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आलोचना और सवालों से ऊपर क्यों रहना चाहते हैं मिलॉर्ड… आप भगवान तो नहीं: लोकतंत्र में जवाबदेही सबकी बनेगी, अमित शाह के बयान के बाद किया जा रहा था जस्टिस रेड्डी का बचाव

पूर्व जजों ने अपने साथियों को याद दिलाया कि जैसे ही कोई जज चुनावी मैदान में उतरता है, उसकी आलोचना होना स्वाभाविक है। इस जवाबी पत्र ने एक बड़ा सवाल उठाया कि आखिर मिलॉर्ड्स लोकतंत्र में आलोचना से ऊपर क्यों रहना चाहते हैं?

गृहमंत्री अमित शाह ने इंडी गठबंधन की ओर से उपराष्ट्रपति के उम्मीदवार जस्टिस (रि) बी सुदर्शन रेड्डी को लेकर टिप्पणी की थी। इसके बाद कई पूर्व जजों और कार्यकर्ताओं की टोली जस्टिस (रि) बी सुदर्शन रेड्डी के बचाव में उतर आई थी। हालाँकि अब कुछ रिटायर्ड जजों के एक ग्रुप ने 26 अगस्त 2025 को चिट्ठी लिखकर साफ कर दिया है कि अमित शाह को निशाने पर लेने और रेड्डी के समर्थन में उतरने की कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि अमित शाह के बयान से न्यायपालिका खतरे में पड़ने नहीं जा रही।

ताज़ा पत्र में इन पूर्व जजों ने अपने साथियों को याद दिलाया कि जैसे ही कोई जज चुनावी मैदान में उतरता है, उसकी आलोचना होना स्वाभाविक है। इस जवाबी पत्र ने एक बड़ा सवाल उठाया कि आखिर मिलॉर्ड्स लोकतंत्र में आलोचना से ऊपर क्यों रहना चाहते हैं?

अमित शाह ने क्या कहा और क्यों?

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह 22 अगस्त 2025 को कोच्चि में मलयालम न्यूज़ चैनल मनोरमा के कार्यक्रम में पहुँचे थे। वहाँ उन्होंने कॉन्ग्रेस पर वामपंथी दबाव में झुककर जस्टिस रेड्डी को उपराष्ट्रपति उम्मीदवार बनाने का आरोप लगाया। शाह ने इस फैसले को रेड्डी के उस अतीत से जोड़ा, जब उन्होंने जस्टिस एसएस निज्जर के साथ मिलकर छत्तीसगढ़ में माओवादियों के खिलाफ तैनात सलवा जुडूम को भंग किया था।

अमित शाह ने कहा, “विपक्ष (कॉन्ग्रेस) के उपराष्ट्रपति उम्मीदवार सुदर्शन रेड्डी वही शख्स हैं, जिन्होंने वामपंथी उग्रवाद और नक्सलवाद के समर्थन में सलवा जुडूम का फैसला दिया। अगर ऐसा नहीं हुआ होता, तो 2020 तक वामपंथी उग्रवाद खत्म हो गया होता।” उन्होंने केरल के लोगों को याद दिलाया कि उनका राज्य भी नक्सलवाद और उग्रवाद का दंश झेल चुका है। शाह ने तर्क दिया कि कॉन्ग्रेस ने अपने वामपंथी सहयोगियों के दबाव में ऐसे व्यक्ति को ऊँचा पद दिया, जिससे उसका असली वैचारिक झुकाव ज़ाहिर होता है।

शाह का हमला न्यायपालिका के खिलाफ कोई आम राग नहीं था। यह एक प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवार के रिकॉर्ड पर सटीक राजनीतिक आलोचना थी, जो लोकतांत्रिक चुनावों में बिल्कुल सामान्य है।

जानें उस फैसले के बारे में, जिसकी बात हो रही है

आलोचना से जजों और कार्यकर्ताओं के समूह को इतनी चोट क्यों लगी, इसे समझने के लिए 2011 के सलवा जुडूम फैसले को देखना ज़रूरी है। सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस रेड्डी और निज्जर की बेंच ने छत्तीसगढ़ सरकार की उस नीति को रद्द कर दिया, जिसमें आदिवासी युवाओं को विशेष पुलिस अधिकारी (एसपीओ) बनाकर माओवादियों से लड़ने के लिए हथियार दिए गए थे। नंदिनी सुंदर और अन्य वामपंथियों ने राज्य सरकार के इस फैसले के खिलाफ याचिका दायर की थी। कोर्ट ने याचिका पर कार्रवाई की और सरकार को आदेश दिया कि वह इस बल को भंग करे, सभी हथियार वापस ले और युवाओं को माओवादी जवाबी हमलों से बचाए।

