केंद्र सरकार ने नेताओं के भ्रष्टाचार पर कार्रवाई के लिए संसद में 130वां संविधान संशोधन बिल पेश किया है। इस बिल के तहत अगर प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या किसी मंत्री पर 5 वर्ष या उससे अधिक सजा वाली धाराओं में मुकदमा दर्ज होता है तो 30 दिन जेल में रहने के बाद उनका पद चला जाएगा। फिलहाल, यह बिल संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के पास भेज दिया गया है।
इस बिल के प्रावधानों के खिलाफ लगातार विपक्ष विरोध प्रदर्शन कर रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार (22 अगस्त 2025) को बिहार के गयाजी में कहा कि सरकारी कर्मचारी 50 घंटों तक हिरासत में रहे तो वह सस्पेंड हो जाता है लेकिन PM और CM जेल से भी सत्ता का सुख भोगते रहते हैं।
पीएम मोदी ने क्या कहा?
पीएम मोदी ने कहा, “मेरा साफ मानना है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई को अगर अंजाम तक पहुँचाना है तो कोई भी कार्रवाई के दायरे से बाहर नहीं होना चाहिए। आज कानून है कि अगर किसी छोटे सरकारी कर्मचारी को 50 घंटे तक हिरासत में रखा जाए तो वह अपने-आप सस्पेंड हो जाता है, ड्राइवर हो, क्लर्क हो, चपरासी हो उनकी जिंदगी तबाह हो जाती है। अगर कोई मुख्यमंत्री है, मंत्री है या प्रधानमंत्री है, तो वह जेल में रहकर भी सत्ता का सुख पा सकता है।”
उन्होंने कहा, “हमने कुछ समय पहले ही देखा है कि कैसे जेल से ही फाइलों पर साइन किए जा रहे थे, जेल से ही सरकारी आदेश निकाले जा रहे थे। नेताओं का अगर यही रवैया रहेगा, तो भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई कैसे लड़ी जा सकती है? संविधान हर जनप्रतिनिधि से ईमानदारी और पारदर्शिता की उम्मीद करता है।”
#WATCH | PM Narendra Modi says, "… If a government employee is imprisoned for 50 hours, then he loses his job automatically, be it a driver, a clerk or a peon. But a CM, a Minister, or even a PM can enjoy staying in the government even from jail… Some time ago, we saw how… pic.twitter.com/1iY1hXr3Xp
भारत में केंद्रीय कर्मियों के वर्गीकरण, उन पर नियंत्रण और कदाचार के मामले में कार्रवाई के लिए दिशानिर्देश ‘केंद्रीय सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण और अपील) नियम, 1965’ में दिए गए हैं। ये नियम 1 दिसंबर 1965 से लागू किए थे। इसके भाग 4 में केंद्रीय कर्मियों के निलंबन के नियम दिए गए हैं।
इसमें नियम 10 के उपनियम 2 के खंड (क) में कहा गया है, “किसी सरकारी कर्मचारी को नियुक्ति करने वाली प्राधिकरण (appointing authority) के आदेश से निलंबित माना जाएगा अगर वह किसी आपराधिक आरोप या अन्य वजह से 48 घंटे से अधिक की अवधि के लिए कस्टडी में रखा जाता है। यह निलंबन उसके हिरासत में लिए जाने की तारीख से ही प्रभवी माना जाता है।”E
वहीं, उपनियम 2 के खंड (ख) में कहा गया है, “अदालत अगर किसी कर्मी को किसी अपराध में दोषी ठहराकर 48 घंटे से ज्यादा की कैद की सजा सुनाती है। ऐसे में अगर उसे तुरंत नौकरी से बर्खास्त, हटाया या अनिवार्य सेवानिवृत्त नहीं किया गया हो तो दोषसिद्धि की तारीख से उसे निलंबित माना जाता है।”
इसमें खंड (ख) को लेकर स्पष्टीकरण दिया गया है, “इसमें दिए गए 48 घंटों को सजा शुरू होने के समय से गिना जाएगा। अगर सजा बीच-बीच में रुक-रुक कर (जैसे अलग-अलग बार जेल जाना पड़े) पूरी की गई हो, तो उन सब अवधियों को जोड़कर देखा जाएगा।”
केंद्रीय सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण और अपील) नियम, 1965 का भाग
इन नियमों में गृह मंत्रालय द्वारा 25 फरवरी 1955 को जारी एक पत्र भी शामिल किया गया है। इस पत्र में कहा गया है, “यह उस सरकारी सेवक की ड्यूटी होगी जिसे किसी कारण से गिरफ्तार किया गया है कि वह अपनी गिरफ्तारी से संबंधित तथ्यों और परिस्थितियों को अपने सरकारी वरिष्ठ अधिकारी को तत्काल सूचित करे चाहे उसे बाद में जमानत पर रिहा ही क्यों न कर दिया गया हो।”
इसमें आगे कहा गया है, “संबंधित व्यक्ति या किसी अन्य स्रोत से सूचना मिलने पर विभागीय प्राधिकारी इस बात का निर्णय लेंगे कि क्या उस व्यक्ति की गिरफ्तारी से संबंधित तथ्य और परिस्थितियों के कारण उसे निलंबित करने की आवश्यकता है कि नहीं?”
IAS, IPS और IFS अधिकारियों का निलंबन
अखिल भारतीय सेवाओं के अधिकारियों के निलंबन किए जाने की शर्तें अखिल भारतीय सेवाएँ (अनुशासन एवं अपील) नियम, 1969 में दी गई हैं। ये नियम IAS, IPS और IFS अधिकारियों पर लागू होते हैं।
इसके भाग 2 के नियम 3 में निलंबन संबंधी शर्तें हैं और इसके उपनियम 2 में कहा गया है, “इन सर्विसेज का कोई कर्मी अगर किसी आपराधिक आरोप के कारण या किसी अन्य वजह से 48 घंटे से अधिक अवधि के लिए आधिकारिक हिरासत में रखा जाता है तो इस नियम के अंतर्गत संबंधित सरकार द्वारा निलंबित माना जाएगा।”
वहीं, इसके उपनियम 4 में कहा गया है, “अदालत अगर किसी कर्मी को किसी अपराध में दोषी ठहराकर 48 घंटे से ज्यादा की कैद की सजा सुनाती है। ऐसे में अगर उसे तुरंत नौकरी से बर्खास्त, हटाया या अनिवार्य सेवानिवृत्त नहीं किया गया हो तो दोषसिद्धि की तारीख से उसे निलंबित माना जाता है।”
अखिल भारतीय सेवाएँ (अनुशासन एवं अपील) नियम, 1969 का भाग
निलंबन का रिव्यू
इन सेवा शर्तों में अधिकारियों के निलंबन को रिव्यू किए जाने को लेकर भी नियम दिए गए हैं। अखिल भारतीय सेवाएँ (अनुशासन एवं अपील) नियम में कहा गया है कि प्रत्येक मामले में निलंबन आदेश की तिथि से 90 दिनों के भीतर समीक्षा की जाएगी। इसमें कहा गया है कि जिन मामलों में निलंबन की अवधि बढ़ा दी जाती है तो उनमें रिव्यू विस्तार की अंतिम तारीख से 180 दिनों के भीतर किया जाएगा।
वहीं, केंद्रीय सिविल सेवा नियम में कहा गया है, “अगर किसी को निलंबित किया गया है, तो वह आदेश सिर्फ 90 दिन तक ही मान्य रहेगा। अगर इसे 90 दिन के बाद भी जारी रखना है, तो 90 दिन पूरे होने से पहले समीक्षा करके ही इसे आगे बढ़ाया जा सकता है।”
इसमें आगे कहा गया है, “किसी कर्मचारी को निलंबित करने के आदेश दिए जाने के बाद, 90 दिन पूरे होने से पहले उस अधिकारी को उसकी समीक्षा करनी होगा, जिसके पास निलंबन को बदलने या खत्म करने की शक्ति है। यह समीक्षा एक रिव्यू कमेटी की सिफारिश पर होगी। इस समीक्षा के बाद अधिकारी को तय करना होगा कि निलंबन को जारी रखना है या खत्म करना है। निलंबन को एक बार में 180 दिनों से ज्यादा नहीं बढ़ाया जा सकता।”
निलंबित कर्मी को कितना मिलता है निर्वाह भत्ता?
