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UK में ग्रूमिंग जिहाद की शिकार बच्चियों का पुलिसवाले भी करते थे रेप, 11 साल की लड़की तक का दुष्कर्म किया… रेपिस्ट कॉन्स्टेबल हसन अली बिना सजा पाए मरा: 5 पीड़िताओं ने अब सुनाई आपबीती

ब्रिटेन के रोथरहम में एक भयावह सच सामने आया है। पाँच पीड़ित महिलाओं ने खुलासा किया है कि पाकिस्तानी मुस्लिम पुरुषों की गैंग ने न सिर्फ उनके बचपन को तबाह किया, बल्कि साउथ यॉर्कशायर पुलिस (SYP) के कुछ पुलिस वालों ने भी उनकी जिंदगी नर्क बना दी।

एक पीड़िता ने सनसनीखेज आरोप लगाया कि दो पुलिस वालों ने उसका यौन शोषण किया, जिसमें से एक का नाम पीसी हसन अली था। बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, इन दोनों पुलिस वालों ने न सिर्फ उसका शोषण किया, बल्कि उसे नशे की दवाइयाँ भी दीं। हसन अली की जनवरी 2015 में एक कार दुर्घटना में मौत हो गई। उस वक्त वह शोषण के मामले में जाँच के दायरे में था और उसे प्रतिबंधित ड्यूटी पर रखा गया था, लेकिन उसे कभी गिरफ्तार नहीं किया गया।

पुलिस की सफाई और छिपी सच्चाई

साउथ यॉर्कशायर पुलिस ने दावा किया कि हसन अली के खिलाफ शिकायतें थीं, लेकिन ये सिर्फ ‘एक पीड़िता को बार-बार डेट के लिए पूछने, गोपनीय जानकारी साझा करने और पीड़ितों की सुरक्षा में नाकामी’ से जुड़ी थीं। पुलिस ने नशे की सप्लाई के आरोपों को खारिज किया। लेकिन ‘ऑपरेशन लिंडन’ में दो साल तक काम करने वाले गैरी हार्पर ने इस दावे को झूठा करार दिया।

गैरी हार्पर ने दो साल तक इंडिपेंडेंट ऑफिस फॉर पुलिस कंडक्ट (आईओपीसी) के लिए जाँच जीस जिसमें एसवाईपी द्वारा 1997 से 2013 तक रॉदरहैम में चाइल्ड सेक्सुअल एब्यूज की रिपोर्ट्स को कैसे हैंडल किया गया, ये पता लगाना था।

अपनी जाँच के बाद हार्पर ने बताया कि हसन अली पर नशा सप्लाई करने और पीड़िताओं के यौन शोषण के कई गंभीर आरोप थे। उन्होंने यह भी खुलासा किया कि दूसरा पुलिस वाला भी इन घिनौनी हरकतों में शामिल था, लेकिन उसे रिटायर होने की इजाजत दे दी गई। हार्पर ने इसे पुलिस की बदनामी छिपाने की कोशिश बताया और कहा, “ये सबसे अच्छे हाल में उनकी प्रतिष्ठा बचाने की कोशिश थी। और सबसे बुरे हाल में, ये खुला भ्रष्टाचार था।”

पुलिस की क्रूरता और पीड़िताओं का दर्द

पीड़िताओं ने बताया कि 1990 के दशक के मध्य से 2000 के शुरुआती सालों तक, पुलिस वालों ने पाकिस्तानी गैंग के साथ मिलकर उनका शारीरिक और यौन शोषण किया। ज्यादातर पीड़िताएँ उस वक्त किशोर थीं, लेकिन कुछ तो महज 11 साल की थीं।

एक पीड़िता ने बताया कि गैंग ने उसका बार-बार बलात्कार किया और उसे गैरकानूनी गर्भपात के लिए मजबूर किया। जब एक यूथ वर्कर ने सोशल सर्विस और पुलिस को इसकी सूचना दी, तो उसी पुलिस वाले ने उसका बयान लिया, जो उसका शोषण कर रहा था। कुछ दिन बाद, उस पुलिस वाले ने पीड़िता के सामने उसका बयान फाड़कर कूड़ेदान में फेंक दिया। इस घटना के बाद कोई कार्रवाई नहीं हुई।

12 साल की बच्ची को पुलिस की गाड़ी में बनाया शिकार

एक अन्य पीड़िता ने बताया कि जब वह 12 साल की थी, तब एक पुलिस वाले ने उसे एक पुलिस गाड़ी में यौन शोषण का शिकार बनाया। उसने धमकी दी कि अगर उसने उसका विरोध किया, तो वह उसे वापस उन बलात्कारियों के पास भेज देगा। एक महिला जो 1990 के दशक में फोस्टर केयर में थी और बच्चों के आश्रय गृह से बार-बार भागती थी, उसने बताया कि एक पुलिस वाला उसे ढूँढकर एक खाली मकान में ले जाता और बलात्कार करता।

पीड़िता ने कहा, “वह जानता था कि हमारी कोई सुनवाई नहीं होगी। हम अनाथ थे, कमजोर थे, और वह हमारा डर जानता था। वह जानता था कि हम कुछ नहीं बोल पाएँगे।”

पुलिस और कानूनी व्यवस्था पर भरोसा टूटा

30 पीड़िताओं में से सिर्फ 17 ने अपनी सहमति दी कि उनके बयान पुलिस जाँच में इस्तेमाल किए जाएँ। कई पीड़िताओं ने अब इस जाँच से खुद को अलग कर लिया है, क्योंकि उनका पुलिस और कानूनी व्यवस्था पर से भरोसा पूरी तरह उठ चुका है।

गैरी हार्पर ने साउथ यॉर्कशायर पुलिस पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि पुलिस ने हर संभव तरीके से जवाबदेही से बचने की कोशिश की। उन्होंने आठ साल की जाँच को ‘शुरू से अंत तक पूरी तरह नाकाम’ करार दिया।

कुछ कार्रवाई, लेकिन सजा का नामोनिशान नहीं

वॉचडॉग ने 43 पुलिस वालों के खिलाफ शिकायतों को सही पाया, जिनमें से आठ पर छोटे-मोटे गलत व्यवहार और छह पर गंभीर भ्रष्टाचार के आरोप थे। इसके बावजूद, किसी भी पुलिस वाले को न तो कोई सजा हुई और न ही उनकी नौकरी गई।

दिसंबर 2024 से अब तक तीन पूर्व पुलिस वालों को बलात्कार की कोशिश, यौन उत्पीड़न और अपने पद के दुरुपयोग जैसे गंभीर आरोपों में गिरफ्तार किया गया है। ये अपराध 1995 से 2004 के बीच हुए, जब ये पुलिस वाले ड्यूटी पर थे। लेकिन अभी तक इनमें से किसी को भी सजा नहीं हुई है।

नई जाँच की शुरुआत

साउथ यॉर्कशायर पुलिस की मेजर क्राइम यूनिट अब पुलिस वालों की इस घिनौनी साजिश की नई जाँच शुरू कर रही है। यह जाँच पुलिस वॉचडॉग की निगरानी में होगी। स्वतंत्र पुलिस आचरण कार्यालय (IOPC) ने 91 जाँचें कीं, जिनका निष्कर्ष 2022 में आया।

IOPC के एक प्रवक्ता ने कहा, “हमने पाया कि उस दौरान साउथ यॉर्कशायर पुलिस कमजोर बच्चों और युवाओं की सुरक्षा में पूरी तरह नाकाम रही।”

रोथरहम में 1400 बच्चियों का शोषण

2014 में प्रोफेसर एलेक्सिस जे की जाँच से खुलासा हुआ कि 1997 से 2013 के बीच रोथरहम में कम से कम 1,400 बच्चियों का यौन शोषण हुआ। जे ने अपनी रिपोर्ट में कहा, “हमने जो सबूत देखे और सुने, उनके आधार पर ज्यादातर पीड़ितों ने अपने शोषकों को पाकिस्तानी मूल का बताया।”

पाकिस्तानी गैंग और पुलिस की मिलीभगत का काला सच

ब्रिटेन में कई दशकों से पाकिस्तानी गैंग ग्रूमिंग जिहाद करते हुए नाबालिग ब्रिटिश लड़कियों को निशाना बनाते रहे हैं। इन गैंग्स ने बलात्कार, शारीरिक शोषण और यातना जैसे जघन्य अपराध किए। सरकार, पुलिस और मीडिया पर भी गंभीर आरोप हैं कि उन्होंने इन अपराधों की गंभीरता को दबाने की कोशिश की, ताकि नस्लवाद का ठप्पा न लगे।

यह घिनौना सच अब धीरे-धीरे सामने आ रहा है, लेकिन पीड़िताओं को अभी तक इंसाफ का इंतजार है। उनकी आवाजें दबाई गईं, उनके बयान फाड़े गए और उनकी जिंदगियाँ तबाह कर दी गईं। अब सवाल यह है कि क्या इस नई जाँच से इन पीड़िताओं को इंसाफ मिल पाएगा या यह भी एक और नाकाम कोशिश साबित होगी?

