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फर्जी खबरें फैलाने से लेकर काटे-छाँटे गए वीडियो और फर्जी नैरेटिव तक: पढ़ें- भारत में बैन किए गए प्रोपेगेंडा अकाउंट्स की पड़ताल

थंबनेल सबसे पहले दिखता है और वही तय करता है कि लोग चीज को कैसे समझेंगे। जब बार-बार ऐसी आक्रामक और नाटकीय भाषा इस्तेमाल होती है तो हर खबर एक बड़े घोटाले या संकट जैसी लगने लगती है।

हाल के दिनों में 4PM, मॉलिटिक्स (Molitics) और नेशनल दस्तक (National Dastak) जैसे कई सोशल मीडिया अकाउंट्स और कंटेंट प्लेटफॉर्म्स पर भारत में रोक लगाई गई है। जैसे ही ये पाबंदी लगी वामपंथियो ने इसे अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला बताया और कहा कि विरोध की आवाज दबाई जा रही है। यह दावा सोशल मीडिया पर तेजी से फैल भी गया। हालाँकि, इस तरह के दावे बड़ा सवाल खड़ा करते हैं कि क्या यह कार्रवाई मनमाने तरीके से हुई या इससे पहले ऐसा कंटेंट लगातार आ रहा था जिस पर सवाल उठना जरूरी था?

अगर इन प्लेटफॉर्म्स के कंटेंट को ध्यान से देखें तो मामला इतना सीधा नहीं लगता। कई बार इनके कंटेंट में सनसनीखेज अंदाज, तथ्यों को सुविधा के हिसाब से चुनने और ऐसे दावे देखने को मिलते हैं जो बाद में गलत साबित होते हैं या सही नहीं निकलते। कई बार ऐसी कहानियाँ भी सामने आईं जिन्हें बाद में भ्रामक माना गया और कई बार अनुमानों को ही पूरे भरोसे के साथ पेश किया गया। यह पैटर्न दिखाता है कि यहाँ असर पैदा करने को अक्सर सटीक जानकारी से ज्यादा महत्व दिया जाता है। ऐसे में मामला सिर्फ पाबंदी का नहीं बल्कि डिजिटल जानकारी देने वाले इकोसिस्टम की जवाबदेही का भी बन जाता है।

इकोसिस्टम: प्लेटफॉर्म, चेहरे और नैरेटिव

पहली नजर में 4PM, मॉलिटिक्स और नेशनल दस्तक जैसे प्लेटफॉर्म खुद को अलग आवाज बताते हैं। वे कहते हैं कि वे बेबाक हैं, स्वतंत्र हैं और बिना किसी रोक-टोक के सच दिखाते हैं। उनका कहना होता है कि वे मुख्यधारा की बातों को चुनौती देते हैं और ‘सत्ता के सामने सच बोलते हैं’। लेकिन असल में ये लोग सही जानकारी से ज्यादा ऐसी चीजें दिखाते हैं जो लोगों पर अधिक असर डालें।

इनके कंटेंट में अक्सर नाटकीय तस्वीरें (थंबनेल), आक्रामक और भड़काऊ हेडलाइन होती हैं जो लोगों को किसी भी मुद्दे के लिए भावनात्मक बना दें। मुश्किल मुद्दों को बहुत आसान करके दिखाया जाता है। कई बार अनुमानों को ही सच की तरह बताया जाता है जबकि सही जाँच या पक्के सबूत साफ नहीं होते या होते ही नहीं है।

इससे एक ऐसा माहौल बनता है जहाँ अनुमानों को सच जैसा दिखाया जाता है, छोटी-छोटी घटनाओं को पूरे सिस्टम की बड़ी समस्या की तरह पेश किया जाता है और राय को खबर की तरह बताया जाता है। यह सिर्फ सोच या विचार का फर्क नहीं है क्योंकि हर मीडिया के अपने विचार होते हैं। असली फर्क यह है कि क्या पहले सबूत होते हैं या पहले दावा किया जाता है।

इन प्लेटफॉर्म्स पर बार-बार पक्की जाँच की बजाय बातों को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जाता है। इससे उनके काम करने के तरीके और मकसद पर सवाल उठते हैं। यह सिर्फ एक पोस्ट की बात नहीं है बल्कि पूरे एक सिस्टम की बात है। इसी वजह से समझ आता है कि सरकार को इसमें दखल देने की जरूरत क्यों लगी।

