नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (NIA) को 22 अप्रैल 2025 को हुए पहलगाम आतंकी हमले की जाँच में नए सुराग मिले हैं। इस हमले की जिम्मेदारी शुरू में द रेजिस्टेंस फ्रंट (TRF) नामक आतंकी संगठन ने ली थी, जो लश्कर-ए-तैयबा का मुखौटा संगठन माना जाता है, लेकिन बाद में इसने दावा वापस ले लिया।
जाँच के दौरान NIA को श्रीनगर के यासिर हयात नाम के एक व्यक्ति का मोबाइल मिला, जिसमें 450 से ज्यादा कॉन्टैक्ट्स थे। इसी मोबाइल की मदद से TRF को फंडिंग देने वालों की पहचान में मदद मिली। इन संपर्कों में कुछ लोग पहले से ही अन्य आतंकी मामलों में जाँच के घेरे में हैं।
NIA को संदेह है कि TRF को फंडिंग के लिए मलेशिया के रास्ते हवाला नेटवर्क का इस्तेमाल किया गया। जाँच में सजाद अहमद मीर नामक एक व्यक्ति का नाम सामने आया है, जो मलेशिया में रहता है। यासिर हयात की कॉल डिटेल्स से पता चला कि वह सजाद मीर से लगातार संपर्क में था और पैसे की व्यवस्था कर रहा था।
रिपोर्ट के अनुसार, हयात कई बार मलेशिया गया और मीर की मदद से करीब 9 लाख रुपए इकट्ठे किए, जो बाद में शफात वानी नामक TRF ऑपरेटिव को दिए गए। शफात वानी TRF का एक अहम सदस्य है और उसने भी मलेशिया की यात्रा की थी, लेकिन यह यात्रा ‘यूनिवर्सिटी कॉन्फ्रेंस’ के बहाने की गई थी, जबकि यूनिवर्सिटी ने ऐसी किसी स्पॉन्सरशिप की पुष्टि नहीं की।
NIA को यह भी पता चला कि हयात सिर्फ मीर से ही नहीं, बल्कि दो पाकिस्तानी नागरिकों से भी संपर्क में था। उसका मुख्य काम विदेशों से पैसे जुटाना और TRF के लिए फंडिंग की व्यवस्था करना था। NIA ने 13 अगस्त 2025 को बताया था कि उसे TRF की फंडिंग में विदेशी लिंक मिले हैं, जिसकी गहन जाँच की जा रही है।
TRF की स्थापना 2019 में हुई थी। पाकिस्तान और लश्कर-ए-तैयबा ने हिजबुल मुजाहिदीन की जगह एक नया ‘स्थानीय’ चेहरा देने के लिए इसे खड़ा किया था। इसका मकसद था कि कश्मीर में आतंक को स्थानीय आंदोलन की तरह पेश किया जाए और पाकिस्तान Financial Action Task Force (FATF) की निगरानी से बच सके।
भारत पहले ही TRF को आतंकी संगठन घोषित कर चुका है और पाकिस्तान पर इसे समर्थन देने का आरोप लगाता है। अब पहलगाम हमले के बाद अमेरिका ने भी TRF को ‘विदेशी आतंकी संगठन’ और ‘स्पेशली डेजिग्नेटेड ग्लोबल टेररिस्ट’ घोषित कर दिया, जो पाकिस्तान के लिए एक बड़ा झटका था। इससे पाकिस्तान की आतंक से जुड़े दोहरे रवैये का पर्दाफाश हुआ।
गौरतलब है कि भारत का भगोड़ा इस्लामिक प्रचारक जाकिर नाइक भी मलेशिया में ही है। जुलाई 2016 में बांग्लादेश के ढाका में बम धमाके के बाद जाकिर नाइक भारत से भाग गया था। इस धमाके में 29 लोगों की मौत हुई थी। हमले में शामिल आतंकियों ने कहा था कि वो नाइक के भाषणों से प्रभावित थे।
भारत में भगोड़ा घोषित होने के बाद से उसने मलेशिया में शरण ली हुई है। भारत सरकार मलेशिया की सरकार से उसके प्रत्यर्पण के लिए लगातार बातचीत कर रही है, लेकिन अभी तक उसका कोई परिणाम नहीं आया है।
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 50 फीसदी टैरिफ भारत पर लाद दिया है। इसका असर निर्यातकों और लोगों की नौकरियों पर पड़ सकता है। इसको देखते हुए भारत सरकार कोरोना काल की तरह योजना बना कर बढ़ी हुई टैरिफ का मुकाबला करने की तैयारी कर रही है।
कोरोना काल में लॉकडाउन के दौरान जिस तरह की योजनाएँ लागू की गई थी, उसी तरह की योजनाएँ लागू कर लोगों को राहत दी जाएगी। इसके अलावा अमेरिका से इतर ग्लोबल बाजार तलाशने और सप्लाई चेन को लेकर रणनीति बनाई जा रही है।
नकदी बाजार में बनाए रखने पर जोर
हिन्दुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, अधिकारियों ने बताया है कि सरकार सबसे पहले नकदी की समस्या का समाधान निकालेगी। माना जा रहा है कि अमेरिकी टैरिफ की वजह से नकदी की दिक्कत, सामान पहुँचने में देरी, ऑर्डर रद्द होना जैसी समस्याएँ आ सकती हैं।
निर्यातकों को जब तक नई ग्लोबल बाजार नहीं मिलती है, तब तक राहत देना जरूरी है। इसके लिए सरकार तुरंत राहत देने के साथ-साथ चरणबद्ध तरीके से योजनाएं लागू करेगी ताकि लंबी अवधि की रणनीति भी तैयार हो सके। नकदी उपलब्ध कराने के अलावा, मौजूदा व्यापार समझौतों को मजबूत करना और नई मार्केट में अवसर तलाशने का काम भी तेजी से किया जाएगा।
राहत पैकेज का ऐलान कर सकती है सरकार
कोरोना लॉकडाउन के दौरान जिस तरह आम लोगों के साथ-साथ लघु और मध्यम उद्योगों के लिए स्कीम लाए गए थे, उन्हें फिर से दोहराया जा सकता है। सरकार इमरजैंसी क्रेडिट लाइन गारंटी स्कीम यानी ECLGS जैसी योजनाओं को लागू कर सकती है। इसके तहत उद्योगों को बगैर गारंटी के 100 फीसदी लोन उपलब्ध कराया जाएगा। सरकार का पूरा फोकस लघु और मध्यम उद्योगों पर है। इन्हें बचाने के लिए लॉकडाउन के 68 दिनों में ये स्कीम लागू किए गए थे। हालाँकि वर्तमान परिस्थितियों के हिसाब से इसमें कुछ बदलाव लाए जा सकते हैं। इसके अलावा लंबी अवधि की रणनीति तैयार की जा रही है, ताकि नकदी की उपलब्धता बनी रहे। दूसरे देशों से व्यापार समझौते को मजबूत करने और नए बाजार की तलाश का काम और तेज हो।
प्लान1: ECLGS योजना
सरकार जीएसटी रिफॉर्म कर छोटे और मझोले उद्योगों को कई तरह के राहत देने जा रही है। अधिकारियों ने मुताबिक घरेलू माँग की वजह से भारतीय अर्थव्यवस्था अभी मजबूत है। लेकिन निर्यात में गिरावट का असर पड़ सकता है, क्योंकि आर्थिक विकास में निर्यात अहम भूमिका निभाता है। हालाँकि कुल 4.12 ट्रिलियन डॉलर जीडीपी में इसका योगदान मात्र 10 फीसदी यानी 438 बिलियन डॉलर ही है। यही वजह है कि जून तिमाही में भी भारत की आर्थिक वृद्धि दर 7.8% दर्ज की गई।
क्या है ECLGS
