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संगीता बरुआ में ऐसा क्या है ‘खास’ कि उनके प्रेस क्लब अध्यक्ष बनने पर लहालोट है लेफ्ट-लिबरल गैंग?

प्रेस क्लब ऑफ इंडिया (PCI) की नई अध्यक्ष संगीता बरुआ की जीत पर लेफ्ट-लिबरल गैंग के बीच जश्न का माहौल है। यह संगीता बरुआ के 'द वायर' से जुड़े रहकर लिखे गए सरकार-विरोधी लेख का नतीजा है। एक बार प्रेस क्लब ऑफ इंडिया को वामपंथी सोच वाला नेतृत्व मिला है।

देशभर के मीडिया संस्थानों का संगठन प्रेस क्लब ऑफ इंडिया (PCI) को अपना नया अध्यक्ष मिल गया है। इतिहास में पहली बार PCI की महिला अध्यक्ष के तौर पर संगीता बरुआ पिशारोटी चुनी गई हैं। उन्होंने 1019 वोटों से जीत दर्ज की है। इससे पहले भी वे साल 2024 में PCI के उपाध्यक्ष के तौर पर चुनी गई थीं।

गौर करने वाली बात यह है कि प्रेस क्लब ऑफ इंडिया का चुनाव हर साल होता है, लेकिन इसके बावजूद हर बार नेतृत्व पर एक ही विचारधारा का दबदबा बना रहता है। लंबे समय से आरोप लगते रहे हैं कि इस संस्था पर लेफ्ट-लिबरल गैंग का कब्जा है और दूसरे विचारों से जुड़े पत्रकारों को हाशिये पर रखा जाता है। इस साल भी वही सिलसिला दोहराया गया और अध्यक्ष पद पर एक बार फिर उसी खेमे से जुड़ा नाम सामने आया। इसीलिए जानने की जरूरत है कि लेफ्ट-लिबरल गैंग नए अध्यक्ष पर जश्न क्यों मना रहा है?

संगीता बरुआ का पत्रकारिता करियर

संगीता बरुआ मूलरूप से असम के गुवाहाटी की रहने वाली हैं। असम के ही गोलाघाट से उन्होंने पढ़ाई पूरी की। फिर 1996 में यूनाइटेड न्यूज ऑफ इंडिया (UNI) से पत्रकारिता की यात्रा शुरू की। उन्होंने ‘द हिंदू’ जैसे कई अंग्रेजी अखबारों में रिपोर्टिंग भी की है। साल 2017 में रमनाथ गोयनका एक्सीलेंस इन जर्नलिज्म अवार्ड भी जीता।

बाद में संगीता बरुआ वामपंथी पोर्टल ‘द वायर’ से बतौर ‘नेशनल अफेयर्स एडिटर’ जुड़ीं, जहाँ से उनकी पहचान एक सक्रिय और राष्ट्रीय स्तर की पत्रकार के रूप में बनी।

जब ‘द वायर’ में रहकर ‘ऑपरेशन सिंदूर’ पर उठाए सवाल

प्रेस क्लब की नई अध्यक्ष संगीता बरुआ ने ‘द वायर’ से जुड़े रहते हुए उनके प्रोपेगेंडा में खूब हाथ बटाया। उनके लिखे गए कई आर्टिकल्स केंद्र और असम की बीजेपी सरकार के विरोधी-भाषी रहे हैं। उन्होंने अपने लेखों में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ नाम पर सवाल उठाने के साथ-साथ असम को मुस्लिम-विरोधी सरकार बताकर घेरने की खूब कोशिश की है।

संगीता बरुआ ने पहलगाम आतंकी हमले के जवाब में शुरू हुए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के नाम पर आपत्ति जताई। उनके लेख– ‘ऑपरेशन सिंदूर’ नाम की बारीकी से जाँच क्यों जरूरी है? में साफतौर पर सरकार की नीयत पर शक खड़ा करने की कोशिश है।

द वायर का लेख

संगीता बरुआ लिखती हैं कि सैन्य ऑपरेशन का नाम अगर सांस्कृतिक या भावनात्मक है, तो वह अपनेआप में ‘राजनीतिक प्रोपेगेंडा’ बन जाता है। लेख में यह भी कहा गया कि महिलाओं अधिकारियों को प्रेस ब्रीफिंग में आगे रखना ‘रणनीति’ का हिस्सा था। यह तर्क अपने आप में महिला अधिकारियों की भूमिका को कमतर आंकने वाला और अपमानजनक है।

इसी तरह के एक लेख में संगीता बरुआ ने असम सरकार की कार्रवाई को मुस्लिम-विरोधी बताकर सवाल उठाया है। उनके लेख– ‘असम सरकार की हालिया कार्रवाइयाँ 1965 में राज्य में देखी गई मुस्लिम-विरोधी भावना के समान है’ में लोगों को सरकार के खिलाफ करता है और मौजूदा सरकार की कार्रवाई से डर पैदा करने की कोशिश करता है।

द वायर का लेख

संगीता बरुआ यह मानकर लिखती हैं कि अवैध घुसपैठ, भूमि अतिक्रमण और पहचान से जुड़े मुद्दों पर सरकारी कार्रवाई करना अपनेआप में सांप्रदायिक कदम है।

वामपंथी सोच और निष्पक्ष पत्रकारिता की मसीहा

नवनिर्वाचित अध्यक्ष संगीता बरुआ का नाम वामपंथी पोर्टल ‘द वायर’ से जुड़ा रहा है। उनके कई लेख और अपनाया गया नजरिया यह संकेत देता है कि उनकी सोच एकतरफा और वैचारिक रूप से पूर्वाग्रह से ग्रस्त रही है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या प्रेस क्लब ऑफ इंडिया की अध्यक्ष के रूप में सभी पत्रकारों की आवाज बन पाएँगी या फिर वही पुराना लेफ्ट-लिबर एजेंडा आगे बढ़ाया जाएगा। पत्रकारों के हितों की रक्षा करने के लिए अध्यक्ष का निष्पक्ष होना बेहद जरूरी है, न कि किसी खास विचारधारा का प्रवक्ता बनना।

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पूजा राणा
पूजा राणाhttps://hindi.opindia.com/
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