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100 नाराज़ ≠ 100 वोट: भारतीय राजनीति में सिर्फ़ ‘नाराज़गी’ का फ़ैक्टर कभी निर्णायक क्यों नहीं रहा

BJP के लिए सबसे बड़ा ख़तरा क्या है सवर्णों की नाराज़गी, SC/ST Act, आरक्षण की राजनीति या जातीय असंतोष? यदि आपका उत्तर केवल ‘CASTE’ है, तो संभव है कि आप भारतीय चुनावी राजनीति के उस बिंदु को देख ही नहीं रहे, जहाँ से असली कहानी शुरू होती है।

राजनीति को केवल भावनाओं की भाषा में पढ़ना सुविधाजनक है। फलाँ समुदाय नाराज़ है, फलाँ वर्ग क्षुब्ध है, फलाँ जाति को प्रतिनिधित्व नहीं मिला, फलाँ कानून से असंतोष है और फिर मान लिया जाता है कि नाराज़गी अपने आप वोट में बदल जाएगी। मगर चुनावी राजनीति इतनी सरल मशीन नहीं है कि उसमें ‘नाराज़गी’ डालिए और दूसरी तरफ़ सत्ता परिवर्तन की पर्ची निकल आए।

सत्ता का प्रश्न भावनाओं से कम और उन भावनाओं के राजनीतिक संगठन से अधिक तय होता है। यही वह बुनियादी अंतर है जिसे समझे बिना BJP और उसके सामाजिक आधार की वर्तमान राजनीति को समझना कठिन है।

सवर्ण समाज का एक हिस्सा BJP से नाराज़ है। SC/ST Act को लेकर असंतोष है, आरक्षण की राजनीति को लेकर शिकायतें हैं, प्रतिनिधित्व को लेकर प्रश्न हैं, जातीय गणित में लगातार हो रहे बदलावों से बेचैनी है और BJP द्वारा दलित, पिछड़े, अति-पिछड़े तथा आदिवासी समुदायों की ओर बढ़ाए जा रहे राजनीतिक हाथ को लेकर स्वाभाविक रूप से एक वर्ग में यह प्रश्न भी है कि इस बदलते समीकरण में उसका अपना स्थान क्या रह जाएगा।

लेकिन असली सवाल यह नहीं है कि सवर्ण BJP से नाराज़ हैं या नहीं। असली सवाल यह है कि उस नाराज़गी का राजनीतिक गंतव्य क्या है? यहीं से चुनावी राजनीति का वह अध्याय शुरू होता है जिसे सोशल मीडिया की नाराज़ पोस्टें अक्सर बीच रास्ते में छोड़ देती हैं।

राजनीति में एक पुराना मेकियावेलियन सत्य है; जनता का आपसे नाराज़ होना अपने आप में सत्ता के लिए घातक नहीं है; घातक तब होता है जब वह नाराज़गी संगठित होकर आपको सत्ता से हटाने की क्षमता हासिल कर ले।

लोकतंत्र में हर सत्तारूढ़ दल से लोग नाराज़ रहते हैं। प्रश्न यह नहीं कि नाराज़ कौन है। प्रश्न यह है कि नाराज़ होकर कौन किसके साथ जा रहा है। और BJP की राजनीति को यदि इसी कसौटी पर देखा जाए, तो सवर्ण असंतोष का प्रश्न कुछ अलग रूप में सामने आता है। 

BJP का हिसाब ‘कितने नाराज़ हैं’ का नहीं, ‘किधर जाएँगे’ का है

BJP के लिए सवर्ण अब भी उसके राजनीतिक ढाँचे की एक महत्वपूर्ण और अपेक्षाकृत स्थिर धुरी हैं। इसलिए उसकी रणनीति का अर्थ यह कतई नहीं कि वह सोचती है, ‘सवर्णों को नाराज़ होने दो, वे कहीं नहीं जाएँगे।’

राजनीतिक दल इतने मूर्ख नहीं होते। अधिक यथार्थवादी गणित यह है कि ‘उन्हें इतना नाराज़ मत होने दो कि वे सामूहिक रूप से किसी वैकल्पिक राजनीतिक शक्ति के पीछे खड़े हो जाएँ।’

