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मालेगाँव में हिन्दुओं को मिला न्याय ‘कोर्ट की चूक’, मुंबई ब्लास्ट में मुस्लिम बरी ‘सच की जीत’: वामपंथी मीडिया के लिए हमेशा सनातनी दोषी-मुस्लिम मासूम, दो अदालती फैसलों ने दिखाया

पिछले एक माह में दो आतंकी हमलों में अदालत ने फैसले सुनाए। एक फैसला 2006 के मालेगाँव धमाकों से जुड़ा था जबकि दूसरा 2008 में हुए मुंबई लोकल धमाकों से। दोनों मामलों में धमाके के आरोपित बरी हो गए। उन्हें लगभग 2 दशक के बाद इन मुकदमों से मुक्ति मिली।

एक महीने के भीतर ही इन दोनों धमाकों के फैसले सुनाए गए। दोनों मामलों में फैसला भी एक जैसा आया, फैसला सुनाने वाली अदालतें इसी देश की हैं। कोर्ट ने फैसले में दोनों ही ब्लास्ट में सबूत ना मिलने पर दोषियों को बरी कर दिया। दोनों मामलों की शुरूआती जाँच करने वाली एजेंसी (महाराष्ट्र ATS) भी एक है। यह हमले हुए भी एक ही राज्य- ‘महाराष्ट्र’ में हुए थे।

इन दोनों फैसलों में बस एक मूलभूत फर्क है। मुंबई ब्लास्ट 2006 में आरोपित मुस्लिम थे, जिन पर बम ब्लास्ट करने का तगड़ा शक था। दूसरी तरफ मालेगाँव ब्लास्ट 2008 में वे हिंदू थे, जिनको ‘भगवा आतंकवाद’ की थ्योरी गढ़ने के लिए फँसाया गया था। दोनों को बरी किया गया। लेकिन वामपंथी मीडिया ने दोनों फैसलों पर अलग-अलग एजेंडे से रिपोर्टिंग की।

मुंबई ब्लास्ट पर वामपंथी मीडिया को यह चिंता हुई कि कैसे मुस्लिम दोषियों की जिंदगी बर्बाद हो गई। वहीं मालेगाँव ब्लास्ट का फैसला आते ही यह चिंता खत्म हो गई। तब उनका एक्टिविज्म इस दुख में बदल गया कि आखिर हिंदू आतंकवादी साबित कैसे नहीं हुए? यह दिखाने के लिए वामपंथी मीडिया ने तरह-तरह के प्रपंच रचे।

मालेगाँव ब्लास्ट 2008 मामले में मुंबई की NIA स्पेशल कोर्ट ने फैसला सुनाया। इस मामले में साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर, लेफ्टिनेंट कर्नल श्रीकांत पुरोहित समेत 7 हिंदुओं को बरी कर दिया गया। कोर्ट ने कहा कि NIA की जाँच में किसी के भी खिलाफ पर्याप्त सबूत नहीं हैं और सिर्फ शक के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

जहाँ देश की बड़ी आबादी ने इस फैसले को ‘न्याय की जीत’ माना तो वहीं वामपंथी मीडिया ने फैसले को लेकर वही पुराना ‘भगवा आतंकवाद’ का हौव्वा और अदालत की नीयत पर सवाल करने वाला एजेंडा आगे बढ़ाया। लेकिन वामपंथी मीडिया की दोहरी सोच तब सामने आ गई जब उसने 7/11 मुंबई लोकल ट्रेन ब्लास्ट में 12 मुस्लिमों के कोर्ट से बरी होने पर ‘न्याय की जीत’ बताया और मुस्लिमों कि जिन्दगी खराब होने पर आँसू बहाए।

