अखिलेश यादव किस मुँह से मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा माँग रहे हैं? जिस पार्टी का अपना इतिहास बूथ कब्जाने, दोबारा मतदान कराने पड़ने और निर्विरोध जीत के लिए विरोधियों को नामांकन तक न भरने देने के आरोपों से भरा पड़ा हो, उसका मुखिया आज दिल्ली की सड़क पर खड़े होकर चुनावी ईमानदारी का पाठ पढ़ा रहा है।
मंगलवार को INDIA गठबंधन के सांसद संसद के मकर द्वार से निर्वाचन सदन की तरफ मार्च लेकर निकले। भारी पुलिस बैरिकेडिंग के बीच अखिलेश यादव मीडिया से बोले, “चुनाव आयोग ऐसे काम कर रहा है, जैसे भाजपा के लोग ही इस देश के नागरिक हैं।”
उन्होंने ज्ञानेश कुमार को चुनौती दी कि वो खुद आकर बताएँ कि नंदलाल निषाद के नाम से किसके दस्तखत फर्जी किए गए और दशरथ के नाम पर सौ फॉर्म किसने गढ़ दिए। अखिलेश यादव ने यह भी कहा कि पिछले विधानसभा और लोकसभा चुनावों में भी आयोग ऐसी गड़बड़ियों पर आँख मूँदे बैठा रहा था। यानी चुनावी धांधली पर सबसे ज्यादा चिंता उन्हें अब हो रही है, ऐसा प्रतीत कराया।
#WATCH | Delhi: Ahead of INDIA bloc MPs’ protest march to the EC, Samajwadi Party Akhilesh Yadav says, "…Complaints and objections regarding the Election Commission, and the way it functions, are not new occurrences. The Election Commission seems to operate as if only members of the BJP are Indian citizens. It often appears to hold the view that only BJP members are entitled to vote. People used to say that the BJP functions like an ‘election machine’. They don’t just win elections; they possess vast financial resources. We witnessed how booths were hijacked using force in Bengal, and it wasn’t just Bengal; they did the same in UP prior to that. They rigged the Kundarki and Meerapur elections… as well as the by-elections in Ayodhya and Ambedkar Nagar… Ever since the BJP came to power, the Commission has effectively started working for the party… BJP’s push for ‘One Nation, One Election’ isn’t about administrative efficiency; it’s a strategy to rig the system just once and then rule for five years without the need for repeated scrutiny… The people of this country will not accept it…"
— ANI (@ANI) October 6, 2026
पहली बार नहीं है जब अखिलेश यादव इस सुर में बोले हों। इससे पहले 24 सितंबर को अखिलेश यादव ने अपने एक्स अकाउंट पर मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की माँग करते हुए लिखा, “मुँह नुचुआ तो सुना था, अब चुनाव मुचुआ आ गए हैं… भ्रष्ट मुचुआ दें त्यागपत्र।” अखिलेश का आरोप है कि चुनाव आयोग के कामकाज में पारदर्शिता नहीं है और मतदाता सूची से लेकर पूरी चुनाव प्रक्रिया तक पर गंभीर सवाल हैं।
‘मुँह नुचुआ’ तो सुना था अब ‘चुनाव मुचुआ’ आ गये हैं। अब एक देश का एक मत भ्रष्ट ‘मुचुआ’ दें त्यागपत्र! … बाक़ी मतलब समझने के लिए जेन ज़ी और जागरूक हो चुकी जनता बहुत समझदार है।