पहला चरण: जब दिखाने का तरीका बदलता है सोच

एक मामले में नेशनल दस्तक ने एक पोस्ट में आरोपितों के नाम पूरे नहीं बताए सिर्फ ‘राजपूत’ और ‘राना’ जैसे शब्द इस्तेमाल किए। इससे ऐसा लगा कि आरोपी हिंदू हैं। लेकिन बाद में पूरी जानकारी सामने आई तो पता चला कि असली नाम ‘अजीम राना’ और ‘आजाद राजपूत’ थे। यानी दोनों आरोपित मुस्लिम थे लेकिन पोस्ट में इसे ऐसे दिखाया गया जैसे अपराध हिंदुओं ने किया हो।

इस पोस्ट पर एक कम्युनिटी नोट भी लगा जिसमें कहा गया कि अधूरे नाम जानबूझकर ऐसे इस्तेमाल किए गए जिससे गलत धारणा बने। ऐसे और भी कई मामले हैं जहाँ इन प्लेटफॉर्म्स की बातें बाद में अधूरी, भ्रामक या पूरी जानकारी आने पर गलत साबित हुईं।

एक बड़ा उदाहरण वह था जब दावा किया गया कि भारत के सोने के भंडार (₹1 लाख करोड़ से ज्यादा) का एक बड़ा हिस्सा RBI से ‘गायब’ हो गया है। इसे बहुत डराने वाले तरीके से दिखाया गया जैसे कोई बड़ा घोटाला या गड़बड़ी हुई हो। लेकिन बाद में PIB ने इसकी जाँच कर साफ किया कि यह दावा गलत है और आँकड़ों को गलत तरीके से फैलाया गया था।

फिर भी सच सामने आने के बाद भी यह बात कई जगह फैलती रही और ज्यादातर पोस्ट में सुधार की जानकारी नहीं दी गई। इससे पता चलता है कि इस तरह की बड़ी गलत खबरें, सच सामने आने के बाद भी लोगों की सोच पर असर डालती रहती हैं।

दूसरा चरण: वीडियो और तस्वीरों से अपनी कहानी गढ़ना

एक और तरीका बार-बार दिखता है कि छोटे वीडियो और चुनी हुई तस्वीरें। इन्हें पूरे संदर्भ के बिना दिखाया जाता है। एक मामले में एक वीडियो क्लिप शेयर की गई जिसमें नीतीश कुमार आरती की थाली पकड़े हुए दिख रहे थे। इसके साथ कैप्शन दिया गया- ‘सम्राट चौधरी ने नीतीश कुमार के हाथ से आरती की थाली छीन ली’। वीडियो को अकेले ऐसे दिखाया गया कि एक खास मैसेज जाए। लेकिन पूरी घटना या पूरा वीडियो देखे बिना ऐसी बात सिर्फ अधूरी ही रहती है।

आजकल सोशल मीडिया पर यही आम तरीका बन गया है। छोटे-छोटे वीडियो को उनके असली संदर्भ से अलग करके दिखाया जाता है ताकि वो किसी खास कहानी या सोच के हिसाब से फिट हो जाएँ। ऐसे में जो नहीं दिखाया जाता वो उतना ही जरूरी होता है जितना जो दिखाया जाता है। समस्या सिर्फ एक वीडियो की नहीं है, बल्कि उस पैटर्न की है जिसमें चीजों को पहले से बनी सोच के हिसाब से दिखाया जाता है। जब पूरा संदर्भ नहीं दिया जाता तो लोग अधूरी चीजों को ही पूरी सच्चाई मान लेते हैं। बार-बार ऐसा होने पर लोगों की सोच उसी दिशा में बनने लगती है चाहे पूरी सच्चाई कुछ और ही क्यों न हो।

