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‘यहाँ मस्जिद थी, है और रहेगी’: संभल दंगे की न्यायिक जाँच आयोग रिपोर्ट में सपा सांसद जिया-उर-रहमान बर्क का जिक्र 100+ बार, 199 साक्षियों से पूछताछ, खुद के बयान भी विरोधाभासी

संभल दंगों की न्यायिक जाँच आयोग की रिपोर्ट में सांसद जिया-उर-रहमान बर्क का 100 बार से भी अधिक बार जिक्र। प्रत्यक्षदर्शियों-गवाहों के आधार पर लिखा गया नाम। वीडियो, ऑडियो, डिजिटल हिस्ट्री, चैट्स जैसे सबूतों के साथ।

“यहाँ मस्जिद थी, है और रहेगी” – यह कहा था समाजवादी पार्टी के सांसद जिया-उर-रहमान बर्क ने। और यह कहा गया था उत्तर प्रदेश के संभल में जमा हुई मुस्लिम भीड़ के सामने। फिर यही भीड़ 24 नवंबर 2024 को दंगा करती है। भीड़ के निशाने पर होती है संभल की शाही जामा मस्जिद का सर्वे करने गई टीम। इस टीम में पुलिस-प्रशासन-न्यायालय के लोग थे। और इनको यह काम सौंपा था कोर्ट ने। ताकि पता लगाया जा सके कि मस्जिद के भीतर मंदिर के अवशेष हैं या नहीं। लेकिन इस सरकारी काम के आड़े आ गया एक सांसद और भीड़ को उकसाने के लिए दिया गया उसका नारा – “यहाँ मस्जिद थी, है और रहेगी।” अब जब संभल दंगों की न्यायिक जाँच आयोग की रिपोर्ट आई है तो सांसद जिया-उर-रहमान बर्क का इसमें 100 बार से भी अधिक जिक्र (PDF पेज 3 से लेकर PDF पेज 365 तक) किया गया है।

संभल दंगों की जाँच को लेकर न्यायिक जाँच आयोग की रिपोर्ट (हिंदी वाली) कुल 369 PDF पेज की है। 100 से ज्यादा बार सपा सांसद जिया-उर-रहमान बर्क का नाम इसी रिपोर्ट में दर्ज है। और यह हवा-हवाई नहीं है। सिर्फ पुलिस या प्रशासन के लोगों द्वारा लगाए गए आरोप नहीं हैं। प्रत्यक्षदर्शियों और गवाहों के आधार पर इनका नाम लिखा गया है। वीडियो, ऑडियो, डिजिटल हिस्ट्री, वॉट्सऐप चैट्स, इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट सहित राष्ट्रीय व स्थानीय मीडिया कवरेज जैसे तमाम सबूतों के साथ सांसद महोदय का नाम दर्ज किया गया है।

रिपोर्ट की शुरुआत होती है 3 पन्नों की प्रस्तावना से। प्रस्तावना के पॉइंट 5 में यह स्पष्ट लिख दिया गया है कि कैसे जिया-उर-रहमान बर्क और इनके समर्थकों के कारण 19 नवंबर 2024 को संभल स्थित शाही जामा मस्जिद का सर्वे पूरा नहीं किया जा सका। मतलब यह रिपोर्ट शुरू भी होती है बर्क से और अंत भी इसी नाम के साथ।

24 नवंबर 2024 को दंगा… षड्यंत्र रचा था 19 नवंबर को ही

19 नवंबर 2024 को मंगलवार था। तिथि के साथ-साथ दिन भी जरूरी है, यह थोड़ी देर में स्पष्ट हो जाएगा। मंगलवार को सबको सूचित (संभल स्थित जामा मस्जिद की प्रबंध समिति और उनके अध्यक्ष तक को) करके मस्जिद का सर्वे करने जाती है टीम। साथ में पुलिस-प्रशासन भी, कवरेज के लिए मीडिया भी। इससे पहले कि सर्वे पूरा होता, भारी संख्या में मुस्लिम भीड़ मस्जिद को चारों तरफ से घेर चुकी थी। संभल के सांसद जिया-उर-रहमान बर्क भी अपने समर्थकों की भीड़ लेकर मस्जिद पहुँच गए थे। माहौल तनावपूर्ण हो गया था। शाम में रोशनी की कमी और अनियंत्रित भीड़ के बढ़ते दबाव के कारण सर्वे उस दिन स्थगित करना पड़ा।

3 दिन के बाद आया 22 नवंबर 2024। दिन शुक्रवार। मतलब जुम्मे की नमाज। मुस्लिमों को तब तक भड़काया जा चुका था। संभल जामा मस्जिद के अंदर और उसके आसपास माहौल तनावपूर्ण था। हर शुक्रवार को जितने नमाजी इस मस्जिद में आते थे, उससे कहीं अधिक और असामान्य भीड़ इस दिन नमाज के लिए जमा थी। इसी भीड़ में संभल के सांसद भी थे, मतलब जिया-उर-रहमान बर्क। इन सबको देखते हुए, कानून और शांति-व्यवस्था बनाए रखने के लिए बड़ी संख्या में पुलिस बल को तैनात किया गया था। कायदे से होना यह चाहिए था कि एक नेता के तौर पर बर्क को पुलिस-प्रशासन का साथ देना चाहिए था, भीड़ के गुस्से को दूर करने का प्रयास किया जाता… लेकिन किया गया ठीक इसके उल्टा।

नमाज के बाद सपा सांसद जिया-उर-रहमान बर्क ने मस्जिद से बाहर निकल कर मीडिया से बातचीत की। मस्जिद की सीढ़ियों पर खड़े होकर उन्होंने मीडिया के सवालों का जवाब देने के बहाने मुस्लिम भीड़ को संबोधित करते हुए कहा – “यहाँ मस्जिद थी, है और रहेगी।” इस भड़काऊ भाषण से भीड़ को स्पष्ट दिशा-निर्देश मिल गया – जामा मस्जिद का जब भी शेष सर्वे किया जाएगा, उसके लिए तैयार रहो। ठीक 2 दिन बाद भीड़ ने वैसा ही सुलूक किया, जिस अंदाज में सांसद ने भड़काया था।

23 नवंबर को सपा सांसद की राजनीतिक हार, 24 नवंबर को संभल में दंगा

22 नवंबर के ठीक एक दिन बाद 23 नवंबर 2024 को एक और घटना हुई, जो सपा सांसद जिया-उर-रहमान बर्क से संबंधित थी। इस घटना का जामा मस्जिद से कोई लेना-देना नहीं था लेकिन इसने बर्क के समर्थकों के लिए आग में घी का काम किया।

सांसद बनने से पहले बर्क कुंदरकी विधानसभा के विधायक थे। यहाँ उपचुनाव करवाना पड़ा था क्योंकि विधायक रहते हुए इन्होंने सांसदी का चुनाव लड़ा था, जीता था। उपचुनाव में भाजपा के उम्मीदवार से समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी बुरी तरह हार गए और यह नतीजा आया था 23 नवंबर 2024 को। मतलब एक दिन पहले सांसद बर्क ने मुस्लिमों का रहनुमा बन कर उनको जामा मस्जिद के सर्वे के खिलाफ भड़काया, दूसरे ही दिन एक तरह से उनको और उनकी समाजवादी पार्टी को राजनीतिक हार का सामना करना पड़ा।

जामा मस्जिद के सर्वेक्षण हेतु नियुक्त कमिश्नर रमेश सिंह राघव ने शेष सर्वे के काम को संपन्न करने के लिए संभल के जिलाधिकारी (डीएम) से 23 नवंबर 2024 को अनुमति माँगी। 4 दिन पहले 19 नवंबर को सर्वे के दौरान जिस तरह की परिस्थितियाँ उत्पन्न हुई थीं, उनको ध्यान में रखते हुए उचित पुलिस व्यवस्था का अनुरोध भी उन्होंने किया। प्रशासन की तरफ से शेष सर्वे की अनुमति मिली, दिन तय हुआ – 24 नवंबर का। इसके बाद 23 नवंबर की रात को ही संभल के एसडीएम/सीओ ने जामा मस्जिद के अध्यक्ष और एडवोकेट जफर अली को इसकी सूचना दे दी थी, ताकि वो मस्जिद प्रबंध समिति के साथ शेष सर्वे के वक्त मौजूद रहें, भीड़ को नियंत्रित करें। संभल के सांसद जिया-उर-रहमान बर्क को भी सूचित किया गया था, जो उस समय बेंगलुरु में थे। संभल के विधायक इकबाल महमूद के बेटे सुहेल इकबाल के साथ-साथ मस्जिद समिति के अन्य सदस्यों को भी रात में ही सूचित कर दिया गया था।

भीड़ नियंत्रण के लिए संवेदनशील स्थानों पर बैरिकेडिंग, पैरा-मिलिट्री कंपनियों की तैनाती, जामा मस्जिद में खुद संभल के डीएम-एसपी की मौजूदगी – मतलब पुलिस-प्रशासन ने भी शेष सर्वे के लिए हर संभव तैयारियाँ की थीं। लेकिन जैसे ही सर्वे शुरू हुआ, मजहबी नारों के साथ मुस्लिम भीड़ ने मस्जिद को घेर लिया। पथराव की शुरुआत के साथ भीड़ धीरे-धीरे और हिंसक होती चली गई। कई वाहनों में दंगाई भीड़ ने आग लगा दी। कुछ जगहों पर पुलिस दल पर हमला किया गया, उनके सरकारी हथियार छीन लिए गए। पत्थरबाजी के कारण कई पुलिस अधिकारी और जवान गंभीर रूप से घायल भी हुए। आत्मरक्षा में पुलिस ने भी लाठीचार्ज किया, आँसू गैस, मिर्च बम और रबड़ की गोलियों का इस्तेमाल किया गया।

