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संभल हिंसा के पीछे सपा सांसद जियाउर रहमान बर्क, हिंदू बस्तियों पर हमले-तीर्थ स्थलों पर कब्जे की थी साजिश: बाहर से बुलाए गए थे गुंडे, CM योगी को सौंपी 450 पन्ने की रिपोर्ट

उत्तर प्रदेश के संभल में 24 नवंबर 2024 को हुई हिंसा पर आई 450 पन्नों की 3 सदस्यीय समिति की रिपोर्ट में बड़ा खुलासा हुआ है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि यह दंगा अचानक नहीं भड़का बल्कि इसे पूर्वनियोजित साजिश के तहत अंजाम दिया गया था। इसमें कई राजनीतिक और मजहबी किरदारों की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं, जो अब कठघरे में खड़े नजर आ रहे हैं।

सपा सांसद के बयान के बाद भड़की हिंसा

रिपोर्ट के अनुसार, 22 नवंबर को समाजवादी पार्टी के सांसद जियाउर रहमान बर्क ने नमाजियों को संबोधित करते हुए विवादित बयान देते हुए कहा था, “हम इस देश के मालिक हैं, नौकर-गुलाम नहीं। मस्जिद थी है और कयामत तक रहेगी। अयोध्या में हमारी मस्जिद ले ली गई, यहाँ ऐसा नहीं होने देंगे।”

इस भाषण का कन्वर्टेड हिंदू पठानों ने विरोध किया, जिससे तुर्क और पठान समुदाय आमने-सामने आ गए। 24 नवंबर को यही तनाव हिंसा में बदल गया। रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि इस साजिश में सांसद बर्क, विधायक के बेटे सुहैल इकबाल और जामा मस्जिद की इंतजामिया कमेटी की बड़ी भूमिका रही थी।

हिंदुओं पर हमले और तीर्थ स्थलों पर कब्जे की थी साजिश

रिपोर्ट में यह भी दर्ज है कि दंगे की आड़ में 68 तीर्थ स्थलों और 19 पावन कूपों पर कब्जे की कोशिश की गई। हरिहर मंदिर को भी निशाना बनाया गया, जिसने बाबर काल की यादें ताजा कर दीं।

इसके बाद योगी सरकार ने इन स्थलों के पुनरुद्धार की योजना बनाई और 30 मई 2025 को इसका शिलान्यास किया। दंगे को बढ़ाने के लिए बाहरी उपद्रवियों को बुलाया गया और हिंदू मोहल्लों को निशाना बनाने की योजना बनाई गई लेकिन पुलिस की कड़ी तैनाती से इनका यह मंसूबा विफल हो गया। फिर भी, तुर्क और पठान समुदायों के बीच हुई क्रॉस फायरिंग में चार लोगों की मौत हुई।

रिपोर्ट के मुताबिक 1936 से 2019 तक यहाँ 73 दिन कर्फ्यू लगा, जिसमें 1948 में 20 दिन, 1978 में 30 दिन और 2019 में सीएए हिंसा के दौरान 6 दिन शामिल हैं। रिपोर्ट में संभल को आतंकी संगठनों और अवैध हथियारों का अड्डा बताया गया है। अलकायदा और हरकत-उल-मुजाहिद्दीन की गतिविधियों का जिक्र है और अमेरिका द्वारा आतंकी घोषित मौलाना आसिम का कनेक्शन भी संभल से जुड़ा बताया गया।

डेमोग्राफी में भी बड़ा बदलाव हुआ है, आजादी के समय 55% मुस्लिम और 45% हिंदू थे लेकिन अब हिंदू घटकर 15% और मुस्लिम बढ़कर 85% हो गए हैं। 1947 से 2019 तक यहाँ 15 बड़े दंगे हुए जिनका सबसे ज्यादा असर हिंदू समाज पर पड़ा है।

अब AI भी हुआ ‘हलाल’, अरबी-अंग्रेजी में करता है बात: जानिए सऊदी अरब की कंपनी ने क्यों किया लॉन्च, कैसे इस्लामी रवायतों को करेगा प्रमोट

सऊदी एआई कंपनी हुमैन (Humain) ने एक अरबी भाषा का एआई चैटबॉट लॉन्च किया है। कंपनी ने इसे दुनिया का पहला ‘हलाल एआई’ होने का दावा किया है। कंपनी का कहना है कि यह अरबी भाषा, इस्लामी रिवायत, मूल्यों और विरासत को लेकर संवेदनशील है।

क्या है हलाल एआई ( Halal AI)

अरबी भाषा में तैयार किए गए चैटबॉट हुमैन चैट (Humain Chat) यानी हलाल एआई अंग्रेजी और अरबी, दोनों भाषाओं में आसानी से स्विच कर सकता है। इसके अलावा मिस्र, लेबनानी सहित कई बोलियों को भी आसानी से समझ सकता है और जवाब दे सकता है। यूजर्स टेक्स्ट या वॉइस के जरिए इससे सवाल पूछ सकते हैं। इसमें रियल टाइम सर्च बेस्ड जवाब मिल जाते हैं। इतना ही नहीं बातचीत को शेयर भी किया जा सकता है।

Humain Chat चैटबॉट की तकनीक का आधार ‘ALLAM 34B’ है। यह एक लार्ज लैंग्वेज मॉडल (LLM) है, जिसे आठ पेटाबाइट से ज्यादा डेटा पर प्रशिक्षित किया गया है। इसे सबसे बड़ा अरबी डेटासेट माना जा रहा है।

कंपनी के मुताबिक, हुमैन चैट कंपनी के अल्लाम लार्ज लैंग्वेज मॉडल (Allam model) पर आधारित है, जिसे अब तक के सबसे बड़े अरबी डेटासेट पर तैयार किया गया है।

यह चैटबॉट सबसे पहले सऊदी अरब में उपलब्ध कराया जाएगा। ये वेब, IOS, Android तीनों पर उपलब्ध होगा। उसके बाद इसे मध्य पूर्व और दुनिया के बाकी हिस्सों में भी लॉन्च किया जाएगा।

इस्लाम की बारीकियाँ ह्यूमेन चैट को पता है- कंपनी

कंपनी का कहना है कि अल्लाम मॉडल को ‘इस्लामी, मध्य पूर्वी और सांस्कृतिक बारीकियों’ वाले डेटा सेट पर प्रशिक्षित किया गया है। यह दुनिया के अग्रणी चैटबॉट ChatGPT जैसा ही है, जिसके डेवलपर OpenAI का कहना है कि इसे पश्चिमी मूल्यों के अनुरूप बनाया गया है। ह्यूमेन चैट ऐसे समय में लॉन्च हुआ है, जब स्टार्टअप और दूसरी कंपनियाँ एआई तकनीक में आगे निकलने की होड़ में हैं।

सऊदी अरब की पब्लिक फंड के पैसे से बना ह्यूमेन चैट

सऊदी सॉवरेन वेल्थ फंड के स्वामित्व वाली ह्यूमेन चैट को सऊदी पब्लिक इनवेस्टमेंट फंड से मदद मिली है। कंपनी एआई इकोसिस्टम, इंफ्रास्ट्रक्चर, क्लाउड, डाटा और एप्लिकेशन पर फोकस कर रही है। इसको अबू धाबी सरकार की फाल्कन अरेबिक मॉडल से चुनौती मिल सकती है। अबु धाबी की सरकारी अनुसंधान संस्थान ने साल 2025 की शुरुआत में इसे लॉन्च किया था।

