीं पाई गई।

2024 में NEET का पेपर कैसे लीक हुआ।

सुबह लगभग 7:40 बजे, ओएसिस स्कूल के प्रिंसिपल अहसानुल हक ने हजारीबाग में SBI के एक वॉल्ट से नीट के प्रश्नपत्रों से भरे दो ट्रंक लिए। हक NTA के सिटी कोऑर्डिनेटर भी थे। ये ट्रंक सेंटर सुपरिटेंडेंट और वाइस-प्रिंसिपल इम्तियाज आलम को सौंप दिए गए, जो सुबह लगभग 7:53 बजे स्कूल पहुँचे और उन्हें कंट्रोल रूम में रख दिया।

CBI ने पैकेजिंग चेन के जरिए चोरी हुई बुकलेट का पता लगाया। ट्रंक संख्या 13093 में 13560 से 13563 तक के बंच थे। बंच 13560 में पैकेट नंबर 38988, 38989 और 38990 शामिल थे।

पैकेट 38990 में 6136465 से 6136488 तक नंबर वाली 24 बुकलेट थीं। बुकलेट संख्या 6136488 की पहचान उस मूल कॉपी के रूप में की गई जिसकी स्कूल के अंदर नकल की गई थी।

पंकज कुमार ओएसिस स्कूल पहुँचा और उसने गार्ड रोहित राम से कहा कि वह इनोवेटिव व्यू का प्रतिनिधि है और इम्तियाज आलम से मिलने आया है। रोहित ने आलम को आवाज लगाई, जो प्रिंसिपल के ऑफिस के पास खड़े थे।

CBI ने कहा कि आलम ने इशारा किया कि पंकज को अंदर आने दिया जाए। इसके बाद पंकज स्टाफ रूम में बैठ गया। गौर करने वाली बात यह है कि ‘इनोवेटिव व्यू’ परीक्षा केंद्रों पर तैनात की गई आधिकारिक सुरक्षा और बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन एजेंसी थी।

यह स्पष्ट नहीं है कि पंकज वास्तव में उस कंपनी का प्रतिनिधित्व कर रहा था या उसने स्कूल में प्रवेश करने के लिए केवल उसके नाम का इस्तेमाल किया था। स्कूल के कर्मचारियों मोहम्मद शाकिब खान और सादुल हसन ने ध्यान दिया कि वह बाहरी व्यक्ति काफी समय से वहाँ रुका हुआ है।

शाकिब ने इसकी जानकारी आलम को और बाद में हक को दी। सादुल ने भी यह मुद्दा उठाया। CBI द्वारा उद्धृत बयानों के अनुसार, आलम इस पर चिढ़ गए और उन्होंने कर्मचारियों से कहा कि वे इस मामले को उन पर छोड़ दें। शाकिब और सादुल ने बाद में मजिस्ट्रेट के सामने बयान दिए। शाकिब ने एक टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड में पंकज की पहचान भी की।

सुबह 8:02 बजे, पंकज ने दूसरे दरवाजे से कंट्रोल रूम में प्रवेश किया। CBI ने कहा कि उसने ट्रंक 13093 के पिछले कब्जों से छेड़छाड़ करने के लिए टूलकिट का इस्तेमाल किया, बंच 13560 को बाहर निकाला और पैकेट 38990 को खोला। उसने बुकलेट 6136488 को चुना, उसके प्लास्टिक रैपिंग को काटा और एक पेंसिल की मदद से पेपर की सील को खोल दिया।

जाँच एजेंसी ने कहा कि पंकज ने एक आईफोन 13  से पहले और आखिरी पन्ने को छोड़कर हर पेज की फोटो खींची, जिसके बारे में CBI का कहना है कि इसका इस्तेमाल इस पूरे ऑपरेशन में किया गया था। उसने किसी दूसरे व्यक्ति की पहचान का इस्तेमाल करके एक सिम कार्ड भी हासिल किया था।

उसने बुकलेट को वापस पैकेट में रख दिया, बंच को ठीक किया और ट्रंक को दोबारा सील करने की कोशिश की। इस प्रक्रिया के दौरान हटाई गई प्लास्टिक की पट्टियों को टूलकिट बैग के अंदर रख दिया गया, जिसे एक अलमारी के पास छिपा दिया गया था।

CBI ने कहा कि अस्त-व्यस्त हो चुकी टेबल क्लॉथ को स्कूल के CCTV फुटेज में देखा जा सकता था। बाद में इन औजारों को जब्त कर लिया गया और पंकज ने CBI की कस्टडी में इस पूरी प्रक्रिया को दोबारा करके दिखाया।

पंकज सुबह करीब 9:23 बजे कंट्रोल रूम से बाहर निकला और करीब 9:24 बजे स्कूल परिसर से चला गया। परीक्षा दोपहर 2 बजे शुरू होने वाली थी। इस नेटवर्क के पास फोटो भेजने, पेपर हल करने, पढ़ने योग्य कॉपियाँ तैयार करने और उम्मीदवारों को उनके केंद्रों तक पहुँचाने के लिए पाँच घंटे से भी कम का समय था।

खींची गई तस्वीरों को राज गेस्ट हाउस भेजा गया। सॉल्वरों को विषयों के हिसाब से बांट दिया गया। कुमार शानू, दीपेंद्र शर्मा और संदीप कुमार को बायोलॉजी का जिम्मा सौंपा गया था। सुरभि कुमारी और रौनक राज ने केमिस्ट्री को संभाला।

चंदन सिंह, राहुल आनंद और अमित कुमार ने फिजिक्स का पेपर हल किया। करण जैन को कठिन या अधिक समय लेने वाले प्रश्न दिए गए थे। चंदन को पटना ग्रुप के लीडर और कुमार मंगलम को राजस्थान ग्रुप के लीडर के रूप में बताया गया।

एक बार जवाब तैयार हो जाने के बाद चंदन और सुरभि को नीचे ले जाया गया ताकि वे उम्मीदवारों को जवाब समझा सकें और उनके संदेह दूर कर सकें। अन्य सॉल्वर भी उनके साथ शामिल हो गए। CBI ने कहा कि जवाब याद कर लेने के बाद हल की गई कॉपियों को नष्ट करने का आदेश दिया गया था।

इसके बाद सॉल्वर वापस होटल श्री विनायक आ गए, जहाँ संजय कुमार और सनोज कुमार यादव उनका इंतजार कर रहे थे। एजेंसी ने सनोज के बयानों पर भरोसा किया, जिसमें ग्रुप के सदस्यों ने आपस में बातचीत के दौरान कहा था कि उन्होंने पेपर हल कर लिया है।

पंकज ने हल की गई सामग्री की PDF बनाई और उन्हें सिंदूर, एके इंटरनेशनल होटल, बोकारो, भुवनेश्वर और पटना में मौजूद हैंडलर्स को भेज दिया। शशिकांत पासवान ने सिंदूर ब्रांच को संभाला। एक कॉपी अमित कुमार सिंह के भाई अमन कुमार सिंह द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले व्हाट्सएप नंबर पर भेजी गई थी।

भुवनेश्वर में पंकज के भाई घनश्याम से जुड़े हैंडलर्स ने दो इलेक्ट्रीशियन, गौतम और विकास के साथ मिलकर काम किया। 2024 के इस लीक मामले में CBI की जाँच के दौरान ‘करियर एकेडमी’ सबसे व्यापक रूप से दर्ज किए गए उम्मीदवार-भर्ती और लॉजिस्टिक्स चैनलों में से एक बनकर उभरी।

पटना ब्रांच को हल किए गए विषय अलग-अलग मिले। द इंडियन एक्सप्रेस द्वारा समीक्षा की गई CBI की चार्जशीट के अनुसार, बलदेव कुमार उर्फ चिंटू को सुबह 10:50 बजे व्हाट्सएप पर हल किया हुआ बायोलॉजी का पेपर मिला।

केमिस्ट्री का पेपर सुबह 11:05 बजे और फिजिक्स का पेपर सुबह 11:40 बजे आया। यह क्रम दर्शाता है कि जैसे ही संबंधित सॉल्वर ग्रुप ने अपना हिस्सा पूरा किया, वैसे ही प्रत्येक सेक्शन को आगे भेज दिया गया।

बलदेव और नीतीश कुमार ने कथित तौर पर खेमनीचक के ‘लर्न प्ले स्कूल’ में 15 सेट प्रिंट किए। नीतीश अपने साथ एक ब्रदर  प्रिंटर और एक डेल लैपटॉप लेकर आया था। करीब 30 से 32 उम्मीदवारों को दो या तीन के समूहों में इकट्ठा किया गया था।

चार्जशीट के विवरण के अनुसार प्रिंटिंग और वितरण के दौरान बलदेव, पिंटू कुमार, नीतीश कुमार, अभिमन्यु पटेल, आशुतोष कुमार और मनीष प्रकाश उसी परिसर में मौजूद थे। लर्न प्ले स्कूल लीक हुए पेपर नेटवर्क की पटना ब्रांच के लिए वितरण और जवाब याद कराने का एक प्रमुख केंद्र था।