इस बीच सर्वे टीम को सर्वेक्षण पूरा करने के बाद जामा मस्जिद से सुरक्षित निकाल कर संभल पुलिस स्टेशन तक हिंदू मोहल्ले के रास्ते बचते-बचाते लाया गया। पुलिस-प्रशासन की मुस्तैदी और पर्याप्त बैरिकेडिंग के कारण दंगाई हिंदू मोहल्ले में प्रवेश नहीं कर पाए। इससे दंगा जामा मस्जिद के आसपास ही सीमित रहा, नियंत्रित कर लिया गया। हालाँकि दंगाइयों ने 4 लोगों (अयान, नईम, बिलाल, मोहम्मद कैफ) को मार डाला। इस दंगे से संबंधित कुल 12 FIR संभल कोतवाली और नखासा पुलिस स्टेशन में दर्ज की गई है, जसमें 7 पुलिस की और से है, जबकि 5 अन्य निजी व्यक्तियों द्वारा दर्ज करवाई गई है।

जिया-उर-रहमान बर्क के भड़काऊ भाषण/धमकी

1.
“यह मस्जिद है, मस्जिद थी, और मस्जिद रहेगी। कोई भी हमारी मस्जिद हमसे नहीं ले सकता।”

2.
“मस्जिद थी, मस्जिद है, और मस्जिद रहेगी, कयामत तक।”

3.
“जैसे अयोध्या में हमारी मस्जिद छीनी गई, वैसे ही इसे नहीं छीनने देंगे।”

4.
“पुलिस कितने ही ड्रोन तैनात कर ले, मस्जिद थी, है, और रहेगी, और हमें इसे हर हाल में बचाना है।”

5.
“जामा मस्जिद हमारी है, हमारी रहेगी, कोई इसे छीन नहीं सकता, हम इसे बचाने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।”

6.
“आप बाहरी लोग, मस्जिद के अंदर कैसे आए? आप संभल का माहौल खराब करना चाहते हैं।”

7.
“जो भी तमाशा करना चाहते हो, 10 मिनट में खत्म करो, वरना स्थिति ऐसी हो जाएगी कि तुम संभाल नहीं पाओगे।”

8.
“हम पुलिस, प्रशासन या सरकार से डरने वाले नहीं हैं। हम इस देश के मालिक हैं, नौकर या गुलाम नहीं।”

9.
“हमारा कर्तव्य है कि हम अपने धर्म का पालन करें और अपने धार्मिक स्थलों की रक्षा करें। जिस तरह से यहाँ संविधान का गला घोंटा जा रहा है, जिस तरह सरकार संविधान को तार-तार कर रही है; हम इस मस्जिद के लिए लड़ने के लिए तैयार हैं। इंशाल्लाह, हम हमेशा जामा मस्जिद की हर तरह से रक्षा करने के लिए मौजूद रहेंगे। हम 1947 से पहले हमारे राज्य और देश में मौजूद धार्मिक स्थलों और मस्जिदों को किसी को लेने नहीं देंगे।”

10.
“बाहरी लोगों ने सर्वे के लिए याचिका दायर की थी और कोर्ट ने आदेश पारित किया था। यह हमारा अधिकार है कि हम कोर्ट के आदेश से संतुष्ट हैं या इसका विरोध करते हैं। लाखों मुस्लिम यहाँ इकट्ठा होना चाहते थे। मैं सर्वे के खिलाफ हूँ। यह मस्जिद थी, मस्जिद है और मस्जिद रहेगी।”

11.
“जिन लोगों ने सर्वे याचिका दायर की, वे शरारती तत्व हैं। मैं कोर्ट के आदेश से संतुष्ट नहीं हूँ। मैं खुलकर पुलिस प्रशासन को बताता हूँ कि भले ही वे यहाँ दस ड्रोन कैमरे लाएँ, यह मस्जिद है, मस्जिद थी और कयामत के दिन तक मस्जिद रहेगी। यह मस्जिद किसी धार्मिक स्थल को तोड़कर नहीं बनाई गई थी। इस्लाम सिखाता है कि किसी मुस्लिम की सहमति के बिना भी उसकी जमीन पर जबरदस्ती धार्मिक स्थान नहीं बनाया जा सकता, किसी अन्य धार्मिक स्थल की तो बात ही छोड़ दें। हम पुलिस प्रशासन या सरकार द्वारा दबाए नहीं जाएँगे। हम इस देश के मालिक हैं, गुलाम या नौकर नहीं। संविधान का गला घोंटा जा रहा है; इसकी पवित्रता को तार-तार किया जा रहा है। हम अपनी जामा मस्जिद को कानूनी रूप से बचाएँगे और इंशा अल्लाह, इसे सुरक्षित रखने के लिए हर जरूरी काम करेंगे। हम सभी हमेशा जामा मस्जिद की रक्षा के लिए हर तरह से प्रतिबद्ध रहे हैं और रहेंगे। यह मस्जिद 1947 से पहले की है और हम इसे किसी को छीनने नहीं देंगे।”

24 नवंबर 2024 को संभल में हुआ दंगा सुनियोजित था। विवादित जामा मस्जिद के सर्वेक्षण को लेकर कोर्ट के आदेश के बावजूद समाजवादी पार्टी के सांसद जिया-उर-रहमान बर्क ने इसके लिए साजिश रची थी। भड़काऊ भाषण, मजहबी नारों आदि से उन्होंने मुस्लिम समुदाय के लोगों को इसके लिए उकसाया था। इस संदर्भ में तमाम गवाहों और प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों के आधार पर उनके खिलाफ FIR भी दर्ज किया गया है:
अपराध संख्या 335/2024 (थाना: संभल, जिला संभल): स्टेट बनाम जियाउर रहमान बर्क और एक अन्य नामजद, साथ ही 700-800 अज्ञात व्यक्ति
इस मामले में 23 आरोपितों के खिलाफ चार्ज-शीट नंबर 96/2025 न्यायालय में प्रस्तुत किया जा चुका है, शेष आरोपितों के खिलाफ जाँच जारी है।

सपा सांसद बर्क के विरोधाभासी बयान

संभल दंगों की न्यायिक जाँच आयोग के समक्ष स्थानीय सांसद जिया-उर-रहमान बर्क ने भी अपनी गवाही दी है। पूरी गवाही में उन्होंने खुद को पाक-साफ दिखाने की कोशिश की है। अपने ऊपर लगे किसी भी तरह के आरोपों से इनकार किया है। लेकिन कुछ तथ्य और गवाह ऐसे हैं, जो सांसद द्वारा दी गई गवाही से विरोधाभास रखते हैं।

(i) सांसद बर्क के अनुसार वो 19 नवंबर 2024 को सर्वे के दौरान अकेले जामा मस्जिद में प्रवेश किए, समर्थकों के बिना। पुलिस-प्रशासन से जुड़े 10 लोगों की गवाही इससे विपरीत है। कोर्ट कमिश्नर और उनके कैमरामैन की गवाही में भी यह बात स्पष्ट है कि सांसद भीड़ के साथ मस्जिद में घुसे। वादी पक्ष के अधिवक्ताओं, सरकारी अधिवक्ताओं के साथ-साथ महंत श्री ऋषिराज गिरी ने भी सांसद को भीड़ के साथ मस्जिद में प्रवेश करने की गवाही दी है। सबसे दिलचस्प है जामा मस्जिद प्रबंधन समिति के अध्यक्ष जफर अली की गवाही। इन्होंने भी आयोग को बताया है कि 19 नवंबर को सांसद जिया-उर-रहमान बर्क अपने समर्थकों के साथ मस्जिद में आए।

(ii) सांसद बर्क ने आयोग को बताया कि 19 नवंबर 2024 को उन्होंने मीडिया से बात की, ऐसा उन्हें याद नहीं। जब उन्हें वीडियो रिकॉर्डिंग दिखाई गई, तब उन्होंने इस बात को स्वीकार किया। आश्चर्यजनक यह है कि स्थानीय सांसद के अलावा जितने भी लोगों ने (मस्जिद समिति के लोगों ने भी) आयोग के सामने अपने बयान दर्ज करवाए, सबने बर्क द्वारा मीडिया से बात करने वाली बात बताई – यहाँ तक की जामा मस्जिद प्रबंधन समिति के अध्यक्ष जफर अली ने भी।

(iii) ‘मन्नत’ वॉट्सऐप ग्रुप और ‘संभल सांसद’ वॉट्सऐप ग्रुप में भेजे गए मैसेज (22 नवंबर को जुमे की नमाज के लिए जामा मस्जिद में ज्यादा से ज्यादा लोग पहुँचे, किसी और मस्जिद न जाएँ) के बारे में सांसद बर्क ने कहा कि वो जनप्रतिनिधि हैं, इसलिए ऐसे ग्रुपों को छोड़ नहीं सकते लेकिन ऐसा कोई भी मैसेज उन्होंने पढ़ा नहीं है।

(iv) 22 नवंबर 2024 के बारे में सांसद बर्क ने कहा कि उस दिन जुमे की नमाज के बाद उन्होंने कोई भाषण नहीं दिया था बल्कि वहाँ मौजूद मीडिया के सवालों का सिर्फ जवाब दिया था। अगर ये भाषणबाजी नहीं कर रहे थे, भीड़ को उकसा नहीं रहे थे, तो जामा मस्जिद प्रबंधन समिति के अध्यक्ष जफर अली को अपनी गवाही में यह क्यों कहना पड़ा – “जब सांसद बर्क नमाजियों को संबोधित कर रहे थे, तब उनको चुप करवाने की कोशिश भी की थी। कहा था, “बस, कृपया रूकें।” लेकिन सांसद बर्क ने अनसुना कर दिया, बोलना जारी रखा।”

इसके अलावा मशहूद अली फारूकी, जो जामा मस्जिद प्रबंधन समिति के सदस्य और अधिवक्ता हैं, उन्होंने अपनी गवाही में यह क्यों लिखवाया – “22 नवंबर 2024 को जुमे की नमाज के बाद सांसद बर्क ने मस्जिद की सीढ़ियों पर से मीडिया को संबोधित किया था। मस्जिद की सीढ़ियों से राजनीतिक बयान या प्रेस कॉन्फ्रेंस अनुचित था।”

सांसद बर्क मीडिया द्वारा पूछे गए सवालों का सिर्फ जवाब दे रहे थे, आयोग ने इसके विपक्ष में उन्हें एक वीडियो क्लिप दिखाई। यह वीडियो 22 नवंबर को ही इंडिया टीवी पर प्रसारित की गई थी। इस क्लिप में वहाँ मौजूद मीडिया कोई भी सवाल नहीं कर रही थी, केवल सांसद बोल रहे थे.