ह्यूमेन चैट की घोषणा मई में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की सऊदी अरब यात्रा से एक दिन पहले की गई थी। सऊदी अरब ने इस दौरान एआई की बुनियादी ढाँचा बनाने के लिए अमेरिकी प्रौद्योगिकी कंपनियों के साथ अरबों डॉलर के समझौते किए थे।

सऊदी अरब में स्टोर होगा यूजर्स का डाटा

कंपनी का कहना है कि ह्यूमेन चैट पूरी तरह से सऊदी अरब के पर्सनल डाटा प्रोटेक्शन लॉ को मानने वाला है। इसके यूजर्स की सारी जानकारी देश में ही स्टोर किया जाता है, ताकि प्राइवेसी बनी रहे।

उद्योगों में अंग्रेजी भाषा के वर्चस्व के बीच ह्यूमेन चैट दुनिया के 38 करोड़ अरबी-भाषियों को उनकी मूल भाषा में सेवाएँ प्रदान करने में सक्षम होगी।

कंपनी का मानना है कि अनुवाद में सक्षम होने के बावजूद, दुनिया की अग्रणी एआई कंपनियों के चैटबॉट डिफ़ॉल्ट रूप से अंग्रेजी में ही काम करते हैं, क्योंकि इनके डेटासेट अंग्रेजी में होते हैं।

चैटजीपीटी, गूगल जेमिनी और चीन के डीपसीक की तुलना में अल्लाम और फाल्कन जैसे मॉडल अरबी भाषा में विस्तार से आउटपुट देने में ज्यादा सक्षम हैं।

ब्रिटेन के 85 इलाकों में पसरा है पाकिस्तानी बलात्कारियों का गैंग, ड्रग्स-गिफ्ट से फँसाते हैं: ब्रिटिश MP की रिपोर्ट से खुलासा, बताया- 60 के दशक से एक्टिव हैं ‘ग्रूमिंग गैंग्स’

ब्रिटेन के सांसद रूपर्ट लोव की अगुवाई में हुई एक निजी जाँच में हैरान करने वाले खुलासे हुए हैं। जाँच में ब्रिटेन के कम से कम 85 इलाकों में गैंग बनाकर बच्चों का यौन शोषण किए जाने के मामलों का पता चला है।

शोषण की ये घटनाएँ ना केवल मौजूदा वक्त में हो रही हैं बल्कि कई घटनाएँ 1960 के दशक से चली आ रही हैं। जाँच रिपोर्ट का दावा है कि इस घिनौने कांड में शामिल अधिकतर आरोपी पाकिस्तानी मूल के युवक हैं।

इस रिपोर्ट में कहा गया है कि सैकड़ों पीड़ित, उनके परिजन और व्हिसलब्लोअर्स सामने आए हैं, जिन्होंने अपनी दर्दनाक कहानियाँ बताई है। कई पीड़िताएँ बचपन में ही गैंग्स के निशाने पर आ गईं, उन्हें गिफ्ट्स और झूठे वादों से फँसाया गया, नशा दिया गया और फिर बार-बार बलात्कार का शिकार बनाया गया।

इन मामलों में हैरानी की बात ये रही कि अक्सर पुलिस और प्रशासन ने इन घटनाओं के संकेतों को नजरअंदाज किया और पीड़ितों को गंभीरता से नहीं लिया गया।

रूपर्ट लोव की जाँच और सरकार पर दबाव

सांसद रूपर्ट लोव ने अपनी जाँच टीम के साथ देशभर में सफर किया और सबूत जुटाए। उन्होंने हजारों ‘फ्रीडम ऑफ इन्फॉर्मेशन’ (सूचना अधिकार जैसी व्यवस्था) के तहत माँगी गई रिपोर्टों और सैकड़ों गवाहों के बयानों के आधार पर यह खुलासा किया है।

लोव का कहना है ‘सड़ी-गली सच्चाई’ पहले से सोची गई तुलना में कहीं ज्यादा गहरी है। उनके अनुसार, “‘”सैकड़ों, हजारों जिंदगियाँ इन पाकिस्तानी गैंग्स के हाथों बर्बाद हो चुकी हैं।”

उन्होंने लेबर सरकार पर भी तीखा हमला बोला और आरोप लगाया कि सरकार ने अब तक कोई  ठोस कदम नहीं उठाए हैं। लोव ने कहा, “दो महीने से ज्यादा हो गए, लेबर ने पूरे देश में एक्शन लेने का वादा किया था, लेकिन अब तक कुछ नहीं हुआ। पीड़ितों का संदेश साफ है, बस बहुत हो चुका। अब समय है सख्त कदम उठाने का।”

लोव ने यह भी ऐलान किया कि उनकी जाँच समिति संसद में एक रिपोर्ट पेश करेगी, जिसमें पारदर्शिता, जवाबदेही और पीड़ितों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उचित कदम सुझाए जाएँगे।

उन्होंने यहाँ तक कहा कि अगर कोई विदेशी नागरिक ऐसे अपराधों में शामिल पाया जाता है या चुपचाप जानकर भी कुछ नहीं करता, तो उसे तुरंत ब्रिटेन से बाहर निकाला जाना चाहिए।

रोदरहैम से अब तक का काला सच

ब्रिटेन में ग्रूमिंग गैंग्स की समस्या कोई नई नहीं है। साल 2014 में प्रोफेसर एलेक्सिस जे की रिपोर्ट ने रोदरहैम इलाके में 1997 से 2013 के बीच कम से कम 1400 बच्चियों के यौन शोषण का पर्दाफाश किया था।

उस रिपोर्ट में साफ कहा गया था कि स्थानीय प्रशासन और पुलिस ने जानबूझकर इन घटनाओं को दबाया, क्योंकि उन्हें डर था कि कहीं उन पर नस्लभेदी होने का ठप्पा न लग जाए। यह रवैया ही अपराधियों को खुली छूट देता रहा।

अब नई जाँचों में और भी चौंकाने वाले तथ्य सामने आ रहे हैं। कुछ पीड़िताओं ने तो यह तक आरोप लगाया कि साउथ यॉर्कशायर पुलिस के कुछ अधिकारी भी पाकिस्तानी गैंग्स के साथ मिलकर उनका शोषण करते रहे। कई पीड़िताओं के बयान फाड़कर कूड़े में फेंक दिए गए, ताकि अपराध कभी दर्ज ही न हो सके।

एक पीड़िता ने बताया कि उसे 12 साल की उम्र में ही पुलिस की गाड़ी में बलात्कार का शिकार बनाया गया। वहीं, कई बच्चियों को नशा देकर गर्भपात के लिए मजबूर किया गया। इन घटनाओं ने पीड़िताओं का पुलिस और कानूनी व्यवस्था से पूरा भरोसा तोड़ दिया। हालांकि हाल के वर्षों में कुछ पूर्व पुलिस अधिकारी गिरफ्तार किए गए हैं, लेकिन सजा का इंतजार अब भी लंबा है।

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अकाउंट: 56.16 करोड़, डिपॉजिट: ₹2.68 लाख करोड़, महिला खाताधारक: 31.31 करोड़… जानिए कैसे 11 साल में ‘प्रधानमंत्री जन धन’ से आम आदमी की मुट्ठी में आए बैंक

प्रधानमंत्री जन धन योजना के 11 साल पूरे हो गए। अब से ग्यारह साल पहले भारत आर्थिक रूप से बहुत अलग था। करोड़ों लोग ऐसे थे जिनके पास न तो कोई बैंक खाता था और न ही औपचारिक वित्तीय सेवाओं तक पहुँच। खासकर ग्रामीण और पिछड़े इलाकों में आम लोग अपनी मेहनत की कमाई घर में रखते थे या फिर ऊँचे ब्याज पर साहूकारों से कर्ज लेते थे। नतीजा यह होता कि गरीबी और कर्ज का बोझ कभी कम नहीं होता। आर्थिक सुरक्षा तो उन परिवारों के लिए दूर का सपना था।  