‘CJI कोई पोस्ट ऑफिस नहीं’: सुप्रीम कोर्ट ने कपिल सिब्बल को लगाई लताड़, जस्टिस यशवंत वर्मा मामले में CJI के ‘एक्शन’ पर उठा रहे थे सवाल

जस्टिस यशवंत वर्मा मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कपिल सिब्बल को फटकार लगाई। कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि CJI को पोस्ट ऑफिस मत समिझए, जो सिर्फ फाइलें आगे बढ़ाते हैं। कोर्ट ने अपने आदेश में यशवंत वर्मा की रिट याचिका पर भी फैसला सुरक्षित रख लिया है।

बुधवार (30 जुलाई, 2025) को सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “भारत के CJI का काम केवल पोस्ट ऑफिस की तरह चिट्ठी भेजना नहीं है। अगर उनके पास किसी जज के गलत आचरण का सबूत है तो वे उसे राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को सूचित करना उनका अधिकार है।”

सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणियाँ जस्टिस यशवंत वर्मा की रिट याचिका पर सुनवाई के दौरान की। जिसमें उन्होंने आंतरिक जाँच रिपोर्ट को चुनौती दी थी। इस रिपोर्ट में CJI संजीव खन्ना की राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से यशवंत वर्मा को हटाने की सिफारिश की गई थी। सुनवाई जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एजी मसीह की पीठ ने की।

इस दौरान कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि इन-हाउस कमेटी के जज की बर्खास्तगी की सिफारिश करना गैर-कानूनी है। उन्होंने कहा कि आर्टिकल 124 के तहत ही महाभियोग प्रक्रिया हो सकती है। सिब्बल ने कहा कि ऐसा करके CJI संसद के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप कर रहे हैं, यह ‘अस्वीकार्य’ है। इसी पर सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें लताड़ लगाई।

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान ‘कैश कांड’ वाले जस्टिस यशवंत वर्मा के रवैए पर भी प्रश्न उठाए। कोर्ट ने कहा, “आप जो मुद्दे उठा रहे हैं, वे महत्वपूर्ण हैं लेकिन पहले भी उठाए जा सकते थे, इसलिए आपका आचरण विश्वास पैदा नहीं करता और आपका आचरण बहुत कुछ कहता है। आप नहीं चाहते कि यहाँ कुछ भी उजागर हो। संसद को फैसला करने दीजिए। हम यह क्यों तय करें कि यह आपका पैसा है या नहीं? यह आंतरिक समिति का काम नहीं था।”

साथ ही जस्टिस दत्ता ने इन-हाउस रिपोर्ट पर कहा कि यह केवल शुरुआती जाँच का निष्कर्ष है और CJI की सिफारिश केवल एक ‘सलाह’ है। कोर्ट ने कहा कि निष्कासन केवल संसद की प्रक्रिया के अनुसार हो सकता है, इन-हाउस रिपोर्ट के अनुसार बिल्कुल भी नहीं हो सकता।

यशवंत वर्मा के घर से मिले थे अधजले नोट

जस्टिस यशवंत वर्मा के दिल्ली स्थित निवास स्थान पर 14 मार्च 2025 को आग लग गई थी। इस आगजनी में घर के स्टोर रूप में बड़ी मात्रा में अधजले नोट मिले थे। इसको लेकर जाँच के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक कमेटी बनाई थी।

कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि कई गवाहों, वीडियो और तस्वीरों से यह साबित होता है कि जस्टिस वर्मा के दिल्ली वाले घर के स्टोररूम में बड़ी मात्रा में कैश खासकर 500 रुपए के नोट मिले थे, जिनमें से कुछ आधे जले हुए थे।

सबसे हैरानी की बात यह है कि इतनी बड़ी घटना के बावजूद ना तो जस्टिस वर्मा और ना ही उनके परिवार ने पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई थी और ना ही अपने किसी वरिष्ठ को सूचना दी थी।

₹35 लाख में सेरोगेसी का लालच देकर दे दिया किसी और का बच्चा, DNA जाँच में असलियत आई सामने तो धमकाने लगी: डॉक्टर समेत 8 गिरफ्तार, हैदराबाद का मामला

सरोगेसी के नाम पर हैदराबाद फर्टिलिटी क्लिनिक ने दंपती से 35 लाख रुपए लेकर उन्हें किसी और का बच्चा दे दिया दे दिया है। पुलिस जाँच में पता चला कि बच्चा एक गरीब परिवार से मात्र 90,000 रुपए में खरीदा गया था और उसे दंपत्ति को उनके बेटे के रूप में दे दिया गया।

DNA जाँच में जब सच्चाई सामने आई तो दंपती ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई, जिसके बाद मामला सामने आया। पुलिस जाँच में ये पता चला की यूनिवर्सल सृष्टि फर्टिलिटी सेंटर अवैध सरोगेसी रैकेट बिना किसी लाइसेंस के चल रहा था।

मामले में अब तक आठ लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है और अन्य कई दंपतियों की जाँच जारी है, पुलिस को शक है कि और भी लोगों को इसी तरह ठगा गया होगा।  

झूठी सरोगेसी और जाली दस्तावेज

राजस्थान के एक दंपती ने अगस्त 2024 में हैदराबाद स्थित यूनिवर्सल सृष्टि फर्टिलिटी सेंटर से संपर्क किया। क्लिनिक की संचालिका डॉ अथलुरी नम्रता ने उन्हें सरोगेसी का सुझाव दिया और आश्वासन दिया कि प्रक्रिया में उनके ही भ्रूण का प्रत्यारोपण किया जाएगा।

इलाज के नाम पर दंपती से करीब 35 लाख रुपये वसूले गए और बताया गया कि एक सरोगेट माँ गर्भवती है। जून 2025 में उन्हें बताया गया कि विशाखपटनम में सरोगेट ने एक बेटे को जन्म दिया है। बच्चे को सौंपने से पहले दो लाख रुपये प्रसव के नाम पर लिया गया और साथ ही एक जाली जन्म प्रमाण पत्र भी दिया गया, जिसमें बच्चे को उनका अपना बेटा (जैविक पुत्र) बताया गया था।

शंका होने पर दंपती ने दिल्ली की फोरेंसिक लैब में DNA परीक्षण कराया, जिसमें साफ हुआ कि बच्चे का दंपती से कोई बोयोलॉजिकल रिश्ता नहीं है। जब उन्होंने क्लिनिक से स्पष्टीकरण माँगा तो डॉ नम्रता ने बातचीत बंद कर धमकी देना शुरू कर दिया। इसके बाद दंपती ने गोपालपुरम पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई।

पुराने मामले और अवैध नेटवर्क का भंडाफोड़

शिकायत मिलने के बाद पुलिस ने कार्रवाई करते हुए डॉ नम्रता, उनके बेटे पी जयंत कृष्णा, सरकारी गाँधी अस्पताल के डॉक्टर नरगुला सदानंदम, एजेंट धनश्री संतोषी, दो क्लिनिक कर्मचारियों और बच्चे के बोयोलॉजिकल माता-पिता सहित कुल आठ लोगों को गिरफ्तार किया।

रिपोर्ट के अनुसार, जाँच में पता चला कि बच्चा असम के एक गरीब परिवार से 90,000 रुपये में खरीदा गया था और माँ को प्रसव के लिए विशाखपटनम भेजा गया। दो दिन बाद बच्चे को दंपती को सौंप दिया गया।

डॉ नम्रता पहले भी दो बार विवादों में रह चुकी हैं। 2016 में एक NRI दंपती ने उन पर फर्जी सरोगेसी का आरोप लगाया था, जिसके चलते उनका लाइसेंस पाँच साल के लिए निलंबित किया गया। 2020 में उन्हें विशाखापटनम पुलिस ने नवजात बच्चों की तस्करी के मामले में गिरफ्तार किया था। अब तक उनके खिलाफ हैदराबाद, विशाखपटनम और गुंटूर में दस से अधिक मामले दर्ज हो चुके हैं।

पुलिस और स्वास्थ्य विभाग की संयुक्त छापेमारी में पाया गया कि क्लिनिक बिना वैध लाइसेंस के IVF, भ्रूण निर्माण, लिंग परीक्षण, MTP जैसी संवेदनशील प्रक्रियाएँ चला रहा था। क्लिनिक के भीतर लिंग परीक्षण उपकरण, नाइट्रस ऑक्साइड सिलेंडर और अन्य अवैध उपकरण बरामद हुए हैं।

कैसे चलता था फर्जीवाड़ा और आगे की कार्रवाई

क्लिनिक दंपतियों को यह भरोसा दिलाता था कि उनके ही भ्रूण से बच्चा जन्मेगा। लेकिन वास्तव में किसी भी सरोगेट माँ से संबंध नहीं होता था और गरीब महिलाओं से नवजात बच्चे खरीदकर उन्हें सौंपा जाता था।

