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खूबसूरत मुस्लिम युवतियों से निकाह, नशा और पैसे के लालच में हिंदू युवकों का धर्मांतरण कर रहा बरेली का अब्दुल मजीद गिरोह: बृजपाल को बनाया अब्दुल्ला तो प्रभात को हामिद, जाकिर नाइक के दिखाए जाते थे वीडियो

उत्तर प्रदेश के बरेली में धर्मांतरण कराने वाले गिरोह को लेकर पुलिस ने कई बड़े खुलासे किए हैं। यह गिरोह हिंदू युवकों के धर्मांतरण के लिए आर्थिक मदद से लेकर मुस्लिम युवतियों से निकाह तक के लालच दे रहा था। गिरोह पहले किसी ऐसे व्यक्ति को ढूंढता जो आर्थिक तौर पर कमजोर होता और उसे आर्थिक मदद दी जाती।

इस गिरोह का षड्यंत्र था कि आर्थिक मदद के बाद शख्स को सुंदर मुस्लिम युवतियों से निकाह का लालच दिया जाए और फिर धीरे-धीरे उसका ब्रेनवाश करके इस्लाम कबूल करवाया जाए। इसके बाद उस शख्स के जरिए उसके परिवार को भी मुस्लिम बना दिया जाता था।

बृजपाल को बनाया अब्दुल्ला तो प्रभात को हामिद

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, सुभाष नगर के बृजपाल के साथ भी इस गैंग ने यहीं किया था। वे करेली के रहने वाले हैं और एक प्राइवेट स्कूल में गणित के शिक्षक हैं। 2014 में उनका एक्सीडेंट हो गया था और इलाज के दौरान परिवार की आर्थिक हालत बिगड़ गई। इसी दौरान करेली के ही निवासी सलमान और आरिफ नाम के दो युवकों ने उनको मदद शुरू कर दी।

दोनों युवकों ने इलाज का खर्चा उठाया और आर्थिक मदद दी। फिर धीरे-धीरे बृजपाल को समझाना शुरू किया कि अगर वह इस्लाम धर्म अपना लेगा तो उसे और भी फायदे मिलेंगे, साथ ही एक मुस्लिम युवती से निकाह भी करा दिया जाएगा।

लगातार संपर्क और बहलाने-फुसलाने के बाद बृजपाल ने इस्लाम कबूल कर लिया और उसका नाम बदलकर अब्दुल्ला रख दिया गया। इसके बाद उसकी बहन का निकाह एक मुस्लिम युवक से करा दिया गया और माँ का नाम भी ऊषा रानी से बदलकर अमीना रख दिया गया।

एक अन्य शख्स प्रभात भी इस गिरोह का शिकार हुआ है। प्रभात मूल रूप से अलीगढ़ के महुआ खेड़ा का रहने वाला है। उसने एएमयू से एमफिल, बीएड किया और फिर हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी से पीएचडी की। साल 2019 में उसकी नौकरी राजकीय इंटर कॉलेज अलीगढ़ में लगी। शादी के कुछ समय बाद उसकी पत्नी ने तलाक की अर्जी डाल दी और उसके खिलाफ FIR भी कर दी।

इसके बाद उसका तबादला बरेली के इंटर कॉलेज में हो गया। यहाँ पर वह गिरोह के निशाने पर आया। गिरोह के लोगों ने उसका मानसिक रूप से शोषण करना शुरू कर दिया। उसे कहा गया कि अब तुम्हारे साथ कोई शादी नहीं करेगा लेकिन इस्लाम कबूल कर लोगे तो मुस्लिम युवती से निकाह हो जाएगा और तलाक भी आसान रहेगा। कई मुस्लिम लड़कियों की तस्वीरें दिखाकर उसे लालच दिया गया।

प्रभात ने जब धर्म परिवर्तन किया तो उसका नाम हामिद रख दिया गया। गिरोह उसका खतना करने की तैयारी कर रहा था लेकिन उसकी माँ को शक हुआ और उन्होंने समय रहते पुलिस को सूचना दे दी। इसी वजह से उसका खतना रुक गया।

नशा देकर भी बनाते थे दबाव

इज्जतनगर का रहने वाला एक किशोर बी-कॉम की पढ़ाई कर रहा था। वह भी गिरोह का शिकार बना। पहले गिरोह के लोगों ने उससे दोस्ती की और उसे नशे की लत लगा दी। शुरुआत में उसे नशा फ्री में दिया जाता था। जब वह इसकी लत में पूरी तरह फँस गया, तब उस पर धर्म परिवर्तन का दबाव बनाया जाने लगा। अब उस किशोर की मानसिक और शारीरिक हालत बहुत खराब हो चुकी है।

पुलिस ने गिरोह के मोबाइल फोन से कई मुस्लिम युवतियों की तस्वीरें बरामद की हैं, जो लोगों को फँसाने के लिए इस्तेमाल की जाती थीं। इसके अलावा पुलिस ने यह भी खुलासा किया है कि जिस मदरसे में ये जबरन खतना कराते थे, उस मदरसे का संचालक अब्दुल मजीद था। ये दिव्यांग और पिछड़े वर्ग के लड़कों को खासतौर पर निशाना बनाते थे।

उसकी ट्रैवल हिस्ट्री पूरे देश के 27 से अधिक जिलों से जुड़ी है। वह जगह-जगह से चंदा इकट्ठा करता था। पुलिस को उसके बैंक अकाउंट से 13 लाख रुपए मिले हैं और 21 अलग-अलग बैंक खातों का खुलासा हुआ है। वहीं, गिरोह सोशल मीडिया पर भी लोगों का ब्रेनवॉश करता थे।

आरोपितों ने कई वॉट्सऐप ग्रुप बनाए थे, जिनमें जाकिर नाइक की वीडियो और पाकिस्तानी स्कॉलर्स के ऑडियो शेयर किए जाते थे। सलमान, आरिफ और फहीम अब्दुल मजीद के ही अंडर में काम करते थे। सलमान धर्मग्रंथ, सीडी और किताबें उपलब्ध कराता था और आरिफ उसकी मदद करता था।

दूसरी तरफ फहीम लोगों की जानकारी इकट्ठा कर गैंग तक पहुँचाता था। पुलिस को इनके विदेशी फंडिंग की भी आशंका है। फिलहाल पुलिस गिरोह के बाकी सदस्यों की तलाश में जुटी हुई है।

बाहरी हो या NGO अब असम में आसानी से नहीं खरीद पाएँगे जमीन, हिमंता सरकार ने बनाई नई SOP: अलग धर्म के लोग भी नहीं कर पाएँगे लैंड ट्रांसफर डील

असम में जनसांख्यिकीय बदलाव और संभावित सुरक्षा खतरों को लेकर चिंताओं को देखते हुए असम कैबिनेट ने एक नई स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) को मंजूरी दी है। यह SOP अलग-अलग धर्मों के लोगों के बीच भूमि हस्तांतरण की जाँच के लिए बनाई गई है। इसके अलावा असम के बाहर से आने वाले गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) द्वारा जमीन खरीदने की प्रक्रिया को भी इस SOP के तहत जाँचा जाएगा।

बुधवार (27 अगस्त 2025) को कैबिनेट बैठक के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस में मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने इस नीति के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने कहा कि असम जैसे संवेदनशील राज्य में जमीन के लेन-देन को बहुत सावधानी से संभालना जरूरी है, ताकि कोई धोखाधड़ी न हो और समाज में शांति बनी रहे।

मुख्यमंत्री ने बताया कि अगर जमीन का ट्रांसफर (खरीद-बिक्री, दान) एक ही धर्म के लोगों के बीच हो रहा है, तो इस SOP का कोई असर नहीं होगा और ऐसे सौदे बिना किसी अतिरिक्त रुकावट के हो सकेंगे। लेकिन अगर यह ट्रांसफर अलग-अलग धर्मों के बीच हो, जैसे हिंदू और मुस्लिम या इसके उलट, तो इसके लिए कई स्तरों पर जाँच होगी।

हिमंता बिस्वा सरमा ने कहा, “जब कोई प्रस्ताव सब-डिविजनल ऑफिसर के पास आएगा, तो अगर यह एक ही धर्म के लोगों के बीच का सौदा है, तो कोई दिक्कत नहीं। लेकिन अगर यह इंटर-रिलीजन सौदा है, जैसे हिंदू और मुस्लिम के बीच तो पहले यह जाँचा जाएगा कि जमीन का मालिक असली है या नहीं, जमीन असली है या नहीं। इसके बाद प्रस्ताव डिप्टी कमिश्नर के पास जाएगा।”

