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‘द बंगाल फाइल्स’ की स्क्रीनिंग मुस्लिम लीग के मेंबर ही रोकेंगे… विवेक अग्निहोत्री ने बंगाल में फिल्म की रोक पर उठाए सवाल: ममता बनर्जी से पूछा- जब सेंसर बोर्ड ने पास कर दिया, तो TMC को आपत्ति क्यों?

फिल्म द बंगाल फाइल्स को लेकर बंगाल की सियासत में उबाल आ गया है। फिल्म के डायरेक्टर विवेक अग्निहोत्री ने हाल ही में X (पहले ट्विटर) पर एक वीडियो शेयर करके हुए पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को खुला संदेश दिया है। वीडियो में उन्होंने आरोप लगाया कि उनकी फिल्म ‘द बंगाल फाइल्स’ को बंगाल में जानबूझकर बैन करने या दबाने की कोशिश की जा रही है। उनका कहना है कि थिएटर मालिकों पर इतना ज़्यादा पॉलिटिकल प्रेशर डाला जा रहा है कि वो डर के मारे फिल्म दिखाने को तैयार नहीं हैं।

फिल्म 5 सितंबर 2025 को पूरे देश और दुनिया में रिलीज होनी है। डायरेक्टर विवेक अग्निहोत्री ने दावा किया कि 16 अगस्त 2025 को जब फिल्म का ट्रेलर कोलकाता के एक होटल में प्राइवेट तौर पर दिखाया जा रहा था, तब पुलिस ने आकर रोक दिया।

फिल्म पर बन रही है बैन की स्क्रिप्ट?

विवेक अग्निहोत्री ने वीडियो में बताया कि TMC कार्यकर्ता लगातार फिल्म को बैन करने की माँग कर रहे हैं और उनके खिलाफ कई बेबुनियाद FIR दर्ज करवाई गई हैं। उन्होंने ममता बनर्जी से हाथ जोड़कर अपील की कि इस फिल्म को बगैर किसी रोक-टोक के बंगाल में रिलीज़ होने दिया जाए, क्योंकि यह भारत के संविधान और फ्री स्पीच के अधिकारों का सम्मान होगा। विवेक अग्निहोत्री ने कहा कि सेंसर बोर्ड (CBFC) ने फिल्म पास कर दी है, तो फिर अब इसे रोकना संविधान के खिलाफ होगा।

बंगाल का इतिहास क्यों छुपाया जा रहा है?– अग्निहोत्री का सवाल

डायरेक्टर विवेक अग्निहोत्री का कहना है कि डायरेक्ट एक्शन डे और नोआखाली नरसंहार जैसे बड़े ऐतिहासिक सचों को भारत की नई पीढ़ी से छुपाया जा रहा है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे दुनिया में हर बच्चा होलोकॉस्ट, स्लेवरी या हिरोशिमा के बारे में जानता है, वैसे ही भारत के बच्चों को भी अपने इतिहास के काले पन्नों को जानने का हक है। उन्होंने पूछा – क्या हिन्दुओं के दर्द पर फिल्म बनाना गुनाह है? विवेक अग्निहोत्री ने आगे कहा कि डायरेक्ट एक्शन डे और नोआखाली के हिंदू जैनोसाइट के सत्य को कोई बेंगोली कभी बैन कर ही नहीं सकता। अगर वो मुस्लिम लीग का मेंबर नहीं है तो।

यह फिल्म किसी समुदाय के खिलाफ नहीं, सिर्फ सच्चाई के साथ

डायरेक्टर विवेक अग्निहोत्री ने ज़ोर देकर कहा कि ‘द बंगाल फाइल्स’ किसी धर्म या समुदाय के खिलाफ नहीं है, बल्कि उन लोगों के खिलाफ है जिन्होंने इंसानियत को कुचलना चाहते हैं और अब भी सच को दबाना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि अगर इस फिल्म को बैन किया गया, तो यह उन हजारों पीड़ितों की आत्मा-पीड़ा का अपमान होगा। विवेक अग्निहोत्री ने कहा कि घावों को छुपाने से नफरत बढ़ती है, लेकिन जब सच्चाई सामने आती है तो हीलिंग शुरू होती है।

फिल्म का विषय – 1946 के नरसंहार की अनसुनी दास्तान

‘द बंगाल फाइल्स’ फिल्म 1946 में अविभाजित बंगाल में हुए हिंदू नरसंहार पर आधारित है। फिल्म में डायरेक्ट एक्शन डे, कलकत्ता दंगे और नोआखाली जैसे घटनाओं को दिखाया गया है, जहाँ हजारों हिंदुओं की हत्या, महिलाओं के साथ बलात्कार और लाखों का पलायन हुआ था। विवेक अग्निहोत्री का दावा है कि यह इतिहास अब तक दबा कर रखा गया था और उनकी फिल्म उसी सच को सामने लाने की कोशिश है।

फिल्म का प्रीमियर अमेरिका में हो चुका है, जहाँ खासकर बंगाली समुदाय और उनके युवाओं ने फिल्म को सराहा। विवेक अग्निहोत्री ने बताया कि कई लोगों ने उन्हें कहा कि ‘इस फिल्म से उनकी हीलिंग शुरू होती है।’ अब विवेक अग्निहोत्री चाहते हैं कि भारत में भी लोग इस सच को जानें और फिल्म बिना किसी रुकावट के रिलीज हो।

क्या है स्वदेशी ‘विक्रम 3201’ जो PM मोदी को सौंपा गया, जानिए पहले ‘मेड इन भारत’ चिप के बारे में सब कुछ: देश में लग रहे है 5 सेमीकंडक्टर प्लांट

केन्द्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने सेमीकॉन इंडिया 2025 के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भारत का पहला ‘मेड इन इंडिया’ चिप विक्रम 32 बिट प्रोसेसर (Vikram-32 bit processor chip)और चार सेमीकंडक्टर टेस्ट चिप सौंपा। भारत अभी तक विदेशों से चिप आयात करता रहा है। अब विदेशी चिप पर भारत की निर्भरता कम करने के प्रयासों में यह एक मील का पत्थर साबित होगा।

इसरो ने बनाया स्वदेशी विक्रम-3201 चिप

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) की सेमीकंडक्टर लैब (एससीएल) में इसे विकसित किया गया है। विक्रम चिप देश का पहला स्वदेशी 32-बिट माइक्रोप्रोसेसर है, जिसे विशेष रूप से स्पेस लॉन्च व्हीकल्स के लिए डिजाइन किया गया है। किसी भी डिवाइस के लिए चिप ‘ब्रेन’ की तरह काम करता है।

‘विक्रम’ के शुरुआती बैच का पीएसएलवी-सी 60 मिशन के दौरान सफलता पूर्वक इस्तेमाल किया गया था। इसलिए अंतरिक्ष के क्षेत्र में भविष्य में भी इसके इस्तेमाल की काफी संभावना है।

2021 में भारत में सेमीकंडक्टर मिशन की शुरुआत हुई थी। इसके सिर्फ 3.5 वर्षों में भारत एक प्रमुख उपभोक्ता से चिप निर्माता के रूप में उभरकर सामने आया है। ये अनुसंधान एवं विकास को लेकर सरकारी नीतियों और मजबूत आर्थिक विकास को दर्शाता है। विक्रम का निर्माण और पैकेजिंग पंजाब के मोहाली में SCL की 180nm CMOS में किया गया है।

विक्रम 32-बिट चिप की खासियत

विक्रम-32 एक कंप्यूटर चिप है, जो कई अलग-अलग काम एक साथ कर सकती है। यह दशमलव संख्याओं (जैसे 3.14) के साथ काम करती है और इसे 32-बिट डिजाइन का उपयोग करके बनाया गया है। इसका मतलब है कि चिप एक बार में 32 बिट्स के टुकड़ों में डेटा संसाधित करती है। अंतरिक्ष में प्रक्षेपण के दौरान यान के अत्यधिक तापमान और दूसरी दिक्कतों के हिसाब से इसे डिजाइन किया गया है।

इसरो के अनुसार, इसमें पर्याप्त मेमोरी है और उपग्रहों और अंतरिक्ष यानों को प्रक्षेपित करने के लिए जरूरी निर्देशों का पालन करने में ये सक्षम है। आने वाले वक्त में रक्षा, एयरोस्पेस, ऑटोमोटिव और ऊर्जा क्षेत्रों में इसका इस्तेमाल किया जा सकता है। इसलिए इस चिप का रणनीतिक महत्वपूर्ण भी है।

क्या होता है सेमीकंडक्टर चिप

सेमीकंडक्टर चिप असल में सिलिकॉन सर्किट बोर्ड होता है। ये डेटा प्रोसेसिंग, स्टोरेज, कंट्रोल्स और कम्युनिकेशन्स समेत कई काम करता है। दरअसल ये किसी भी डिवाइस या गैजेट का ब्रेन होता है।

