प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा स्वतंत्रता दिवस के भाषण में इस्तेमाल किए गए शब्द ‘दिमागी नक्सल’ से वामपंथी और कॉन्ग्रेसी इकोसिस्टम बिलबिलाया हुआ है। हाल में इसी टिप्पणी को लेकर पूर्व केंद्रीय गृह मंत्री और वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेता पी चिदंबरम ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर खुद को गर्व से ‘दिमागी नक्सल’ घोषित किया। उन्होंने लिखा कि उन्हें ‘दिमागी नक्सल’ होने पर गर्व है।
I am proud to be a dimagi naxal !
— P. Chidambaram (@PChidambaram_IN) August 16, 2026
पीएम मोदी ने अपने संबोधन में ‘दिमागी नक्सल’ और जंगल में बंदूकें थामे ‘सशस्त्र नक्सलियों’ के बीच का फर्क साफ किया था। उन्होंने बताया कि जहाँ हथियारबंद नक्सली छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में हिंसा और खूनी खेल खेलते हैं, वहीं ये ‘दिमागी नक्सल’ सत्ता के गलियारों, वातानुकूलित कमरों और शैक्षणिक संस्थानों में बैठकर उसी जनसंहारी विचारधारा को खाद-पानी देते हैं।
इनका मुख्य मकसद भारत की संप्रभुता को चोट पहुँचाना और लोकतांत्रिक व्यवस्था को ध्वस्त करना है। पीएम मोदी ने देश को इन छद्म-बुद्धिजीवियों से सतर्क रहने की चेतावनी दी, जो युवाओं के मन में जहर घोलकर उन्हें काल्पनिक ‘क्रांति’ का मोहरा बनाते हैं।
हालाँकि, देश के पूर्व गृह मंत्री का खुलकर देशद्रोही और हिंसक नक्सली विचारधारा के पक्ष में खड़े होना बेहद शर्मनाक है, लेकिन कॉन्ग्रेस के इतिहास को देखते हुए इसमें कोई हैरानी नहीं होती।
चिदंबरम की यह स्वीकारोक्ति कोई नई बात नहीं है। साल 2010 में, जब वे देश के गृह मंत्री थे, तब उन्होंने जेएनयू (JNU) के मंच से सरेआम देश विरोधी ताकतों के आगे घुटने टेकने की पेशकश की थी। उन्होंने कहा था कि सरकार नक्सलियों से बिना उनके हथियार डाले भी बातचीत करने को तैयार है। उनका तर्क था कि चूँकि नक्सली ‘सशस्त्र संघर्ष’ में भरोसा रखते हैं, इसलिए सरकार उनसे हथियार छोड़ने को नहीं कहेगी।
चौंकाने वाली बात यह है कि चिदंबरम ने यह बयान दंतेवाड़ा में हुए उस बर्बर माओवादी हमले के ठीक एक महीने बाद दिया था, जिसमें 76 सीआरपीएफ (CRPF) जवान वीरगति को प्राप्त हुए थे। देश के वीर जवानों की शहादत पर मरहम लगाने के बजाय, कॉन्ग्रेसी गृह मंत्री नक्सलियों को पुचकार रहे थे और जेएनयू के वामपंथी गढ़ में इस बयान पर खूब तालियाँ पीटी गई थीं।
चिदंबरम के कार्यकाल में नक्सलवाद अपने चरम पर था, लेकिन कॉन्ग्रेस सरकार ने न केवल इस खतरे को अनदेखा किया, बल्कि तुष्टिकरण की नीति अपनाकर देश को आग में झोंकने का काम किया। चिदंबरम का नक्सली हमदर्दी का यह पुराना ट्रैक रिकॉर्ड और उनकी राष्ट्रीय सुरक्षा विरोधी सोच उनके ‘दिमागी नक्सल’ होने के दावे की पूरी तरह पुष्टि करती है।
एक तरफ जहाँ उनका दिल खूनी माओवादियों के लिए पसीजता रहा है, वहीं दूसरी तरफ उन्होंने और उनकी पार्टी ने सनातन और पूरे हिंदू समाज को बदनाम करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। कॉन्ग्रेस के वोटबैंक तुष्टिकरण का सबसे घिनौना चेहरा तब सामने आया जब चिदंबरम, सुशील कुमार शिंदे और दिग्विजय सिंह जैसे नेताओं ने ‘हिंदू आतंकवाद’ और ‘भगवा आतंकवाद’ जैसी काल्पनिक अवधारणाएँ गढ़ीं।
2008 के मालेगाँव बम विस्फोट मामले में साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर और सेवारत सैन्य अधिकारी लेफ्टिनेंट कर्नल श्रीकांत पुरोहित को झूठे मामलों में फँसाकर जेलों में सड़ने के लिए छोड़ दिया गया, ताकि ‘हिंदू आतंक’ का झूठा नैरेटिव खड़ा किया जा सके। हालाँकि, 17 साल की लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद अदालत में कॉन्ग्रेस का यह सफेद झूठ पूरी तरह बेनकाब हो गया और पूरा मामला औंधे मुंह गिर पड़ा।
इतना ही नहीं, चिदंबरम की भारत विरोधी और विकास विरोधी मानसिकता उनके हर फैसले में साफ झलकती है। जब मोदी सरकार ने भ्रष्टाचार और काले धन पर नकेल कसने के लिए डिजिटल पेमेंट और नोटबंदी जैसी क्रांतिकारी नीतियाँ लागू कीं, तो चिदंबरम ने इसका कड़ा विरोध किया और इसे ‘घोटाला’ तक बता डाला। जबकि विभिन्न अध्ययनों और रिपोर्टों ने यह साबित किया कि कैश-आधारित फंडिंग बंद होने से आतंकवाद और नक्सलवाद की रीढ़ की हड्डी टूट गई।
चिदंबरम का भारत की रक्षा तैयारियों और सैन्य मजबूती से भी पुराना बैर रहा है। 1998 में जब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने पोखरण-द्वितीय परीक्षण करके भारत को परमाणु शक्ति संपन्न बनाया, तब संसद में चिदंबरम ने इसका पुरजोर विरोध किया था।
उनका बचकाना तर्क था कि भारत को परमाणु हथियार बनाने के बजाय अपनी खोखली ‘नैतिक श्रेष्ठता’ बनाए रखनी चाहिए। भारत के आक्रामक और हिंसक पड़ोसियों को दरकिनार कर देश की सुरक्षा को दांव पर लगाने का तर्क देना यह साबित करता है कि चिदंबरम का दिमाग हमेशा से भारत विरोधी और ‘दिमागी नक्सलवादी’ सोच से ही संचालित होता रहा है।