निलंबन की अवधि के दौरान सरकारी कर्मचारी को जीविका चलाने हेतु निर्वाह भत्ता (Subsistence Allowance) दिया जाता है। निलंबन के पहले 90 दिनों तक कर्मचारी को उसके आखिरी वेतन का 50% जीविका भत्ते के रूप में दिया जाता है। यदि विभागीय कार्रवाई में देरी कर्मचारी की गलती से नहीं होती है, तो यह भत्ता बढ़ाकर 75% तक किया जा सकता है लेकिन यदि देरी कर्मचारी की वजह से होती है, तो यह घटाकर 25% कर दिया जाता है।
इस भत्ते में मकान किराया भत्ता (HRA), महंगाई भत्ता (DA) या अन्य कोई विशेष भत्ता शामिल नहीं होता। साथ ही, यह भत्ता कर्मचारी के मूल वेतन से अधिक नहीं हो सकता है।
मुंबई की टाइम्स ऑफ इंडिया में डिप्टी मैनेजर होने का दावा करने वाली दिव्या राणा ने मेरी माँ को अपमानजनक शब्द कहे और उन पर यौन हमला करने की बात लिखी।
इस पूरे विवाद पर टाइम्स ऑफ इंडिया ने दिव्या को अपना कर्मचारी मानने से इनकार कर दिया और संबंधित अकाउंट को ‘फर्ज़ी’ बताकर मामले से खुद को अलग करने की कोशिश की।
वहीं दिव्या ने मुझे शारीरिक नुकसान पहुँचाने की धमकी भी दी और अपने पिता, जो कथित तौर पर जज हैं, उनके प्रभाव का इस्तेमाल करके मेरी जिंदगी बर्बाद करने की कसम खाई। ये सभी धमकियाँ उन्होंने उस फेसबुक पोस्ट के बाद दीं, जिसमें बेंगलुरु में रेबीज़ से चार साल के बच्चे की मौत पर सवाल उठाए गए थे।
दिव्या राणा का फेसबुक प्रोफाइल, जिसमें वह टाइम्स ऑफ इंडिया की उप प्रबंधक होने का दावा करती हैं
यह घटना गुरुवार (21 अगस्त 2025) को हुई, जब मैंने बेंगलुरु में आवारा कुत्तों के कारण चार साल की एक बच्ची की मौत पर फेसबुक पोस्ट शेयर की थी।
बच्ची एक रेहड़ी-पटरी वाले की बेटी थी, जिसे रेबीज हो गया था और रविवार (17 अगस्त 2025) को उसकी मौत हो गई। लोकप्रिय सोशल मीडिया कमेंटेटर ‘द स्किन डॉक्टर’ ने मंगलवर (19 अगस्त 2025) को इस घटना के बारे में फेसबुक पर पोस्ट किया था।
मैंने उनकी पोस्ट इस कैप्शन के साथ शेयर की थी, “हमने तुम्हें निराश किया, बच्ची। आवारा कुत्तों को सड़क पर रखने के लिए अभियान चलाने वाले ‘डॉग एक्टिविस्ट’ इस बारे में एक शब्द भी नहीं बोलेंगे।”
फेसबुक पोस्ट का स्क्रीनशॉट
दिव्या राणा, जो खुद को ‘पत्रकार’ और उप-प्रबंधक बताती हैं, मेरे फेसबुक पेज पर आईं और अपनी पहचान का इस्तेमाल करके मुझे परिणाम भुगतने की चेतावनी दी।
उन्होंने कहा कि यह खबर गलत है और असत्यापित जानकारी साझा करने पर मुझे कानूनी सजा मिलेगी। लेकिन जब मैंने दोबारा पूरी जाँच की तो पाया कि खबर बिल्कुल सही थी।
रेबीज से बच्चे की मौत की खबर ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ समेत कई मीडिया संस्थानों में प्रकाशित हुई थी। फिर भी, दिव्या राणा ने फेसबुक पोस्ट के कमेंट सेक्शन में मुझे चैटजीपीटी से तैयार किया गया ‘सीज एंड डिसिस्ट नोटिस’ भेजा।
— Dibakar Dutta (দিবাকর দত্ত) (@dibakardutta_) August 21, 2025
जब मैंने दिव्या राणा से कहा कि वे कानूनी नोटिस मेरे आधिकारिक ईमेल ([email protected]) पर भेजें, तो उन्होंने समय बर्बाद करना शुरू कर दिया। मैंने टाइम्स ऑफ इंडिया की कथित डिप्टी मैनेजर से अनुरोध किया कि वे जल्दी से नोटिस भेजें।
लेकिन इसके बजाय, उन्होंने मुझे ‘मानहानि’ और ‘गलत जानकारी’ फैलाने के आरोप में गिरफ़्तार कराने की धमकी दी।
दिव्या राणा ने आगे कहा, “इंडियन एक्सप्रेस के लिए वारंट पहले ही जारी हो चुका है। आपको भी कानूनी नोटिस भेजा जा रहा है। आपने स्वीकार किया है कि यह जानकारी आपने दूसरों द्वारा साझा की गई पोस्ट के आधार पर शेयर की है और आपके पास कोई ठोस तथ्य नहीं हैं। इसलिए यह नोटिस जरूरी है।”
Divya Rana from @TOIIndiaNews claimed that a warrant has been issued to The Indian Express which 'incorrectly' covered the rabies story.
— Dibakar Dutta (দিবাকর দত্ত) (@dibakardutta_) August 21, 2025
राणा ने अपनी धमकी भरी रणनीति जारी रखते हुए कहा, ” आपको सोशल मीडिया पर बदनामी करने और सुनी-सुनाई बातों पर आधारित झूठी जानकारी फैलाने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया जाएगा।”
गिरफ़्तारी और वारंट की धमकियों के बावजूद, जब मैंने बार-बार अपनी ईमेल आईडी पर ‘कानूनी नोटिस’ भेजने की माँग की, तो टाइम्स ऑफ इंडिया की कथित उप-प्रबंधक गालियाँ देने लगीं।
दिव्या राणा ने मेरी 70 साल की माँ को ‘रं$%’ और ‘हि&$%’ कहने में कोई झिझक नहीं दिखाई। यहाँ तक कि उन्होंने मेरी माँ को सार्वजनिक रूप से नंगा घुमाने की भी धमकी दी।
इसके अलावा, उन्होंने अपने जज पिता के प्रभाव और ताकत का इस्तेमाल करके मेरी जिंदगी बर्बाद करने की चेतावनी दी। मेरी बस इतनी गलती थी कि मैंने एक बच्चे की कुत्ते के काटने और उसके बाद रेबीज से हुई असामयिक मौत का मुद्दा उठाया था।
एक बेटे के तौर पर, माँ को दी गई गालियों का अनुवाद करना मेरे लिए मुश्किल है।
दिव्या राणा: दिबाकर दत्ता, क्या तेरी माँ कोई रं$% है जो तेरी आग बुझाने आती है? चू&$ की गां$ नहीं, तेरी माँ की गां$ है। तेरी माँ का क्या रेट है? हर्ष वर्मा मेरे पापा हैं जो जज हैं। तेरी चड्डी उतरवा दूँगी और तुझे नंगा घुमाऊँगी, हि&$* और रं&* की औलाद।
क्या तेरी गां$ भी है? तेरा चेहरा भद्दा है और तेरी बातें भी। छी, कितना घिनौना चेहरा है तेरा, रं$# की औलाद। देख, तेरी माँ सड़कों पर नं&@ घूम रही है। मा*$@द, अभी भौंकता रह। मैं तुझे कानूनी जवाब दूँगी, नाले के घिनौने कीड़े। भौंकता रह, मैं जवाब भी नहीं दूँगी और मै पढ़ूँगी भी नहीं।
मैं इस बात से आश्चर्यचकित हूँ कि राणा, ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ के साथ अपने कथित संबंध और अपने पिता के न्यायाधीश के कथित पेशे के जरिए बिना किसी कानून के डर के एक आम आदमी को धमकाने और गाली देने के लिए पर्याप्त रूप से सक्षम है।
टाइम्स ऑफ इंडिया की प्रतिक्रिया
एक्स पर जब मैंने ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ से कार्रवाई की माँग करते हुए यह मामला उठाया, तो अखबार ने करीब 16 घंटे बाद, शुक्रवार (22 अगस्त 2025) को प्रतिक्रिया दी। अखबार ने दावा किया कि मेरे ट्वीट में जिस व्यक्ति का जिक्र है, वह उसका कर्मचारी नहीं है, बल्कि यह किसी वास्तविक कर्मचारी के नाम पर बनाया गया ‘फर्ज़ी अकाउंट’ प्रतीत होता है।
सवाल यह है कि क्या दिव्या राणा वास्तव में टाइम्स ऑफ इंडिया की कर्मचारी हैं या फिर अखबार सिर्फ अपनी छवि बचाने की कोशिश कर रहा है। इस लेख के लिखे जाने तक दिव्या राणा का फेसबुक प्रोफाइल सक्रिय था, जिसकी कवर इमेज पर अब भी ‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ लिखा हुआ है।
हालाँकि अखबार ने ‘उचित कार्रवाई’ का आश्वासन दिया है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया कि कार्रवाई किस तरह की होगी और ‘फर्ज़ी अकाउंट’ से उसकी प्रतिष्ठा को हुए नुकसान की भरपाई के लिए तत्काल क्या कदम उठाए गए हैं।
नोट- मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में दिबाकर दत्ता ने लिखी है, इस लिंक पर क्लिक कर विस्तार से पढ़ सकते है।
‘भारत रूसी युद्ध मशीन को ईंधन दे रहा है’, ‘भारत रूस-यूक्रेन युद्ध से मुनाफाखोरी कर रहा है’, ‘भारत रूस से नजदीकियाँ बढ़ा रहा है’- ट्रंप प्रशासन लगातार इस तरह के आरोप लगाकर भारत को रूसी तेल की खरीद को लेकर बदनाम करता रहा है
इन आरोपों के पीछे मुख्य वजह भारत की ओर से रूस से रियायती दरों पर तेल खरीदना है। भारत इस तेल को रिफाइन कर उन यूरोपीय देशों को बेच रहा है, जिन्होंने रूस पर प्रतिबंध लगाए हैं। इस प्रक्रिया के जरिए वैश्विक ऊर्जा संकट को कम करने में मदद मिली है। पहले अमेरिका ने भारत की इस भूमिका की सराहना की थी, लेकिन अब ट्रंप प्रशासन अचानक भारत से नाराज हो गया है।