क्लिनिक की ओर से लगातार झूठी जानकारी दी जाती थी कि गर्भावस्था सामान्य चल रही है। जब ग्राहक सवाल उठाते तो उन्हें धमकाया जाता था। स्वास्थ्य विभाग ने क्लिनिक को सील कर दिया है और अन्य शाखाओं कोंडापुर, विजयवाड़ा और विशाखपटनम में भी जाँच चल रही है।

DCP रश्मि पेरुमल ने बताया कि उन सभी दंपतियों की जाँच की जा रही है जिन्होंने क्लिनिक की किसी भी शाखा से IVF या सेरोगेसी सेवा ली थी। पुलिस का मानना है कि यह सिर्फ एक मामला नहीं, बल्कि एक बड़े सरोगेसी-तस्करी रैकेट का हिस्सा है, जो वर्षों से गरीबों का शोषण कर रहा है।

अमेरिका ने भारत पर लगाया 25% टैरिफ, रूस से ‘दोस्ती’ पर ‘पेनाल्टी’ भी जोड़ी: राष्ट्रपति ट्रंप ने किया ऐलान, जानिए हमारे एक्सपोर्ट पर इसका क्या होगा असर

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ऐलान किया है कि 1 अगस्त, 2025 से भारत को अपने निर्यातों पर 25% टैरिफ देना होगा। इसके अलावा उसे पेनाल्टी के रूप में कुछ और प्रतिशत का टैरिफ भी झेलना होगा। इसका ऐलान उन्होंने बुधवार (30 जुलाई, 2025) को किया है।

ट्रंप ने अपने प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर यह ऐलान किया है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने लिखा, “भारत भले हमारा मित्र है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में हमने उसके साथ बहुत कम व्यापार किया है क्योंकि उसके यहाँ टैरिफ़ बहुत ज़्यादा हैं, दुनिया में सबसे ज़्यादा हैं, और किसी भी देश की तुलना में उसके यहाँ सबसे कठोर व्यापार बैरियर हैं।”

ट्रंप ने आगे लिखा, “इसके अलावा, उन्होंने हमेशा अपने अधिकांश हथियार रूस से ही खरीदे हैं और चीन के साथ मिलकर वह रूस के तेल का सबसे बड़ा खरीददार है। वो भी ऐसे समय में जब हर कोई चाहता है कि रूस यूक्रेन में हत्याएँ रोके, इसलिए सब कुछ ठीक नहीं है।”

ट्रंप ने इसके बाद भारत के खिलाफ टैरिफ रेट्स का भी ऐलान किया। उन्होंने कहा, “सब कुछ ठीक नहीं है! इसलिए, भारत को 1 अगस्त से 25% टैरिफ़ और बाकी बताए गए कारणों के चलते पेनाल्टी भी भरनी होगी।” ट्रंप ने इससे पहले दोनों देशों के बीच डील फाइनल ना होने की बात कही थी।

भारत वर्तमान में अमेरिका से एक व्यापार समझौते को लेकर बातचीत कर रहा है। हालाँकि, कई मुद्दों पर बातचीत फंसी हुई है। इस बीच ट्रंप ने भारतीय सामान के अमेरिका में जाने पर यह नए टैरिफ घोषित कर दिए हैं। इससे जब तक भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौता नहीं होता, तब तक भारतीय निर्यातकों को परेशानी उठानी पड़ेगी।

इसका भारत पर क्या असर?

इन टैरिफ का सीधा असर भारत के अमेरिका को होने वाले निर्यात पर पड़ेगा। अब अमेरिकी बाजार में भारतीय सामान 25% महँगे दामों पर बिकेंगे। इससे उनकी अमेरिकी स्थानीय उत्पादों या फिर दूसरे देश से आए उत्पादों के मुकाबले किफायत कम हो जाएगी। भारतीय सामानों पर अभी तक अमेरिका में औसतन 3% का टैरिफ लगता आया है।

अमेरिका भारत का सबसे बड़ा निर्यात सहयोगी है। रिपोर्ट बताती हैं कि भारत ने 2024 में अमेरिका को 87 बिलियन डॉलर (लगभग ₹7.5 लाख करोड़) का निर्यात किया। भारत के कुल निर्यात में अमेरिका की हिस्सेदारी 18% है। अमेरिका के साथ भारत व्यापार अधिशेष में रहता है। यानी अमेरिका को भारत जितना निर्यात करता है, उससे कम अमेरिकी सामान का आयात करता है।

भारत अमेरिका टैरिफ ट्रम्प

विदेशों के साथ व्यापार का लेखाजोखा रखने वाले वाणिज्य मंत्रालय के अनुसार, वर्ष 2024-25 की तीन तिमाहियों (अप्रैल-जून) में ही भारत की तरफ व्यापार का पलड़ा लगभग 30 बिलियन डॉलर (लगभग ₹2.5 लाख करोड़) से अधिक झुका है।

अब यह स्थिति कुछ बदल सकती है। राष्ट्रपति ट्रंप के इस कदम का नुकसान भारतीय फार्मा कम्पनियों और टेलीकॉम क्षेत्र को होगा। वाणिज्य मंत्रालय के आँकड़ों के अनुसार, 2024-25 के अप्रैल से जून के बीच भारत ने अमेरिका को ₹63 हजार करोड़ से ज्यादा की दवाइयाँ बेचीं हैं।

भारत अमेरिका टैरिफ ट्रम्प

वहीं भारत ने इसी दौरान ₹55 हजार करोड़ से अधिक के टेलीकॉम उत्पाद भी अमेरिका को बेचे हैं। इसके बाद रत्न और हीरे भी भारत का बड़ा निर्यात हैं। अब इन सब पर असर पड़ेगा। संभव है कि उनके निर्यात में कुछ कमी देखने को मिले। हालाँकि, भारत पहले ही इन टैरिफ की तैयारी कर चुका है।

फरवरी, 2025 में आई सिटीबैंक की एक रिपोर्ट कहती है कि भारत को अमेरिका के टैरिफ से लगभग ₹50 हजार करोड़ का नुकसान सालाना हो सकता है। रिपोर्ट बताती है कि सबसे अधिक नुकसान स्टील और एल्युमीनियम जैसे सेक्टर उठाएँगे। दवाइयों को लेकर थोड़ा असर जरूर पड़ेगा लेकिन इससे कोई ख़ास अंतर नहीं आने वाला।

सिटीबैंक की रिपोर्ट के इतर, भारतीय स्टेट बैंक की एक रिपोर्ट ने बताया था कि भारत को चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। स्टेट बैंक की रिपोर्ट कहती है कि अमेरिका के इस कदम के बाद भारत के अमेरिका को निर्यातों में लगभग 3%-3.5% की कमी आ सकती है। भारत इसे आसानी से झेल सकता है।

क्या अंतिम चरण में है ट्रेड डील?

भारत और अमेरिका के बीच बीत कुछ महीनों से लगातार व्यापार समझौते पर बातचीत चल रही है। डेयरी और कृषि जैसे मुद्दों पर यह बात फँसी हुई है। हालाँकि, अब इन टैरिफ के ऐलान के बाद यह व्यापार जल्द हो सकता है। यह समझौता जल्द से जल्द हो जाए, यह दोनों देश चाहते हैं।

चीन से टैरिफ की लड़ाई के चलते पहले ही वहां से आने वाले सामानों को लेकर अमेरिका में समस्याएँ पैदा हो चुकी हैं। ऐसे में भारत स व्यापार समझौता अमेरिका के पक्ष में भी है। इसके अलावा इस टैरिफ का नुकसान उन अमेरिकी कंपनियों को उठाना पड़ेगा, जो भारत से सामान या सेवाएँ आयात करती हैं।

भारत जबकि दूसरे तरफ अपने निर्यात में कोई समस्या नहीं आने देना चाहेगा, इसलिए वह जल्द यह समझौता करना चाहेगा। विश्लेषकों ने कहा है कि ट्रंप ने ऐसे ही धमकी भरे ट्वीट जापान और यूरोपियन यूनियन को लेकर भी दिए थे। हालाँकि, इसके कुछ ही दिनों में डील हो गई। ऐसे में यह भी अनुमान लगाया जा रहा है कि भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौता आखिरी चरणों में हो।

743 किमी दूर रहकर पृथ्वी पर रखेगा नजर, दुनिया होगी ‘निसार’: ISRO-NASA का सेटेलाइट हर 12 दिन पर धरती को करेगा स्कैन, सबको फ्री में मिलेगी हर जानकारी

भारत आंध्र प्रदेश राज्य में श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से बुधवार (30 जुलाई 2025) को एक बेहद महत्वाकांक्षी मिशन के सेटेलाइट ‘निसार’ को GSLV-F16 प्रक्षेपण यान के जरिए लॉन्च किया गया। ये सेटेलाइट केंद्र से उड़ान भरकर सूर्य की समकालिक ध्रुवीय कक्षा में स्थापित होगा।

निसार का पूरा नाम ‘नासा-इसरो सिंथेटिक अपर्चर रडार’ (NASA-ISRO Synthetic Aperture Radar) है। ये एक अत्याधुनिक पृथ्वी-अवलोकन सेटेलाइट है, जिसे भारत के इसरो और अमेरिका की नासा ने संयुक्त रूप से विकसित किया है।