मुख्यमंत्री ने आगे बताया, “डिप्टी कमिश्नर इस प्रस्ताव को राजस्व विभाग को भेजेगा। वहाँ से यह असम पुलिस की स्पेशल ब्रांच को जाएगा। स्पेशल ब्रांच यह देखेगी कि कहीं यह सौदा जबरदस्ती, धोखाधड़ी या गैरकानूनी तो नहीं है। साथ ही खरीदार के पैसे का स्रोत भी जाँचा जाएगा कि वह काला धन तो नहीं है।”

इसके अलावा स्थानीय लोगों की राय भी ली जाएगी कि वे इस सौदे से सहमत हैं या नहीं, खासकर जब जमीन किसी अलग धर्म के व्यक्ति को बेची जा रही हो। मुख्यमंत्री ने कहा, “स्पेशल ब्रांच यह भी देखेगी कि इस सौदे से स्थानीय सामाजिक ढाँचे पर कोई बुरा असर तो नहीं पड़ रहा या इससे राष्ट्रीय सुरक्षा को कोई खतरा तो नहीं है। उनकी रिपोर्ट डिप्टी कमिश्नर को वापस भेजी जाएगी, जो अंतिम फैसला लेगा कि सौदा मंजूर करना है या नहीं।”

स्पेशल ब्रांच की रिपोर्ट सरकार को भेजी जाएगी, जो डिप्टी कमिश्नर को अंतिम फैसला लेने के लिए कहेगी। सरमा ने जोर देकर कहा कि यह सख्त जाँच जरूरी है ताकि धोखाधड़ी या गैरकानूनी काम, पैसे के स्रोत, स्थानीय सामाजिक ढाँचे पर प्रभाव और राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों को ठीक से देखा जा सके। उन्होंने कहा, “SOP के तहत, असम पुलिस की स्पेशल ब्रांच यह जाँचेगी कि क्या भूमि हस्तांतरण में कोई धोखाधड़ी या गैरकानूनी काम है, खरीदार के पैसे का स्रोत क्या है, जमीन के आसपास के सामाजिक ढाँचे पर क्या असर होगा और राष्ट्रीय सुरक्षा का कोई मुद्दा तो नहीं है।”

हिमंता ने यह भी बताया कि पिछले छह महीनों से रुके हुए कई भूमि हस्तांतरण के मामलों का अब इस नए ढाँचे के तहत जल्दी निपटारा किया जाएगा।

यह SOP सिर्फ व्यक्तिगत सौदों तक सीमित नहीं है। असम के बाहर से आने वाले NGOs जो जमीन खरीदकर स्कूल, कॉलेज या अन्य संस्थान बनाना चाहते हैं, उन्हें भी इस SOP के तहत जाँच से गुजरना होगा।

सरमा ने हाल के रुझानों पर चिंता जताई, जहाँ कुछ NGOs ने असम में जमीन खरीदी है। उन्होंने कहा, “हाल ही में हमने देखा कि केरल से कुछ NGOs ने यहाँ जमीन खरीदी। उन्होंने कुछ आयोजन किए, जो भविष्य में राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बन सकते हैं। अगर कोई बाहरी NGO शिक्षण संस्थान, मेडिकल कॉलेज या नर्सिंग कॉलेज के लिए जमीन खरीदना चाहता है, तो उसे भी इस SOP की प्रक्रिया से गुजरना होगा।”

असम के मुख्यमंत्री ने खास तौर पर बराक वैली, श्रीभूमि और बरपेटा जैसे इलाकों का जिक्र किया, जहाँ बाहरी NGOs, जो अक्सर किसी खास धर्म से जुड़े होते हैं, स्कूल या अन्य सुविधाओं के नाम पर बड़ी मात्रा में जमीन खरीद रहे हैं। उन्होंने कहा, “वे कहते हैं कि वे स्कूल बनाना चाहते हैं, लेकिन उनका असली मकसद कुछ और हो सकता है। पुलिस इन सभी पहलुओं की जाँच करेगी।”

मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि यह SOP असम में रजिस्टर्ड NGOs पर लागू नहीं होगी। यह सिर्फ बाहरी NGOs पर लागू होगी, ताकि किसी भी अनुचित प्रभाव या छिपे मकसद को रोका जा सके। उन्होंने दोहराया, “असम जैसे संवेदनशील राज्य में भूमि हस्तांतरण के मुद्दे को बहुत सावधानी से संभालना जरूरी है।” इस नीति का मकसद राज्य के जनसांख्यिकीय संतुलन को बनाए रखना और राष्ट्रीय सुरक्षा को किसी भी खतरे से बचाना है।

पीएम मोदी 13-14 सितंबर को करेंगे असम का दौरा

प्रेस कॉन्फ्रेंस में हिमंता बिस्वा सरमा ने यह भी घोषणा की कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की असम यात्रा, जो पहले 8 सितंबर को होने वाली थी, अब उप-राष्ट्रपति चुनाव के कारण टल गई है। चुनाव आयोग ने 9 सितंबर को उप-राष्ट्रपति चुनाव की तारीख तय की है, इसलिए अब पीएम मोदी 13 सितंबर को असम आएँगे और 14 सितंबर को वापस जाएँगे। इस वजह से 8 सितंबर को होने वाले सभी कार्यक्रम अब 13 और 14 सितंबर को होंगे।

पीएम मोदी डॉ. भूपेन हजारिका की जन्म शताब्दी समारोह का उद्घाटन करेंगे और कई बड़े बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं की आधारशिला रखेंगे।

पूछा- भगवा गमछा क्यों पहना है और सुरेंद्र को पीटने लगे तबरेज-इमरान-अजीज: कॉन्ग्रेस के शासन वाले कर्नाटक का मामला, निशाना बना बिहार का मजदूर

कर्नाटक के बेंगलुरु शहर में कॉन्ग्रेस सरकार के राज में भगवा पहनना अब खतरनाक होता जा रहा है। 24 अगस्त 2025 की रात कलासिपाल्या इलाके में एक बिहारी मजदूर सुरेंद्र कुमार को सिर्फ इसलिए पीटा गया क्योंकि उसने भगवा रंग का गमछा सिर पर बाँध रखा था। जब कंपनी के मैनेजर हरिकृष्णा ने बीच-बचाव करने की कोशिश की तो मुस्लिम हमलावरों ने उन्हें भी पीटा और शर्ट फाड़ दी।

शुरू में पुलिस ने मामूली रिपोर्ट दर्ज कर मामले को दबाने की कोशिश की, लेकिन जैसे ही वीडियो वायरल हुआ और हिंदू संगठनों ने दबाव बनाया, तब जाकर FIR दर्ज हुई और तीन आरोपितों तबरेज, इमरान खान, अजीज खान को गिरफ्तार किया गया।

कहाँ और कब हुई घटना?

ये घटना बेंगलुरु के भीड़भाड़ वाले इलाके कलासिपाल्या में 24 अगस्त 2025 को रात करीब 9:30 बजे हुई। रॉयल ट्रेवलर्स नाम की एक ट्रांसपोर्ट कंपनी के बाहर मजदूर सुरेंद्र कुमार अपने रोज के काम में लगा हुआ था। बिहार से आए इस 26 साल के युवक ने काम के दौरान सिर पर भगवा रंग का गमछा बाँध रखा था।

जैसे ही वो काम में व्यस्त था, तीन मुस्लिम युवक वहाँ आए। पहले उन्होंने गाली-गलौच की, फिर बोले- “ये भगवा क्यों पहना है? उतार इसे।” शिलेंद्र कुछ समझ पाता, इससे पहले उसे धक्का देकर गिरा दिया गया और मारने-पीटने लगे। भगवा रंग की वजह से गुस्सा जताना और उसपर हमला करना – ये बात घटना को सांप्रदायिक रंग दे रही थी।

पिछले 15 साल से वहीं काम करने वाले कंपनी के मैनेजर हरिकृष्णा शोर सुनकर मौके पर पहुँचे। उन्होंने बीच-बचाव की कोशिश की लेकिन मुस्लिम हमलावरों ने उन्हें भी नहीं बख्शा। उनके साथ भी मारपीट हुई, गालियाँ दी गईं और उनकी शर्ट तक फाड़ दी गई।

जानकारी के अनुसार, एम तबरेज (30) मैकेनिक का काम करता है। इमरान खान (35) रेडियम कटिंग का काम करता है और ए अजीज खान (37) रियल एस्टेट का काम करता है।