ऐसे माहौल में 28 अगस्त 2014 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री जन धन योजना (PMJDY) की शुरुआत की। इसका मकसद सीधा था, ‘हर भारतीय को बैंकिंग से जोड़ना, हर परिवार को वित्तीय पहचान देना और हर नागरिक को आर्थिक सुरक्षा दिलाना।’

इस योजना ने बैंकिंग की दुनिया को आम आदमी के दरवाजे तक पहुँचा दिया। जीरो बैलेंस खाते, आसान केवाईसी प्रक्रिया, रुपे डेबिट कार्ड और बीमा जैसी सुविधाओं ने गरीबों के लिए बैंक को सहज और सुलभ बना दिया।

ग्यारह साल का सफर और उपलब्धियाँ

ग्यारह साल के इस सफर में जन धन योजना ने जो बदलाव किए, वे अपने आप में ऐतिहासिक हैं। आज 56 करोड़ से ज्यादा जन धन खाते खोले जा चुके हैं। इन खातों में जमा राशि बढ़कर 2.67 लाख करोड़ रुपए तक पहुँच गई है, जबकि 2015 में यह महज़ 15,670 करोड़ रुपए थी।

इस योजना की सबसे अहम खासियत यह रही कि इसका सबसे बड़ा फायदा गरीब और ग्रामीण भारत को मिला। करीब 67% खाते गाँव और अर्ध-शहरी इलाकों में खुले और खास बात यह है कि कुल खातों में 56% महिलाओं के नाम पर हैं।

यानी पहली बार लाखों महिलाएँ अपनी आर्थिक पहचान के साथ बैंकिंग सिस्टम का हिस्सा बनीं। इन खातों के साथ सरकार ने सीधे लाभ पहुँचाने की व्यवस्था भी खड़ी की। अब मनरेगा की मजदूरी हो, गैस सब्सिडी हो या किसी अन्य योजना का लाभ सारा पैसा सीधे लाभार्थी के खाते में जाता है। बिचौलियों की भूमिका खत्म हो गई और लोगों का विश्वास भी बैंकिंग व्यवस्था में बढ़ा है।

महिलाओं और गरीबों के जीवन में बदलाव

जन धन योजना सिर्फ आँकड़ों तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसने करोड़ों परिवारों की जिंदगी बदल दी। गाँव की महिलाएँ, जो पहले नकद बचत रखती थीं, अब अपने खाते में पैसा जमा करती हैं।

दिहाड़ी मजदूरों और छोटे किसानों को सीधे खातों में मजदूरी और सब्सिडी मिलती है। दुर्घटना बीमा और ओवरड्राफ्ट सुविधा ने गरीब परिवारों को आकस्मिक हालात में सहारा दिया।

इस योजना ने डिजिटल भुगतान को भी नई गति दी है। अब तक 38 करोड़ से ज्यादा रुपे कार्ड जारी हो चुके हैं। यूपीआई और डिजिटल लेन-देन में भारत ने दुनिया में नेतृत्व हासिल किया है और इसमें जन धन योजना की बड़ी भूमिका रही है।

बने नए रेकॉर्ड और विश्व पहचान

जन धन योजना ने दुनिया में भी भारत का नाम रोशन किया। गिनीज वर्ल्ड रेकॉर्ड्स में इसका नाम शामिल हुआ जब सिर्फ एक हफ्ते में 1.8 करोड़ खाते खोले गए। यह किसी भी देश में अब तक की सबसे बड़ी वित्तीय समावेशन पहल साबित हुई।

ग्यारह सालों में औसत जमा राशि भी कई गुना बढ़ी है। 2015 में एक खाते में औसतन 1,300 रुपए रहते थे, जो अब बढ़कर लगभग 4,768 रुपए हो गए हैं। इसका मतलब है कि लोग न सिर्फ खाते खोल रहे हैं बल्कि नियमित रूप से उनमें बचत भी कर रहे हैं।

साल 2024-25 में ही करीब 6.9 लाख करोड़ रुपए विभिन्न सरकारी योजनाओं के तहत सीधे खातों में ट्रांसफर किए गए। यह सरकार की पारदर्शिता और जन धन योजना की सफलता का जीता-जागता सबूत है।

वित्तीय आजादी की ओर कदम

ग्यारह साल बाद आज साफ दिखता है कि प्रधानमंत्री जन धन योजना ने गरीब और वंचित तबकों की जिंदगी में वास्तविक बदलाव लाया है। यह केवल बैंक खाता खोलने की योजना नहीं रही, बल्कि सम्मान और आत्मनिर्भरता देने की एक राष्ट्रीय मुहिम बन चुकी है।

महिलाओं को आर्थिक ताकत मिली है, ग्रामीण इलाकों तक बैंकिंग की पहुँच हुई है और सरकारी योजनाओं का लाभ सीधे जनता तक पहुँचने लगा है। इस योजना ने भारत में वित्तीय समावेशन की परिभाषा बदल दी है।

रूस-यूक्रेन युद्ध तो असल में ‘मोदी का वॉर’… जहर उगलने से बाज नहीं आ रहा डोनाल्ड ट्रंप का सलाहकार पीटर नवारो: हर चीज के लिए बता रहा भारत को जिम्मेदार

अमेरिका आजकल भारत को नसीहत दे रहा है, उसकी बुराई कर रहा है और रूस-यूक्रेन युद्ध के लिए भारत को जिम्मेदार ठहरा रहा है। ये ट्रंप प्रशासन के अधिकारियों का रोज का काम बन गया है और भारतीयों के लिए मीम मटेरियल। मगर अब ट्रंप के व्यापार सलाहकार पीटर नवारो ने दावा किया कि यूक्रेन-रूस युद्ध किसी तरह ‘मोदी का युद्ध’ है, सिर्फ इसलिए क्योंकि भारत रूस से तेल खरीदता है।

ब्लूमबर्ग को दिए इंटरव्यू में व्हाइट हाउस के व्यापार सलाहकार पीटर नवारो ने भारत को इस बात के लिए जिम्मेदार ठहराया कि अमेरिका और यूरोप को यूक्रेन को रूस के हमले के खिलाफ फंडिंग करनी पड़ रही है।

नवारो ने गुस्से में कहा, “यूक्रेन हमसे और यूरोप से कहता है कि हमें और पैसे दो (युद्ध के लिए)। भारत जो कर रहा है, उसकी वजह से अमेरिका में सब हार रहे हैं। ग्राहक और कारोबारी हार रहे हैं; मजदूर हार रहे हैं क्योंकि भारत के ऊँचे टैरिफ की वजह से नौकरियाँ, कमाई और ज्यादा तनख्वाह का नुकसान हो रहा है। टैक्स देने वाले हार रहे हैं क्योंकि हमें मोदी के युद्ध को फंड करना पड़ रहा है।”

नवारो ने आगे कहा, “शांति का रास्ता कम से कम कुछ हद तक नई दिल्ली से होकर गुजरता है।” व्हाइट हाउस के व्यापार सलाहकार ने भारत को ‘घमंडी’ करार दिया क्योंकि वो अपनी ऊर्जा जरूरतों को प्राथमिकता देता है और सलाह दी कि उसे ‘लोकतंत्रों का साथ देना चाहिए।’