फोटो साभार- X- @isro

इस सेटेलाइट का वजन 2,392 किलोग्राम है और यह दुनिया का पहला बड़ा उपग्रह है। इसमें दो फ्रीक्वेंसी बैंड लगाए गए हैं। L-बैंड NASA की ओर से और S-बैंड ISRO द्वारा लगाए गए हैं। यह दोहरे बैंड वाला रडार सिस्टम इस मिशन को पृथ्वी की सतह पर होने वाले परिवर्तनों को किसी भी अन्य उपग्रह की तुलना में अधिक सटीकता से देखने में सक्षम बनाता है।

भारत के लिए बेहद उपयोगी है निसार

लॉन्च के बाद पहले 90 दिनों तक यह इन-ऑर्बिट चेकआउट चरण में रहेगा। इस चरण के दौरान उपग्रह को वैज्ञानिक संचालन के लिए तैयार किया जाएगा। इसके बाद इसका वैज्ञानिक संचालन शुरू होगा।

इससे मिले डेटा सभी उपयोगकर्ताओं को कुछ ही घंटों में सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध होगा और साथ ही इसके लिए कोई शुल्क भी नहीं लगेगा। ऐसे में यह भारत की पर्यावरण योजना, आपदा प्रबंधन और वैज्ञानिक शोध के लिए एक बड़ा वरदान साबित होगा।

अपनी स्कैनिंग क्षमता के जरिए ये सेटेलाइट पृथ्वी की सतह पर हो रहे बदलावों को मिलीमीटर स्तर तक की सूक्ष्मता से माप सकता है। इस लिहाज से निसार सेटेलाइट भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि यह भूकंप, भूस्खलन, ज्वालामुखी और सुनामी जैसे हर तरह की प्राकृतिक आपदाओं की निगरानी कर सकता है।

साथ ही ये हिमखंडों की गतिविधियाँ, समुद्र स्तर में वृद्धि, भूजल और वन क्षेत्रों की स्थिति और कृषि पर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को भी ट्रैक करने में सक्षम है।

पृथ्वी से 743 किमी दूर होगा निसार सेटेलाइट

इसके प्रक्षेपण पर भारतीय खगोलशास्त्री और अंतरिक्ष वैज्ञानिक प्रोफेसर आरसी कपूर ने कहा, “यह NASA और ISRO के बीच एक महत्वपूर्ण सहयोग है। यह पृथ्वी से लगभग 743 किलोमीटर की ऊँचाई और 98.4 डिग्री के झुकाव के साथ पर उसकी कक्षा में स्थापित किया जाएगा। यह उपग्रह लगभग 12 दिनों में पूरी पृथ्वी का स्कैन करेगा। इसके बाद यह प्रतिदिन काफी मात्रा में डेटा हमें देगा।”

डॉ. कपूर ने आगे कहा, “इसके कारण आपदा प्रबंधन के साथ पृथ्वी की कई ऐसी जानकारियाँ मिलेंगी जो वर्तमान और भविष्य की कई परेशानियों का समाधान कर सकती हैं। इसके साथ ही पृथ्वी का गहराई से अध्ययन करने वालों के लिए ये बेहद उपयोगी होगा। आज की तारीख में, यह पृथ्वी का सबसे उन्नत अवलोकन उपग्रह बनने जा रहा है।”

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) और राष्ट्रीय वैमानिकी एवं अंतरिक्ष प्रशासन (नासा) द्वारा संयुक्त रूप से विकसित, भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी का GSLV Mk-II रॉकेट निसार को 747 किलोमीटर की सूर्य-समानध्रुवीय कक्षा (sun-synchronous polar orbit) में स्थापित करेगा।

कैसे काम करेगा निसार

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, नासा के वैज्ञानिकों का कहना है कि प्रत्येक प्रणाली का सिग्नल पृथ्वी की सतह पर अलग-अलग आकार की विशेषताओं के प्रति संवेदनशील होता है और प्रत्येक प्रणाली अलग-अलग विशेषताओं जैसे नमी की मात्रा, सतह की खुरदुरापन, और गति को मापने में विशेषज्ञता रखती है।

अपनी कक्षा में जाने के बाद सेटेलाइट की सिंथेटिक अपर्चर रडार (SAR)तकनीक पृथ्वी की सतह पर रडार तरंगें भेजेगी। ये तरंगें सतह से टकराकर लौटेंगी। रिटर्न सिग्नल के समय और उसके फ़ेज में हुए बदलाव को मापा जाएगा।

निसार सेटेलाइट पृथ्वी का अवलोकन L-बैंड SAR के 1.257 GHz के माध्यम से करेगा। ये लंबी तरंग दैर्ध्य (Wavelength) वाली रेडियो तरंगें होती हैं। यह तकनीक घने जंगलों और मिट्टी के नीचे तक होने वाले परिवर्तनों के साथ सतह पर होने वाली विकृतियों को भी ट्रैक करने में सक्षम है।

इसके अलावा, S-बैंड SAR, 3.2 GHz की छोटी तरंग दैर्ध्य वाली रेडियो तरंगों का उपयोग करता है। इससे फसलों, पानी की सतह और जमीन की सतही जानकारियों का विस्तृत विश्लेषण कर सकने में सक्षम है।

चौड़े क्षेत्र से लेकर कोने तक का हो सकेगा विस्तृत स्कैन

इसरो के अनुसार, सेटेलाइट पहली बार SweepSAR (स्वीप सिंथेटिक अपर्चर रडार) तकनीक का उपयोग कर 242 किमी के चौड़े क्षेत्र को भी उच्च स्थानिक विभेदन यानी spatial resolution के साथ स्कैन कर सकेगा।

आसान भाषा में कहा जाए तो SweepSAR एक रडार तकनीक है जिसमें बड़े क्षेत्र को कम समय में विस्तृत तौर पर स्कैन किया जा सकता है। यह तकनीक कई छोटे रडार एलीमेंट्स को एक साथ और अलग-अलग कोणों से चलाकर सतह की काफी स्पष्ट तस्वीर तैयार करती है।

इसी तरह स्थानिक विभेदन का मतलब है कि एक तस्वीर में कितनी अधिक जानकारी दिख रही है। जितना अधिक रेजोल्यूशन होगा उतनी ही साफ और सूक्ष्म डिटेल मिलेगी। निसार हर 12 दिन में पृथ्वी को स्कैन करेगा और किसी भी मौसम, दिन या रात में हाई रेजोल्यूशन वाले तस्वीर देगा। इसके दोहरे रडार पेलोड और SweepSAR तकनीक इसे और अधिक बेहतर बनाते हैं।

फोटो साभार- X- @isro

इससे वैज्ञानिकों और नीति निर्माताओं को बेहद कम समय में सटीक और व्यापक डेटा मिल सकता है। ये जलवायु परिवर्तन, कृषि और आपदा प्रबंधन के लिए बेहद जरूरी है।

निसार मिशन भारत और अमेरिका के बीच अंतरिक्ष सहयोग में बढ़ती साझेदारी को दर्शाता है। इसे लेकर केंद्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा, “यह मिशन केवल एक उपग्रह प्रक्षेपण नहीं है। यह एक ऐसा क्षण है जो दर्शाता है कि विज्ञान और वैश्विक कल्याण के प्रति समर्पित 2 लोकतंत्र मिलकर बहुत कुछ हासिल कर सकते हैं, इसे दिखा रहा है।”

केंद्रीय मंत्री ने आगे कहा, “निसार न सिर्फ भारत और अमेरिका को सेवा देगा बल्कि दुनिया भर के देशों को भी खास तौर पर, आपदा प्रबंधन, कृषि और जलवायु निगरानी जैसे क्षेत्रों में महत्वपूर्ण डेटा देगा।”

वैश्विक स्तर पर निसार क्यों है खास

वैश्विक पटल पर देखें तो दुनिया भर में जलवायु परिवर्तन से जुड़ी कई घटनाएँ अक्सर देखने को मिल रही हैं। निसार उन सभी घटनाओं की जानकारी पहले से ही संभावित करेगा। इससे आपदा प्रबंधन के साथ कई घटनाओं को होने से पहले ही रोका जा सकेगा।

निसार भूकंप, भूस्खलन, बाढ़, ज्वालामुखी विस्फोट और तूफानों की लगभग वास्तविक समय में निगरानी करेगा। इससे आपातकालीन सेवाएँ तेजी से काम करेंगी। वैज्ञानिकों को जलवायु मॉडल को बेहतर बनाने और क्षेत्रीय प्रभावों को समझने में मदद मिलेगी।

निसार कृषि और जलवायु परिवर्तन पर असर की भी निगरानी करने में सक्षम है। फसल वृद्धि, भूमि उपयोग और सिंचाई स्तर की निगरानी कर फसल उत्पादन का पूर्वानुमान, जल प्रबंधन और सूखे की पहचान पहले से किया जा सकेगा।

इसके अलावा ये सेटेलाइट भूमि धंसने और संरचनात्मक ढाँचों में होने वाले बदलावों को देख सकेगा। इससे पुलों, सड़कों और बांधों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकेगी।