(v) 24 नवंबर को जामा मस्जिद का शेष सर्वेक्षण होगा, इसकी जानकारी सांसद बर्क को मस्जिद समिति के अध्यक्ष जफर अली ने फोन पर दी। आयोग के सामने इस बात पर सांसद ने सहमति जताई। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि इसी सांसद बर्क ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में एक शपथ-पत्र दायर किया था, जिसमें कहा गया था – “24 नवंबर 2024 को जामा मस्जिद का शेष सर्वे होना है, इसकी जानकारी सांसद बर्क को नहीं थी।”

(vi) सांसद बर्क ने जफर अली से 23-24 नवंबर 2024 की रात कई बार बात की, इस तथ्य से सांसद ने इनकार किया। जबकि विरोधाभास यह है कि सांसद बर्क ने 23 नवंबर की रात 11:04 बजे जफर अली को कॉल किया। फिर सांसद बर्क से जफर अली को रात 12:32 बजे और 01:48 बजे कॉल प्राप्त हुई है। इसमें भीड़ एकत्र करने और सर्वेक्षण को हर हाल में रोकने की योजना बनाई गई, किसी भी स्थिति से निपटने की तैयारी की गई। यह सब कुछ CDR में दर्ज है, वॉट्सऐप कॉल इंटरेक्शन भी।

संभल सांसद जिया-उर-रहमान बर्क के खिलाफ गवाही

गवाह नंबर 1 – जिला मजिस्ट्रेट संभल, डॉ राजेंद्र पेंसिया:

सपा सांसद जिया-उर-रहमान बर्क की संलिप्तता (भीड़ को उकसाना, मस्जिद के भीतर जबरन घुसना और सर्वे करने गई टीम को धमकाना) को लेकर आयोग की रिपोर्ट में सबसे पहली गवाही संभल जिला मजिस्ट्रेट डॉ राजेंद्र पेंसिया की है। इनके अनुसार 19 नवंबर 2024 को सांसद बर्क ने स्थानीय विधायक के बेटे (सुहेल इकबाल) के साथ 200 लोगों की भीड़ का नेतृत्व किया, पुलिस को धक्का देकर जबरन मस्जिद में प्रवेश किया। इन लोगों ने सर्वे को बाधित किया और धमकियाँ भी दीं।

जिले में धारा 163 (BNSS) लागू होने के बावजूद 3 दिन बाद 22 नवंबर को सांसद बर्क ने बिना प्रशासनिक अनुमति के विवादित जामा मस्जिद में भीड़ जमा की, प्रेस कॉन्फ्रेस आयोजित की, कोर्ट के आदेश पर असहमति जताई, विशेष समुदाय (मुस्लिम) को एकजुट होने और जामा मस्जिद की रक्षा के लिए भड़काऊ बयान दिया।

23 नवंबर 2024 को कुंदरकी उप-चुनाव में जब समाजवादी पार्टी का प्रत्याशी हार गया तो सांसद बर्क ने इसके लिए भी पुलिस-प्रशासन को जिम्मेदार ठहराया, “उत्तर प्रदेश में संविधान की हत्या” जैसे शब्दों की प्रयोग कर अपने समर्थकों को भड़काया, हिंसा के लिए अनुकूल वातावरण बनाया।

गवाह नंबर 2 – अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट संभल, प्रदीप वर्मा:

19 नवंबर की शाम 6:00 बजे के आसपास सांसद जिया-उर-रहमान बर्क और संभल के विधायक महमूद इकबाल के बेटे सुहेल इकबाल लगभग 200 अन्य व्यक्तियों के साथ जामा मस्जिद के अंदर मौजूद थे। जन प्रतिनिधियों और अन्य उपस्थित व्यक्तियों ने बार-बार सर्वेक्षण प्रक्रिया में बाधा डाली और धमकियाँ दीं। इतने सारे लोगों की उपस्थिति के कारण सर्वेक्षण सुचारू रूप से नहीं हो सका।

गवाह नंबर 3 – उप-जिलाधिकारी संभल, डॉ वंदना मिश्रा:

19 नवंबर की शाम 6:00 बजे के आसपास सांसद जिया-उर-रहमान बर्क और संभल के विधायक महमूद इकबाल के बेटे सुहेल इकबाल लगभग 200 अन्य व्यक्तियों के साथ जामा मस्जिद के अंदर मौजूद थे। जन प्रतिनिधियों और अन्य उपस्थित व्यक्तियों ने बार-बार सर्वेक्षण प्रक्रिया में बाधा डाली और धमकियाँ दीं। इतने सारे लोगों की उपस्थिति के कारण सर्वेक्षण सुचारू रूप से नहीं हो सका।

22 नवंबर को सांसद बर्क ने बिना प्रशासनिक अनुमति के विवादित जामा मस्जिद में भीड़ जमा की, प्रेस कॉन्फ्रेस आयोजित की, कोर्ट के आदेश पर असहमति जताई। साथ ही विशेष समुदाय (मुस्लिम) को एकजुट होने और जामा मस्जिद की रक्षा के लिए एकत्र होने का भड़काऊ बयान दिया।

यह सब कुछ संभल की उप-जिलाधिकारी डॉ वंदना मिश्रा की आँखों के सामने हुआ क्योंकि उस दिन शुक्रवार की नमाज को शांतिपूर्वक कराने की प्रशासनिक जिम्मेदारी इनको दी गई थी। इनके अनुसार सांसद बर्क ने 22 नवंबर को एक नहीं बल्कि 2 बार प्रेस से बात की – एक बार मस्जिद की सीढ़ियों पर, दूसरी बार अपनी गाड़ी के पास पहुँच कर। इन्होंने मामला अदालत में लंबित होने के कारण सांसद से किसी भी तरह की टिप्पणी नहीं करने का 3 बार अनुरोध भी किया, लेकिन वो नहीं माने।

संभल की उप-जिलाधिकारी वंदना मिश्रा के अनुसार पूरी घटना पूर्व-नियोजित थी। इसका उद्देश्य शहर में भय का माहौल बनाना और सर्वेक्षण टीम को अपना काम पूरा करने से रोकना था। साथ ही भविष्य में भी ऐसी किसी टीम को किसी भी तरह के सर्वेक्षण करने से रोकना था।

गवाह नंबर 4 – अधिशासी अधिकारी, संभल नगर पालिका, मणिभूषण तिवारी:

मणिभूषण तिवारी संभल के जिलाधिकारी द्वारा गठित 3 सदस्यीय समिति में थे। 19 नवंबर को जामा मस्जिद के सर्वे के दौरान इनकी मौजूदगी में सांसद, विधायक के बेटे (सुहेल इकबाल)ने सर्वेक्षण कार्य में बाधा पहुँचाई। 24 नवंबर के दंगों के बाद की स्थिति (पत्थरबाजी के कारण) ऐसी थी कि नगर पालिका की टीम को मलबा हटाने में 4-5 दिन लग गए। कुल 6 ट्रॉली ईंट-पत्थर-मलबा हटवाया गया।

गवाह नंबर 5 – संभल पुलिस अधीक्षक, कृष्ण कुमार:

19 नवंबर को जामा मस्जिद का सर्वेक्षण करने जब सर्वे टीम पहुँची, तो संभल विधायक के बेटे सुहेल इकबाल अपने 200 समर्थकों के साथ मस्जिद में मौजूद थे। इसके 30 मिनट के बाद सांसद जिया-उर-रहमान बर्क भी अपने समर्थकों के साथ पहुँच गए। उन्हें धारा 163 BNSS के बारे में सूचित किया गया, लेकिन उन्होंने इसे नजरअंदाज कर दिया और 10-15 समर्थकों के साथ जबरन मस्जिद में प्रवेश किया। उन्होंने सर्वे टीम से कहा – “आप बाहरी लोग, मस्जिद के अंदर कैसे आए? आप संभल का माहौल खराब करना चाहते हैं।”

जन प्रतिनिधियों और अन्य उपस्थित व्यक्तियों ने बार-बार सर्वेक्षण प्रक्रिया में बाधा डाली और धमकियाँ दीं। शाम के वक्त अंधेरा होने और बार-बार व्यवधान के कारण सर्वे का काम उस दिन स्थगित कर दिया गया। इसके बाद जिला मजिस्ट्रेट ने पत्रकारों को सर्वेक्षण की जानकारी दी। सांसद बर्क ने भी इस समय मीडिया से बातचीत की। भीड़ एकत्र करके सर्वे को सफलतापूर्वक बाधित करने के बाद सांसद बर्क और मस्जिद समिति का आत्मविश्वास बढ़ा। इसी आत्मविश्वास के कारण इन लोगों ने आगे की साजिश रची।

