ओडिशा में कॉन्ग्रेस की राजनीति इन दिनों परिवारवाद और पीढ़ीगत टकराव की आग में जल रही है। पूर्व विधायक मोहम्मद मोकीम और उनकी बेटी सोफिया फिरदौस एक तरफ हैं, तो दूसरी तरफ प्रदेश अध्यक्ष भक्त चरण दास और उनका बेटा सागर चरण दास। मोहम्मद मोकीम का सोनिया गाँधी को लिखा पत्र और उसके बाद पार्टी से निष्कासन ने इस जंग को सड़क पर ला दिया है।
सतह पर तो यह पार्टी को बचाने की कोशिश लगती है, लेकिन गहराई में राज्य की कमान हथियाने की होड़ साफ झलकती है। मोकीम ओडिशा में कॉन्ग्रेस के लिए मुस्लिम वोटबैंक के मजबूत स्तंभ हैं, जबकि भक्त चरस दास पिता-पुत्र आदिवासी और ग्रामीण इलाकों में पैठ रखते हैं। यह लड़ाई न सिर्फ ओडिशा, बल्कि पूरे देश में कॉन्ग्रेस के आंतरिक कलह का आईना है, जहाँ युवा बनाम पुरानी लीडरशिप का मुद्दा बार-बार उभर रहा है।
भ्रष्टाचार के मामले में दोषी पाए जा चुके हैं मोकीम
मोहम्मद मोकीम का नाम ओडिशा की राजनीति में एक ऐसा चेहरा है, जो विवादों और वापसी की कहानियों से भरा पड़ा है। 3 जुलाई 1965 को कटक में जन्मे मोकीम का परिवार स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ा रहा है। उनके पूर्वजों ने आजादी की लड़ाई लड़ी और यही विरासत मोकीम ने राजनीति में आगे बढ़ाई। वे लंबे समय से कॉन्ग्रेस के वफादार सिपाही रहे हैं।
साल 2019 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने बाराबाती-कटक सीट से कमाल कर दिया। यह सीट 35 साल बाद कॉन्ग्रेस के पास आई थी। मोकीम ने बीजेडी के दिग्गज को हराकर सबको चौंका दिया। उनकी जीत मुस्लिम और ओडिया समुदायों के बीच पुल का काम करती रही। लेकिन किस्मत ने करवट ली। 2022 में भ्रष्टाचार के एक मामले में ओडिशा हाईकोर्ट ने उन्हें दोषी ठहराया। मामला राज्य सतर्कता विभाग का था, जिसमें उन्हें तीन साल की सजा मिली। इस वजह से वे 2024 के चुनाव नहीं लड़ सके।
उतार-चढ़ाव भरा रहा मोकीम का राजनीतिक सफर
मोकीम का राजनीतिक सफर उतार-चढ़ाव भरा रहा। 2022 के राष्ट्रपति चुनाव में उन्होंने पार्टी लाइन से हटकर एनडीए की द्रौपदी मुर्मू को वोट दिया, क्योंकि वे स्थानीय मानी जाती थीं। इसकी सजा मिली शो-कॉज नोटिस। फिर 2023 में पूर्व प्रदेश अध्यक्ष निरंजन पत्तनायक की लीडरशिप पर सवाल उठाए तो 15 जुलाई 2025 को सस्पेंड कर दिए गए। लेकिन 2024 के चुनाव से ठीक पहले, जनवरी में सस्पेंशन रद्द हो गया।
निडर रही है मोकीम की शख्सियत
मोकीम की खासियत उनकी बेबाकी है। वे हमेशा पार्टी के अंदरूनी मुद्दों पर खुलकर बोलते रहे। ओडिशा के मुस्लिम समुदाय में उनकी पकड़ इतनी मजबूत है कि पार्टी को कई बार झुकना पड़ा। निष्कासन के बावजूद वे कहते हैं, “मैंने सच कहा, इसलिए सजा मिली। राहुल जी खुद कहते हैं ‘डरो मत’, तो मैंने हाईकमान को सच्चाई बताई।” उनका पत्र सोनिया को लिखा गया था, जिसमें उन्होंने पार्टी की हारों को आंतरिक फैसलों का नतीजा बताया। बिहार, दिल्ली, हरियाणा, महाराष्ट्र और कश्मीर की हारों का जिक्र करते हुए कहा, “ये हारें बाहरी दुश्मनों से नहीं, बल्कि गलत फैसलों से हुईं।”
