दिल्ली में पहली बार बिना इंद्रदेव की मर्जी से बारिश होने जा रही है। इस बार बादल बुलाने के लिए आसमान की ओर नजरें उठाने की नहीं बल्कि विज्ञान की मदद ली जा रही है। इसे ‘आर्टिफिशियल रेन’ नाम दिया गया है। यह बारिश प्रकृति नहीं, तकनीक करवाएगी। मंगलवार (28 अक्टूबर 2025) को राजधानी के उत्तर पश्चिम क्षेत्र और बुराड़ी में ये आर्टिफिियल बारिश कराने की योजना है। यह कदम दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण को कम करने के लिए उठाया गया है।
दिल्ली की जहरीली हवा को धोने के लिए अब आसमान में विमान उड़ान भरेंगे, जो बादलों में बारिश करवाने वाला रसायन छोड़ेंगे। वैज्ञानिकों की यह कोशिश न सिर्फ दिल्ली की हवा को साफ करेगी बल्कि यह साबित करेगी कि जब इंसान और विज्ञान मिलें तो इंद्रदेव भी पीछे छूट सकते हैं। तो अब समझते हैं कि आखिर यह ‘आर्टिफिशियल रेन’ होती कैसे है और इसकी पूरी तकनीक क्या है।
क्लाउड सीडिंग से होती है आर्टिफिशियल बारिश
दरअसल आर्टिफिशियल बारिश लाने की इस प्रक्रिया को वैज्ञानिक भाषा में ‘क्लाउड सीडिंग’ (Cloud Seeding) कहा जाता है। यानी बादलों को इस तरह तैयार करना कि वे बरसने लगें। इसके लिए जरूरी है कि आसमान में पहले से बादल मौजूद हों और उनमें नमी हो। वैज्ञानिक विमान, रॉकेट या अन्य किसी मशीन के जरिए उन बादलों में सिल्वर आयोडाइड, नमक या अन्य रासायनिक कण छोड़ते हैं। ये कण बादलों के भीतर जाकर नमी को आकर्षित करते हैं, जिससे जलकण आपस में मिलकर भारी बूंदों में बदल जाते हैं और बारिश शुरू हो जाती है।
इस प्रक्रिया में बादलों की तापमान स्थिति, हवा की दिशा और नमी की मात्रा का सही होना बहुत जरूरी होता है, क्योंकि गलत परिस्थिति में यह प्रयोग विफल भी हो सकता है। विशेषज्ञों का यहा भी कहना है कि इस आर्टिफिशियल बारिश का पानी सेहत के लिए नुकसानदायक नहीं है। इसे लेकर जाँच और रिसर्च पूरी की जा चुकी हैं।
क्यों होती है क्लाउड सीडिंग?
क्लाउड सीडिंग दो मकसद से कराई जाती है। इसके पहला उद्देश्य है उन इलाकों में बारिश करवाना, जहाँ सूखा या पानी की कमी हो। दूसरा उद्देश्य प्रदूषण को कम करना है। दिल्ली में इसका उपयोग प्रदूषण को कम कराने के लिए किया जा रहा है। जब आर्टिफिशियल बारिश होती है तो हवा में तैरते सूक्ष्म प्रदूषक कण, धूल और जहरीली गैसें पानी के साथ जमीन पर बैठ जाती हैं। इससे हवा साफ होती है और साँस लेने में थोड़ी राहत मिलती है। यही वजह है कि दिल्ली सरकार ने प्रदूषण के चरम स्तर को देखते हुए यह कदम उठाया है।
हालाँकि यह तकनीक नई नहीं है। भारत में क्लाउड सीडिंग की शुरुआत कई दशक पहले हो चुकी थी। 1980 के दशक में तमिलनाडु ने सूखे से राहत पाने के लिए इसका प्रयोग किया था। 2003 में महाराष्ट्र और कर्नाटक में भी इसे आजमाया गया। तेलंगाना में भी कुछ साल पहले बारिश बढ़ाने के लिए यह प्रयोग हुआ था।
लेकिन दिल्ली का मामला खास है क्योंकि यहाँ इसका इस्तेमाल पहली बार प्रदूषण कम करने के लिए किया जा रहा है, न कि बारिश बढ़ाने के लिए। यानी यह प्रयोग मौसम नहीं बल्कि वातावरण को साफ करने के मकसद से किया जा रहा है।
क्या सच में होगी आर्टिफिशियल बारिश?
वैज्ञानिकों का कहना है कि यह तकनीक पूरी तरह मौसम पर निर्भर है। अगर बादल अनुकूल हों तो बारिश की संभावना 60 से 70 फीसदी तक रहती है। लेकिन अगर नमी या तापमान ठीक न हो तो सारा प्रयास बेकार जा सकता है। यही वजह है कि मौसम वैज्ञानिक इस प्रक्रिया के लिए सही दिन और सही बादलों का इंतजार करते हैं।
दिल्ली में यह कदम ऐसे समय पर उठाया जा रहा है जब वायु गुणवत्ता सूचकांक ‘गंभीर’ स्तर पर है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के मुताबिक मंगलवार (28 अक्टूबर 2025) को दिल्ली का AQI 319 दर्ज किया गया, जो ‘बहुत खराब’ श्रेणी में है।
आर्टिफिशियल बारिश से खत्म होगा प्रदूषण?
प्रदूषण से निजात पाने लिए जब सभी उपाय नाकाम नजर आए तो अब उम्मीद आसमान से लगाई गई है। लेकिन क्या सच में आर्टिफिशियल बारिश से प्रदूषण खत्म हो जाएगा? देखा जाए तो यह पहल न सिर्फ प्रदूषण से जूझ रही दिल्ली के लिए राहत बन सकती है बल्कि भविष्य में उन शहरों के लिए भी मिसाल बन सकती है, जहाँ हवा सांस लेने लायक नहीं रह गई है।
हालाँकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि आर्टिफिशियल बारिश कोई स्थायी समाधान नहीं है। यह अस्थायी राहत तो देती है, लेकिन जब तक असली कारण जैसे वाहन प्रदूषण, पराली जलाना और औद्योगिक धुआँ नहीं रोका जाता है तब तक या समस्या फिर लौट आएगी।
फिर भी दिल्ली की बीजेपी सरकार ने प्रदूषण से निजात पाने के लिए बेहतरीन कदम उठाने का प्रयास किया है, जो पिछले सरकारें केवल हवा-हवाई वादों में ही प्रदूषण को भगाने का समाधान ढूँढती थी। लेकिन आर्टिफिशियल बारिश कराने के इस कदम से वाकई में दिल्ली में प्रदूषण स्तर ठीक होने की उम्मीद है।