जिले में धारा 163 BNSS लागू थी। इसके बावजदू 21 नवंबर को ‘संभल सांसद’ के नाम से बने वॉट्सऐप ग्रुप में अब्दुल्ला और कासिफ हुसैन नाम के दो व्यक्तियों ने एक मैसेज भेजा, जिसमें लिखा था – “संभल के सभी लोग शुक्रवार की नमाज शाही जामा मस्जिद में बड़ी संख्या में अदा करें और शाही जामा मस्जिद के पास की मस्जिदों में नहीं। केवल शाही जामा मस्जिद में नमाज अदा करें, और इस संदेश को यथासंभव साझा करें।” इसी तरह का मैसेज ‘मन्नत’ नामक एक वॉट्सऐप ग्रुप के माध्यम से किया गया ताकि शुक्रवार की नमाज के लिए शाही जामा मस्जिद में बड़ी भीड़ एकत्र हो।

22 नवंबर को जामा मस्जिद में भीड़ को सुनियोजित ढंग से एकत्रित किया गया। सांसद बर्क और संभल विधायक का घर जामा मस्जिद से 2 किलोमीटर दूर है, वो आमतौर पर अपने-अपने क्षेत्र की मस्जिदों में नमाज अदा करते हैं लेकिन 22 नवंबर (शुक्रवार) को सांसद बर्क के साथ-साथ संभल विधायक के बेटे सुहेल इकबाल ने अपने क्षेत्र की मस्जिदों में नमाज अदा करने के बजाय जामा मस्जिद आकर नमाज पढ़ी। इतना ही नहीं, सांसद बर्क ने धारा 163 BNSS का उल्लंघन करते हुए मजहबी भावनाओं को भड़का कर भीड़ को उकसाया भी। साथ ही प्रेस कॉन्फ्रेस भी आयोजित की। मीडिया को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा – “यह मस्जिद है, मस्जिद थी, और मस्जिद रहेगी। कोई भी हमारी मस्जिद हमसे नहीं ले सकता।”

इन उकसाने वाले बयानों को समर्थकों ने वॉट्सऐप ग्रुपों और अन्य माध्यमों से प्रसारित किया ताकि लोगों को भड़काया जा सके। ऐसा सुनिश्चित करने के लिए किया गया कि यदि सर्वेक्षण फिर से शुरू हुआ तो इसे किसी भी कीमत पर रोका जाए। राजनीतिक लाभ के इरादे से उन्होंने सार्वजनिक तौर पर न्यायालय के आदेश से असहमति भी व्यक्त की, साथ ही समुदाय विशेष (मुस्लिमों) को इसके लिए उकसाया भी।

प्रेस को संबोधित करते हुए सांसद बर्क ने भड़काऊ भाषण भी दिया। इस भाषण से वहाँ खड़ी भीड़ को यह संदेश गया कि सर्वेक्षण के माध्यम से जामा मस्जिद को हड़पने की कोशिश की जा रही है। इसके फलस्वरूप 24 नवंबर 2024 को सर्वे के दौरान हिंसक घटनाएँ हुईं। 22 नवंबर को सांसद बर्क के कार्यों के संबंध में 23 नवंबर को धारा 168 BNSS के तहत एक नोटिस भी जारी किया गया।

23 नवंबर को कुंदरकी उप-चुनाव के परिणाम घोषित हुए। यहाँ से जिया-उर-रहमान बर्क पहले विधायक थे, जो सीट उनके सांसद बनने के बाद खाली हो गई थी। समाजवादी पार्टी इस सीट पर हार गई, निश्चित ही यह चुनाव परिणाम सांसद बर्क की अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं थे। इस बात को लेकर भी उन्होंने पुलिस और प्रशासन को हार के लिए दोषी ठहराया और उनकी निष्पक्षता पर सवाल उठाए।

24 नवंबर को जामा मस्जिद का शेष सर्वेक्षण फिर से शुरू किया जाएगा, इसकी सूचना 23 नवंबर की शाम को मस्जिद के अध्यक्ष जफर अली को उनके निवास पर दी गई। इसके बाद जफर अली ने 23 नवंबर की रात 10:01 बजे 38 सेकंड की कॉल के माध्यम से सांसद बर्क को सर्वेक्षण के बारे में सूचित किया, यह जफर अली के CDR में दर्ज है। बाद में रात 11:04 बजे सांसद बर्क ने जफर अली को कॉल-बैक किया, यह भी CDR में दर्ज है। चूँकि सांसद बर्क संभल में मौजूद नहीं थे, ऐसे में उन्होंने जफर अली को भीड़ एकत्र करने की जिम्मेदारी सौंपी, जो अपनी स्थिति के कारण कम समय में बड़ी भीड़ जुटा सकते थे।

सांसद बर्क के निर्देशों का पालन करते हुए जफर अली ने आधी रात को सुहेल इकबाल (जामा मस्जिद इंतजामिया कमेटी के कैशियर और संभल के विधायक के बेटे) के निवास पर अन्य कमेटी सदस्यों के साथ एक बैठक की, जिसमें सर्वेक्षण और सांसद बर्क के निर्देशों के बारे में जानकारी दी गई। इसके बाद सांसद बर्क से जफर अली को 24 नवंबर की रात 12:32 बजे और 01:48 बजे कॉल प्राप्त हुईं, जिनमें भीड़ एकत्र करने और सर्वेक्षण को हर हाल में रोकने की योजना बनाई गई, किसी भी स्थिति से निपटने की तैयारी की गई। वॉट्सऐप कॉल इंटरेक्शन भी CDR में दर्ज है।

“24 नवंबर 2024 को जामा मस्जिद का शेष सर्वे होना है, इसकी जानकारी सांसद बर्क को नहीं थी।” – इलाहाबाद उच्च न्यायालय में सांसद बर्क ने यह जो शपथ-पत्र दायर किया है, वो पूरी तरह से असत्य है। पुलिस पर दबाव डालने, झूठे और गंभीर आरोप लगाते हुए 25 नवंबर को जफर अली ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की। इसमें उन्होंने कहा कि उनके खिलाफ झूठे साक्ष्य गढ़े गए हैं। जबकि सत्य यह है कि सांसद जिया-उर-रहमान बर्क के साथ मिलकर जफर अली ने सर्वे को रोकने के लिए साजिश रची। इसके संबंध में संभल कोतवाली पुलिस स्टेशन में सांसद बर्क और सुहेल इकबाल के खिलाफ क्राइम नंबर 335/24 दर्ज किया गया है।

गवाह नंबर 6 – श्रीश्चंद, संभल अपर पुलिस अधीक्षक (उत्तरी):

19 नवंबर को सर्वेक्षण के दौरान सांसद जिया-उर-रहमान बर्क और अन्य राजनीतिक हस्तियों के समर्थकों की भीड़ जामा मस्जिद के अंदर और बाहर एकत्र हुई। इन लोगों ने नारेबाजी और विरोध-प्रदर्शन शुरू कर दिया। सर्वे के दौरान व्यवधान किए गए, इसलिए कार्यवाही पूरी नहीं हो सकी।

22 नवंबर को संभल सांसद ने बिना किसी प्रशासनिक अनुमति के (पहले से लागू धारा 163 BNSS का उल्लंघन करते हुए) दोपहर लगभग 1 बजे बड़ी संख्या में अपने समर्थकों के साथ जामा मस्जिद पहुँचे। सामान्य रूप से सांसद जामा मस्जिद में नमाज नहीं अदा करते और अपने क्षेत्र दीपा सराय में नमाज अदा करते हैं। नमाज के बाद उन्होंने जामा मस्जिद के मुख्य गेट की सीढ़ियों पर खड़े होकर प्रेस/मीडिया के व्यक्तियों को संबोधित किया। इस पर प्रशासन के अनुरोध के बावजूद उन्होंने अपना संबोधन जारी रखा, जिसमें उन्होंने कहा – “पुलिस कितने ही ड्रोन तैनात कर ले, मस्जिद थी, है, और रहेगी, और हमें इसे हर हाल में बचाना है।”

सांसद बर्क ने इसके अलावा खुद को सर्वेक्षण का कर्ताधर्ता बताते हुए यह भी घोषणा कर दी कि सर्वे में मस्जिद के अलावा कुछ नहीं मिला है। वहाँ मौजूद अधिकारियों ने सांसद को फिर से अनावश्यक भीड़ जमा करने से बचने का अनुरोध किया क्योंकि धारा 163 BNSS लागू थी, जिसके बाद वे पास के एक मैदान में चले गए और वहाँ जाकर एक और प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की। इस दौरान सांसद ने न्यायालय के आदेश से अपनी असहमति व्यक्त की और एक विशेष समुदाय (मुस्लिमों) को जामा मस्जिद की रक्षा के लिए एकजुट होने के लिए बोला। उन्होंने राजनीतिक लाभ के लिए भीड़ को उकसाया भी। परिणामस्वरूप संभल का माहौल संवेदनशील से अत्यधिक संवेदनशील हो गया। 22 नवंबर को सांसद के कृत्य को ध्यान में रखते हुए 23 नवंबर को धारा 168 BNSS के तहत एक नोटिस जारी किया गया।

23 नवंबर को कुंदरकी विधानसभा का उप-चुनाव का परिणाम घोषित किया गया। इसमें समाजवादी पार्टी ने वह सीट खो दी, जो पहले जिया उर रहमान बर्क के पास थी। उप-चुनाव की हार के जवाब में सांसद बर्क ने पुलिस और प्रशासन को दोष देना और उनकी निष्पक्षता पर सवाल उठाना जारी रखा। प्रेस कॉन्फ्रेंस के माध्यम से उन्होंने “उत्तर प्रदेश में संविधान की हत्या कर दी गई है” जैसे बयानों का उपयोग किया, जिसने जनता को पुलिस और प्रशासन के खिलाफ भड़का कर हिंसा के लिए अनुकूल माहौल बनाया।

