Homeदेश-समाजडेडलाइन से पहले डेड हुआ नक्सलवाद: जानिए कैसे मोदी सरकार के ऑपरेशन्स ने 'लाल...

डेडलाइन से पहले डेड हुआ नक्सलवाद: जानिए कैसे मोदी सरकार के ऑपरेशन्स ने ‘लाल आतंकियों’ पर किया प्रहार, बड़े-बड़े नक्सलियों को ढेर कर जन-जन तक पहुँचाई हर सुविधा

नक्सलवाद से देश को आजाद कराने के लिए 2014 में मोदी सरकार ने प्रण लिया था और इसका डेडलाइन 31 मार्च 2026 तय किया। यह संकल्प अब पूरा हो गया है। जल जंगल जमीन के नाम पर जनजातीय लोगों को बरगलाने वाला लाल आतंकी संगठन अब इतिहास बनने की ओर है।

भारत अब नक्सल मुक्त हो गया है। देश के 12 राज्यों में फैला नक्सलवाद को खत्म करने का प्रण मोदी सरकार ने 2014 में लिया था। पिछले 12 साल में बेहतर रणनीति और नक्सलियों के खिलाफ एक के बाद एक ऑपरेशन ने नक्सलवाद को घुटने पर ला दिया। इस दौरान नक्सलियों को आत्मसमर्पण कर देश की मुख्य धारा में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित किया गया। कई कैडर सुरक्षाबलों के ऑपरेशन में मारे गए।

सीआरपीएफ, कोबरा, राज्यों की पुलिस, डीआरजी के जवान और स्थानीय जनजातीय लोगों की विकास के प्रति जागरुकता ने इस मिशन को अंजाम तक पहुँचाया।

‘सत्ता बंदूक की नली से निकलती है’, नक्सलियों की इस ध्रुव वाक्य ने भारत को करीब 55 सालों तक लहुलुहान कर रखा। 1970 के दशक में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी गाँव से इसकी शुरुआत हुई थी। इसने एक साल के अंदर 3620 घटनाओं को अंजाम दिया।

यह वह दौर था जब वामपंथी अतिवादियों ने अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए जनजातीय समाज के भोले-भाले लोगों का इस्तेमाल किया। जिन हाथों में कलम होनी चाहिए थी, उन हाथों में बंदूकें और हथियार पकड़ा दिए। जिन किशोरों को किताबें देनी चाहिए थी, उन्हें उन्मादी इतिहास की भटकी कहानियों और भारत विरोधी दस्तावेज पकड़ा दिए, जिन आँखों में सुंदर भविष्य के सपने और साहस बोने थे, उनमें अपने ही लोगों के प्रति नफरत के काँटे बो दिए गए। दशकों तक इसकी वजह से हजारों जवान बलिदान हुए।

2014 से प्रधान मंत्री मोदी और गृह मंत्री शाह ने नक्सलवाद के खात्मे की रणनीति बनाई। नक्सल प्रभावित लोगों को उसके गर्त से निकाल कर देश की मुख्य धारा से जोड़ने के लिए शिक्षा, रोजगार, विकास के संसाधनों से जोड़ना अहम था। दूरदराज के इलाकों में पुलिस चौकी बना कर, सड़कों से जोड़ कर जनजातीय लोगों को मुख्य धारा में जोड़ने के लिए निरंतर सार्थक संवाद किया गया।

गृह मंत्री खुद उन लोगों में विश्वास पैदा करने के लिए उनकी समस्या सुनने कई जगह पहुँचे और उनका समाधान निकाला। देश की सुरक्षा, सद्भावना और समन्वय की भावना को बनाए रखने में उनकी सहभागिता तय की।

नेपाल की सीमा से आंध्रप्रदेश तक नक्सलवाद फैला था

भारत की आतंरिक सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती बन वामपंथी उग्रवाद का विस्तार नेपाल की सीमा से दक्षिण भारत के आंध्रप्रदेश तक अपनी जड़ें जमाए हुए था। छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, बिहार में इनकी गतिविधियाँ भारतीय जनमानस को आहत कर रही थीं।