वन और जैव विविधता संरक्षण में भी निसार बाहद कारगर सिद्ध होगा। इससे वनों की कटाई और प्राकृतिक आवासों की निगरानी संभव होगी। इसके जरिए अवैध कटाई और संकटग्रस्त प्रजातियों की भी पहचान की जा सकती है।

यह मिशन भारत को वैश्विक जलवायु वार्ताओं में एक डेटा-संपन्न और तकनीकी रूप से सक्षम भागीदार बनाने में मदद करेगा। ये मिशन इस बात को सिद्ध करता है कि भारत अब केवल डेटा उपभोक्ता नहीं, बल्कि डेटा प्रदाता और नीति निर्माता की भूमिका में आ गया है।

पश्चिम बंगाल में जोड़े जा रहे थे फर्जी वोटर, चुनाव आयोग ने सैंपल चेकिंग में पकड़ी गड़बड़ी: जाँच के आदेश, SIR का विरोध कर रहीं हैं CM ममता

पश्चिम बंगाल में वोटरलिस्ट में बड़ा फर्जीवाड़ा चुनाव आयोग ने पकड़ा है। यहाँ चुनाव आयोग ने पाया है कि बड़ी मात्रा में फर्जी वोटर फॉर्म को स्थानीय अधिकारी जमा कर रहे थे। यह काम बंगाल के कुछ जिलों में हो रहा था। दो अधिकारियों ने यह माना भी है कि उन्होंने बड़ी संख्या में फर्जी फॉर्म भी जमा किए।

पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने 28 जुलाई, 2025 को सभी जिला निर्वाचन अधिकारियों को संबोधित एक पत्र में लिखा, “निरंतर अपडेशन के दौरान ERO द्वारा 1% से कम फॉर्म 6 निपटान की सैंपल जाँच में सामने आया है कि कि दो लोगों ने फर्जी मतदाताओं के लिए काफी संख्या में फॉर्म 6 स्वीकार किए थे।”

चुनाव आयोग ने बताया कि इन दो ERO अधिकारियों ने स्वीकार किया है कि उन्होंने अपने से निचले अधिकारियों को चुनाव आयोग पोर्टल का एक्सेस दिया था। यहाँ ERO.net पोर्टल पर ‘डाटा एंट्री ऑपरेटरों’ ने फॉर्म 6 के आवेदन निपटा दिए।

भारतीय जनता पार्टी के आईटी सेल के राष्ट्रीय संयोजक अमित मालवीय ने एक्स पर ट्वीट करते हुए कहा है,”ममता बनर्जी द्वारा बूथ लेवल अधिकारियों को खुलेआम धमकी देने और उन्हें भारत के चुनाव आयोग के निर्देशों का पालन न करने के लिए कहने के कुछ ही दिनों बाद, पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय ने नियमित मतदाता सूची जाँच और नमूना सर्वेक्षणों के दौरान गंभीर अनियमितताओं को चिन्हित किया है।”

और भी गंभीर बात यह है कि इन मामलों में बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) से फॉर्म की सत्यापन प्रक्रिया को बिना किसी जरूरी कारण के हटा दिया गया। एक जैसे दस्तावेज कई फॉर्मों में इस्तेमाल किए गए और उनकी जाँच रिपोर्ट भी एक जैसी दिखाई दी।

इस गंभीर गड़बड़ी को देखते हुए CEO ने तत्काल जाँच के आदेश दिए हैं। सभी DEOs को निर्देश दिया गया है कि वे वरिष्ठ अधिकारियों की एक टीम बनाकर पिछले एक साल में निपटाए गए सभी फॉर्म 6 की सैंपल जाँच करें। यह रिपोर्ट 14 अगस्त 2025 तक अनिवार्य रूप से CEO को भेजनी होगी।

CEO ने अपने पत्र में यह भी कहा है कि दोषियों के खिलाफ उचित कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।

पश्चिम बंगाल में वोटर लिस्ट जाँच पर हो रही बात

राज्य चुनाव आयोग की वेबसाइट पर स्पेशल इन्टेंशिव रीवीजन (SIR) 2002 के डेटा के प्रकाशन के साथ ही राज्य में मतदाता सूची की समीक्षा की अटकलें तेज हो गई हैं। माना जा रहा है कि अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले राज्य चुनाव आयोग मतदाता सूची को अपडेट कर सकता है।

बिहार में चुनाव आयोग ने SIR प्रक्रिया करवाई है। यहाँ अक्टूबर-नवंबर 2025 में विधानसभा चुनाव होने हैं। राजद, कॉन्ग्रेस और तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने इस प्रक्रिया का कड़ा विरोध किया है। उन्होंने दावा किया है कि यह मतदाता सूची के बहाने राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) को गुपचुप तरीके से लागू करने की कोशिश है।

TMC सांसद महुआ मोइत्रा समेत कई विपक्षी नेताओं ने इस मुद्दे को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती भी दी। हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रक्रिया पर रोक लगाने से इनकार कर दिया और कहा कि यह मतदाता सूची को अपडेट करने की नियमित प्रक्रिया है। कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग को यह करने का पूरा अधिकार है।

बिहार में SIR के बाद करीब 65 लाख नाम मतदाता सूची से हटाए गए थे। इससे पहले 21 जुलाई 2025 को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने स्पष्ट रूप से कहा था कि वह अपने राज्य में SIR प्रक्रिया नहीं होने देंगी।

भाजपा ने पश्चिम बंगाल में फर्जी मतदाताओं को लेकर जताई चिंता

भाजपा नेता सुवेंदु अधिकारी ने हाल ही में आरोप लगाया था कि बांग्लादेश से सटी पश्चिम बंगाल की सीमावर्ती जिलों में मतदाता आवेदन की संख्या में अचानक तेजी आई है। उनका कहना है कि यह बढ़ोतरी राज्य प्रशासन द्वारा जिला अधिकारियों को डोमिसाइल (स्थायी निवास) प्रमाणपत्र जारी करने के निर्देश देने के बाद देखने को मिली है।

सुवेंदु अधिकारी ने चुनाव आयोग (ECI) को पत्र लिखकर माँग की है कि अगर 2026 के विधानसभा चुनावों से पहले राज्य में कोई विशेष पुनरीक्षण (SIR) किया जाता है, तो 25 जुलाई 2025 या उसके बाद जारी किए गए डोमिसाइल प्रमाणपत्रों को मान्य नहीं माना जाए।

बीजेपी लंबे समय से पश्चिम बंगाल में फर्जी और डुप्लिकेट वोटरों का मुद्दा उठाती रही है। फरवरी 2024 में सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व में बीजेपी के छह सदस्यों का एक प्रतिनिधिमंडल राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) से मिला और 16 लाख फर्जी या दोहरे वोटरों की शिकायत की। उन्होंने चुनाव आयोग से तुरंत कार्रवाई की माँग की।

इसके अलावा, दिसंबर 2023 में झारखंड के गोड्डा से बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने संसद में बांग्लादेशी अवैध घुसपैठियों का मुद्दा उठाया था और केंद्र सरकार से जल्द से जल्द राष्ट्रीय नागरिक पंजी (NRC) लागू करने की माँग की थी।

इंदिरा-इंदिरा का भोंपू बजाने वाले क्या बाबू जगजीवन राम को दलित होने की देते हैं सजा? बांग्लादेश ने मुक्ति के लिए दिया सम्मान, पर कॉन्ग्रेस की कब मिटेगी नफरत

संसद के मानसून सत्र में लगातार ऑपरेशन सिंदूर पर चर्चा हो रही है। लोकसभा में इस चर्चा के दौरान राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी.. अपनी दादी इंदिरा गाँधी को ‘आयरन लेडी’ बताते रहे। लेकिन सच्चाई क्या है? सच्चाई यह है कि कॉन्ग्रेस द्वारा बाबू जगजीवन राम का क्रेडिट छीन लिया गया। आज बहुत कम लोग उनका नाम जानते हैं।

कॉन्ग्रेस ने दलित नेता जगजीवन राम को उनका हकदार क्रेडिट नहीं दिया। सारा क्रेडिट इंदिरा गाँधी को दिया जाता है। जबकि क्रेडिट सेना को मिलना चाहिए था, और उस समय के रक्षा मंत्री जगजीवन राम को भी। एलजेपी सांसद शांभवी चौधरी ने लोकसभा में इस बात का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस दलितों की मसीहा बनती है, लेकिन अपने ही दलित नेता के योगदान को छिपाती है।

बाबू जगजीवन राम और बांग्लादेश मुक्ति संग्राम

1971 का भारत-पाकिस्तान युद्ध भारतीय सेना की बहादुरी, अटूट हौसले और सफलता का सबसे अच्छा उदाहरण है। 16 दिसंबर को विजय दिवस मनाया जाता है, जब भारतीय सेना ने बांग्लादेश को पाकिस्तान की जुल्मों से आजाद कराया और इतिहास व भूगोल दोनों बदल दिए। बांग्लादेश का जन्म हुआ। कॉन्ग्रेस पार्टी के प्रमुख दलित चेहरे और पूर्व उप-प्रधानमंत्री स्वर्गीय बाबू जगजीवन राम को इस युद्ध के नायकों में से एक माना जाता है। लेकिन कॉन्ग्रेस ने गाँधी परिवार को महान बनाने के चक्कर में उन्हें बहुत कम सम्मान दिया।