इमरजैंसी क्रेडिट लाइन गारंटी योजना ( ECLGS)’आत्मनिर्भर भारत अभियान’ के तहत शुरू की गई भारत सरकार की एक योजना है। इसे मई 2020 में लागू की गई थी। इसका मकसद कोविड काल से प्रभावित सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) और दूसरे व्यवसायों को राहत देना है। इसके तहत उद्योगों को बगैर गारंटी के 100 फीसदी लोन दिया जाता है, ताकि उद्योगों को चलाने में दिक्कत न आए।
इसके तहत 1.19 करोड़ उद्योगों को ₹3.68 लाख करोड़ लोन दिए गए। जिसका मात्र 6 फीसदी हिस्सा ही एनपीए हुआ यानी ₹22,000 करोड़। सरकार का मानना है कि ये अनुमान से काफी कम था।
एनपीए ऐसी स्थिति होती है, जब ऋणकर्ता अपने लोन के ब्याज या मूलधन के किश्त को 90 दिनों या उससे अधिक दिनों तक नहीं दे पाता है।
प्लान2: डायरेक्ट इनकम सपोर्ट योजना पर विचार
सरकार एमएसएमई में काम कर रहे कर्मचारियों और दूसरे अस्थाई कर्मचारियों की मदद के लिए (Direct Income Support) प्रत्यक्ष आय योजना लागू करने पर विचार कर रही है। इसका मकसद एमएसएमई के क्षेत्र में काम कर रहे कर्मचारियों की नौकरी जाने की स्थिति में उन्हें आर्थिक मदद करना है। मनी कंट्रोल के मुताबिक योजना का प्रारूप तैयार कर लिया गया है और इसे जल्द लागू किया जा सकता है।
प्लान3: कोलेट्रल फ्री लोन की सीमा बढ़ सकती है
आरबीआई क्रेडिट गारंटी योजना यानी CGS के तहत एमएसएमई के अंतर्गत आने वाले उद्योगों को बिना गिरवी के ऋण देने की सीमा 10 लाख रुपए से बढ़ा कर 20 लाख रुपए कर सकती है। CGS को 2010 में शुरू किया गया था। इसका संचालन क्रेडिट गारंटी फंड ट्रस्ट फॉर माइक्रो एंड स्मॉल एंटरप्राइजेज करता है। ये ट्रस्ट बैंकों और वित्तीय संस्थानों को ये गारंटी देता है कि अगर एमएसएमई कंपनी लोन नहीं चुका पाती है तो ट्रस्ट बकाया राशि का 75 से 90 फीसदी हिस्सा चुकाएगा।
प्लान4: एक्सपोर्ट प्रमोशन मिशन के तहत सस्ता कर्ज देने की योजना
यूनियन बजट 2025-26 के तहत मोदी सरकार ने एक्सपोर्ट प्रमोशन मिशन की बात कही थी। इसके तहत 25000 करोड़ रुपए के पैकेज का ऐलान किया गया था। पैकेज के तहत एक्सपोर्टर्स को सस्ता कर्ज और बेहतर मार्केट एक्सेस उपलब्ध कराने की योजना है। इससे ट्रंप के टैरिफ के निगेटिव असर से भी एक्सपोर्ट्स को बचाने में मदद मिलेगी। इस पर तेजी से काम किया जा रहा है।
दिल्ली हाई कोर्ट ने मंगलवार (3 सितंबर 2025) को शरजील इमाम और उमर खालिद जैसे लोगों की जमानत याचिका को खारिज कर दिया। दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि इन दंगों की साजिश पहले से बनाई गई थी और शरजील इमाम व उमर खालिद जैसे लोग इसके मुख्य षड़यंत्रकारी (Intellectual Architects) थे। कोर्ट ने आरोपितों की उस दलील को भी नहीं माना कि बिना सुनवाई के वो लोग लंबे समय से जेल में हैं, ऐसे में उन्हें जमानत दी जाए।
स्वाभाविक तरीके से चलनी चाहिए सुनवाई, सही दिशा में आगे बढ़ रहा केस
उमर खालिद, शरजील इमाम और अन्य को दिल्ली दंगों के बड़े षड्यंत्र मामले में जमानत न देते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि ट्रायल को अपने स्वाभाविक तरीके से आगे बढ़ना चाहिए। जल्दबाजी में ट्रायल करना न तो आरोपितों के हक में होगा और न ही सरकार के। ये लोग पाँच साल से ज्यादा समय से गैरकानूनी गतिविधियाँ रोकथाम अधिनियम (UAPA) के तहत जेल में बंद हैं।
जस्टिस शैलेंद्र कौर और जस्टिस नवीन चावला की बेंच ने कहा, “ट्रायल की गति स्वाभाविक रूप से आगे बढ़ेगी। जल्दबाजी में ट्रायल दोनों पक्षों के अधिकारों के लिए नुकसानदायक होगा।”
कोर्ट को बताया गया कि मामला अभी चार्ज तय करने के लिए तर्क सुने जाने के चरण में है, यानी केस आगे बढ़ रहा है। उमर खालिद और शरजील इमाम के बारे में कोर्ट ने कहा कि पहली नजर में उनकी भूमिका इस षड्यंत्र में ‘गंभीर’ लगती है, क्योंकि उन्होंने सांप्रदायिक आधार पर भड़काऊ भाषण दिए, जिससे मुस्लिम समुदाय के लोगों को उकसाकर भीड़ जुटाने की कोशिश की।
ये आम दंगा नहीं, बल्कि देश को खतरे में डालने वाली साजिश
दिल्ली हाई कोर्ट ने देखा कि दिल्ली पुलिस ने इस कथित गहरे षड्यंत्र को उजागर करने की पूरी कोशिश की है। इसका सबूत ये है कि चार्जशीट 3,000 पेज से ज्यादा की है और 30,000 पेज का इलेक्ट्रॉनिक सबूत भी है। कोर्ट ने कहा, “सरकार ने विस्तार से जाँच की, जिसके बाद कई लोगों को गिरफ्तार किया गया और चार अतिरिक्त चार्जशीट दाखिल की गईं। कई आरोपितों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल हुई और 58 गवाहों के बयान, जिनमें कुछ संरक्षित गवाह भी हैं, मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज किए गए।”
कोर्ट ने आगे कहा कि आरोपों की गंभीरता को देखते हुए, खासकर सॉलिसिटर जनरल और विशेष लोक अभियोजक के इस दावे को कि ये कोई साधारण विरोध या दंगा नहीं, बल्कि भारत की एकता, अखंडता और संप्रभुता को खतरे में डालने वाला सोचा-समझा षड्यंत्र है।
आरोपित खुद ही मुकदमे की सुनवाई में देरी के जिम्मेदार
दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि दिल्ली दंगों के बड़े षड्यंत्र मामले में आरोपित खुद ही अलग-अलग समय पर मुकदमे में देरी के लिए जिम्मेदार हैं, न कि दिल्ली पुलिस या ट्रायल कोर्ट। जस्टिस सुब्रह्मण्यम प्रसाद और जस्टिस हरीश वैद्यनाथन शंकर की बेंच ने कहा कि जमानत पर बाहर आए आरोपित आसिफ इकबाल तन्हा, देवांगना कलिता और नताशा नरवाल चार्ज पर बहस में देरी कर रहे हैं, जिसका नुकसान जेल में बंद बाकी आरोपितों को हो रहा है।
कोर्ट ने कहा, “बेशक केस जल्दी सुनवाई भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 का एक हिस्सा है। लेकिन अगर आरोपित खुद ही सुनवाई में बार-बार देरी करता है और फिर जमानत माँगता है, तो ये ठीक नहीं है। अगर ऐसा हुआ तो कानून जो सुनवाई में देरी के आधार पर जमानत देने को सीमित करता है, उसे आसानी से तोड़ा जा सकता है। एक तरफ सुनवाई में देरी करो और दूसरी तरफ जमानत के लिए अर्जी डालो।”