— Akhilesh Yadav (@yadavakhilesh) September 24, 2026
इंडियन एक्सप्रेस की खबर और विपक्ष की ‘लामबंदी’
23 सितंबर को इंडियन एक्सप्रेस में एक रिपोर्ट छपती है। रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले करीब दस महीनों में कम से कम 14 बार रिकॉर्ड पर आपत्तियाँ दर्ज कीं। आखिर क्यों दर्ज की गईं आपत्तियाँ और किन मामलों को लेकर की गईं? रिपोर्ट में बताया गया कि मामला SIR यानी मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण, फॉर्म 6 में बदलाव, मतदाता सूची के डेटाबेस तक पहुँच और चुनाव से जुड़े सॉफ्टवेयर के केंद्रीकरण जैसे फैसलों का बताया गया। रिपोर्ट के मुताबिक इनमें से कई फैसले दोनों आयुक्तों की जानकारी के बिना लिए गए।
इस रिपोर्ट के पब्लिश होते ही विपक्ष को मानो मुँहमाँगी मुराद मिल गई। कॉन्ग्रेस ने इसे अपने ‘वोट चोरी’ के आरोपों का सबूत बता दिया। किसी ने इसे ‘वन मैन ऑटोक्रेसी’ कहा, किसी ने ज्ञानेश कुमार को ‘मोदी का पपेट’ बताया, कुछ नेताओं ने इस्तीफे के साथ गिरफ्तारी तक की माँग कर डाली।
25 सितंबर को देशभर में कॉन्ग्रेस के प्रदर्शन हुए, 2 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर जुटने की कोशिश में करीब 700 लोग हिरासत में लिए गए और आज INDIA गठबंधन के सांसद सड़क पर हैं। एक अखबार की एक रिपोर्ट, और पूरा विपक्ष एक सुर में ‘ज्ञानेश हटाओ’ गा रहा है। न किसी जाँच का इंतजार, न किसी जवाब का।
आयोग ने उसी दिन कर दिया खंडन
अब वो बात, जो विपक्षी नेता अपने भाषणों में नहीं बताते। उसी दिन, यानी 23 सितंबर को चुनाव आयोग ने रिपोर्ट को सिरे से खारिज कर दिया। आयोग ने साफ कहा कि SIR समेत आयोग के सारे फैसले सर्वसम्मति से हुए हैं और उन पर दोनों चुनाव आयुक्तों और मुख्य चुनाव आयुक्त, तीनों की मंजूरी है। आयोग का कहना था कि किसी भी संस्था में चर्चा के दौरान अलग-अलग राय, सुझाव और सवाल आना सामान्य प्रक्रिया है, उसे ‘बगावत’ या ‘तानाशाही’ बना देना बेईमानी है।
Official Press Note https://t.co/xIQvXHqMSt
— Election Commission of India (@ECISVEEP) September 23, 2026
ध्यान देने वाली बात ये है कि जिन दो आयुक्तों के नाम पर पूरा किस्सा खड़ा किया गया, वो भी उसी आयोग का हिस्सा हैं, जिसने इसे खारिज किया। 26 सितंबर को ज्ञानेश कुमार, सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी, तीनों एक साथ बैठे और उसके बाद आयोग की तरफ से बयान जारी हुआ। यानी जिस ‘फूट’ का डंका पीटा जा रहा था, वहाँ तीनों आयुक्त एक टेबल पर बैठकर एक ही बात कहते दिखे।
भारतीय जनता पार्टी ने भी इसी तर्क को आगे रखा। पार्टी का कहना है कि अगर आयुक्त आपस में सवाल-जवाब करते हैं तो ये दिखाता है कि आयोग लोकतांत्रिक तरीके से काम कर रहा है। अगर वो आपस में चर्चा न करें तो यही विपक्ष कहेगा कि आयुक्त ‘यस मैन’ हैं। मतलब चित भी मेरी, पट भी मेरी।