सेमिकॉन इंडिया 2025 में प्रधानमंत्री को पहली “मेड-इन-इंडिया” चिप सौंपते हुए, केन्द्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने भारत की प्रगति में सेमीकंडक्टर के विकास की बात भी कही। उन्होंने कहा कि पाँच नई सेमीकंडक्टर इकाइयों का निर्माण कार्य चल रहा है। साथ ही 6 राज्यों में 1.60 लाख करोड़ रुपए से अधिक के निवेश वाली 10 प्रमुख परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है।

पीएम मोदी ने नई दिल्ली की यशोभूमि में मंगलवार (2 सितंबर 2025) को सेमीकॉन इंडिया 2025 (Semicon India 2025) का उद्घाटन किया। इस मौके पर चिप को भी लॉन्च किया गया। इस सबसे बड़े सेमीकंडक्टर इलेक्ट्रोनिक्स शो में 33 देशों से आए करीब 350 से अधिक कंपनियाँ शामिल हुई।

छोटे से चिप में दुनिया सिमटी- पीएम

इस मौके पर पीएम ने कहा कि पहले दुनिया का भाग्य तेल की कुओं से तय होता था, इस आधार पर ग्लोबल इकोनॉमी ऊपर नीचे होती रहती थी। लेकिन 21वीं शताब्दी की इकोनॉमी छोटे से चिप में सिमट कर रह गयी है। ये चिप भले छोटी सी है लेकिन इसमें दुनिया की प्रगति को गति देने की ताकत है। इसीलिए आज सेमीकंडक्टर का वैश्विक बाजार 600 अरब डॉलर तक पहुँच रहा है और अगले कुछ वर्षों में यह 1 ट्रिलियन डॉलर को भी पार कर जाएगा, इसमें अहम हिस्सा भारत का होगा।

16 दिन, 23 जिले, 1300 किमी, 67 विधानसभा… ‘वोटर अधिकार यात्रा’ से पहाड़ (बिहार) खोदने निकले थे राहुल गाँधी, चुहिया ने तेजस्वी यादव को कुतरा: न एजेंडा चला, न जन समर्थन मिला

बिहार में राहुल गाँधी की वोटर अधिकार यात्रा 16 दिन तक चली और अब खत्म हो चुकी है। ये यात्रा बिहार के 23 जिलों, 1300 किलोमीटर और 67 विधानसभा सीटों से होकर गुजरी। वैसे तो इस यात्रा का मकसद था बिहार विधानसभा चुनाव से पहले वोट चोरी का मुद्दा उठाकर जनता का समर्थन हासिल करना और इंडी गठबंधन को मजबूत करना। लेकिन नतीजा उल्टा रहा।

इस यात्रा की अगुवाई करने वाली कॉन्ग्रेस पार्टी न तो जनता का भरोसा जीत पाई गया, न ही गठबंधन के भीतर एकजुटता दिख पाई। यात्रा के दौरान विवाद, आपसी मतभेद और स्थानीय लोगों की उदासीनता ने इसे चर्चा का विषय बना दिया। आइए, इस यात्रा के हर पहलू को विस्तार से समझते हैं।

वोटर अधिकार यात्रा का मकसद और उसकी विफलता

राहुल गाँधी ने वोटर अधिकार यात्रा की शुरुआत सासाराम से की थी, जिसमें आरजेडी नेता तेजस्वी यादव उनके साथ थे। इसका लक्ष्य था वोट चोरी को बड़ा मुद्दा बनाना और बिहार की जनता को यह बताना कि उनके वोटिंग अधिकार खतरे में हैं। साथ ही इंडी गठबंधन को एकजुट दिखाकर तेजस्वी यादव को बिहार में मुख्यमंत्री पद का चेहरा बनाना भी इसका उद्देश्य था। लेकिन ये दोनों ही लक्ष्य पूरे नहीं हो सके।

स्थानीय लोगों ने इस यात्रा को ज्यादा तवज्जो नहीं दी। दैनिक भास्कर से बातचीत में सीनियर जर्नलिस्ट संजय कौशिक कहते हैं, “यात्रा का सबसे बड़ा नुकसान मुद्दे के चयन में हुआ। वोट चोरी का मुद्दा बिहार की जनता के बीच गूँज नहीं सका। लोग SIR (स्पेशल इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन) को जरूरी मानते हैं, क्योंकि उनका मानना है कि वोटर लिस्ट में बाहरी लोग, घुसपैठिए और मृत वोटरों के नाम हटाए जाने चाहिए।” इस वजह से राहुल गाँधी को स्थानीय समर्थन नहीं मिला।

राहुल गाँधी की वोटर अधिकार यात्रा की कवरेज ऑपइंडिया ने भी की। इस दौरान हमारी टीम ने लोगों से बातचीत की। लोगों ने राहुल गाँधी की इस यात्रा तो न सिर्फ खारिज किया, बल्कि उन्होंने बिहार SIR को बेहद जरूरी बताया। स्थानीय लोग तो घुसपैठियों की समस्या से परेशान भी दिखे।

यात्रा का रूट मैप भी मुस्लिम बहुल इलाकों को ध्यान में रखकर बनाया गया था, ताकि इस समुदाय को इंडी गठबंधन की ओर आकर्षित किया जा सके। सासाराम, रोहतास से निकली यात्रा औरंगाबाद, गया, वजीरगंज, शेखपुरा, मुंगेर से होकर भागलपुर, कटिहार, पूर्णिया, सुपौल होते हुए दरभंगा, सीतामढ़ी, बेतिया, फिर गोपालगंज, छपरा, भोजपुर होते हुए पटना में खत्म हुई। लेकिन यह रणनीति भी कारगर नहीं रही। आरा जैसे इलाकों में वामपंथी दलों को जोड़ा गया, लेकिन वहाँ भी भीड़ जुटाने में नाकामी मिली।

गठबंधन में खटास और तेजस्वी की छवि पर असर

इंडी गठबंधन में शामिल आरजेडी को उम्मीद थी कि यह यात्रा तेजस्वी यादव को बिहार में मुख्यमंत्री पद का चेहरा बनाएगी। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। यात्रा के दौरान राहुल गाँधी ने सारा ध्यान अपनी ओर खींच लिया, जिससे तेजस्वी की छवि को नुकसान हुआ। दैनिक भास्कर से बातचीत में सीनियर जर्नलिस्ट नचिकेता नारायण कहते हैं, “राहुल गाँधी ने तेजस्वी को मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करने से बचकर गठबंधन की अंदरूनी खटास को उजागर कर दिया।”

इसके अलावा आरजेडी और कॉन्ग्रेस के बीच सीट बँटवारे को लेकर भी तनाव सामने आया। यात्रा से पहले चर्चा थी कि कॉन्ग्रेस को महागठबंधन में 40 सीटें भी नहीं मिलेंगी। लेकिन यात्रा के बाद लगता है कि कॉन्ग्रेस कुछ ज्यादा सीटें हासिल कर सकती है। फिर भी जमीनी स्तर पर इसका कोई खास फायदा नहीं दिखता।

विवादों ने डुबोई वोटर अधिकार यात्रा की नैया

यात्रा के दौरान कई विवादों ने इसे और कमजोर किया। सबसे बड़ा विवाद तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के शामिल होने पर हुआ। स्टालिन 27 अगस्त को मुजफ्फरपुर में यात्रा में शामिल हुए। लेकिन उनकी पार्टी डीएमके के नेताओं के पुराने बयान लोगों को याद आ गए।

डीएमके सांसद दयानिधि मारन ने बिहार और यूपी के लोगों को ‘टॉयलेट साफ करने वाला’ कहा था, जबकि स्टालिन के बेटे उदयनिधि ने सनातन धर्म को बीमारी बताया था। बीजेपी प्रवक्ता प्रभात मालाकार ने कहा, “यह यात्रा बिहार और बिहारियों के अपमान की यात्रा थी। राहुल और तेजस्वी उन लोगों के साथ घूमे, जिन्होंने बिहार के डीएनए पर सवाल उठाए।”

दूसरा बड़ा विवाद दरभंगा में हुआ, जहाँ मंच से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपशब्द कहे गए। मोहम्मद रिजवी को इस मामले में गिरफ्तार किया गया। इस घटना का वीडियो वायरल हो गया और बीजेपी ने इसे पूरे देश में मुद्दा बनाया।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने असम दौरे में कहा, “राहुल गाँधी को पीएम मोदी और उनकी दिवंगत माँ के लिए कहे गए अपशब्दों पर माफी माँगनी चाहिए।” खुद पीएम मोदी ने भी इस मुद्दे को जनता के सामने रखा। ऐसे में इस विवाद ने यात्रा की साख को और नुकसान पहुँचाया।

पप्पू यादव और कन्हैया कुमार का रोल सीमित, बैकफुट पर रहे

यात्रा में पप्पू यादव और कन्हैया कुमार जैसे नेताओं को भी शामिल किया गया, लेकिन इनका रोल भी विवादों से अछूता नहीं रहा। पप्पू यादव को पूर्णिया में इस्तेमाल किया गया, लेकिन बाद में उन्हें मंच पर जगह तक नहीं दी गई। पटना में वे मंच के पीछे बैठे दिखे, जबकि उन्होंने तेजस्वी यादव को ‘जननायक’ तक कह दिया था। कन्हैया कुमार शुरुआत में यात्रा में दिखे, लेकिन बाद में गायब हो गए।