गिरफ्तार मुस्लिम हमलावर

शुरुआत में पुलिस ने इस घटना को एक मामूली झगड़ा मानते हुए ‘नॉन-कॉग्निजेबल रिपोर्ट’ दर्ज की थी। लेकिन जैसे ही इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ और हिंदू संगठनों ने विरोध किया, उसके बाद पुलिस की कार्रवाई शुरु हुई। पुलिस ने मामला दर्ज किया और तीन आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि इस मामले में आगे की जाँच जारी है और दोषियों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

1984 के सिख दंगे कॉन्ग्रेस की साजिश, 2002 के गुजरात दंगे स्वाभाविक: राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व अध्यक्ष तरलोचन सिंह बोले – नरेंद्र मोदी ने राज्य को जलने से बचाया

पूर्व राज्यसभा सांसद तरलोचन सिंह ने 1984 के सिख दंगों को कॉन्ग्रेस की प्रायोजित साजिश बताया, जबकि 2002 के गुजरात दंगों को गोधरा कांड के बाद लोगों की स्वाभाविक प्रतिक्रिया करार दिया। उन्होंने कहा कि 27 फरवरी 2002 को साबरमती एक्सप्रेस में 59 कारसेवकों की हत्या के बाद भड़की हिंसा में सरकार की कोई भूमिका नहीं थी।

राज्यसभा के पूर्व सांसद और राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व अध्यक्ष सरदार तरलोचन सिंह ने अपने बयान में साफ कहा है कि 2002 में गुजरात में जो कुछ हुआ, वह ‘स्वाभाविक प्रतिक्रिया’ थी, जबकि 1984 के सिख दंगे पूरी तरह ‘सरकार प्रायोजित साजिश’ थे। उन्होंने कॉन्ग्रेस पर बड़ा हमला बोलते हुए कहा कि दिल्ली में सिखों पर जो हुआ, वह पहले से तय था, लेकिन गुजरात में गोधरा कांड के बाद जो हिंसा भड़की, उसमें सरकार की कोई भूमिका नहीं थी।

मोदी का साहसिक फैसला

तरलोचन सिंह ने कहा कि तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने उस समय बड़ा कदम उठाया था। गोधरा अग्निकांड में मारे गए 59 कारसेवकों के शवों को गाँव ले जाने की माँग उठ रही थी। लेकिन मोदी ने इसकी अनुमति नहीं दी और वहीं अंतिम संस्कार का आदेश दिया। अगर ये शव गाँव पहुँच जाते तो पूरा गुजरात जल उठता।

तरलोचन ने कहा, “मोदी जी ने गुजरात को बचा लिया। इस फैसले ने दंगों को सीमित रखा और हालात बेकाबू नहीं होने दिए।”

पूर्व सांसद ने जोर देकर कहा कि गुजरात दंगे वह त्वरित प्रतिक्रिया थी उस घटना के होने के बाद। उन्होंने कहा, “मैं उस समय राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग का अध्यक्ष था और सबसे पहले गुजरात पहुँचा। मैंने जाँच की और एक बुकलेट भी लिखी। उसमें साफ लिखा कि दिल्ली दंगे प्रायोजित थे, जबकि गुजरात दंगे लोगों की सामान्य प्रतिक्रिया थे। सरकार का इसमें कोई रोल नहीं था।” तरलोचन सिंह ने बताया कि उस बुकलेट की 500 कॉपियाँ खुद मोदी ने छपवाकर बांटने का आदेश दिया था।

मुस्लिम नेताओं के साथ बैठक और दिल्ली बनाम गुजरात

राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व अध्यक्ष सरदार तरलोचन सिंह ने यह भी खुलासा किया कि उन्होंने 30 बड़े मुस्लिम नेताओं और मोदी की बैठक कराई थी। तीन घंटे चली उस मीटिंग में मोदी ने सभी नेताओं की बातें सुनीं और उनकी माँगें मान लीं। उन्होंने महिलाओं के लिए सिर्फ महिला अधिकारियों वाले थाने खोलने जैसे फैसले भी किए।

तरलोचन सिंह ने सबसे बड़ा अंतर बताते हुए कहा, “दिल्ली का दंगा प्रायोजित था, गुजरात स्वाभाविक। दिल्ली में कॉन्ग्रेस सरकार के संरक्षण में सिखों का कत्लेआम हुआ, जबकि गुजरात में गोधरा कांड के बाद लोगों की प्रतिक्रिया सामने आई। मोदी ने हालात संभाले और पूरे राज्य को जलने से बचाया।”

गोधरा कांड

27 फरवरी 2002 का दिन भारतीय इतिहास में एक काले अध्याय के रूप में दर्ज है। उस दिन गोधरा रेलवे स्टेशन पर साबरमती एक्सप्रेस के एस-6 कोच में आग लगा दी गई। इस कोच में अयोध्या से लौट रहे कारसेवक सवार थे।

अचानक भीड़ ने ट्रेन पर हमला किया और डिब्बे पर पेट्रोल डालकर आग के हवाले कर दिया। इस भयावह घटना में महिलाओं और बच्चों समेत 59 कारसेवकों की दर्दनाक मौत हो गई।

गोधरा कांड की खबर फैलते ही पूरे गुजरात में तनाव की लहर दौड़ गई। अहमदाबाद, वडोदरा, पंचमहल और अन्य जिलों में सांप्रदायिक हिंसा भड़क उठी। कई दिनों तक चले इन दंगों में सैकड़ों लोग मारे गए और हजारों को अपने घर छोड़ने पड़े। अदालतों ने इस मामले में सख्त सजा भी सुनाई और सुप्रीम कोर्ट तक ने दोषियों की सजा बरकरार रखी।

‘संघ में आओगे तो कुछ मिलेगा नहीं, जो है वो भी चला जाएगा…’ देश और समाज की सेवा में मिलता है स्वयंसेवकों को सुकून: RSS प्रमुख बोले – हिंदुत्व धर्म नहीं, जीवन जीने का तरीका

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने दिल्ली में हिंदुत्व, भारतीयता और धर्म के मोल को लेकर गहरी बातें कही। उन्होंने संघ के 100 साल पूरे होने के मौके पर दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम में लगातार दूसरे दिन अपने विचार रखे। भागवत ने साफ कहा कि संघ का रास्ता लालच या पुरस्कार का नहीं, बल्कि सत्य, प्रेम और राष्ट्रहित का है। उन्होंने कहा कि हिंदुत्व और भारतीयता का असली मतलब है अपने देश और समाज को मजबूत करना, लेकिन दुनिया से कटना नहीं।

सात्त्विक प्रेम और समर्पण संघ का आधार

मोहन भागवत ने कहा कि 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने विजयदशमी के दिन संघ की नींव रखी थी। उनका सपना था कि हिंदू समाज संगठित हो और हर व्यक्ति राष्ट्र के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझे।

भागवत ने बताया कि संघ का काम सात्त्विक प्रेम और आत्मीयता पर टिका है। इसमें कोई लालच नहीं है। उन्होंने मजाकिया लहजे में कहा, “संघ में आओगे तो कुछ मिलेगा नहीं, जो है वो भी चला जाएगा।” यानी स्वयंसेवक सिर्फ इसलिए काम करते हैं क्योंकि उन्हें अपने देश और समाज की सेवा में सुकून मिलता है। उनका ध्येय है – “आत्मनो मोक्षार्थं जगत् हिताय च,” यानी अपनी आत्मा की मुक्ति और विश्व कल्याण के लिए।

संघ का लक्ष्य पूरे हिंदू समाज को एकजुट करना है। भागवत ने कहा कि यह काम आसान नहीं है। इसके लिए हर व्यक्ति को उसकी स्थिति के हिसाब से देखना होगा – चाहे वह दोस्ती का भाव हो, करुणा का या फिर उपेक्षा का। संघ का हर स्वयंसेवक बिना किसी पुरस्कार की उम्मीद के काम करता है। यही भावना संघ को खास बनाती है। भागवत ने साफ किया कि संघ का काम सिर्फ हिंदुओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे समाज और विश्व के कल्याण के लिए है।

स्वदेशी और आत्मनिर्भर भारत

भागवत ने स्वदेशी और आत्मनिर्भरता पर जोर देते हुए कहा कि भारत को हर क्षेत्र में आत्मनिर्भर होना चाहिए। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम दुनिया से रिश्ते तोड़ दें। उन्होंने कहा, “अंतरराष्ट्रीय व्यापार जरूरी है, लेकिन वह दबाव में नहीं, स्वेच्छा से होना चाहिए।”