हिन्दू हुए बरी तो वामपंथी मीडिया को शक भी लगा सबूत

मालेगाँव ब्लास्ट 2008 का फैसला सुनाते हुए कोर्ट ने साफ कहा था कि बिना सबूतों के सभी को बरी किया जा रहा है। कोर्ट ने कहा था कि केवल ‘शक’ के आधार पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता है। इसके बावजूद वामपंथी मीडिया ने कोर्ट के बयान को सबूत समझ लिया, वो भी सिर्फ ‘भगवा आतंकवाद’ की थ्योरी को साबित करने के लिए।

मालेगाँव ब्लास्ट द वायर
मालेगाँव ब्लास्ट 2008 में ‘द वायर’ की लिखी गई खबर (फोटो साभार: The WIRE)

‘द वायर’ के इस आर्टिकल में साफतौर पर यह जताने की कोशिश की गई कि सभी आरोपित दोषी ही थे, लेकिन कोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया। कोर्ट के बयान को इस तरीके से दिखाया गया कि गंभीर सबूत होने के बावजूद कोर्ट ने केवल शक के आधार पर हिंदू दोषियों को बरी किया है। इस रिपोर्ट में कोर्ट के उस बयान पर जोर दिया गया, जिसमें कोर्ट ने कहा, “घटनास्थल से प्राथमिक साक्ष्यों का संग्रह ठीक से नहीं किया गया था।”

एक अलग रिपोर्ट में ‘द वायर’ मालेगाँव ब्लास्ट 2008 मामले में पूर्व स्पेशल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर रोहिणी सालियान के पुराने बयान को हिन्दुओं के खिलाफ एजेंडा के लिए इस्तेमाल किया गया। इससे द वायर ने यह दिखाने का दावा किया कि फैसले के पीछे राजनीतिक दबाव था।

सालियन ने कहा था कि मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद मालेगाँव ब्लास्ट की पैरवी में गंभीर चूक हुई हैं। उन्होंने कहा था कि तत्कालीन मोदी सरकार ने NIA के जरिए मालेगाँव ब्लास्ट के दोषियों पर नरमी बरतने को कहा था।

मालेगाँव ब्लास्ट द वायर
मालेगाँव ब्लास्ट 2008 में ‘द वायर’ की लिखी गई खबर (फोटो साभार: The WIRE)

मामले में कोर्ट के फैसले के बाद अब रोहिणी सालियान ने आरोप लगाते हुए कहा, “यह तो पता था कि ऐसा होगा। अगर आप सच्चे सबूत पेश नहीं करेंगे तो और क्या उम्मीद की जा सकती है?” सालियान ने कहा कि साल 2017 से ही वह अभियोजक के रूप में बाहर कर दी गई थीं।

मालेगाँव ब्लास्ट द क्विंट
मालेगाँव ब्लास्ट 2008 में मुस्लिम पीड़ितों की आपबीती बताती ‘द क्विंट’ की खबर (फोटो साभार: The Quint)

मालेगाँव मामले में फैसले पर बदजुबानी करने में केवल द वायर ही नहीं बल्कि दूसरे वामपंथी मीडिया पोर्टल भी शामिल हुए। मालेगाँव फैसले पर रूदाली करने वाले गिरोह में दूसरा नाम द क्विंट है। वामपंथी पोर्टल ‘द क्विंट’ ने इस लेख में मालेगाँव ब्लास्ट 2008 के मुस्लिम पीड़ितों पर रोना रोया।

कोर्ट के फैसले पर पीड़ितों की आपबीती को क्विंट ने खूब प्रचारित किया। ब्लास्ट में मारे गए उस्मान खान के भतीजे को न्याय के साथ विश्वास टूटने का भावनात्मक प्लॉट खड़ा किया गया। मानों 7 लोगों को बरी कर कोर्ट ने कोई अपराध कर दिया हो, जबकि कोर्ट का फैसला सबूतों के आधार पर लिया गया था।

मालेगाँव पर वामपंथी मीडिया का दर्द असल में इसलिए फूटा क्योंकि हिन्दुओं को न्याय मिल गया। हिन्दू आतंकवाद की थ्योरी पूरे देश के सामने मुंह के बल गिर गई। जिन साध्वी प्रज्ञा और कर्नल पुरोहित को फँसाने का प्रयास किया गया, वह बेदाग़ छूट गए।