पप्पू यादव और कन्हैया कुमार जैसों को अभी भी आरजेडी कबूल करने को तैयार नहीं है। ऐसे में आरजेडी ने इन दोनों को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया, जिससे गठबंधन में आपसी अविश्वास की खाई और गहरी हो गई।

तेजस्वी के मुद्दों का गायब होना

आरजेडी को उम्मीद थी कि इस यात्रा से तेजस्वी यादव को बिहार में इंडी गठबंधन का फ्रंट चेहरा बनाया जाएगा, लेकिन हुआ उल्टा। सारा फुटेज खा गए राहुल गाँधी। इसकी वजह से कॉन्ग्रेस और आरजेडी के बीच मतभेद भी सामने आ गई कि राहुल गाँधी तेजस्वी यादव पर हावी हो गए। इसकी वजह से यात्रा के समापन को बदल दिया गया और बेहद निराशा भरे माहौल में पटना में यात्रा को खत्म कर दिया गया।

बिहार में एक वर्ग है- जिसने सिर्फ जंगल राज की कहानियों को पढ़ा है, उस समय के बारे में सिर्फ सुना है, उन्होंने जंगलराज को जिया नहीं है। मतदाताओं के ऐसे वर्ग ने 20 सालों से नीतीश कुमार को ही सत्ता में बने देखा है। जंगलराज को न जानने वाले इस मतदाता वर्ग में एंटी इन्कमबेंसी फैक्टर बना हुआ था। यही वर्ग मजबूरी के विकल्प के तौर पर तेजस्वी यादव की तरफ भी देख रहे थे। 2020 में भी देख रहे थे, अभी भी देख रहे हैं।

यही वजह है कि तेजस्वी यादव कलम, रोजगार इन सब चीजों की बात भी करते थे। लेकिन कॉन्ग्रेस ने अपने वोट चोरी का जो फर्जी एजेंडा थोप दिया। उससे तेजस्वी यादव के मुद्दे खो गए। साफ है – कॉन्ग्रेस के वोट चोरी के एजेंडे ने तेजस्वी के इन मुद्दों को दबा दिया।

इन सब की वजह से जो नए मतदाताओं के बीच कलम-रोजगार जैसे मजबूरी के मुद्दों के बीत तेजस्वी उभर रहे थे, वो सब भी तेजस्वी और इंडी गठबंधन के हाथों से फिसल गए। नचिकेता नारायण कहते हैं, “कॉन्ग्रेस खुद को RJD के बराबर खड़ा करने में कामयाब रही। इसके अलावा उसे बहुत ज्यादा फायदा नहीं हुआ। वोट चोरी का मुद्दा लोगों ने नकार दिया। यात्रा के दौरान दिखाए गए सबूत या तो गलत निकले या जनता ने उन्हें स्वीकार नहीं किया।”

क्या मिला इंडी गठबंधन को?

यात्रा से इंडी गठबंधन को मिला-जुला फायदा हुआ। कॉन्ग्रेस के लिए यह संगठन को मजबूत करने का मौका था। संजय कौशिक कहते हैं, “बिहार में कॉन्ग्रेस का संगठन लगभग खत्म हो चुका था। इस यात्रा ने कार्यकर्ताओं में नई जान फूँकी।” लेकिन वोटों में इसका कितना फायदा होगा, यह साफ नहीं है।

आरजेडी के लिए यात्रा फायदे का सौदा नहीं रही। दैनिक भास्कर से बातचीत में सीनियर जर्नलिस्ट मणिकांत ठाकुर कहते हैं, “RJD के लिए यह यात्रा फायदे का सौदा साबित नहीं हुई। उसे इकलौता फायदा मुस्लिम वोटों का बंटवारा रोकने का मिला। रणनीतिक रूप से उसे नुकसान ही हुआ।” हालाँकि, नचिकेता नारायण का मानना है कि राहुल और तेजस्वी की केमिस्ट्री से सीट बँटवारे और वोट ट्रांसफर में आसानी हो सकती है।

भाकपा (माले) जैसी छोटी पार्टियों को इस यात्रा से कुछ फायदा हुआ। पार्टी के जनरल सेक्रेटरी दीपांकर भट्टाचार्य पूरे 16 दिन राहुल के साथ दिखे, जिससे उनकी पार्टी की अहमियत बढ़ी।

क्या बदला बिहार का सियासी माहौल?

यात्रा के रूट में शामिल 67 विधानसभा सीटों में से 2020 में एनडीए ने 39 सीटें जीती थीं, जबकि कॉन्ग्रेस को सिर्फ 9 सीटें मिली थीं। राहुल गाँधी के सामने इन सीटों पर एनडीए की मजबूती को तोड़ने की चुनौती थी, लेकिन ऐसा हो नहीं सका। यात्रा के समापन में पटना के गाँधी मैदान में बड़ी रैली की योजना थी, लेकिन भीड़ न जुटने की वजह से इसे रोडशो में बदल दिया गया। राहुल गाँधी जल्दी ही बिहार से निकल गए।

खोया ज्यादा, पाया कम

कुल मिलाकर इस यात्रा से पहले जो चर्चा थी कि इंडी गठबंधन में कॉन्ग्रेस को 40 सीटें भी नहीं मिलेंगी, वो इस यात्रा के बाद बदल गया है। अब लगता है कि शायद कॉन्ग्रेस कुछ ज्यादा सीट झटक ले। हालाँकि इस यात्रा से ये भी साफ हो गया है कि कॉन्ग्रेस भले ही कुछ सीटें इंडी गठबंधन में ज्यादा ले ले, लेकिन जमीन पर उसका कोई फायदा नहीं मिलने वाला। क्योंकि सालों तक विपक्ष में रहने के बावजूद न तो कॉन्ग्रेस के पास कोई मुद्दा है और न ही आरजेडी के पास। ऐसे में राहुल गाँधी की वोटर अधिकार यात्रा का जमीन पर कोई खास फर्क पड़ा हो, ऐसा बिल्कुल भी नहीं दिखता है।

क्या है RTE जिससे अल्पसंख्यक संस्थानों को छूट देने के अपने ही फैसले पर फिर से विचार करेगा सुप्रीम कोर्ट, 2 जजों की बेंच ने संविधान पीठ के फैसले पर उठाए सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (1 सितंबर 2025) को अपने ही 2014 के उस फैसले पर दोबारा विचार करने को कहा है जिसमें अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों को शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE) से छूट दी गई थी। कोर्ट का कहना है कि कई संस्थान केवल इस कानून से बचने के लिए अल्पसंख्यक दर्जा प्राप्त करने की कोशिश कर रहे हैं।

यह टिप्पणी न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति मनमोहन की पीठ ने की। यह छूट समान शिक्षा व्यवस्था और सामाजिक समावेशिता के सिद्धांतों के खिलाफ हो सकती है।

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने अंजुमन इशात-ए-तालीम ट्रस्ट (Anjuman Ishaat-e-Taleem Trust) बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले की सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की।

उन्होंने इस मामले को बड़ी पीठ के पास भेजते हुए कहा कि 2014 का निर्णय संविधान के अनुच्छेद 21A (शिक्षा का अधिकार) और अनुच्छेद 30(1) (अल्पसंख्यकों को संस्थान स्थापित करने का अधिकार) के बीच संतुलन स्थापित नहीं कर रहा है। हालाँकि कोर्ट ने यह भी कहा कि दोनों अनुच्छेद एक-दूसरे के विरोध में नहीं हैं और इन्हें समन्वय के साथ लागू किया जा सकता है।

पीठ ने अपनी टिप्पणी में ये भी कहा कि RTE की जिम्मेदारियों से बचने के लिए संस्थानों का खुद को अल्पसंख्यक घोषित करना कमजोर वर्गों के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से वंचित कर रहा है।

साथ ही RTE के तहत शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) जैसी गुणवत्ता सुनिश्चित करने वाली शर्तें भी इन संस्थानों पर लागू नहीं होतीं। इसके कारण शिक्षा की गुणवत्ता पर भी असर पड़ता है।

शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE) क्या है?