तीसरा चरण: जब सनसनी ही बन जाए कंटेंट

सिर्फ क्या कहा जा रहा है या क्या दिखाया जा रहा है… ये ही नहीं बल्कि उसे कैसे दिखाया जा रहा है, ये भी बहुत मायने रखता है। Molitics जैसे प्लेटफॉर्म अक्सर ध्यान खींचने वाली भाषा का इस्तेमाल करते हैं। जैसे ‘घपलेबाजी पकड़ी गई’, ‘बड़ा खुलासा’, ‘तहलका मच गया’, ‘मोदी को बड़ा झटका’, ‘नफरती हिंदुत्व’, ‘आतंकी संगठन’। ये शब्द ऐसे अंदाज में लिखे जाते हैं जैसे बात पूरी तरह साबित हो चुकी हो जबकि कई बार मामला उतना साफ नहीं होता।

ये लाइनें ज्यादातर थंबनेल, कैप्शन और वीडियो के टाइटल में होती हैं जिससे देखने वाले को लगे कि मामला बहुत बड़ा और पक्का है, भले ही अंदर पूरा सबूत साफ न हो।

ये तरीका सोच-समझकर अपनाया जाता है। थंबनेल सबसे पहले दिखता है और वही तय करता है कि लोग चीज को कैसे समझेंगे। जब बार-बार ऐसी आक्रामक और नाटकीय भाषा इस्तेमाल होती है तो हर खबर एक बड़े घोटाले या संकट जैसी लगने लगती है। कई बार इनका फोकस खास तरह की सोच पर होता है जहाँ हिंदुत्व को गलत या दबाने वाला दिखाया जाता है और छोटी या कम अहम खबरों को भी बड़ा बनाकर पेश किया जाता है।

कई बार टाइटल या थंबनेल में जो बड़ा दावा किया जाता है, वह अंदर दिए गए सबूतों से मेल नहीं खाता। यानी दिखाने और असली जानकारी में फर्क होता है। जब ऐसा कंटेंट बहुत लोगों तक पहुँचता है तो यह फर्क और भी अहम हो जाता है। समय के साथ, बार-बार ऐसे कंटेंट देखने से लोगों को लगने लगता है कि हर जगह गड़बड़ी ही गड़बड़ी है, भले ही हर मामला सच में इतना बड़ा या साबित न हो।

चौथा चरण: जब कंटेंट आरोप, अनुमान और भड़काऊ बातों तक पहुँचे

सनसनी और आधी-अधूरी जानकारी से आगे बढ़कर मामलों में यह कंटेंट सीधे अनुमानों और गंभीर आरोपों तक पहुँच जाता है, जो कभी-कभी बदनाम करने वाले भी हो सकते हैं।

एक बार ‘Dr Nimo Yadav 2.0’ नाम के अकाउंट (जिसे Prateek Sharma चलाते हैं) से ऐसा कंटेंट पोस्ट किया जिसमें इशारा किया गया कि केंद्रीय मंत्रियों के दफ्तर किसी ऐसे व्यक्ति से जुड़े हो सकते हैं जिस पर आतंकी ट्रेनिंग से जुड़ा होने का आरोप है।

पोस्ट में इसे सवाल के रूप में रखा गया और जाँच की माँग की गई लेकिन ऐसा कोई पक्का सबूत नहीं दिया गया जो इतने गंभीर आरोप को साबित करे। भले ही इसे सवाल की तरह लिखा गया हो लेकिन जब ऐसी बातें बड़ी संख्या में लोगों तक पहुँचती हैं तो वे बिना सबूत के भी लोगों को प्रभावित कर सकती हैं।

एक और मामले में भारतीय सेना के अधिकारियों की तस्वीर के साथ की गई टिप्पणी में मजाक के जरिए उसे मिड-डे मील जैसी नीति से जोड़ दिया गया। हंसी-मजाक और व्यंग्य समाज का हिस्सा हैं लेकिन इस तरह की बातों को कुछ लोग उन संस्थाओं का मजाक उड़ाना मान सकते हैं, जिनका हम सम्मान करते हैं।

इसी तरह, भारत की विदेश नीति और ऊर्जा से जुड़े फैसलों पर भी ऐसे निष्कर्ष दिखाए गए जैसे सब कुछ असफल हो गया हो जबकि असल में मामला इतना सीधा नहीं था। उदाहरण के लिए, कई रिपोर्ट्स में दिखाया गया है कि भारत ने वैश्विक दबाव के बावजूद रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदा जो एक अलग तस्वीर पेश करता है।