1971 में पाकिस्तान के तानाशाह जनरल याह्या खान की जुल्म और अत्याचार से पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) टूट रहा था। भारत भी प्रभावित हुआ। करीब एक करोड़ शरणार्थी बांग्लादेश से भारत आए। जैसे-जैसे संकट बढ़ा, भारत ने पाकिस्तान के उस हिस्से की मदद करने का फैसला किया। देश की तीनों सेनाओं ने रक्षा मंत्रालय और रक्षा मंत्री के नेतृत्व में अटूट बहादुरी दिखाई।

बाबू जगजीवन राम ने फ्रंट से किया नेतृत्व

बाबू जगजीवन राम की 1971 युद्ध में भूमिका बहुत महत्वपूर्ण थी। बांग्लादेश ने कॉन्ग्रेस नेता और तत्कालीन रक्षा मंत्री बाबू जगजीवन राम को इस युद्ध का नायक माना। भारतीय सेना में सिर्फ देशभक्ति का जोश नहीं था, बल्कि यह युद्ध भारत की बजाय दूसरे देश के लिए लड़ा गया। जगजीवन राम ने सेना के जवानों का मनोबल बढ़ाने और उनमें विश्वास जगाने में बड़ी भूमिका निभाई। 1970 में रक्षा मंत्री बनने के बाद से ही भारत-पाकिस्तान युद्ध का खतरा बढ़ रहा था।

इस दौरान पश्चिम पाकिस्तान (आज का पाकिस्तान) पूर्वी पाकिस्तान पर बड़े-बड़े अत्याचार कर रहा था। जगजीवन राम की बेटी और पूर्व लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार ने 16 दिसंबर 2016 को ‘1971 भारत-पाकिस्तान युद्ध: बांग्लादेश की मुक्ति’ नामक कार्यक्रम में हिस्सा लिया। यह कार्यक्रम इंडियन वॉर वेटरन्स एसोसिएशन, इंडिया फाउंडेशन और नेहरू मेमोरियल म्यूजियम एंड लाइब्रेरी के साथ मिलकर आयोजित हुआ था। मीरा कुमार ने अपने भाषण में बताया कि उनके पिता के नेतृत्व में की गई तैयारियाँ कितनी महत्वपूर्ण थीं।

मीरा कुमार ने कहा कि जगजीवन राम रक्षा मंत्री बनने के बाद पूरे देश में घूमे और सेना से मिले। उन्होंने कहा, “हमारी इतिहास, परंपरा या जड़ों में पहले हमला करने की आदत नहीं है। लेकिन अगर युद्ध थोपा गया, तो यह भारत की जमीन पर नहीं होगा। हम दुश्मन को पीछे धकेलेंगे और उनके क्षेत्र पर लड़ेंगे।” उन्होंने हर दो-तीन दिन में संसद में स्थिति और युद्ध तैयारियों पर ब्रीफिंग दी।

बाबू जगजीवन राम हर दो-तीन दिन में सार्वजनिक भाषण देते, लोगों को राष्ट्रीय घटनाओं और युद्ध योजनाओं की जानकारी देते। शहरों और गाँवों में सबको कहते, “डरने की कोई बात नहीं। हम इस युद्ध को ऐतिहासिक बना देंगे।” उन्होंने देश में जरूरी माहौल बनाया। मीरा कुमार ने बताया कि जगजीवन राम कहते थे, “आप किसी व्यक्ति का सम्मान करें या न करें, लेकिन सैनिक को देखकर सम्मान जरूर करें, क्योंकि अमूर्त चीज के लिए जान देना आम बात नहीं है।”

देश की रक्षा सिर्फ सीमा पर सेना का लड़ना नहीं है। रक्षा का मतलब है कि हर व्यक्ति देश और उसके सम्मान की रक्षा करे। जगजीवन राम को बांग्लादेश की मुक्ति बहिनी पर भी भरोसा था। उन्होंने भारतीय सेना को निर्देश दिया कि दुश्मन क्षेत्र में घुसते समय घनी आबादी वाली जगहों से दूर रहें, ताकि लोगों को असुविधा न हो।

मीरा कुमार ने कहा कि पाकिस्तानी सेना की क्रूरता इतिहास में दर्ज है, लेकिन भारतीय सेना पर ऐसी कोई शिकायत नहीं आई। उन्होंने इस युद्ध को सम्मानजनक बताया। यह युद्ध इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि इससे बांग्लादेश बना और इतिहास-भूगोल बदल गया।

93,000 पाकिस्तानी सैनिकों ने आत्मसमर्पण किया। पहली बार भारतीय नौसेना ने किसी युद्ध में हिस्सा लिया। पहले युद्धों में सिर्फ थलसेना और वायुसेना शामिल हुई थीं। ऑपरेशन ट्राइडेंट भारतीय नौसेना का पहला और सबसे सफल अभियान था। इसमें पाकिस्तान की रीढ़ कराची को नुकसान पहुँचाया गया, जिससे उनका मनोबल टूट गया। इसी युद्ध में लेफ्टिनेंट जनरल आमिर अब्दुल्ला खान नियाजी ने 93,000 सैनिकों के साथ भारत के सामने आत्मसमर्पण किया।

बांग्लादेश मुक्ति संग्राम से जुड़े इन महत्वपूर्ण तथ्यों के बारे में देश को पता न चलने की वजह कॉन्ग्रेस का परिवारवाद है। पार्टी ने ऐतिहासिक घटनाओं का क्रेडिट सिर्फ नेहरू-गाँधी परिवार को दिया। इसी वजह से जगजीवन राम का नाम युद्ध के रिकॉर्ड से गायब हो गया। दलितों की ‘मसीहा’ बनने वाली कॉन्ग्रेस ने अपने दलित नेता की उपलब्धि पर ध्यान नहीं दिया। अगर बांग्लादेश ने जगजीवन राम को युद्ध नायक न बताया होता, तो यह सच्चाई कभी सामने न आती।

बांग्लादेश ने जगजीवन राम के योगदान को उजागर किया। अगर बांग्लादेश ने ध्यान न दिलाया होता, तो जगजीवन राम का योगदान कभी पता न चलता। 2012 में बांग्लादेश की आजादी के 41 साल बाद प्रधानमंत्री शेख हसीना के समय में उनकी भूमिका सामने आई। बांग्लादेश ने 1971 के पाकिस्तान युद्ध में तत्कालीन रक्षा मंत्री जगजीवन राम को ‘महत्वपूर्ण’ माना। उन्होंने प्रशंसा पत्र लिखा।

बांग्लादेश की ओर से जारी प्रशंसा में कहा गया, “उन्होंने बांग्लादेश और भारतीय सेनाओं की ‘संयुक्त कमान’ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिससे अंतिम हमले में जीत मिली।” इसमें आगे लिखा गया, “उन्होंने बांग्लादेशी स्वतंत्रता सेनानियों को प्रशिक्षण, हथियार और आपूर्ति देकर युद्ध रणनीति को मजबूत किया। लेकिन राजनीतिक इतिहास उन्हें 16 दिसंबर 1971 के संसद भाषण के लिए ज्यादा याद रखेगा, जिसमें उन्होंने स्वतंत्र बांग्लादेश के उदय की घोषणा की।”

जगजीवन राम के संसद भाषण का जिक्र भी पत्र में है। उन्होंने कहा, “मुझे एक घोषणा करनी है। पश्चिम पाकिस्तान की सेना ने बांग्लादेश के सामने बिना शर्त आत्मसमर्पण कर दिया। ढाका अब स्वतंत्र देश की राजधानी है।” पाकिस्तान के संयुक्त भारत-बांग्लादेश बलों के सामने आत्मसमर्पण के कुछ मिनट बाद ही जगजीवन राम ने संसद में भाषण दिया।

बांग्लादेश ने किया बाबू जगजीवन राम का सम्मान

साल 2012 में बांग्लादेश ने उन्हें सम्मानित किया। मीरा कुमार के बेटे और जगजीवन राम के पोते अंशुल कुमार वहाँ मौजूद थे। 20 अक्टूबर 2012 को बंगबंधु इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस हॉल में राष्ट्रपति मोहम्मद जिल्लुर रहमान और प्रधानमंत्री शेख हसीना ने सम्मान दिया। अंशुल ने कहा, “उल्लेखनीय बात है कि वे (जगजीवन राम) कभी युद्ध नहीं चाहते थे, सिर्फ न्याय चाहते थे, क्योंकि पाकिस्तानी सैनिकों ने बांग्लादेश में नरसंहार किया और भारत पर हमला किया।” सुरक्षा विशेषज्ञों ने भी जगजीवन राम के नेतृत्व की सराहना की।