बेटी सोफिया के कंधों पर मोकीम की विरासत संभालने की जिम्मेदारी
मोकीम की राजनीतिक विरासत अब उनकी बेटी सोफिया फिरदौस के कंधों पर है। 1992 में कटक में जन्मीं सोफिया मात्र 32 साल की हैं, लेकिन उन्होंने इतिहास रच दिया। 2024 के चुनाव में वे ओडिशा की पहली मुस्लिम महिला विधायक बनीं। बाराबाती-कटक से लड़ीं और बीजेपी के दिग्गज डॉ. पूर्ण चंद्र महापात्रा को 8,001 वोटों से हरा दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह जैसे बड़े नेताओं की रैलियों के बावजूद सोफिया की जीत ने कॉन्ग्रेस को जिंदा रखा।
बाराबाती-कटक सीट उनके अब्बू की थी और सोफिया ने इसे बखूबी संभाला। उनकी शिक्षा शानदार है। कालिंगा इंस्टीट्यूट ऑफ इंडस्ट्रियल टेक्नोलॉजी (KIIT) से सिविल इंजीनियरिंग में बीटेक किया। 2022 में आईआईएम बैंगलोर से एग्जीक्यूटिव जनरल मैनेजमेंट प्रोग्राम पूरा किया। पढ़ाई के बाद वे रियल एस्टेट में कूद पड़ीं। 24 साल की उम्र में एक रियल एस्टेट कंपनी की डायरेक्टर बनीं। उनकी संपत्ति 3.64 करोड़ रुपए बताई जाती है।
सोफिया की सबसे बड़ी उपलब्धि कन्फेडरेशन ऑफ रियल एस्टेट डेवलपर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (क्रेडाई) के भुवनेश्वर चैप्टर की पहली महिला अध्यक्ष बनना है। वे कहती हैं, “महिलाएँ हर क्षेत्र में आगे आएँ, राजनीति में भी।” सोफिया की राजनीति में एंट्री पिता की सजा के बाद मजबूरी थी, लेकिन उन्होंने इसे अवसर बना लिया। मुस्लिम महिलाओं के लिए उनकी जीत प्रेरणा बनी। वे ओडिया-मुस्लिम समुदाय की आवाज हैं। सोफिया का फोकस विकास पर है। वे रियल एस्टेट से जुड़े मुद्दों पर बोलती हैं, जैसे किफायती आवास और इंफ्रास्ट्रक्चर। पिता की तरह बेबाक हैं, लेकिन ज्यादा सॉफ्ट इमेज।
बेटी के लिए बड़ी भूमिका की तलाश में मोकीम
मोकीम की नजरें बेटी के लिए बड़ी भूमिका पर हैं। वे युवा लीडरशिप के नाम पर सोफिया को आगे धकेलना चाहते हैं। पत्र में उन्होंने प्रियंका गाँधी को सेंट्रल लीडरशिप सौंपने की सिफारिश की और सचिन पायलट, डीके शिवकुमार, ए रेवंथ रेड्डी, शशि थरूर जैसे युवाओं को कोर टीम में शामिल करने को कहा। यह साफ है कि मोकीम परिवार की सियासी दुकान चलाने के लिए जगह तलाश रहे हैं।
भक्त चरण दास और उनके परिवार का पत्ता काटना चाहते हैं मोकीम
दूसरी तरफ भक्त चरण दास हैं, जिनकी जड़ें ओडिशा के ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में गहरी हैं। 26 नवंबर 1958 को जन्मे दास का राजनीतिक सफर लंबा है। 1989 में जनता पार्टी से कालाहांडी लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा। वीपी सिंह सरकार में डिप्टी मिनिस्टर स्पोर्ट्स एंड यूथ अफेयर्स बने, साथ ही रेलवे में मिनिस्टर ऑफ स्टेट।