मुस्लिम तुष्टिकरण के चलते खड़े किए भगवा आतंकवाद के नैरेटिव का दफ़न होना और वामपंथियों के प्रपंचों का अस्वीकार किया जाना, क्विंट और वायर के लिए मौत समान है। अब इस दुख को पाटने के लिए वह कुछ भी बातें कर रहे हैं। फिर इसके लिए चाहे कोर्ट को कठघरे में ही क्यों ना खड़ा करना पड़ जाए।

मुस्लिम छूटे तो न्याय व्यवस्था पर पढ़े कसीदे

इसी वामपंथी मीडिया ने मुंबई ब्लास्ट 2006 के दोषी पर कोर्ट के फैसले की सराहना की। कोर्ट के फैसले को ‘न्याय की जीत’ करार दिया। क्योंकि बरी हुए लोग ‘मुस्लिम’ थे। इन मुस्लिमों को लेकर भावानात्मक रिपोर्ट करनी शुरू कर दी गई। यहाँ कोर्ट के फैसले पर सवाल नहीं किया और ना ही राजनीतिक दबाव जैसा कोई प्रपंच रचने की बातें हुईं।

मुंबई ब्लास्ट द वायर
मुंबई ब्लास्ट 2006 में ‘द वायर’ की लिखी गई खबर (फोटो साभार: The WIRE)

‘द वायर’ ने इस मामले में एक रिपोर्ट में मुस्लिम आरोपितों को न्याय मिलने का गुणगान किया। बताया गया कि मुंबई बम धमाका 2006 में इन्हें केवल इनका हिस्सा होने तक सीमित कर दिया। उसने मुस्लिमों के 19 साल जेल में जाने के लिए आंसू बहाए और पूछा की उनकी भरपाई कौन करेगा।

मालेगाँव मामले में ATS की जाँच को ब्रह्मवाक्य मान कर हिन्दुओं को फाँसी पर चढ़ाने की इच्छा रखने वाला वामपंथी मीडिया इस मामले में इसी एजेंसी की जिम्मेदारी तय करने जैसी बातें करने लगा।

मुंबई ब्लास्ट द वायर
मुंबई ब्लास्ट 2006 में ‘द वायर’ की लिखी गई खबर (फोटो साभार: The WIRE)

मुंबई ब्लास्ट 2006 की जाँच के दौरान पुलिस ने जो प्रताड़ना आरोपितों पर की, उसकी कोर्ट के फैसले से तुलना की गई। पुलिस को तुरंत खलनायक बताया गया और 19 सालों का हिसाब माँगा गया।

मुंबई ब्लास्ट द वायर
मुंबई ब्लास्ट 2006 में ‘द वायर’ की लिखी गई खबर (फोटो साभार: The WIRE)

इसके बाद तो ‘द वायर’ ने मुंबई ब्लास्ट 2008 के एक आरोपित की कहानी अलग से बताई और बर्बाद हुई जिंदगी बताकर रोना-पीटना चालू किया। आरोपित की ‘फाँसी यार्ड’ से निकलने की कहानी इस तरह लिखी जैसे कोई मेलोड्रामा वाली फिल्म चल रही हो। पूरा आर्टिकल मानों किसी आरोपित नहीं, बल्कि फकीर की कहानी हो।

असल में वामपंथी मीडिया का यह स्वभाव ही है, हिंदू को अपराधी और मुस्लिम को पीड़ित बताना। उसे देश का औसत हिंदू हिंसक, लेकिन मुस्लिम शांतिप्रिय लगता है। उसे ईद की सेवइयों में भाईचारा दिखता है लेकिन होली के रंगों में उसे नफरत दिखाई पढ़ती है।