इस समारोह में पूर्व प्रधानमंत्री आईके गुजराल, जगजीवन राम और कर्नल (रिटायर्ड) अशोक तारा समेत 61 ‘विदेशी मित्रों’ को सम्मानित किया गया। अशोक तारा ने शेख हसीना और उनके परिवार को पाकिस्तानी सेना की कैद से बचाया था। कई बुजुर्ग व्हीलचेयर पर आए। कुछ को मरणोपरांत सम्मान मिला। गुजराल और नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री गिरिजा प्रसाद कोइराला को ‘बांग्लादेश लिबरेशन वॉर ऑनर’ दिया गया। बाकी को ‘फ्रेंड्स ऑफ लिबरेशन वॉर’ सम्मान। 61 में 51 भारतीय थे, जिनमें सेना के वेटरन्स, सहायता कार्यकर्ता, राजनेता, पत्रकार, कलाकार और राजनयिक शामिल थे।

स्वतंत्रता सेनानी से बांग्लादेश के जनक तक का सफर

जगजीवन राम का जन्म 5 अप्रैल 1908 को हुआ। वे दलित समुदाय से थे और सामाजिक न्याय के योद्धा थे। स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रहे। आजादी के बाद कई महत्वपूर्ण पदों पर रहे, जैसे रक्षा मंत्री (1970-74), कृषि मंत्री (1974-77)। 1971 युद्ध में उनकी भूमिका भारत की जीत में निर्णायक थी। वे सबसे लंबे समय तक कैबिनेट मंत्री रहे। लेकिन कॉन्ग्रेस ने उनका योगदान छिपाया, क्योंकि परिवारवाद हावी था। आज भी दलित नेता होने के बावजूद उन्हें उचित सम्मान नहीं मिलता।

मीरा कुमार ने अपने भाषण में बताया कि जगजीवन राम ने युद्ध के बाद दो साल तक रक्षा मंत्री बने रहकर जवानों की देखभाल की। वे प्रत्येक जवान की तरह परिवार की तरह देखते थे। उन्होंने जिनेवा कन्वेंशन का पालन किया और PoW को अच्छा व्यवहार दिया। अमेरिकी सातवें फ्लीट के आने पर भी वे आश्वस्त रहे।

सुरक्षा विशेषज्ञ कहते हैं कि जगजीवन राम का नेतृत्व बेजोड़ था। उन्होंने मुक्ति बहिनी से संपर्क रखा, हथियार दिए। युद्ध में समन्वय, लॉजिस्टिक्स और कमांड चेन को संभाला। जनरल नियाजी का मनोबल टूटा, जिससे आत्मसमर्पण हुआ।

कॉन्ग्रेस को दलित नेताओं के क्रेडिट को खाने का इतिहास

कॉन्ग्रेस का यह रवैया दिखाता है कि वे दलितों के नाम पर वोट लेते हैं, लेकिन उनके नेताओं को क्रेडिट नहीं देते। जगजीवन राम जैसे नायक को भुला दिया गया। आज नई पीढ़ी को उनकी कहानी पता होनी चाहिए। शांभवी चौधरी जैसे सांसदों ने इसे उठाया, ताकि सच्चाई सामने आए। 1971 युद्ध सिर्फ सैन्य जीत नहीं, बल्कि मानवता की जीत था, जिसमें जगजीवन राम का बड़ा हाथ था।

स्ट्रेंजर ऑफ़ नेशन, Strangers Of The Nation 2… ऐसे ही एकाउंट्स से जिहाद फैलाती थी शमा परवीन: फेसबुक-इंस्टाग्राम पर अलकायदा के लिए जुटाए 10000+ फॉलोअर, गुजरात ATS ने अब पकड़ा

गुजरात ATS ने अल-कायदा से जुड़ी लेडी मास्टरमाइंड शमा परवीन को गिरफ्तार किया है। 30 साल की शमा परवीन कुछ समय से बेंगलरु में रह रही थी और उसके सोशल मीडिया अकाउंट पर एटीएस की नजर थी। अलकायदा इन द इंडियन सबकॉन्टिनेंट (AQIS) से जुड़े आतंकी मॉड्यूल की शमा परवीन अहम सदस्य है।

22 जुलाई को इस मॉड्यूल से जुड़े 4 लोगों को गिरफ्तार किया था, जिससे पूछताछ में पता चला था कि ये लोग इंस्टाग्राम के जरिए एक दूसरे से जुड़े थे और ये इंस्टाग्राम अकाउंट्स शमा परवीन का था। इस अकाउंट के 10000 से ज्यादा फॉलोअर्स हैं। झारखंड की रहने वाली परवीन पाकिस्तान से कट्टरपंथी नेटवर्क से जुड़ी रही है और बेंगलुरु में रहते हुए ऑनलाइन आतंकी गतिविधियों का प्रचार कर रही थी।

बुधवार (30 जुलाई 2025) को प्रेस कॉन्फ्रेंस में सुरक्षा एजेंसियों ने खुलासा किया कि हाल ही में अल-कायदा से जुड़े आतंकवादियों से पूछताछ के दौरान सोशल मीडिया पर सक्रिय कुछ संदिग्ध अकाउंट की जानकारी सामने आई है।

इनमें ‘strangers_nation02’, ‘Strangers Of The Nation’ और ‘Strangers Of The Nation 2’ नाम के प्रोफाइल शामिल हैं, जिनके माध्यम से आतंकी संगठन अल-कायदा से संबंधित सामग्री साझा की जाती थी और उन पर चर्चाएँ की जाती थी।

इन प्रोफाइल्स की जाँच के बाद बेंगलुरु से शमा परवीन को गिरफ्तार किया गया। बीकॉम ग्रेजुएट शमा परवीन से शुरुआती पूछताछ में यह भी बात सामने आई है कि वह कई पाकिस्तानी व्हाट्सएप अकाउंट्स के संपर्क में थी।

रिपोर्ट के अनुसार, एजेंसियाँ अब इस बात की जाँच कर रही हैं कि उसका नेटवर्क कितना फैला हुआ है और उसकी भूमिका किस हद तक गंभीर थी। अहमदाबाद से मोहम्मद फरदीन, दिल्ली से मोहम्मद फैक, नोएडा से जीशान अली और गुजरात के अरावली जिले के मोडासा से सेफुल्लाह कुरैशी की गिरफ्तारी के बाद हुई है।

इन चारों पर इंस्टाग्राम और फेसबुक के जरिए AQIS से जुड़ी कट्टरपंथी सामग्री को कथित तौर पर बढ़ावा देने के लिए गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम, 1967 और भारतीय न्याय संहिता (BNS) की कई धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया था।

ATS ने उसे कोर्ट में पेश कर ट्रांजिट रिमांड पर लिया है। शमा AQIS मॉड्यूल में गिरफ्तार होने वाली पहली महिला आतंकी है। गुजरात के गृह राज्य मंत्री हर्ष सांघवी के अनुसार, शमा परवीन पूरी तरह कट्टरपंथी थी और पाकिस्तान में मौजूद अपने हैंडलर्स से सीधे संपर्क में थी।

वह सोशल मीडिया पर आतंकी कंटेंट साझा करती थी और युवाओं को भड़काने व भर्ती करने में सक्रिय भूमिका निभा रही थी।

गुजरात ATS के मुताबिक, वह अल-कायदा के देशव्यापी हमले की साजिश में शामिल थी और उसका लिंक गुजरात के अल-कायदा मॉड्यूल से था। फिलहाल वह ट्रांजिट रिमांड पर है और पूछताछ जारी है। शमा परवीन अल-कायदा मॉड्यूल से जुड़ी पहली महिला आतंकी है।

हरिद्वार में विशालकाय मस्जिद बनाई, खड़ी कर दी ऊँची मीनार… लेकिन नहीं ली कोई अनुमति: CM धामी के एक्शन के बाद रुका निर्माण, कागज दिखाने को भी कहा

उत्तराखंड के हरिद्वार में अवैध रूप से बनाई जा रही बड़ी मस्जिद का काम रोक दिया गया है। इसका निर्माण मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के आदेश पर रोका गया है। इस मस्जिद को बनाने की अनुमति तक नहीं ली गई थी। इसका निर्माण उस हरिद्वार जिले में हो रहा था, जो हिन्दू आस्था का केंद्र है।

यह मस्जिद हरिद्वार के नगर पंचायत सुल्तानपुर में बनाई जा रही है। ऊँची-ऊँची मीनारों वाली इस मस्जिद में तेजी से काम चल रहा था। इसको लेकर हिन्दुओं ने चिंता जताई। इसके बाद मुख्यमंत्री धामी ने इस पर रिपोर्ट माँगी। मुख्यमंत्री के रिपोर्ट माँगने के बाद यहाँ हरिद्वार के DM ने निर्माण कार्य रुकवा दिया।

हरिद्वार के डीएम मयूर दीक्षित ने इस मस्जिद के निर्माण स्थान का दौरा भी किया। उन्होंने इसके बाद बताया कि कुछ दिनों पहले मीडिया के जरिये सुल्तानपुर में इस मस्जिद निर्माण की सूचना मिली थी और पता चला था कि उसकी मीनार काफी ऊँची हैं।

