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मणिपुर हिंसा: 54+ लोगों की मौत के पीछे बांग्लादेशी और रोहिंग्या कनेक्शन, भाग रहे लोगों की असम सरकार कर रही मदद

मैतेई बहुसंख्यक हैं और पड़ोसी देशों से हो रहे लगातार घुसपैठ को लेकर वे चिंतित हैं। उनका कहना है कि म्यांमार और बांग्लादेश के अवैध प्रवासी पहाड़ी इलाकों में बड़े पैमाने पर बस रहे हैं। इससे उनकी सांस्कृतिक पहचान को खतरा उत्पन्न हो गया है।

उत्तर-पूर्वी भारत के राज्य मणिपुर में दो समूहों के बीच हिंसा (Manipur Violence) के कारण बड़े पैमाने पर नुकसान हुआ है। पड़ोसी राज्य असम मणिपुर को हर संभव मदद और जरूरी सहायता पहुँचा रहा है। इस हिंसा में रोहिंग्या मुस्लिम और अवैध बांग्लादेशी घुसपैठिए का भी कनेक्शन है।

आदिवासियों और बहुसंख्यक मैतेई समुदाय के बीच हिंसा के कारण 54 से अधिक लोग मारे गए हैं। वहीं, 10,000 से अधिक लोग विस्थापित हो गए हैं। रक्षा प्रवक्ता ने कहा कि कुल 13,000 लोगों को बचाया गया और सुरक्षित आश्रयों में स्थानांतरित कर दिया गया।

हिंसा से डरकर लोग पड़ोसी राज्य असम की ओर भाग रहे हैं। अब तक 1200 से अधिक लोग असम में शरण ले चुके हैं। इनमें से ज्यादातर कुकी समुदाय के लोग हैं। असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने जिला प्रशासन को मणिपुर से आए लोगों का ध्यान रखने के लिए आदेश दिया है।

हालाँकि, सरकार की कड़ाई के कारण अब धीरे-धीरे हालात सामान्य होते जा रहे हैं। कुछ-कुछ इलाकों में दुकानें भी खुल गई हैं। राज्य में अर्धसैनिक बलों की 14 कंपनियाँ तैनात की गई हैं। इसके साथ ही केंद्र की ओर से और कुछ कंपनियाँ भेजी गई हैं। इसके अलावा, अलग-अलग इलाकों में सेना और रैपिड एक्शन फोर्स फ्लैग मार्च कर रही हैं।

बताते चलें कि हिंसा का केंद्र राजधानी इम्फाल से 63 किलोमीटर दूर चुराचंदपुर जिला है। हिंसा पर काबू पाने के लिए 1000 से अधिक जवानों CRPF के जवानों को तैनात भेजा गया है। कुछ-कुछ जगहों पर प्रदर्शनकारियों ने सुरक्षाबलों और पुलिस थानों से हथियार भी छीन लिए हैं। सरकार ने उन्हें लौटाने के लिए 48 घंटे का समय दिया है।

वहीं, इंफाल में कर सहायक के रूप में तैनात लेमिनथांग हाओकिप को प्रदर्शनकारियों से उनके आधिकारिक आवास से घसीट कर बाहर निकाला और पीट-पीटकर मार डाला। चुराचांदपुर में छुट्टी पर अपने गाँव आए CRPF के एक कोबरा कमांडो की हथियारबंद हमलावरों ने शुक्रवार (5 मई 2023) को गोली मारकर हत्या कर दी। कोबरा बटालियन के डेल्टा कंपनी के कॉन्स्टेबल चोनखोलेन हाओकिप की दोपहर में हत्या की गई। 

इसके अलावा, भाजपा विधायक वुंगजागिन वाल्टे (Vungzagin Valte) पर प्रदर्शनकारियों ने हमला कर दिया। उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया है। मणिपुर के डीजीपी पी डोंगल ने बताया, “भाजपा विधायक वुंगजागिन वाल्टे पर प्रदर्शनकारियों ने हमला कर दिया। उन्हें राज्य से बाहर एयरलिफ्ट किया गया है। उनकी हालत स्थिर है। हमें सख्त आदेश मिला है कि अगर कोई गलती करता है तो उसे बख्शा नहीं जाएगा। सेना को फ्लैग मार्च के आदेश मिले हैं।”

दरअसल, पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर में तीन प्रमुख समुदाय हैं। बहुसंख्यक मैतेई और दो आदिवासी समुदाय- कुकी और नागा। मैतेई राज्य की कुल आबादी के 53 प्रतिशत हैं। ये राज्य के आर्थिक और राजनीतिक रूप से सबसे प्रभावशाली समुदाय है। वहीं, कुकी और नागा राज्य की आबादी के 40 प्रतिशत हैं।

मैतेई इंफाल घाटी और राज्य के मैदानी इलाकों में रहते हैं। मणिपुर में कुल 10 प्रतिशत ही मैदानी भाग है। वहीं, कुकी और नागा जनजातियाँ इंफाल घाटी से सटे पहाड़ी इलाकों में रहती हैं। राज्य का 90 प्रतिशत भाग पर्वतीय है। जनजातियाँ राज्य में कहीं भी बस सकती हैं, लेकिन मैतेई पहाड़ी इलाकों में नहीं बस सकते। कभी पहाड़ी क्षेत्रों में 60 सशस्त्र उग्रवादी समूह सक्रिय थे।

मैतेई आर्थिक और राजनीतिक रूप से सबसे प्रभावशाली और शक्तिशाली हैं। राज्य में किसी भी पार्टी की सरकार हो, लेकिन दबदबा सिर्फ मैतेई का है। मौजूदा मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह भी इसी समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। कुकी और नागा समुदाय सरकार पर उनके प्रति सौतेला व्यवहार करने का आरोप लगाते हैं।

हिंसा का कारण बहुसंख्यक मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने का फैसला और सरकारी भूमि का सर्वेक्षण है। मैतेई को जनजाति का दर्जा देने का विरोध कुकी और नागा समुदाय कर रहे हैं। आजादी के बाद से कुकी और नागा समुदायों को आदिवासी का दर्जा मिला हुआ है।

मैतेई बहुसंख्यक हैं और पड़ोसी देशों से हो रहे लगातार घुसपैठ को लेकर वे चिंतित हैं। उनका कहना है कि म्यांमार और बांग्लादेश के अवैध प्रवासी पहाड़ी इलाकों में बड़े पैमाने पर बस रहे हैं। इससे उनकी सांस्कृतिक पहचान को खतरा उत्पन्न हो गया है।

दरअसल, उत्तर पूर्व भारत म्यांमार के साथ 1,643 किलोमीटर की सीमा साझा करता है। आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार, म्यांमार के लगभग 52,000 शरणार्थी पूर्वोत्तर राज्यों में बसे हुए हैं। इनमें से 7800 मणिपुर में शरणार्थी हैं। इन्हें शरणार्थी का दर्जा मिला हुआ है।

इसके अलावा, म्यांमार और बांग्लादेश से बड़ी संख्या में अवैध प्रवासी भी मणिपुर में बसे हुए हैं। इनके आँकड़े सरकार का पास नहीं हैं। मैतेई संगठनों का दावा है कि म्यांमार और बांग्लादेश से बड़े पैमाने पर अवैध आप्रवास के कारण उन्हें कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।

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ऑपइंडिया स्टाफ़
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कार्यालय संवाददाता, ऑपइंडिया

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