कुछ पोस्ट में बिना पक्के सबूत के बड़े-बड़े कूटनीतिक दावे भी किए गए जिससे ऐसी कहानियाँ बनती हैं जो सुनने में सही लगती हैं लेकिन पूरी तरह साबित नहीं होतीं।

इसके अलावा, कुछ मामलों में बेहद भड़काऊ और अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल भी किया गया। जैसे एक रिपोर्टिंग के दौरान नेशनल दस्तक के एक रिपोर्टर ने ब्राह्मण समुदाय के खिलाफ आपत्तिजनक बातें कहीं कि ‘ब्राह्मण कलंक हैं, उन्हें जूतों से मारकर बाहर निकालो’। इस तरह की बातें दिखाती हैं कि सार्वजनिक चर्चा में भाषा का स्तर कितना नीचे जा सकता है और किसी खास समुदाय को निशाना बनाया जा सकता है।

ऐसे प्लेटफॉर्म अक्सर अभिव्यक्ति की आजादी की बात करते हैं लेकिन सवाल यह भी उठता है कि क्या वही आजादी उन समुदायों के लिए भी है जिनके खिलाफ इस तरह की बातें कही जाती हैं। जब इस तरह का कंटेंट बिना रोक-टोक फैलता है तो समाज में दूरी और तनाव बढ़ सकता है।

इन सभी उदाहरणों को मिलाकर देखें, तो एक पैटर्न सामने आता है जहाँ गंभीर आरोप सवाल के रूप में पेश किए जाते हैं, संवेदनशील संस्थाओं पर व्यंग्य का इस्तेमाल किया जाता है और जटिल मामलों को आसान और पक्के निष्कर्ष की तरह दिखाया जाता है। इसका असर यह होता है कि गलत जानकारी फैलती है और लोगों में डर या भ्रम का माहौल बन सकता है।

पाँचवाँ चरण: नैरेटिव को सच बनाकर दिखाना

एक और साफ पैटर्न यह है कि कुछ प्लेटफॉर्म, खासकर 4PM जैसे यूट्यूब चैनल, बार-बार राजनीतिक भविष्यवाणियाँ करते हैं। इनके वीडियो टाइटल, थंबनेल और कंटेंट में अक्सर यह दिखाया जाता है कि जल्द ही बड़ा राजनीतिक उलटफेर होने वाला है। इनके कंटेंट में डर पैदा करने वाला माहौल बनाया जाता है जैसे सरकार गिरने वाली है, कोई बड़ा बदलाव होने वाला है या नेतृत्व बदलने वाला है।

इन दावों को बहुत जल्दबाजी और बिल्कुल सच के रूप में दिखाया जाता है मानो यह कोई अंदर की खबर हो या अभी-अभी होने वाली घटना हो लेकिन समय के साथ देखें तो इनमें से कई बातें सच होती नहीं दिखतीं।

इससे एक पूरा सिस्टम बन जाता है कि पहले थंबनेल में चौंकाने वाली बात दिखाई जाती है, फिर बड़ा दावा किया जाता है, उसे जोर-शोर से फैलाया जाता है और कुछ समय बाद बिना पुराने दावे का हिसाब दिए एक नई भविष्यवाणी शुरू हो जाती है। इससे धीरे-धीरे लोगों को लगता है कि देश में हमेशा कुछ बड़ा गलत होने वाला है जबकि असल में ऐसा जरूरी नहीं होता।

यह समझना जरूरी है कि राजनीति पर राय देना या अनुमान लगाना गलत नहीं है लेकिन फर्क इस बात का है कि उसे कैसे दिखाया जाता है। जब बार-बार अंदाजों को ऐसे पेश किया जाए जैसे वे पक्का सच हों और बाद में उनकी कोई जिम्मेदारी न ली जाए तो इससे उनके काम करने के तरीके और भरोसे पर सवाल उठते हैं। असली समस्या एक गलत भविष्यवाणी नहीं बल्कि बार-बार अनुमानों को सच की तरह दिखाने की आदत है।