स्वदेशी का मतलब है अपने देश में बनी चीजों को तरजीह देना। अगर हमारे देश में कार बनती है, तो बाहर से क्यों खरीदें? जो चीजें देश में उपलब्ध हैं, उन्हें आयात करने की जरूरत नहीं।

उन्होंने यह भी कहा कि हमारे घरों में भाषा, खान-पान, वेशभूषा और पूजा-पद्धति भारतीय होनी चाहिए। यह हमारी संस्कृति और पहचान को मजबूत करता है। लेकिन उन्होंने साफ चेतावनी दी कि अगर कोई धार्मिक अपमान होता है, तो हिंसा या टायर जलाना इसका हल नहीं है। ऐसी स्थिति में कानून और प्रशासन का सहारा लेना चाहिए। भागवत ने समाज में बढ़ रहे सात सामाजिक पापों का भी जिक्र किया, जैसे बिना मेहनत के धन कमाना और सिद्धांतों के बिना राजनीति करना। उन्होंने कहा कि आत्मनिर्भर भारत ही सशक्त भारत का आधार बनेगा।

दुनिया में बढ़ता तनाव और तीसरे विश्वयुद्ध का खतरा

मोहन भागवत ने वैश्विक हालात पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद भी दुनिया में शांति नहीं आई। संयुक्त राष्ट्र जैसे संगठन भी स्थाई समाधान नहीं दे पाए। आज दुनिया कट्टरपन और असहिष्णुता की चपेट में है। भागवत ने कहा कि तीसरा विश्वयुद्ध भले ही पुराने युद्धों जैसा न हो, लेकिन माहौल उतना ही खतरनाक है। कट्टर सोच वाले लोग न सिर्फ अपने विरोधियों को दबा रहे हैं, बल्कि ‘कैंसिल कल्चर’ को भी बढ़ावा दे रहे हैं। इससे समाज और देशों के बीच खाई बढ़ रही है।

उन्होंने कहा कि दुनिया के बड़े नेता भी इस स्थिति से चिंतित हैं। चर्चाएँ तो बहुत होती हैं, लेकिन कोई स्थाई हल नहीं निकलता। भागवत ने जोर देकर कहा कि अगर सभी लोग सिर्फ उपभोग और स्पर्धा के पीछे भागेंगे, तो दुनिया नष्ट होने की कगार पर पहुंच जाएगी। उन्होंने भारतीय दृष्टिकोण को दुनिया की जरूरत बताया, जिसमें ‘सबका भला’ की सोच है।

धर्म का असली मतलब और विश्व शांति

मोहन भागवत ने धर्म की सही परिभाषा बताई। उन्होंने कहा, “धर्म का मतलब सिर्फ पूजा-पाठ नहीं है। धर्म वह मार्ग है, जो इंसान को संतुलन और मोक्ष की ओर ले जाता है।” उन्होंने साफ किया कि धर्म में कन्वर्जन या धर्म परिवर्तन का कोई स्थान नहीं है। धर्म का काम है समाज को जोड़ना, न कि बाँटना। भागवत ने कहा कि भारतीय दृष्टिकोण ही दुनिया को एकजुट कर सकता है। अगर विश्व को स्थायी शांति चाहिए, तो धर्म के संतुलन को अपनाना होगा।

उन्होंने कहा कि भारत एक प्राचीन देश है। इसके नागरिकों को ऐसा जीवन जीना होगा कि दुनिया के लोग भारत से जीवन का ज्ञान लेने आएं। यही भारत का असली योगदान है। भागवत ने जोर देकर कहा कि हिंदुत्व का आधार सत्य और प्रेम है। यह सात्त्विक प्रेम ही संघ का मूल है, और यही सोच विश्व को शांति दे सकती है।

हिंदुत्व और भारतीयता का संदेश

भागवत ने हिंदुत्व को भारतीयता का पर्याय बताया। उन्होंने कहा कि हिंदुत्व सिर्फ एक धर्म नहीं, बल्कि जीवन जीने का तरीका है। यह सत्य, प्रेम और करुणा पर आधारित है। हिंदुत्व का मतलब है सभी को साथ लेकर चलना, न कि किसी को दबाना। उन्होंने कहा कि भारत की संस्कृति हमेशा से समावेशी रही है। यही वजह है कि संघ का काम सिर्फ हिंदुओं तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे समाज और विश्व के कल्याण के लिए है।

भागवत ने यह भी कहा कि आज दुनिया में जो तनाव और अशांति है, उसका जवाब भारतीय संस्कृति और हिंदुत्व में है। भारत का दर्शन ‘वसुधैव कुटुंबकम’ यानी पूरी दुनिया एक परिवार है, को मानता है। यह सोच ही दुनिया को जोड़ सकती है। उन्होंने स्वयंसेवकों से आह्वान किया कि वे अपने काम में और मेहनत करें, ताकि भारत न सिर्फ आत्मनिर्भर बने, बल्कि विश्व को शांति और समृद्धि का रास्ता दिखाए।

संघ का भविष्य और चुनौतियाँ

मोहन भागवत ने यह भी कहा कि संघ को हमेशा से विरोध का सामना करना पड़ा है। फिर भी यह संगठन 100 सालों से मजबूती से खड़ा है। उन्होंने स्वयंसेवकों से कहा कि वे अपने ध्येय पर अडिग रहें। संघ का काम सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव पूरे विश्व पर पड़ना चाहिए। भागवत ने कहा कि अगर भारत मजबूत होगा, तो दुनिया को भी एक नई दिशा मिलेगी।

उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे संघ के विचारों को समझें और समाज में फैली बुराइयों को दूर करने में योगदान दें। भागवत ने यह भी कहा कि भारत को अपनी संस्कृति और परंपराओं पर गर्व करना चाहिए, लेकिन यह गर्व अहंकार में नहीं बदलना चाहिए। हमें दुनिया के साथ कदम मिलाकर चलना है, लेकिन अपनी पहचान को बनाए रखते हुए।

कभी अमेरिका कभी पाकिस्तान, लेकिन भारत पर राहुल गाँधी को नहीं है ऐतबार: बिहार में फिर बने विदेशी तोता, बदतमीजी भरे लहजे में कहा- ट्रंप के बोलते ही 5 घंटे में PM मोदी ने रोकी लड़ाई

सरकार के बार-बार कहने, संसद में बयान देने, सेना के खुले तौर पर बताने के बावजूद कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी को भरोसा है, तो सिर्फ अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप पर, जो बार-बार सीजफायर का श्रेय लेने के लिए बेताब हैं। ट्रंप 40 से ज्यादा बार दुनिया को ये बता चुके हैं कि उन्होंने ही भारत-पाकिस्तान के बीच सीजफायर कराया है, लेकिन भारत शुरू से ही कह रहा है कि पाकिस्तान ताबड़तोड़ हमले के बाद नाक रगड़ते हुए सीजफायर के लिए भारत से गुहार लगाई थी।

संसद के अंदर और बाहर सरकार स्थिति कर चुकी है साफ

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और विदेश मंत्री एस जयशंकर ने संसद में आधिकारिक रूप से दो टूक कहा था कि सीजफायर के लिए सिर्फ पाकिस्तान के डीजीएमओ का फोन आया था। इसको लेकर किसी भी देश से कोई बात नहीं हुई। पीएम मोदी ने संसद में एक और खुलासा किया था कि 9 मई की रात जेडी वैंस का कई बार फोन आया था। उन्होंने बताया कि पाकिस्तान भारत पर बहुत बड़ा हमला करने वाला है। पीएम मोदी ने उन्हें बता दिया था कि पाकिस्तान ऐसा करता है, तो वो बहुत बड़ी गलती करेगा। इसके बाद जो हुआ वो सबको पता है, बात खत्म।

राहुल गाँधी ने ट्रंप के दावे को दोहराया

लेकिन राहुल गाँधी की बात है जो खत्म ही नहीं होती। ट्रंप के बयान के बाद राहुल गाँधी का दावा सामने आ जाता है। बिहार में ‘मतदाता अधिकार यात्रा’ के दौरान एक रैली में फिर उन्होंने दावा किया, “ट्रंप ने आज कहा कि जब भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध चल रहा था, तो मैंने फोन उठाया और नरेंद्र मोदी को बताया और कहा कि वह जो कुछ भी कर रहे हैं उसे 24 घंटे के भीतर बंद कर दें। नरेंद्र मोदी ने 24 घंटे नहीं, बल्कि पाँच घंटे में सब कुछ बंद कर दिया।” उनके बोलने का अंदाज और भाषा शैली पर भी सवाल उठ रहे हैं।