कोर्ट ने उमर-शरजील के भाषणों की टाइमिंग पर भी दिया ध्यान
दिल्ली हाई कोर्ट ने माना कि शरजील और उमर ने अपने भाषणों के जरिए मुस्लिम समुदाय को ये बात मनवाने की कोशिश की कि CAA और NRC उनके खिलाफ हैं। ये भाषण ऐसे वक्त दिए गए, जब देश में तनाव का माहौल था। सॉलिसिटर जनरल ने दलील दी कि ये भाषण सिर्फ राजनीतिक विरोध नहीं, बल्कि दंगे भड़काने की साजिश का हिस्सा थे। कोर्ट ने भी माना कि इन भाषणों की टाइमिंग गलत नहीं थी – ये उसी वक्त आए जब साजिश को अंजाम देने की तैयारी चल रही थी।
दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले की कॉपी का अंश
भाषणों का असर साफ दिखा। कोर्ट ने कहा कि ये भाषण पर्चों और मीटिंग्स के जरिए लोगों तक पहुँचे, जिससे भीड़ जुटाई गई और दंगों की योजना बनी।
हालाँकि शरजील जनवरी 2020 से हिरासत में था और उमर दंगा वाले दिन मौजूद नहीं था, लेकिन कोर्ट ने साफ किया कि उनकी गैरमौजूदगी मायने नहीं रखती। कोर्ट का कहना था कि अगर कोई पहले से योजना बनाए, लोगों को उकसाए और ग्रुप तैयार करे, तो उसकी जिम्मेदारी खत्म नहीं होती। इनके भाषणों ने माहौल को इतना गरम किया कि दंगे होना तय हो गए।
इसके अलावा दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा कि इन भाषणों को अलग-अलग नहीं, बल्कि पूरे घटनाक्रम के साथ जोड़कर देखना चाहिए। अभियोजन पक्ष का दावा है कि ये भाषण साजिश, संगठन, और व्यवस्था को ठप करने की कोशिशों का हिस्सा थे। साफ है कि ये सिर्फ राजनीतिक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि गंभीर अपराध की ओर इशारा करते हैं। UAPA जैसे गंभीर कानून के तहत ये मामला अब और पेचीदा हो गया है।
हालाँकि कोर्ट ने अभी अंतिम फैसला नहीं दिया, लेकिन प्रथम दृष्टया (prima facie) इनके भाषणों को साजिश से जोड़ा गया है। बचाव पक्ष का तर्क था कि हिरासत या गैरमौजूदगी से इनकी भूमिका कम नहीं होती, लेकिन कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया।
दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले की कॉपी का अंश
गौरतलब है कि दिल्ली में 2020 की फरवरी में हिंदू विरोधी दंगे भड़क उठे थे। ये दंगे CAA और NRC को लेकर शुरू हुए विवाद के बाद भड़के। शरजील इमाम और उमर खालिद जैसे लोग इन दंगों से पहले कई सभाओं में शामिल हुए और भाषण दिए। आरोप है कि उनके उकसावे से दंगे हुए। इस मामले में UAPA के तहत कार्रवाई हुई और अब कोर्ट इसकी जाँच कर रही है। फिलहाल आरोपितों की जमानत याचिका खारिज कर दी गई है।
दिल्ली हाईकोर्ट ने मंगलवार (2 सितंबर 2025) को 2020 के हिंदू विरोधी दिल्ली दंगे के आरोपित उमर खालिद और शरजील इमाम समेत 9 आरोपितों की जमानत याचिका खारिज कर दी। यह फैसला जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस शालिंदर कौर की बेंच ने सुनाया।
कोर्ट ने कहा कि इस स्टेज पर यह साफ तौर पर दिखाई देता है कि उमर खालिद और शरजील इमाम ने CAA और NRC के खिलाफ विरोध प्रदर्शन की योजना बनाने और उसे फैलाने में अहम भूमिका निभाई। कोर्ट ने यह भी कहा कि हम अभी केस के पूरे तथ्यों में नहीं जा रहे, लेकिन इस समय उनके खिलाफ जो सबूत हैं, वो उनकी भूमिका को बाकी आरोपितों से अलग और ज्यादा गंभीर दिखाते हैं।
CAB के बाद शीघ्र लामबंदी पर कोर्ट
दिल्ली हाई कोर्ट ने पाया कि दिसंबर 2019 में नागरिकता संशोधन विधेयक पारित होने के तुरंत बाद घटित घटनाओं में, खालिद और इमाम ने लोगों को भड़काने की पहल की थी।
दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा, “पहली नजर में ये साफ होता है कि जैसे ही दिसंबर 2019 की शुरुआत में नागरिकता संशोधन विधेयक पारित हुई, ये लोग (अपीलकर्ता) सक्रिय हो गए। इन्होंने तुरंत वॉट्सऐप ग्रुप बनाया और मुस्लिम बहुल इलाकों में पर्चे बाँटें, जिसमें लोगों से कानून का विरोध करने और तुरंत चक्काजाम जैसी कार्रवाई में भाग लेने की अपील थी। इन पर्चों में लोगों से पूरी व्यवस्था, जिसमें इमरजेंसी सेवाएँ भी शामिल हैं, उन्हें भी ठप कर देने को कहा गया।”
कोर्ट के मुताबिक, शरजील-उमर जैसे लोगों का मकसद सिर्फ राजनीतिक विरोध नहीं था, बल्कि लोगों को खासकर मुस्लिम समुदाय को ये विश्वास दिलाना था कि CAA और NRC उनके खिलाफ हैं, ताकि जानबूझकर गड़बड़ी फैलाई जा सके।
कोर्ट ने खालिद और इमाम को माना दंगों के पीछे का दिमाग
कोर्ट ने खालिद और शरजील इमाम के भड़काऊँ भाषणों की टाइमिंग पर भी ध्यान दिया। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि इन लोगों ने तब भड़काऊँ भाषण दिए, जब एक खास माहौल बना हुआ था। ऐसे में परिस्थितियों के साथ इन चीजों को जोड़ें, तो ये मामला सिर्फ राजनीतिक अभिव्यक्ति से अधिक आगे बढ़ जाता है।
साफ है, कोर्ट ने इन बात को माना कि इन दंगों के पीछे इनके भड़काऊँ भाषणों का भी हाथ रहा। ऐसे में ये मामला राजनीतिक बदले की कार्रवाई से कहीं अधिक गंभीर है। फिर, शरजील और उमर जैसे लोगों को UAPA जैसे गंभीर मामले हैं, ऐसे में इनके भाषणों को सिर्फ राजनीतिक मानना बड़ी भूल साबित हो सकती है।
सुनवाई के दौरान, सॉलिसिटर जनरल ने तर्क दिया कि इमाम और खालिद इस पूरी साजिश के मुख्य षड़यंत्रकारी (बौद्धिक शिल्पकार – Intelluctual Architects) थे, जो अपने सहयोगियों के साथ तन-मन-धन से इस काम में लगे हुए थे।
हालाँकि कोर्ट ने मामले के अंतिम निष्कर्षों पर कोई टिप्पणी नहीं की, लेकिन उसने यह माना कि पहली नजर में (prima facie) यह कहा जा सकता है कि अपीलकर्ताओं द्वारा दिए गए भड़काऊ और उकसावे वाले भाषण कथित साजिश में उनकी भूमिका की ओर इशारा करते हैं।
