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खून वही, बस नैरेटिव बदल गया: प्राचीन बलि से ईसाई संस्कार तक, इतिहास ने ये फर्क कैसे बनाया?

‘Eucharist’ रोटी और वाइन को मसीह के शरीर और रक्त से जोड़ने वाला प्रमुख संस्कार। यानी जिस शारीरिक धार्मिक परंपरा को ईसाई धर्म ने प्राचीन दुनिया में बर्बरता का प्रतीक बताया, उसका एक बदला हुआ रूप खुद उसके धार्मिक जीवन के केंद्र में बैठा है।

इतिहास की किताबें अक्सर एक तरफा कहानी सुनाती हैं। पश्चिमी इतिहासकारों और धर्मशास्त्रियों ने सदियों से दुनिया के अतीत को एक खास फ्रेम में फिट किया। एक तरफ प्राचीन और स्वदेशी सभ्यताएँ- एज़टेक, अफ्रीकी जनजातियाँ, भारतीय परंपराएँ, जिन्हें बर्बर, हिंसक और खून-खराबे में डूबी बताया गया। दूसरी तरफ ईसाई धर्म, जिसे सार्वभौमिक नैतिकता, मानवाधिकार और आध्यात्मिक ऊँचाई की शुरुआत माना गया।

यानी तस्वीर कुछ ऐसी बनाई गई कि पुराने जमाने के देवताओं को ब्रह्मांड का संतुलन बनाए रखने के लिए इंसानी शरीर और खून चाहिए था। इसके उलट ईसाई धर्म ने इस तरह की शारीरिक हिंसा से ऊपर उठकर ईश्वर के प्रेम को एक विशुद्ध आध्यात्मिक रूप दिया।

लेकिन अगर इस कहानी को थोड़ा करीब से देखें, खासकर गैर-पश्चिमी या उपनिवेशवाद के बाद वाले नजरिए से, तो एक दिलचस्प विरोधाभास सामने आता है। ईसाई धर्म की सभ्य और परिष्कृत दिखने वाली परंपरा के केंद्र में भी एक ऐसा अनुष्ठान मौजूद है जिसमें ईश्वर के शरीर को ग्रहण करने की अवधारणा शामिल है। ‘Eucharist’ रोटी और वाइन को मसीह के शरीर और रक्त से जोड़ने वाला प्रमुख संस्कार। यानी जिस शारीरिक धार्मिक परंपरा को ईसाई धर्म ने प्राचीन दुनिया में बर्बरता का प्रतीक बताया, उसका एक बदला हुआ रूप खुद उसके धार्मिक जीवन के केंद्र में बैठा है।

The Last Supper

बात यहीं खत्म नहीं होती। ईसाई परंपरा खुद कहती है कि यह अनुष्ठान आकाश से नहीं टपका। इसकी जड़ Last Supper में है। सूली से एक रात पहले यीशु ने शिष्यों के साथ आखिरी भोजन किया। रोटी तोड़ी और कहा, कि ‘यह मेरा शरीर है’। फिर प्याला उठाया और कहा, ‘यह मेरा रक्त है’। बाद की सदियों में यही दृश्य चर्च का सबसे बड़ा संस्कार बन गया- Eucharist। यानी जिस धर्म ने पुरानी दुनिया की बलि और खून वाली रीतों को बर्बर बताया, उसके सबसे पवित्र क्षण की भाषा भी शरीर और रक्त से ही शुरू होती है। फर्क इतना है कि अब खून वेदी पर नहीं बहता, प्याले में प्रतीक बनकर आता है। लेकिन शब्द वही हैं। कल्पना वही है। शरीर को ग्रहण करने की बात वही है। इसलिए यह सिर्फ एक धार्मिक रस्म नहीं, सभ्यता के उस दावे पर सवाल है जिसमें एक रीत को जंगली कहा गया और उसी भाषा के दूसरे रूप को सभ्यता का शिखर मान लिया गया।

भूल जाने की सुविधा

पुरानी सभ्यताओं को ‘बर्बर’ और ‘सभ्य’ के पैमाने पर तौलने की प्रक्रिया को समझने के लिए पहले यह देखना होगा कि ‘सभ्य’ होने की परिभाषा बनी कैसे। जब शुरुआती आधुनिक दौर में यूरोपीय खोजकर्ता और मिशनरी अमेरिका, अफ्रीका और दूसरी स्वदेशी सभ्यताओं तक पहुँचे, तो ‘बर्बरता’ का विचार सिर्फ वर्णन नहीं था। उसका इस्तेमाल साम्राज्यवादी शासन और दूसरे समाजों पर कब्जे को जायज ठहराने के लिए भी किया गया। 

एज़टेक सभ्यता में इंसानी दिल निकालने जैसी प्रथाओं या पूर्वजों से जुड़े जटिल अंतिम संस्कारों को उनके नैतिक पतन का सबूत बनाया गया। इन परंपराओं की आलोचना हमेशा निष्पक्ष नजरिए से नहीं हुई। ध्यान खास तौर पर उन चीजों पर गया जो देखने में सबसे भयावह थीं खून, शरीर और मांस का इस्तेमाल।

इसके पीछे एक धारणा काम कर रही थी जिसे शायद ही कभी सवालों के घेरे में रखा गया, अगर कोई सभ्यता सचमुच विकसित है, तो उसे शरीर और भौतिक दुनिया से जुड़ी इन पुरानी प्रथाओं से ऊपर उठकर विचार और आध्यात्मिकता की किसी ऊँची दुनिया तक पहुँचना चाहिए।

लेकिन इस नैतिक श्रेष्ठता की कहानी में इतिहास का एक बड़ा हिस्सा गायब हो जाता है। क्रूसेड, इंक्विजिशन और अलग-अलग धार्मिक तथा सांस्कृतिक परंपराओं को दबाने के लिए ईसाई साम्राज्यों द्वारा इस्तेमाल की गई संस्थागत हिंसा अक्सर इस तस्वीर में पीछे छूट जाती है।

और इससे भी ज्यादा असहज करने वाली बात यह है कि ईसाई धर्म ने खून और शरीर से जुड़ी इस पुरानी धार्मिक भाषा को खत्म नहीं किया। उसने उसे अपने भीतर समाहित कर लिया और उसे अपने धार्मिक अनुष्ठानों का हिस्सा बना दिया।

रोटी अब सिर्फ रोटी नहीं रही, वाइन सिर्फ पेय नहीं रहा। लेकिन प्रतीक भी उसी पुरानी भाषा से निकले हैं, जिसे कभी दूसरों पर बर्बरता का आरोप लगाने के लिए इस्तेमाल किया गया। सभ्यता की कहानी अक्सर इतनी साफ नहीं होती, जितनी हमें पढ़ाई जाती है। कभी-कभी जिसे हम दूसरों में जंगलीपन कहते हैं, वही चीज हमारे अपने केंद्र में थोड़े बदले हुए कपड़ों में बैठी मिलती है।

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आशीष नौटियाल
आशीष नौटियाल
पहाड़ी By Birth, PUN-डित By choice

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