शिक्षा का अधिकार अधिनियम-2009 (Right to Education Act) भारत सरकार की ओर से पारित एक कानून है, जिसके तहत 6 से 14 वर्ष की उम्र के बच्चों को नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार दिया गया है।

इस कानून की धारा 12(1)(c) के तहत निजी स्कूलों को अपनी 25% सीटें आर्थिक रूप से कमजोर और वंचित वर्गों के बच्चों के लिए आरक्षित करनी होती हैं। इसका उद्देश्य शिक्षा में सभी वर्गों के लिए समानता और सामाजिक समावेश सुनिश्चित करना है।

जजमेंट की कॉपी का स्क्रीनशॉट

2014 के फैसले पर उठे सवाल

पीठ ने 2014 में संविधान पीठ द्वारा दिए गए प्रमति एजुकेशनल एंड कल्चरल ट्रस्ट (Pramati Educational and Cultural Trust) बनाम भारत संघ के फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह निर्णय सार्वभौमिक प्राथमिक शिक्षा की नींव को कमजोर कर सकता है। साथ ही इससे समाज में अलग-अलग वर्गों में बँटवारा हो सकता है और असमानता की जड़ और गहरी हो सकती है।

कोर्ट ने यह चिंता जताई कि कई अल्पसंख्यक स्कूल RTE अधिनियम द्वारा निर्धारित सुविधाएँ नहीं दे रहे हैं। इसके कारण वहाँ पर पढ़ रहे विद्यार्थी समानता और पहचान की भावना से वंचित हो रहे हैं।

कोर्ट ने कहा, “RTE अधिनियम से अल्पसंख्यक संस्थानों को छूट देना समान शिक्षा की कल्पना को खत्म करता है और अनुच्छेद 21A की समावेशिता और सार्वभौमिकता की भावना को कमजोर करता है। यह बच्चों को जाति, वर्ग, धर्म और समुदाय के आधार पर जोड़ने के बजाय विभाजन को बढ़ाता है और साझा शिक्षण स्थानों की बेहतर क्षमता को कम करता है।”

कोर्ट ने यह भी कहा कि शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) RTE अधिनियम के तहत एक अनिवार्य शर्त है।गैर-अल्पसंख्यक स्कूलों में कार्यरत शिक्षकों को इसे उत्तीर्ण करना जरूरी होगा।

प्रमति मामले के फैसले का संदर्भ लेते हुए उन्होंने कहा कि इससे सार्वभौमिक प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता से समझौता हो सकता है और इसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि संविधान के अनुच्छेद 30(1) का उद्देश्य अल्पसंख्यकों की भाषाई और सांस्कृतिक पहचान को संरक्षित करना है, न कि उन्हें सार्वभौमिक मानकों से अलग कर एक अलग प्रणाली में चलाना।

मान्यता मिली तो समानता भी दें शिक्षण संस्थान

कोर्ट ने यह भी कहा कि अल्पसंख्यक संस्थानों को उनकी सांस्कृतिक और भाषाई पहचान के मामलों में स्वायत्तता दी जानी चाहिए, लेकिन जब वे औपचारिक शिक्षा प्रणाली में प्रवेश करते हैं और राज्य से मान्यता, संबद्धता या सहायता प्राप्त करते हैं तो उन्हें समावेशी और शिक्षित समाज के निर्माण के लिए भी एक समान व्यवहार करना चाहिए और व्यापक संवैधानिक परियोजना में भाग लेना चाहिए।

कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि प्रमति का निर्णय केवल RTE की धारा 12(1)(c) पर आधारित था। इसमें कमजोर वर्गों के बच्चों के लिए 25% सीट आरक्षित करने की बात शामिल की गई है। जबकि शिक्षक योग्यता, संरचनात्मक मानक और बाल सुरक्षा उपायों जैसे मानकों पर इस फैसले में कोई चर्चा नहीं की गई।

कोर्ट के अनुसार, धारा 12(1)(c) का मतलब ये बिल्कुल नहीं है कि 25% कोटा के तहत प्रवेश पाने वाले बच्चे किसी विशेष या अन्य धर्म या भाषा वाले हों। यदि अल्पसंख्यक समुदाय के आर्थिक रूप से कमजोर या सामाजिक रूप से वंचित बच्चे इस कोटे के तहत प्रवेश लेते हैं तो क्या वास्तव में इसकी संख्या पर प्रश्न उठता है?

कोर्ट ने यह भी कहा कि अल्पसंख्यक छात्रों के न्यूनतम नामांकन पर स्पष्ट दिशानिर्देश न होने के कारण ही संस्थान बेरोकटोक अल्पसंख्यक दर्जा लेने में आगे बढ़ गए हैं।

4 सवालों पर होगा विचार

सुप्रीम कोर्ट ने चार अहम सवालों को बड़ी पीठ के समक्ष रखा है, जिनमें यह शामिल है कि क्या RTE की धारा 12(1)(c) को इस तरह पढ़ा जा सकता है कि वह अल्पसंख्यक समुदाय के भीतर भी वंचित वर्गों को लाभ पहुँचाए। कोर्ट ने यह भी पूछा है कि क्या 2014 का फैसला संविधान की मूल भावना के अनुरूप है?

इसके अलावा इसमें प्रमति फैसले से जुड़े दो सवाल भी हैं। कोर्ट ने पूछा कि क्या प्रमति मामले में लिया गया फैसला RTE अधिनियम को अल्पसंख्यक अधिकारों के खिलाफ घोषित किया जाना उचित था? साथ ही क्या संस्थानों के RTE की छूट के फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए?

यह मामला अब संविधान पीठ के समक्ष जाएगा, जो यह तय करेगी कि क्या अल्पसंख्यक संस्थानों को RTE से पूरी तरह छूट देना न्यायसंगत है या नहीं। इस फैसले का असर देश भर के लाखों बच्चों की शिक्षा और सामाजिक समावेशिता पर पड़ सकता है।

मुस्लिम बनो, 3 बीवी पाओ… बरेली में अब्दुल मजीद का जो मदरसा था ‘धर्मांतरण का मरकज’, वह भी निकला अवैध: व्हाट्सएप ग्रुप में अश्लील तस्वीर-वीडियो पोस्ट कर फँसाते थे

बरेली में धर्मांतरण के बड़े गिरोह का खुलासा होने के बाद अब रोज़ नई परतें खुल रही हैं। ताजा जानकारी ये है कि गिरोह जिस मदरसे से हिंदुओं का धर्मांतरण करता था, वो मदरसा अवैध निकला है। इस मदरसे पर बुलडोजर चलाने की कार्यवाही के भी आदेश दिए जा चुके हैं।

धर्मांतरण गिरोह ने हिंदू युवकों को फँसाने के लिए 20+ व्हाट्सएप ग्रुप बनाए थे। इनमें अश्लील तस्वीरें और वीडियो भेजे जाते थे। इसके बाद लड़कों को शादी, जन्नत और ‘तीन बीवियाँ’ मिलने का लालच दिया जाता था। जो युवक दिलचस्पी दिखाते थे, उन्हें मदरसे में बुलाकर ब्रेनवॉश किया जाता था। अब तक कई युवक इस जाल में फँस चुके हैं।

किस तरह चलता था व्हाट्सएप वाला जाल

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक, गिरोह ने अलग-अलग नामों से कई व्हाट्सएप ग्रुप बना रखे थे। शुरू में इनमें सामान्य बातें होती थीं। फिर धीरे-धीरे ग्रुप में अश्लील वीडियो और लड़कियों की फोटो डाली जाती थीं। हिंदू लड़कों को शादी का झाँसा दिया जाता था। कहा जाता, ‘अगर मुस्लिम बन जाओगे तो तीन-चार बीवियाँ भी मिलेंगी और जन्नत भी।’ जो लड़के इस लालच में आ जाते, उन्हें मदरसे में बुलाकर लड़कियों और मौलानाओं के जरिए मानसिक रूप से तोड़ा जाता था।

मदरसे के अंदर युवकों को बताया जाता कि इस्लाम अपनाने से सारी परेशानियाँ खत्म हो जाएँगी। उन्हें कहा जाता कि मुस्लिम बनने पर नौकरी, घर, पैसा और खूबसूरत बीवी जैसी चीजें आसानी से मिलेंगी। कुछ युवकों को उर्दू सिखाई जाती थी। कुरान और हदीस पढ़ने को दी जाती थी। जब कोई युवक थोड़ा बहुत मजहबी जानकारी सीख जाता, तो उसे मौलवी बनने का सपना दिखाया जाता।

फैजनगर का मदरसा बना था धर्मांतरण की फैक्ट्री

बरेली से 30 किलोमीटर दूर फैजनगर का यह मदरसा 2014 में शुरू हुआ था। लेकिन असलियत में यह कोई शिक्षा देने वाली जगह नहीं थी। यह एक धर्मांतरण की फैक्ट्री बन चुका था, जहाँ युवकों का मानसिक रूप से ब्रेनवॉश किया जाता था।

इस मदरसे का कोई सरकारी रिकॉर्ड भी नहीं मिला है। यानी यह अवैध रूप से चलाया जा रहा था। यहाँ से बरामद हुआ अब्दुल मजीद का पैन कार्ड भी फर्जी निकला है।

कैसे टारगेट किए जाते थे युवक

गिरोह का टारगेट वे युवक होते थे जो अकेले रहते थे, आर्थिक रूप से कमजोर थे या फिर तलाकशुदा थे। गाँव-शहरों में ऐसे युवकों पर निगरानी रखी जाती थी। फिर धीरे-धीरे उन्हें जाल में फँसाया जाता था। गिरोह का संचालन अब्दुल मजीद करता था। सलमान, आरिफ और फहीम जैसे लोग उसका साथ देते थे।