फैसले में यह भी कहा गया कि सलवा जुडूम या कोया कमांडो कहलाने वालों द्वारा किए गए मानवाधिकार उल्लंघन और अपराधों की जाँच हो। बेंच ने साफ किया कि कोई भी समूह कानून को अपने हाथ में नहीं ले सकता या संविधान से बाहर काम नहीं कर सकता।

बेंच ने कहा था, “किसी बल की प्रभावशीलता यह तय करने का एकमात्र आधार नहीं हो सकती कि वह संवैधानिक रूप से जायज़ है।” उसने जोड़ा कि भले ही एसपीओ माओवादियों से लड़ने में कुछ हद तक प्रभावी थे, लेकिन इन ‘संदिग्ध फायदों’ की कीमत संवैधानिक उल्लंघनों और सामाजिक व्यवस्था को भारी नुकसान के रूप में चुकानी पड़ी।

यह फैसला राज्य सरकार और केंद्र के लिए बड़ा झटका था, क्योंकि तमाम खामियों के बावजूद सलवा जुडूम माओवादियों के गढ़ में उनका मुकाबला करने का एकमात्र तरीका था। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप ने सुरक्षा बलों को कमज़ोर कर दिया। शाह का तर्क सीधा है – अगर न्यायपालिका ने दखल न दिया होता, तो नक्सलवाद के खिलाफ जंग 2020 तक खत्म हो सकती थी।

मिलॉर्ड रेड्डी के बचाव में उतरे कई मिलॉर्ड

शाह के बयान के दो दिन बाद 24 अगस्त को कुछ रिटायर्ड जजों और कार्यकर्ताओं ने एक पत्र जारी कर शाह पर हमला बोला। उन्होंने शाह पर फैसले को ‘गलत तरीके से पेश करने’ का आरोप लगाया और ज़ोर देकर कहा कि उस फैसले ने कभी नक्सलवाद का समर्थन नहीं किया। उन्होंने नसीहत दी कि ऊँचे पदों के लिए प्रचार गरिमा के साथ और विचारधारा पर सवाल उठाए बिना करना चाहिए।

साभार: LegallySpeakingTarun/X

पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों में पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज जैसे मदन लोकुर, जे. चेलमेश्वर, कुरियन जोसेफ, अभय ओका और एके पटनायक साथ ही हाई कोर्ट के पूर्व जज और कार्यकर्ता जैसे संजय हेगड़े और मोहन गोपाल शामिल थे। पत्र का लहजा काफी कड़ा था – कि एक नेता की हिम्मत कैसे हुई कि वो मिलॉर्ड के फैसले पर बयान दे दे। उन्होंने चेतावनी दी कि शाह के शब्दों से न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर ‘ठंडा असर’ पड़ सकता है। दूसरे शब्दों में मिलॉर्ड्स ने आलोचना से छूट माँगी, भले ही उनका एक साथी राजनीति के गंदे खेल में उतर चुका हो।

जवाबी प्रतिक्रिया में उतरे जज, जो सच देखते हैं

लेकिन जवाब जल्दी आया। रेड्डी के बचाव में उतरे जजों के काम से नाखुश कुछ और रिटायर्ड जज मैदान में उतने और अपना बयान जारी किया। उन्होंने कुछ रिटायर्ड जजों की उस आदत को उजागर किया, जिसमें वे न्यायपालिका की स्वतंत्रता की आड़ में पक्षपात छिपाते हैं। उन्होंने याद दिलाया कि जैसे ही जस्टिस रेड्डी ने उपराष्ट्रपति का चुनाव लड़ने का फैसला किया, वे राजनीति में उतर गए और उन्हें अपने रिकॉर्ड का बचाव करना होगा, जैसे बाकी उम्मीदवार करते हैं।

यह जवाबी बयान इसलिए अहम है, क्योंकि इसने यह धारणा तोड़ दी कि शाह की आलोचना न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर हमला है। उन्होंने तर्क दिया कि आलोचना से न्यायपालिका की स्वतंत्रता को खतरा नहीं होता। असल नुकसान तब होता है, जब रिटायर्ड जज बार-बार पक्षपातपूर्ण राजनीतिक बयान देते हैं, जिससे लगता है कि पूरी संस्था ही किसी एक राजनीतिक पक्ष के साथ खड़ी है।

साभार: X/Amit Malviya

एक तीखी बात में उन्होंने कहा कि कुछ जजों की गलती की वजह से पूरी जजों की बिरादरी को पक्षपातपूर्ण गिरोह के रूप में देखा जाता है। उन्होंने चेतावनी दी कि यह न तो न्यायपालिका के लिए अच्छा है और न ही लोकतंत्र के लिए।