नवारो ने कहा, “भारतीय लोग इस बारे में बहुत घमंडी हैं। वो कहते हैं हमारे टैरिफ ऊँचे नहीं हैं। ये हमारा हक है। हम जिससे चाहें तेल खरीद सकते हैं। भारत तुम दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र हो। ठीक है? तो वैसे ही बर्ताव भी करो। लोकतंत्रों का साथ दो।”

नवारो ने भारत पर चीन के साथ रिश्ते सुधारने के लिए भी हमला बोला, मॉस्को और बीजिंग के साथ भारत के बढ़ते रिश्तों पर गुस्सा जाहिर किया, जिन्हें उन्होंने ‘तानाशाह’ बताया।

नवारो ने कहा, “तुम तानाशाहों के साथ जा रहे हो। चीन, तुम दशकों से उनके साथ चुपके-चुपके जंग लड़ रहे हो। उसने अक्साई चिन और तुम्हारी जमीन पर कब्जा किया। ये तुम्हारे दोस्त नहीं हैं, दोस्तों। ठीक है? और रूस.. अरे, चलो न।”

नवारो के बयान तब आए जब डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन द्वारा भारतीय सामान पर 50 फीसदी टैरिफ लागू हुआ, जो बुधवार (27 अगस्त 2025) से शुरू हो गया। 50 फीसदी टैरिफ में से 25 फीसदी इसलिए लगाया गया क्योंकि भारत रूस से तेल और सैन्य उपकरण खरीद रहा है, जिसे विदेश मंत्रालय ने ‘बेहद दुर्भाग्यपूर्ण’ बताया और अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने की बात दोहराई।

नवारो ने कितनी आसानी से रूस-यूक्रेन युद्ध को ‘मोदी का युद्ध’ कह दिया, जैसे कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दोनों देशों को लड़ने के लिए कहा हो ताकि भारत उससे पैसे कमा सके। अगर ये रूस और यूक्रेन के अलावा किसी का युद्ध है, तो वो अमेरिका का है। रूस-यूक्रेन युद्ध से किसी ने ज्यादा फायदा नहीं उठाया जितना अमेरिका ने।

भारत पर ‘रूसी युद्ध मशीन’ को बढ़ावा देने का आरोप लगाने से लेकर अब बिना सोचे-समझे रूस-यूक्रेन युद्ध को ‘मोदी का युद्ध’ कहने तक, अमेरिका ने अपने कामों पर गौर करना छोड़ दिया। जब नवारो भारत पर हमला बोल रहे हैं, तब 16 अगस्त को अलास्का में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ मुलाकात में पता चला कि पिछले कुछ महीनों में अमेरिका-रूस का द्विपक्षीय व्यापार 20 फीसदी से ज्यादा बढ़ गया है, जिससे ट्रंप के उन दावों की पोल खुलती है कि अमेरिका मॉस्को पर युद्ध खत्म करने का दबाव डाल रहा है।

खास बात ये है कि 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से अमेरिकी तेल कंपनियों ने रिकॉर्ड मुनाफा कमाया है। लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) निर्यात, हथियार बिक्री और युद्ध से जुड़े कई मौकों से अमेरिका इस युद्ध का सबसे बड़ा फायदा उठाने वाला है।

अमेरिका ने यूरोप को अपना सस्ता LNG घरेलू कीमत से चार गुना ज्यादा कीमत पर बेचा, जिसे ‘युद्ध की वजह से आपूर्ति में रुकावट’ बताया गया और यूरोप की वैकल्पिक जरूरतों का फायदा उठाया। 2022 में अमेरिकी तेल और गैस कंपनियों जैसे शेवरॉन और एक्सॉनमोबिल ने युद्ध से पहले 2021 की तुलना में 125 फीसदी ज्यादा मुनाफा कमाया।

हाल ही में एक्सॉन मोबिल रूस के सखालिन-1 तेल और गैस प्रोजेक्ट में वापसी की योजना बना रहा है। अलास्का में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और उनके अमेरिकी समकक्ष के बीच मुलाकात में रूस को अपने लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) प्रोजेक्ट्स, जैसे आर्कटिक LNG 2 के लिए अमेरिकी उपकरण खरीदने की इजाजत देने पर बात हुई, भले ही ये अभी प्रतिबंधों के तहत है। रूस को ‘सजा’ देने और पुतिन की ‘युद्ध मशीन’ को रोकने की बात तो दूर की है।

ऊर्जा के अलावा अमेरिका ने रूस-यूक्रेन युद्ध से अपनी रक्षा निर्यात के जरिए भी फायदा उठाया। अमेरिका ने यूक्रेन को 19 अरब डॉलर से ज्यादा के सैन्य उपकरण दिए, जिससे लॉकहीड मार्टिन और रेथियॉन जैसी अमेरिकी रक्षा कंपनियों के शेयरों की कीमत बढ़ गई।

ये भी नहीं भूलना चाहिए कि अमेरिका ने बेशर्मी से दावा किया कि यूक्रेन को दी जाने वाली रक्षा आपूर्ति अमेरिकी अर्थव्यवस्था को मजबूत कर रही है। पहले अमेरिका 95 अरब डॉलर का एक अतिरिक्त रक्षा बिल लाया, जिसमें यूक्रेन के लिए 60.7 अरब डॉलर रखे गए और वादा किया कि इसके 64 फीसदी फंड अमेरिकी रक्षा उद्योग को ‘पुनर्जीवित’ करेंगे।

अब डोनाल्ड ट्रंप यूरोपीय देशों के जरिए यूक्रेन को हथियार बेच रहे हैं, वो भी 10 फीसदी ज्यादा कीमत पर, ताकि अमेरिका का खजाना भरे, जबकि रूस और यूक्रेन के लोग अपनी जान गँवा रहे हैं। ट्रंप ने यूक्रेन को सुरक्षा गारंटी देने की अमेरिकी भागीदारी की कीमत भी तय कर दी है।

जब अमेरिका यूक्रेन के लिए यूरोप को 10 फीसदी ज्यादा कीमत पर हथियार बेचता है, तो ये ठीक है। लेकिन जब भारत अपनी जरूरतों के लिए रूसी तेल खरीदता है और अपने पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स यूरोप और अमेरिका को बेचता है, तो भारत रूसी युद्ध मशीन को बढ़ावा दे रहा है और ये अचानक मोदी का युद्ध बन जाता है।

अमेरिका ने रूस-यूक्रेन युद्ध से मुनाफा कमाया और अब शांति की दलाली करके भी मुनाफा कमाने की कोशिश कर रहा है। अगर रूस-यूक्रेन युद्ध को खत्म करने की शांति वार्ता में युद्धविराम, क्षेत्रीय वापसी या स्थायी शांति की गारंटी से ज्यादा अमेरिका को रूस और यूक्रेन से लाभकारी व्यापार सौदे मिल रहे हैं, तो साफ है कि अमेरिका को शांति नहीं, सिर्फ मुनाफा चाहिए।

रूस-यूक्रेन युद्ध से मुनाफा कमाने के अलावा अमेरिका ने मॉस्को के साथ अपने व्यापारिक रिश्ते भी जारी रखे हैं। गैर-लौह धातु, उर्वरक, अकार्बनिक रसायन, परमाणु रिएक्टर और मशीनरी, तैयार पशु चारा, लोहा और इस्पात और तिलहन आदि में अमेरिका का रूस से आयात लगातार बना हुआ है और कुछ मामलों में बढ़ा भी है। ये सब तब हो रहा है जब पश्चिम ने रूस पर कई प्रतिबंध लगाए हैं और उसकी अर्थव्यवस्था को कमजोर करने का दावा करता है।