अमेरिका खुद रूस-यूक्रेन युद्ध से काफी मुनाफा कमा रहा है, लेकिन भारत को खुलेआम ‘विलेन’ बना रहा है। हाल ही में अमेरिका के ट्रेज़री सचिव स्कॉट बेसेन्ट ने भारत की रूसी तेल खरीद और यूरोपीय देशों को बिक्री को ‘आर्बिट्राज’ कहा। उन्होंने दावा किया कि भारत ने $16 बिलियन (लगभग ₹1.32 लाख करोड़ रुपए) का अतिरिक्त मुनाफा कमाया।
बेसेंट ने घोषणा की, “हम भारत पर सेकेंड्री टैरिफ लगाने की योजना बना रहे हैं क्योंकि भारत रूस से प्रतिबंधित तेल खरीद रहा है।” उन्होंने कहा कि 2022 से पहले भारत रूस से 1% से भी कम तेल खरीदता था, लेकिन अब यह 42% तक पहुँच गया है।
उनके अनुसार, “भारत सिर्फ मुनाफाखोरी कर रहा है और भारत के कुछ सबसे अमीर परिवारों ने इस युद्ध से ₹1.32 लाख करोड़ (लगभग $16 बिलियन) का अतिरिक्त लाभ कमाया है।”
बेसेन्ट के ‘भारत के प्रतिबंधित रूसी तेल की खरीदा’ वाला बयान तब आया जब यूरोपीय संघ के नियमों (Council Regulation 833/2014) के अनुसार, परिष्कृत कच्चा तेल अब ‘रूसी’ नहीं माना जाता। इस लिहाज से भारत जो तेल यूरोप को बेचता है, वह भारत में रिफाइन किया गया उत्पाद होता है, न कि रूसी तेल।
इसके बावजूद ट्रंप प्रशासन भारत को रूस-यूक्रेन युद्ध के लिए दोषी ठहराने पर तुला हुआ है। यहाँ तक कि वे यह भी भूल गए कि G7 देशों द्वारा तय की गई $60 (लगभग ₹4,980 रुपए) प्रति बैरल की मूल्य सीमा का उद्देश्य रूसी तेल की आपूर्ति बनाए रखना था, ताकि मास्को को जरूरत से अधिक मुनाफा न हो।
व्हाइट हाउस के ट्रेड सलाहकार पीटर नवारो ने भी हाल ही में फाइनेंनशियल टाइम्स में एक लेख लिखा, जिसमें उन्होंने भारत को युद्ध का मुख्य दोषी बताया और चीन, यूरोप और अमेरिका को क्लीन चिट दे दी।
नवारो ने लिखा, “भारत रूसी तेल के लिए वैश्विक क्लियरिंगहाउस की तरह काम करता है, प्रतिबंधित कच्चे तेल को उच्च मूल्य वाले निर्यात में बदलता है और मास्को को डॉलर देता है।” उन्होंने यह भी कहा कि भारत के समर्थन से रूस यूक्रेन पर हमला जारी रखता है। इसके कारण अमेरिकी और यूरोपीय टैक्सपेयर्स अरबों डॉलर खर्च करने को मजबूर हैं।
नवारो और बेसेन्ट ने भारतीय कंपनियों को बदनाम किया, लेकिन यह नहीं बताया कि अमेरिकी तेल कंपनियों ने 2022 से अब तक रिकॉर्ड मुनाफा कमाया है। तरल प्राकृतिक गैस (LNG) निर्यात, हथियारों की बिक्री और युद्ध से जुड़े कई अवसरों पर अमेरिका इस युद्ध का सबसे बड़ा लाभार्थी बन गया है।
अगर ट्रंप वास्तव में उन लोगों को ‘सजा’ देना चाहते हैं जो रूसी युद्ध मशीन को ईंधन दे रहे हैं तो उन्हें यूरोप से अमेरिका पर ही प्रतिबंध लगाने की माँग करनी चाहिए।
2022 में युद्ध शुरू होने के बाद यूरोप ने रूस से गैस पर अपनी 40% निर्भरता कम कर दी। रूस की अर्थव्यवस्था को कमजोर करने के लिए कई प्रतिबंध लगाए गए, ये सोचकर कि इससे मास्को पश्चिम की शर्तों को मान लेगा और युद्ध खत्म कर देगा।
लेकिन इस योजना के अनुसार सब कुछ नहीं हुआ। अमेरिका ने इस गैस आपूर्ति की कमी को पूरा किया और 2023 में यूरोपीय संघ का शीर्ष LNG आपूर्तिकर्ता बन गया।
अमेरिका ने अपनी सस्ती LNG यूरोप को चार गुना से भी अधिक कीमत पर बेची। इसके पीछे इसने ‘युद्ध के कारण आई रुकावटों’ का हवाला दिया। यूरोप की तत्काल जरूरतों का फायदा उठाते हुए अमेरिका ने भारी मुनाफा कमाया।
गौरतलब है कि 2022 में फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने अमेरिका को इन बढ़ी हुई कीमतों के लिए फटकार लगाई थी। यहाँ तक कि एक वरिष्ठ यूरोपीय अधिकारी ने भी कहा था कि अमेरिका ‘इस रूस-यूक्रेन युद्ध से सबसे अधिक मुनाफा कमाने वाला देश है।’
2022 में अमेरिकी तेल और गैस कंपनियाँ जैसे कि शेवरॉन और एक्सॉनमोबिल ने युद्ध से पहले वर्ष 2021 की तुलना में 125% की दर से रिकॉर्ड मुनाफा दर्ज किया। उसी वर्ष, अमेरिका ने यूरोप को LNG की 50% आपूर्ति की और 12% तेल भी दिया।
रूस पर लगाए गए बहिष्कार, प्रतिबंध और यूरोपीय संघ की मूल्य सीमा के कारण यूरोप को रूसी तेल और गैस की आपूर्ति में भारी गिरावट आई। इस खाली जगह का फायदा उठाते हुए अमेरिका ने अपनी पकड़ मज़बूत की और इसी के ज़रिए NATO में अपना प्रभुत्व भी बढ़ाया।
2023 में अमेरिका यूरोप का सबसे बड़ा LNG आपूर्तिकर्ता बना रहा। उस वर्ष यूरोप की ओर से आयात की गई कुल LNG का लगभग 48% हिस्सा अमेरिका से आया, जिसमें फ्रांस, स्पेन, नीदरलैंड और ब्रिटेन प्रमुख आयातक देश रहे।
2024 में यूरोपीय संघ (EU) की गैस आपूर्ति में नॉर्वे ने 33% हिस्सेदारी के साथ अग्रणी भूमिका निभाई, लेकिन साथ ही अमेरिका ने भी 16.5% हिस्सेदारी दर्ज की। इसी वर्ष, यूरोपियन यूनियन ने 100 अरब घन मीटर (bcm) से अधिक LNG आयात किया और अमेरिका 45% LNG आपूर्ति कर एक बार फिर से सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता बन गया।
ऊर्जा क्षेत्र से अलग, अमेरिका को रूस-यूक्रेन युद्ध में रक्षा निर्यात के जरिए भी काफी मुनाफा हुआ है। अमेरिका ने यूक्रेन को $19 बिलियन (₹1.58 लाख करोड़ रुपए) से अधिक के हथियार भेजे। इससे लॉकहीड मार्टिन और रेथियॉन जैसी अमेरिकी रक्षा कंपनियों के शेयरों में उछाल आया। वास्तव में, जर्मन रक्षा कंपनी राइनमेटल को भी इस युद्ध से मुनाफा हुआ। युद्ध शुरू होने के बाद से इस कंपनी के शेयरों की कीमत 14 गुना तक बढ़ चुकी है।
ध्यान देने योग्य बात ये भी है कि मीअमेरिका ने बेशर्मी के साथ ये स्वीकारा है कि यूक्रेन को दी जा रही सैन्य सामग्री से अमेरिकी अर्थव्यवस्था को मजबूती मिली है। पहले अमेरिका ने $95 बिलियन (₹7.88 लाख करोड़ रुपए) का अतिरिक्त रक्षा बजट पेश किया था, जिसमें से $60.7 बिलियन (लगभग ₹5.04 लाख करोड़ रुपए) यूक्रेन को आवंटित किए गए। इसे पीछे वादा किया गया कि इस बजट का 64% हिस्सा अमेरिकी रक्षा उद्योग को दोबारा उठाने में काम आएगा।
अब, डोनाल्ड ट्रंप यूरोपीय देशों के माध्यम से यूक्रेन को 10% प्रीमियम के साथ हथियार बेच रहे हैं। यह रणनीति खासतौर पर अमेरिका के खजाने को भरने के लिए अपनाई गई है, जबकि रूस और यूक्रेन के आम नागरिक युद्ध में जान गँवा रहे हैं। ट्रंप ने यूक्रेन को सुरक्षा गारंटी देने में अमेरिका की भूमिका के लिहाज से एक कीमत भी तय कर दी है।
असल में, अमेरिकी सेना अब यूक्रेन के लिए एक प्रकार की ‘भाड़े की सेना’ की तरह काम कर रही है। लेकिन अमेरिका चाहता है कि दुनिया यह माने कि युद्ध से लाभ कमाने वाला देश वॉशिंगटन नहीं, बल्कि नई दिल्ली है।
ट्रंप प्रशासन की हिपोक्रेसी की कोई सीमा नहीं है। अमेरिका का पाखंडी रवैया वैसे तो हैरान करने वाला नहीं है, लेकिन ट्रंप के अधिकारियों ने इसे खुले तौर पर स्वीकार कर अपने दोहरे चरित्र की एक नई मिसाल कायम कर दी है।
यही अमेरिकी ट्रेज़री सचिव स्कॉट बेसेन्ट, जिन्होंने भारत पर रूस-यूक्रेन युद्ध से मुनाफाखोरी का आरोप लगाया था, वे अमेरिका की उस रणनीति पर गर्व करते देखे जा सकते हैं जिसमें यूरोप के जरिए यूक्रेन को को हथियार बेचे जा रहे हैं और जिन पर राष्ट्रपति ट्रंप 10% अतिरिक्त शुल्क ले रहे हैं।
बेसेन्ट ने फॉक्स न्यूज़ को बताया, “हम यूरोपीय देशों को हथियार बेच रहे हैं, वे उन्हें यूक्रेन को भेज रहे हैं और राष्ट्रपति ट्रंप इन हथियारों पर 10 प्रतिशत का प्रीमियम ले रहे हैं। शायद यही 10 प्रतिशत एयर कवर की लागत को पूरा कर देगा।”
US Treasury Secretary who accuses India of "profiteering" from its oil purchase from Russia, is gloating over the fact that the US is selling weapons to Europe intended for Ukraine with a 10% markup. Selling weapons that kill people and profiteering from it vs India buying… pic.twitter.com/0ImPlsCgYZ