नीतीश हल की गई बायोलॉजी की कॉपियाँ प्रतिभा कॉलोनी स्थित अपने आवास पर भी ले गया, जहाँ सात महिला उम्मीदवारों को रखा गया था। कृष्णनंदन के बेटे आशुतोष कुमार को एक कैंडिडेट एजेंट के रूप में बताया गया जो राशि सिंह को वहाँ लेकर आया था। CCTV फुटेज में नीतीश को उसे हल किए गए पेपर्स के सेट देते हुए देखा गया था।

जाँचकर्ताओं ने कहा कि परीक्षा शुरू होने से काफी पहले, सुबह 11:23 बजे के टाइमस्टैम्प के साथ लीक हुए पेपर का एक पेज नीतीश के फोन पर पाया गया था। दोपहर करीब 12:30 बजे लर्न प्ले स्कूल और नीतीश के आवास पर मौजूद उम्मीदवारों को अपने-अपने केंद्रों के लिए निकलने को कहा गया। उनकी तलाशी  ली गई ताकि कोई भी प्रिंटेड कॉपी उनके साथ बाहर न जा सके।

पुलिस इंटरसेप्शन जिसने रैकेट का किया पर्दाफाश

दुपहर लगभग 2:05 बजे, शास्त्री नगर पुलिस स्टेशन के तत्कालीन SHO इंस्पेक्टर अमर कुमार को सूचना मिली कि एक संगठित गिरोह ने NEET प्रश्नपत्र की सुरक्षा शृंखला को तोड़ दिया है। उन्हें यह भी बताया गया कि इस नेटवर्क के सदस्य रजिस्ट्रेशन नंबर JH01BW0019 वाली एक सफेद रेनॉल्ट डस्टर कार में घूम रहे हैं।

पुलिस ने राजवंशी नगर मोड़ के पास डस्टर गाड़ी को रोका और सिकंदर यादवेन्दु, अखिलेश कुमार व बिट्टू कुमार को हिरासत में ले लिया। गाड़ी की आगे की सीट के पास से चार फोटोकॉपी किए गए एडमिट कार्ड मिले। ये एडमिट कार्ड अभिषेक कुमार, शिवनंदन कुमार, आयुष राज और अनुराग यादव के थे। सिकंदर के पास से दो फोन भी बरामद किए गए।

कैसे कुछ लोगों के नेटवर्क ने इस लीक में अपनी भूमिका निभाई।

FIR के अनुसार, सिकंदर ने उम्मीदवारों के इंतजाम के सिलसिले में ‘संजीव सिंह’, रॉकी, नीतीश और अमित आनंद का जिक्र किया। पुलिस ने बरामद एडमिट कार्ड का इस्तेमाल परीक्षा केंद्रों की पहचान करने के लिए किया और उम्मीदवारों को हिरासत में लेने के लिए परीक्षा के खत्म होने का इंतजार किया।

आयुष राज BSEB कॉलोनी के डीएवी पब्लिक स्कूल में परीक्षा दे रहा था। FIR के मुताबिक, उसने बताया कि उसे और लगभग 20 से 25 छात्रों को ‘लर्न बॉयज हॉस्टल’ और ‘लर्न प्ले स्कूल’ ले जाया गया था, जहाँ उन्हें हल किए गए प्रश्न दिए गए और उन्हें याद करने के लिए कहा गया। उसने यह भी कहा कि परीक्षा में आए प्रश्न उपलब्ध कराई गई सामग्री से मेल खाते थे। पुलिस ने उसका एडमिट कार्ड, टेस्ट बुकलेट और पहचान दस्तावेज जब्त कर लिए।

इसके बाद जाँचकर्ताओं ने लर्न प्ले स्कूल की तलाशी ली और छत से नीट पेपर के आधे जले और गीले टुकड़े बरामद किए। CBI ने बाद में कहा कि इन टुकड़ों की मदद से वे लीक के तार ओएसिस स्कूल को आवंटित की गई बुकलेट से जोड़ने में कामयाब रहे। इस बरामदगी  ने पटना के वितरण केंद्र को हजारीबाग के पेपर से जोड़ दिया।

अपना काम पूरा करने के बाद, चंदन सिंह, कुमार शानू, राहुल आनंद, अमित कुमार और करण जैन को कुमार अभिषेक और टिंकू कुमार द्वारा हजारीबाग टाउन रेलवे स्टेशन ले जाया गया। वे वंदे भारत एक्सप्रेस में सवार हुए और रात लगभग 10 बजे पटना पहुँचे।

इस तरह मात्र एक दिन के भीतर, सॉल्वर सूर्योदय से पहले राज गेस्ट हाउस में दाखिल हुए, सुबह 8 बजे के बाद पेपर की कॉपी की गई, सुबह 11:40 बजे तक विषय-वार उत्तर पटना पहुँच गए और दोपहर 12:30 बजे तक उम्मीदवार अपने केंद्रों के लिए रवाना हो चुके थे।

मुख्य ऑर्गनाइजर और उनकी बताई गई भूमिकाएँ

CBI ने किसी एक व्यक्ति को इस पूरे नेटवर्क की हर शाखा के नियंत्रक के रूप में चिन्हित नहीं किया। जाँच एजेंसी का मामला एक बहुस्तरीय ऑपरेशन को दर्शाता है, जिसमें अलग-अलग लोगों ने परीक्षा केंद्र तक पहुँच, उम्मीदवारों की भर्ती, पेपर हल करने, वितरण और पैसों के लेनदेन को संभाला।

अमित कुमार सिंह उस चेहरे के रूप में उभरता है जिसने सबसे अधिक शाखाओं को आपस में जोड़ा था। CBI ने कहा कि वह दाखिला व्यवसाय के जरिए राजू सिंह को जानता था, उसने ही पंकज को ओएसिस स्कूल के अधिकारियों के संपर्क में लाया, उम्मीदवारों की व्यवस्था करने वालों के साथ काम किया और पटना व राजस्थान दोनों सॉल्वर ग्रुप्स को जोड़ा।

कुमार मंगलम और दीपेंद्र शर्मा को रांची में अमित से जुड़े एक फ्लैट में ठहराया गया था। एजेंसी ने यह भी कहा कि कुमार मंगलम को रत्ना खान के एक खाते से 2.4 लाख रुपए मिले थे, जिसे अमित ऑपरेट करता था। अमित ने इस फ्लैट, भुगतान और मुलाकातों के दावों का खंडन किया। उसके घर की तलाशी में कोई आपत्तिजनक सामग्री नहीं मिली।

पंकज कुमार को सुरक्षित परीक्षा केंद्र और बाहरी नेटवर्क के बीच की ऑपरेशनल कड़ी बताया गया था। CBI ने उस पर टूल्स और आईफोन खरीदने, झूठी पहचान बताकर ओएसिस स्कूल में प्रवेश करने, ट्रंक खोलने, पेपर की फोटो खींचने और हल किए गए PDF भेजने का आरोप लगाया।

एजेंसी ने उसे हजारीबाग, बोकारो, पटना और भुवनेश्वर में उम्मीदवारों के ठिकानों के साथ-साथ उसके भाई घनश्याम के खाते के जरिए ट्रांसफर किए गए पैसों से भी जोड़ा। पंकज ने इन आरोपों से इनकार किया।

हाई कोर्ट ने उसकी हिरासत की अवधि और अन्य आरोपितों के साथ समानता पर विचार करने के बाद मई 2025 में उसे जमानत दे दी। हालाँकि इस आदेश ने उसे आरोपों से बरी नहीं किया।

राकेश रंजन उर्फ रॉकी को पटना वितरण ऑपरेशन के मुख्य सरगनाओं में से एक बताया गया था। उसकी शाखा ही ‘लर्न प्ले स्कूल’, उम्मीदवारों को इकट्ठा करने, प्रिंटर, लैपटॉप और स्थानीय स्तर पर पेपर पहुँचाने का प्रबंधन करती थी।

बलदेव को विषय-वार फाइलें मिली थीं। नीतीश ने उपकरणों की व्यवस्था की और पेपर्स को अपने आवास पर ले गया। रॉकी ने इस मामले में अपनी संलिप्तता से इनकार किया और बाद में उसे जमानत मिल गई।

राजू सिंह ने राज गेस्ट हाउस उपलब्ध कराया और खाने-पीने व गाड़ियों का इंतजाम किया। उसका कहना था कि उसने केवल कमरे किराए पर दिए थे। उसकी पहली जमानत याचिका खारिज कर दी गई थी, लेकिन कस्टडी में डेढ़ साल से अधिक का समय बिताने के बाद फरवरी 2026 में उसे जमानत मिल गई।