यूरोप और अमेरिका को भारत के रूसी तेल खरीदने से दिक्कत है, लेकिन रूसी कच्चे तेल से बने पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स खरीदने में उन्हें कोई परेशानी नहीं है। बात सीधी है, अगर पसंद नहीं तो मत खरीदो। लेकिन अमेरिका खरीदता है, यूरोप खरीदता है। अगर पश्चिम को रूसी तेल से बने पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स खरीदने में खुद से नफरत नहीं है, तो भारत को उसी के लिए विलेन नहीं बनाना चाहिए।

अगर भारत नहीं होता, तो वैश्विक ऊर्जा की कीमतें आसमान छूतीं, जिससे संकट पैदा होता, लेकिन भारत रूसी युद्ध मशीन को बढ़ावा दे रहा है।

अमेरिका रूस के साथ व्यापार कर रहा है। यूक्रेन को हथियार बेचकर अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत कर रहा है। रूस को बाजार से बाहर करके यूरोप को अपने प्रोडक्ट्स बेच रहा है। लेकिन भारत रूस-यूक्रेन युद्ध से मुनाफा कमा रहा है, उसका जोर इसी झूठ को जोर-शोर से फैलाने पर है, ताकि वो खुद का चेहरा बचा सके और भारत को विलेन साबित कर सके।

मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में श्रद्धा पाण्डेय ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

आंतकी संगठनों का अड्डा बना संभल, सिर्फ 15% बचे हिंदू और मस्जिद में मिले हरिहर मंदिर के सबूत: पढ़ें CM योगी को सौंपी गई आयोग की रिपोर्ट की बड़ी बातें

उत्तर प्रदेश के संभल में पिछले साल हुई हिंसा के बाद गठित समिति ने गुरुवार (28 अगस्त 2025) को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को अपनी रिपोर्ट सौंप दी है। करीब 450 पन्नों की इस रिपोर्ट में कई अहम दावे किए गए हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि आजादी के वक्त यहाँ पर करीब 45% हिंदू थे जो अब घटकर 15-20% फीसदी रह गए हैं। रिपोर्ट में मस्जिद में हरिहर मंदिर के साक्ष्य मिलने का भी जिक्र है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इस रिपोर्ट में 24 नवंबर 2024 को संभल में हुई हिंसा के बारे में बताए जाने के साथ ही संभल के इतिहास में कब-कब कितने दंगे हुए और उन दंगों में क्या-क्या हुआ, इसके बारे में भी विस्तार से जानकारी दी गई है।

बदल गई संभल की डेमोग्राफी

इस रिपोर्ट में डेमोग्राफी में आए बदलाव को लेकर भी बड़ा खुलासा किया गया है। रिपोर्ट में बताया गया है कि संभल नगरपालिका में आजादी के समय 45% हिंदू थे, जो आज घटकर 15% से 20% ही रह गए हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, दंगे और तुष्टीकरण की राजनीति की वजह से हिंदू आबादी ने यहाँ से पलायन किया। यही वजह है कि डेमोग्राफी में बदलाव देखा गया। संभल में जिस तरह से मुस्लिमों ने हिंदुओं पर अत्याचार किया और दंगे भड़काए, यह हिंदुओं के पलायन की एक मुख्य वजह बनी। स्थानीय लोगों का भी यहीं कहना है कि आज की अपेक्षा संभल में पहले हिंदुओं की आबादी अधिक थी।

आजादी के बाद संभल में हुए 15 बड़े दंगे

इस रिपोर्ट में दावा किया गया है कि आजादी के बाद संभल में 15 बड़े दंगे हुए हैं। इसमें बताया गया है कि संभल में 1947, 1948, 1953, 1958, 1962, 1976, 1978, 1980, 1990, 1992, 1995, 2001, 2019 में दंगे हुए थे।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, 2019 में सीएए उपद्रव के दौरान चार दिन का कर्फ्यू लगा था। इसके अलावा 1948 में 20 दिन, 1958 में 2 दिन, 1976 में 7 दिन, 1978 में 30 दिन, 1992 में 8 दिन, 2019 में करीब 6 दिन बाजार बंद रहे थे।

आतंकी संगठनों का बना अड्डा, विदेशी हथियार मिले

रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस रिपोर्ट में दावा किया गया है कि संभल कई सारे आतंकवादी संगठनों का अड्डा बन चुका है। इसमें अलकायदा, हरकत उल मुजाहिद्दीन जैसे आतंकवादी संगठन शामिल हैं।

संभल में हुए दंगों में विदेशी हथियारों का इस्तेमाल होने की जानकारी भी सामने आई है। इस मामले के लिए बनाए गए न्यायिक आयोग को इस बात के साक्ष्य मिले हैं कि संभल में अमेरिका में बने हथियारों का इस्तेमाल किया गया था।

पूर्व नियोजित थी 24 नवंबर की हिंसा

24 नवंबर 2024 की हिंसा को लेकर रिपोर्ट में दावा किया गया है कि यह हिंसा पूर्वनियोजित और षड्यंत्र का नतीजा थी। सांसद जिया-उर-रहमान बर्क ने नमाजियों को उकसाने के लिए कहा था कि हम इस देश के मालिक हैं। संभल जामा मस्जिदकी इंतेजामिया कमेटी पर इसकी साजिश रचने का आरोप है। हिंसा से पहले बर्क ने भड़काऊ भाषण दिया था।

बर्क ने कहा था, “हम पुलिस प्रशासन सरकार से दबने वाले थोड़ी हैं, अरे हम इस देश के मालिक है नौकर, गुलाम नहीं हैं’। मैं खुले रूप से कह रहा हूं कि मस्जिद थी, मस्जिद है, इंशा-अल्ला मस्जिद रहेगी कयामत तक। जिस तरह अयोध्या में हमारी मस्जिद ले ली गई, वैसा यहां नहीं होने देंगे।”

गौरतलब है कि मामले में उतर प्रदेश सरकार द्वारा तीन सदस्यीय जाँच टीम बनाई गई थी। इसमें हाईकोर्ट के पूर्व सेवानिवृत्त जज देवेंद्र अरोड़ा को अध्यक्ष बनाया गया था। इसके अलावा कमेटी में रिटायर्ड आईपीएस एके जैन और अमित प्रसाद सदस्य के रूप में शामिल किए गए थे।

‘राहुल गाँधी चु@$या, जिनके मन में ह$मी है वो वोट चोर बोलता है’: जिस SIR का विरोध कर रहा INDI गठबंधन उसे जरूरी बता रही बिहार की जनता, कहा- 100 में से 30 अवैध

INDI गठबंधन भले विशेष गहन पुनरीक्षण (Bihar SIR) का विरोध करते हुए ‘वोट चोरी’ का प्रोपेगेंडा चला रहा है, लेकिन बिहार की जनता इसे जरूरी बता रही है। ऑपइंडिया की ग्राउंड रिपोर्टिंग के दौरान आम लोगों ने इसके विरोध में चल रही राहुल गाँधी-तेजस्वी यादव की ‘वोटर अधिकार यात्रा’ की मंशा पर भी सवाल उठाए हैं।

बिहार के कटिहार जिले के कदवा प्रखंड के कदवा कुम्हरी गाँव के लोगों ने यह भी बताया कि उनके इलाके में बांग्लादेश से आकर लोग अवैध तरीके से बस गए हैं। वे स्थानीय लोगों की जमीनों, काम-धंधा पर कब्जा कर रहे हैं। ऐसे लोगों को मतदाता सूची से हटाना जरूरी है।