A meeting of the Election Commission of India was held today, 26 September 2026, at 3:00 PM at Nirvachan Sadan, New Delhi. Chief Election Commissioner Shri Gyanesh Kumar and Election Commissioners Dr. Sukhbir Singh Sandhu and Dr. Vivek Joshi were present in today’s meeting. Read details in the Press Note — https://t.co/bLrQulHokH #ECI
— Election Commission of India (@ECISVEEP) September 26, 2026
अब याद कीजिए सपा राज
सपा मुखिया अखिलेश यादव को आज आयोग की निष्पक्षता की इतनी फिक्र है तो चलिए उत्तर प्रदेश की याददाश्त ताजा कर देते हैं। किसी की भी जुबानी नहीं, रिकॉर्ड में दर्ज बातें।
2004 का लोकसभा चुनाव, मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव: उस वक्त यूपी में सपा की सरकार थी और अखिलेश के पिता मुलायम सिंह मुख्यमंत्री। चुनाव में बूथ कब्जाने और धांधली की शिकायतें इतनी गंभीर थीं कि चुनाव आयोग को मुजफ्फरनगर, बदायूं और फिरोजाबाद संसदीय क्षेत्रों के 11 मतदान केंद्रों पर दोबारा वोटिंग करानी पड़ी।
पर्यवेक्षकों की रिपोर्ट के आधार पर इन बूथों के वोट अमान्य घोषित किए गए। बदायूं और फिरोजाबाद वही सीटें थीं, जहाँ से मुलायम सिंह के अपने भतीजे धर्मेंद्र यादव और अक्षय यादव चुनाव लड़ रहे थे। तब भाजपा और बसपा, दोनों ने सत्ताधारी सपा पर बूथ कैप्चरिंग और गड़बड़ी के आरोप लगाए थे। सत्ता आपकी, पुलिस प्रशासन आपका, और दोबारा मतदान चुनाव आयोग को कराना पड़ा। ये अपने आप में क्या कहता है?
2012 का कन्नौज उपचुनाव, मुख्यमंत्री अखिलेश यादव: अखिलेश के मुख्यमंत्री बनने पर कन्नौज की लोकसभा सीट खाली हुई। उपचुनाव में उनकी पत्नी डिंपल यादव निर्विरोध चुन ली गईं, यानी मैदान में कोई दूसरा उम्मीदवार बचा ही नहीं। आरोप लगे कि विपक्षी उम्मीदवारों को सपा समर्थकों ने ‘उठवा’ लिया और वो नामांकन ही नहीं भर पाए।
सपा ने इन आरोपों को खारिज किया, पर कहानी यहीं खत्म नहीं होती। अदालत में याचिका गई, सीबी-सीआईडी जाँच के आदेश 2012 में ही हो गए थे, मगर जाँच शुरू ही नहीं हो पाई क्योंकि प्रदेश में सरकार सपा की थी। जाँच ने रफ्तार तब पकड़ी, जब 2017 में सत्ता बदली। सवाल सीधा है कि जब राज्य में आपकी सरकार थी, तब जाँच क्यों नहीं बढ़ी?
2022 का करहल, खुद अखिलेश की सीट– सत्ता में न होते हुए भी सपा कार्यकर्ताओं का हाल देखिए। मैनपुरी की करहल सीट पर जहाँ अखिलेश खुद उम्मीदवार थे, केंद्रीय मंत्री और भाजपा प्रत्याशी एसपी सिंह बघेल ने शिकायत की कि सपा कार्यकर्ताओं ने करीब 65 बूथों पर कब्जे जैसी हरकत की और वोटरों को धमकाया।
जसवंतपुर के बूथ नंबर 266 का वीडियो सामने आया, जिसमें महिला मतदाताओं को सपा कार्यकर्ताओं के कहे अनुसार वोट डालने को कहा जा रहा था। चुनाव आयोग ने बोगस वोटिंग और प्रतिरूपण की इस शिकायत पर उस बूथ पर दोबारा मतदान का आदेश दिया। धमकाते हुए वोटरों से तब ये भी कहा गया था कि पुलिस फोर्स हमेशा नहीं रहेगी और ’10 मार्च के बाद’ देख लिया जाएगा।