हाईकोर्ट ने संज्ञान लिया कि अभी तक आरोप तय नहीं हुए हैं और अभियोजन पक्ष ने 589 गवाहों की सूची पेश की है। जमालुद्दीन को उस मध्यस्थ के रूप में बताया गया जिसने दाखिला नेटवर्क की मुलाकात हक और इम्तियाज से कराई थी।

हक और इम्तियाज ही उस सुरक्षित केंद्र के लिए जिम्मेदार अधिकारी थे। CBI ने कहा कि पंकज के प्रवेश को आसान बनाया गया, स्टाफ के विरोध के बावजूद उसकी मौजूदगी को नजरअंदाज किया गया और कंट्रोल रूम तक उसकी पहुँच सुनिश्चित की गई। दोनों ने इस मामले में शामिल होने से इनकार किया और अभियोजन पक्ष के घटनाक्रम पर सवाल उठाए।

‘करियर एकेडमी’ ने उम्मीदवारों का एक व्यवस्थित नेटवर्क प्रदान किया। बेउरा, महाराणा और पांडा ने उम्मीदवारों की भर्ती की, सर्टिफिकेट या चेक इकट्ठा किए, यात्रा, ठहरने और गाड़ियों की व्यवस्था की और हजारीबाग व भुवनेश्वर में पेपर बांटे।

संजय कुमार ने उम्मीदवारों और सॉल्वरों का इंतजाम किया। चंदन सिंह को पटना सॉल्वर ग्रुप के हेड के रूप में बताया गया। सिकंदर यादवेन्दु ने माता-पिता और उम्मीदवारों को पटना के हैंडलर्स से जोड़ा।

अलग गोधरा नेटवर्क ने OMR शीट को बनाया निशाना

गोधरा मामले में एक अलग तरीका अपनाया गया था। यह पेपर चुराने और उम्मीदवारों को जवाब याद कराने पर निर्भर नहीं था। CBI ने कहा कि कोचिंग से जुड़े एक नेटवर्क ने एक परीक्षा केंद्र को अपने नियंत्रण में लेने का प्रयास किया था ताकि उम्मीदवारों के जाने के बाद चुनिंदा OMR शीटों पर सही उत्तर भरे जा सकें।

इस मामले में तुषार रजनीकांत भट्ट, परशुराम बिंदनाथ रॉय, आरिफ नूर मोहम्मद वोरा, विभोर उमेश्वर प्रसाद सिंह आनंद, पुरुषोत्तम शर्मा और दीक्षित कांतिभाई पटेल को नामजद किया गया था।

तुषार भट्ट ‘ज्ञान मंदिर करियर इंस्टीट्यूट’ में काम करता था, जो एक निजी कोचिंग संस्थान था। CBI ने कहा कि उसे ‘जय जलाराम स्कूल’ में एक शिक्षक और पर्यवेक्षक के रूप में पेश किया गया था ताकि उसे डिप्टी सेंटर सुपरिटेंडेंट नियुक्त किया जा सके। स्कूल के प्रिंसिपल और NTA के सिटी कोऑर्डिनेटर पुरुषोत्तम शर्मा ने इस नियुक्ति को आसान बनाया।

दीक्षित पटेल ‘जय जलाराम एजुकेशन ट्रस्ट’ का चेयरमैन था, जो परीक्षा केंद्रों के रूप में इस्तेमाल किए जाने वाले इन स्कूलों को चलता था। अभियोजन पक्ष ने कहा कि उसने केंद्रों और अधिकारियों की व्यवस्था करने में भाग लिया था। उसके वकीलों ने कहा कि वे नियुक्तियाँ NTA द्वारा की गई थीं और उसकी संलिप्तता से इनकार किया।

CBI ने कहा कि एजेंटों ने उम्मीदवारों को निर्देश दिया था कि वे पंचमहल या वडोदरा में अपने वर्तमान पते दर्ज करें, गोधरा को अपने परीक्षा शहर के रूप में चुनें और गुजराती को माध्यम के रूप में चुनें।

इसका उद्देश्य यह संभावना बढ़ाना था कि उन्हें इस नेटवर्क के प्रभाव वाले केंद्रों में आवंटित किया जाए। उम्मीदवारों से कहा गया था कि वे केवल उन्हीं प्रश्नों के उत्तर दें जो वे जानते हैं और बाकी को खाली छोड़ दें। इसके बाद उनकी OMR शीट पर सही विकल्प भर दिए जाते हैं। परिवारों से 20 लाख रुपए से 25 लाख रुपए के बीच भुगतान करने को कहा गया था।

‘ऑपइंडिया’ द्वारा प्राप्त गुजरात हाई कोर्ट के आदेश में NEET-UG 2023 से संबंधित बयानों को भी दर्ज किया गया था। विष्णु शर्मा नाम के एक गवाह ने कहा कि उसने तीन रिश्तेदारों के लिए इस नेटवर्क से संपर्क किया था।

बयान के अनुसार, दीक्षित पटेल ने प्रति उम्मीदवार 10 लाख रुपए एडवांस माँगे थे। शर्मा ने कहा कि उसने परीक्षा के दिन तुषार भट्ट को 20 लाख रुपए का भुगतान किया था। भट्ट ने बाद में 25 लाख रुपए और माँगे और दावा किया कि काम पूरा हो चुका है।

गवाह ने यह भी कहा कि भट्ट को अपनी तस्वीर भेजने के बाद उसे 2023 में एक इनविजिलेटर के रूप में नियुक्त किया गया था। अभियोजन पक्ष ने इस बयान के आधार पर तर्क दिया कि कोचिंग और स्कूल नेटवर्क ने परीक्षा स्टाफ को प्रभावित करने के तरीके पहले ही विकसित कर लिए थे।

दीक्षित पटेल ने इस सामग्री को चुनौती दी और कहा कि यह उसे 2024 के अपराध से नहीं जोड़ती है। हाई कोर्ट ने अप्रैल 2026 में उसे बरी करने से इनकार कर दिया और माना कि यह सामग्री गंभीर संदेह पैदा करती है जिसके लिए मुकदमा जरूरी है।

संजीव मुखिया पर शक था, लेकिन CBI ने उसके खिलाफ चार्जशीट फाइल नहीं की

संजीव कुमार सिंह उर्फ संजीव मुखिया शुरुआती जाँच के दौरान सबसे ज्यादा चर्चा में रहने वाले नामों में से एक बन गया था। बिहार की आर्थिक अपराध इकाई (EOU) ने उसे एक अंतर-राज्यीय सॉल्वर गिरोह के संदिग्ध सरगना के रूप में वर्णित किया था।

रिपोर्टों में कहा गया था कि जाँचकर्ताओं का मानना था कि कई राज्यों के परीक्षा-लीक नेटवर्क में उसके संपर्क थे। लगभग 11 महीनों तक फरार रहने के बाद, आखिरकार 25 अप्रैल 2025 को EOU ने उसे पटना के सगुना मोड़ के पास से गिरफ्तार कर लिया। बिहार सरकार ने उसकी गिरफ्तारी में मदद करने वाली जानकारी देने पर 3 लाख रुपए के इनाम की घोषणा की थी।

चूँकि बिहार जाँच के दौरान उसका नाम सामने आया था, इसलिए CBI ने उसे अपनी हिरासत में ले लिया। शुरुआती रिपोर्टों में कहा गया था कि उससे अंतर-राज्यीय संपर्कों और लॉजिस्टिक्स के बारे में पूछताछ की गई थी।

NEET मामले में अगस्त 2025 में मुखिया को डिफॉल्ट बेल मिल गई क्योंकि CBI ने 90 दिनों के भीतर उसके खिलाफ चार्जशीट दाखिल नहीं की थी। हालाँकि वह बिहार पुलिस के अन्य मामलों में हिरासत में ही रहा।

23 जुलाई 2026 को, CBI ने स्पष्ट किया कि उसे NEET-UG 2024 पेपर की चोरी या आगे के वितरण से जोड़ने वाला कोई सबूत नहीं मिला है। जाँच एजेंसी ने कहा कि उसने इसमें शामिल लोगों की पहचान कर ली है और 45 आरोपितों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल कर दी है। मुखिया उन आरोपितों में शामिल नहीं था।

बिहार के जाँचकर्ताओं को शुरुआत में संजीव मुखिया पर 2024 के लीक का नेतृत्व करने का संदेह था, लेकिन CBI ने बाद में कहा कि उसे पेपर चोरी या वितरण में उसकी भूमिका का कोई सबूत नहीं मिला और उसने उसके खिलाफ कोई चार्जशीट दाखिल नहीं की।

2024 का मामला कैसे राष्ट्रीय संकट बन गया

पटना का यह मामला एक गाड़ी, चार एडमिट कार्ड और ‘लर्न प्ले स्कूल’ से जुड़े उम्मीदवारों से शुरू हुआ था। लेकिन 4 जून 2024 को परिणाम घोषित होने के बाद यह एक राष्ट्रीय विवाद बन गया।