स्थानीय लोग का दावा है कि उनके इलाके में 100 में से करीब 30 लोग ऐसे हैं जो अवैध तरीके से बसे हैं। उल्लेखनीय है कि कदवा कुम्हरी से 23 अगस्त 2025 को राहुल गाँधी की यात्रा गुजरी थी। वहीं SIR का मकसद बिहार की मतदाता सूची से मृत, डुप्लीकेट और राज्य में अवैध तरीके से आकर बसे लोगों को हटाना है।

‘जिनके मन में ह$मी है, वो वोट चोर बोलता है’

कदवा प्रखंड में ऑपइंडिया की टीम ने कुछ महिलाओं से बात की। नित्या देवी नाम की एक महिला ने बताया कि वोटर लिस्ट में उनका नाम बिना किसी दिक्कत के जुड़ गया है। उन्होंने कहा कि उनके घर पर BLO (बूथ लेवल ऑफिसर) आए थे और सारा काम आसानी से हो गया।

जब हमारे रिपोर्टर मिथुन मिश्रा ने नित्या देवी से राहुल गाँधी और तेजस्वी के ‘वोट चोरी’ आरोपों के बारे में पूछा, तो उन्होंने कहा कि जिसके मन में ह$मी है वो वोट चोर बोलता है। नित्या देवी ने मोदी-नीतीश की सरकार को बहुत अच्छा बताया है और उन्हें कोई दिक्कत नहीं हुई। महिला ने यह भी बताया कि पहले उन्हें ₹400 पेंशन मिलती थी, जो अब बढ़कर ₹1100 हो गई है। एक और महिला ने भी मोदी-नीतीश की सरकार की तारीफ करते हुए कहा कि वे गरीबों का ध्यान रखते हैं और विकास करते हैं।

‘SIR जरुरी, अवैध बांग्लादेशी आकर बसे’

एक और महिला, अरुणा देवी ने तो राहुल गाँधी और तेजस्वी यादव को ही चोर बताया दिया। महिला ने कहा कि ‘चोर वही है जो दूसरे को चोर कहता है।’ महिला ने मोदी-नीतीश सरकार की कई योजनाओं की तारीफ की, जैसे मुफ्त गैस, बिजली और पेंशन। उनका कहना है कि सरकार ने हर चीज में सुधार किया है। आगे भी हम उन्हीं को वोट देंगे।

वहीं, एक स्थानीय व्यक्ति ने वोटर सर्वेक्षण के बारे में अपनी राय रखी। उनका कहना था कि यह एक बहुत अच्छा कदम है क्योंकि इससे उन लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हट जाएँगे जो अवैध रूप से आकर बस गए हैं। जब हमारे रिपोर्टर ने स्थानीय व्यक्ति से पूछा कि अवैध लोग कहा से आए है, तो उन्होंने कहा कि बगल में ही बांग्लादेश है, वहीं से ये लोग अवैध रुप से घुसे हैं।

स्थानीय व्यक्ति ने आरोप लगाया कि ऐसे लोग बिहार के मूल निवासियों के अधिकार छीन रहे हैं और हमसे दोगुना पैसा देकर यहाँ की जमीन खरीदकर रह रहे हैं। इसके अलावा स्थानीय निवासी का कहना है कि 100 में से 30 प्रतिशत अवैध लोग बसे हुए है, जो हमारा रोजगार छीन रहे हैं। और ऐसे लोगों का नाम वोटर लिस्ट से जरूर हटना चाहिए।

राहुल गाँधी ‘चु@$या’… कॉन्ग्रेस काल में बहन-बेटियाँ नहीं थी सुरक्षित

वहीं, स्थानीय व्यक्ति ने आरोप लगाते हुए कहा कि कॉन्ग्रेस काल के दौरान बहन-बेटियाँ घर से बाहर नहीं निकल पाती थी। लेकिन आज मोदी-नीतीश सरकार के राज में सड़कें, बिजली और कानून-व्यवस्था में काफी सुधार हुआ है, जिससे महिलाएँ रात में भी सुरक्षित महसूस करती हैं।

हमारे रिपोर्टर ने जब और लोगों से बात की तो उसमें से एक व्यक्ति पहले वार्ड मेंबर था और उन्होंने राहुल गाँधी को ‘चु@$या’ बताय। उन्होंने आगे कहा कि राहुल गाँधी अपनी यात्रा के लिए गरीबों के पेट पर लात मार रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि शकील अहमद जैसे नेता सिर्फ मुस्लिमों का वोट चाहते हैं और वोटर लिस्ट में उनके नाम हिंदुओं से आगे कर देते हैं। स्थानीय व्यक्ति ने कहा कि राहुल गाँधी और तेजस्वी यादव के खिलाफ काला झंडा लहराएँगे।

इसके अलावा एक स्थानीय व्यक्ति ने तेजस्वी यादव पर भी हमला बोलते हुए कहा कि उसका बाप चोर है, घोटाले में जेल जाकर आ चुका है और वे कभी मुख्यमंत्री नहीं बन सकता। स्थानीय व्यक्ति आगे कहता है कि ना तो नीतीश कुमार कभी जेल गया और ना ही उनका बेटा निशांत कुमार कभी जेल गया। मोदी जी हिंदू राष्ट्र के लिए काम कर रहे हैं और अमित शाह घुसपैठियों को बाहर निकालने का जो काम कर रहे हैं, वो बहुत बढ़िया है।

जमीनी हकीकत बताती है कि कदवा के ग्रामीणों में SIR सर्वे को लेकर कोई नाराजगी नहीं है। वोटर लिस्ट से नाम कटने की बात को उन्होंने नकारा और सरकार की योजनाओं से लाभ मिलने की बात दोहराई। यहाँ के लोग ‘वोट चोरी’ के आरोपों को राजनीति मानते हैं और भरोसा मोदी-नीतीश की जोड़ी पर जताते हैं।

भारत ही नहीं पूरे दक्षिण एशिया में घूमते थे विशाल हाथी, 140 किलो तक भारी होते थे दाँत: स्टेगोडॉन गणेश के बारे में जानिए सबकुछ

गणेशोत्सव की इस वक्त हर तरफ धूम है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि 25000 साल पहले भारत समेत दक्षिण एशिया के जंगलों में ‘हाथियों के पूर्वज’ थे, जिनका नाम स्टेगोडोन गणेशा (Stegodon Ganesa) था। इनके बड़े-बड़े दाँत हुआ करते थे, बिलकुल हमारे गणपति की तरह।

गणपति उत्सव में लीन हैं भक्त

हाथी के सिर वाले देवता भगवान गणेश को हर शुभ कार्य से पहले पूजा जाता है। उन्हें ‘विघ्नहर्ता’ यानी बाधाओं को दूर करने वाला कहा जाता है। उनका नाम दो अर्थों में बहुत खास है: ‘गणों के स्वामी’ और ‘जनता के प्रभु’।

गणेश जी ज्ञान, बल, और संकल्प के प्रतीक माने जाते हैं। हर साल पूरे देश में गणेश चतुर्थी बड़े धूमधाम से मनाई जाती है। इस साल यह उत्सव बुधवार (27 अगस्त 2025) से शुरू हुआ है और 6 सितंबर 2025 को गणपति विसर्जन के साथ इसका समापन होगा।

इन दिनों देशभर में सड़कों, मंदिरों और घरों में भक्तिमय माहौल है। हर तरफ बस गणपति की चर्चा है।

आधुनिक हाथियों के मिलता-जुलता था ‘गणेशा’

गणपति बप्पा के नाम पर ही इस प्राचीन विशाल जानवर का नाम स्टेगोडोन गणेशा (Stegodon Ganesa) रखा गया। यह एक ऐसा हाथी जैसा जीव था जो आज से करीब 25,000 साल पहले अस्तित्व में आया।