पुलिस ने कुछ दिन पहले प्रोफेसर प्रभात उपाध्याय को एक मदरसे से बंधक बना कर छुड़ाया। वो नेत्रहीन हैं और उनका जबरन धर्मांतरण करवाया जा रहा था। प्रभात का नाम बदलकर ‘हामिद’ रख दिया गया था और उनका खतना किया जा रहा था। इसी कार्रवाई के दौरान चार आरोपितों को गिरफ्तार किया गया, जिनमें अब्दुल मजीद भी शामिल था।

पुलिस को आरोपितों के पास से ज़ाकिर नाइक की किताबें और 21 से ज़्यादा बैंक खातों का पता चला है, जिनमें ₹13 लाख से ज़्यादा का लेनदेन हुआ है। पुलिस का मानना है कि इस गिरोह का नेटवर्क सिर्फ बरेली तक सीमित नहीं, बल्कि देश के 13 राज्यों तक फैला है और इसमें 200 से ज़्यादा मौलाना भी शामिल हो सकते हैं।

एक खालिस्तानी, दूसरा पाकिस्तानी की पैदाइश: जानिए कौन हैं हरमीत ढिल्लो-उम्मेद मलिक, इनके ‘घुसपैठ’ से ही भारत को आँखें दिखा रहे डोनाल्ड ट्रंप

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप को नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकित नहीं करने और ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान भारत-पाकिस्तान के बीच सीजफायर करवाने के दावों को खारिज करने के बाद भारत-अमेरिकी संबंधों में खटास आ गई है।

रूस-यूक्रेन संघर्ष को ‘मोदी का युद्ध‘ बताना। भारत पर यूक्रेन युद्ध को आर्थिक सहायता देने का आरोप लगाना और रूसी तेल खरीदने पर भारत पर अतिरिक्त 25% (कुल 50%) टैरिफ लगाने का फैसला, भारत- अमेरिकी संबंधों में आई कड़वाहट की वजह बने हैं। जबकि बीजिंग द्वारा उसी तेल की खरीद का बेशर्मी से बचाव करना, ये दिखाता है कि ट्रंप के इरादे ठीक नहीं हैं।

भारत की दृढ़ता और संप्रभुता ने निश्चित रूप से ट्रंप के नाज़ुक अहंकार को चोट पहुँचाई है। हालाँकि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उनकी धमकाने वाली चालों के आगे झुकने को तैयार नहीं दिखते। ट्रंप प्रशासन ने भारत-विरोधी लोगों को अपने प्रशासन में शामिल कर रही सही कसर पूरी कर दी है। खालिस्तान समर्थक हरमीत ढिल्लो और आधे पाकिस्तानी उम्मेद मलिक ऐसे ही दो व्यक्ति हैं, जो अमेरिकी राष्ट्रपति के करीबी हैं।

उम्मेद मलिक कौन हैं?

46 वर्षीय उम्मेद मलिक ईरानी और पाकिस्तानी प्रवासियों के घर पैदा हुए थे। उनका पालन-पोषण न्यू जर्सी में हुआ। द फ्री प्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, उनके माता-पिता डेमोक्रेटिक पार्टी के लिए चंदा जमा करते थे। उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा को दो बार वोट दिया था। डेमोक्रेटिक हिलेरी क्लिंटन को चंदा दिया और न्यू जर्सी के दो डेमोक्रेट्स उम्मीदवारों के लिए काम किया।

‘ब्लैक लाइव्स मैटर’, ‘मी टू’ आंदोलन और दूसरे उदारवादी नीतियों की वजह से मलिक का पार्टी से मोहभंग हो गया। वह रिपब्लिकन के साथ आ गए। आज वह MAGA (मेक अमेरिका ग्रेट अगेन) के कट्टर समर्थक हैं और ट्रंप परिवार के करीबी भी।

डोनाल्ड ट्रंप जूनियर के साथ उनकी दोस्ती ने कथित तौर पर उन्हें ट्रम्प परिवार के वित्तीय मामलों से जोड़ दिया है। दोनों की मुलाकात 2019 की गर्मियों में हैम्पटन्स पार्टी में हुई थी। इसके बाद वे दोनों अक्सर मिलते थे। वह ट्रम्प जूनियर की उस वक्त की प्रेमिका किम्बर्ली गुइलफॉयल को 10 साल से जानते थे।

मलिक ने जो बाइडेन को 2,800 डॉलर देने के एक महीने बाद ही ट्रम्प को 5,600 डॉलर का अपना पहला दान दिया था। वर्तमान राष्ट्रपति के सबसे बड़े बेटे के ‘1789 कैपिटल’ में भी मलिक भागीदार है। इसके अलावा पत्रकार टकर कार्लसन की कंपनी का वह सबसे बड़ा निवेशक है। कार्लसन और मलिक 2015 से दोस्त थे।

अपने इजराइल विरोधी बयानों के लिए कुख्यात मलिक भारत के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रसित रहा है। उसने ब्रिटिश साम्राज्य की तारीफ की थी। उन्होंने 2022 में तर्क दिया था, “मजबूत देश कमजोर देशों पर हावी होते हैं। यह चलन नहीं बदला है। जब अंग्रेज भारत से चले गए, तो वे अपने पीछे एक पूरी सभ्यता, एक भाषा, एक कानूनी व्यवस्था, स्कूल, चर्च और सार्वजनिक इमारतें छोड़ गए, जो आज भी उपयोग में हैं।” उसके बयान की जबरदस्त आलोचना हुई थी।

टकर कार्लसन नेटवर्क (टीसीएन) में अहम निवेशक मलिक की कई बार आलोचना भी हुई। लॉरा लूमर ने उन्हें कार्लसन नेटवर्क में इजराइल की आलोचना करने के पीछे का मास्टरमाइंड बताया था। पिछले साल कार्लसन ने एक ऐसे व्यक्ति का साक्षात्कार लिया था जिसने आरोप लगाया था कि एडॉल्फ हिटलर स्वर्ग में है।

बाद में, वही व्यक्ति तस्कर जेफरी एपस्टीन पर हुए एक कार्यक्रम में दिखा। कार्लसन ने उसे ‘संयुक्त राज्य अमेरिका का सबसे अच्छा और सबसे ईमानदार लोकप्रिय इतिहासकार’ बताया। जुलाई में उसने ईरानी राष्ट्रपति का इंटरव्यू लिया। हालाँकि MAGA और इजराइल-ईरान मुद्दे पर इस इंटरव्यू में विवाद हो गया।

मलिक का नाम एक एक्स पोस्ट में नेटवर्क का ‘प्रमुख समर्थक’ बताया गया था। 1789 कैपिटल अब कार्लसन की कंपनी में निवेशक के रूप में शामिल नहीं है।

ट्रंप प्रशासन के साथ उम्मेद मलिक के गहरे संबंध

मलिक काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस के सदस्य रहे हैं। मलिक ने एक प्रमुख थिंक टैंक, मिल्केन इंस्टीट्यूट को धन दान किया था। वह इंस्टीट्यूट के बोर्ड में भी थे। यह एक ऐसी गैर लाभकारी विदेश नीति से जुड़ी संस्था है, जिसने कुख्यात जॉर्ज सोरोस सहित उदारवादी हस्तियों के सम्मान में वार्षिक समारोह आयोजित किए हैं।

मलिक ने 2018 में अपना व्यवसाय शुरू करने के लिए बैंक ऑफ अमेरिका छोड़ दिया। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, बैंक ने उन पर कॉर्पोरेट मानकों की अनदेखी और अनुचित व्यवहार का आरोप लगाते हुए बर्खास्त कर दिया। इसके बाद मलिक ने बैंक ऑफ अमेरिका पर 100 मिलियन डॉलर से अधिक का मुकदमा दायर किया। बाद में दोनों पक्षों के बीच समझौता हुआ और मलिक ने उस पैसे से अपनी निवेश कंपनी, फरवाहर पार्टनर्स शुरू की।

मलिक 2021 में फ्लोरिडा पहुँचे और वहाँ रिपब्लिकन से जुड़ गए। वह रूढ़िवादी संगठन रॉकब्रिज नेटवर्क में भी शामिल हो गए। इसकी स्थापना जेडी वेंस और क्रिस बुस्किर्क ने की थी। बुस्किर्क 1789 कैपिटल के सह-संस्थापक और दक्षिणपंथी वेबसाइट अमेरिकन ग्रेटनेस के प्रकाशक थे।

मलिक ने 2023 में बुस्किर्क और रिपब्लिकन मेगाडोनर रेबेका मर्सर के साथ मिलकर ‘1789 कैपिटल’ की स्थापना की। मलिक की कंपनी ने पहला निवेश कार्लसन के नेटवर्क में किया था।