भक्त चरण दास 15वीं लोकसभा में कालाहांडी से सांसद रहे। लेकिन हारों का सिलसिला भी जारी रहा है। वो तीन लगातार लोकसभा चुनाव हार चुके हैं, तो 2024 में नरला विधानसभा से लड़कर दूसरे नंबर पर रहे, हालाँकि वोट शेयर 12 फीसदी बढ़ा। फरवरी 2025 में उन्हें ओपीसीसी अध्यक्ष बनाया गया। दास का परिवार राजनीति में सक्रिय है। पत्नी सुंदा दास के साथ दो बेटे हैं- बड़ा क्रांति और छोटा सागर चरण दास। दास की संपत्ति 2.29 करोड़ है, और तीन क्रिमिनल केस लंबित हैं।
कोसल राज्य की माँग को मोकीम ने बनाया दास परिवार के खिलाफ मुद्दा
भक्त चरण दास की सबसे बड़ी कमजोरी उनकी पुरानी विचारधारा मानी जाती है। जेपी मूवमेंट में उन्होंने गाँधी परिवार की आलोचना की थी। कोसल राज्य की माँग का समर्थन किया, जो कॉन्ग्रेस की लाइन से अलग है। मोकीम ने पत्र में यही उठाया और कहा कि दास के बेटे सागर ने भी कोसल मूवमेंट को सपोर्ट किया, जिससे पार्टी में अशांति फैली।
दास की अगुवाई में कॉन्ग्रेस ने नुआपड़ा उपचुनाव में 83,000 वोटों की करारी हार झेली, जो उनके गढ़ का हिस्सा था। मोकीम ने इसे भरोसे की कमी का सबूत बताया। दास ने जवाब में मोकीम को बीजेपी का एजेंट कहा। बोले, “जो लीडरशिप को चुनौती दे, वो बीजेपी जॉइन कर ले।” यह जंग दो परिवारों की है- एक मुस्लिम वोट पर टिकी, दूसरी आदिवासी-ग्रामीण पर।
भक्त चरण दास के छोटे बेटे सागर चरण दास 33 साल के युवा हैं, लेकिन राजनीति में पिता की छाया में आगे बढ़ रहे हैं। हालाँकि वो भी साल 2024 से भवनिपतना विधानसभा से कॉन्ग्रेस विधायक हैं। सागर का फोकस स्थानीय मुद्दों पर है- सिंचाई, शिक्षा, रोजगार। वे सोशल मीडिया पर एक्टिव हैं, जहाँ कालाहांडी के विकास पर पोस्ट करते हैं। सागर की जीत ने पिता को मजबूती दी। लेकिन मोकीम का आरोप है कि सागर का कोसल राज्य का समर्थन पार्टी को नुकसान पहुँचा रहा। सागर चुप हैं, लेकिन पिता के साथ खड़े।
ओडिशा में डायनेस्टी पॉलिटिक्स का क्लासिक उदाहरण
यह डायनेस्टी पॉलिटिक्स का क्लासिक उदाहरण है, जहाँ बेटे विधायक बनकर परिवार की सियासत संभाल रहे। दास पिता-पुत्र की जोड़ी ओपीसीसी (ओडिशा प्रदेश कॉन्ग्रेस कमेटी) को कंट्रोल करना चाहती है, जबकि मोकीम-सोफिया युवा चेहरे के बहाने जगह बनाना चाहते हैं।
मोकीम का 8 दिसंबर 2025 का पत्र सोनिया को लिखा गया, जिसमें पार्टी की हालत को ‘चिंताजनक, दिल टूटने वाली और असहनीय’ बताया। उन्होंने छह लगातार हारें गिनाईं- ओडिशा में तीन राष्ट्रीय। बिहार, दिल्ली आदि की हारों को ‘संगठनात्मक दूरी’ का नतीजा कहा। राष्ट्रीय स्तर पर खड़गे की उम्र पर तंज कसा- ’83 साल के खड़गे से युवा (65 फीसदी आबादी 35 से कम) नहीं जुड़ पाते।’
मोकीम की राहुल गाँधी से तीन साल मिलने की कोशिश नाकाम रही, इसे ‘भावनात्मक दूरी’ कहा। अपने पत्र में मोकीम ने युवा नेताओं के पलायन का जिक्र भी किया और ज्योतिरादित्य सिंधिया, जयवीर शेरगिल, मिलिंद देवड़ा, हिमंता बिस्वा सरमा जैसे नेताओं का नाम भी लिया, तो बीजेपी में जाकर अच्छा काम कर रहे हैं।