23 नवंबर की रात को सांसद बर्क दिल्ली और बाद में बेंगलुरु पहुँचे लेकिन अपने समर्थकों और जामा मस्जिद के अध्यक्ष जफर अली के साथ देर रात तक मोबाइल और वॉट्सऐप के माध्यम से संपर्क में रहे। हालाँकि उच्च न्यायालय (इलाहाबाद) में दायर एक रिट में उन्होंने दावा किया कि उन्हें 24 नवंबर को निर्धारित दूसरे सर्वेक्षण की कोई जानकारी नहीं थी और उन्होंने इस बारे में किसी से चर्चा नहीं की थी। जबकि सत्य यह है कि 23/24 नवंबर की रात को लगभग 12:00 बजे जामा मस्जिद के अध्यक्ष जफर अली के साथ उनकी वॉट्सऐप और नियमित कॉल्स हुई थीं।

स्थानीय नेताओं ने दंगों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। जामा मस्जिद में उकसाने वाले भाषणों के माध्यम से दंगाइयों को भड़काया गया। मोबाइल फोन, मैसेज आदि के माध्यम से संदेश फैला कर भीड़ जमा की गई, दंगों के लिए अनुकूल माहौल बनाया गया। स्थानीय खुफिया इकाई (LIU) की जानकारी के अनुसार सांसद बर्क, विधायक इकबाल महमूद और मस्जिद समिति के अधिकारी जफर अली, लड्डन और आपराधिक तत्व इस मामले में सक्रिय रूप से शामिल थे और बाहरी लोगों को आश्रय दे रहे थे। राजनीतिक महत्वाकांक्षा के कारण सांसद बर्क और विधायक इकबाल महमूद के बेटे सुहेल इकबाल ने इस घटना में सक्रिय भूमिका निभाई और लोगों को उकसाया।

LIU की जानकारी से यह भी पता चला कि लोकसभा चुनावों के दौरान दोनों पक्षों (सांसद बर्क और विधायक इकबाल महमूद) ने अपने-अपने विवादों को सुलझा लिया था लेकिन यह स्पष्ट हुआ कि उन्होंने सतही रूप से सुलह की थी। जब जामा मस्जिद के सर्वे का मामला सामने आया तो इन दोनों ने अपने-अपने समूहों/समर्थकों को उकसा कर मुस्लिम हितों के बड़े रक्षक के तौर पर खुद को पेश किया, उनका मसीहा बनने की कोशिश की।

गवाह नंबर 7 – अनुज कुमार चौधरी, संभल सर्किल अधिकारी:

19 नवंबर को सर्वेक्षण लगभग डेढ़ घंटे तक चला। सर्वेक्षण के दौरान जामा मस्जिद परिसर और आसपास के क्षेत्रों में भीड़ एकत्र हो गई थी। भीड़ में सांसद जिया-उर-रहमान बर्क और अन्य राजनीतिक हस्तियों के समर्थक शामिल थे। इन्होंने सर्वेक्षण के खिलाफ नारेबाजी शुरू कर दी। यह पूर्व नियोजित प्रतीत हुआ, जिसमें विघटनकारी तत्व भीड़ को उकसा रहे थे, यह कहते हुए कि सर्वेक्षण टीम मस्जिद से नहीं हटेगी तो भीड़ वापस नहीं होगी। सर्वेक्षण में कई बार व्यवधान हुआ। राजनीतिक हस्तियों के हस्तक्षेप और विरोध के कारण सर्वेक्षण पूरा नहीं हो सका।

22 नवंबर को सांसद बर्क ने जिला प्रशासन की अनुमति के बिना और धारा 163 BNSS का उल्लंघन करते हुए मस्जिद में भीड़ एकत्र की और एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की। इसमें उन्होंने न्यायालय के आदेश से असहमति व्यक्त की। उन्होंने एक विशेष समुदाय (मुस्लिम) को जामा मस्जिद की रक्षा के लिए एकजुट होने का आह्वान यह कहते हुए किया, “मस्जिद थी, मस्जिद है, और मस्जिद रहेगी, कयामत तक।” सांसद बर्क के प्रेस कॉन्फ्रेंस से यह स्पष्ट था कि राजनीतिक लाभ के लिए माहौल को जानबूझ कर अस्थिर बनाया गया। सांसद बर्क, मस्जिद समिति, सुहेल इकबाल और असामाजिक तत्वों द्वारा रची गई साजिश के कारण दंगे हुए।

संभल दंगा सांसद जिया-उर-रहमान बर्क और अन्य लोगों द्वारा 19 नवंबर 2024 के न्यायालय के आदेश से नाराज होकर उकसाया गया था ताकि सर्वेक्षण को पूरा होने से रोका जाए। इसके लिए इन्होंने भीड़ को उकसाया, इसमें इनका राजनीतिक लाभ भी शामिल था। उन्होंने जिला पुलिस और प्रशासन की भूमिका और विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाए।

23 नवंबर को कुंदरकी विधानसभा उप-चुनाव के परिणाम घोषित किए गए, जिसमें समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार हार गए। सांसद बर्क और समाजवादी पार्टी के समर्थकों ने हार के लिए पुलिस और प्रशासन को दोषी ठहराया और उनकी निष्पक्षता पर सवाल उठाए। चुनावी हार और जामा मस्जिद सर्वेक्षण के चल रहे मुद्दे से नाराज समाजवादी पार्टी के समर्थकों और विघटनकारी तत्वों ने सर्वेक्षण को बाधित करने और इस मुद्दे को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ाने की योजना बनाई और संभल और अन्य क्षेत्रों से एक विशेष समुदाय (मुस्लिमों) के सदस्यों को नियोजित तरीके से आगामी सर्वेक्षण के दौरान जामा मस्जिद में एकत्र होने और अशांति पैदा करने के लिए बुलाया। इसके बाद सांसद बर्क ने पूर्व नियोजित तरीके से क्षेत्र छोड़ दिया।

गवाह नंबर 8 – अनुज कुमार तोमर, प्रभारी (कोतवाली संभल):

19 नवंबर को जामा मस्जिद सर्वेक्षण के दौरान कई व्यवधान हुआ क्योंकि सांसद जिया उर रहमान बर्क और अन्य राजनीतिक हस्तियों के समर्थकों सहित भारी भीड़ मस्जिद के अंदर और बाहर एकत्र हुई और सर्वेक्षण के खिलाफ नारेबाजी की। राजनीतिक हस्तियों की सक्रिय भागीदारी और विरोध के कारण उस दिन सर्वेक्षण पूरा नहीं हो सका।

21 नवंबर को ‘संभल सांसद’ नामक वॉट्सऐप ग्रुप में मैसेज भेजा गया कि शुक्रवार को अधिक से अधिक से लोग जामा मस्जिद में एकत्र हों। जुमे की नमाज के बाद सांसद बर्क ने प्रशासनिक अनुमति के बिना जामा मस्जिद के गेट पर भीड़ एकत्र कर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की। उन्होंने सर्वेक्षण के लिए न्यायालय के आदेश से असहमति व्यक्त करते हुए भाषण दिया, जिसमें मुस्लिम समुदाय को इसके संरक्षण के लिए एकजुट होने का आह्वान किया गया। उन्होंने अपने भाषण में कहा – “जामा मस्जिद हमारी है, हमारी रहेगी, कोई इसे छीन नहीं सकता, हम इसे बचाने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।” स्थिति की गंभीरता को देखते हुए 23 नवंबर को सांसद बर्क को धारा 168 BNSS के तहत नोटिस जारी किया गया।

गवाह नंबर 9 – राजीव कुमार मलिक, इंस्पेक्टर-इन-चार्ज (कैला देवी पुलिस स्टेशन, संभल):

19 नवंबर को शाही जामा मस्जिद का सर्वे करने के लिए टीम पहुँची। इंस्पेक्टर राजीव कुमार मलिक की ड्यूटी मस्जिद के पास ढलान वाले बैरियर चौराहे पर कानून और व्यवस्था बनाए रखने के लिए नियुक्त की गई थी। मस्जिद में प्रवेश करने से पहले सांसद जिया-उर-रहमान बर्क ने अपनी गाड़ी मस्जिद के पीछे ढलान वाले बैरियर चौराहे की सड़क पर पार्क की। उन्होंने सांसद बर्क को सूचित किया कि कोर्ट के आदेश के तहत सर्वे किया जा रहा है और उनकी उपस्थिति सर्वे के लिए आवश्यक नहीं है लेकिन उन्होंने इसकी परवाह नहीं की।

सांसद बर्क के साथ उनके 25-26 समर्थक भी थे। इन सब ने जबरदस्ती मस्जिद में प्रवेश करने की कोशिश की। जब इंस्पेक्टर ने उन्हें रोकने की कोशिश की, तो इन लोगों ने “अल्लाह-हु-अकबर” और “नारा-ए-तकबीर” जैसे मजहबी नारे लगाने शुरू कर दिए। सांसद ने तब इंस्पेक्टर को यह कहते हुए धमकी दी – “जैसे अयोध्या में हमारी मस्जिद छीनी गई, वैसे ही इसे नहीं छीनने देंगे।”