वह मुस्लिम के आतंकी होने पर innocent until proven guilty का रवैया अपनाती है, लेकिन हर हिंदू को वह हमेशा ही दोषी मानती है। यही वह करती आई है, और करती रहेगी।

‘ISIS टेरेरिस्ट संगठन नहीं’: आतंकी साकिब नाचन की याचिका सुप्रीम कोर्ट ने की खारिज, क्रिमिनल कोर्ट जाने को कहा; महाराष्ट्र के गाँव को घोषित किया था ‘अल शाम’

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (5 अगस्त 2025) को आतंकी साकिब नाचन की याचिका खारिज कर दी है। यह याचिका दिसंबर 2024 में दाखिल की गई थी। इसमें भारत में ISIS को आतंकवादी संगठन घोषित करने को लेकर चुनौती दी गई थी। साकिब नाचन की जून 2025 में ब्रेन हैमरेज से मौत हो चुकी है।

याचिका में नाचन ने दावा किया था कि उसे और उसके बेटे शमिल नाचन को ISIS से जुड़े होने के संदेह में गलत तरीके से गिरफ्तार किया गया था। सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाला बागची की पीठ ने ये कहकर याचिका खारिज कर दी कि इस तरह के आरोपों पर उचित क्रिमिनल कोर्ट ही विचार कर सकती है।

नाचन की याचिका में 2015 और 2018 में जारी दो सरकारी नोटिफिकेशनों को चुनौती दी गई थी, जिन्हें अलनॉफुल एक्टीविटीज प्रीवेंशन एक्ट (UAPA), 1967 की धारा 35 के तहत जारी किया गया था। कोर्ट ने कहा कि वह इस तरह की याचिका पर विचार नहीं करना चाहता है।

साकिब नाचन की मृत्यु के बाद वरिष्ठ वकील मुक्ता गुप्ता को कोर्ट ने amicus curiae (न्याय मित्र) नियुक्त किया। उन्होंने कोर्ट में दलील दी कि इन नोटिफिकेशनों में ‘खिलाफत’ और ‘जिहाद’ जैसे मजहबी शब्दों की गलत व्याख्या की गई है, जिससे याचिकाकर्ता के अनुच्छेद 25 के तहत मिलने वाले धार्मिक अधिकारों का उल्लंघन होता है।

गुप्ता ने कहा कि UAPA की धारा 3 के तहत जिस तरह ‘अवैध संघ’ घोषित करने की प्रक्रिया तय है, वैसी कोई प्रक्रिया धारा 35 के तहत नहीं है, जिससे संगठन को ‘आतंकवादी संगठन’ घोषित किया जा सके। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि UAPA में आतंकवादी संगठन की स्पष्ट परिभाषा नहीं दी गई है।

जस्टिस बागची ने कहा कि नोटिफिकेशन में ‘खिलाफत’ जैसे शब्दों का उपयोग मजहबी संदर्भ में नहीं, बल्कि आतंकवादी गतिविधियों के संदर्भ में किया गया है, इसलिए उन्हें उसी संदर्भ में पढ़ा जाना चाहिए। जस्टिस सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि UAPA में ‘terrorist act’ (आतंकवादी कृत्य) की परिभाषा दी गई है, और जो संगठन ऐसी गतिविधियों में शामिल होते हैं, उन्हें ‘आतंकी संगठन’ घोषित किया जा सकता है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता दरअसल इस याचिका के जरिए अपने और अपने बेटे के खिलाफ चल रहे आपराधिक मामलों में राहत लेना चाह रहे थे, जबकि इसके लिए क्रिमिनल कोर्ट ही सही जगह है।

जस्टिस सूर्यकांत ने कहा, “ऐसे मामलों में राहत के लिए याचिकाकर्ता को सही फोरम पर जाना चाहिए। वह जमानत या अन्य राहत के लिए आपराधिक कोर्ट का रुख कर सकते हैं।” इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया।

कौन था साकिब नाचन?