कोर्ट ने माना कि इन भाषणों को अलग- थलग कर के नहीं बल्कि उस व्यापक परिप्रेक्ष्य में समझना जरूरी है, जिसमें अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया है कि इन लोगों के भाषण … इस पूरी साजिश को अंजाम देने के लिए आपसी सहयोग, भीड़ को जुटाने और व्यवस्था को ठप करने देने की कोशिशों का हिस्सा थे।
शारीरिक मौजूदगी न होने पर भी भूमिका वही
बचाव पक्ष ने इस बात पर जोर दिया कि शरजील इलाम जनवरी 2020 से हिरासत में था और इसलिए दंगों में उसकी कोई भूमिका नहीं हो सकती। उमर खालिद के मामले में कहा गया कि वह दंगों के दिन विरोध स्थलों पर मौजूद भी नहीं था। लेकिन कोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया।
दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा, “ये जरूरी नहीं कि आरोपित उस दिन मौके पर मौजूद हो। अगर उसने पहले से योजना बनाई, ग्रुप बनाए, लोगों को उकसाया तो उसकी भूमिका बनी रहती है।”
अलग-अलग भूमिकाओं के आधार पर जमानत खारिज
कोर्ट ने साफ किया कि इस वक्त सबूतों से लगता है कि उमर और शरजील की भूमिका लीडरशिप की रही, इसलिए अन्य आरोपितों जैसे देवांगना कलिता और नताशा नरवाल (जिन्हें पहले जमानत मिल चुकी है) के साथ उनकी तुलना नहीं की जा सकती।
कोर्ट ने कहा कि केवल यह तर्क देना कि आरोपित उस समय दंगों में मौजूद नहीं थे, काफी नहीं है। आरोपितों द्वारा जो योजना बनाई गई और जिस तरह संगठन और उकसावे का काम पहले ही कर दिया गया, वही इस मामले का मुख्य हिस्सा है। इस वजह से जमानत नहीं दी जा सकती।
यह रिपोर्ट मुख्य रूप से अंग्रेजी में अनुराग ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।
कॉन्ग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा पर दो वोटर आईडी रखने का मामला अभी थमा भी नहीं था कि अब उनकी पत्नी को लेकर भी ऐसा ही आरोप सामने आया है। पवन खेड़ा को चुनाव आयोग ने नोटिस भी भेजा था। पवन खेड़ा की पत्नी कोटा नीलिमा के पास भी दो वोटर ID हैं, एक तेलंगाना की खैरताबाद सीट से और दूसरी काका नगर नई दिल्ली सीट से।
यह आरोप बीजेपी आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने सार्वजनिक किया है। उनका कहना है कि कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी दूसरों पर ‘वोट चोरी’ का आरोप लगाते हैं, लेकिन उनके करीबी सहयोगी खुद इस गड़बड़ी में लिप्त हैं।
Rahul Gandhi held a press conference and, without adequate due diligence, targeted and tarnished honest voters — even putting them at risk by revealing their identities without consent. He doxxed young, upwardly mobile professionals and poor daily wagers who had moved cities in… pic.twitter.com/WWjM3OUIZB
बीजेपी का आरोप है कि कोटा नीलिमा के नाम से भी दो एक्टिव वोटर ID हैं। एक ID तेलंगाना के खैरताबाद विधानसभा क्षेत्र में है। यह ID उनके चुनावी हलफनामे में भी दर्ज है।
लेकिन दूसरा EPIC नंबर दिल्ली की काका नगर नई दिल्ली विधानसभा में भी एक्टिव है। यहीं पवन खेड़ा का नाम भी दर्ज है। यानी दोनों पति-पत्नी के नाम दो-दो जगहों पर वोटर लिस्ट में मौजूद हैं।
बीजेपी नेता अमित मालवीय का कहना है कि यह अकेला मामला नहीं है। उन्होंने इसे कॉन्ग्रेस की ‘वोट बैंक’ राजनीति का हिस्सा बताया है।
पवन खेड़ा पर दो वोटर ID
पवन खेड़ा का नाम दिल्ली की दो विधानसभा सीटों ‘जंगपुरा और काका नगर नई दिल्ली’ की वोटर लिस्ट में पाया गया। दोनों जगहों पर उनके नाम से अलग-अलग EPIC नंबर एक्टिव हैं।
इस आधार पर चुनाव आयोग ने उन्हें नोटिस भेजा। आयोग ने कहा है कि एक व्यक्ति दो जगहों पर वोटर लिस्ट में शामिल नहीं हो सकता। इसलिए पवन खेड़ा से 8 सितंबर 2025 तक जवाब माँगा गया है।
वहीं, पवन खेड़ा का कहना है कि उन्होंने 2016 में एक जगह से नाम हटाने के लिए आवेदन किया था। लेकिन चुनाव आयोग ने उसे समय पर हटाया नहीं। उन्होंने जाँच की माँग की है और कहा है कि अगर उन्होंने दो बार वोट डाला है तो CCTV फुटेज पेश किया जाए।
मामले पर बीजेपी का रुख
बीजेपी ने इस मुद्दे को कॉन्ग्रेस के ‘दोहरे रवैये’ से जोड़ा है। बीजेपी का कहना है कि कॉन्ग्रेस पार्टी खुद ‘वोट चोरी’ के आरोप लगाती है, लेकिन उसके अपने नेता ऐसे कृत्यों में शामिल हैं। बीजेपी ने राहुल गाँधी से सवाल किया है कि वे अपनी ही पार्टी के नेताओं के खिलाफ लगे इन आरोपों पर क्यों चुप हैं।
भारत और रूस के बीच S-400 मिसाइल सिस्टम की अतिरिक्त आपूर्ति को लेकर बातचीत चल रही है। यह विश्व के सबसे बेहतरीन हवाई रक्षा सिस्टम्स में से एक है।
रूसी समाचार एजेंसी TASS के अनुसार, रूस की फेडरल सर्विस फॉर मिलिट्री-टेक्निकल कोऑपरेशन के प्रमुख दिमित्री शुगायेव ने कहा, “भारत के पास पहले से ही हमारा S-400 सिस्टम है और इस क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने की संभावना है। अभी हम बातचीत के स्तर पर हैं।”
भारत ने ऑपरेशन सिंदूर में भी इसका इस्तेमाल किया था और पाकिस्तान और PoK में आतंकी ठिकानों पर हमला किया। यह सिस्टम भारत को हवाई हमलों से बचाने के लिहाज से काफी अहम है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत ने 2018 में रूस के साथ 5.5 अरब (लगभग 45,000 करोड़) की डील की थी, जिसके तहत पाँच S-400 ट्रायम्फ मिसाइल सिस्टम मिलने थे। भारत का कहना है कि यह सिस्टम चीन से खतरे का मुकाबला करने के लिए जरूरी हैं। हालाँकि इस डील की डिलीवरी में कई बार देरी हो चुकी है। अब माना जा रहा है कि अंतिम दो सिस्टम 2026 और 2027 में भारत को मिलेंगे।