इसके बाद ये सभी लोग जबरदस्ती शाही जामा मस्जिद में प्रवेश कर गए। उन्होंने सर्वे टीम को सर्वे पूरा करने नहीं दिया। सांसद के विरोध के कारण सर्वे पूरा नहीं हो सका। 24 नवंबर को संभल में हुआ दंगा सांसद बर्क और उनके समर्थकों द्वारा आम लोगों को उकसाने के कारण हुआ। इन लोगों ने दंगों के लिए साजिश रची।

गवाह नंबर 10 – दीपक राठी, सब-इंस्पेक्टर (कोतवाली पुलिस स्टेशन, संभल)

विवादित जामा मस्जिद संभल के इसी कोतवाली पुलिस स्टेशन के अंतर्गत आता है। 19 नवंबर को शाही जामा मस्जिद के सर्वे के दौरान सांसद जिया उर रहमान बर्क के कारण उत्पन्न व्यवधान और अपर्याप्त प्रकाश के कारण सर्वे कार्यवाही पूरी नहीं हो सकी। सांसद अपने समर्थकों, जिनमें पूर्व जिला अध्यक्ष फिरोज खान, अधिवक्ता जफर अली और कई अन्य शामिल थे, के साथ मस्जिद में मौजूद थे। सांसद ने मस्जिद में अपने समर्थकों को उकसाया और उत्तेजक बयान दिए, जिसके परिणामस्वरूप वहाँ नमाज अदा की गई। सांसद ने जानबूझकर सर्वे में बाधा डाली, जिसके कारण यह पूरा नहीं हो सका।

इसके बाद मस्जिद की सीढ़ियों से उतरते समय मीडियाकर्मियों को संबोधित करते हुए सांसद ने कहा – “बाहरी लोगों ने सर्वे के लिए याचिका दायर की थी और कोर्ट ने आदेश पारित किया था। यह हमारा अधिकार है कि हम कोर्ट के आदेश से संतुष्ट हैं या इसका विरोध करते हैं। लाखों मुस्लिम यहाँ इकट्ठा होना चाहते थे। मैं सर्वे के खिलाफ हूँ। यह मस्जिद थी, मस्जिद है और मस्जिद रहेगी।”

जिले में धारा 163 BNSS लागू होने के बावजूद सांसद बर्क ने 22 नवंबर को शुक्रवार की नमाज के दौरान शाही जामा मस्जिद पर बिना प्रशासनिक अनुमति के भीड़ इकट्ठा की और उत्तेजक बयान दिए। उन्होंने एक विशेष समुदाय (मुस्लिमों को) को एकजुट होने और जामा मस्जिद की रक्षा के लिए बड़ी संख्या में इकट्ठा होने का आह्वान किया, जिसका उद्देश्य संवेदनशील माहौल को भड़काना था। इसके बाद सांसद ने कहा:

“जिन लोगों ने सर्वे याचिका दायर की, वे शरारती तत्व हैं। मैं कोर्ट के आदेश से संतुष्ट नहीं हूँ। मैं खुलकर पुलिस प्रशासन को बताता हूँ कि भले ही वे यहाँ दस ड्रोन कैमरे लाएँ, यह मस्जिद है, मस्जिद थी और कयामत के दिन तक मस्जिद रहेगी। यह मस्जिद किसी धार्मिक स्थल को तोड़कर नहीं बनाई गई थी। इस्लाम सिखाता है कि किसी मुस्लिम की सहमति के बिना भी उसकी जमीन पर जबरदस्ती धार्मिक स्थान नहीं बनाया जा सकता, किसी अन्य धार्मिक स्थल की तो बात ही छोड़ दें। हम पुलिस प्रशासन या सरकार द्वारा दबाए नहीं जाएँगे। हम इस देश के मालिक हैं, गुलाम या नौकर नहीं। संविधान का गला घोंटा जा रहा है; इसकी पवित्रता को तार-तार किया जा रहा है। हम अपनी जामा मस्जिद को कानूनी रूप से बचाएँगे और इंशा अल्लाह, इसे सुरक्षित रखने के लिए हर जरूरी काम करेंगे। हम सभी हमेशा जामा मस्जिद की रक्षा के लिए हर तरह से प्रतिबद्ध रहे हैं और रहेंगे। यह मस्जिद 1947 से पहले की है और हम इसे किसी को छीनने नहीं देंगे।”

जिस कोतवाली पुलिस स्टेशन के अंतर्गत संभल का जामा मस्जिद आता है, उसके सब-इंस्पेक्टर दीपक राठी के अनुसार यह दंगा सांसद के उत्तेजक भाषणों, लोगों के उकसाने के कारण हुई। सर्वे के पहले दिन मतलब 19 नवंबर को भी दीपक राठी ने सांसद के उग्र व्यवहार को अपनी आँखों के सामने देखा, मीडिया से उत्तेजक बातें करते देखा। जुमे की नमाज यानी 22 नवंबर को भी मस्जिद की सीढ़ियों से उनको भाषण देते सुना। सब-इंस्पेक्टर दीपक राठी का मानना है कि सांसद बर्क और सुहेल इकबाल इस दंगे के मास्टरमाइंड थे।

गवाह नंबर 11 – रमेश सिंह राघव, सर्वे कमिश्नर (विवादित जामा मस्जिद का सर्वेक्षण रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए कोर्ट द्वारा नियुक्त)

जामा मस्जिद के सर्वे-निरीक्षण के दौरान स्थानीय सांसद जिया-उर-रहमान बर्क और वर्तमान विधायक के पुत्र सुहेल इकबाल लगभग 200-300 समर्थकों के साथ पहुँचे और धमकी भरे लहजे में कहा, “जो भी तमाशा करना चाहते हो, दस मिनट में खत्म करो, वरना स्थिति ऐसी हो जाएगी कि तुम संभाल नहीं पाओगे।”

इसके बाद मस्जिद के बाहर जमा भीड़ ने विरोध शुरू कर दिया, मजहबी और उत्तेजक नारे लगाए। इसके अतिरिक्त रोशनी की भी समस्या थी। इसलिए उन्होंने निरीक्षण को स्थगित करना उचित समझा और प्रशासन को लिखित में कारण बताते हुए निरीक्षण कार्यवाही को किसी अन्य दिन के लिए स्थगित कर दिया।

सर्वे कमिश्नर रमेश सिंह राघव की राय में यह घटना स्थानीय सांसद बर्क, स्थानीय विधायक के बेटे सुहेल इकबाल और जामा मस्जिद समिति के अध्यक्ष जफर अली की दुर्भावनापूर्ण मंशा और पूर्व नियोजित साजिश का परिणाम थी।

गवाह नंबर 12 – विष्णु शर्मा, सर्वे कमिश्नर के कैमरामैन

19 नवंबर 2024 और 24 नवंबर 2024 – इन दोनों दिनों में विष्णु शर्मा ने जामा मस्जिद में सर्वेक्षण के दौरान वीडियोग्राफी और फोटोग्राफी की है। 19 नवंबर को इनके साथ 2/3 सहायक भी थे, जिन्हें मस्जिद समिति के सदस्यों ने अंदर घुसने से रोक दिया। इसलिए इन्होंने वीडियोग्राफी और फोटोग्राफी अकेले ही की। इनके मस्जिद पहुँचने से पहले ही सांसद जिया-उर-रहमान बर्क और संभल विधायक के पुत्र सुहेल इकबाल भीड़ के साथ वहाँ मौजूद थे। इनके अनुसार वो ऐसी-ऐसी टिप्पणियाँ कर रहे थे, जिन्हें ये दोहरा भी नहीं सकते।

सर्वे की कार्यवाही लगभग 45 मिनट से 1 घंटे तक चली। यदि सांसद बर्क और सुहेल इकबाल चाहते तो स्थिति नहीं बिगड़ती और सर्वे प्रक्रिया 19 नवंबर को ही पूरी हो सकती थी। हालाँकि उन्होंने माहौल खराब कर दिया और सर्वे में बाधा डाली, जिसके कारण प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी। घटनाओं के वीडियो और फोटो कोर्ट कमिश्नर को सौंप दिए गए थे। यदि उन वीडियो और फोटो की समीक्षा की जाए तो मस्जिद के अंदर की स्थिति और माहौल, साथ ही किस तरह की नारेबाजी हो रही थी, कौन क्या कह रहा था, कौन किसे उकसा रहा था, स्पष्ट हो जाएगा। मस्जिद की सीढ़ियों पर नेताओं द्वारा भाषण दिए जा रहे थे, माहौल तनावपूर्ण था। मस्जिद की प्रबंध समिति लाउडस्पीकर के माध्यम से सभी से शांत रहने और सहयोग करने की अपील कर रही थी, लेकिन चुपके से भीड़ को उकसा रही थी।

विष्णु शर्मा ने बताया कि 19 नवंबर की घटनाओं के बारे में वो बहुत कुछ कह सकते हैं, लेकिन अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा की चिंता के कारण वे खुलकर नहीं बोल सकते। इनकी राय में पूरी घटना पूर्व नियोजित थी, जिसमें संभल के बाहर से भी बड़ी संख्या में लोग शामिल थे। इनका मानना है कि मुस्लिम समुदाय को 24 नवंबर के सर्वे के बारे में पहले से सूचित किया गया था। सांसद जिया-उर-रहमान बर्क, सुहेल इकबाल और प्रबंध समिति के सदस्य पूरी घटना के लिए जिम्मेदार थे क्योंकि उन्होंने भीड़ को इकट्ठा किया और उकसाया।