राहुल गाँधी ने कहा, “ट्रंप ने मोदी से कहा- सुन जो तू ये कर रहा है, इसे 24 घंटे में बंद कर। जिसको नरेंद्र मोदी ने 24 घंटे में बल्कि पाँच घंटों में बंद कर दिया।”

ऑपरेशन सिंदूर के बाद से ही राहुल गाँधी और उनकी कॉन्ग्रेस ट्रंप- ट्रंप का रट लगाए हुए है। उन्हें सेना के बयान पर भी विश्वास नहीं है। सेना ने खुले तौर पर कहा कि दोनों सेनाओं के डीजीएमओ स्तर पर बातचीत हुई और पाकिस्तान के कहने पर भारत ने हमले रोके।

हर आतंकी हमले को भारत मानेगा युद्ध

ये वही कॉन्ग्रेस है जिसके राज में मुंबई सीरियल ब्लास्ट, 26/11 जैसी घटनाएँ घटी, लेकिन डोजियर देने के अलावा कुछ नहीं कर सकी कॉन्ग्रेस सरकार। पाकिस्तान के प्रति सख्ती 2014 के बाद दिखलाई दी और पीएम मोदी ने पिछले 11 सालों में दुनिया को दिखाया कि भारत बदल गया है। अब तो मोदी सरकार ने ये भी घोषणा कर दी है कि पाकिस्तान की ओर से होने वाले आतंकी हमलों को भारत युद्ध की तरह मानेगा। यानी अगर अब आतंकी हमला होता है, तो भारत उसे छोड़ेगा नहीं।

ट्रंप का भारत-पाक युद्ध रुकवाने पर फिर बयान

बुधवार (27 अगस्त 2025) को अपनी कैबिनेट बैठक में रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ के साथ बैठे डोनाल्ड ट्रंप ने बताना शुरू किया कि कैसे उन्होंने यूक्रेन-रूस संघर्ष में एक विश्व युद्ध को उन्होंने टाल दिया था और फिर बात को मोड़कर भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव के दौरान पीएम नरेंद्र मोदी से बातचीत होने का जिक्र किया।

ट्रंप ने कहा, “मैं एक शानदार व्यक्ति की बात कर रहा था, भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। मैंने पूछा कि पाकिस्तान के साथ क्या चल रहा है। नफरत काफी थी और ये कई सालों से चल रहा है।”

ट्रंप ने अपना बात में आगे कहा, “मैंने उनसे कहा कि मैं आपके साथ कोई ट्रेड डील नहीं करूंगा। आप परमाणु युद्ध में उलझ जाएँगे। मैंने कहा, मुझे कल फोन करना। मैं आपके साथ कोई डील नहीं करूँगा या फिर इतना ज्यादा टैरिफ लगा दूँगा कि आपका सिर चकरा जाएगा।”

ट्रंप के मुताबिक, “भारत और पाकिस्तान के बीच जो स्थिति थी, उससे न्यक्लियर वॉर हो सकती थी। उन्होंने पहले ही 7 जेट मार गिराए थे, हालात बेहद खतरनाक थे। तब मैंने उनसे कहा – क्या आप व्यापार करना चाहते हैं? अगर आप लड़ाई जारी रखते हैं, तो अमेरिका आपके साथ कोई व्यापार या सहयोग नहीं करेगा। आपके पास इसे सुलझाने के लिए सिर्फ 24 घंटे हैं।” अगर ट्रंप की माने तो बातचीत के 5 घंटे के अंदर ही भारत और पाकिस्तान के बीच सीजफायर हो गया।

ट्रंप का ये बयान उस समय आया है जब भारत पर नए टैरिफ नियम लागू हो गया है। इसके साथ ही अब भारतीय सामानों के आयात पर 50% टैरिफ लागू हो गया है। यानी व्यापार की जो धमकी देने का दावा ट्रंप कर रहे हैं, वह भारत पर नहीं चला। सरकार ने कई बार साफ किया है कि वो किसानों, पशुपालकों के हितों के खिलाफ कोई समझौता नहीं करेगी। अगर व्यापार के नाम पर सीजफायर होता, तो भारत अमेरिका के सामने अपनी शर्तों पर इस तरह अडिग नहीं रहता।

इस बीच दावा ये भी किया जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कई फोन कॉल्स को नजरअंदाज कर दिया। 50% टैरिफ दरों को लेकर भारत ने ‘अनुचित, अन्यायपूर्ण और अव्यवहारिक’ बताते हुए कड़ी प्रतिक्रिया दी है। साथ ही अमेरिका को बार-बार यह संकेत दिया है कि वह रूस के साथ अपने संबंध बनाए रखेगा।

गौरतलब है कि पीएम मोदी जापान के दौरे पर हैं। इसके बाद वो चीन जाने वाले हैं जहाँ चीनी राष्ट्रपति शी जिंगपिंग के अलावा रूस के राष्ट्रपति पुतिन से भी मुलाकात होगी। इनकी बैठक पर दुनिया की नजर है। ये बैठक ट्रंप के टैरिफ को ‘फुस्स’ कर सकता है।

बरेली में फेल हुआ अब्दुल-सलमान, आरिफ-फहीम गैंग का इस्लामी खेल, नेत्रहीन प्रभात का खतना कर बना रहे थे ‘हामिद’: छांगुर के भी निकले बाप, कइयों का कराया धर्मांतरण

उत्तर प्रदेश के बरेली से एक सुनियोजित और संगठित धर्मांतरण गिरोह का पर्दाफाश हुआ है। इस गिरोह ने नेत्रहीन प्रोफेसर प्रभात उपाध्याय को निकाह और बेहतरीन जिंदगी का लालच देकर फँसा लिया था। मदरसे में खतने की प्रक्रिया के दौरान ही पुलिस ने दबिश देकर उन्हें गैंग की साजिश नाकाम की। पुलिस ने 4 आरोपितों को गिरफ्तार किया है। आरोपितों के पास से ज़ाकिर नाइक की सीडी, धर्मांतरण प्रमाणपत्र, 22 बैंक खातों में संदिग्ध ट्रांजैक्शन और विदेशी फंडिंग से जुड़े सुराग मिले हैं।

पुलिस जाँच में सामने आया है कि गिरोह का नेटवर्क देश के कई राज्यों और 13 से ज्यादा प्रदेशों तक फैला है। गिरोह की सोशल मीडिया, कट्टरपंथी प्रचार और ‘हनी ट्रैप‘ हथकंडे भी सामने आए हैं।

कैसे खुला ये पूरा मामला?

सारा मामला तब सामने आया जब अलीगढ़ की एक महिला ने पुलिस में शिकायत की थी कि एक गिरोह ने उसके नेत्रहीन बेटे प्रभात उपाध्याय को बहकाकर अपने जाल में फँसा लिया है। इसके अलावा शादी और पैसे का लालच देकर अपने साथ ले गए है। प्रभात एक प्रोफेसर हैं।

जाँच के दौरान पुलिस को पता चला कि उसे बरेली के एक मदरसे में ले जाया गया था, जहाँ उसका जबरन खतना कराकर नाम ‘हामिद’ रखा जा रहा था। माँ की शिकायत पर पुलिस ने समय रहते छापा मारा और प्रभात को बचा लिया।

कैसे काम करता था यह गिरोह?