गृह मंत्रालय के आँकड़े के अनुसार, 2004 से 2014 के बीच नक्सली हिंसा की 16,463 घटनाएँ दर्ज की गईं। इस दौरान नक्सल हमलों में 1851 सुरक्षाकर्मियों ने बलिदानी दी, जबकि 4766 आम लोगों की भी जानें गई। 2013 में 126 जिले नक्सलवाद से प्रभावित थे, इनमें 35 सबसे ज्यादा प्रभावित जिला था। लेकिन 2026 तक आते आते इनका खात्मा करीब-करीब हो चुका है।

गृहमंत्री शाह ने संसद में ऐलान किया है कि मात्र एक नक्सली कमांडर मिशिर बेसरा बच गया है, जिससे बातचीत चल रही है। वह करीब 55 साथियों के साथ झारखंड के सारंडा की जंगलों में छिपा हुआ है।

साल 2025 में अब तक 317 नक्सलियों को मार गिराया गया है, 862 को गिरफ्तार किया गया है और 1,973 ने आत्मसमर्पण किया है।अकेले 2024 में 290 नक्सलियों को मार गिराया गया, 1,090 को गिरफ्तार किया गया और 881 ने आत्मसमर्पण किया। कुल 28 शीर्ष नक्सली नेताओं को मार गिराया गया है, जिनमें 2024 में 1 केंद्रीय समिति सदस्य और 2025 में 5 केंद्रीय समिति सदस्य शामिल हैं। प्रमुख सफलताओं में ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट में 27 कट्टर नक्सलियों का मारा जाना, 23 मई 2025 को बीजापुर में 24 का आत्मसमर्पण और अक्टूबर 2025 में छत्तीसगढ़ (197) और महाराष्ट्र (61) में 258 का आत्मसमर्पण शामिल है, जिनमें आत्मसमर्पण करने वालों में 10 वरिष्ठ नक्सली शामिल हैं।

नक्सलियों के गिरफ्त में आई थी इंदिरा गाँधी

गृह मंत्री अमित शाह ने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी पर आरोप लगाया कि 1970 से लेकर 1977 तक वह माओवादी विचारधारा की गिरफ्त में आ गई थीं।उन्होंने इसे पाला-पोसा। इसका परिणाम यह हुआ कि नक्सलवाद तेजी से बढ़ा और 12 राज्यों तक फैल गया। दरअसल कॉन्ग्रेस राज में इन इलाकों में कोई विकास कार्य नहीं हुआ। जनजातीय लोगों को अनपढ़ रखने की साजिश रची गई।

देश में आजादी के बाद करीब 60 सालों तक कॉन्ग्रेस सत्ता में थी, लेकिन इन इलाकों में न तो सड़कें पहुँची और न ही विकास हुआ। यहाँ तक कि पुलिस इन इलाकों में जाने से डरती थी, क्योंकि यहाँ जाने का मतलब मौत के मुँह में समाने जैसा था। नतीजा ये था कि नक्सली जनजातीय युवाओं को सरकारी तंत्र के खिलाफ भड़का कर देश विरोधी गतिविधियों में संलिप्त करते रहे। इन इलाकों में कानून का राज नहीं था, नक्सली जो बोलते थे वही कानून था। इस दौरान करीब 20 हजार लोग मारे गए।