शुरुआत में 67 उम्मीदवारों को 720 में से 720 का परफेक्ट स्कोर मिला। इसके अलावा 718 और 719 अंकों पर भी सवाल उठाए गए, जो सामान्य मार्किंग स्कीम के तहत असामान्य लग रहे थे।

NTA ने कहा कि कुछ केंद्रों पर परीक्षा के समय का नुकसान होने के कारण 1563 उम्मीदवारों को प्रतिपूरक अंक दिए गए थे। ग्रेस-मार्क्स का विवाद और पटना-हजारीबाग पेपर चोरी के तथ्य भले ही अलग-अलग थे, लेकिन दोनों एक ही सार्वजनिक संकट का हिस्सा बन गए। 13 जून को केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया कि प्रतिपूरक अंकों को वापस ले लिया जाएगा।

इन 1563 उम्मीदवारों के पास दो विकल्प थे या तो वे बिना ग्रेस मार्क्स के अपना स्कोर स्वीकार करें या 23 जून को दोबारा परीक्षा में बैठें। इसने ग्रेस-मार्क्स के सवाल को तो सुलझा दिया, लेकिन पेपर लीक के भौगोलिक विस्तार का मुद्दा अभी भी बाकी था।

देश भर में छात्रों के विरोध प्रदर्शन फैल गए। कॉन्ग्रेस सहित राजनीतिक दलों और ABVP से जुड़े संगठनों ने जवाबदेही और व्यापक जाँच की माँग की। सरकार ने 21 जून को ‘लोक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम, 2024′ को लागू कर दिया। यह कानून संगठित नकल, पेपर लीक, इम्पर्सनेशन (डमी कैंडिडेट) और परीक्षा सामग्री तक अनधिकृत पहुँच के लिए सजा का प्रावधान करता है।

22 जून को शिक्षा मंत्रालय ने परीक्षा प्रक्रिया, डेटा सुरक्षा और NTA के कामकाज में सुधारों की सिफारिश करने के लिए ISRO के पूर्व अध्यक्ष के राधाकृष्णन की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया।

उसी वीकेंड पर NTA के डायरेक्टर जनरल सुबोध कुमार सिंह को पद से हटा दिया गया। केंद्र ने CBI को व्यापक साजिश और लोक सेवकों की भूमिका सहित इस पूरे मामले की विस्तृत जाँच करने को कहा।

सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार पूछा कि सुरक्षा में चूक कब हुई, यह कितनी दूर तक फैली और क्या दागी उम्मीदवारों को बाकी छात्रों से अलग किया जा सकता है। CBI के शुरुआती आकलन में करीब 155 संदिग्ध लाभार्थियों की पहचान की गई थी।

एजेंसी ने बाद में कहा कि लीक मुख्य रूप से हजारीबाग और पटना पर केंद्रित था, जहाँ से चुनिंदा उम्मीदवारों को अंतर-राज्यीय वितरण किया गया था। 23 जुलाई 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने पूरी परीक्षा को रद्द करने से इनकार कर दिया।

कोर्ट ने माना कि उस समय उपलब्ध सामग्री से यह साबित नहीं होता कि कोई ऐसी व्यवस्थागत चूक हुई थी जिसने देश भर में परीक्षा की पवित्रता को नष्ट कर दिया हो।

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि ऐसा कोई सबूत नहीं है जिससे पता चले कि लीक हुआ पेपर सोशल मीडिया पर फैला था या बेकाबू संख्या में उम्मीदवारों तक पहुँचा था। कोर्ट ने कहा कि बिना किसी मजबूत तथ्यात्मक आधार के 23 लाख से अधिक उम्मीदवारों के लिए दोबारा परीक्षा का आदेश नहीं दिया जा सकता।

इसके बावजूद कोर्ट ने NTA प्रणाली में गंभीर विफलताओं की पहचान की। अपने अंतिम फैसले में कोर्ट ने पेपर तैयार करने, स्टोरेज, ट्रांसपोर्ट, सेंटर की सुरक्षा, पहचान के सत्यापन और अनियमितताओं से निपटने के लिए एक मजबूत मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) बनाने का आह्वान किया। ग्रेस-मार्क्स के फैसले और फिजिक्स के एक विवादित उत्तर के समाधान के बाद परफेक्ट स्कोर पाने वालों की संख्या 67 से घटकर 17 रह गई।

CBI ने पटना-हजारीबाग शाखा में 45 लोगों के खिलाफ पाँच चार्जशीट दाखिल कीं। जाँच को समझने के लिए अदालती आदेश ही मुख्य सार्वजनिक स्रोत बने। हालाँकि मुकदमा धीमी गति से आगे बढ़ा। फरवरी 2026 तक पटना मामले में अभी भी आरोप तय नहीं हो पाए थे और अभियोजन पक्ष ने 589 गवाहों की सूची पेश की थी।

सरकार ने राधाकृष्णन समिति की सिफारिशों को लागू करना शुरू कर दिया। इन उपायों में सरकारी संस्थानों को परीक्षा केंद्र के रूप में अधिक उपयोग करना, राज्य प्रशासनों के साथ मजबूत समन्वय, NTA  में स्थायी कर्मचारियों की नियुक्ति, बेहतर केंद्र आवंटन, डिजिटल निगरानी और सुधार के लिए एक संचालन समिति शामिल थी।

केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण (CCPA) ने कोचिंग के भ्रामक विज्ञापनों के खिलाफ भी दिशानिर्देश जारी किए। इसने सफलता के झूठे दावों, जानकारी छिपाने और चयन की गारंटी देने पर रोक लगा दी। नवंबर 2024 तक, CCPA ने कहा कि उसने 45 कोचिंग सेंटरों के खिलाफ कार्रवाई शुरू की थी और 18 संस्थानों पर 54.6 लाख रुपए का जुर्माना लगाया था।

इन उपायों ने परीक्षा की सुरक्षा को मजबूत किया और भ्रामक विज्ञापनों पर रोक लगाई। हालाँकि वे एडमिशन कंसल्टेंट्स और छोटे काउंसलिंग नेटवर्कों के लिए एक पूर्ण ढाँचा तैयार नहीं कर सके।

रिपोर्टों के अनुसार, ‘करियर एकेडमी’ पारंपरिक क्लासरूम के बजाय काउंसलिंग और उम्मीदवारों को संभालने के जरिए काम करती थी। 2024 के इस नेटवर्क ने गेस्ट हाउस, होटल, निजी घरों, असली सर्टिफिकेट, कोरे चेक और थर्ड-पार्टी खातों का इस्तेमाल किया। बहरहाल, 2026 के लीक ने एक और भी बड़ी कमजोरी को उजागर कर दिया, जो कि विषय-विशेषज्ञ के स्तर पर गोपनीय पहुँच का होना था।

2026 का लीक एक गेस पेपर के अंदर छिपा था

NEET-UG 2026 की सुरक्षा में लगी यह सेंध पुलिस द्वारा किसी गाड़ी को रोकने के बाद उजागर नहीं हुई थी। इसका खुलासा तब हुआ जब सीकर के एक शिक्षक को 3 मई को परीक्षा की शाम को 150 पन्नों का एक हस्तलिखित गेस पेपर मिला।

यह दस्तावेज उनके मकान मालिक के बेटे के माध्यम से उन तक पहुँचा था, जो केरल में पढ़ाई कर रहा था। शिक्षक ने इसका मिलान वास्तविक प्रश्नपत्र से किया और बड़े पैमाने पर प्रश्नों के मिलने के बाद उन्होंने अधिकारियों से संपर्क किया।

7 मई को उन्होंने NTA, गृह मंत्रालय और CBI को इसकी जानकारी भेजी। NTA के अधिकारियों ने अगले दिन उनसे संपर्क किया और वह PDF प्राप्त की। रिपोर्टों के अनुसार, उस 150 पन्नों की सामग्री में लगभग 410 प्रश्न शामिल थे। उनमें से तकरीबन 120 प्रश्न 3 मई को आयोजित परीक्षा के केमिस्ट्री के पेपर में आए थे। बायोलॉजी के भी कुछ हिस्सों के प्रसारित होने का संदेह था।

2026 में NEET का पेपर कैसे लीक हुआ।

इसे गेस पेपर कहने से बचने का एक रास्ता मिल जाता था। गोपनीय प्रश्नों को विशेषज्ञों की भविष्यवाणी या उच्च संभावना वाले रिवीजन सेट के रूप में बेचा जा सकता था। राजस्थान के स्पेशल ऑपरेशंस ग्रुप (SOG) ने देहरादून, केरल और राजस्थान में संपर्कों के माध्यम से इस फाइल का पता लगाया।

इसने उन पेड डिजिटल ग्रुप्स की भी जाँच की जिनके जरिए यह सामग्री बेची गई थी। इस जाँच से यह साबित नहीं हुआ कि सीकर का हर कोचिंग संस्थान इसमें शामिल था। लेकिन इसने यह जरूर दिखाया कि एक गोपनीय दस्तावेज एक बड़े कोचिंग हब तक पहुँच गया था और रीसेल के एक बड़े बाजार में दाखिल हो चुका था।