मोकीम ने अपने पत्र में कॉन्ग्रेस के संगठन सृजन अभियान को फेवरिटिज्म का अड्डा बताते हुए पार्टी में सुधार के लिए ‘ओपन हार्ट सर्जरी’ की माँग कर डाली। उन्होंने पारदर्शिता, मेरिट बेस्ड अपॉइंटमेंट, युवा सशक्तिकरण को पार्टी के लिए अहम बताते हुए प्रियंका गाँधी को लीडरशिप सौंपने की सिफारिश कर डाली। इसके साथ ही पत्र में उन्होंने ओडिशा की कॉन्ग्रेस लीडरशिप यानी सरत पत्तनायक और भक्त चरण दास की जमकर आलोचना भी की।
ओडिशा तक ही सीमित नहीं 2 गुटों की लड़ाई
कॉन्ग्रेस में यह जंग ओडिशा तक सीमित नहीं। पूरे देश में कॉन्ग्रेस आंतरिक कलह से जूझ रही है। कर्नाटक में सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार की जंग 2.5 साल फॉर्मूले पर अटकी है। सिद्धारमैया पूरा टर्म चाहते हैं, शिवकुमार सीएम बनने को बेताब हैं। हाईकमान पर दबाव है, क्योंकि गलत फैसला राजस्थान-छत्तीसगढ़ जैसी हार ला सकता है।
ऐसे ही राजस्थान में 2020 में अशोक गहलोत और सचिन पायलट की लड़ाई ने पार्टी को बर्बाद ही कर डाला। एक तरफ अशोक गहलोत ने पायलट को दबाया, तो इसका फायदा बीजेपी ने उठा लिया। इसी तरह छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल और टीएस सिंहदेव की सत्ता रोटेशन की जंग ने संगठन को कमजोर किया। 2023 चुनाव में हार मिली। मध्य प्रदेश में कमलनाथ, दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया का टकराव 2018 सरकार गिरा गया। इसमें सिंधिया 22 विधायकों के साथ बीजेपी चले गए।
पंजाब में नवजोत सिद्धू और अमरिंदर सिंह की पुरानी लड़ाई ने पार्टी को तोड़कर रख दिया था। साल 2022 में सिद्धू ने हाईकमान को खुला पत्र लिखा था, फिर भी चुनाव में कॉन्ग्रेस की हार हुई अब सिद्धू vs राजा वडिंग के बीच लड़ाई का दौर चल रहा है। वहीं, हिमाचल में सुखविंदर सिंह सुक्खू और विक्रमादित्य सिंह की खींचतान भी जगजाहिर है।
कॉन्ग्रेस का आंतरिक कलह उसकी सबसे बड़ी कमजोरी
ये उदाहरण दिखाते हैं कि कॉन्ग्रेस का आंतरिक कलह उसकी सबसे बड़ी कमजोरी है। जहाँ एक तरफ बीजेपी मजबूत लीडरशिप दिखाती है, वहीं कॉन्ग्रेस में गुटबाजी हाईकमान को कमजोर कर देती है। ओडिशा में मोकीम का पत्र उसी कड़ी का हिस्सा है। वे कहते हैं, “पार्टी को बचाना मेरा कर्तव्य है।” लेकिन असल में नजर राज्य लीडरशिप पर है।
मोकीम सोफिया को युवा चेहरा बनाकर दास की कुर्सी हिलाना चाहते हैं, तो वहीं दास पिता-पुत्र अपनी पकड़ मजबूत रखना चाहते हैं। यह डायनेस्टी पॉलिटिक्स है, जहाँ परिवार पहले, पार्टी बाद में। वैसे, पार्टी में युवा लीडरशिप की माँग तो सही है, लेकिन बहाने से सत्ता हथियाना गलत परिपाटी की ओर ले जाता है। ऐसे में कॉन्ग्रेस को अगर जीतना है, तो गुटबाजी खत्म करनी होगी। हाईकमान को पारदर्शी फैसले लेने होंगे, वरना ओडिशा जैसी हारें बढ़ेंगी।
अंत में, 15 दिसंबर 2025 को ओपीसीसी ने मोकीम को “एंटी-पार्टी एक्टिविटी” के लिए निष्कासित कर दिया। नोटिस में कहा गया, “एआईसीसी ने मोकीम को प्राइमरी मेंबरशिप से निकालने का प्रस्ताव मंजूर किया।” हालाँकि मोकीम की बेटी सोफिया विधायक हैं, तो उनकी वापसी का रास्ता खुला भी है। पहले भी वो पार्टी में वापसी कर चुके हैं। ऐसे में मोकीम का यह निष्कासन कलह का अंत नहीं, बल्कि शुरुआत लगता है।