यही अंतर है असंतोष और राजनीतिक संकट के बीच। किसी समाज में असंतोष बहुत गहरा हो सकता है, लेकिन यदि वह सामाजिक समूहों, उप-जातियों, क्षेत्रों, स्थानीय नेतृत्व और अलग-अलग राजनीतिक प्राथमिकताओं में बँटा हुआ है, तो वह सत्ता परिवर्तन की संगठित शक्ति नहीं बन पाता। भारतीय समाज की जातीय संरचना इस मामले में BJP को एक दिलचस्प राजनीतिक लाभ देती है।

सवर्ण कोई एक राजनीतिक वर्ग नहीं हैं।

ब्राह्मण की राजनीतिक प्राथमिकताएँ हर जगह राजपूत की प्राथमिकताओं से मेल नहीं खातीं। बनिया का आर्थिक हित और राजनीतिक व्यवहार कई बार दूसरे समूहों से अलग हो सकता है। क्षेत्र, स्थानीय उम्मीदवार, परिवार, पंचायत, संसदीय क्षेत्र और राज्य की राजनीति इस समीकरण को और जटिल बना देते हैं। कोई BJP के साथ है, कोई कांग्रेस के साथ, कोई क्षेत्रीय दल के साथ और कोई स्थानीय उम्मीदवार को ही अपनी राजनीति का केंद्र मानता है।

अर्थात जिस असंतोष को सोशल मीडिया पर एक सामूहिक ‘सवर्ण आक्रोश’ के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, ज़मीनी राजनीति में वह आवश्यक नहीं कि एक ही दिशा में बह रहा हो। और यहीं BJP की संरचनात्मक बढ़त दिखाई देती है। उसे यह आवश्यक नहीं कि हर सवर्ण उससे प्रसन्न हो। उसे केवल इतना सुनिश्चित करना है कि सवर्णों की नाराज़गी एक संगठित Anti-BJP electoral bloc में परिवर्तित न हो।

यह चुनावी राजनीति का बड़ा फर्क है।

100 नाराज़ वोट और 100 संगठित वोट, दोनों एक चीज़ नहीं

इसे एक बहुत साधारण उदाहरण से समझिए। मान लीजिए किसी चुनाव क्षेत्र में 100 सवर्ण मतदाता BJP से नाराज़ हैं। उनमें से 30 कांग्रेस की ओर चले जाते हैं, 20 किसी क्षेत्रीय दल की ओर, 10 स्वतंत्र उम्मीदवार के साथ चले जाते हैं, कुछ मतदान ही नहीं करते और शेष अंततः BJP को ही वोट कर देते हैं।

तो BJP के लिए राजनीतिक नुकसान हुआ, लेकिन वह आवश्यक रूप से सत्ता के लिए अस्तित्वगत संकट नहीं बना। लेकिन वही 100 मतदाता यदि किसी एक राजनीतिक विकल्प के पीछे एकजुट हो जाएँ और उनके साथ दूसरे सामाजिक समूहों का असंतोष भी जुड़ जाए, तब परिस्थिति पूरी तरह बदल जाती है।

इसलिए चुनावी राजनीति में नाराज़गी की मात्रा से अधिक महत्वपूर्ण उसकी संगठनात्मक दिशा होती है। और यही वह बात है जिसे अक्सर ‘वोट बैंक’, ‘जातीय ध्रुवीकरण’ और ‘एंटी-इनकम्बेंसी’ जैसे आसान शब्दों के नीचे दबा दिया जाता है। 

BJP का असली भय: असंतोष नहीं, उसका एकजुट होना

यहीं पहुँचकर BJP के सामने वास्तविक चुनौती दिखाई देती है। BJP के लिए सबसे बड़ा खतरा सवर्णों की नाराज़गी नहीं है। खतरा है,  जातीय असंतोष का राजनीतिक Consolidation, विपक्षी मतों का एकीकरण और BJP के पुराने हिंदू सामाजिक गठबंधन का क्षरण।