यूक्रेन के राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की की ओर से अमेरिका से $100 अरब डॉलर (₹8.3 लाख करोड़ रुपए) की कीमत के हथियार खरीदने के प्रस्ताव को लेकर कई खबरें सामने आई हैं। इस सौदे से डोनाल्ड ट्रंप को $10 अरब (₹83,000 करोड़ रुपए) का कमीशन मिलेगा, इसके अलावा हथियार बेचने वाले अमेरिकी कंपनियों की ओर से दिया जाने वाला टैक्स भी इसमें शामिल हैं।
अमेरिका यूरोप को LNG और तेल बेचकर काफी मुनाफा कमा रहा है। साथ ही बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाई, अपने अनुसार, कीमतों में बदलाव किए और रणनीतिक भू-राजनीतिक लाभ लिए। रूस से आयात में आई गिरावट के बाद अमेरिका एक प्रमुख ऊर्जा आपूर्तिकर्ता बन गया। इससे अमेरिकी ऊर्जा कंपनियों की आय में वृद्धि हुई है और घरेलू उद्योग को भी मजबूती मिली है।
हालाँकि अमेरिका ने प्रतिबंधों के चलते रूसी कच्चे तेल का आयात कम किया है, लेकिन वह अब भी रूस के साथ कई क्षेत्रों में व्यापार कर रहा है। यूक्रेन पर रूस के हमले के तीन साल बाद भी अमेरिका ने मास्को से अपने व्यापारिक संबंध पूरी तरह नहीं तोड़े हैं।
जनवरी 2022 से अब तक अमेरिका ने $24.5 अरब (लगभग ₹2.03 लाख करोड़) से अधिक मूल्य के रूसी सामान आयात किए हैं। इस वर्ष अकेले अमेरिका ने $1.27 अरब (₹1.05 लाख करोड़) के उर्वरक, $624 मिलियन (₹5,179 करोड़) के यूरेनियम और प्लूटोनियम और लगभग $878 मिलियन (₹7,287 करोड़) के पैलेडियम खरीदे हैं।
2024 में जनवरी से नवंबर तक पैलेडियम और एल्युमिनियम जैसे गैर-लौह धातुओं का आयात $876.5 मिलियन (लगभग ₹72,754 करोड़) रहा। अकार्बनिक रसायनों का आयात $683 मिलियन (लगभग ₹56,089 करोड़), बिजली उत्पादन मशीनरी $79 मिलियन (लगभग ₹6,557 करोड़) और कॉर्क तथा लकड़ी उत्पाद लगभग $64 (लगभग ₹5,312 करोड़) मिलियन रहा।
अन्य वस्तुओं में $80.81 मिलियन (लगभग ₹6,710 करोड़) मूल्य के परमाणु रिएक्टर और मशीनरी, पशु आहार, लोहा और इस्पात, और तेल बीज शामिल थे। हालाँकि इनका कुल आयात में हिस्सा अपेक्षाकृत कम था।
अमेरिकी सरकारी आँकड़ों के अनुसार, 2024 में अमेरिका से रूस को निर्यात घटकर $528.3 मिलियन (लगभग ₹43,850 करोड़) रह गया, जबकि रूस से आयात इससे कहीं अधिक रहा।
2023 में यह निर्यात लगभग $598.8 मिलियन (लगभग ₹49,700 करोड़) था। ये आँकड़े साफ तौर पर दिखाते हैं कि रूस-यूक्रेन युद्ध के बावजूद अमेरिका और रूस के बीच व्यापार कभी पूरी तरह रुका नहीं।
दरअसल, 16 अगस्त 2025 को अलास्का में अमेरिकी राष्ट्रपति से मुलाकात के दौरान रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने खुलासा किया कि हाल के महीनों में अमेरिका-रूस द्विपक्षीय व्यापार में 20% से अधिक की वृद्धि हुई है। इससे ट्रंप के उस दावे की पोल खुल गई जिसके तहत वह यह कहते फिर रहे थे कि अमेरिका रूस पर युद्ध समाप्त करने का दबाव बना रहा है।
ट्रंप, मार्को रुबियो, पीटर नवारो और स्कॉट बेसेन्ट, इनमें से कोई भी चीन की उतनी आलोचना नहीं करता जितनी भारत की, जबकि रूस से सबसे अधिक तेल खरीदने वाला देश भारत नहीं, बल्कि चीन है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने हाल ही में भारत और चीन को लेकर अमेरिका के दोगलेपन को स्वीकार किया और वॉशिंगटन की इश हिपोक्रेसी को सही भी ठहराया।
फिर भी, भारत का घरेलू जरूरतों के लिए रूसी तेल खरीदना और वैश्विक ऊर्जा कीमतों को स्थिर बनाए रखना गलत ठहराया जाता है, जबकि लोगों को मारने के लिए अमेरिका का हथियार बेचकर युद्ध से मुनाफा कमाना उसे शांतिदूत, मसीहा और संरक्षक समेत क्या कुछ नहीं बना देता।
शायद भारत का मई में भारत-पाकिस्तान के संघर्ष विराम का श्रेय ट्रंप को न देना, उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकित न करना और भारतीय कृषि और डेयरी बाजार को अमेरिका के लिए न खोलना आदि बातें अब टैरिफ और भारत-विरोधी बयानबाजी के तौर पर सामने आ रही हैं।
यहाँ इस बात का जिक्र करना जरूरी है कि अमेरिका अक्सर संघर्ष और विवाद से ही लाभ कमाता है। असल में वाशिंगटन के लिए अराजकता एक सीढ़ी है, जिससे वह अपने रणनीतिक हितों को साधते हुए मुनाफा कमाता है।
ट्रंप प्रशासन को लगता है कि वह भारत पर दबाव बनाकर उसे अमेरिका-हितैषी व्यापार समझौते के लिए मजबूर कर सकता है, ठीक वैसे ही जैसे पाकिस्तान ने आत्मसमर्पण किया। लेकिन भारत अमेरिका की धमकियों, टैरिफ, प्रतिबंधों और झूठी बयानबाज़ी के आगे झुकने को तैयार नहीं है।
अमेरिका के दबाव में झुका यूरोपीय संघ, ट्रंप की दबंगई का विरोध करने पर भारत को दोष
ऑपइंडिया ने पहले भी इस पर रिपोर्ट किया है कि कैसे US-EU ट्रेड डील को लेकर यूरोपीय संघ ट्रंप के दबाव में आया और अपने हितों से समझौता किया। इस समझौते में अमेरिका ने अधिकतम मुनाफा लिया, जबकि यूरोप को बहुत कम मिला।
ट्रंप ने भारत की तरह ही यूरोप को भी टैरिफ की धमकी दी थी, लेकिन भारत के उलट, यूरोपियन यूनियन ने अपनी आत्म-सम्मान की कीमत पर ट्रंप की ‘गुड बुक्स’ में रहने का विकल्प चुना।
27 जुलाई 2025 को यूरोपीय संघ ने अमेरिका के साथ व्यापार समझौता किया, जिसमें उसने अपने निर्यात पर टैरिफ को 27.5% से घटाकर 15% कर दिया, जबकि अमेरिका से यूरोप को होने वाले निर्यात पर कोई टैरिफ नहीं लगाया गया।
इसके अलावा, यूरोपीय संघ ने अमेरिका से $750 अरब (₹62.25 लाख करोड़) की ऊर्जा खरीद, $600 अरब (₹49.8 लाख करोड़) के निवेश और अमेरिकी सैन्य हथियारों की खरीद का वादा भी किया।
ट्रंप की टैरिफ बढ़ाने और यूरोप की अमेरिकी बाजार और सुरक्षा पर निर्भरता का फायदा उठाने वाली धमकी भरी रणनीति ने यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन को इस एकतरफा शर्तों को स्वीकार करने पर मजबूर कर दिया। इसका खामियाजा यूरोपीय उद्योगों, विशेष रूप से ऑटोमोबाइल और फार्मास्युटिकल क्षेत्रों को उठाना पड़ा।
ये ठीक वैसे ही था जैसे अप्रैल में भारत के मामले में देखा गया था। ट्रंप ने यूरोपीय संघ को भी 1 अगस्त 2025 तक व्यापार समझौते की समयसीमा देकर 30% टैरिफ लगाने की धमकी दी थी। ट्रंप ने यूरोपीय फार्मा उत्पादों पर भी 200% टैरिफ लगाने की धमकी भी दी थी।
यूरोपीय संघ के आत्मसमर्पण ने ट्रंप को इस बात से ओत-प्रोत कर दिया कि उनकी टैरिफ रणनीति हर देश पर काम करेगी। लेकिन भारत ने उनकी गलतफहमी को चूर-चूर कर दिया।
अगर भारत ने अमेरिकी कंपनियों के लिए अपने बाजार खोल दिए होते, रूस को छोड़कर व्हाइट हाउस को खुश किया होता, ट्रंप को भारत-पाकिस्तान संघर्षविराम का श्रेय दिया होता या उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकित कर दिया होता तो शायद भारत को अमेरिका के कड़े तेवर का सामना नहीं करना पड़ता।
अमेरिका लगातार रूस-यूक्रेन युद्ध से अपने मुनाफे को जरूरी बताकर दुनिया के सामने रखता है, जबकि भारत पर युद्ध से लाभ उठाने का आरोप लगाता है।
ये लेख मूल रूप से अंग्रेजी में श्रद्धा पांडे ने लिखा है। इसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शुक्रवार (22 अगस्त 2025) को बिहार के बोधगया में ₹13000 करोड़ की कई विकास परियोजनाओं का शिलान्यास और उद्घाटन किया है। इन परियोजनाओं का उद्देश्य राज्य में कनेक्टिविटी, बिजली, स्वास्थ्य और शहरी बुनियादी ढाँचे को बेहतर बनाना है।
इस दौरान पीएम मोदी ने संबोधन में कहा, “बिहार चंद्रगुप्त मौर्य और चाणक्य की धरती है। इस धरती पर लिया गया हर संकल्प कभी खाली नहीं जाता। जब कश्मीर के पहलगाम में आतंकी हमला हुआ था। तब मैंने बिहार की इसी धरती से आतंकवादियों को मिट्टी में मिलाने की बात कही थी। आज दुनिया देख रही है बिहार की धरती से लिया गया वो संकल्प पूरा हो चुका है।”