NTA ने 8 मई को इस सामग्री को केंद्रीय एजेंसियों के पास भेज दिया। 12 मई को, इसने परीक्षा रद्द कर दी और मामला CBI को सौंप दिया। दोबारा होने वाली परीक्षा के लिए मौजूदा रजिस्ट्रेशन और सेंटर प्राथमिकताओं को ही आगे बढ़ा दिया गया। उम्मीदवारों को दोबारा रजिस्ट्रेशन करने या कोई अन्य शुल्क देने की आवश्यकता नहीं थी।

यह निर्णय 2024 से अलग था। सुप्रीम कोर्ट ने उस परीक्षा को बरकरार रखने की अनुमति दी थी क्योंकि सबूतों से यह नहीं पता चला था कि कोई ऐसा देशव्यापी लीक हुआ था जिसे संभालना असंभव हो। वहीं 2026 में NTA इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि नौ दिनों के भीतर ही यह साफ हो गया कि इस प्रभावित परीक्षा को बचाना संभव नहीं था।

CBI ने 2026 लीक का पता NTA द्वारा नियुक्त एक्सपर्ट्स से लगाया

CBI ने 12 मई को अपना मामला दर्ज किया और कई राज्यों में ठिकानों की तलाशी ली। उसने फोन, मैसेजिंग एप्लिकेशन, बैंक रिकॉर्ड और NTA के दस्तावेजों की जाँच की। जाँच एजेंसी का यह मामला 2024 की जाँच की तुलना में लीक के मुख्य स्रोत के बहुत करीब पहुँच गया।

पंकज कुमार ने परीक्षा की सुबह एक छपी हुई बुकलेट कॉपी की थी। वहीं 2026 में CBI ने कहा कि विषय-विशेषज्ञों ने हफ्तों पहले ही गोपनीय प्रश्नों तक पहुँच बना ली थी और उन्हें कोचिंग व काउंसलिंग नेटवर्कों तक पहुँचा दिया था।

13 मई को गिरफ्तार किए गए पहले पाँच लोग नासिक के शुभम खैरनार, जयपुर के मांगीलाल बीवाल, विकास बीवाल व दिनेश बीवाल और गुरुग्राम के यश यादव थे। खैरनार ‘एसआर एजुकेशन कंसल्टेंसी’ चलाता था, जो मेडिकल दाखिले के लिए मार्गदर्शन प्रदान करती थी।

CBI ने दिल्ली की एक अदालत को बताया कि उसने यादव को वितरण के लिए पेपर हासिल करने में मदद की थी। रिपोर्टों के अनुसार, यादव को 29 अप्रैल को टेलीग्राम के जरिए फिजिक्स, केमिस्ट्री और बायोलॉजी की PDF मिल गई थीं।

मांगीलाल बीवाल के बारे में कहा गया कि उसने अपने छोटे बेटे के लिए इस नेटवर्क से संपर्क किया था। इस सौदे के लिए बातचीत की कीमत 10 लाख रुपए से 12 लाख रुपए के बीच थी।

नेटवर्क कैसे काम करता था और NEET 2026 पेपर लीक में किसने क्या भूमिका निभाई।

पुणे की मनीषा वाघमारे और अहिल्यानगर के धनंजय लोखंडे को इसके बाद गिरफ्तार किया गया। CBI का कहना था कि लोखंडे ने वाघमारे से सामग्री प्राप्त की और उसे खैरनार को सौंप दिया, जिसने इसे आगे यादव तक पहुँचाने की व्यवस्था की।

वाघमारे मेडिकल काउंसलिंग और उम्मीदवारों को इकट्ठा करने (मोबिलाइजेशन) के काम से जुड़ी थी। एजेंसी ने बाद में बताया कि वह छात्रों को NTA द्वारा नियुक्त केमिस्ट्री और बायोलॉजी के विशेषज्ञों द्वारा ली जाने वाली विशेष क्लासों में लेकर आती थी।

15 मई को CBI ने केमिस्ट्री के लेक्चरर पी वी कुलकर्णी को गिरफ्तार किया गया और उसे केमिस्ट्री शाखा का मुख्य सरगना करार दिया। कुलकर्णी NTA की ओर से परीक्षा प्रक्रिया का हिस्सा रहा था और गोपनीय प्रश्नों तक उसकी सीधी पहुँच थी। अप्रैल के आखिरी हफ्ते के दौरान, उसने वाघमारे के माध्यम से जुटाए गए छात्रों के लिए अपने पुणे स्थित निजी आवास पर विशेष सत्र आयोजित किए।

CBI के मुताबिक, कुलकर्णी प्रश्नों, उनके विकल्पों और सही उत्तरों को बोलकर लिखवाता था। छात्र उन्हें अपनी कॉपियों में लिख लेते थे। रिपोर्टों के अनुसार, यह सामग्री 3 मई के प्रश्नपत्र से पूरी तरह मेल खाती थी।

इन क्लासों में शामिल होने के लिए छात्रों ने कई-कई लाख रुपए का भुगतान किया था। इस तरीके ने हर खरीदार को NTA का कोई पहचान योग्य आधिकारिक दस्तावेज दिए बिना ही, गोपनीय पहुँच को एक निजी कोचिंग प्रॉडक्ट में तब्दील कर दिया।

16 मई को जाँच एजेंसी ने सीनियर बॉटनी शिक्षिका मनीषा गुरुनाथ मंधारे को गिरफ्तार किया। CBI का कहना था कि उन्हें NTA विशेषज्ञ के रूप में नियुक्त किया गया था और बॉटनी व जूलॉजी के पेपरों तक उनकी मुकम्मल पहुँच थी।

उन्होंने भी अपने पुणे स्थित आवास पर विशेष क्लासें ली थीं। वाघमारे यहाँ भी उम्मीदवारों को लाने का काम कर रही थी। छात्र कॉपियों में प्रश्न लिखते थे और टेक्स्टबुक्स के जरूरी हिस्सों पर निशान लगाते थे। रिपोर्टों के मुताबिक, उन प्रश्नों में से अधिकांश परीक्षा में ज्यों के त्यों आए थे।

इस प्राइवेट-रेसिडेंस मॉडल ने किसी कोचिंग सेंटर के तौर पर दिखने वाले लेन-देन की गुंजाइश को खत्म कर दिया। एक रिक्रूटर अपने निजी संपर्कों का इस्तेमाल करता था, विशेषज्ञ एक छोटे से सशुल्क (पेड) समूह को पढ़ाता था और छात्र इस लीक को सामान्य नोट्स की तरह रिकॉर्ड कर लेते थे।

इस पूरे मामले में सबसे मजबूत और डायरेक्ट इंस्टीट्यूशनल लिंक 18 मई को तब सामने आया जब CBI ने लातूर में ‘आरसीसी कोचिंग इंस्टीट्यूट’ के मालिक शिवराज मोटेगांवकर को गिरफ्तार किया।

एजेंसी के अनुसार, RCC नौ शाखाओं का संचालन करता था और नीट उम्मीदवारों को कोचिंग देता था। मोटेगांवकर को कुलकर्णी का बेहद करीबी बताया गया। संस्थान और उसके घर की तलाशी में एक केमिस्ट्री क्वेश्चन बैंक मिला, जिसमें 3 मई की परीक्षा के प्रश्न शामिल थे।

CBI ने बाद में दिल्ली की एक अदालत को बताया कि मोटेगांवकर का बेटा आदित्य कुलकर्णी के उन्हीं सत्रों में शामिल हुआ था और उसने हस्तलिखित नोट्स तैयार किए थे।

जाँचकर्ताओं ने मोटेगांवकर द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे एक फोन से 36 तस्वीरें बरामद कीं, जिनमें से पाँच एक जैसी थीं। बाकी तस्वीरों में 132 हस्तलिखित केमिस्ट्री के प्रश्न थे और उनमें से करीब 111 प्रश्न NTA के मास्टर सेट से मेल खाते थे। रिपोर्टों के अनुसार, ये तस्वीरें परीक्षा से दस दिन पहले, यानी 23 अप्रैल को ही खींच ली गई थीं।

जाँच एजेंसी ने कहा कि यह लेन-देन लातूर के ‘सिद्धिविनायक अस्पताल’ में हुआ था, जिसे बाल रोग विशेषज्ञ (पीडियाट्रिशियन) डॉ मनोज भगवानराव शिरूरे चलाते हैं। शिरूरे को 26 मई को गिरफ्तार किया गया था।

राउज एवेन्यू जिला अदालत के 24 जुलाई के एक आदेश में CBI के इस दावे का जिक्र है कि शिरूरे ने अप्रैल के तीसरे हफ्ते के दौरान अस्पताल के एक डीलक्स कमरे में आदित्य मोटेगांवकर की कुलकर्णी से मुलाकात की व्यवस्था की थी।