मलिक अब सबसे प्रसिद्ध उद्यमियों में से एक बन गए हैं। वह फ्लोरिडा के पाम बीच स्थित मार-ए-लागो क्लब में काफी समय बिताते हैं। रिपब्लिकन उम्मीदवारों और चैरिटी संस्थाओं को एक बार में हजारों डॉलर के चेक भेजते हैं। स्कॉट बेसेंट को ट्रंप का वित्त मंत्री नियुक्त किए जाने से उन्होंने उनसे मुलाकात की थी। 10 साल पहले बेसेंट को 2015 में पहला ‘हेज फंड’ शुरू करने में उनकी मदद की थी।

बेसेंट ने हाल ही में राहुल गाँधी के अडानी-अंबानी वाले तंज को दोहराते हुए कहा था कि ‘सबसे अमीर भारतीय परिवार’ रूसी तेल से मुनाफा कमा रहे हैं।

मलिक वर्तमान प्रशासन के साथ जुड़े हुए हैं। ट्रंप जूनियर के साथ कई परियोजनाओं पर सहयोग कर रहे हैं। ये परियोजनाएँ लोकतंत्र-विरोधियों को बढ़ावा देने के लिए एक ‘समानांतर अर्थव्यवस्था’ की स्थापना के लिए चलाई जा रही हैं। साथ ही भारत, हिंदुओं और मोदी सरकार के खिलाफ भावना को बढ़ाने के लिए एक क्लब बनाया गया है।

खालिस्तान समर्थक हरमीत ढिल्लो को जानिए

डोनाल्ड ट्रंप ने अपने इस कार्यकाल में भारतीय-अमेरिकी हरमीत कौर ढिल्लन को अमेरिकी न्याय विभाग में नागरिक अधिकारों के लिए सहायक अटॉर्नी जनरल नियुक्त किया। उनका “द ढिल्लन लॉ ग्रुप” नामक एक कानूनी फर्म है। इसके पूरे देश में ऑफिस खुले हुए हैं। हालाँकि, ट्रंप प्रशासन में शामिल होने के बाद उन्हें 2025 में कंपनी छोड़नी पड़ी।

उनके विवादास्पद अतीत और खालिस्तान समर्थक रवैये को देखते हुए उनकी कड़ी आलोचना भी हुई।

ढिल्लो पर बार-बार अमेरिका में खालिस्तानियों का समर्थन करने के आरोप लगे। वह भारत विरोधी गुट की मुखर समर्थक रही हैं। उन्होंने नई दिल्ली पर अमेरिका और कनाडा में मारने के लिए लोगों को भेजने का आरोप लगाया है और यह भी कहा है कि आलोचकों की हत्या में प्रवासी भारतीय भी शामिल हैं।

ढिल्लो ने आरोप लगाया कि खालिस्तानी समर्थकों की हत्या के पीछे मोदी सरकार का हाथ है। उन्होंने दावा किया कि भारतीय अमेरिकी डेमोक्रेट्स ने इन हत्याओं पर अजीब चुप्पी साध ली है। उन्होंने अमेरिकी सरकार से पूछा कि देश के नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उन्होंने क्या कदम उठाए हैं।

ढिल्लो ने कनाडा में विपक्ष के नेता पियरे पोलीव्रे का भी हवाला दिया, जिन्होंने प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो का समर्थन किया था। ट्रूडो ने हरदीप सिंह निज्जर की हत्या का आरोप भारत पर लगाया था। उन्होंने अमेरिका में खालिस्तानी समर्थकों को ‘सिख नेता’ करार दिया। साथ ही खालिस्तानियों की कट्टरपंथी विचारधारा को कम करके आंका।

ढिल्लो ने भारत में मानवाधिकारों के कथित उल्लंघनों पर रॉयटर्स के एक लेख का भी ज़िक्र किया। उन्होंने कहा कि पंजाब में हाल ही में इंटरनेट पर लगे बैन से लोगों को काफी नुकसान झेलना पड़ा। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि सिख कार्यकर्ताओं और पत्रकारों को निशाना बनाया गया है। दरअसल उन्होंने उस वक्त की बात की, जब पंजाब में खालिस्तानी प्रचारक और सांसद अमृतपाल सिंह पर कार्रवाई को लेकर झूठा प्रचार किया जा रहा था।

ढिल्लो पहले डेमोक्रेटिक नेता कमला हैरिस की समर्थक थीं। रिपोर्टों के अनुसार, उन्होंने सैन फ्रांसिस्को के जिला अटॉर्नी पद के लिए हैरिस के लिए काम किया था। हालाँकि कार्लसन शो के दौरान उन्हें हैरिस के खिलाफ जातिवादी टिप्पणी की।

ढिल्लो ने कमला हैरिस के उच्चारण पर टिप्पणी करते हुए कहा कि वह दूसरे अक्षर पर जोर देती हैं, जिससे यह कमाला बन जाता है, जबकि भारत में इसे कमला कहा जाता है। ढिल्लन ने कहा, “वह एक उच्च जाति ‘ब्राह्मण’ के परिवार से आती हैं। उनकी माँ एक ब्राह्मण हैं।”

ट्रम्प प्रशासन रूसी तेल खरीद को लेकर भारत पर अपने हास्यास्पद हमलों में भी इस निराधार ब्राह्मण-विशेषाधिकार कथा को जारी रखता है। व्हाइट हाउस के व्यापार सलाहकार पीटर नवारो ने जातिगत राजनीति का सहारा लेने की कोशिश की और ज़ोर देकर कहा कि ब्राह्मण ही इस व्यापार के असली लाभार्थी हैं।

ढिल्लो पर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगे। जून 2023 में द गार्जियन में छपी एक खबर में खुलासा हुआ कि उनके नेतृत्व में एक गैर-लाभकारी संस्था में 10 लाख डॉलर से ज्यादा का निवेश किया गया।

रिपोर्ट में खुलासा किया गया है, “द गार्जियन ने पाया है कि सेंटर फॉर अमेरिकन लिबर्टी (CAL) से कम से कम 13.2 लाख डॉलर उनकी लॉ फर्म, ढिल्लो लॉ ग्रुप को हस्तांतरित किए गए हैं। इसके अलावा, राज्य और संघीय दस्तावेजों से पता चलता है कि ढिल्लो दो घंटे के साप्ताहिक कार्य के लिए CAL से 120,000 डॉलर का वेतन लेती हैं।”

हरमीत ढिल्लो का पार्टनर फर्म भी कट्टरपंथी

जॉन-पॉल-देओल ‘द ढिल्लो लॉ ग्रुप’ के पार्टनरों में एक हैं। वह एक ऑनलाइन ट्रोल की तरह काम करता है, जो नियमित रूप से हिंदुओं और हिंदू देवताओं का अपमान करता है। उसने 2023 में ‘द वायर’ के लेख में आतंकवादी जरनैल सिंह भिंडरावाले की निंदा करने वाले एक यूजर्स के पोस्ट पर प्रतिक्रिया स्वरूप भगवान शिव के लिए एक अपमानजनक ट्वीट भेजा था।

हालाँकि ट्वीट को हटा दिया गया, लेकिन उनका इतिहास उन हिंदुओं और सिखों पर हमला करने के लिए जातिवादी और नस्लीय शब्दों का इस्तेमाल करने का रहा है जो उनकी मान्यताओं से सहमत नहीं हैं। वह अक्सर “ब्राह्मणों” को निशाना बनाते हैं, हिंदुओं का “लिंडू” कहकर मजाक उड़ाते हैं और सबसे “पिछड़ी सभ्यता” कहते हैं।

अमेरिका में जाति-विरोधी हिंदू-विरोधी कानून के प्रबल समर्थक देओल ने भी वेदों को जाति से जोड़कर उनका अपमान किया।

दरअसल ट्रंप के आचरण से ज्यादा खतरनाक उनकी सोच है। उन्हें लगता है कि बाकी दुनिया पर अमेरिका का दबदबा है। वह गौतम अडानी और मुकेश अंबानी के मोदी सरकार से संबंधों को लेकर विपक्ष के प्रचार का इस्तेमाल कर रहे हैं। साथ ही जातिगत राजनीति के मुद्दे पर मतदाताओं को भड़का रहे हैं, ताकि नई दिल्ली को अपनी माँगें मनवाने के लिए धमकाया जा सके।

ट्रंप की हताशा और उनके आसपास मौजूद भारत विरोधी लोगों को देखते हुए उनके ‘भारत-विरोध’ को समझा जा सकता है। ‘खालिस्तानी आतंकवाद’ का महिमामंडन भी इसकी कड़ी है।

(ये लेख मूल रूप में अंग्रेजी में लिखी गई है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

अलीगढ़ में अतिक्रमण हटाने पहुँचा दस्ता, विरोध में हिंदुओं की शोभायात्रा से पहले फाड़े भगवान श्रीकृष्ण के पोस्टर: ऑपइंडिया से बोले VHP नेता- इलाका मुस्लिम बहुल

उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में अतिक्रमण के विरोध में भगवान कृष्ण और भगवान राम के पोस्टर फाड़े गए। हिंदू देवताओं का अपमान बताते हुए विश्व हिंदू परिषद (VHP) ने आक्रोश जताया है। VHP ने गाँधी पार्क पुलिस थाने में मामले की तहरीर दी है, जिसमें उचित कार्रवाई की माँग की गई है।