यह फर्क मामूली नहीं है। यही चुनावी सत्ता की पूरी संरचना बदल सकता है।

2024 के लोकसभा चुनाव ने कम-से-कम इतना संकेत अवश्य दिया कि BJP का ऊपरी जातियों में आधार काफी हद तक उसके साथ बना रहा, लेकिन अनेक क्षेत्रों में SC और कुछ OBC समूहों के राजनीतिक झुकाव में बदलाव ने BJP के पुराने सामाजिक समीकरण को चुनौती दी।

इसका अर्थ यह नहीं कि BJP का सामाजिक आधार ध्वस्त हो गया। बल्कि इससे एक और गंभीर प्रश्न पैदा हुआ कि क्या अलग-अलग जातियों की अलग-अलग नाराज़गियाँ कभी एक साझा राजनीतिक असंतोष में बदल सकती हैं?

क्योंकि सत्ता के लिए खतरा तब पैदा होता है जब अलग-अलग असंतोष एक-दूसरे से जुड़ने लगें। एक जाति आरक्षण को लेकर असंतुष्ट हो, दूसरी प्रतिनिधित्व को लेकर, तीसरी आर्थिक परिस्थितियों को लेकर, चौथी स्थानीय सत्ता-संरचना को लेकर; तो ये अलग-अलग शिकायतें हैं।

लेकिन यदि कोई राजनीतिक शक्ति इन्हें एक साझा कथा, साझा शत्रु और साझा चुनावी विकल्प में बदल दे, तब ये शिकायतें राजनीतिक शक्ति बन जाती हैं। शिकायत स्वयं शक्ति नहीं है; शिकायत का राजनीतिक संगठन उसे शक्ति में बदलता है।

और BJP की रणनीति को समझने की कुंजी यहीं है।

BJP ने अपना सामाजिक गठबंधन बदला है, लेकिन छोड़ा नहीं

BJP एक तरफ़ अपने पारंपरिक सवर्ण आधार को पूरी तरह छोड़ने के लिए तैयार नहीं है। दूसरी तरफ़ वह लगातार Ambedkar, दलित राजनीति, OBC नेतृत्व, EBC mobilisation और आदिवासी राजनीति की ओर बढ़ रही है। यह कुछ लोगों को विरोधाभास अवश्य प्रतीत हो रहा होगा, लेकिन यह तो BJP की राजनीतिक रणनीति का मूल तत्व है।

पुरानी BJP का सामाजिक समीकरण मोटे तौर पर Upper Caste + Hindutva के फ्रेम में समझा जाता था।

लेकिन आज की BJP का लक्ष्य उससे कहीं बड़ा है।

उसका राजनीतिक प्रोजेक्ट है, Upper Caste + OBC + EBC + Dalit + Tribal + Welfare Beneficiaries + Hindutva

अर्थात एक ऐसा विस्तृत हिंदू चुनावी गठबंधन, जिसमें प्रत्येक सामाजिक समूह को हर नीति से संतुष्ट करना आवश्यक नहीं है। राजनीति में सर्वसम्मति की आवश्यकता नहीं होती। पर्याप्त बहुमत की आवश्यकता होती है।

यही कारण है कि BJP के लिए यह आवश्यक नहीं कि सवर्ण आरक्षण से प्रसन्न हों, दलित हर नीति से प्रसन्न हों, OBC नेतृत्व से हर पिछड़ा समूह प्रसन्न हो या Welfare politics से हर वर्ग समान रूप से संतुष्ट हो। उसके लिए निर्णायक प्रश्न यह है कि क्या इन समूहों में से कोई बड़ा सामाजिक समूह एकजुट होकर विपक्ष के साथ जा रहा है? यदि नहीं, तो असंतोष प्रबंधनीय है। और यदि हाँ, तो वही असंतोष सत्ता के लिए गंभीर संकट बन सकता है।

‘हम BJP से नाराज़ हैं’ और ‘हम BJP को हराएँगे’ में बहुत बड़ा अंतर है

यही वह वाक्य है जिसके बीच भारतीय चुनावी राजनीति का एक बड़ा हिस्सा छिपा हुआ है। ‘हम BJP से नाराज़ हैं।’ और ‘हम BJP को हराने के लिए किसी दूसरे राजनीतिक विकल्प के साथ खड़े हैं।’

