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भारत-चीन के बीच सिल्क रूट पर 6 साल बाद शुरू हुआ व्यापार, खुल गया Shipki La पास: क्यों अहम है ये रास्ता और कितने सामानों का होगा लेन-देन? जानिए सबकुछ

6 वर्षों के अंतराल के बाद भारत और चीन के बीच शिपकी ला दर्रे से सीमा व्यापार फिर शुरू हो गया है। जानिए इस ऐतिहासिक व्यापार मार्ग का इतिहास, कोविड और गलवान के बाद यह क्यों बंद हुआ, कौन व्यापार कर सकता है और इसका रणनीतिक व आर्थिक महत्व क्या है।

भारत और चीन के बीच ऐतिहासिक ‘शिपकी ला’ (Shipki La) दर्रे के जरिए सीमा व्यापार छह साल के लंबे अंतराल के बाद एक बार फिर शुरू हो गया है। इस प्राचीन मार्ग के फिर से खुलने से सदियों पुराने ‘सिल्क रूट’ पर एक बार फिर से व्यापारिक गतिविधियाँ और हलचल लौट आई हैं।

साल 2019 में फैली कोविड-19 महामारी और उसके बाद 2020 में गलवान घाटी में हुए गंभीर सैन्य तनाव के कारण यह व्यापारिक मार्ग पूरी तरह ठप पड़ा हुआ था। अब छह वर्षों बाद द्विपक्षीय सीमा व्यापार की बहाली से हिमाचल प्रदेश के सीमावर्ती जनजातीय क्षेत्रों में स्थानीय अर्थव्यवस्था और आजीविका के नए रास्ते भी खुलते दिख रहे हैं।

हिमालय की दुर्गम ऊँचाइयों पर स्थित यह मार्ग केवल आर्थिक लेन-देन का जरिया नहीं है, बल्कि यह दोनों देशों के बीच सीमावर्ती सुरक्षा, जनसांख्यिकीय महत्व और ऐतिहासिक कूटनीति का भी एक अहम केंद्र बिंदु रहा है।

क्या है सीमा व्यापार का इतिहास?

भारत और चीन के बीच सीमा व्यापार का इतिहास कई शताब्दियों पुराना है और यह प्राचीन ‘सिल्क रूट’ के सबसे महत्वपूर्ण हिस्सों में से एक माना जाता रहा है। ऐतिहासिक रूप से, भारत के उत्तरी सीमावर्ती राज्यों जैसे कि हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और सिक्किम के स्थानीय व्यापारी तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र के साथ स्वतंत्र और निर्बाध रूप से व्यापार करते आ रहे थे।

स्वतंत्रता के बाद आधुनिक भारत में इस व्यापार को एक औपचारिक और कानूनी स्वरूप देने के लिए वर्ष 1954 में ‘पंचशील समझौता’ किया गया। इस समझौते के तहत तीन प्रमुख सीमावर्ती बिंदुओं- हिमाचल प्रदेश में शिपकी ला, उत्तराखंड में लिपुलेख और सिक्किम में नाथू ला को आधिकारिक सीमा व्यापार केंद्र के रूप में मान्यता दी गई।

इस औपचारिक व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य दोनों देशों के सीमावर्ती इलाकों में रहने वाले जनजातीय समुदायों की बुनियादी जरूरतों को पूरा करना और उनकी आर्थिक स्थिति को मजबूत करना था। हालाँकि यह शुरुआती औपचारिक व्यापार बहुत लंबे समय तक नहीं चल सका।

वर्ष 1962 में भारत और चीन के बीच हुए युद्ध के बाद यह पूरा व्यापारिक ढाँचा अचानक ध्वस्त हो गया। सुरक्षा कारणों से भारत ने अपनी उत्तरी सीमाओं को सील कर दिया और यह व्यापारिक मार्ग अनिश्चितकाल के लिए बंद कर दिया गया।