हाल ही में शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गनाइजेशन (SCO) की बैठक के दौरान रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘प्रिय मित्र’ कहा। इसके जवाब में मोदी ने कहा, “भारत और रूस ने मुश्किल समय में भी एक-दूसरे का साथ निभाया है।”
रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने भी कहा कि भारत ने अमेरिका के दबाव में आकर रूस से संसाधन (जैसे कि हथियार और तेल) खरीदना बंद नहीं किया, रूस इसकी सराहना करता है। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट के मुताबिक, 2020 से 2024 के बीच भारत के कुल हथियार आयात में 36% हिस्सा रूस का था, जबकि फ्रांस से 33% और इजराइल से 13% हथियार भारत ने खरीदे।
एक तरफ अमेरिका ने बढ़ाया टैरिफ तो दूसरी तरफ भारत को रूसी कच्चे तेल पर मिली छूट
रूसी कच्चे तेल की कीमत भारत के लिए और घट गई है। ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के अनुसार, ‘यूराल्स ग्रेड’ तेल की कीमत अब सितंबर-अक्टूबर की डिलीवरी के लिए 3-4 डॉलर प्रति बैरल की छूट पर मिल रही है। यह छूट तब दी गई है, जब अमेरिका ने भारत पर रूसी तेल खरीदने को लेकर टैरिफ दोगुना कर 50% कर दिया है।
2022 से भारत, रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदने वाला एक बड़ा ग्राहक बन गया है, हालाँकि अमेरिका ने इसे लेकर कई बार नाराजगी जताई है। व्हाइट हाउस के सलाहकार पीटर नवारो ने कहा कि भारत सस्ता रूसी तेल खरीदकर उसे रिफाइन करता है और विदेशों में बेचता है, जिससे ‘पुतिन की युद्ध मशीन’ को फायदा हो रहा है।
भारत ने इस आलोचना का जवाब देते हुए कहा है कि ऐसी खरीद पर कोई अंतरराष्ट्रीय पाबंदी नहीं है, यहाँ तक कि अमेरिकी रिफाइनर भी अप्रत्यक्ष रूप से रूसी तेल का फायदा उठाते हैं।
बता दें कि अगस्त में थोड़े समय के लिए खरीदारी रुकी थी, लेकिन अब भारत के रिफाइनर फिर से रूस से तेल खरीदना शुरू कर चुके हैं, क्योंकि यह अमेरिका के तेल के मुकाबले काफी सस्ता है, जो 3 डॉलर (लगभग 264.52 भारतीय रुपए) प्रीमियम पर कारोबार कर रहा है।
आगरा के शाहगंज थाना क्षेत्र के केदार नगर में चल रहे एक धर्मांतरण गिरोह का खुलासा हुआ है। इस पूरे मामले का भंडाफोड़ दो महिला पुलिसकर्मियों ने किया। वे सादे कपड़ों में पीड़ित बनकर हर रविवार को होने वाली सभा में शामिल होती थीं।
इस दौरान महिला पुलिसकर्मियों को सभा में बुलाकर बाइबिल पढ़ने को कहा गया। उनके हाथ में बँधे कलावे को कटवाया गया और हिंदू धर्म छोड़ने का दबाव बनाया गया। कहा गया कि अगर वे ईसाई बन जाएँ तो उनकी बीमारियाँ दूर हो जाएँगी और सारी समस्याएँ खत्म हो जाएँगी।
एक महीने की जाँच के बाद पुलिस ने 3 महिलाओं सहित 8 लोगों को गिरफ्तार किया। गिरोह का मुख्य आरोपित राजकुमार लालवानी है। वह पहले हिंदू था, लेकिन चार साल पहले मुंबई में ईसाई बन गया और उसने अपना नाम बदलकर पास्टर राजकुमार रख लिया। राजकुमार की टीम के लोग खुद को बीमार बताकर लोगों को भरोसे में लेते थे और फिर उन्हें सभा में लाकर ब्रेनवॉश करते थे।
बीमार और गरीबों को किया जाता था टारगेट
राजकुमार केदारनगर में स्थित अपने घर में हर रविवार को सभा करता था। इसमें बीमार और गरीब लोगों को टारगेट किया जाता था। उनसे कहा जाता था कि मूर्तियाँ हटा दो, कलावा काट दो, सिंदूर और बिछुए उतार दो, तभी खुशहाली आएगी। सभा में शामिल होने वालों से वादा किया जाता था कि ईसाई बनने पर उनकी जिंदगी सुधर जाएगी और सरकारी नौकरी भी मिल सकती है।
धर्म सभा में बाहर से कुछ लोग आते थे और आसपास के हिंदुओं को बुलाकर उनसे समस्याएँ पूछते थे। इसके बाद समस्या के निराकरण का दावा कर उनका धर्म परिवर्तन करा देते थे। मामले की भनक लगते ही पुलिस आयुक्त दीपक कुमार और शाहगंज पुलिस ने जाँच शुरु की। इस दौरान दो महिला पुलिसकर्मियों को सादे कपड़े में सबूत जुटाने के उद्देश्य से भेजा गया।
डीसीपी सिटी सोनम कुमार ने बताया, “मामले के खुलासे के लिए महिला पुलिस को सादी कपड़ों में भेजा गया। उन्होंने धर्म सभा अटेंड की। राजकुमार और अन्य लोगों ने महिला पुलिसकर्मियों पर हिंदू धर्म छोड़कर ईसाई धर्म अपनाने का दबाव बनाया। पुलिस ने उनके खिलाफ सबूत जुटाए। इसके बाद छापा मारकर 8 लोगों को गिरफ्तार कर लिया। इसमें राजकुमार लालवानी, अनूप कुमार, कमल कुंडलानी, जयकुमार, अरुण और तीन महिलाएँ शामिल हैं।”
स्पेन और दुबई से भी जुड़े हैं धर्मांतरण के तार
इस गिरोह के स्पेन और दुबई से भी संबंध पाए गए हैं। जूम मीटिंग्स के जरिए स्पेन और दुबई से भी लोग जुड़ते थे और लोगों को धर्मांतरण के लिए प्रेरित करते थे। राजकुमार ने एक यूट्यूब चैनल भी बना रखा था, जिसका नाम है ‘Church of God Agra,’ इस पर हर रविवार की सभाओं के वीडियो डाले जाते थे।
इसके 176 सबस्क्राइबर हैं और 93 वीडियो अपलोड हैं। सभी वीडियो प्रार्थना सभा या उसके द्वारा दिए गए उपचार के हैं। इनमें से कुछ वीडियो ऐसे भी हैं जो मतांतरित होने वाले लोगों के हैं। इसमें वे कह रहे हैं कि प्रार्थना सभा में शामिल होने से उनकी बीमारी ठीक हो गई।
भारत सरकार ने देश में अवैध विदेशी घुसपैठियों को लेकर गजट नोटिफिकेशन जारी किया है। अब ऐसे सभी लोगों को डिपोर्ट करने से पहले डिटेंशन सेंटरों में रखा जाएगा। इसके लिए सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को आदेश दे दिए गए हैं। नेपाल और भूटान के नागरिकों को पासपोर्ट और वीजा की अनिवार्यता से छूट दी गई है। साथ ही 31 दिसंबर 2024 तक पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से धार्मिक कारणों से भारत आए अल्पसंख्यकों को विशेष छूट दी गई है। ये नए नियम ‘इमिग्रेशन एंड फॉरेनर्स (एक्सेम्प्शन) ऑर्डर, 2025’ के तहत लागू किए गए हैं।
अवैध विदेशी घुसपैठियों के लिए डिटेंशन सेंटर अनिवार्य