कॉन्ग्रेस-RJD पर जमकर बरसे पीएम मोदी
पीएम मोदी कॉन्ग्रेस और RJD पर जमकर बरसे। उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस-RJD की सरकार ने बिहार के लोगों को शिक्षा और रोजगार नहीं दिया, तब लोग पलायन करने को मजबूर हो गए। पीएम ने कहा, “बिहार में लालटेन राज में लाल आतंक था। न शिक्षा न रोजगार था। बिहार की कितनी पीढ़ियों को इन लोगों ने बिहार से पलायन के लिए मजबूर कर दिया था। बिहार के लोगों को RJD और उनके साथी वोट बैंक मानते थे। उन्हें गरीब के सुख-दुख और गरीब के मान-सम्मान से कोई मतलब नहीं है।”
PM मोदी ने आगे कहा, “हमारे देश में कॉन्ग्रेस हो या RJD हो। इनकी सरकार ने कभी जनता के पैसों का मोल नहीं समझा। इनके लिए जनता के पैसों का मतलब खुद की तिजोरी भरना रहा है। इसीलिए कॉन्ग्रेस-RJD सरकार में सालोंसाल तक परियोजनाएँ पूरी नहीं होती थी। जो परियोजना जितनी लंबी थी उतना उसमें पैसे कमा लेते थे।”
प्रधानमंत्री ने कहा, “अब इस गलत सोच को भी NDA सरकार ने बदल दिया है। अब शिलान्यास के बाद कोशिश होती है जल्द से जल्द काम को पूरा करने के लिए सफल प्रयास किए जाते हैं। आज का कार्यक्रम में भी इसका उदाहरण है।”
अब भ्रष्टाचारी जेल भी जाएगा और कुर्सी भी जाएगी: पीएम मोदी
पीएम ने केंद्र शासित संसोधन विधेयक और संविधान के 130वें संशोधन विधेयक का भी जिक्र किया। पीएम ने कहा कि अब सरकार ऐसा कानून लाने जा रही है, जिसके जद में खुद देश का प्रधानमंत्री भी होगा। पीएम मोदी ने कहा, “हमने कुछ समय पहले देखा है कि जेल से ही फाइलों पर साइन किए जा रहे थे। जेल से सरकारी आदेश निकाले जा रहे थे। नेताओं का यही रवैया रहेगा, तो ऐसे भ्रष्टाचार के विरुद्ध कैसे लड़ाई लड़ी जाएगी।”
पीएम ने आगे कहा, “हम संविधान की मर्यादा को तार-तार होते नहीं देख सकते। इसीलिए सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ ऐसा कानून लाई है जिसमें देश का पीएम भी है। जब यह कानून बन जाएगा, तो मंत्री को गिरफ्तारी के 30 दिन के भीतर जमानत लेनी होगा और अगर जमानत नहीं मिली तो कुर्सी छोड़नी होगी।”
बिहार में डेमोग्राफी बड़ी चिंता: PM
बिहार में डेमोग्राफी पर बदलाव में पीएम मोदी ने कहा कि यह एक बड़ी चिंता है। पीएम ने कहा, “बिहार के सीमावर्ती जिलों में घुसपैठ बढ़ रही है। जिन सुविधाओं पर भारतीयों का अधिकार है उनको घुसपैठी को डाका नहीं डालने देंगे। मैंने डेमीग्राफी मिशन शुरू किया है। हम हर घुसपैठी को देश से बाहर करके रहेंगे। कॉन्ग्रेस और RJD जैसे दल बिहार के गरीबों का हक छीनकर घुसपैठियों को देना चाहते हैं।”
इन विकास प्रोजेक्ट का किया उद्घाटन
पीएम ने गया में NH-31 पर 8.15 किलोमीटर लंबे औंटा-सिमरिया पुल परियोजना का उद्घाटन किया। इसमें गंगा नदी पर 1.86 किलोमीटर लंबा 6 लेन वाला पुल भी शामिल है, जिसका निर्माण ₹1,870 करोड़ की लागत से हुआ है।
इसके बाद पीएम मोदी ने गया-दिल्ली अमृत भारत एक्सप्रेस और वैशाली-कोडरमा बौद्ध सर्किट ट्रेन को हरी झंडी दिखाई। पीएम ने 12,000 गरीब लोगों को उनके घर की चाबियाँ भी सौंपी। इसके साथ बक्सर में ₹6,880 करोड़ की लागत से बने थर्मल पावर प्लांट का उद्घाटन भी किया। इससे राज्य की बिजली उत्पादन क्षमता में वृद्धि होगी।
राज्य में स्वास्थ्य सेक्टर को मजबूत करने के लिए मुजफ्फरपुर में होमी भाभा कैंसर अस्पताल और रिसर्च सेंटर का भी उद्घाटन किया गया। यह अस्पताल आधुनिक तकनीक और बेहतर सुविधाओं के साथ बनाया गया है। अब बिहार के लोगों को कैंसर के इलाज के लिए मेट्रो शहरों में जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
इसके साथ पीएम पश्चिम बंगाल के कोलकाता में भी ₹5,200 करोड़ की विकास परियोजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास करेंगे।
हमास ने 7 अक्टूबर 2023 को इजरायल पर वीभत्स आतंकी हमला किया था। महिलाओं और बच्चों समेत हजारों लोगों को मारा गया, रेप किए और सैकड़ों लोग बंधक बनाए गए। इसके जवाब में जब इजरायल ने गाजा में आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया तो तथाकथित सेकुलर जमात का रोना शुरू हो गया।
स्वरा भास्कर जैसे लोग हमास के आतंकियों पर सवाल उठाने के बजाय इजरायल को ही इसका सारा दोष दे रहे हैं। मुंबई के आजाद मैदान में बुधवार (20 मार्च 2025) को गाजा के समर्थन में करीब 200 लोग इकट्ठा हुए। इस भारी भीड़ की माँग थी कि इजरायल अपने हमले बंद कर दे। स्वरा भास्कर ने भी इस सभा में तकरीर की और इजरायल पर किए गए हमले को ‘वाइटवॉश’ करने की कोशिश की।
स्वरा ने हमास के आतंकियों के कुकृत्यों को जायज ठहराने की भी पूरी कोशिश की। स्वरा ने कहा, “जो 7 अक्टूबर को हुआ जिसमें 1,200 इजरायल के नागरिक मारे गए। इसमें कोई शक नहीं है कि किसी भी दुनिया में किसी भी जगह पर किसी नागरिक की जान जाए तो यह दुख की बात है। लेकिन ऐसा दिखाना कि इतिहास की शुरुआत 7 अक्टूबर 2023 से हुई थी। ये झूठ है और ये मक्कारी है।”
मतलब सीधा है कि 7 अक्टूबर के आतंकी हमले की बात अगर आप करोगे तो आप मक्कार हैं लेकिन असल में मक्कारी क्या है, ये लोग बेहतर जानते समझते हैं। आतंकियों को खुलेआम मंच से बचाना, रेप, हत्याओं को जायज ठहराने की कोशिश करना और आतंकियों को क्लीन चिट दे देना, ये पता नहीं मक्कारी की श्रेणी में आएँगे की नहीं। अपनी तकरीर में स्वरा ने गाजा पर खूब आँसू बहाए लेकिन हमास के आतंकियों को आलोचना में उनके मुँह से 2 शब्द तक नहीं निकले।
पहले भी आतंकियों का बचाव करती रही है स्वरा
ऐसा पहली बार भी नहीं है जब स्वरा ने इस तरह की हिमाकत की हो, जिस दिन हमास के आतंकियों ने हमला किया उस दिन से ही स्वरा ने हमास के आतंकियों को बचाना शुरू कर दिया था।
इस हमले के तुरंत बाद स्वरा ने अपने इंस्टाग्राम पर लिखा, “अगर आपको फिलिस्तीनियों पर इजरायल के हमले से सदमा नहीं लगा तो…इजरायल पर हमास के हमलों से आपका सदमा और डर पाखंडी लगता है।” यानी स्वरा यह बता रही थी कि हमास ने जो हत्याएं की हैं, रेप किए हैं उन सब पर लोग शांत रहे, उन्हें सदमा ना लगे क्योंकि यह सब उसकी नजरों में गलत नहीं था।
इजरायल पर ही लगाए यौन हिंसा के आरोप
कुछ दिनों पहले की ही बात है जब BBC ने एक रिपोर्ट छापी कि किस तरह हमास के आतंकियों ने रेप और यौन हिंसा को नरसंहार की रणनीति के तौर पर इस्तेमाल किया था। स्वरा यहाँ भी आतंकियों का बचाव करने से नहीं चूकी। स्वरा ने कह दिया कि स्वरा ने अपने ट्वीट में उल्टा इजरायल पर इल्जाम लगाए। उसने यह बताया कि हमास द्वारा यौन उत्पीड़न की खबरें झूठी हैं।
क्या इजरायल के दर्द पर प्रोपेगैंडा करने वाले ‘मक्कार’ नहीं?
स्वरा जैसे लोग कथित सेकुलर लोग झूठे और मनगढ़ंत इतिहास का लबादा ओढ़कर आतंकियों को कुकृत्यों को जायज ठहराते हैं। स्वरा ने अपनी तकरीर में कहा कि इतिहास 7 अक्टूबर से नहीं बल्कि 1948 से देखा जाएगा। मतलब इतिहास भी जितनी स्वरा की सुविधा हो उनता पीछे ही जाए, अगर स्वरा को इतिहास में ही जाना है तो फिर 2000-2500 साल पीछे क्यों नहीं जाती?
असल में ऐसे लोगों को ना इतिहास से मतलब है, ना किसी के दर्द है इन लोगों को सिर्फ अपने प्रोपेगैंडा से मतलब है। लोग मरते रहे और इनका प्रोपेगैंडा चलता रहे फिर चाहे इसके लिए इन्हें आतंकियों के ही पक्ष में क्यों ना बोलना पड़े। आतंकवाद को जायज ठहराने इनके नैरेटिव को सूट करता है। कभी आपने देखा है कि पाकिस्तान में, बांग्लादेश में हिंदुओं पर अत्याचार के खिलाफ स्वरा ने हाथों में तख्ती लेकर आवाज उठाई हो?