जजों की आलोचना लोकतंत्र का अपमान नहीं

यही असली मुद्दा है। रिटायर्ड या मौजूदा जज भगवान नहीं हैं। वे पैगंबर नहीं हैं। वे इंसान हैं, जिनके फैसलों ने लाखों लोगों की ज़िंदगी पर असर डाला। ऐसे फैसले खासकर जो राष्ट्रीय सुरक्षा नीति को बदल दें, ज़रूर उनकी आलोचना होगी। यही लोकतंत्र का सार है।

लेकिन भारत में मिलॉर्ड्स को लगता है कि वे ऐसी किसी भी आलोचना से परे हैं। उन्हें लगता है कि उनके फैसलों की आलोचना संविधान पर हमला है। इससे ज़्यादा अलोकतांत्रिक कुछ हो ही नहीं सकता। अगर राजनेता, नौकरशाह, जनरल और मीडिया की सार्वजनिक आलोचना होती है, तो राजनीति में उतर चुके जज को आलोचना से छूट चाहिए ही क्यों? फिर भी वो इसकी उम्मीद करते हैं।

अभिव्यक्ति की आज़ादी कोर्टरूम के दरवाज़े पर खत्म नहीं होती। बल्कि लोकतंत्र की माँग है कि नागरिकों की सुरक्षा पर असर डालने वाले फैसलों की खुलकर आलोचना हो। शाह का बयान भले ही राजनीतिक रूप से तीखा था, लेकिन यह माओवादी उग्रवाद के रास्ते पर एक पुराने फैसले के प्रभाव पर जायज़ टिप्पणी थी।

इसे ‘गलत व्याख्या’ या ‘ठंडा असर’ कहना, व्याख्या पर एकाधिकार की माँग है, जैसे कि केवल न्यायपालिका को ही अपने शब्दों को समझाने का हक है। यह पाखंड तब और साफ हो जाता है, जब रिटायर्ड जज खुद न्यायपालिका की स्वतंत्रता की आड़ में राजनीतिक घोषणापत्र जारी करते हैं। एक तरफ किसी एक राजनीतिक खेमे के साथ पूरी तरह जुड़े पत्रों पर हस्ताक्षर करना और दूसरी तरफ यह शिकायत करना कि किसी राजनेता की आलोचना पक्षपातपूर्ण है – यह दोहरा खेल है और जनता भी इसे समझने लगी है।

लोकतंत्र का मतलब है सभी के लिए जवाबदेही

यह विवाद सिर्फ अमित शाह बनाम जस्टिस रेड्डी का नहीं है। यह लोकतंत्र में न्यायपालिका की भूमिका के बारे में है। जैसे ही जज राजनीति में कदम रखते हैं, उन्हें स्वीकार करना होगा कि उनके रिकॉर्ड की जाँच होगी। उनके फैसलों, खासकर जो राष्ट्रीय सुरक्षा नीतियों को बदलते हैं, की पड़ताल होगी और उनके वैचारिक झुकाव को जनता के सामने उजागर किया जाएगा। यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर हमला नहीं, बल्कि जवाबदेही की कीमत है।

न्यायपालिका सम्मान की हकदार है, लेकिन तभी जब वह राजनीति से ऊपर रहे। जब इसके रिटायर्ड सदस्य राजनीतिक किरदार की तरह व्यवहार करते हैं, तो वे आलोचना से छूट नहीं माँग सकते। अगर लोकतंत्र का कोई मतलब है, तो वह यह कि कोई भी संस्था या व्यक्ति सवालों से परे नहीं है।

तो मिलॉर्ड्स… जो लोग भी आलोचना होते ही हाय-तौबा मचाने लग जाते हैं, उन्हें याद दिला दिया जाए कि ‘आप भगवान नहीं हैं’ और न ही आप सवालों से परे हैं। क्योंकि लोकतंत्र आपके हिसाब से काम नहीं करता, बल्कि वो जनता के हिसाब से काम करता है।

इस लेख को मूल रूप से अंग्रेजी में अनुराग ने लिखा है। इसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें। इसका अनुवाद श्रवण शुक्ल ने किया है।

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Anurag
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Anurag is a Chief Sub Editor at OpIndia with over twenty one years of professional experience, including more than five years in journalism. He is known for deep dive, research driven reporting on national security, terrorism cases, judiciary and governance, backed by RTIs, court records and on-ground evidence. He also writes hard hitting op-eds that challenge distorted narratives. Beyond investigations, he explores history, fiction and visual storytelling. Email: [email protected]

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