इसके बाद दोनों देशों के बीच कूटनीतिक वार्ताओं की प्रक्रिया दोबारा शुरू हुई। 13 दिसंबर 1991 को सीमा व्यापार दोबारा शुरू करने पर समझौता हुआ। लंबे प्रयासों के बाद 1992 में उत्तराखंड के लिपुलेख, 1994 में हिमाचल के शिपकी ला और अंततः 2006 में सिक्किम के नाथू ला दर्रे को फिर से व्यापार के लिए खोल दिया गया।

व्यापार रुकने के मुख्य कारण

वर्ष 2000 के दशक में पुनः शुरू हुआ यह सीमा व्यापार लगभग डेढ़ दशक तक बिना किसी बड़ी रुकावट के मौसमी आधार पर संचालित होता रहा, लेकिन हाल के वर्षों में आई दो बड़ी अंतरराष्ट्रीय घटनाओं ने इस पर एक बार फिर से लंबा ब्रेक लगा दिया।

पहला निलंबन वर्ष 2019 के अंत और 2020 के शुरुआत में आया, जब वैश्विक स्तर पर फैले कोविड-19 संक्रमण को रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय सीमाओं को कड़ाई से सील कर दिया गया। सार्वजनिक स्वास्थ्य और सुरक्षा प्रोटोकॉल के कारण व्यापारिक गतिविधियों को अस्थायी रूप से रोक दिया गया था।

अभी महामारी का प्रभाव कम भी नहीं हुआ था कि मई-जून 2020 में पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में दोनों देशों की सेनाओं के बीच एक भीषण हिंसक सैन्य गतिरोध पैदा हो गया। सीमा पर बढ़ते सैन्य तनाव और गंभीर सुरक्षा चिंताओं को देखते हुए भारत सरकार और सुरक्षा एजेंसियों ने सीमा व्यापार से जुड़ी सभी गतिविधियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया।

इसके बाद के वर्षों में सीमा पर दोनों ओर से बड़े पैमाने पर सैन्य तैनाती रही, जिसके कारण शिपकी ला सहित अन्य सभी व्यापारिक दर्रों पर ताले लटके रहे। लगभग छह वर्षों के लंबे अंतराल, कूटनीतिक वार्ताओं, प्रशासनिक बैठकों और सीमा सुरक्षा प्रोटोकॉल के पुनर्मूल्यांकन के बाद अब इस व्यापार को पुनः संचालित करने का निर्णय लिया गया है।

आम लोगों के लिए प्रतिबंध का कारण

बहुत से लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि जब यह अंतरराष्ट्रीय सीमा व्यापार मार्ग खोला जाता है, तब भी इस पर आम नागरिकों, बाहरी व्यापारियों या पर्यटकों को आवाजाही और व्यापार की छूट क्यों नहीं दी जाती। दरअसल भारत-चीन सीमा व्यापार का यह मॉडल कोई सामान्य व्यावसायिक या खुला ई-कॉमर्स बाजार नहीं है।

यह एक अत्यधिक संवेदनशील, नियंत्रित और विशेष बार्टर एवं लोकल ट्रेड सिस्टम है। इसके आम लोगों के लिए प्रतिबंधित रहने का सबसे प्राथमिक कारण राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता का मुद्दा है। जिन भौगोलिक स्थानों से यह व्यापार होता है, वे सभी अत्यधिक संवेदनशील और उच्च सुरक्षा वाले सैन्य क्षेत्रों (High Security Military Zones) में स्थित हैं।

यदि इन मार्गों को आम जनता या बाहरी व्यापारियों के लिए अनियंत्रित रूप से खोल दिया जाए, तो इससे सीमावर्ती क्षेत्रों में घुसपैठ, अवैध नेटवर्क, तस्करी और संवेदनशील सैन्य प्रतिष्ठानों की जासूसी जैसे गंभीर सुरक्षा खतरे पैदा हो सकते हैं। इसी वजह से द्विपक्षीय समझौतों के अनुसार यह अधिकार केवल और केवल संबंधित सीमावर्ती जिलों (जैसे हिमाचल का किन्नौर या उत्तराखंड का पिथौरागढ़) के पंजीकृत स्थानीय निवासियों तक ही सीमित रखा जाता है।