केंद्र सरकार ने साफ कहा है कि जो भी व्यक्ति भारत में अवैध रूप से रह रहा है और खुद को भारतीय नागरिक साबित नहीं कर पाता, उसे डिटेंशन सेंटर में रखा जाएगा। इसके लिए विदेशी न्यायाधिकरण (Foreigners Tribunal) बनाए जाएँगे, जो तय करेंगे कि कोई व्यक्ति विदेशी है या नहीं। यह न्यायाधिकरण तीन सदस्यों वाला होगा जिनके पास न्यायिक अनुभव होगा।
अगर कोई घुसपैठी अपनी नागरिकता के सबूत नहीं दिखा पाता और जमानत की व्यवस्था भी नहीं कर सकता तो उसे तुरंत हिरासत में लिया जाएगा और डिपोर्ट होने तक डिटेंशन सेंटर में रखा जाएगा।
नेपाल और भूटान के नागरिकों को वीजा-पासपोर्ट से छूट
नई अधिसूचना में नेपाल और भूटान के नागरिकों को विशेष छूट दी गई है। अब वे भारत में जमीन या हवाई मार्ग से बिना पासपोर्ट और वीजा के प्रवेश या निकास कर सकते हैं, जब तक वे चीन, मकाऊ, हांगकांग या पाकिस्तान से नहीं आ रहे हों।
Citizens of Nepal and Bhutan entering India by land or air will not be required to furnish a passport or visa, as earlier.
Ministry of Home Affairs (@HMOIndia) has notified the Immigration and Foreigners (Exemption) Order, 2025, highlighting major exemptions from requirements… pic.twitter.com/8aIkJISWFU
यही नियम भारतीय नागरिकों पर भी लागू होता है जो नेपाल या भूटान के जरिए भारत में आ रहे हैं। साथ ही तिब्बती नागरिक जो 1959 के बाद और 30 मई 2003 से पहले भारत में आए और जिनके पास पंजीकरण प्रमाणपत्र हैं, उन्हें भी यह छूट दी गई है।
पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के अल्पसंख्यकों को राहत
जो हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदाय के लोग पाकिस्तान, बांग्लादेश या अफगानिस्तान से धार्मिक उत्पीड़न के चलते भारत में 31 दिसंबर 2024 तक आए हैं, उन्हें वीजा या पासपोर्ट की अनिवार्यता से छूट दी गई है। इसका मतलब यह है कि अगर ऐसे लोगों के पास कोई वैध दस्तावेज नहीं है, या दस्तावेज की वैधता खत्म हो चुकी है तो भी उन्हें भारत में रहने की अनुमति दी जाएगी।
इस प्रावधान को नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) से भी जोड़ा जा सकता है, जिसमें पहले ही 31 दिसंबर 2014 तक आए शरणार्थियों को नागरिकता देने की बात कही गई थी। अब यह सीमा 31 दिसंबर 2024 तक बढ़ा दी गई है। हालाँकि यह सिर्फ रहने की अनुमति से संबंधित है, न कि सीधी नागरिकता से।
यह अधिसूचना 2025 के नए कानून ‘इमिग्रेशन एंड फॉरेनर्स एक्ट, 2025’ के तहत जारी की गई है। इसमें विदेशी नागरिकों की भारत में आवाजाही, रोजगार, पहचान, और कानूनी प्रक्रिया से जुड़े सभी पुराने नियमों को संशोधित किया गया है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की भारत के खिलाफ लगाई गई 50% टैरिफ (आयात कर) की नीति अब उनके अपने देश में ही सवालों के घेरे में है। ट्रंप ने भारत पर रूसी तेल खरीदने के लिए यह भारी-भरकम टैरिफ लगाया, लेकिन ट्रंप की नीति ने न सिर्फ भारत को रूस और चीन के करीब ला दिया, बल्कि अमेरिका के भीतर भी ट्रंप प्रशासन के खिलाफ तीखी आलोचना शुरू हो गई है।
अमेरिकी मीडिया, विशेषज्ञ और यूट्यूबर से लेकर पॉडकास्टर तक सभी इस नीति को ‘बेतुका’ और ‘खुद के पैरों पर कुल्हाड़ी मारने’ वाला कदम बता रहे हैं। भारत ने न केवल डोनाल्ड ट्रंप की नीति को ठेंगा दिखाते हुए रूसी तेल खरीदना जारी रखा, बल्कि उसने रूस-भारत-चीन (RIC) त्रिकोण को मजबूत किया और BRICS समूह को एकजुट करने में भी अहम भूमिका निभाई। आइए, इस पूरी कहानी को विस्तार से समझते हैं कि कैसे ट्रंप की नीति ने उनके अपने घर में हंगामा मचा दिया।
डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीति: भारत को निशाना बनाने की गलती
डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर 50% टैरिफ इसलिए लगाया क्योंकि भारत रूस से तेल खरीद रहा है। लेकिन यह बात अमेरिकी मीडिया और विशेषज्ञों को हजम नहीं हो रही कि आखिर भारत को ही क्यों निशाना बनाया गया, जबकि रूस से कहीं ज्यादा तेल खरीदने वाले चीन को कोई सजा नहीं मिली।
CNBC टीवी के शो ‘Squawk Box‘ में पूर्व अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि माइकल फ्रॉनमैन ने इस मुद्दे पर खुलकर बात की। उन्होंने कहा, “क्लिंटन प्रशासन से लेकर अब तक अमेरिका ने भारत के साथ रिश्तों को मजबूत करने की कोशिश की थी। लेकिन ट्रंप के इस टैरिफ ने भारत को हैरान कर दिया। भारत अब अमेरिका को भरोसेमंद रणनीतिक साझेदार नहीं मान रहा।”
फ्रॉनमैन ने बताया कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सात साल बाद चीन यात्रा ट्रंप के इस टैरिफ का सीधा जवाब है। भारत और चीन के बीच कई मुद्दे हैं, लेकिन ट्रंप की नीति ने दोनों देशों को करीब ला दिया। फ्रॉनमैन ने कहा, “भारत यह संदेश दे रहा है कि वह अमेरिका के सामने झुकेगा नहीं। वह चीन और शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के अन्य देशों के साथ नए रास्ते तलाश रहा है।”
अमेरिकी विशेषज्ञों ने डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीति को बताया मूर्खता
अमेरिकी अर्थशास्त्री रिचर्ड डी. वोल्फ और माइकल हडसन ने एक यूट्यूब चर्चा में ट्रंप प्रशासन की भारत नीति को ‘मूर्खतापूर्ण’ और ‘हताश’ करार दिया। इस चर्चा को 3 लाख से ज्यादा लोग देख चुके हैं। वोल्फ ने व्हाइट हाउस के व्यापार सलाहकार पीटर नवारो के उस बयान की कड़ी आलोचना की, जिसमें उन्होंने रूस-यूक्रेन युद्ध को ‘मोदी का युद्ध’ कहा था।
वोल्फ ने कहा, “नवारो कोई तेज दिमाग नहीं हैं। अगर भारत को रूस के साथ व्यापार के लिए सजा दी जा रही है, तो रूस के साथ व्यापार करने वाले 100 से ज्यादा देशों को भी सजा मिलनी चाहिए। लेकिन सिर्फ भारत को क्यों निशाना बनाया गया?”