गवाह नंबर 13 – विष्णु शंकर जैन, वादी के अधिवक्ता

19 नवंबर 2024 को शाम 6 बजे जैसे ही सर्वेक्षण की कार्यवाही शुरू हुई, लगभग 200-300 अज्ञात लोग (मुस्लिम समुदाय से) मस्जिद परिसर में प्रवेश कर गए। इसके 15 मिनट बाद परिसर के बाहर एक बड़ी भीड़ जमा हो गई और नारे लगाने लगी (नारा-ए-तकबीर, अल्लाह-हु-अकबर आदि) और कथित मस्जिद में प्रवेश करने लगी। लगभग 6:45-7:00 बजे कथित मस्जिद के अंदर एक हजार लोग मौजूद थे और कई लोग बाहर से मस्जिद को घेरे हुए थे। स्थिति तब और बिगड़ने लगी, जब स्थानीय विधायक (सुहेल इकबाल) का बेटा और क्षेत्र का सांसद (जिया-उर-रहमान बर्क) कथित मस्जिद में प्रवेश कर गए।

सांसद बर्क और स्थानीय विधायक का बेटा इसके बाद सर्वे कर रही टीम को अपनी शर्तें बताने लगे, धमकी देने लगे। उन्होंने नमाज का समय होने का हवाला देकर सर्वे टीम को तुरंत मस्जिद परिसर छोड़ देने का फरमान भी सुना डाला था। धमकी भरे लहजे में यह भी कहा था कि स्थिति नियंत्रण से बाहर हो जाएगी और कोई भी भीड़ को नियंत्रित नहीं कर पाएगा। इसके बाद कोर्ट कमिश्नर ने सर्वे का काम उस दिन के लिए स्थगित कर दिया था।

गवाह नंबर 14 – गोपाल शर्मा, वादी के अधिवक्ता

मस्जिद के सर्वेक्षण के दौरान स्थानीय सांसद जिया-उर-रहमान बर्क और सुहेल इकबाल (वर्तमान विधायक के पुत्र) लगभग 200-300 समर्थकों के साथ पहुँचे और धमकी भरे लहजे में कहा, “जो कुछ भी करना है, 10 मिनट में खत्म करो, वरना स्थिति ऐसी हो जाएगी कि आप संभाल नहीं पाएँगे।” इसके बाद भीड़ ने मजहबी और उन्मादी नारे लगाने शुरू किए और विरोध प्रदर्शन किया। भीड़, धमकी, शाम का समय और प्रकाश की समस्या के कारण कोर्ट कमिश्नर ने उस दिन के लिए सर्वेक्षण को स्थगित करना उचित समझा और प्रशासन को लिखित में कार्यवाही को किसी अन्य दिन के लिए स्थगित करने के कारणों की सूचना दे दी।

इनके अनुसार यह घटना सांसद बर्क, विधायक के पुत्र सुहेल इकबाल और मस्जिद की पूरी प्रबंधन समिति द्वारा एक सुनियोजित साजिश का परिणाम थी, जिसमें हजारों लोग मस्जिद में प्रवेश करने की कोशिश कर रहे थे ताकि वादियों और उनके अधिवक्ताओं, कोर्ट कमिश्नर को सबक सिखाया जा सके।

गवाह नंबर 15 – महंत श्री ऋषिराज गिरी, महंत कैलादेवी

19 नवंबर 2024 को सर्वेक्षण टीम मस्जिद परिसर में प्रवेश कर गई। लेकिन महंत श्री ऋषिराज गिरी ने गेट के बाहर रहना चुना और जामा मस्जिद परिसर में प्रवेश नहीं किया। इस बीच मुस्लिम समुदाय के कई लोग जामा मस्जिद के पीछे और ढलान वाली सड़क पर इकट्ठा होने लगे। मुस्लिम भीड़ अपमानजनक टिप्पणियाँ कर रही थी, उन्हें धमकी दे रही थी। उस समय सांसद जिया-उर-रहमान बर्क और विधायक इकबाल महमूद के बेटे सुहेल इकबाल अपने समर्थकों के साथ जामा मस्जिद में प्रवेश कर गए। इसके बाद भीड़ की आक्रामकता और विरोध को देखते हुए स्थानीय पुलिस ने उन्हें बाजार मार्ग के माध्यम से संभल कोतवाली तक सुरक्षित पहुँचाया। जैसी भीड़ वहाँ इकट्ठा हुई थी, उसे देख कर यह कहा जा सकता है कि यह घटना एक पूर्व नियोजित साजिश का परिणाम थी।

गवाह नंबर 16 – प्रिंस शर्मा, संभल जिले के जिला सरकारी अधिवक्ता (सिविल)

19 नवंबर 2024 की शाम लगभग 6:00 बजे सभी लोग (सर्वे टीम के लोग) जामा मस्जिद में प्रवेश कर गए और आयोग की कार्यवाही शुरू की। सब कुछ शांतिपूर्ण ढंग से चल रहा था, जब तक कि शाम लगभग 6:30 बजे सांसद जिया-उर-रहमान बर्क लगभग 200-300 समर्थकों के साथ मस्जिद परिसर में प्रवेश नहीं कर गए। मुस्लिम पक्ष के कई लोग भी विवादित संरचना के बाहर इकट्ठा हो गए, जो मजहबी नारे लगा रहे थे, जो मस्जिद परिसर के अंदर सुनाई भी दे रहे थे।

मस्जिद परिसर के अंदर सांसद जिया-उर-रहमान बर्क और उनके समर्थक इकट्ठा होकर निरीक्षण में बाधा डाल रहे थे। इसके बाद शाम लगभग 7:00 बजे मस्जिद समिति के अध्यक्ष और अधिवक्ता जफर अली ने कोर्ट कमिश्नर को बताया कि अंधेरा हो रहा है और नमाज का समय है, इसलिए आयोग की कार्यवाही जल्दी पूरी की जानी चाहिए। इस कारण, आयोग की कार्यवाही उस दिन के लिए स्थगित कर दी गई।

प्रिंस शर्मा ने बताया कि इस घटना के पूर्व नियोजित न होने का सवाल ही नहीं उठता, क्योंकि इतनी बड़ी भीड़ का इतनी दूर से और इतनी संख्या में आना संभव नहीं था।

गवाह नंबर 17 – विष्णु कुमार शर्मा, संभल जिला कोर्ट में भारत सरकार के स्थायी अधिवक्ता

19 नवंबर को सर्वेक्षण के दौरान स्थानीय सांसद जिया-उर-रहमान बर्क और सुहेल इकबाल (वर्तमान विधायक के पुत्र) लगभग 200-300 समर्थकों के साथ मस्जिद परिसर में प्रवेश कर गए और कहा, “जो कुछ भी करना है, 10 मिनट में खत्म करो, वरना स्थिति ऐसी हो जाएगी कि आप संभाल नहीं पाएँगे।” वहाँ खड़ी भीड़ भी सर्वे का विरोध कर रही थी, मजहबी और उन्मादी नारे लगा रही थी। इसके अलावा शाम के समय और प्रकाश की समस्या के कारण, कोर्ट कमिश्नर ने उस दिन के लिए सर्वे को स्थगित करना उचित समझा और प्रशासन को लिखित में कार्यवाही को किसी अन्य दिन के लिए स्थगित करने के कारणों की सूचना दे दी।

24 नवंबर 2024 को जामा मस्जिद के पास सैकड़ों से हजारों लोगों की उपस्थिति जिसमें दूर-दराज से आए लोग भी शामिल थे, यह पुष्टि करता है कि यह घटना पूर्व नियोजित थी। भीड़ को कोर्ट के आदेश में बाधा डालने और उन पर (सर्वे टीम पर) हमला करने के लिए इकट्ठा किया गया था।

गवाह नंबर 18 – कासिम जमाल, जामा मस्जिद प्रबंधन समिति का सदस्य और अधिवक्ता

19 नवंबर 2024 को जामा मस्जिद में हुए सर्वे के दौरान कासिम जमाल वहाँ उपस्थित थे। शाम में लगभग 6-6:15 के बीच जब ये मस्जिद पहुँचे, तो उस समय स्थानीय सांसद (जिया-उर-रहमान बर्क) और संभल विधायक का बेटा सुहेल इकबाल पहले से ही वहाँ मौजूद था।

गवाह नंबर 19 – मशहूद अली फारूकी, जामा मस्जिद प्रबंधन समिति का सदस्य और अधिवक्ता

मशहूद अली फारूकी 19 नवंबर 2024 को जामा मस्जिद में होने वाले सर्वे के लिए शाम में लगभग 6 बजे पहुँचे। इनके पहुँचने से पहले ही वहाँ स्थानीय सांसद (जिया-उर-रहमान बर्क) और संभल विधायक का बेटा सुहेल इकबाल मौजूद था।

22 नवंबर 2024 को जुमे की नमाज के बाद सांसद बर्क ने मस्जिद की सीढ़ियों पर से मीडिया को संबोधित किया था। अपने बयान में मशहूद अली फारूकी ने सहमति जताई कि मस्जिद की सीढ़ियों से राजनीतिक बयान या प्रेस कॉन्फ्रेंस अनुचित था।

गवाह नंबर 20 – जफर अली, जामा मस्जिद प्रबंधन समिति के अध्यक्ष

जफर अली ने बताया कि 19 नवंबर 2024 को सर्वेक्षण के लिए वो जामा मस्जिद शाम के लगभग 6 बजे पहुँचे थे। इनके अनुसार सांसद जिया-उर-रहमान बर्क लगभग 6:30 बजे अपने समर्थकों के साथ मस्जिद पहुँचे। फिर 6:45 बजे उन्होंने संभल विधायक के बेटे सुहेल इकबाल को मस्जिद के अंदर देखा। यह भी बताया कि सांसद के साथ इन्होंने प्रेस के लोगों और इकट्ठा हुई भीड़ को संबोधित भी किया था।