इन दोनों वाक्यों को एक समझ लेना राजनीतिक विश्लेषण की सबसे सामान्य भूलों में से एक है। पहला एक भावनात्मक कथन है। दूसरा एक संगठित राजनीतिक निर्णय।

पहले में असंतोष है। दूसरे में राजनीतिक दिशा। पहले में शिकायत है। दूसरे में शक्ति-संचय। और चुनाव अंततः इसी दूसरे प्रश्न पर फैसला करते हैं।

इसीलिए सोशल मीडिया की टाइमलाइन पर दिखाई देने वाला आक्रोश और मतदान केंद्र पर पड़ने वाला वोट कई बार दो बिल्कुल अलग राजनीतिक वास्तविकताएँ होते हैं। सोशल मीडिया पर क्रांति की घोषणा करना और बूथ पर एकजुट होकर वोट डालना, भारतीय लोकतंत्र में अभी तक दो अलग-अलग संस्थाएँ हैं।

तो BJP के सामने असली अस्तित्व का संकट क्या है?

यदि प्रश्न को बिल्कुल साफ़ शब्दों में रखा जाए तो मेरा उत्तर होगा, जाति अपने आप में BJP का Existential threat नहीं है। सवर्णों की नाराज़गी भी अपने आप में Existential threat नहीं है।

असली खतरा तब पैदा होता है जब जातीय असंतोष का राजनीतिक Consolidation + विपक्षी वोट का एकीकरण + BJP के पुराने हिंदू सामाजिक गठबंधन का टूटना, ये सब एक साथ घटित होने लगे।

और यह केवल सैद्धांतिक संभावना नहीं है। भारतीय चुनावों का इतिहास बताता है कि सत्ता परिवर्तन अक्सर किसी एक वर्ग की नाराज़गी से नहीं, बल्कि विभिन्न असंतोषों के एक साझा राजनीतिक गठबंधन में बदल जाने से होता है। 

तीन शर्तें पूरी हुईं तो कहानी बदल सकती है

BJP के लिए वास्तविक ख़तरा तब आकार लेगा जब तीन प्रक्रियाएँ एक साथ चलें।

1. सवर्णों की नाराज़गी वास्तविक वोट के नुकसान में बदल जाए

इसके लिए केवल यह पर्याप्त नहीं कि सवर्ण BJP से शिकायत करें। उन्हें वास्तव में BJP से मतदान स्तर पर दूर जाना होगा।

2. SC, OBC और EBC जैसे समूहों में BJP के विरुद्ध बड़ा राजनीतिक Consolidation हो

अलग-अलग जातियों की अलग-अलग शिकायतें यदि अलग-अलग राजनीतिक दिशाओं में जाती रहेंगी, तो BJP के लिए उनका प्रबंधन अपेक्षाकृत आसान रहेगा।

लेकिन यदि उनमें एक साझा राजनीतिक ध्रुवीकरण पैदा होता है, तो स्थिति गंभीर होगी।

3. विपक्ष उस असंतोष को एक ही राजनीतिक विकल्प के पीछे समेट दे

यही शायद सबसे कठिन शर्त है।

क्योंकि BJP के विरुद्ध असंतोष पैदा करना और उस असंतोष को एक साझा चुनावी विकल्प में बदल देना, दो अलग राजनीतिक कार्य हैं। विपक्ष की सबसे बड़ी चुनौती यही है।

जाति, आरक्षण और SC/ST Act, क्या ये 2029 तय कर देंगे?