इस्लामी मुल्कों से घिरे एक यहूदी मुल्क पर जुल्म होता रहे, उनके बच्चे मरते रहें, उनकी बेटियों-महिलाओं का रेप होता रहे उससे इन्हें कोई मतलब नहीं है। हत्याओं को ऐसे लोगों ने अपनी नौटंकी और प्रोपेगैंडा का हिस्सा मान लिया है। इजरायली लोगों का दर्द इनके लिए सजा नहीं है, क्योंकि असल में प्रोपेगैंडा चलाने वाले ये लोग ‘मक्कारी’ करते हैं।
अहमदाबाद के सेवेंथ डे स्कूल में 19 अगस्त 2025 को एक बड़ा हादसा हुआ है। स्कूल में 10वीं कक्षा के एक हिंदू छात्र की चाकू मारकर हत्या कर दी गई। आरोप है कि हत्या एक मुस्लिम छात्र ने की। हमले के बाद घायल छात्र को अस्पताल ले जाया गया, जहाँ उसे मृत घोषित कर दिया गया। पुलिस ने आरोपित छात्र को हिरासत में ले लिया है। उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी गई है।
घटना के बाद, 20 अगस्त 2025 को स्थानीय हिंदू समुदाय के लोग स्कूल में जमा हुए और उन्होंने विरोध प्रदर्शन किया। पीड़ित परिवार और स्थानीय लोगों ने स्कूल प्रशासन पर सवाल उठाए हैं। लोगों का कहना है कि स्कूल में सुरक्षा को लेकर लापरवाही हुई। मामले की जाँच जारी है और पुलिस स्थिति पर नजर रख रही है।
घटना के बाद स्कूल प्रशासन पर कई गंभीर आरोप लगे हैं। पीड़ित परिवार और स्थानीय लोगों का कहना है कि स्कूल ने घायल छात्र की मदद नहीं की और छात्र को समय पर अस्पताल नहीं ले जाया गया। यह भी कहा गया है कि स्कूल ने हादसे के तुरंत बाद सफाई शुरू कर दी।
स्कूल प्रशासन ने पानी का टैंकर मँगवाया और स्कूल परिसर की धुलाई करवाई। लोगों का आरोप है कि इससे सबूत मिटाने की कोशिश की गई। अब पुलिस इन आरोपों की जाँच कर रही है। मामला सबूत छिपाने की दिशा में भी देखा जा रहा है।
पहले भी विवादों में रहा है स्कूल
जिस स्कूल में हिंदू छात्र की हत्या हुई, वह पहले भी विवादों में घिर चुका है। 2016 में एक घटना सामने आई थी। उस समय स्कूल के एक शिक्षक ने कक्षा 4 के एक बच्चे की पिटाई कर दी थी। बच्चे की गलती सिर्फ इतनी थी कि उसने मौखिक परीक्षा के दौरान किसी से बात कर ली थी।
इस बात से गुस्साए शिक्षक ने बच्चे के बाल पकड़कर मारपीट की। आरोप है कि शिक्षक ने चेहरे पर घूंसा मारा, जिससे बच्चे के खून बहने लगा। इस घटना को लेकर भी स्कूल की काफी आलोचना हुई थी।
इस घटना के बाद कई अभिभावक स्कूल पहुँच गए। उन्होंने स्कूल परिसर में विरोध प्रदर्शन किया। अभिभावकों के दबाव के बाद स्कूल प्रशासन ने शिक्षक को निलंबित कर दिया। निलंबित शिक्षक का नाम ‘मोसेस अदला‘ था।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि यह शिक्षक पहले भी चार बच्चों की पिटाई कर चुका है। अभिभावकों ने इस मामले की शिकायत खोखरा थाने में की थी। पुलिस ने केस दर्ज कर शिक्षक के खिलाफ कार्रवाई की थी।
यह स्कूल अक्टूबर 2024 में भी विवादों में आया था। उस समय स्कूल का स्टाफ 200 छात्रों को मेहसाणा के एक वॉटर पार्क में लेकर गया थे। इस यात्रा के लिए जिला शिक्षा कार्यालय से कोई अनुमति नहीं ली गई थी, जो कि सरकारी नियमों का उल्लंघन थी।
घटना सामने आने के बाद जिला शिक्षा अधिकारियों ने इसका संज्ञान लिया। उन्होंने स्कूल प्रशासन को बकायदा नोटिस भेजा था। साथ ही, पुलिस में शिकायत भी दर्ज करवाई गई थी।
स्कूल प्रशासन पर और भी गंभीर आरोप
हिंदू छात्र की हत्या के बाद स्कूल प्रशासन पर कई सवाल उठे हैं। स्थानीय लोगों ने स्कूल की भूमिका पर शक जताया है। मृतक छात्र के दादा ने ऑपइंडिया से बातचीत में बड़ा दावा किया। घटना वाले दिन कुछ मुस्लिम छात्रों ने चेहरे ढक रखे थे। उन्होंने पीड़ित छात्र पर चाकू से हमला कर दिया। मृतक के दादा ने कहा कि घटना से दो महीने पहले ही स्कूल में शिकायत दी गई थी। शिकायत में कहा गया था कि मुस्लिम छात्र हिंदू छात्रों को परेशान कर रहे हैं। लेकिन स्कूल ने कोई कार्रवाई नहीं की।
એક વર્ષ પહેલા પણ હિંદુ વિદ્યાર્થીઓ બન્યા હતા મજહબી માનસિકતાનો ભોગ….
મુસ્લિમ વિદ્યાર્થીઓ શાળામાં મટન લાવ્યા હતા અને હિંદુ છોકરાઓને પનીરનું શાક કહીને બળજબરીથી ખવડાવ્યું હતું…
इसके अलावा, दादा ने बताया कि उनका पूरा परिवार शाकाहारी है। उन्होंने आरोप लगाया कि मुस्लिम छात्र स्कूल में मटन लाते थे। उनके पोते को पनीर बताकर मटन खिलाया जाता था।
इतना ही नहीं, स्कूल कैब के मालिक ने भी आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि इससे पहले भी मुस्लिम छात्रों ने हिंदू छात्रों पर हमले किए हैं। अब इन आरोपों की पुलिस जाँच कर रही है।
पीड़ित छात्र के दादा ने बताया कि उन्होंने कई बार वीडियो बनाकर स्कूल को सबूत दिए। उन्होंने लगातार शिकायतें कीं, लेकिन स्कूल ने कोई कदम नहीं उठाया। उन्होंने धर्मांतरण का भी आरोप लगाया। उनका कहना है कि पहले हिंदू छात्रों पर ईसाई या मुस्लिम बनने का दबाव डाला जाता था।
अन्य अभिभावकों और स्थानीय लोगों ने भी यही आरोप लगाए। उनका कहना है कि मुस्लिम छात्र लगातार हिंदू छात्रों को परेशान करते थे। इन घटनाओं की स्कूल में शिकायत की गई, लेकिन फिर भी कोई कार्रवाई नहीं हुई।
इसके अलावा एक और गंभीर आरोप सामने आया है। कहा गया कि स्कूल में नैतिक शिक्षा के नाम पर ईसाई मजहब का प्रचार किया जा रहा है। सिलेबस के जरिए छात्रों को ईसाई मजहब की ओर आकर्षित करने की कोशिश हो रही है।
इसके अलावा, एक महिला ने बड़ा दावा किया है। उसने कहा कि स्कूल संचालक अभिभावकों से ₹2 लाख माँग रहे थे। साथ ही, छात्रों से कहा जा रहा था कि वे बिना बोर्ड परीक्षा दिए पास हो जाएँगे। इन आरोपों की भी अब जाँच की जा रही है।
चर्च के जरिए चलता स्कूल
जाँच में पता चला कि यह स्कूल ‘सेवेंथ डे एडवेंटिस्ट चर्च‘ नाम का एक विदेशी संगठन चलाता है। इस संगठन का मुख्यालय अमेरिका में है। अहमदाबाद में यह स्कूल एक स्थानीय ट्रस्ट, ‘एश्लॉक ट्रस्ट’ के जरिए चलाया जाता है। यह ट्रस्ट भी उसी चर्च का हिस्सा है। पूरी दुनिया में, यह चर्च संगठन 7,804 स्कूल और कॉलेज चलाता है।
इस स्कूल के मूल्य और नियम ईसाई मजहब के अनुसार बनाए गए हैं। चर्च के स्कूल अधिकतर चर्च के नियमों के अनुसार चलते हैं। दुनिया भर में, ‘सेवेंथ डे एडवेंटिस्ट चर्च संगठन’ सभी स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय के नियम बनाता है और फिर उन पर लागू करवाता है।
स्कूल का प्रिंसिपल जी इमैनुएल
अहमदाबाद के सेवेंथ डे स्कूल के प्रिंसिपल का नाम जी इमैनुएल है। जी इमैनुएल ईसाई मजहब को मानते हैं और पूरे स्कूल का प्रबंधन संभालते हैं। हत्या से पहले, स्थानीय लोग और अभिभावक प्रिंसिपल से कई बार शिकायत कर चुके थे। लेकिन प्रिंसिपल ने इन शिकायतों पर ध्यान नहीं दिया और कोई कदम नहीं उठाया।
यह स्कूल ‘काउंसिल फॉर द इंडियन स्कूल सर्टिफिकेट एग्जामिनेशन’ (CISCE) से जुड़ा है। यह एक गैर-सरकारी संगठन है। यह संस्था 1990 से स्कूल की पढ़ाई की देखरेख करती है। खास बात यह है कि प्रिंसिपल जी इमैनुएल खुद इस संस्था का अध्यक्ष है।
सेवेंथ डे स्कूल CISCE और गुजरात बोर्ड दोनों से जुड़ा हुआ है। चूंकि स्कूल के प्रिंसिपल खुद CISCE के अध्यक्ष हैं, इसलिए कई आरोप लग रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर परिषद का अध्यक्ष ही स्कूल का प्रिंसिपल है, तो स्कूल के खिलाफ कौन कार्रवाई करेगा?