अखिलेश की उंगली आज बार-बार आयोग पर उठ रही है, पर 2017 में जब वो खुद सत्ता से बाहर हुए थे, तब भी उन्होंने जनता को दोष देते हुए कहा था कि वोट ‘समझाने’ से नहीं, ‘बहकाने’ से मिलता है। जब हारे तो मतदाता गलत, जब वोटर लिस्ट साफ हो रही है तो आयोग गलत। मतलब अखिलेश यादव के अनुसार गड़बड़ी हमेशा सामने वाले की होती है, अपनी कभी नहीं।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा
अब आते हैं उस मामले पर, जिसका विपक्ष ने शायद सबसे ज्यादा इंतजार किया था। सोमवार, 5 अक्टूबर को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ दाखिल याचिकाओं पर सुनवाई की।
याचिकाकर्ता की तरफ से वरिष्ठ वकील विकास सिंह ने ज्ञानेश कुमार को अंतरिम तौर पर निलंबित करने की माँग की, या कम से कम उनके अधिकार छीनकर बाकी दो आयुक्तों को काम करने दिया जाए। उन्होंने इसे लोकतंत्र की बुनियाद के लिए ‘बहुत गंभीर स्थिति’ बताया।
अदालत ने इसमें से कुछ भी नहीं किया। पीठ ने मुख्य चुनाव आयुक्त को सस्पेंड करने से इनकार कर दिया और आयोग से सिर्फ सर्वसम्मति से फैसले करवाने का अंतरिम आदेश देने से भी इनकार किया। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अखबार की रिपोर्ट पूरी तरह सही भी हो सकती है, आंशिक रूप से सही भी और आंशिक रूप से गलत भी, इसलिए इसके आधार पर कोई आदेश नहीं दिया जा सकता। उनके शब्दों का भाव यही था कि अदालत को पहले ‘प्रामाणिक जानकारी’ चाहिए, इसलिए दस दिन इंतजार किया जाएगा।
यानी जिस रिपोर्ट के दम पर देशभर में सड़कें जाम की गईं, देश की सबसे बड़ी अदालत उसे लेकर इतना भी तैयार नहीं थी कि बिना जवाब सुने किसी संवैधानिक पदाधिकारी पर कार्रवाई कर दे। अदालत ने केंद्र सरकार, चुनाव आयोग, ज्ञानेश कुमार, दोनों चुनाव आयुक्तों और आयोग के दो अन्य अधिकारियों को नोटिस जारी कर जवाब माँगा है।
सवाल जो अखिलेश से पूछा जाना चाहिए
अखिलेश यादव को नंदलाल निषाद के नाम के फर्जी दस्तखत की चिंता के साथ-साथ आईना भी देखना जरूरी है। जिस पार्टी के राज में दोबारा मतदान कराना पड़ा, जिसके मुखिया की पत्नी निर्विरोध चुनी जाएँ और जाँच सरकार बदलने तक दबी रहे, जिसकी पार्टी पर बार-बार बूथ कब्जाने के आरोप लगते रहे हों, उसे आयोग की ईमानदारी पर भाषण देने से पहले अपने अक्स को जरूर देख लेना चाहिए।
अब इसे तर्क के तराजू पर भी तौलते हैं। 2024 में जब सपा ने उत्तर प्रदेश में 37 सीटें जीतीं, तब आयोग में क्या सबकुछ ठीक-ठाक था, EVM ठीक थी, वोटर लिस्ट ठीक थी? लेकिन जब नतीजे मनमाफिक नहीं आते, तब वही आयोग ‘वोट चोर’ हो जाता है। यानी संस्था तभी तक निष्पक्ष है, जब तक वो आपके पक्ष में नतीजा दे।
ज्ञानेश कुमार को हटाना है या नहीं, ये फैसला कानून और संसद की प्रक्रिया से होगा, विपक्ष की मार्च-रैली से नहीं। जब तक वो प्रक्रिया पूरी नहीं होती, उत्तर प्रदेश की जनता को ये याद रखने का पूरा हक है कि चुनावी धांधली और बूथ लूट का सबसे बड़ा हिसाब खुद सपा के पास बाकी है।