उन्होंने आगे बताया कि अब सुल्तानपुर में निर्माण मस्जिद का काम रुकवा दिया गया है और मस्जिद की जमीन और निर्माण संबंधी दस्तावेज दिखाने के लिए नोटिस जारी किया जा रहा है। डीएम दीक्षित ने यह भी बताया कि इसको लेकर प्रशासनिक अधिकारियों ने मस्जिद कमिटी से कागज दिखाने तक निर्माण रोकने के लिए भी हाल ही में बैठक की थी।

इस मामले में एक्शन हिन्दू संगठनों और साधु-संतों के आवाज उठाने के बाद हुआ है। उन्होंने ही मुख्यमंत्री धामी से इस मस्जिद के निर्माण पर रोक लगाने की माँग की थी। हालाँकि, निर्माण रुकने के बाद हिन्दू संगठन लगातार इस बात की जाँच की माँग कर रहे है कि इतनी बड़ी मस्जिद बनाने का पैसा कहाँ से आ रहा है।

उन्होंने विदेशी फंडिंग की जाँच करवाने की माँग की है। यह मस्जिद जिस तहसील में बन रही है वहाँ पहले भी कई अवैध ढांचों पर कार्रवाई हो चुकी है। धामी सरकार राज्य में 500 से अधिक अवैध मजार भी ध्वस्त करवा चुकी है।

ऑपरेशन सिंदूर के समय भारत विरोधी प्रोपेगेंडा कर रहा था वाशिंगटन पोस्ट, भारतीय मीडिया को बदनाम करने के चक्कर में खुद हो गया एक्सपोज: अब स्वीकारी गलती, लेख में भी किया बदलाव

ऑपरेशन सिंदूर की कवरेज पश्चिमी मीडिया के लिए किसी उत्सव से कम नहीं थी, मानो क्रिसमस से पहले ही उन्हें भारत पर लगातार हमला करने का मौका मिल गया हो। हालाँकि, ऐसा करते हुए वे खुद भी गलत सूचना और फर्जी खबरें फैलाने लगे। 

द वाशिंगटन पोस्ट (WaPo) ने भारतीय मीडिया पर युद्धकाल में गलत जानकारी फैलाने का आरोप लगाया, लेकिन इसी कोशिश में वो खुद वही गलती कर बैठा। उसने भी संदिग्ध स्रोतों पर भरोसा किया, स्थानीय भाषा का गलत अनुवाद किया और बिना पुष्टि के जानकारी प्रकाशित की।

एक सुधार जो मूल कहानी से कहीं अधिक कहता है

वॉशिंगटन पोस्ट ने 4 जून 2025 को एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी जिसका शीर्षक ‘How misinformation overtook Indian newsrooms amid conflict with Pakistan’ था। यह रिपोर्ट पत्रकार करिश्मा मेहरोत्रा ने लिखी थी। इसमें भारतीय मीडिया, खासकर टीवी न्यूज चैनलों पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव के समय झूठी खबरें और नाटकीय दावे दिखाए। रिपोर्ट में कहा गया कि भारतीय चैनलों ने फर्जी वीडियो और अपनी जीत के बयान बढ़ा-चढ़ाकर चलाए।

लेकिन अब उसी रिपोर्ट में वॉशिंगटन पोस्ट ने चुपचाप एक सुधार (correction) जोड़ा है, जिससे यह साफ हुआ कि उन्होंने खुद पत्रकारिता संबंधी एक बड़ी गलती की थी।

रिपोर्ट की सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि एक भारतीय पत्रकार को व्हाट्सऐप पर यह संदेश मिला कि पाकिस्तान के सेना प्रमुख को तख्तापलट (कूप) में गिरफ्तार कर लिया गया है। वॉशिंगटन पोस्ट ने दावा किया कि यह मैसेज प्रसार भारती (भारत की सरकारी प्रसारण संस्था) से आया था। उन्होंने भारतीय पत्रकारों को यह कहकर दोषी ठहराया कि उन्होंने बिना जाँच किए इस खबर को आगे बढ़ाया।

पर अब वॉशिंगटन पोस्ट ने माना है कि वह व्हाट्सऐप मैसेज प्रसार भारती के आधिकारिक चैनल से आया ही नहीं था। वह मैसेज केवल किसी एक व्यक्ति के दावे पर आधारित था। इसका ना कोई प्रमाण था और ना कोई दूसरा स्रोत। यह सिर्फ व्हाट्सऐप पर आया एक कथित मैसेज था।

अपनी सुधार सूचना में अब वॉशिंगटन पोस्ट ने कहा है कि वह मैसेज ‘प्रसार भारती के एक कर्मचारी’ द्वारा भेजा गया था। लेकिन यह नहीं बताया गया कि वह कर्मचारी कौन था, उसका पद क्या था, या वह जानकारी कितनी विश्वसनीय थी।

प्रसार भारती ने भी एक बयान जारी कर कहा है कि उसने ऐसी कोई झूठी जानकारी अपने किसी प्लेटफॉर्म पर साझा नहीं की थी। संस्था ने यह भी कहा कि उसके पास एक सख्त फैक्ट-चेकिंग सिस्टम है और वह केवल जाँची-परखी खबरें ही जारी करता है।

चुपचाप हटा दिए गए भारतीय चैनलों पर से झूठे आरोप

यहाँ से लेख ने एक और झूठ की ओर रुख किया। वॉशिंगटन पोस्ट ने TV9 भारतवर्ष पर एक झूठा आरोप लगाया कि चैनल ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के आत्मसमर्पण की खबर चलाई थी। बाद में चुपचाप इस दावे को लेख से हटा दिया गया।

एक Pulitzer जीतने की चाह रखने वाला न्यूजरूम यह उम्मीद तो कर ही सकता है कि वह ऐसे गंभीर आरोप लगाने से पहले जानकारी की अच्छी तरह जाँच कर ले। लेकिन लगता है कि ये नियम सिर्फ दूसरों पर लागू होते हैं उन पर नहीं जो खुद आरोप लगा रहे हैं। पत्रकारिता में सच्चाई की जाँच जरूरी है, लेकिन वॉशिंगटन पोस्ट ने खुद यह नियम तोड़ा।

सूडान के वे दृश्य जो कभी प्रसारित नहीं हुए

रिपोर्ट में यह झूठा दावा भी किया गया था कि भारतीय समाचार चैनलों ने सूडान संघर्ष के दृश्य प्रसारित किए, जो फिर से झूठ निकला। अब संशोधित संस्करण में उस पंक्ति को हटा दिया गया है।

अनुवाद में खोकर हिंदी वाक्यांशों का गलत अनुवाद

फिर सबसे अहम बात जो सामने आई वह था हिंदी शब्दों का गलत अनुवाद। वॉशिंगटन पोस्ट ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि भारतीय न्यूज चैनलों ने बताया था ‘पाकिस्तान के बड़े शहर तबाह कर दिए गए हैं।’ लेकिन यह बात बाद में गलत साबित हुई और उन्हें इसे सुधारना पड़ा।

असल में जो लोग भारतीय चैनल देखते हैं या जिन्हें थोड़ी भी हिंदी समझ आती है, वो जानते हैं कि चैनलों पर ‘कराची में तबाही’ जैसे शब्दों का मतलब होता है कि वहाँ अफरा-तफरी या हंगामा मचा है, इसका ये मतलब नहीं होता कि पूरा शहर मिटा दिया गया है।

लेकिन वॉशिंगटन पोस्ट ने ‘तबाही’ का सीधा मतलब complete destruction (पूरी तरह बर्बाद हो जाना) निकाला। लगता है उन्होंने या तो Google Translate का इस्तेमाल किया या फिर किसी AI टूल से शब्द दर शब्द अनुवाद करवा लिया था। शायद वॉशिंगटन पोस्ट के पास फ्रीलांस पर भी कोई ऐसा कर्मचारी रखने का बजट नहीं है, जो भारतीय भाषाओं को समझता हो।

विडंबना का एक सबक

एक ऐसा लेख, जिसे भारतीय मीडिया में गलत जानकारी को उजागर करने के लिए लिखा गया था, खुद ही एक उदाहरण बन गया कि कैसे झूठी या भ्रामक बातें कभी-कभी मशहूर पश्चिमी मीडिया संस्थानों में भी छप जाती हैं।

यह रिपोर्ट जो भारतीय न्यूज चैनलों को शर्मिंदा करने के इरादे से लिखी गई थी, अंत में खुद ही अपनी संपादकीय प्रक्रिया की कमजोरी को उजागर कर बैठी। ऐसे में बेहतर तो यहीं होगा कि वॉशिंगटन पोस्ट दूसरों पर उँगली उठाने से पहले खुद अपनी पत्रकारिता और नैतिकता पर ध्यान दे और आत्ममंथन करे।

इस खबर को मूल रूप से अंग्रेजी में अनुराग ने लिखा है। इसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें। इसका अनुवाद सौम्या सिंह ने किया है।