वोल्फ ने यह भी कहा कि ट्रंप प्रशासन भारत और मोदी को रूस-यूक्रेन युद्ध के लिए जिम्मेदार ठहरा रहा है, जबकि असल में यह युद्ध वाशिंगटन डीसी की नीतियों का नतीजा है, जिसने नाटो को रूस की सीमा तक बढ़ाने की कोशिश की। उन्होंने चेतावनी दी कि भारत, कनाडा और मैक्सिको जैसे देशों को सजा देकर अमेरिका खुद को अलग-थलग कर रहा है।
माइकल हडसन ने भी ट्रंप की नीति को भारत की संप्रभुता पर हमला बताया। उन्होंने कहा कि भारत के प्रधानमंत्री मोदी और विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने साफ कर दिया है कि भारत अपनी मर्जी से किसी भी देश के साथ व्यापार करेगा। हडसन ने कहा, “1945 से अमेरिका ने खाद्य निर्यात को हथियार बनाया और कई देशों में अपनी मर्जी से सत्ता परिवर्तन करवाया। लेकिन मोदी ट्रंप की माँगों के सामने नहीं झुकेंगे।” उन्होंने यह भी कहा कि ट्रंप की नीति ने भारत को चीन और रूस के और करीब ला दिया, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए एक बड़ा बदलाव होगा।
पाकिस्तान के साथ ‘दोस्ती’ और भारत के साथ दुश्मनी पर भड़के अमेरिकी पॉडकास्टर
अमेरिकी पॉडकास्टर ‘Speaknsee‘ ने डोनाल्ड ट्रंप की भारत विरोधी नीति पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि ट्रंप का पाकिस्तान के साथ ‘ब्रोमांस’ (दोस्ताना रवैया) और भारत के खिलाफ टैरिफ लगाना समझ से परे है। पॉडकास्टर ने कहा, “पाकिस्तान ने ट्रंप को नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकित करके रिश्वत देने की कोशिश की, लेकिन मोदी ने कभी ऐसा नहीं किया।”
पॉडकास्टर ने मोदी की तारीफ करते हुए उन्हें ‘सर्वकालिक महान’ (GOAT) कहा और बताया कि जहां ट्रंप की लोकप्रियता 45% है, वहीं मोदी की भारत में 72% अप्रूवल रेटिंग है। उन्होंने ट्रंप को सलाह दी कि वह नोबेल पुरस्कार का सपना छोड़ दें, क्योंकि एक फोन कॉल से भारत-पाकिस्तान जैसे जटिल मुद्दे हल नहीं हो सकते।
अमेरिकी मीडिया बोली – ट्रंप ने भारत के साथ रिश्ते बर्बाद किए
अमेरिकी मीडिया में भी ट्रंप की भारत नीति की कड़ी आलोचना हो रही है। आमतौर पर मोदी की आलोचना करने वाले CNN के पत्रकार फरीद जकारिया ने कहा कि ट्रंप ने भारत के साथ रिश्तों को अपूरणीय नुकसान पहुँचाया है। जकारिया ने कहा, “ट्रंप की भारत के प्रति अचानक दुश्मनी ने पिछले पाँच प्रशासनों की नीतियों को उलट दिया, जिसमें उनकी पहली सरकार भी शामिल थी। यह ट्रंप की सबसे बड़ी रणनीतिक गलती हो सकती है।”
जकारिया ने बताया कि भारत ने धीरे-धीरे अमेरिका के साथ करीबी रिश्ते बनाए थे, लेकिन ट्रंप ने भारत को सीरिया और म्यांमार जैसे देशों की श्रेणी में डालकर अपमानित किया। उन्होंने यह भी कहा कि ट्रंप ने पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर के साथ लंच किया और पाकिस्तान के साथ क्रिप्टो डील की, जबकि भारत की अर्थव्यवस्था को ‘मृत’ कहकर तंज कसा। जकारिया ने चेतावनी दी कि भारत इस अपमान को लंबे समय तक याद रखेगा।
‘The Daily Show’ ने भी एक वीडियो में ट्रंप की टैरिफ नीति की खिल्ली उड़ाई। वीडियो का शीर्षक था, “ट्रंप की टैरिफ नीति ने अमेरिका की साख बर्बाद कर दी। क्या कोई अब भी हमारा सम्मान करता है?” इसमें बताया गया कि ट्रंप ने अपनी चुनावी रैलियों में कहा था कि उनकी सरकार में अमेरिका फिर से सम्मानित होगा, लेकिन उनकी नीतियों की वजह से चीन, फ्रांस, इटली, कनाडा, पोलैंड, सिंगापुर, जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन जैसे देशों में अमेरिका की साख गिरी है।
BRICS और RIC का उभार: ट्रंप की नीति का उल्टा असर
ट्रंप की टैरिफ नीति ने BRICS (ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका) और RIC (रूस-भारत-चीन) त्रिकोण को और मजबूत कर दिया। अमेरिकी विशेषज्ञों का कहना है कि ट्रंप की नीति ने भारत को चीन और रूस के करीब धकेल दिया, जो अमेरिका के लिए रणनीतिक रूप से नुकसानदायक है। माइकल हडसन ने कहा, “ट्रंप ने भारत को BRICS का सबसे कमजोर कड़ी मान लिया था, लेकिन उनकी नीति ने भारत और चीन को एक साथ ला दिया। दोनों देश मिलकर सिलिकॉन वैली को चुनौती दे सकते हैं।”
अमेरिकी के परंपरावादी टिप्पणीकार विक्टर डेविस हैनसन ने भी कहा कि भारत और अमेरिका के बीच अच्छे रिश्ते थे, क्योंकि भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था और भौगोलिक स्थिति इसे चीन के खिलाफ एक आदर्श सहयोगी बनाती थी। लेकिन ट्रंप के टैरिफ ने भारत को रूस और चीन के करीब ला दिया, जो पहले से ही भारत का पुराना दोस्त है। हैनसन ने कहा, “ऐतिहासिक रूप से भी अमेरिका ने इस्लामिक पाकिस्तान का समर्थन करके गलती की, जबकि रूस ने भारत का साथ दिया।”
डोनाल्ड ट्रंप की अपनी ही पार्टी में नाराजगी
डोनाल्ड ट्रंप की नीति की आलोचना सिर्फ मीडिया और विशेषज्ञों तक सीमित नहीं है। उनकी अपनी पार्टी और समर्थकों में भी नाराजगी बढ़ रही है। मशहूर रेडियो होस्ट और ट्रंप समर्थक एलेक्स जोन्स ने ट्रंप की आलोचना की, क्योंकि उन्होंने अपने वादे के मुताबिक एपस्टीन फाइल्स को सार्वजनिक नहीं किया। जोन्स ने कहा कि ट्रंप का MAGA (मेक अमेरिका ग्रेट अगेन) अभियान अब एक ‘पंथ’ बनता जा रहा है।
यूट्यूबर मैलन बेकर ने भी ट्रंप की टैरिफ नीति को ‘राजनीतिक हथियार’ बताते हुए कहा कि यह भारत और ब्राजील के खिलाफ राजनीतिक कारणों से लगाया गया। उन्होंने बताया कि अमेरिकी अदालत ने ट्रंप के इस कदम को गैरकानूनी ठहराया है, और अगर यह फैसला बरकरार रहा, तो ट्रंप की सरकार को भारी शर्मिंदगी झेलनी पड़ेगी।
क्या होगा भविष्य में?