इसके लिए स्थानीय प्रशासन, गृह विभाग और पुलिस एजेंसियां व्यापारियों का गहन पृष्ठभूमि और सुरक्षा सत्यापन (Security Verification) करती हैं। इस सत्यापन के बाद ही व्यापारियों को सीमित समय और कड़े सुरक्षा प्रोटोकॉल के तहत व्यापारिक पास जारी किए जाते हैं। आम जनता के लिए इन संवेदनशील दर्रों से आवाजाही पूरी तरह से प्रतिबंधित रहती है।

आयात और निर्यात होने वाले सामान

भारत-चीन सीमा व्यापार की एक अन्य बड़ी विशेषता यह है कि इसमें आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, भारी मशीनरी, ऑटोमोबाइल या बड़े औद्योगिक सामानों का आयात-निर्यात नहीं किया जा सकता। विदेश व्यापार महानिदेशालय (DGFT), भारत सरकार के वाणिज्य मंत्रालय और चीन के समकक्ष प्राधिकरणों द्वारा आपसी सहमति से पूर्व-निर्धारित और अधिसूचित वस्तुओं की एक स्पष्ट सूची तैयार की जाती है, जिसके बाहर किसी भी सामान का लेन-देन कानूनन अपराध माना जाता है।

भारत की ओर से मुख्य रूप से स्थानीय हस्तशिल्प उत्पाद, हथकरघा वस्त्र, पारंपरिक मसाले, गुड़, मेवे, चावल, वनस्पति तेल, चाय, कॉफी, कांसे व तांबे के बर्तन, रेडीमेड कपड़े और स्थानीय पहाड़ी क्षेत्रों में उगने वाली जड़ी-बूटियों का निर्यात तिब्बती स्वायत्त क्षेत्र के बाजारों में किया जाता है।

दूसरी ओर से चीन और तिब्बत के बाजारों से भारत में आने वाले सामानों में मुख्य रूप से पारंपरिक कच्चे माल और स्थानीय तिब्बती उत्पाद ही शामिल होते हैं।

सीमा व्यापार का महत्व

भारत और चीन के बीच इस सीमा व्यापार का दायरा भले ही दोनों देशों के बीच होने वाले अरबों डॉलर के कुल राष्ट्रीय आयात-निर्यात की तुलना में बहुत छोटा दिखता हो, लेकिन इसका सामाजिक, आर्थिक और रणनीतिक मूल्य अत्यधिक महत्वपूर्ण है।

सामाजिक-आर्थिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह व्यापार हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और सिक्किम के अत्यधिक दुर्गम और दूरदराज के जनजातीय क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की आजीविका का एक मुख्य मौसमी साधन है। कठोर भौगोलिक परिस्थितियों और सीमित संसाधनों के कारण इन क्षेत्रों में रोजगार के विकल्प बेहद सीमित होते हैं, ऐसे में कुछ महीनों के लिए खुलने वाला यह व्यापार स्थानीय परिवारों को अच्छी आय और संबल प्रदान करता है।

रणनीतिक और सामरिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो भारतीय सीमाओं पर स्थानीय आबादी का बसाव और उनका आर्थिक रूप से मजबूत होना राष्ट्रीय सुरक्षा का एक बेहद मजबूत आधार माना जाता है। भारत सरकार द्वारा सीमावर्ती बुनियादी ढाँचे (Border Infrastructure) को मजबूत करने के साथ-साथ इन पारंपरिक व्यापारिक मार्गों को नियंत्रित तरीके से संचालित करना यह दर्शाता है कि भारत अपनी संप्रभुता और सुरक्षा से समझौता किए बिना स्थानीय निवासियों के कल्याण के लिए प्रतिबद्ध है।

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सौम्या सिंह
सौम्या सिंह
ख़ुद को तराशने में मसरूफ़

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