हालाँकि, प्रिंसिपल इमैनुएल की तरफ से अभी तक कोई बयान नहीं आया है। पुलिस फिलहाल मामले की जाँच कर रही है।
पिछले साल तक भारत के खिलाफ बोलने वाले चीन के अब सुर बदल गए हैं। वह अमेरिका के भारत पर लगाए गए दोगुने टैरिफ को लेकर अब खुलकर भारत के पक्ष में खड़ा हो गया है। चीन ने भारत के समर्थन में एक सख्त और स्पष्ट संदेश दिया है।
चीन के भारत में राजदूत शू फेइहोंग ने कहा, “अमेरिका लंबे समय से मुक्त व्यापार से लाभ उठाता रहा है, लेकिन अब वह टैरिफ को सौदेबाजी के हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा है। ऐसे में चुप्पी केवल धमकाने वाले को और हिम्मत देती है। चीन भारत के साथ मजबूती से खड़ा रहेगा।”
नई दिल्ली के थिंक टैंक चिंतन रिसर्च फाउंडेशन और सेंटर फॉर ग्लोबल इंडिया इनसाइट्स की ओर से आयोजित कार्यक्रम में चीनी राजदूत फेईहोंग ने कहा कि भारत और चीन प्रतिद्वंद्वी नहीं बल्कि साझेदार हैं। दोनों देशों को आपस में रणनीतिक विश्वास और सहयोग को बढ़ाना चाहिए।
गौरतलब है कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारतीय सामानों पर के आयात पर 50% तक का शुल्क लगाने की घोषणा की है। पहले भारत पर 25% टैरिफ लगाया था, जो 7 अगस्त से लागू हो गया। बाद में घोषणा की 25% अतिरिक्त टैक्स लगेगा जिसके बाद ये कुल 50% हो गया। साथ ही ट्रंप ने चीन पर भी 30 प्रतिशत टैरिफ लगाया है।
असल में ये घोषणा भारत के रूस के साथ संबंधों और रूसी तेल को खरीदने के विरोध में लगाया गया है। अमेरिका का आरोप है कि भारत सस्ते रूसी तेल को खरीदकर मुनाफा कमा रहा है। इस पर चीन ने तीखी प्रतिक्रिया दी और इसे ‘आर्थिक धमकी’ की नीति कहा है।
चीन ने अमेरिका के टैरिफ नीति को की तीखी आलोचना करते हुए कहा कि वह इस प्रकार के टैरिफ का पूरी तरह से विरोध करता है। चीन का कहना है कि यह अमेरिका की एकतरफा और अनुचित व्यापार नीति है, जो वैश्विक व्यापार की व्यवस्था को नुकसान पहुँचा सकती है।
चीन के भारत में राजदूत शू फेइहोंग ने इस मुद्दे पर आगे कहा कि अमेरिका विभिन्न देशों से अत्यधिक कीमतें वसूलने के लिए दबाव बना रहा है और भारत पर लगाए गए टैरिफ इसी नीति का हिस्सा हैं।
राजदूत फेइहोंग ने यह भी कहा कि वह विश्व व्यापार संगठन (WTO) जैसे बहुपक्षीय व्यापार ढाँचे की रक्षा के लिए भारत का समर्थन करेगा। यह बयान भारत और चीन के बीच बढ़ते सहयोग और रणनीतिक साझेदारी को भी दर्शाता है।
आलोचक बन गए प्रशंसक
ग्लोबल टाइम्स, चीनी सरकार का वो अखबार जो भारत के खिलाफ नैरेटिव फैलाने के लिए कुख्यात था, वो अब भारत के साथ दोस्ती और विकास की बातें करने लगा है। ट्रंप के टैरिफ के बीच चीन अब भारत के साथ अपनी दोस्ती पक्की करने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहता है।
6 अगस्त 2025 को ग्लोबल टाइम्स ने एक ओपिनियन (विचार) प्रकाशित किया था। इसकी हेडलाइन थी “भारत ‘विदेशी निवेश का कब्रिस्तान’ के लेबल को क्यों नहीं हटा पा रहा?” इस लेख में तर्क दिया गया कि पश्चिमी मीडिया द्वारा फैलाया गया चीन और भारत के बीच ‘कौन किसकी जगह लेगा’ का नैरेटिव असल में बेबुनियाद है।
इसके अलावा भारत स्थित चीन के दूतावास की प्रवक्ता यू जिंग ने भी X पर यह लेख शेयर किया है। उन्होंने हाथी और ड्रेगन की दोस्ती दिखाने वाली तस्वीर शेयर कर लिखा, “आज के समय में दोनों देशों के लिए सहयोग और सहमति को बढ़ाना और एशिया व विश्व स्तर पर शांति को बढ़ावा देना समझदारी की बात होगी।”
भारत-चीन साझेदारी पर जोर
चीन ने भारत के साथ हाल ही में सीमा विवाद को सुलझाने के लिए WMCC कार्य समूह बनाने, सीमा बाजारों को फिर से खोलने और रिवर डेटा साझा करने जैसे कदम उठाए हैं। चीनी राजदूत ने भारत और चीन को एशिया की ‘डबल इंजन शक्ति’ बताया और कहा कि दोनों देशों को मिलकर बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था को मजबूत करना चाहिए।
फेइहोंग ने बताया, “भारतीय तीर्थयात्रियों के लिए चीन की ओर से कैलाश पर्वत और झील की यात्रा फिर से शुरू की है। भारत ने भी चीनी नागरिकों के लिए पर्यटक वीजा फिर से शुरू कर दिया है।” इसके जरिए दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक और रणनीतिक सहय़ोग को बढ़ाने की और काम किया जा रहा है।
इसके साथ ही यह भी उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अगले सप्ताह बीजिंग की यात्रा पर जाने वाले हैं। 2018 के बाद ये उनकी पहली चीन यात्रा होगी। इस यात्रा को दोनों देशों के बीच संबंधों को और मजबूत करने के अवसर के रूप में देखा जा रहा है।
गुवाहाटी पुलिस की क्राइम ब्रांच ने पत्रकार और यूट्यूबर अभिसार शर्मा के खिलाफ एक FIR दर्ज की है। यह FIR उनके एक यूट्यूब वीडियो के कारण दर्ज की गई है। शिकायत में कहा गया है कि अभिसार शर्मा ने अपने वीडियो में असम और केंद्र सरकार का मजाक उड़ाया है।
FIR में आरोप लगाया गया है कि उनका वीडियो सांप्रदायिक भावनाएँ भड़काता है। पुलिस ने यह मामला भारतीय न्याय संहिता 2023 (BNS) की धाराओं 152 (राजद्रोह), 196 और 197 के तहत दर्ज किया है।
शिकायत किसने और क्यों की?
यह शिकायत गुवाहाटी के रहने वाले आलोक बरुआ नाम के 23 वर्षीय व्यक्ति ने दर्ज कराई है। शिकायत में बताया गया कि अभिसार शर्मा ने असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा पर सांप्रदायिक राजनीति करने का आरोप लगाया। उन्होंने ‘राम राज्य’ के सिद्धांत का मजाक भी उड़ाया।
शिकायत में यह भी बताया गया है कि अभिसार शर्मा ने कहा कि सरकार ‘सिर्फ हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण’ पर टिकी है। शिकायतकर्ता का मानना है कि ये टिप्पणियाँ जानबूझकर सरकारों को बदनाम करने और लोगों में नफरत फैलाने के लिए की गई हैं।
शिकायतकर्ता के अनुसार, अभिसार शर्मा की टिप्पणियाँ समाज में शांति और सद्भाव को बिगाड़ने का काम सकती हैं। इसके अलावा अभिसार शर्मा का वीडियो उनके इलाके में भी चर्चा का विषय बन गया है, जिससे लोग चिंतित हैं।
आगे क्या होगा?
पुलिस का कहना है कि ये आरोप BNS के उन प्रावधानों के तहत आते हैं जो भारत की संप्रभुता और एकता को खतरे में डालते हैं। साथ ही, ये आरोप विभिन्न समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देने और राष्ट्रीय एकता के खिलाफ काम करने से जुड़े हैं।
इस मामले की जाँच अब गुवाहाटी पुलिस की क्राइम ब्रांच के हाथ में हैं। पुलिस सभी पहलुओं की जाँच करेगी कि क्या वीडियो में की गई टिप्पणियाँ वास्तव में कानून का उल्लंघन करती हैं या नहीं।
असम में घुपैठियों से निपटने के लिए सरकार ने बड़ा ऐलान किया है। असम सरकार ने फैसला किया है कि 18 साल से अधिक उम्र के लोगों का अब आधार कार्ड नहीं बनाया जाएगा। हालाँकि, इससे कुछ समुदायों को कुछ समय के लिए छूट दी गई है।
असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने गुरुवार (21 अगस्त 2025) को मंत्रिमंडल की बैठक के बाद बताया कि यह फैसला अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों को आधार कार्ड मिलने से रोकने के लिए लिया गया है। यह निर्णय अक्टूबर के पहले सप्ताह से लागू किया जाएगा। उन्होंने कहा कि अगर किसी का आधार कार्ड नहीं है तो वह सितंबर के महीने में इसके लिए आवेदन कर सकता है। वहीं, अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और चाय बागान समुदाय से जुड़े लोग अगले एक वर्ष तक आधार कार्ड बनवा सकेंगे।
103% हुआ आधार सैचुरेशन: CM हिमंता
सीएम हिमंता ने बताया है कि राज्य में आधार सैचुरेशन 103% हो गया है, जिसका मतलब है कि कोई भी 18 वर्ष से ऊपर का व्यक्ति बिना आधार कार्ड के नहीं बचा है। आधार सैचुरेशन 103% होने का मतलब है कि अगर 100 लोगों की जनसंख्या है तो 103 आधार कार्ड जारी कर दिए गए हैं। इसमें बांग्लादेशी घुसपैठियों को भी आधार कार्ड दिए जाने की आशंका है।
उन्होंने कहा, “SC, ST और चाय बागान समुदायों को इससे छूट दी गई है क्योंकि उनके बीच आधार का सैचुरेशन 96% है यानी 4% लोगों को अभी भी कवर किया जाना बाकी है।”
हिमंता ने कहा, “हम यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि कोई भी (अवैध विदेशी) असम में प्रवेश करके आधार कार्ड प्राप्त न कर सके और भारतीय नागरिक होने का दावा न कर सके। हमने वह रास्ता पूरी तरह से बंद कर दिया है।”
In Assam, barring a few sections of people, for whom we will be making an exception, everyone else has received an Aadhar Card.