डोनाल्ड ट्रंप की भारत विरोधी नीति ने न सिर्फ भारत-अमेरिका रिश्तों को नुकसान पहुँचाया, बल्कि उनके अपने देश में भी उनकी साख को ठेस पहुँचाई है। अमेरिकी मीडिया और विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप ने भारत को गलत निशाना बनाकर एक ऐसी गलती की है, जिसका खामियाजा अमेरिका को लंबे समय तक भुगतना पड़ सकता है। भारत अब रूस और चीन के साथ मिलकर BRICS और RIC को मजबूत कर रहा है, जो वैश्विक व्यापार और कूटनीति में एक नया समीकरण बना सकता है।
ट्रंप ने ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ का नारा दिया था, लेकिन उनकी नीतियों ने उल्टा असर दिखाया। जैसा कि कई विशेषज्ञों ने कहा, ट्रंप की नीति ने ‘मेक एशिया ग्रेट अगेन’ का रास्ता खोल दिया है। भारत के साथ रिश्तों में आई इस दरार को ठीक करना आसान नहीं होगा, और ट्रंप प्रशासन को अब अपने ही घर में बढ़ते विरोध का सामना करना पड़ रहा है।
मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में श्रद्धा पाण्डेय ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।
फिल्म द बंगाल फाइल्स को लेकर बंगाल की सियासत में उबाल आ गया है। फिल्म के डायरेक्टर विवेक अग्निहोत्री ने हाल ही में X (पहले ट्विटर) पर एक वीडियो शेयर करके हुए पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को खुला संदेश दिया है। वीडियो में उन्होंने आरोप लगाया कि उनकी फिल्म ‘द बंगाल फाइल्स’ को बंगाल में जानबूझकर बैन करने या दबाने की कोशिश की जा रही है। उनका कहना है कि थिएटर मालिकों पर इतना ज़्यादा पॉलिटिकल प्रेशर डाला जा रहा है कि वो डर के मारे फिल्म दिखाने को तैयार नहीं हैं।
फिल्म 5 सितंबर 2025 को पूरे देश और दुनिया में रिलीज होनी है। डायरेक्टर विवेक अग्निहोत्री ने दावा किया कि 16 अगस्त 2025 को जब फिल्म का ट्रेलर कोलकाता के एक होटल में प्राइवेट तौर पर दिखाया जा रहा था, तब पुलिस ने आकर रोक दिया।
फिल्म पर बन रही है बैन की स्क्रिप्ट?
विवेक अग्निहोत्री ने वीडियो में बताया कि TMC कार्यकर्ता लगातार फिल्म को बैन करने की माँग कर रहे हैं और उनके खिलाफ कई बेबुनियाद FIR दर्ज करवाई गई हैं। उन्होंने ममता बनर्जी से हाथ जोड़कर अपील की कि इस फिल्म को बगैर किसी रोक-टोक के बंगाल में रिलीज़ होने दिया जाए, क्योंकि यह भारत के संविधान और फ्री स्पीच के अधिकारों का सम्मान होगा। विवेक अग्निहोत्री ने कहा कि सेंसर बोर्ड (CBFC) ने फिल्म पास कर दी है, तो फिर अब इसे रोकना संविधान के खिलाफ होगा।
URGENT: An open appeal to Hon’ble CM @MamataOfficial. Please listen till the end and share widely as your protest against banning of a film on Hindu Genocide. #TheBengalFiles In cinemas 05 September 2025 pic.twitter.com/AvDuVlixmx
बंगाल का इतिहास क्यों छुपाया जा रहा है?– अग्निहोत्री का सवाल
डायरेक्टर विवेक अग्निहोत्री का कहना है कि डायरेक्ट एक्शन डे और नोआखाली नरसंहार जैसे बड़े ऐतिहासिक सचों को भारत की नई पीढ़ी से छुपाया जा रहा है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे दुनिया में हर बच्चा होलोकॉस्ट, स्लेवरी या हिरोशिमा के बारे में जानता है, वैसे ही भारत के बच्चों को भी अपने इतिहास के काले पन्नों को जानने का हक है। उन्होंने पूछा – क्या हिन्दुओं के दर्द पर फिल्म बनाना गुनाह है? विवेक अग्निहोत्री ने आगे कहा कि डायरेक्ट एक्शन डे और नोआखाली के हिंदू जैनोसाइट के सत्य को कोई बेंगोली कभी बैन कर ही नहीं सकता। अगर वो मुस्लिम लीग का मेंबर नहीं है तो।
यह फिल्म किसी समुदाय के खिलाफ नहीं, सिर्फ सच्चाई के साथ
डायरेक्टर विवेक अग्निहोत्री ने ज़ोर देकर कहा कि ‘द बंगाल फाइल्स’ किसी धर्म या समुदाय के खिलाफ नहीं है, बल्कि उन लोगों के खिलाफ है जिन्होंने इंसानियत को कुचलना चाहते हैं और अब भी सच को दबाना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि अगर इस फिल्म को बैन किया गया, तो यह उन हजारों पीड़ितों की आत्मा-पीड़ा का अपमान होगा। विवेक अग्निहोत्री ने कहा कि घावों को छुपाने से नफरत बढ़ती है, लेकिन जब सच्चाई सामने आती है तो हीलिंग शुरू होती है।
फिल्म का विषय – 1946 के नरसंहार की अनसुनी दास्तान
‘द बंगाल फाइल्स’ फिल्म 1946 में अविभाजित बंगाल में हुए हिंदू नरसंहार पर आधारित है। फिल्म में डायरेक्ट एक्शन डे, कलकत्ता दंगे और नोआखाली जैसे घटनाओं को दिखाया गया है, जहाँ हजारों हिंदुओं की हत्या, महिलाओं के साथ बलात्कार और लाखों का पलायन हुआ था। विवेक अग्निहोत्री का दावा है कि यह इतिहास अब तक दबा कर रखा गया था और उनकी फिल्म उसी सच को सामने लाने की कोशिश है।
फिल्म का प्रीमियर अमेरिका में हो चुका है, जहाँ खासकर बंगाली समुदाय और उनके युवाओं ने फिल्म को सराहा। विवेक अग्निहोत्री ने बताया कि कई लोगों ने उन्हें कहा कि ‘इस फिल्म से उनकी हीलिंग शुरू होती है।’ अब विवेक अग्निहोत्री चाहते हैं कि भारत में भी लोग इस सच को जानें और फिल्म बिना किसी रुकावट के रिलीज हो।