पिछले 7 वर्षों से संभल के जामा मस्जिद समिति के अध्यक्ष रहे जफर अली ने बताया कि 22 नवंबर 2024 को जुमे की नमाज में लगभग 2000 लोग आए थे, जबकि अन्य जुमे के दिन सामान्य तौर पर यह संख्या 1000 के आस-पास रहती थी। जब जफर अली को ‘संभल सांसद’ वॉट्सऐप ग्रुप में ज्यादा से ज्यादा भीड़ जुटाने वाले मैसेज दिखाए गए तो इन्होंने स्वीकार किया कि भेजे गए मैसेज से ऐसा प्रतीत होता है कि नमाज के लिए अधिक से अधिक लोगों को इकट्ठा करने का आह्वान किया गया था।

22 नवंबर 2024 को जुमे की नमाज के बाद सांसद बर्क के साथ जफर अली ने भी वहाँ इकट्ठा नमाजियों को संबोधित किया था, यह खुद स्वीकार किया। इस दौरान घटी एक दिलचस्प बात भी इन्होंने बताई। जब सांसद बर्क नमाजियों को संबोधित कर रहे थे, तब इन्होंने उनको चुप करवाने की कोशिश भी की थी। इन्होंने कहा था, “बस, कृपया रूकें।” लेकिन सांसद बर्क ने इनकी अनसुना कर दिया, बोलना जारी रखा।

जफर अली ने यह भी स्वीकार किया कि 24 नवंबर 2024 को होने वाले शेष सर्वे की सूचना उन्होंने सांसद बर्क को फोन कर दी थी। उन्होंने स्पष्ट बताया कि रात 11:00-11:30 बजे के बीच उन्होंने सांसद के पीआरओ से उनके मोबाइल पर बात की और दूसरी बार उन्होंने डायरेक्ट सांसद बर्क से बात की, उन्हें सूचित किया कि अगले दिन फिर से सर्वेक्षण हो रहा है।

कुल कितने साक्षी, गवाही दर्ज करने की प्रक्रिया क्या

आयोग ने 24 नवंबर 2024 के दंगों से संबंधित 72 अभियुक्तों (जो मुरादाबाद जेल में बंद हैं) के बयान भी दर्ज किए। इनके अलावे संभल में 62 व्यक्तियों के बयानों की दोबारा जाँच भी की गई, इनमें से 28 गवाहों के साक्ष्य फिर से दर्ज किए गए। प्रशासनिक लोगों में दंगों के दौरान घायल हुए पुलिस वाले, वहाँ मौजूद सुरक्षाकर्मी, डीएम/एसपी/एडीएम/अतिरिक्त एसपी/सीओ/एसडीएम, मृतकों का पोस्टमॉर्टम करने वाले डॉक्टरों तक को बयान दर्ज करने के लिए आयोग ने बुलाया। सर्वे कमिश्नर और उनके साथ गई टीम के हर सदस्य को भी आयोग के सामने अपना-अपना बयान दर्ज करवाना पड़ा। 24 नवंबर के साथ-साथ 19 नवंबर को जामा मस्जिद सर्वे के दौरान जो-जो मीडियाकर्मी वहाँ कवरेज के लिए मौजूद थे, उन सबका भी बयान लिया गया।

जामा मस्जिद प्रबंध समिति के पदाधिकारियों की सूची मँगवा कर उन सबके भी बयान दर्ज करवाए गए। सपा सांसद जिया-उर-रहमान बर्क और संभल के विधायक (ये भी समाजवादी पार्टी के ही) इकबाल महमूद के बेटे सुहेल इकबाल का भी बयान लिया गया। जिन 4 लोगों की हत्या दंगाइयों ने कर दी थी, उनके रिश्तेदारों को भी आयोग ने साक्ष्य दर्ज करने बुलाया। चूँकि इन्होंने FIR भी दर्ज करवाई थी, इसलिए इनके बयान शिकायतकर्ता के तौर पर दर्ज किए गए। इस बात का भी ध्यान रखा गया कि जब ये शिकायतकर्ता अपने बयान दर्ज करवाएँ तो कोई भी पुलिस अधिकारी या अन्य व्यक्ति उनके पास मौजूद न रहे।

पूरी प्रक्रिया में आयोग ने कुल 199 साक्षियों से पूछताछ की। इनमें से 106 साक्षियों के बयान वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से दर्ज किए गए। जबकि 84 साक्षियों के बयान संभल में डाक बंगले पर और 8 साक्षियों के बयान लखनऊ में जाँच आयोग के कार्यालय में दर्ज किए गए।

संभल जामा मस्जिद का सर्वे क्यों? सर्वे टीम में कौन-कौन?

संभल जिले के चंदौसी स्थित जिला एवं सत्र न्यायालय है। यहीं पर सीनियर डिवीजन के सिविल जज न्यायालय में 19 नवंबर 2024 को एक याचिका (182/2024) दायर की गई थी। याचिका में बताया गया कि साल 1526 में संभल स्थित शाही जामा मस्जिद उस जगह बनाई गई, जहाँ कभी प्राचीन हरिहर मंदिर (भगवान कल्कि का मंदिर) हुआ करता था। पहले मंदिर को ध्वस्त किया गया, फिर उसके अवशेषों पर ही मस्जिद बना दी गई।

याचिका पर सुनवाई करते हुए सिविल जज ने शाही जामा मस्जिद के सर्वे (फोटो और वीडियोग्राफी दोनों) का आदेश दिया। इसके लिए अधिवक्ता रमेश सिंह राघव को सर्वे कमिश्नर नियुक्त किया गया। मामले की गंभीरता को समझते हुए 19 नवंबर 2024 को ही संभल के जिलाधिकारी ने पुलिस अधीक्षक को पर्याप्त पुलिस बल के साथ जामा मस्जिद जाकर कोर्ट के आदेश पर कार्रवाई के लिए कहा।

पर्याप्त पुलिस बल से साथ सर्वे कमिश्नर रमेश सिंह राघव, याचिकाकर्ता और अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन, गोपाल शर्मा (अधिवक्ता), प्रिंस शर्मा (अधिवक्ता) और जामा मस्जिद समिति के अध्यक्ष एवं अधिवक्ता जफर अली की उपस्थिति में 19 नवंबर 2024 की शाम को संभल की शाही जामा मस्जिद का सर्वे शुरू किया गया। हालाँकि उस दिन सर्वे का काम पूरा नहीं हो सका। इसके पीछे 2 वजहें रहीं: (i) शाम होने के कारण कम रोशनी (ii) सांसद जिया-उर-रहमान बर्क और विधायक इकबाल महमूद के बेटे सुहेल इकबाल द्वारा मुस्लिम भीड़ को भड़काना।

न्यायिक जाँच आयोग का गठन क्यों?

कोर्ट ने मस्जिद के सर्वे का आदेश दिया। पुलिस-प्रशासन मामले की संवेदनशीलता को समझते हुए और कानून एवं शांति व्यवस्था को बनाए रखते हुए सर्वे करने पहुँचती है। लेकिन शिकार होती है हिंसक भीड़ का। 4 लोग मारे जाते हैं, कई घायल होते हैं। और उँगली उठती है उत्तर प्रदेश की पुलिस पर। जबकि हकीकत में पुलिस की तरफ से गोली चलाई भी नहीं गई थी। आत्मरक्षा और भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पुलिस ने सिर्फ आँसू गैस, मिर्च बम, रबर बुलेट आदि ही फायर किए थे।

मस्जिद के सर्वे का विरोध करने वाली भीड़ भी मुस्लिम, मारे गए 4 लोग भी मुस्लिम। ऐसे में उत्तर प्रदेश पुलिस को अपराधी बताने, गोलीबाज बताने का नैरेटिव गढ़ दिया गया। फेक चीजों को वायरल किया गया, सच कहीं दब गया। जबकि घटनास्थल पर तमाम मीडिया चैनल मौजूद थे, लगातार कवरेज किया जा रहा था। इसी सच को बाहर लाने के लिए घटना के 4 दिन बाद 28 नवंबर 2024 को तीन सदस्यीय न्यायिक जाँच आयोग का गठन किया गया। इस आयोग के अध्यक्ष थे इलाहाबाद उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति देवेंद्र कुमार अरोड़ा। जबकि दो अन्य सदस्य थे – (i) सेवानिवृत्त आईएएस अमित मोहन प्रसाद (ii) सेवानिवृत्त आईपीएस अरविंद कुमार जैन।

आयोग पर एकतरफा जाँच का आरोप नहीं लगे, इसको सुनिश्चित किया गया। घटना से जुड़े हर छोटे-बड़े पहलू को देखा-परखा गया। प्रत्यक्षदर्शी या गवाह भी विविध हों, इसका भी ख्याल रखा गया। पुलिसकर्मियों, प्रशासनिक अधिकारियों, वादियों, प्रतिवादियों के साथ-साथ उनके अधिवक्ताओं, मीडिया कर्मियों (प्रत्यक्षदर्शी), जामा मस्जिद इंतेजामिया समिति के सदस्यों, अन्य प्रत्यक्षदर्शियों, एफआईआर, मेडिकल रिपोर्ट, पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट, फोरेंसिक (एफएसएल) की रिपोर्ट, बैलिस्टिक विशेषज्ञ की रिपोर्ट के साथ-साथ अन्य रिकॉर्डों की भी साक्ष्य सहित सूक्ष्म जाँच की गई। पूरी प्रक्रिया के बाद न्यायिक जाँच आयोग ने अपनी रिपोर्ट बनाई है। न्यायिक प्रक्रिया के तहत इसे कोर्ट में चुनौती दी जाएगी, तारीख-पर-तारीख भी आएँगे… लेकिन देर-सबेर अपराधी सलाखों के पीछे होंगे, यही उम्मीद है।

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चंदन कुमार
चंदन कुमारhttps://hindi.opindia.com/
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