पुलिस ने मौके से अब्दुल मजीद, सलमान, आरिफ और फहीम को गिरफ्तार किया है। पूछताछ में पता चला कि यह गिरोह बहुत ही सोचे-समझे तरीके से काम करता था। पुलिस ने मौके से अब्दुल मजीद, सलमान, आरिफ और फहीम को गिरफ्तार किया है। पूछताछ में पता चला कि यह गिरोह बहुत ही सोचे-समझे तरीके से काम करता था। पहले ये कमजोर लोगों को निशाना बनाता है, जिसमें तलाकशुदा, परेशान या अकेले रहने वाले लोग शामिल होते हैं।

फिर उन लोगों को शादी, नौकरी या पैसों का लालच दिया जाता है। ये लोग सोशल मीडिया ग्रुप्स में जाकिर नाइक और दूसरे कट्टरपंथी मौलवियों के वीडियो और ऑडियो शेयर करते है। जब पीड़ित पूरी तरह से उनके जाल में फँस जाता है, तो उसे मदरसे में ले जाकर जबरन खतना और निकाह कराकर उसका धर्म परिवर्तन कर देते है।

पुलिस को इस गैंग के पास से मजहबी किताबें, जाकिर नाइक की सीडी और धर्मांतरण से जुड़े कई दस्तावेज भी मिले हैं। यह भी खुलासा हुआ है कि इस गिरोह ने पहले बृजपाल साहू और उनके परिवार का भी धर्मांतरण कराया था।

विदेशी फंडिंग का शक

गिरफ्तार किए गए आरोपितों के कुल 21 बैंक खाते मिले हैं। इनमें से अकेले सलमान के 12 बैंक खाते हैं, जिनमें उसकी हैसियत से कहीं ज़्यादा पैसे मिले हैं। अब्दुल मजीद के 5 खातों में 2,000 से ज़्यादा संदिग्ध लेनदेन पाए गए हैं।

पुलिस का मानना है कि ये लोग अलग-अलग राज्यों से चंदा इकट्ठा करते थे और इसी पैसे से धर्मांतरण का धंधा चलाते थे। इस बड़े लेन-देन को देखते हुए एजेंसियाँ पाकिस्तान समेत अन्य देशों से फंडिंग की संभावना की जाँच कर रही हैं।

एसपी साउथ अंशिका वर्मा ने बताया कि इस गिरोह का नेटवर्क सिर्फ बरेली तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के कई राज्यों में फैला हुआ है।

उन्होंने कहा कि पुलिस इस मामले में और भी लोगों को गिरफ्तार करेगी। इस घटना ने एक बार फिर से इस तरह के धर्मांतरण रैकेटों की गंभीरता को उजागर कर दिया है, जो हमारे समाज के लिए एक बड़ा खतरा हैं।

देवी हुईं प्रकट, महिषासुर का किया वध… सनातन से ही जुड़ा है उस ‘चामुंडेश्वरी पहाड़ी’ का इतिहास, जिस पर कर्नाटक के कॉन्ग्रेस नेता बोले- ये जगह सिर्फ हिंदुओं की नहीं…

कर्नाटक की राजनीति इन दिनों एक धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन को लेकर गहराई तक हिल गई है। विश्व प्रसिद्ध मैसूर दशहरा महोत्सव, जो सदियों से आस्था और परंपरा का प्रतीक माना जाता है, अब सियासी बयानबाजी और धार्मिक विवाद का केंद्र बन गया है।

अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार से सम्मानित कन्नड़ लेखिका बानू मुश्ताक को दशहरा पूजा के उद्घाटन के लिए आमंत्रित करने और उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के विवादास्पद बयान ने माहौल को राजनीतिक रूप दे दिया है।

डीके शिवकुमार ने दिया विवादित बयान

इसी बीच उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार का बयान विवाद को और गहरा ले गया। डीके ने कहा “चामुंडी पहाड़ी और चामुंडेश्वरी देवी केवल हिंदुओं की नहीं बल्कि सभी समुदायों की हैं। मंदिर किसी एक धर्म की संपत्ति नहीं है। यहाँ हर धर्म के लोग आकर अपनी श्रद्धा प्रकट कर सकते हैं। जिस तरह मैं गिरजाघरों, मस्जिदों और गुरुद्वारों में जाता हूँ, वैसे ही किसी को भी हिंदू मंदिर आने से रोका नहीं जाता। अयोध्या राम मंदिर में भी ऐसा कोई नियम नहीं है कि केवल हिंदू ही जा सकते हैं।”

चामुंडी पहाड़ी और मंदिर का महत्व

मैसूर की चामुंडी पहाड़ी और यहाँ स्थित चामुंडेश्वरी मंदिर का इतिहास एक हजार साल से भी पुराना माना जाता है। यह मंदिर शक्तिपीठ के रूप में दक्षिण भारत में विशेष पहचान रखता है। माना जाता है कि देवी चामुंडेश्वरी ने इसी स्थान पर महिषासुर का वध किया था और तभी से यह पहाड़ी धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण मानी जाती है।

मैसूर का दशहरा उत्सव चामुंडी देवी की पूजा से ही प्रारंभ होता है। यह परंपरा वाडियार शाही परिवार के शासनकाल से चली आ रही है और आज भी बड़ी श्रद्धा से निभाई जाती है। हर वर्ष लाखों श्रद्धालु यहाँ पहुँचते हैं और देवी की आराधना के साथ जंबू सवारी के भव्य जुलूस को देखते हैं। इस जुलूस में सजे-धजे हाथियों के साथ देवी की मूर्ति मैसूर महल से लेकर बन्नीमंतप तक ले जाई जाती है।

बानू मुश्ताक को न्योता भेजना बना विवाद कारण

मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने घोषणा की कि इस बार 22 सितंबर 2025 को दशहरा महोत्सव का उद्घाटन बुकर पुरस्कार विजेता बानू मुश्ताक करेंगी। 77 साल की लेखिका मूल रूप से कर्नाटक के हासन की रहने वाली हैं और उनकी कृति हार्ट लैंप (अनुवाद: दीपा भाष्थी) को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिला है।

इस घोषणा ने राजनीतिक विवाद को जन्म दिया। भाजपा और हिंदू संगठनों का कहना है कि देवी चामुंडेश्वरी के पूजन जैसे धार्मिक अनुष्ठान में किसी ऐसे व्यक्ति को आमंत्रित करना उचित नहीं है जो हिंदू धर्म का पालन न करता हो। भाजपा का तर्क है कि यह आस्था और परंपरा से खिलवाड़ है, सरकार इस पवित्र आयोजन को तुष्टिकरण की राजनीति में बदल रही है।

भाजपा की तीखी प्रतिक्रिया

राज्य भाजपा अध्यक्ष बीवाई विजयेंद्र ने शिवकुमार को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा कि कॉन्ग्रेस हिंदू परंपराओं का अपमान कर रही है। उन्होंने कहा की “पहले तुम कुत्ते की तरह भौंकते थे, अब मेंढक बन गए हो। अगर चामुंडी माता से खिलवाड़ करोगे तो राजनीतिक रूप से राख हो जाओगे।”

केंद्रीय मंत्री शोभा करंदलाजे ने भी कॉन्ग्रेस सरकार पर तुष्टिकरण का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि दशहरा कोई राजनीतिक मंच नहीं बल्कि देवी चामुंडेश्वरी की भक्ति और परंपरा का पर्व है। किसी ऐसे व्यक्ति से पहली पूजा करवाना, जिसका देवी में विश्वास ही नहीं है, भक्तों की आस्था का अपमान है।

मैसूर के पूर्व सांसद और भाजपा नेता प्रताप सिम्हा ने भी सवाल उठाया कि क्या बानू मुश्ताक देवी चामुंडी में विश्वास करती हैं? अगर नहीं, तो उन्हें उद्घाटन के लिए आमंत्रित करना परंपरा के खिलाफ है।

मैसूर के सांसद और शाही परिवार के सदस्य यदुवीर कृष्णदत्त चामराज वाडियार ने भी शिवकुमार की टिप्पणी को दुर्भाग्यपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि चामुंडी मंदिर सदियों पुरानी आस्था और परंपरा का प्रतीक है।

इसे राजनीतिक विवाद में घसीटना इस धार्मिक विरासत की गरिमा को ठेस पहुँचाता है। वाडियार ने स्पष्ट किया कि दशहरा मूल रूप से हिंदू परंपराओं से जुड़ा उत्सव है और इसमें हस्तक्षेप से बचना चाहिए।

कॉन्ग्रेस सरकार का बचाव

विवाद गहराने के बाद कॉन्ग्रेस सरकार के मंत्री सामने आए। गृह मंत्री जी परमेश्वर ने कहा “दशहरा केवल धर्म का आयोजन नहीं, बल्कि एक राजकीय उत्सव भी है। अतीत में निसार अहमद और मिर्जा इस्माइल जैसे गैर-हिंदू भी दशहरा उद्घाटन में शामिल रहे हैं। इसमें राजनीति करना गलत है।”

मंत्री एच के पाटिल ने भी कहा कि दशहरा सभी समुदायों के लिए खुला उत्सव है। इसे किसी एक धर्म तक सीमित करना कर्नाटक की सांस्कृतिक विविधता के साथ अन्याय होगा। कॉन्ग्रेस का कहना है कि भाजपा इस मुद्दे को राजनीतिक रूप से भुनाने की कोशिश कर रही है।