2014 के बाद बदल गई रणनीति

2000 के दशक में नक्सलवाद अपने चरण पर था। 2004 में आंध्र प्रदेश के सीएम वाईएसआर ने नक्सलियों से शांति समझौते की कोशिश की, लेकिन विश्वास की कमी की वजह से ये नहीं चला और नक्सली हिंसा ने जोर पकड़ा। 2010 में दंतेवाड़ा वाली घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। इसमें सीआरपीएफ के 76 जवान बलिदान हुए थे। तत्कालीन मनमोहन सरकार ने कार्रवाई की बात भी कही, लेकिन ढिलमुल रवैये की वजह से कोई सार्थक पहल नहीं की जा सकी। नक्सलियों ने 2013 में मध्यप्रदेश कॉन्ग्रेस के बड़े बड़े नेताओं को एक साथ बस्तर जिले की झीरम घाटी में मौत के घाट उतार दिया। इसमें कॉन्ग्रेस के तत्कालीन प्रदेशाध्यक्ष नंद कुमार पटेल, पूर्व नेता प्रतिपक्ष महेंद्र कर्मा और पूर्व केंद्रीय मंत्री- विद्याचरण शुक्ल भी शामिल थे।

2014 में केन्द्र में आई मोदी सरकार ने एक एकीकृत और सार्थक रणनीति बनाई। पहले जंगलों में बड़े पैमाने पर तलाशी ली जाती थी, जिससे नक्सलियों के लिए सुरक्षाबलों पर हमला करना आसान होता था, लेकिन अब खुफिया जानकारी के आधार पर सटीक स्ट्राइक किया जाने लगा। इसमें ड्रोन और सैटेलाइट मैपिंग जैसे आधुनिक तकनीक की मदद ली गई।

स्थानीय पुलिस और अर्धसैनिक बलों को स्पेशल बटालियन बना कर बेहतरीन तालमेल के साथ ऑपरेशन को अंजाम दिया जाने लगा। इसकी निगरानी सीधे गृह मंत्रालय कर रही थी।

राज्यों को वित्तीय सहायता दी गई

केन्द्र सरकार ने राज्यों को वित्तीय सहायता दी, ताकि खुफिया तंत्र को मजबूत कर नक्सलियों पर लगाम लगाया जा सके। सरकार ने 2022 में स्पेशल इंफ्रास्ट्रक्चर स्कीम के तहत स्पेशल फोर्सेज और स्पेशल इंटेलिजेंस ब्रांच को भी मजबूत किया। पिछले 10 सालों में राज्य पुलिस के लिए नक्सल प्रभावित इलाकों में 586 किलेबंद पुलिस स्टेशन बनाए, जिससे पुलिस की पकड़ मजबूत हुई।

एनआईए ने नक्सलवाद विरोधी एक अलग विंग बनाया। ईडी और राज्य की एजेंसियों ने मिलकर नक्सलियों की करीब 92 करोड़ की संपत्तियाँ जब्त की। लोगों तक पहुँच बनाने के लिए 12000 किलोमीटर सड़कों का निर्माण किया। इंटरनेट और मोबाइल कनेक्टिविटी बढ़ाने के लिए टावर लगे, ताकि लोगों तक देश दुनिया की जानकारी पहुँच सके। पुलिस तैनात किए गए और चौकियाँ बनाई गई।

आत्मसमर्पण कर मुख्य धारा में शामिल होने का मौका

नक्सली कैडरों और ईनामी नक्सलियों को देश की मुख्य धारा में शामिल करने की पूरी कोशिश की गई। उन्हें हथियार डालने पर 5 लाख रुपए, निचले कैडरों को ढाई लाख रुपए दिए गए। व्यावसायिक परीक्षण के लिए पैसे दिए गए और जमीनें दी गई ताकि ये लोग बस जाए, यानी जीवन को व्यवस्थित करने की पूरी व्यवस्था सरकार ने की। इसका असर जमीन पर दिखाई दिया।

केंद्र सरकार ने नक्सल प्रभावित 48 जिलों में कौशल विकास पहल शुरू की है, जिसके तहत 495 करोड़ रुपए के निवेश से 48 आईटीआई केन्द्र खोले गए।  नक्सल प्रभावित जिलों में 1,804 बैंक शाखाएं, 1,321 एटीएम और 37,850 बैंकिंग संवाददाता स्थापित किए गए।