पहले इसे हाथियों का प्रत्यक्ष पूर्वज माना जाता था, लेकिन अब वैज्ञानिक इसे विलुप्त हो चुके प्रोबोसिडियन जीवों का ही रुप मानते हैं। बाद के शोध के आधार पर इस विशाल हाथी को स्टेगोडोन्टिडे परिवार में रखा गया, जो मैस्टोडॉन की तुलना में आधुनिक हाथियों (एलिफेंटिडे परिवार) से ज्यादा निकट है।

यह आज के हाथियों से भी बड़ा, लगभग 3 से 4 मीटर ऊँचा और 8 मीटर लंबा होता था। इसके बेहद लंबे और भारी दाँत (दाँतों की लंबाई 3.89 मीटर तक और वजन करीब 140 किलो तक) भी आज के हाथियों से कहीं ज्यादा बड़े थे।

इस विशाल जीव के अवशेष भारत के शिवालिक पहाड़ियों और हाल ही में 2025 में महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले के वर्धा और पेनगंगा नदियों के किनारे भी मिले हैं। इससे पता चलता है कि यह जीव प्राचीन भारत में बड़ी संख्या में मौजूद था।

इतिहास में इसकी खास जगह तब बनी जब 1928 में डॉ डी एन वाडिया ने एक 3 मीटर लंबा दाँत खोजा। वह अब जम्मू विश्वविद्यालय में रखा गया है। इस जीव की इतनी अहमियत थी कि 1951 में भारत सरकार ने इसके ऊपर डाक टिकट भी जारी किया था। बाद में नेपाल ने 2015 में एक और डाक टिकट जारी किया।

पहले वैज्ञानिक मानते थे कि स्टेगोडोन हाथियों का पूर्वज था, लेकिन अब यह माना जाता है कि यह अलग है। यह Elephantidae (आधुनिक हाथियों) का करीबी माना जा सकता है पर सीधे पूर्वज नहीं। हैरानी की बात ये है कि कुछ वैज्ञानिकों के अनुसार, यह विशाल जीव आज से सिर्फ 4,100 साल पहले तक जिंदा था, यानी हो सकता है कि यह मानव सभ्यता के शुरुआती दौर में इंसानों के साथ भी रहा हो।

स्टेगोडोन की कई प्रजातियाँ भारत के अलावा चीन, दक्षिण-पूर्व एशिया और जापान तक फैली थीं। आज जब हम गणेश चतुर्थी पर गणेश जी की पूजा कर रहे हैं, तो यह जानना और भी रोचक है कि हमारे इतिहास में एक ऐसा असली जीव भी था जिसे हमारे प्रिय गणपति के नाम से जोड़ा गया। एक ओर आस्था की शक्ति है और दूसरी ओर धरती पर जीवन की अद्भुत कहानी, ये दोनों मिलकर इस त्योहार को और भी खास बना देते हैं।

यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में श्रीति सागर ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें। इसका अनुवाद सौम्या सिंह ने किया है।

नेपाल के रास्ते भारत में घुसे जैश के 3 पाकिस्तानी आतंकी, बिहार में हाई अलर्ट पर सुरक्षा एजेंसियाँ: पड़ोसी देश बना घुसपैठ का ठिकाना

भारत में पाकिस्तानी आतंकियों के घुसपैठ के रास्ते बदलते दिख रहे हैं। ताजी जानकारी के मुताबिक, 3 पाकिस्तानी आतंकियों के नेपाल के रास्ते बिहार में दाखिल होने की सूचना मिली है। ये आतंकी प्रतिबंधित आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद से जुड़े हैं। पुलिस मुख्यालय (PHQ) को मिली अहम खुफिया जानकारी के बाद पूरे बिहार में हाई अलर्ट जारी कर दिया गया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इनकी पहचान रावलपिंडी निवासी हसनैन अली, उमरकोट निवासी आदिल हुसैन और बहावलपुर का रहने वाला मोहम्मद उस्मान के रूप में हुई है। बताया जा रहा है कि ये तीनों अगस्त 2025 के दूसरे हफ्ते में नेपाल के काठमांडू पहुँचे और पिछले हफ्ते नेपाल-बिहार बॉर्डर पार कर भारत में दाखिल हुए हैं।

इस इनपुट को गंभीरता से लेते हुए पुलिस मुख्यालय ने आतंकियों के पासपोर्ट और दूसरी जानकारियाँ सीमावर्ती जिलों के प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियों के साथ साझा कर दी हैं। खास तौर पर नेपाल से सटे इलाकों में सुरक्षा भी कड़ी कर दी गई है।

खुफिया एजेंसियों का मानना है कि ये आतंकी देश के किसी भी हिस्से में बड़ी आतंकी वारदात को अंजाम दे सकते हैं। चूँकि राज्य में विधानसभा चुनाव नजदीक हैं, इसलिए आशंका है कि आतंकी किसी भीड़-भाड़ वाले या राजनीतिक कार्यक्रम को निशाना बना सकते हैं।

PHQ ने राज्य के सभी जिलों की पुलिस और खुफिया विभाग को सतर्क रहने का आदेश दिया है। सभी को संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखने का आदेश दिया गया है।

फिलहाल बिहार पुलिस पूरी तरह अलर्ट पर है और सीमावर्ती इलाकों में सर्च ऑपरेशन तेज कर दिए गए हैं। सुरक्षा एजेंसियाँ यह सुनिश्चित करने में लगी हैं कि राज्य में किसी भी तरह की आतंकी घटना न होने पाए। मोतिहारी पुलिस ने तीनों आतंकियों पर 50-50 हजार रुपए का इनाम भी घोषित कर दिया है।

बता दें कि इससे पहले मई 2025 में सुरक्षा एजेंसियों को सूचना मिली थी कि करीब 37 पाकिस्तानी और बांग्लादेशी आतंकी नेपाल में मौजूद हैं और भारत में घुसपैठ करने की ताक में हैं। जिसके बाद सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए बहराइच से बलरामपुर तक की नेपाल सीमा पर एसएसबी के 1500 अतिरिक्त जवानों को तैनात किया गया था।

37 लोगों में 10 बांग्लादेशी और 27 पाकिस्तानी बताए गए थे। सूचना के बाद नेपाल से लगते उत्तर प्रदेश के महराजगंज, सिद्धार्थनगर, बलरामपुर, बहराइच, श्रावस्ती, पीलीभीत व लखीमपुर खीरी में अलर्ट भी जारी कर दिया गया था।

वहीं उसके बाद जुलाई 2025 में पाकिस्तान में मौजूद हाफिज सईद और मसूद अजहर जैसे आतंकियों के नेपाल के रास्ते भारत में आतंकी गतिविधियों को अंजाम देने की कोशिशों का भी पता चला था।

इस खतरे की जानकारी खुद नेपाल के राष्ट्रपति राम चंद्र पौडेल के सलाहकार सुनील बहादुर थापा ने दी थी। उन्होंने बताया था कि हाफिज सईद का संगठन लश्कर ए तैयबा और मसूद अजहर का जैश के मोहम्मद पाकिस्तान-भारत की सीमा को पार करने के बजाए अब नेपाल के रास्ते भारत में आने की कोशिश कर रहा है।

बता दें कि भारत और नेपाल के बीच 1751 किलोमीटर लंबी खुली सीमा रेखा है। यहाँ चौकसी काफी कम होती है। आतंकवादियों के लिए दूसरी जगहों की तुलना में अपनी पहचान छिपा कर इससे आना आसान है। जम्मू कश्मीर में आतंकियों की एंट्री पर कड़ा पहरा होने के बाद आतंकी दूसरे दरवाजे की तलाश कर रहे हैं इसलिए हाल के वर्षों में नेपाल में आतंकी गतिविधियाँ बढ़ गई हैं।