कॉन्ग्रेस सांसद सैयद नसीर हुसैन ने कहा, “बानू मुश्ताक एक साहित्यिक हस्ती हैं। उन्हें बुकर पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। वह हमारे राज्य की प्रगतिशील लेखिकाओं में से एक हैं। अगर उन्हें किसी कार्यक्रम के उद्घाटन के लिए आमंत्रित किया जाता है, तो इसमें किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। मेरा मानना है कि जो लोग उन पर टिप्पणी कर रहे हैं, वे केवल उनके मजहबी पृष्ठभूमि को ध्यान में रखकर ऐसा कर रहे हैं।”

इसके राजनीतिक असर की बात करे तो कर्नाटक में दशहरा उत्सव हमेशा से सांस्कृतिक गर्व और धार्मिक परंपरा का प्रतीक रहा है। लेकिन इस बार बानू मुश्ताक को आमंत्रित करने और डीके शिवकुमार के बयानों ने इसे राजनीति का अखाड़ा बना दिया है। भाजपा जहाँ इसे हिंदू आस्था पर हमला बताकर आक्रामक हो गई है, वहीं कॉन्ग्रेस इसे सभी के लिए खुला राजकीय आयोजन बताकर बचाव कर रही है।

6000 वोट, जमानत जब्त, जनता को नहीं उतारनी चाहिए थी ऐसी आरती: पुराना वीडियो शेयर कर ट्रोल कर रही थी कॉन्ग्रेस की ‘FLOP’ नेत्री रागिनी नायक, पत्रकार चित्रा त्रिपाठी ने याद दिला दी ‘औकात’

हाल ही में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर पत्रकार चित्रा त्रिपाठी और कॉन्ग्रेस प्रवक्ता रागिनी नायक के बीच तीखी बहस छिड़ गई है। यह विवाद तब शुरू हुआ जब रागिनी नायक ने चित्रा पर आरोप लगाते हुए एक पुराना वीडियो शेयर किया और उसमें बीजेपी का एजेंडा सेट करने वाला बताया। अब इस पोस्ट से शुरु हुआ विवाद ‘एंटरटेनमेंट विद पॉलिटिक्स’ बन गया है।

विवाद की शुरुआत

विवाद की शुरुआत होती है कॉन्ग्रेस प्रवक्ता रागिनी नायक के एक पुराने वीडियो पोस्ट से, जो उन्होंने 24 अगस्त 2025 को ‘X’ पोस्ट किया था। इस पोस्ट में रागिनी नायक ने आजतक चैनल के पुराने डिबेट का वीडियो डाला था। रागिनी नायक ने चित्रा त्रिपाठी पर ‘भाजपा का एजेंडा सेट करने’ और डिबेट में ‘भाजपा को कवर फायर देने‘ का आरोप लगाया गया था।

इसके जवाब में ABP की पत्रकार चित्रा त्रिपाठी ने 25 अगस्त 2025 को पोस्ट डाला। चित्रा त्रिपाठी ने पोस्ट में लिखा, “आपके कितने बुरे दिन आ गए हैं रागिनी जी, मुझे ट्रोल करने के लिये सालों पुराना वीडियो निकालना पड़ रहा है। मैं तो रोज डिबेट करती हूँ”

कॉन्ग्रेस प्रवक्ता रागिनी नायक ने भी तुरंत पलटवार किया और कहा, “भाजपा के चरणचुंबक पत्रकारों को अब जनता खुद ही ट्रोल कर रही है।” इसके अलावा रागिनी नायक ने यह भी कहा कि वह चित्रा की डिबेट में बार-बार आकर उनके ‘संघी एजेंडे’ को उजागर करती रहेंगी।

बहस में राजनीति और चुनाव का ज़िक्र

यह बहस यहीं नहीं रुकी। 27 अगस् 2025 को चित्रा त्रिपाठी ने रागिनी नायक पर फिर से तंज कसा। चित्रा त्रिपाठी ने ‘X’ पर पोस्ट किया कि ट्रोलर्स के कारण ही रागिनी को वज़ीरपुर विधानसभा चुनाव में केवल 6,000 वोट मिले थे और उनकी जमानत जब्त हो गई थी।

फिलहाल, दोनों में से किसी ने इस बहस को खत्म करने का संकेत नहीं दिया है और मामला अब न्यूज डिबेट से ज्यादा सोशल मीडिया शो बनता जा रहा है।

आलोचना और सवालों से ऊपर क्यों रहना चाहते हैं मिलॉर्ड… आप भगवान तो नहीं: लोकतंत्र में जवाबदेही सबकी बनेगी, अमित शाह के बयान के बाद किया जा रहा था जस्टिस रेड्डी का बचाव

गृहमंत्री अमित शाह ने इंडी गठबंधन की ओर से उपराष्ट्रपति के उम्मीदवार जस्टिस (रि) बी सुदर्शन रेड्डी को लेकर टिप्पणी की थी। इसके बाद कई पूर्व जजों और कार्यकर्ताओं की टोली जस्टिस (रि) बी सुदर्शन रेड्डी के बचाव में उतर आई थी। हालाँकि अब कुछ रिटायर्ड जजों के एक ग्रुप ने 26 अगस्त 2025 को चिट्ठी लिखकर साफ कर दिया है कि अमित शाह को निशाने पर लेने और रेड्डी के समर्थन में उतरने की कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि अमित शाह के बयान से न्यायपालिका खतरे में पड़ने नहीं जा रही।

ताज़ा पत्र में इन पूर्व जजों ने अपने साथियों को याद दिलाया कि जैसे ही कोई जज चुनावी मैदान में उतरता है, उसकी आलोचना होना स्वाभाविक है। इस जवाबी पत्र ने एक बड़ा सवाल उठाया कि आखिर मिलॉर्ड्स लोकतंत्र में आलोचना से ऊपर क्यों रहना चाहते हैं?

अमित शाह ने क्या कहा और क्यों?

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह 22 अगस्त 2025 को कोच्चि में मलयालम न्यूज़ चैनल मनोरमा के कार्यक्रम में पहुँचे थे। वहाँ उन्होंने कॉन्ग्रेस पर वामपंथी दबाव में झुककर जस्टिस रेड्डी को उपराष्ट्रपति उम्मीदवार बनाने का आरोप लगाया। शाह ने इस फैसले को रेड्डी के उस अतीत से जोड़ा, जब उन्होंने जस्टिस एसएस निज्जर के साथ मिलकर छत्तीसगढ़ में माओवादियों के खिलाफ तैनात सलवा जुडूम को भंग किया था।

अमित शाह ने कहा, “विपक्ष (कॉन्ग्रेस) के उपराष्ट्रपति उम्मीदवार सुदर्शन रेड्डी वही शख्स हैं, जिन्होंने वामपंथी उग्रवाद और नक्सलवाद के समर्थन में सलवा जुडूम का फैसला दिया। अगर ऐसा नहीं हुआ होता, तो 2020 तक वामपंथी उग्रवाद खत्म हो गया होता।” उन्होंने केरल के लोगों को याद दिलाया कि उनका राज्य भी नक्सलवाद और उग्रवाद का दंश झेल चुका है। शाह ने तर्क दिया कि कॉन्ग्रेस ने अपने वामपंथी सहयोगियों के दबाव में ऐसे व्यक्ति को ऊँचा पद दिया, जिससे उसका असली वैचारिक झुकाव ज़ाहिर होता है।

शाह का हमला न्यायपालिका के खिलाफ कोई आम राग नहीं था। यह एक प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवार के रिकॉर्ड पर सटीक राजनीतिक आलोचना थी, जो लोकतांत्रिक चुनावों में बिल्कुल सामान्य है।

जानें उस फैसले के बारे में, जिसकी बात हो रही है

आलोचना से जजों और कार्यकर्ताओं के समूह को इतनी चोट क्यों लगी, इसे समझने के लिए 2011 के सलवा जुडूम फैसले को देखना ज़रूरी है। सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस रेड्डी और निज्जर की बेंच ने छत्तीसगढ़ सरकार की उस नीति को रद्द कर दिया, जिसमें आदिवासी युवाओं को विशेष पुलिस अधिकारी (एसपीओ) बनाकर माओवादियों से लड़ने के लिए हथियार दिए गए थे। नंदिनी सुंदर और अन्य वामपंथियों ने राज्य सरकार के इस फैसले के खिलाफ याचिका दायर की थी। कोर्ट ने याचिका पर कार्रवाई की और सरकार को आदेश दिया कि वह इस बल को भंग करे, सभी हथियार वापस ले और युवाओं को माओवादी जवाबी हमलों से बचाए।