एजेंसी ने अस्पताल के एक कर्मचारी के बयान का हवाला दिया, जिसे शिरूरे ने यह इंतजाम करने का जिम्मा सौंपा था। इसके मुताबिक इसी बैठक के जरिए आदित्य को परीक्षा से पहले केमिस्ट्री के प्रश्न हासिल करने का मौका मिला।

CBI का दावा था कि इस पहुँच को मुमकिन बनाने के बदले शिरूरे को शिवराज मोटेगांवकर की पत्नी से 5 लाख रुपए मिले थे। यह रकम 21 मई को शिरूरे की बहन के घर से बरामद की गई थी।

अदालती आदेश के अनुसार, बहन ने जाँचकर्ताओं को बताया कि शिरूरे ने पिछली रात ही उसे यह पैसे रखने के लिए दिए थे। एजेंसी ने यह भी कहा कि शिरूरे ने दो अन्य डॉक्टरों को भी कुलकर्णी के पास भेजा था।

उनके बच्चों को 3-3 लाख रुपए का भुगतान करने के बाद केमिस्ट्री के प्रश्न मिले थे और शिरूरे को उन भुगतानों का आधा हिस्सा (कमीशन के तौर पर) मिला था। संबंधित गवाहों के बयान BNSS की धारा 183 के तहत मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज किए गए।

अदालती आदेश में कहा गया है कि गवाहों ने कुलकर्णी द्वारा दिए गए उन 42 प्रश्नों की पहचान की जो NEET-UG के पेपर में आए थे। दूसरी तरफ शिरूरे के वकीलों का कहना था कि उनके मुवक्किल, उनके उपकरणों, घर या अस्पताल से कोई भी लीक प्रश्न बरामद नहीं हुआ है और उन्होंने उनके तथा इस 5 लाख रुपए के बीच के किसी भी संबंध को खारिज किया।

फिजिक्स शाखा की कड़ियाँ NTA द्वारा नियुक्त विशेषज्ञ मनीषा संजय हवलदार तक पहुँचीं। CBI के अनुसार, फिजिक्स के पेपर तक हवलदार की पूरी पहुँच थी और उन्होंने हस्तलिखित प्रश्न मंधारे को सौंपे थे।

उन्होंने कथित तौर पर पुणे में ‘डॉ अभंग प्रभु मेडिकल एकेडमी’ के फैकल्टी मेंबर तेजस हर्षदकुमार शाह को भी फिजिक्स के प्रश्न बोलकर लिखवाए थे। शाह पर इस सामग्री को एकेडमी से जुड़े छात्रों तक पहुँचाने का आरोप था।

उपलब्ध सामग्री इस कृत्य का जिम्मेदार शाह को ठहराती है, लेकिन यह साबित नहीं करती कि एकेडमी के मैनेजमेंट ने इसके लिए कोई आधिकारिक अनुमति दी थी। यह कानूनी अंतर बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी एक फैकल्टी मेंबर की कथित संलिप्तता को स्वतः ही पूरी संस्था के खिलाफ निष्कर्ष नहीं माना जा सकता।

मई के अंत तक, CBI ने खैरनार, मांगीलाल बीवाल, विकास बीवाल, दिनेश बीवाल, यश यादव, लोखंडे, वाघमारे, कुलकर्णी, मंधारे, मोटेगांवकर, हवलदार, शिरूरे और शाह सहित कुल 13 लोगों को गिरफ्तार कर लिया था।

सार्वजनिक रूप से उपलब्ध सामग्री विषय-स्तरीय तीन मुख्य स्रोतों की पुष्टि करती है, केमिस्ट्री के लिए कुलकर्णी, बायोलॉजी के लिए मंधारे और फिजिक्स के लिए हवलदार। यह आपस में जुड़े हुए बिचौलियों को तो दिखाता है, लेकिन अभी तक यह स्थापित नहीं करता कि किसी एक अकेले व्यक्ति ने इन तीनों शाखाओं को नियंत्रित किया था।

24 जुलाई को विशेष CBI अदालत ने शिरूरे की जमानत याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि जाँच अभी एक बेहद महत्वपूर्ण चरण में है और गवाहों को प्रभावित करने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

आदेश में यह भी दर्ज किया गया कि गिरफ्तार किए गए सभी 13 आरोपित उस समय न्यायिक हिरासत में थे। यह निष्कर्ष केवल जमानत की अर्जी तक ही सीमित था और इससे दोष का अंतिम फैसला नहीं हुआ था।

इस तरह 2026 का यह नेटवर्क सोर्स के बहुत ज्यादा करीब रहकर और कहीं अधिक समय के साथ काम कर रहा था। यह प्राइवेट क्लासों, हस्तलिखित नोट्स, गेस पेपर्स और टेलीग्राम के जरिए बिक्री की व्यवस्था करने में सक्षम था। इसमें परीक्षा के दिन सिर्फ पाँच घंटे की समय-सीमा के भीतर भाग-दौड़ करने वाले सॉल्वरों के किसी बड़े गिरोह की जरूरत बहुत कम थी।

दोबारा जाँच, सुप्रीम कोर्ट और सरकार का जवाब

NTA ने 21 जून को एक नए प्रश्नपत्र और नए विषय-विशेषज्ञों के साथ NEET-UG 2026 की परीक्षा दोबारा आयोजित की। इस कैन्सलैशन के कारण 22 लाख से अधिक प्रभावित उम्मीदवारों को दूसरी परीक्षा के लिए फिर से तैयारी करने पर मजबूर होना पड़ा।

NTA के अनुसार, 21 जून को आयोजित इस री-टेस्ट में लगभग 20 लाख उम्मीदवार शामिल हुए। रद्द की गई परीक्षा के उम्मीदवार बिना किसी नए रजिस्ट्रेशन या अतिरिक्त शुल्क के इसमें बैठने के पात्र थे। इसके परिणाम 16 जुलाई को जारी किए गए।

शिरूरे की जमानत सुनवाई के दौरान, CBI के अभियोजक ने कहा कि परीक्षा रद्द करने और दोबारा परीक्षा कराने से सरकारी खजाने को 600 करोड़ रुपए से अधिक का नुकसान हुआ। अभियोजक ने यह भी बताया कि नए प्रश्नपत्रों को परीक्षा केंद्रों तक हेलीकॉप्टर के जरिए पहुँचाना पड़ा था।

अदालती आदेश में इन बातों को अभियोजन पक्ष की दलीलों के रूप में दर्ज किया गया है, न कि अदालत द्वारा स्वतंत्र रूप से निकाले गए किसी सटीक निष्कर्ष के रूप में।

यह मामला दोबारा परीक्षा होने से पहले ही सुप्रीम कोर्ट पहुँच गया था। याचिकाकर्ताओं ने परीक्षा रद्द करने, उम्मीदवारों की सुरक्षा और इस तरह की घटना की पुनरावृत्ति को रोकने की NTA की क्षमता पर सवाल उठाए।

कोर्ट ने पूछा कि 2024 के बाद किए गए सुधारों से पर्याप्त संस्थागत सीख क्यों विकसित नहीं हो सकी। अदालत चाहती थी कि जाँच एजेंसी ऐसी शारीरिक और बौद्धिक क्षमता का प्रदर्शन करे जिससे भविष्य में ऐसी किसी अन्य चूक को रोका जा सके।

यह चिंता केवल तालों और CCTV कैमरों तक सीमित नहीं थी। 2024 के मामले ने उस समय की कमजोरियों को उजागर किया था जब छपे हुए प्रश्नपत्र परीक्षा केंद्र पर पहुँच चुके थे। वहीं 2026 के मामले ने दिखाया कि विशेषज्ञों के चयन और गोपनीयता की प्रणाली अभी भी असुरक्षित बनी हुई थी।

भविष्य के लिए एक स्थायी जोखिम प्रणाली बनाई जानी चाहिए जो यह रिकॉर्ड रखे कि किसके पास पहुँच थी, कौन सा नियंत्रण विफल रहा, क्या किसी विशेषज्ञ का कोचिंग से कोई संबंध था और भविष्य में इन जैसे चेतावनी संकेतों से कैसे निपटा जाना चाहिए।

29 मई की सुनवाई के दौरान, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट को बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व्यक्तिगत रूप से इस पूरी प्रतिक्रिया और दोबारा परीक्षा कराने की प्रक्रिया की निगरानी कर रहे थे।

परीक्षा रद्द होने के बाद देश भर में विरोध प्रदर्शन हुए, जो बाद में पेपर लीक, एनटीए और मंत्रालय की जवाबदेही को लेकर एक व्यापक आंदोलन में बदल गए। इस विवाद के कारण मानसून सत्र के दौरान संसद की कार्यवाही भी बाधित हुई।

विपक्ष के सांसदों ने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग की, जबकि सरकार ने कहा कि वह बहस के लिए तैयार है लेकिन उसने इस्तीफे को बहस की पूर्व शर्त के रूप में स्वीकार करने से इनकार कर दिया।