शिकायतकर्ता VHP के जिला सह मंत्री राहुल वर्मा ने पुलिस को दी तहरीर में बताया गया कि 30 अगस्त 2025 को मामू भाँजा बाजार में नगर निगम का अतिक्रमण हटाओ अभियान जारी था। यहाँ दुकानों के बाहर टीनशेड के नीचे काउंटर लगाकर अतिक्रमण किया जाता है, जिसे हटाने के लिए नगर निगम कार्यवाही में जुटी थी।

विश्व हिंदू परिषद ने पुलिस को दी तहरीर की फोटो

राहुल वर्मा ने बताया कि ये मुस्लिम बहुल इलाका है, जहाँ हर दुकान किसी मुस्लिम व्यक्ति की है। वे कहते हैं कि इन दुकानदारों ने अतिक्रमण का विरोध करना शुरू कर दिया। भारी संख्या में दुकानदार ने सड़क के बीचोबीच हंगामा शुरू कर दिया।

VHP नेता ने बताया कि विरोध के बीच कुछ मुस्लिम युवकों ने सड़कों पर लगे शोभायात्रा के पोस्टर को निशाना बनाना शुरू कर दिया, जिन पर हिंदू देवी-देवताओं की तस्वीर थी। उन्होंने बताया कि जमीन के काफी ऊपर लगाए गए पोस्टर को नीचे उतारा और तोड़फोड़ शुरू कर दी। इसमें भगवान राम और भगवान श्रीकृष्ण के पोस्टर पूरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गए।

इस घटना का वीडियो ऑपइंडिया के पास है। वीडियो में भी देखा जा सकता है कि एक मुस्लिम युवक भगवान श्रीकृष्ण और भगवान राम के पोस्टर पर हमला कर रहा है। वह हवा में आधे लटके पोस्टर को हाथों से पीटता नजर आ रहा है और उसके पीछे खड़ी कुछ लोग वीडियो भी बना रहे हैं।

विश्व हिंदू परिषद की शोभायात्रा के थे पोस्टर

विश्व हिंदू परिषद (VHP) ब्रजप्रांत के मीडिया प्रमुख प्रतीक रघुवंशी ने ऑपइंडिया से बातचीत में बताया कि 31 अगस्त 2025 को VHP के स्थापना दिवस के अवसर पर शोभायात्रा निकालने की तैयारी हो रही थी। इसके तहत पूरे शहर में हिंदू देवी-देवताओं के पोस्टर लगाए गए थे। ये पोस्टर मामू भाँजा मार्केट में भी लगाए, जहाँ मुस्लिमों की आबादी काफी ज्यादा है।

ऑपइंडिया से बातचीत में रघुवंशी ने कहा कि शोभायात्रा से एक दिन पहले ही भगवान राम और भगवान श्रीकृष्ण के पोस्टर को फाड़ दिया गया। उन्होंने कहा कि इस कृत्य से सभी VHP और बजरंग दल कार्यकर्ता आक्रोशित हैं, क्योंकि यह हिंंदू धर्म का अपमान है, जिसे सहन नहीं किया जाएगा।

पुलिस ने कार्रवाई का दिया आश्वासन

जिला सह मंत्री राहुल वर्मा के नेतृत्व में VHP और बजरंग दल कार्यकर्ताओं ने पुलिस से भी मामले की शिकायत की है। मामले के दिन 30 अगस्त 2025 को ही संबंधित गाँधी पार्क पुलिस थाने में थाना प्रभारी राजवीर सिंह परमार को तहरीर सौंपी गई।

इस अवसर पर ब्रजप्रान्त मीडिया प्रमुख करन चौधरी, महानगर सह सोशल मीडिया प्रमुख दिनेश बघेल समेत अन्य कार्यकर्ता मौजूद रहे।

राहुल वर्मा ने बताया कि पुलिस ने मामले में कार्रवाई का आश्वासन दिया है। उन्होंने मामले में पुलिस की लापरवाही बरतने का भी आरोप लगाया।

समाजवादी पार्टी के नेता ने सहायक नगरायुक्त को दी धमकी

वहीं समाजवादी पार्टी (SP) महानगर अध्यक्ष अब्दुल हमीद घोसी ने मामू भाँजा मार्केट में अतिक्रमण हटाओ अभियान का विरोध किया और नगर निगम सहायक नगरायुक्त वीर सिंह को फोन पर धमकी दी। इस फोन कॉल की रिकॉर्डिंग भी ऑपइंडिया के पास है।

सहायक नगरायुक्त से बातचीत के दौरान अब्दुल हमीद गुंडागर्दी पर उतर आए। अब्दुल हमीद ने नगर निगम पर अतिक्रमण हटाओ अभियान के तहत विशेष समुदाय को निशाना बनाने का भी आरोप लगाया। सपा नेता ने धमकी दी कि वे नगर निगम अधिकारियों को अतिक्रमण करने से रोकेंगे।

12 साल की हिंदू बच्ची को अगवा कर कराया निकाह, पीड़ित पिता को 200 की भीड़ ने घेर कर कहा- अब मुस्लिम हो गई, तुम्हारा अधिकार नहीं: जान से मारने की दी धमकी

वाराणसी के आदमपुर में एक 12 साल की हिंदू बच्ची का अपहरण कर जबरन धर्मांतरण कराने का चौंकाने वाला मामला सामने आया है। पुलिस ने इस मामले में मुख्य आरोपित निहाल और एक अन्य महिला को गिरफ्तार कर लिया है। बच्ची के पिता ने आरोप लगाया है कि निहाल तीन महीने पहले उनकी बेटी को अगवा करके ले गया था और बाद में उसका धर्म बदलवाकर मौलवी से निकाह करवा दिया। जब वे अपनी बेटी को वापस लेने गए तो आरोपित परिवार और 200 लोगों की भीड़ ने उन्हें जान से मारने की धमकी दी।

बच्ची के पिता ने लगाए गंभीर आरोप

पीड़ित पिता ने पुलिस को बताया कि उनकी बेटी तीन महीने से लापता थी। जब उन्हें पता चला कि उनकी बेटी निहाल के पास है, तो वे उसे वापस लाने के लिए उसके घर गए। लेकिन वहाँ निहाल, उसका अब्बू शरीफ, भाई लालू और अन्य परिजनों ने उन्हें धमकी दी।

आरोपितों ने कहा कि उनकी बेटी का धर्मांतरण हो चुका है और अब उस पर उनका कोई अधिकार नहीं है। जब पिता ने इसका विरोध किया तो करीब 200 लोगों की भीड़ ने उन्हें घेर लिया और धमकी दी कि अगर उन्होंने अपनी बेटी को वापस लेने की कोशिश की तो उन्हें जान से मार दिया जाएगा। डरकर पीड़ित पिता को वहाँ से भागना पड़ा।

पुलिस पर भी लगे लापरवाही के आरोप

पिता का आरोप है कि उन्होंने इस घटना की जानकारी तुरंत स्थानीय पुलिस चौकी और थाने में दी, लेकिन उनकी कोई सुनवाई नहीं हुई। उनका कहना है कि पुलिसकर्मियों ने उन्हें यह कहकर टाल दिया कि ‘बड़े साहब नहीं हैं, बाद में आना।’

कई बार थाने के चक्कर लगाने के बावजूद उनकी बेटी को ढूँढने का कोई प्रयास नहीं किया गया। इसके बाद उन्होंने पुलिस कमिश्नर मोहित अग्रवाल से गुहार लगाई, जिन्होंने तुरंत कार्रवाई के आदेश दिए।

दो आरोपित गिरफ्तार, तनाव का माहौल

पुलिस कमिश्नर के आदेश के बाद पुलिस ने निहाल, उसके अब्बू शरीफ, भाई लालू और एक अज्ञात के खिलाफ केस दर्ज किया। मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने सोमवार (1 सितंबर 2025) की रात को मुख्य आरोपित निहाल और एक महिला को गिरफ्तार कर लिया।

बाकी आरोपितों की तलाश जारी है। इस घटना के बाद आदमपुर इलाके में तनाव का माहौल है। पीड़ित परिवार ने अपनी बच्ची की सुरक्षित वापसी की माँग की है। पुलिस का कहना है कि वे इस मामले की गहनता से जाँच कर रहे हैं और जल्द ही बच्ची को ढूँढकर आरोपितों पर सख्त कार्रवाई की जाएगी।

राहुल गाँधी की ‘वोट चोरी’ वाली थ्योरी के फिर से फूट गए गुब्बारे, कॉन्ग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा के पास मिले 2 एक्टिव वोटर ID: मतदाता सूची में मृत सदस्य का भी नाम

कॉन्ग्रेस पार्टी के सांसद राहुल गाँधी की ‘वोट चोरी’ की बातें उनकी पार्टी के लिए शर्मिंदगी का सबब बन गईं। बीजेपी के आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय ने 2 सितंबर 2025 को खुलासा किया कि कॉन्ग्रेस के प्रवक्ता पवन खेड़ा के पास दो एक्टिव EPIC नंबर हैं। एक निजामुद्दीन ईस्ट में जंगपुरा विधानसभा क्षेत्र में और दूसरा नई दिल्ली विधानसभा क्षेत्र के काका नगर में।