साकिब नाचन एक कुख्यात आतंकवादी था, जिस पर मुंबई में चार महीनों के अंदर तीन बड़े बम धमाकों को अंजाम देने का आरोप है। ये धमाके 6 दिसंबर 2002 से 13 मार्च 2003 के बीच हुए थे। आखिरी धमाका सबसे खतरनाक था, जिसमें 11 लोगों की मौत हो गई थी और 82 लोग घायल हुए थे।

इन धमाकों को मुंबई के व्यस्त रेलवे स्टेशन और बाजारों को निशाना बनाकर अंजाम दिया गया था ताकि ज्यादा से ज्यादा नुकसान हो। मुंबई पुलिस ने 10 अप्रैल 2003 को साकिब को गिरफ्तार किया था। उसे 8 साल की सजा हुई और फिर उसे 1 लाख के मुचलके पर जमानत मिल गई।

बाद में मार्च 2016 में कोर्ट ने उसे धमाकों के मामले में दोषी ठहराया। लेकिन वह 2 साल से भी कम समय के लिए ही जेल में रहा और नवंबर 2017 में उसे ‘अच्छे व्यवहार’ के चलते 5 महीने पहले रिहा कर दिया गया।

इस बीच, 4 अगस्त 2012 को उसे विश्व हिंदू परिषद (VHP) के कार्यकर्ता मनोज राइचा की हत्या की कोशिश के आरोप में फिर से गिरफ्तार किया गया। लेकिन उसे अगस्त 2014 में फिर जमानत मिल गई।

रिहाई के बाद भी साकिब नाचन ने अपनी आतंकी गतिविधियाँ जारी रखीं। 9 दिसंबर 2023 को राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने उसे फिर से गिरफ्तार किया, क्योंकि वह महाराष्ट्र में एक ISIS मॉड्यूल चला रहा था।

शुरुआती जाँच में पता चला कि साकिब ने ठाणे के ग्रामीण इलाके पाडघा को ‘मुक्त क्षेत्र’ और ‘अल-शाम’ घोषित कर दिया था। यह वही तरीका है जो सीरिया में ISIS अपनाता है। NIA ने यह भी बताया कि वह मुस्लिम युवाओं को भड़काकर उन्हें उनके घरों से पाडघा लाकर आतंकी नेटवर्क को मजबूत करने में जुटा था।

इससे पहले 11 अगस्त 2023 को NIA ने साकिब का बेटा शमिल नाचन को भी गिरफ्तार किया था। यह गिरफ्तारी पुणे ISIS मॉड्यूल केस में हुई। जाँच में शमिल के ठिकाने से आपत्तिजनक सबूत मिले। शमिल और उसके साथियों ने 2022 में पुणे में एक घर में IED (बम) बनाने और ट्रेनिंग की वर्कशॉप का आयोजन किया था और वहाँ बम तैयार किए थे। इसके बाद उसे न्यायिक हिरासत में भेजा गया।

मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में अदिति ने लिखी है। इसका अनुवाद सौम्या सिंह ने किया है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

आर्मी-नेवी-एयरफोर्स के लिए खरीदे जाएँगे ₹67000 करोड़ के हथियार, मोदी सरकार ने दी मंजूरी: ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में पाकिस्तान को तबाह करने वाले ब्रह्मोस, ड्रोन और रडार भी लिस्ट में शामिल

मोदी सरकार ने मंगलवार (5 अगस्त 2025) को लगभग ₹67,000 करोड़ के रक्षा खरीद प्रस्तावों को मंजूरी दी है। इसमें लंबी दूरी के उड़ान भरने वाले ड्रोन्स के साथ ब्रह्मोस फायर कंट्रोल सिस्टम की खरीद शामिल है। जिन हथियारों की खरीद के प्रस्ताव को मंजूरी मिली है, उनमें से कई हथियार औसे हैं जिनका उपयोग ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी किया गया था इनमें S-400 मिसाइल सिस्टम समेत अन्य के अपगग्रेडेशन और मेंटेनेंस समेत कई प्रस्ताव शामिल किए गए हैं।