सामने आता छिपा हुआ पैटर्न

अलग-अलग देखें तो इन अकाउंट्स (जिन्हें भारत में रोका गया है) की हर बात को सिर्फ राय, एडिटोरियल फैसला या एक गलती माना जा सकता है। लेकिन जब सबको साथ में देखा जाता है तो एक साफ पैटर्न दिखता है। कभी गलत आर्थिक दावे, कभी पहचान को घुमा कर दिखाना, तो कभी वीडियो और तस्वीरों को अलग तरीके से पेश करना है कि इनमें कई चीजें बार-बार दोहराई जाती हैं। कई बार पूरी जानकारी नहीं दी जाती, दावे बिना पक्के सबूत के होते हैं और बातें हाल की सच्चाई से मेल नहीं खातीं।

यह ट्रेंड इस बात से और बढ़ता है कि कंटेंट को कैसे दिखाया और फैलाया जाता है। भड़काऊ हेडलाइन, भावनात्मक तस्वीरें और पक्के अंदाज़ में लिखी गई बातें ये सब मिलकर ऐसा असर देती हैं जैसे सब कुछ पूरी तरह सच हो जबकि असल में बात उतनी साफ नहीं होती।

समय के साथ, बार-बार ऐसी चीजें देखने से लोगों की सोच पर असर पड़ता है। जो बात पहले सिर्फ दावा या अंदाज़ा होती है, वही बार-बार दोहराने से सच जैसी लगने लगती है। एक मशहूर कहावत है कि ‘एक झूठ अगर बार-बार बोला जाए तो वह सच जैसा लगने लगता है’। इन प्लेटफॉर्म्स का पूरा नैरेटिव इसी तरह काम करता दिखता है।

शुरुआत में सरकार की आलोचना होती है जो धीरे-धीरे देश के खिलाफ सोच में बदलती दिखती है और वही उनके कंटेंट में भी नजर आता है। जैसे ऊपर लेयर 4 में देखा गया कि ‘नीमो यादव’ नाम के अकाउंट ने भारतीय सेना का मज़ाक उड़ाय जबकि सेना किसी भी राजनीतिक दल से ऊपर होती है। लेकिन ऐसे अकाउंट किसी सीमा पर जाकर रुकते नहीं हैं। इसलिए चिंता सिर्फ एक-दो पोस्ट की नहीं है बल्कि पूरे उस सिस्टम की है जहाँ कहानी बनाने और लोगों को जोड़ने पर ज्यादा ध्यान होता है जबकि सही जानकारी और पूरा संदर्भ पीछे छूट जाता है।

अभिव्यक्ति और जिम्मेदारी के बीच संतुलन

इन अकाउंट्स पर लगी पाबंदी की चर्चा अक्सर ‘अभिव्यक्ति की आजाादी बनाम सेंसरशिप’ के रूप में होती है लेकिन यह मामला इतना सीधा नहीं है। अभिव्यक्ति की आजादी किसी भी लोकतंत्र की बुनियाद है। सवाल उठाना, आलोचना करना और असहमति जताना बहुत जरूरी है। आज के डिजिटल दौर में जहाँ जानकारी बहुत तेजी से फैलती है, वहाँ नई चुनौतियाँ भी हैं जिससे खासकर तब, जब गलत या भ्रामक जानकारी बहुत बड़े स्तर पर फैल सकती है।

इसलिए असली सवाल विचारों को दबाने का नहीं है बल्कि यह देखने का है कि क्या बार-बार अधूरी जानकारी, बिना सबूत के दावे और पहले से तय कहानी के हिसाब से बनाया गया कंटेंट भरोसेमंद माना जा सकता है। दिल्ली हाईकोर्ट में दी गई जानकारी के अनुसार, सरकार की चिंता भ्रामक जानकारी, बदनाम करने वाले कंटेंट और कानून-व्यवस्था पर उसके असर को लेकर है।

वहीं, दूसरी तरफ प्लेटफॉर्म्स यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या कार्रवाई सही तरीके से और सही सीमा में की गई है। इससे साफ है कि यह मुद्दा आसान नहीं है। लेकिन एक बात साफ है कि जब कंटेंट बार-बार सही जानकारी से ज्यादा असर पैदा करने पर ध्यान देता है, तो उस पर सवाल उठना तय है।

(यह खबर मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है जिसे इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ा जा सकता है)

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Dhruv Mishra
Dhruv Mishra
Dhruv Mishra is a researcher and writer specializing in Indian politics and policy analysis. With a background in data-driven storytelling, he explores elections, governance, and India’s role in global affairs.

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