US के कैथोलिक स्कूल में ट्रांस शूटर रॉबिन वेस्टमैन ने की 2 बच्चों की हत्या-17 घायल, हथियारों पर लिखे ‘माशाल्लाह’ और ‘न्यूक इंडिया’ जैसे नारे: भारत-इजरायल विरोधी नफरत से भरा था हत्यारा

अमेरिका के मिनियापोलिस में 23 साल के ट्रांसजेंडर रॉबिन वेस्टमैन ने एक कैथोलिक चर्च और स्कूल में गोलीबारी कर दी। इस हमले में दो बच्चों की मौत हो गई और 17 लोग घायल हुए, जिनमें 14 बच्चे और 3 बड़े शामिल हैं। रॉबिन वेस्टमैन ने अपने हथियारों पर ‘माशाल्लाह’ और ‘न्यूक इंडिया’ लिखा था।

इस्लामी शब्द और भारत को परमाणु हथियारों से खत्म करने की बात के अलावा, रॉबिन ने इजरायल को बर्बाद करने की कसम भी खाई थी। उसने अपनी बंदूक पर ‘इजरायल को खत्म करना होगा’ लिखा था।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह घटना बुधवार (27 अगस्त 2025) सुबह करीब 8:30 बजे हुई, जब बच्चे चर्च में प्रार्थना सभा में शामिल थे। रॉबिन ने चर्च की खिड़कियों के बाहर से गोलियाँ चलाईं, जिससे वहाँ मौजूद लोग दहशत में आ गए। मिनियापोलिस पुलिस प्रमुख ब्रायन ओ’हारा ने बताया कि यह हमला एक सुनियोजित ‘घरेलू आतंकवाद’ और ‘कैथोलिक समुदाय के खिलाफ हेट क्राइम’ के तौर पर जाँचा जा रहा है। रॉबिन ने हमले के बाद खुद को गोली मारकर आत्महत्या कर ली।

भारत और यहूदी विरोधी नफरत से भरा था हत्यारा

रॉबिन वेस्टमैन ने अपने हथियारों पर कुछ चौंकाने वाले नारे लिखे थे। उसकी राइफल, शॉटगन और पिस्तौल पर ‘माशाल्लाह’, ‘न्यूक इंडिया’ और ‘इजरायल को खत्म करना होगा’ जैसे शब्द लिखे थे। उसने अपने हथियारों पर ‘बच्चों के लिए’, ‘तुम्हारा भगवान कहाँ है?’ और ‘डोनाल्ड ट्रंप को मारो’ जैसे नारे भी लिखे थे। इसके अलावा, एक गोला-बारूद की मैगजीन पर ‘स्किबिडी’ शब्द लिखा था, जो एक ऑनलाइन चरमपंथी मंच से जुड़ा हो सकता है।

रॉबिन ने अपने हथियारों पर दो अन्य हत्यारों के नाम भी लिखे थे – ‘रुपनो’ और ‘ब्रेविक’। ‘रुपनो’ का जिक्र संभवतः नटाली रुपनो से है, जिसेने पिछले साल विस्कॉन्सिन में एक स्कूल में गोलीबारी की थी। वहीं ‘ब्रेविक’ का संबंध नॉर्वे के कुख्यात हत्यारे एंडर्स ब्रेविक से हो सकता है, जिसने 2011 में 77 लोगों की हत्या की थी।

रॉबिन ने हमले से पहले यूट्यूब पर दो वीडियो पोस्ट किए थे, जिन्हें अब हटा दिया गया है। पहले वीडियो में उसने सिरिलिक अक्षरों में लिखा एक दस्तावेज़ दिखाया, जो अंग्रेजी में था। दूसरे वीडियो में उसने चार पेज का एक पत्र दिखाया, जिसमें उसने अपने परिवार और दोस्तों से माफी माँगी और अपने दर्द और पीड़ा की बात की।

इन वीडियो में उसने अपने हथियारों का जखीरा भी दिखाया, जिसमें राइफल, पिस्तौल, शॉटगन और कई मैगजीन शामिल थे। हथियारों पर सिल्वर रंग मार्कर से लिखे गए राजनीतिक और नफरत भरे नारे साफ दिख रहे थे। पुलिस ने बताया कि रॉबिन ने ये हथियार पूरी तरह कानूनी तौर पर खरीदे थे।

एफबीआई निदेशक काश पटेल ने इस हमले को कैथोलिक समुदाय के खिलाफ हेट क्राइम बताया है। जाँच में पता चला कि रॉबिन पहले इसी चर्च और स्कूल का छात्र रह चुका था, लेकिन यह साफ नहीं है कि उसने इस जगह को निशाना क्यों बनाया।

एंटी-डिफेमेशन लीग के विश्लेषण के मुताबिक, रॉबिन के लेखन में कैथोलिक, यहूदी, अश्वेत, एलजीबीटीक्यू+ समुदाय, मुस्लिम और हिस्पैनिक लोगों के खिलाफ नफरत भरे संदेश थे। उसने अपने हथियारों पर ‘बच्चों के लिए’, ‘तुम्हारा भगवान कहाँ है?’ और ‘डोनाल्ड ट्रंप को मारो’ जैसे नारे भी लिखे थे।

रॉबिन की माँ मैरी वेस्टमैन ने 2019 में कोर्ट में याचिका दायर कर अपने बच्चे का नाम बदलवाया था, क्योंकि रॉबिन खुद को महिला के रूप में पहचानता था। 2020 में जब रॉबिन 17 साल का था, जज ने इस बदलाव को मँजूरी दी थी। रॉबिन का आखिरी पता साउथ सेंट पॉल इलाके का एक अपार्टमेंट था।

पुलिस ने बताया कि हमले के दौरान स्कूल में पहली हफ्ते की प्रार्थना सभा चल रही थी। बच्चे और शिक्षक नए स्कूल साल की शुरुआत कर रहे थे।

सेंट क्लाउड के बिशप पैट्रिक एम. नियरी ने कहा, “यह एक बेगुनाह लोगों पर किया गया क्रूर हमला है। बच्चे प्रार्थना कर रहे थे, जब गोलियाँ चलीं। हम इस दुख से उबरने की कोशिश कर रहे हैं।” घायलों में दो बच्चे गंभीर हालत में हैं और तीन बुजुर्ग पैरिशनर भी गोलीबारी में घायल हुए हैं।

रॉबिन की ऑनलाइन गतिविधियों से पता चलता है कि वह नफरत फैलाने वाले ऑनलाइन समुदायों से जुड़ा था। जाँचकर्ता अभी यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि उसकी इस हिंसा के पीछे की वजह क्या थी।

साउदर्न पॉवर्टी लॉ सेंटर की रेचल कैरोल-रिवास ने कहा, “यह समझना मुश्किल है कि इस हिंसा की जड़ में क्या था। रॉबिन के विचारों में कई तरह की विचारधाराएँ और नफरत थी, जो किसी एक बॉक्स में फिट नहीं होती।”

यह घटना न केवल मिनियापोलिस बल्कि पूरे अमेरिका के लिए एक बड़ा झटका है। लोग इस बात से दुखी और गुस्से में हैं कि मासूम बच्चों को निशाना बनाया गया। यूएस होमलैंड सिक्योरिटी सेक्रेटरी क्रिस्टी नोएम ने कहा, “हम उन परिवारों के साथ हैं, जिन्होंने अपने बच्चों को खोया। हम उनके लिए प्रार्थना करते हैं।”