New Aadhar cards will only be issued by DCs in rarest of rare cases to ensure a robust mechanism to check applications by illegal infiltrators. pic.twitter.com/X8I8Ta9r5w
हिमंता ने स्पष्ट कर दिया है कि दुर्लभतम मामलों में जिला आयुक्त (DC) को आधार कार्ड जारी करने का अधिकार होगा। उन्होंने कहा, “एक महीन के बाद SDC या सर्किल ऑफिसर आधार कार्ड जारी नहीं कर पाएँगे। केवल DC के पास यह अधिकार होगा।”
उन्होंने कहा कि आधार कार्ड जारी करने से पहले DC को SB (स्पेशल ब्रांच) रिपोर्ट और विदेशी न्यायाधिकरण की रिपोर्ट की जांच करनी होगी।
असम में बांग्लादेश से होने वाली घुसपैठ एक बड़ी समस्या है। घुसपैठिए स्थानीय लोगों की मदद से आधार कार्ड जैसे दस्तावेज बनवा लेते हैं और फिर उनका इस्तेमाल कर अन्य कागजात भी उन्हें मिल जाते हैं। सीएम हिमंता के इस फैसले के बाद अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों के लिए असम में आधार कार्ड हासिल करना बहुत मुश्किल हो जाएगा।
असम में तेजी से बदल रही डेमोग्राफी, 2041 तक बराबर होंगे हिंदू-मुस्लिम
हिमंता ने पिछले महीने बताया था कि राज्य में 2041 तक मुस्लिम जनसंख्या हिंदुओं के बराबर हो जाएगी। सीएम सरमा ने बताया था कि 2011 में असम की कुल जनसंख्या 3.12 करोड़ थी, जिसमें मुस्लिम जनसंख्या 1.07 करोड़ (लगभग 34.22%) और हिंदू जनसंख्या 1.92 करोड़ (लगभग 61.47%) थी।
उन्होंने कहा था कि असम में रहने वाले महज 3% मुस्लिम ही असमिया मूल के हैं जबकि 31% मुस्लिम आबादी घुसपैठिए हैं जो मुख्यतः बांग्लादेश से आए हैं। उन्होंने इस बात की भी आशंका जताई कि अगर इसी तरह चलता रहा तो 2021, 2031 और 2041 तक असम की जनसंख्या में 50 फीसदी तबका मुस्लिम होगा और हिंदू समुदाय अल्पसंख्यक बन जाएगा।
हिमंता ने बताया था कि 2001 में असम के 23 जिलों में से 6 मुस्लिम बहुल थे। इनमें धुबरी (74.29), गोलपारा (53.71), बारपेटा (59.37), नगांव (51), करीमगंज (52.3) और हैलाकांडी (57.63) थी। 2011 में जिलों की संख्या 27 हुई और इनमें 9 जिले मुस्लिम बहुल हो गए।
सीएम सरमा ने जनसांख्यिकीय बदलाव पर कहा कि ये सिर्फ ‘भूमि जिहाद’ ही नहीं बल्कि असम को खत्म करने वाला जिहाद है। योजनाबद्ध तरीके से मुस्लिम आबादी सरकारी और जंगलों की जमीन पर भी कब्जा कर रही है। इसके कारण असम की सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक पहचान खतरे में पड़ गई है। अगर यही प्रवृत्ति जारी रही तो अगले 20 वर्षों में असम के मूल निवासी अल्पसंख्यक बन सकते हैं।
असम में 4 साल में घुसपैठियों से छुड़ाई गई 1.29 लाख बीघा जमीन
असम में घुसपैठ से निपटने के लिए कई कदम उठाए जा रहे हैं। जिनमें बांग्लादेशी घुसपैठियों को पहचानकर वापस उनके देश भेजना और घुसपैठियों द्वारा जबरन कब्जाई गई जमीन को खाली कराना जैसे कार्यक्रम शामिल हैं।
हिमंता ने बीते महीने ही बताया था कि असम में लगभग 29 लाख बीघा जमीन पर ‘बांग्लादेशी घुसपैठिए और संदिग्ध नागरिकों’ का कब्जा है। उन्होंने कहा था, “2021 में जमीन खाली कराने की योजना शुरू की गई थी जिसके तहत अब तक 77,420 बीघा जमीन को अतिक्रमण से साफ कर दिया गया है। इसमें अधिकतर बंगाल के मुस्लिमों का कब्जा था।”
हिमंता ने कहा था, “दरंग जिले में अभियान की सफलता के बाद बोरसोल्ला, लुमडिंग, बुरहापहाड़, पाभा, बतद्रा, चापर और पैकन में भी इस अभियान को चलाया गया। पिछले 4 वर्षों में हमने 1.29 लाख बीघा कब्जे वाली जमीन को मुक्त कराया है। अब इस जमीन का एक बड़ा हिस्सा जंगल बनाने के लिए और प्रदेश की जनता के लिए उपयोग में लाया जा रहा है।”
बड़ी संख्या में बांग्लादेशी घुसपैठिए असम का रुख करते हैं। सीएम हिमंता ने इस बात को बार-बार दोहराया है कि वे बांग्लादेशी घुसपैठियों से असम को मुक्त करना चाहते हैं और इसके लिए वो लगातार अभियान भी चला रहे हैं।
टैरिफ विवाद के बीच भारत पर अलग ढंग से व्यापार का दबाव बनाने के लिए ट्रंप ने नया दांंव चला है। पहले जहाँ खबर आई थी कि ट्रंप ने कहा कि अमेरिकी एजेंसी USAID ने भारत में मतदान बढ़ाने के लिए 175 करोड़ रुपये दिए। लेकिन नई दिल्ली में अमेरिकी दूतावास ने इसे सिरे से खारिज कर दिया।
अमेरिकी दूतावास ने भारत के विदेश मंत्रालय को बताया कि 2014 से 2024 तक USAID ने भारत में चुनाव या मतदान से जुड़ा कोई काम नहीं किया और न ही ऐसी कोई रकम दी या ली और न ही भारत में मतदान से जुड़ी कोई गतिविधि की।
Big Breaking: US embassy in Delhi contradicts Trump's $21m voter funding claim
US Embassy tells India's foreign ministry that USAID/India did not receive/provide funding of $21 m for voter turnout in India (FY 2014 to 2024) nor implemented any voter turnout-related activities https://t.co/ByUadmf11wpic.twitter.com/aIL9YCIx0l
फरवरी 2025 में विवाद तब शुरू हुआ जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिकी विभाग DOGE (Department of Government Efficiency) की एक समीक्षा का हवाला देते हुए दावा किया कि USAID दुनिया भर में चुनाव और मतदाता संबंधी परियोजनाओं को फंड कर रहा है।
ट्रंप ने खास तौर पर कहा कि भारत को भी इसमें शामिल किया गया था और 2.1 करोड़ डॉलर (174.3 करोड़ रुपए) मतदाता संख्या बढ़ाने के लिए रखे गए थे। इस दावे से नई दिल्ली में तुरंत चिंता बढ़ी और भारत के विदेश मंत्रालय (MEA) ने अमेरिका से पूरे मामले की विस्तृत जानकारी माँगी।
28 फरवरी 2025 को विदेश मंत्रालय ने नई दिल्ली स्थित अमेरिकी दूतावास से पिछले दस सालों में भारत में चलाए गए सभी USAID कार्यक्रमों की पूरी जानकारी देने को कहा। मंत्रालय ने खर्च का विवरण, सहयोगी संगठनों की जानकारी और यह भी पूछा कि क्या किसी तरह की मतदाता जुटाने से जुड़ी गतिविधियाँ हुई थीं।
इस पर अमेरिकी दूतावास ने 2 जुलाई 2025 को जवाब देते हुए आंकड़े सौंपे। दूतावास ने साफ किया कि सभी कार्यक्रम केवल भारत सरकार के साथ किए गए सात साझेदारी समझौतों के तहत ही चलाए गए हैं। ये कार्यक्रम मुख्य रूप से विकास सहयोग, स्वास्थ्य, शिक्षा, ऊर्जा और शासन सुधार से जुड़े थे, न कि मतदान या चुनाव से।
अमेरिकी दूतावास ने साफ कहा कि USAID भारत ने 2014 से 2024 के बीच भारत में मतदान के लिए न तो 21 मिलियन डॉलर (175 करोड़ रुपए) लिए और न ही दिए और न ही कोई मतदान संबंधी गतिविधि चलाई।
29 जुलाई 2025 को दूतावास ने एक और पत्र भेजकर इस रुख को दोहराया और विदेश मंत्रालय को बताया कि बाइडेन प्रशासन के फैसले के बाद भारत में USAID के सभी काम 15 अगस्त 2025 तक बंद हो जाएँगे।
इसके बाद 11 अगस्त 2025 को दूतावास ने आर्थिक मामलों के विभाग को लिखे पत्र में पुष्टि की कि भारत के साथ किए गए सभी सात साझेदारी समझौते समाप्त कर दिए गए हैं। यह बयान ट्रंप के उन आरोपों के बीच अहम है, जिनमें उन्होंने अमेरिकी विदेशी सहायता के राजनीतिक इस्तेमाल की बात कही थी। ट्रंप के दावे जनवरी 2025 के कार्यकारी आदेश 14169 के बाद सामने आए थे, जिसके तहत विदेशी सहायता कार्यक्रमों की बड़ी समीक्षा शुरू की गई थी।
हालाँकि DOGE ने दुनिया भर में चुनाव और राजनीतिक प्रक्रियाओं को मजबूत करने वाली CEPPS परियोजनाओं के लिए USAID द्वारा दिए गए 486 मिलियन डॉलर(4,033.8 करोड़ रुपए) के फंड को रद्द करने का ऐलान किया था, लेकिन नई दिल्ली स्थित दूतावास ने साफ कर दिया कि भारत को इसमें से कुछ भी नहीं मिला।
इसके साथ ही दूतावास ने 2022, 2023 और 2024 के लिए कार्यक्रमों और लाभार्थियों का पूरा ब्यौरा भी जारी किया। अधिकारियों ने फिर जोर देकर कहा कि भारत में USAID की सारी गतिविधियाँ विकास से जुड़ी और पारदर्शी हैं और उनका चुनाव या राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है।
अमेरिकी दूतावास ने यह भी बताया कि 15 अगस्त 2025 तक USAID के सारे काम भारत में बंद हो चुके हैं। ट्रंप का दावा गलत साबित होने से उनकी विश्वसनीयता पर फिर सवाल उठे हैं।