खेड़ा के नाम पर दो एक्टिव EPIC नंबर

मालवीय द्वारा साझा की गई जानकारी सार्वजनिक है। OpIndia ने इन जानकारियों को चुनाव आयोग की वेबसाइट पर मिलान किया है, जिसमें ये दावा सच पाया गया है। वोटर लिस्ट के रिकॉर्ड दिखाते हैं कि खेड़ा का नाम जंगपुरा में EPIC नंबर XHC1992338 के साथ दर्ज है।

Source: Amit Malviya/ECI

पवन खेड़ा का नाम न सिर्फ जंगपुरा में है, बल्कि नई दिल्ली में EPIC नंबर SJE0755967 के साथ भी है। वोटर लिस्ट में एंट्री अभी भी एक्टिव हैं।

Source: Amit Malviya/ECI

खेड़ा का वोटर लिस्ट में डुप्लिकेट नाम होना एक गंभीर सवाल उठाता है कि चुनाव आयोग को इसकी जाँच करनी चाहिए कि उनके पास दो एक्टिव वोटर आईडी कैसे हैं। इसके अलावा मालवीय ने अपने पोस्ट में कहा कि अधिकारी इस बात की जाँच कर रहे हैं कि क्या खेड़ा ने कभी एक से ज्यादा बार वोट डाला है।

मृत परिवार के सदस्य का नाम अभी भी वोटर लिस्ट में

उसी पते पर अन्य वोटरों की जाँच करने पर OpIndia को पता चला कि रूपम खेड़ा का नाम अभी भी वोटर लिस्ट में एक्टिव है। खास बात ये है कि रूपम का निधन 2021 में कोविड-19 की वजह से हो गया था।

Source: Amit Malviya/ECI

इसके अलावा एक व्यक्ति श्रावण कुमार प्रजापत का नाम दोनों वोटर लिस्ट में दिखा। दिलचस्प बात ये है कि जंगपुरा क्षेत्र से खेड़ा की पत्नी का नाम लिस्ट से हटा दिया गया है।

Source: Amit Malviya/ECI

कॉन्ग्रेस नेताओं के बार-बार ‘वोट चोरी’ के दावों के बावजूद, उनके अपने मृत परिवार के सदस्यों के नाम वोटर लिस्ट से हटाने जैसे बेसिक काम भी नजरअंदाज किए गए हैं।

पाखंडी राजनीति की खुल गई पोल

कॉन्ग्रेस नेता पवन खेड़ा दूसरों को चुनावी ईमानदारी का पाठ पढ़ाते हैं और जब किसी का नाम अलग-अलग जगहों पर चार बार वोटर लिस्ट में दिखा तो हंगामा मचाया। बाद में वह व्यक्ति कैमरे पर आया और साफ किया कि उसने पहले जहाँ रहता था, वहाँ से नाम हटाने की अर्जी दी थी, लेकिन वोटर लिस्ट अपडेट नहीं हुई।

इसमें विडंबना ये है कि उनके अपने रिकॉर्ड ही गड़बड़ियों से भरे हैं। मालवीय ने ये भी बताया कि सोनिया गाँधी का नाम भारत की वोटर लिस्ट में तब दर्ज था, जब वो भारत की नागरिक भी नहीं बनी थीं। उन्होंने ये भी कहा कि राहुल गाँधी ने बेंगलुरु के महादेवपुरा में चुनावी गड़बड़ी के अपने आरोपों के बारे में कोई औपचारिक शपथपत्र शिकायत नहीं दी है और सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र में गड़बड़ी के आरोप वाले केस को पहले ही खारिज कर दिया है।

इससे पहले, पवन खेड़ा ने CSDS-Lokniti के संजय कुमार के X पर एक पोस्ट के आधार पर डेटा शेयर किया था, जिसमें महाराष्ट्र में वोटर लिस्ट में गड़बड़ी का दावा था। हालाँकि बाद में संजय कुमार ने वो पोस्ट डिलीट कर दी और कहा कि उनकी टीम ने टेबल्स को ‘गलत पढ़ा’। राहुल गाँधी और अन्य नेताओं के चुनाव आयोग के खिलाफ किए गए हर दावे पिछले कुछ महीनों में खोखले साबित हुए हैं।

यूट्यूबर ने एयरबेस-सेना की जानकारी पाकिस्तान भेजी, फोन में मिले 120 ISI एजेंट के नंबर: 1700 पन्नों की चार्जशीट, ज्योति मल्होत्रा के साथ दिखता था जसबीर सिंह

पाकिस्तान के लिए जासूसी के आरोप में पकड़ी गई यू्ट्यूबर ज्योति मल्होत्रा के साथ गिरफ्तार जसबीर सिंह के खिलाफ पुलिस ने 1700 पन्नों की चार्जशीट दायर की है। इसमें जसबीर सिंह के पाकिस्तान को भारत के फाइटर जेट एयरबेस, आर्मी बेस और भाखड़ा नांगल डैम की जानकारी भेजने के सबूत हैं।

चार्जशीट के मुताबिक, जसबीर पाकिस्तान के 120 लोगों से संपर्क में था। इसमें ISI के भी लोग शामिल थे। ISI के शाकिर का नंबर उसके फोन में जट रँधावा के नाम से सेव मिला। जसबीर के पाकिस्तान के होटलों में भी ISI के लोगों से मिलने की जानकारी सामने आई है।

जसबीर के पास 2 पासपोर्ट, 4 बार गया पाकिस्तान

जसबीर के पास 2 पासपोर्ट थे और वह चार बार पाकिस्तान जा चुका है। वह पाकिस्तानी यूट्यूबर नासिर ढिल्लो के जरिए पाकिस्तान दूतावास का अधिकारी और ISIS का सदस्य दानिश से भी मिला। पुलिस ने यह भी बताया कि जसबीर कई बार ज्योति मल्होत्रा के साथ भी पाकिस्तानी दूतावास गया था। ज्योति मल्होत्रा को भी पाकिस्तान की जासूसी के आरोप में गिरफ्तार किया गया है।

चार्जशीट में सामने आया कि दूतावास में दानिश ने उससे भारत के सिम माँगे थे, जिसे वह उपलब्ध नहीं करा पाया था। साथ ही जसबीर सिंह ने अपना लैपटॉप भी दानिश को दिया था। बाद में जसबीर ने लैपटॉप और मोबाइल का डाटा भी डिलीट कर दिया। इस डाटा को वापस लाने की कोशिश की जा रही है।

बता दें कि दानिश वही है, जिसकी ज्योति मल्होत्रा के साथ नई दिल्ली के पाकिस्तानी दूतावास में आयोजित पार्टियों में ली गई तस्वीरें वायरल हुई थी। ज्योति मल्होत्रा को पाकिस्तान की जासूसी के आरोप में पकड़े जाने के बाद दानिश को भी दूतावास से निलंबित कर दिया गया था।

कौन है यूट्यूबर जसबीर सिंह?

यूट्यूबर जसबीर सिंह को जून 2025 में पाकिस्तान के लिए जासूसी के आरोप में पकड़ा गया था। अधिकारियों के मुताबिक, जसबीर सिंह पाकिस्तान की ISI के लिए जासूसी कर रहा था। जसबीर के समान आरोप में पकड़ी गई हरियाणा की यूट्यूबर ज्योति मल्होत्रा के साथ लिंक जुड़े थे।

जसबीर सिंह के मूलरूप से पंजाब के रूपनगर स्थित महलान गाँव का रहने वाला है। वह ‘जानमहल वीडियो’ नाम से यूट्यूब चैनल चलाता था, जिसके 11 लाख सब्सक्राइबर थे। जसबीर ट्रैवलिंग और फूड व्लॉगिंग से जुड़ा कन्टेन्ट वीडियो में डालता था। इसी चैनल पर उसके पाकिस्तान से जुड़े कुछ वीडियो भी मिले थे।

यूट्यूबर ज्योति मल्होत्रा की चार्जशीट में भी खुले थे कई राज

इससे पहले यूट्यूबर ज्योति मल्होत्रा, जिसे पाकिस्तान के लिए जासूसी के आरोप में गिरफ्तार किया गया था, उसके खिलाफ भी पुलिस ने 14 अगस्त 2025 को चार्जशीट दायर की थी। इस चार्जशीट में ज्योति मल्होत्रा के पाकिस्तान के कई एजेंटो से संपर्क की बात सामने आई थी।

2500 पन्नों की चार्जशीट में बताया गया कि ज्योति मल्होत्रा लंबे समय से पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI के जासूसों के संपर्क में थी। वह पाकिस्तान उच्चायोग में तैनात एहसान-उर-रहीम उर्फ दानिश के अलावा हसन अली, शाकिर और नासिर ढिल्लों से भी लगातार बातचीत करती थी।