फैसले में यह भी कहा गया कि सलवा जुडूम या कोया कमांडो कहलाने वालों द्वारा किए गए मानवाधिकार उल्लंघन और अपराधों की जाँच हो। बेंच ने साफ किया कि कोई भी समूह कानून को अपने हाथ में नहीं ले सकता या संविधान से बाहर काम नहीं कर सकता।

बेंच ने कहा था, “किसी बल की प्रभावशीलता यह तय करने का एकमात्र आधार नहीं हो सकती कि वह संवैधानिक रूप से जायज़ है।” उसने जोड़ा कि भले ही एसपीओ माओवादियों से लड़ने में कुछ हद तक प्रभावी थे, लेकिन इन ‘संदिग्ध फायदों’ की कीमत संवैधानिक उल्लंघनों और सामाजिक व्यवस्था को भारी नुकसान के रूप में चुकानी पड़ी।

यह फैसला राज्य सरकार और केंद्र के लिए बड़ा झटका था, क्योंकि तमाम खामियों के बावजूद सलवा जुडूम माओवादियों के गढ़ में उनका मुकाबला करने का एकमात्र तरीका था। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप ने सुरक्षा बलों को कमज़ोर कर दिया। शाह का तर्क सीधा है – अगर न्यायपालिका ने दखल न दिया होता, तो नक्सलवाद के खिलाफ जंग 2020 तक खत्म हो सकती थी।

मिलॉर्ड रेड्डी के बचाव में उतरे कई मिलॉर्ड

शाह के बयान के दो दिन बाद 24 अगस्त को कुछ रिटायर्ड जजों और कार्यकर्ताओं ने एक पत्र जारी कर शाह पर हमला बोला। उन्होंने शाह पर फैसले को ‘गलत तरीके से पेश करने’ का आरोप लगाया और ज़ोर देकर कहा कि उस फैसले ने कभी नक्सलवाद का समर्थन नहीं किया। उन्होंने नसीहत दी कि ऊँचे पदों के लिए प्रचार गरिमा के साथ और विचारधारा पर सवाल उठाए बिना करना चाहिए।

साभार: LegallySpeakingTarun/X

पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों में पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज जैसे मदन लोकुर, जे. चेलमेश्वर, कुरियन जोसेफ, अभय ओका और एके पटनायक साथ ही हाई कोर्ट के पूर्व जज और कार्यकर्ता जैसे संजय हेगड़े और मोहन गोपाल शामिल थे। पत्र का लहजा काफी कड़ा था – कि एक नेता की हिम्मत कैसे हुई कि वो मिलॉर्ड के फैसले पर बयान दे दे। उन्होंने चेतावनी दी कि शाह के शब्दों से न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर ‘ठंडा असर’ पड़ सकता है। दूसरे शब्दों में मिलॉर्ड्स ने आलोचना से छूट माँगी, भले ही उनका एक साथी राजनीति के गंदे खेल में उतर चुका हो।

जवाबी प्रतिक्रिया में उतरे जज, जो सच देखते हैं

लेकिन जवाब जल्दी आया। रेड्डी के बचाव में उतरे जजों के काम से नाखुश कुछ और रिटायर्ड जज मैदान में उतने और अपना बयान जारी किया। उन्होंने कुछ रिटायर्ड जजों की उस आदत को उजागर किया, जिसमें वे न्यायपालिका की स्वतंत्रता की आड़ में पक्षपात छिपाते हैं। उन्होंने याद दिलाया कि जैसे ही जस्टिस रेड्डी ने उपराष्ट्रपति का चुनाव लड़ने का फैसला किया, वे राजनीति में उतर गए और उन्हें अपने रिकॉर्ड का बचाव करना होगा, जैसे बाकी उम्मीदवार करते हैं।

यह जवाबी बयान इसलिए अहम है, क्योंकि इसने यह धारणा तोड़ दी कि शाह की आलोचना न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर हमला है। उन्होंने तर्क दिया कि आलोचना से न्यायपालिका की स्वतंत्रता को खतरा नहीं होता। असल नुकसान तब होता है, जब रिटायर्ड जज बार-बार पक्षपातपूर्ण राजनीतिक बयान देते हैं, जिससे लगता है कि पूरी संस्था ही किसी एक राजनीतिक पक्ष के साथ खड़ी है।

साभार: X/Amit Malviya

एक तीखी बात में उन्होंने कहा कि कुछ जजों की गलती की वजह से पूरी जजों की बिरादरी को पक्षपातपूर्ण गिरोह के रूप में देखा जाता है। उन्होंने चेतावनी दी कि यह न तो न्यायपालिका के लिए अच्छा है और न ही लोकतंत्र के लिए।

जजों की आलोचना लोकतंत्र का अपमान नहीं

यही असली मुद्दा है। रिटायर्ड या मौजूदा जज भगवान नहीं हैं। वे पैगंबर नहीं हैं। वे इंसान हैं, जिनके फैसलों ने लाखों लोगों की ज़िंदगी पर असर डाला। ऐसे फैसले खासकर जो राष्ट्रीय सुरक्षा नीति को बदल दें, ज़रूर उनकी आलोचना होगी। यही लोकतंत्र का सार है।

लेकिन भारत में मिलॉर्ड्स को लगता है कि वे ऐसी किसी भी आलोचना से परे हैं। उन्हें लगता है कि उनके फैसलों की आलोचना संविधान पर हमला है। इससे ज़्यादा अलोकतांत्रिक कुछ हो ही नहीं सकता। अगर राजनेता, नौकरशाह, जनरल और मीडिया की सार्वजनिक आलोचना होती है, तो राजनीति में उतर चुके जज को आलोचना से छूट चाहिए ही क्यों? फिर भी वो इसकी उम्मीद करते हैं।

अभिव्यक्ति की आज़ादी कोर्टरूम के दरवाज़े पर खत्म नहीं होती। बल्कि लोकतंत्र की माँग है कि नागरिकों की सुरक्षा पर असर डालने वाले फैसलों की खुलकर आलोचना हो। शाह का बयान भले ही राजनीतिक रूप से तीखा था, लेकिन यह माओवादी उग्रवाद के रास्ते पर एक पुराने फैसले के प्रभाव पर जायज़ टिप्पणी थी।

इसे ‘गलत व्याख्या’ या ‘ठंडा असर’ कहना, व्याख्या पर एकाधिकार की माँग है, जैसे कि केवल न्यायपालिका को ही अपने शब्दों को समझाने का हक है। यह पाखंड तब और साफ हो जाता है, जब रिटायर्ड जज खुद न्यायपालिका की स्वतंत्रता की आड़ में राजनीतिक घोषणापत्र जारी करते हैं। एक तरफ किसी एक राजनीतिक खेमे के साथ पूरी तरह जुड़े पत्रों पर हस्ताक्षर करना और दूसरी तरफ यह शिकायत करना कि किसी राजनेता की आलोचना पक्षपातपूर्ण है – यह दोहरा खेल है और जनता भी इसे समझने लगी है।

लोकतंत्र का मतलब है सभी के लिए जवाबदेही

यह विवाद सिर्फ अमित शाह बनाम जस्टिस रेड्डी का नहीं है। यह लोकतंत्र में न्यायपालिका की भूमिका के बारे में है। जैसे ही जज राजनीति में कदम रखते हैं, उन्हें स्वीकार करना होगा कि उनके रिकॉर्ड की जाँच होगी। उनके फैसलों, खासकर जो राष्ट्रीय सुरक्षा नीतियों को बदलते हैं, की पड़ताल होगी और उनके वैचारिक झुकाव को जनता के सामने उजागर किया जाएगा। यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर हमला नहीं, बल्कि जवाबदेही की कीमत है।

न्यायपालिका सम्मान की हकदार है, लेकिन तभी जब वह राजनीति से ऊपर रहे। जब इसके रिटायर्ड सदस्य राजनीतिक किरदार की तरह व्यवहार करते हैं, तो वे आलोचना से छूट नहीं माँग सकते। अगर लोकतंत्र का कोई मतलब है, तो वह यह कि कोई भी संस्था या व्यक्ति सवालों से परे नहीं है।

तो मिलॉर्ड्स… जो लोग भी आलोचना होते ही हाय-तौबा मचाने लग जाते हैं, उन्हें याद दिला दिया जाए कि ‘आप भगवान नहीं हैं’ और न ही आप सवालों से परे हैं। क्योंकि लोकतंत्र आपके हिसाब से काम नहीं करता, बल्कि वो जनता के हिसाब से काम करता है।

इस लेख को मूल रूप से अंग्रेजी में अनुराग ने लिखा है। इसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें। इसका अनुवाद श्रवण शुक्ल ने किया है।