SC/ST Act, आरक्षण, Caste census, सरकारी नौकरियों में हिस्सेदारी, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय की राजनीति जैसे मुद्दे निश्चित रूप से सवर्णों में असंतोष पैदा कर सकते हैं। इन प्रश्नों को खारिज करना भी राजनीतिक मूर्खता होगी।

लेकिन यह मान लेना कि यही मुद्दे अकेले 2029 का चुनाव तय कर देंगे, उससे भी बड़ी राजनीतिक भूल होगी। क्योंकि चुनाव किसी एक मुद्दे पर नहीं लड़े जाते। राजनीतिक नेतृत्व का प्रभाव है। हिंदुत्व का प्रभाव है। अर्थव्यवस्था का प्रश्न है।

कल्याणकारी योजनाएँ हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा है। स्थानीय उम्मीदवार है। जातीय प्रतिनिधित्व है। विपक्ष का चेहरा और उसकी विश्वसनीयता है। स्थानीय स्तर की सत्ता-संरचना है। और अंततः Anti-incumbency भी है।

इन सभी का योग मिलकर वोट में बदलता है। राजनीति कोई एक-चर वाला समीकरण नहीं है।

भारतीय चुनाव में ‘एक मुद्दा’ अक्सर केवल सोशल मीडिया का मुद्दा होता है; बूथ पर पहुँचते-पहुँचते वह दर्जनों अन्य हितों, पहचान और राजनीतिक गणित से होकर गुजर चुका होता है। 

BJP की असली चिंता क्या है?

इसलिए यदि BJP की राजनीति को ठंडे दिमाग़ से पढ़ा जाए, तो संभवतः उसकी चिंता यह नहीं है कि ‘क्या हर जाति हमसे खुश है?’

क्योंकि कोई भी सत्तारूढ़ दल हर सामाजिक समूह को हर समय खुश नहीं रख सकता। उसकी वास्तविक चिंता इससे कहीं अधिक ठंडी और व्यावहारिक है, ‘क्या अलग-अलग समूहों की नाराज़गी एक-दूसरे से जुड़कर हमारे खिलाफ़ एक व्यापक चुनावी गठबंधन बना सकती है?’

यदि उत्तर ‘नहीं’ है, तो असंतोष मौजूद रहते हुए भी सत्ता-समीकरण उसके पक्ष में रह सकता है। यदि उत्तर ‘हाँ’ हो जाता है, तब वही छोटी-छोटी दरारें मिलकर दीवार में दरार पैदा कर सकती हैं। और राजनीति में दीवार तब नहीं गिरती जब उसमें एक दरार दिखाई दे।

दीवार तब गिरती है जब अलग-अलग दरारें एक-दूसरे से जुड़ जाती हैं। यही BJP के सामाजिक गठबंधन की असली परीक्षा है। इसलिए सोशल मीडिया पर सवर्णों की नाराज़गी के बढ़ते शोर को देखकर यह निष्कर्ष निकाल लेना कि BJP किसी बड़े संकट में है, शायद जल्दबाज़ी होगी। और इसके उलट यह मान लेना कि सवर्ण हमेशा BJP के साथ रहेंगे, उससे भी बड़ी भूल होगी।

राजनीतिक दलों का भाग्य स्थायी भावनाओं से नहीं, बदलते हितों और बदलते गठबंधनों से तय होता है। आज BJP का आत्मविश्वास संभवतः इसी गणित से निकल रहा है कि उसके विरुद्ध असंतोष मौजूद होने के बावजूद वह असंतोष अभी तक पर्याप्त रूप से एकीकृत राजनीतिक शक्ति में परिवर्तित नहीं हुआ है।

और विपक्ष की सबसे बड़ी चुनौती भी यही है। उसे केवल लोगों को BJP से नाराज़ नहीं करना है। उसे यह सिद्ध करना है कि उस नाराज़गी का एक विश्वसनीय राजनीतिक घर भी है। अंततः चुनाव में प्रश्न यह नहीं होता कि कितने लोग आपसे नाराज़ हैं। प्रश्न यह होता है कि कितने नाराज़ लोग एक ही दिशा में चलने को तैयार हैं।

और शायद BJP आज सबसे अधिक इसी गणित पर भरोसा कर रही है। क्योंकि चुनावी राजनीति में नाराज़ होना आसान है; नाराज़ वोट को एक जगह पहुँचा देना, यही असली राजनीति है। 

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आशीष नौटियाल
आशीष नौटियाल
पहाड़ी By Birth, PUN-डित By choice

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