23 जुलाई को पीएम मोदी ने घोषणा की कि पेपर लीक के मामलों के लिए फास्ट-ट्रैक कोर्ट स्थापित की जाएँगी। उन्होंने कहा कि छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने वालों को सख्त से सख्त सजा दी जाएगी।

यह घोषणा एक वास्तविक कमजोरी को दूर करने के उद्देश्य से की गई थी, क्योंकि 2024 के CBI मामले में पाँच चार्जशीट तो दाखिल हो चुकी थीं, लेकिन फरवरी 2026 तक उसका मुकदमा आरोप तय होने के चरण तक भी नहीं पहुँच पाया था।

इसके बाद प्रशासनिक बदलाव भी किए गए। हायर एजुकेशन सेक्रेटरी विनीत जोशी का तबादला कर दिया गया और उनके स्थान पर नरेश पाल गंगवार को नियुक्त किया गया। सरकार ने अतिरिक्त कदम उठाने का वादा किया।

रिपोर्टों में कहा गया कि 2027 से NEET-UG पूरी तरह से कंप्यूटर आधारित फॉर्मेट  की ओर बढ़ेगा। 24 जुलाई को NTA ने 47 अधिकारियों को सेवा से बर्खास्त कर दिया।

कंप्यूटर आधारित परीक्षा छपे हुए प्रश्नपत्रों, उनके परिवहन और OMR शीट से जुड़े जोखिमों को कम कर सकती है। लेकिन यह अपने आप में उस विशेषज्ञ को नहीं रोक सकती जिसके पास गोपनीय प्रश्नों तक पहले से पहुँच हो और वह उन्हें किसी कोचिंग नेटवर्क तक पहुँचा दे।

2026 की केंद्रीय कमजोरी कोई छपी हुई बुकलेट नहीं थी, बल्कि अंदरूनी लोगों, कोचिंग संचालकों और उम्मीदवारों के बीच काम करने वाले बिचौलियों के संबंध थे।

कोचिंग माफिया को तोड़ने के लिए क्या बदलना होगा?

पहला सुधार यह होना चाहिए कि गोपनीय परीक्षा कार्य और कोचिंग इंडस्ट्री के बीच एक सख्त फायरवॉल  बनाई जाए। NTA के किसी भी विषय-विशेषज्ञ को प्रासंगिक गोपनीयता अवधि के दौरान निजी ट्यूशन पढ़ाने, पैसे लेकर विशेष कक्षाएँ लेने, कमीशन प्राप्त करने, सलाहकार के रूप में काम करने, किसी कोचिंग व्यवसाय के साथ कमाई साझा करने या किसी करीबी रिश्तेदार द्वारा नियंत्रित संस्थान के माध्यम से काम करने की अनुमति नहीं होनी चाहिए।

केवल कागज पर घोषणा कर देना ही काफी नहीं है। NTA को कंपनी के रिकॉर्ड, प्रोफेशनल प्रोफाइल, भुगतान के लेन-देन और घोषित जुड़ावों का सत्यापन करना चाहिए।

जब तक कार्य के लिए आवश्यक न हो, किसी भी विशेषज्ञ के पास पूरे विषय के प्रश्नपत्र तक पहुँच नहीं होनी चाहिए। प्रश्न तैयार करने, समीक्षा, अनुवाद, मॉडरेशन और अंतिम चयन के काम को अलग-अलग हिस्सों में बांटा जाना चाहिए।

सिस्टम में यह रिकॉर्ड दर्ज होना चाहिए कि प्रत्येक प्रश्न तक किसने और कब पहुँच बनाई, किस डिवाइस का उपयोग किया गया, क्या इसे प्रिंट या डाउनलोड किया गया था, उत्तर को किसने मंजूरी दी और इसे मास्टर सेट में कब शामिल किया गया। किसी भी असामान्य पहुँच पर एक ऑटोमैटिक अलर्ट जारी होना चाहिए।

कोचिंग सेंटरों और एडमिशन कंसल्टेंसी दोनों का अनिवार्य रजिस्ट्रेशन होना चाहिए। 2024 का मामला दिखाता है कि केवल बड़े क्लासरूम के आधार पर तय की गई परिभाषा क्यों अपर्याप्त है।

एक ऐसा व्यवसाय जो उम्मीदवारों को तैयार करता है, मेडिकल काउंसलिंग की सुविधा देता है, दस्तावेज इकट्ठा करता है, सीटें दिलाने का दावा करता है या परिवारों और कॉलेजों के बीच बिचौलिये के रूप में काम करता है, उसे नियामक प्रणाली रेगुलेटरी सिस्टम के दायरे में आना चाहिए, भले ही वह 50 से कम छात्रों को पढ़ाता हो।

स्वामित्व और वित्त पूरी तरह से पारदर्शी होने चाहिए। नियामकों को प्रमोटरों, निदेशकों, ट्रस्टियों, संबंधित कंपनियों, अधिकृत हस्ताक्षरकर्ताओं और वास्तविक मालिकों की जानकारी होनी चाहिए। यही जानकारी सभी राज्यों में आपस में जुड़ी होनी चाहिए ताकि एक अधिकार क्षेत्र में प्रतिबंधित किया गया प्रमोटर किसी दूसरी कंपनी या रिश्तेदार के माध्यम से दोबारा काम शुरू न कर सके।

गारंटीड सिलेक्शन, कन्फर्म एमबीबीएस एडमिशन या 100 प्रतिशत सफलता जैसे वादे केवल उपभोक्ता-विज्ञापन नोटिस तक सीमित नहीं रहने चाहिए। ऐसे दावे डमी कैंडिडेट, पेपर तक पहुँच, OMR में हेरफेर या अवैध रूप से सीट की व्यवस्था करने का संकेत हो सकते हैं।

उपभोक्ता प्राधिकरणों, NTA और राज्य पुलिस द्वारा संचालित एक कॉमन प्लेटफॉर्म को असामान्य रूप से अधिक फीस, असली सर्टिफिकेट की माँग, कोरे चेक, परीक्षा शहर बदलने के निर्देश, अंकों से जुड़े भुगतान, सटीक प्रश्नों का वादा करने वाले निजी सत्रों और डमी उम्मीदवारों की व्यवस्था करने के प्रस्तावों को चिन्हित करना चाहिए।

गोधरा मामला दिखाता है कि केंद्र आवंटन में हेरफेर करने के लिए आवेदन डेटा का उपयोग कैसे किया जा सकता है। एक ही जिले में अपना वर्तमान पता बदलने वाले, एक ही शहर को चुनने वाले और एक असामान्य भाषा कॉम्बिनेशन चुनने वाले उम्मीदवारों के समूह की समीक्षा केंद्रों के आवंटन से पहले की जानी चाहिए।

इसका मतलब यह नहीं है कि उन्हें दोषी मान लिया जाए, बल्कि इससे मानवीय सत्यापन की प्रक्रिया शुरू होनी चाहिए। जब सबूत स्वयं संस्थान तक पहुँचें, तो कोचिंग संस्थानों की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।

जहाँ कोई मालिक या निदेशक इसमें भाग लेता है, संस्थागत खातों में पैसा आता है, परिसरों का जानबूझकर उपयोग किया जाता है, संगठन के माध्यम से गोपनीय प्रश्न बांटे जाते हैं या प्रबंधन विश्वसनीय चेतावनियों को नजरअंदाज करता है, वहाँ रजिस्ट्रेशन रद्द करने, कमाई को जब्त करने और दीर्घकालिक प्रतिबंध लगाने जैसे कदम उठाए जाने चाहिए।

जवाबदेही फिर भी सबूतों के आधार पर ही तय होनी चाहिए। RCC का मामला अधिक मजबूत रिपोर्ट किए गए आधार पर खड़ा है क्योंकि उसके मालिक को गिरफ्तार किया गया था और उससे जुड़े उपकरणों व परिसरों से सामग्री बरामद की गई थी।

तेजस शाह के कृत्य से स्वचालित रूप से यह साबित नहीं हो जाता कि डॉ अभंग प्रभु मेडिकल एकेडमी के प्रबंधन को फिजिक्स पेपर ट्रांसफर किए जाने के बारे में पता था।

उम्मीदवारों के डेटा को भी सुरक्षा की आवश्यकता है। कोचिंग सेंटर और सलाहकार परीक्षा के अंक, पारिवारिक आय, पसंदीदा कॉलेज, फोन नंबर, पते, पहचान दस्तावेज और परिवार की भुगतान करने की क्षमता के बारे में जानकारी रखते हैं।

यह डेटाबेस भ्रष्ट एजेंटों को हताश या आर्थिक रूप से सक्षम लक्ष्यों की पहचान करने में मदद करता है। छात्रों की जानकारी स्पष्ट सहमति के बिना दाखिला एजेंटों के साथ बेची या साझा नहीं की जानी चाहिए। नियामकों को ऑडिट करना चाहिए कि असली सर्टिफिकेट और पहचान दस्तावेज कैसे एकत्र और संग्रहीत किए जाते हैं।