बड़े-बड़े नक्सली नेता मारे गए

सुरक्षा बलों के सफल ऑपरेशन में बड़े बड़े नक्सली मारे गए। इसका परिणाम यह हुआ कि नक्सलवाद नेताविहीन हो गया। युवाओं को आकर्षित करने की क्षमता विचारधारा में नहीं रही। 2025 में नक्सलियों के एक से बढ़कर एक नेता सुरक्षाबलों के हाथों मारे गए।

सबसे बड़े नेता नम्बाला केशव राव उर्फ बसवराजू छत्तीसगढ़ में मारा गया। संगठन का एकमात्र जनजातीय नक्सली नेता माडवी हिडमा भी नवंबर 2025 में मारा गया। उसने बड़े- बड़े नक्सली घटनाओं को अंजाम दिया था। प्रताप रेड्डी उर्फ चलपति को जनवरी 2025 में छत्तीसगढ़- ओडिशा सीमा पर मार गिराया गया था। इसके अलावा कट्टा रामचंद्र रेड्डी, कदारी सत्यनारायण रेड्डी, गजरला रवि, सहदेव सोरेन, बालकृष्ण, नरसिम्हा और चेलम जैसे केंद्रीय समिति के कई अन्य सदस्य भी हाल के अभियानों में मारे गए हैं।

फरवरी 2026 में हुए एक अन्य एनकाउंटर में प्रभाकर राव, पारकल वीर, स्वामी, पडकाला स्वामी और लोकेटी चंदर राव समेत सात नक्सली नेताओं को मार गिराया गया। पिछले एक साल में 28 नक्सली नेताओं को सुरक्षा बलों ने ढेर कर दिया, जिससे नक्सली आंदोलन दिशाविहीन हुई और इसका अंत हो पाया।

Join OpIndia's official WhatsApp channel

  सहयोग करें  

'द वायर' जैसे राष्ट्रवादी विचारधारा के विरोधी वेबसाइट्स को कभी पैसों की कमी नहीं होती। देश-विदेश से क्रांति के नाम पर ख़ूब फ़ंडिग मिलती है इन्हें। इनसे लड़ने के लिए हमारे हाथ मज़बूत करें। जितना बन सके, सहयोग करें

रुपम
रुपम
रुपम के पास 20 साल से ज्यादा का पत्रकारिता का अनुभव है। जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा। जी न्यूज से टेलीविज़न न्यूज चैनल में कामकाज की शुरुआत। सहारा न्यूज नेटवर्क के प्रादेशिक और नेशनल चैनल में टेलीविज़न की बारीकियाँ सीखीं। सहारा प्रोग्रामिंग टीम का हिस्सा बनकर सोशल मुद्दों पर कई पुरस्कार प्राप्त डॉक्यूमेंट्री का निर्माण किया। एडिटरजी डिजिटल हिन्दी चैनल में न्यूज एडिटर के तौर पर काम किया।

संबंधित ख़बरें

ख़ास ख़बरें

किसी को बेल मिली तो घर नहीं जा सका, कोई अब तक जेल में… संसद की सुरक्षा में सेंधमारी को सामान्य बनाना चाह रहे...

हर पीढ़ी में ऐसे युवा होते हैं जो व्यवस्था बदलना चाहते हैं। लेकिन ये भी समझना जरूरी है कि व्यवस्था बदलने और कानून तोड़ने में अंतर होता है।

PM की हत्या की साजिश, संसद में घुसने का प्रयास और पुलिस पर पथराव: Insta रील से इतर समझें ‘कॉकरोचों’ का एजेंडा, कैसे ठगे...

एकतरफा नैरेटिव को ध्वस्त करने वाली CJP प्रदर्शन यह दूसरी तस्वीरें भी दिखें, जिनमें हिंसक भीड़ ने पुलिस पर पथराव किया, 'मोदी-बीजेपी मुर्दाबाद' के नारे लगाकर असल छात्रों को बरगलाया।
- विज्ञापन -