एक सुरक्षित व्हिसलब्लोअर प्रणाली भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। 2026 का मामला इसलिए सामने आया क्योंकि एक शिक्षक ने गेस पेपर की जाँच की और अधिकारियों से संपर्क किया। शिक्षकों, कोचिंग कर्मचारियों, छात्रों और परीक्षा कर्मियों को एक सुरक्षित पोर्टल के माध्यम से संदिग्ध पेपर, स्क्रीनशॉट और भुगतान की माँगों को जमा करने में सक्षम होना चाहिए।

इस पोर्टल को सामग्री का टाइमस्टैम्प दर्ज करना चाहिए, मूल फाइल को सुरक्षित रखना चाहिए, पहचान की रक्षा करनी चाहिए और NTA व एक स्वतंत्र जाँच इकाई दोनों को अलर्ट करना चाहिए। प्रतिशोध के खिलाफ सुरक्षा आवश्यक है। जहाँ विश्वसनीय जानकारी किसी देशव्यापी परीक्षा को प्रभावित होने से बचाती है, वहाँ वित्तीय इनाम देना भी उचित हो सकता है।

वित्तीय जाँच पहली गिरफ्तारी के साथ ही शुरू हो जानी चाहिए। 2024 में CBI ने माता-पिता, बिचौलियों, कर्मचारियों, रिश्तेदारों, कंपनियों और थर्ड-पार्टी खातों के माध्यम से भुगतानों का पता लगाया था।

जाँचकर्ताओं को संदिग्ध फंडों को फ्रीज करना चाहिए, पेमेंट ऐप्स और कंपनी के रिकॉर्ड की जाँच करनी चाहिए और इस कमाई से खरीदी गई संपत्ति की पहचान करनी चाहिए। मुनाफे को जब्त करना किसी बदले जा सकने वाले स्थानीय हैंडलर को गिरफ्तार करने की तुलना में इस व्यावसायिक मॉडल को अधिक प्रभावी ढंग से नुकसान पहुँचा सकता है।

फास्ट-ट्रैक अदालतों को केवल रिमांड और जमानत याचिकाओं पर तेजी से कार्रवाई करने के बजाय मुकदमों को पूरा करना चाहिए। एक नामित अदालत को एक समेकित (consolidated) डिजिटल चार्जशीट, एक स्पष्ट भूमिका चार्ट, सत्यापित घटनाक्रम, वित्तीय-प्रवाह आरेख, डिवाइस के स्वामित्व का रिकॉर्ड और आवश्यक गवाहों की एक सीमित सूची मिलनी चाहिए।

एक ही FIR का वर्णन करने के लिए किसी मामले में सैकड़ों बार-बार आने वाले गवाहों की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। समय-समय पर सार्वजनिक केस-स्टेटस की जानकारी मिलने से प्रभावित छात्रों को भी यह जानने में मदद मिलेगी कि क्या आरोप तय हो चुके हैं और सबूतों को दर्ज करने की प्रक्रिया शुरू हो गई है।

तरीका बदल गया, लेकिन बाजार बच गया

2024 और 2026 के मामलों में अलग-अलग तौर-तरीकों का इस्तेमाल किया गया था। 2024 में ओएसिस स्कूल पहुँचने के बाद प्रश्नपत्र को एक सीलबंद बक्से से निकाला गया था।

राज गेस्ट हाउस में MBBS छात्र इसे हल करने के लिए इंतजार कर रहे थे। दाखिला एजेंटों ने पहले से ही अलग-अलग शहरों में उम्मीदवारों को इकट्ठा कर लिया था। यह पूरा ऑपरेशन स्पीड, परिवहन, प्रिंटर और स्थानीय हैंडलर पर निर्भर था।

2026 में CBI ने कहा कि परीक्षा से पहले ही प्रश्नपत्र के सवाल विषय-विशेषज्ञों से बाहर आ गए थे। सुबह-सुबह की जाने वाली जल्दबाजी वाली गतिविधियों की जगह निजी कक्षाओं, हस्तलिखित नोट्स, गेस पेपर्स, टेलीग्राम फाइलों और कोचिंग नेटवर्क ने ले ली थी।

इस लीक को पढ़ाई का रूप देकर आसानी से छिपाया जा सकता था और इसे एक सामान्य रिवीजन शेड्यूल में शामिल किया जा सकता था। यह तरीका इसलिए विकसित हुआ क्योंकि इसका बाजार मौजूद था। माता-पिता अभी भी पैसे देने के लिए तैयार थे। कंसलटेंट अभी भी उनकी पहचान कर सकते थे। कोचिंग संचालकों के पास उम्मीदवारों का एक बड़ा आधार था। इनसाइडर अभी भी गोपनीय सामग्री बेच सकते थे।

परीक्षा केंद्रों को सुरक्षित करने से एक रास्ता बंद हो सकता है। कंप्यूटर आधारित परीक्षा से दूसरा रास्ता बंद हो सकता है। व्यक्तिगत रूप से शिक्षकों को गिरफ्तार करने से कुछ समय के लिए यह श्रृंखला टूट सकती है। लेकिन इनमें से कोई भी कदम तब तक पर्याप्त नहीं होगा जब तक कि अंदरूनी लोगों, कोचिंग संचालकों, सलाहकारों और उम्मीदवारों को जोड़ने वाले इस पूरे व्यावसायिक नेटवर्क को खत्म नहीं कर दिया जाता।

कोई प्रश्नपत्र अपने आप किसी गोपनीय प्रणाली से निकलकर पैसे देने वाले उम्मीदवारों तक नहीं पहुँचता। 2024 में इस ऑपरेशन के लिए स्कूल के अधिकारियों, ट्रंक खोलने में सक्षम व्यक्ति, MBBS सॉल्वरों, गेस्ट-हाउस संचालकों, उम्मीदवारों को इकट्ठा करने वाले रिक्रूटर्स, प्रिंटर, ट्रांसपोर्टर्स और पैसों का लेन-देन संभालने वालों की आवश्यकता थी।

2026 में इसके लिए NTA से जुड़े विशेषज्ञों, निजी कोचिंग सत्रों, काउंसलिंग बिचौलियों, कोचिंग फैकल्टी और डिजिटल रीसेलर्स की जरूरत थी। जो व्यक्ति पेपर चुराता है या उसे लीक करता है, वह केवल पहला सप्लायर होता है।

कोचिंग माफिया उस पेपर को व्यावसायिक मूल्य  प्रदान करता है। उसे पता होता है कि उम्मीदवार कहाँ मिलेंगे और कौन से परिवार इसके लिए भुगतान करेंगे। वह केंद्रों, दस्तावेजों, यात्रा और विशेष कक्षाओं की व्यवस्था कर सकता है। वह चुराए गए प्रश्नों को संभावित प्रश्नों के रूप में पेश कर सकता है और भुगतानों को कंसलटेंसी, ट्रस्टों व निजी खातों के माध्यम से रूट कर सकता है।

सरकार ने इसके लिए एक समर्पित कानून पेश किया है, परीक्षा प्रक्रियाओं का पुनर्गठन किया है, CBI जाँच के आदेश दिए हैं और फास्ट-ट्रैक कोर्ट की घोषणा की है। ये उपाय आवश्यक हैं। अगला कदम उन शिक्षा व्यवसायों को निशाना बनाना होना चाहिए जो गोपनीय पहुँच को एक बिकने वाले उत्पाद में बदल देते हैं।

कोचिंग सेंटरों और एडमिशन कंसलटेंसी का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य होना चाहिए। उनके स्वामित्व और वित्त का खुलासा होना चाहिए। NTA के विशेषज्ञों को निजी कोचिंग संबंधों से पूरी तरह दूर रखा जाना चाहिए।

प्रश्नों तक पहुँच को विभाजित किया जाना चाहिए और इसे डिजिटली ट्रेस करने योग्य बनाया जाना चाहिए। जो संस्थान जानबूझकर इसमें भाग लेते हैं, उन्हें काम करने का अधिकार खो देना चाहिए। अन्यथा परीक्षा प्राधिकरण पिछले लीक से लड़ता रहेगा जबकि कोचिंग माफिया अगले नए तरीके की तैयारी कर रहा होगा।

जिन कोर्ट डॉक्यूमेंट्स और FIR पर यह रिपोर्ट आधारित है, उन्हें इस लिंक से देखा जा सकता है।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

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Anurag is a Chief Sub Editor at OpIndia with over 22 years of professional experience, including more than six years in journalism. He is known for deep dive, research driven reporting on national security, terrorism cases, judiciary and governance, backed by RTIs, court records and on-ground evidence. He also writes hard hitting op-eds that challenge distorted narratives. Beyond investigations, he explores history, fiction and visual storytelling. Email: [email protected]

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