रक्षा मंत्रालय की ओर से रक्षा अधिग्रहण परिषद (Defence Acquisition Council – DAC) की बैठक हुई। इसकी अध्यक्षता रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने की। इसमें थल सेना, वायु सेना और नौसेना के लिए कई महत्वपूर्ण उपकरणों और प्रणालियों की खरीद को स्वीकृति दी गई। इस प्रस्ताव का उद्देश्य भारतीय सशस्त्र बलों की सामरिक युद्धक क्षमता को आधुनिक तकनीक से लैस करना है।

किस सेना को क्या मिला

थल सेना के लिए बीएमपी इंफैंट्री (पैदल सेना) लड़ाकू वाहनों में थर्मल इमेजर आधारित नाइट साइट्स लगाए जाएँगे। इससे रात के समय इन वाहनों के संचालन में बेहतरी आएगी। इसके अलावा पर्वतीय इलाकों में निगरानी के लिए विशेष राडार सिस्टम भी खरीदे जाएँगे इससे दुर्गम क्षेत्रों में भी सटीक जानकारी आसानी से मिल सकेगी।

वायु सेना को स्पाइडर एयर डिफेंस सिस्टम का अपग्रेड मिलेगा। साथ ही MALE (मीडियम एल्टीट्यूड लॉन्ग एंड्योरेंस) ड्रोन के खरीद की भी स्वीकृति मिली है। ये हथियारों और सेंसर से लैस होंगे और 24×7 निगरानीके साथ सटीक हमले की क्षमता के साथ आएँगे। वायु सेना के लिए C-17 और C-130J जैसे भारी परिवहन विमानों के रखरखाव और अपग्रेड का प्रस्ताव भी इसमें शामिल है।

नौसेना के लिए कॉम्पैक्ट ऑटोनॉमस सरफेस क्राफ्ट, ब्रह्मोस मिसाइल के लिए फायर कंट्रोल सिस्टम और लॉन्चर और बराक-1 मिसाइल प्रणाली का अपग्रेड का प्रस्ताव शामिल किया गया है। ये सभी उपकरण समुद्री सुरक्षा, पनडुब्बी रोधी युद्ध और तटीय निगरानी में एक स्तर ऊपर उठेंगे।

इन सभी प्रस्तावों को ‘मेक इन इंडिया’ पहल के तहत स्वदेशी निर्माण को प्राथमिकता देते हुए मंजूरी दी गई है ताकि देश की रक्षा उत्पादन क्षमता को भी बढ़ावा मिले।

सुरक्षा रणनीति में एक बड़ा कदम

यह रक्षा खरीद निर्णय भारत की सुरक्षा रणनीति में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। खास तौर पर अगर चीन और पाकिस्तान से उत्पन्न होने वाली चुनौतियों को देखा जाए तो ये रक्षा उपकरण आधुनिक होने के साथ बेहतर मारक और सुरक्षा प्रणाली से लैस होंगे। इस खरीद से भारतीय सेनाओं को आधुनिक हथियार तो मिलेंगे ही, पर साथ ही उनकी जवाबी कार्रवाई की क्षमता भी कई गुना बढ़ जाएगी।

110+ एयर लॉन्च ब्रह्मोस मिसाइलों को मंजूरी

ब्रह्मोस मिसाइल की खरीद को लेकर रक्षा मंत्रालय की ओर से जारी किए गए प्रस्ताव में 110+ एयर-लॉन्च ब्रह्मोस मिसाइलों को खरीदने की मंजूरी भी मिल गई है। इसका अनुमानित बजट लगभग ₹10,800 करोड़ है। इसके अलावा नौसेना के पुराने युद्धपोतों के लिए ब्रह्मोस फायर कंट्रोल सिस्टम और वर्टिकल लॉन्चर की खरीद को भी मंजूरी दी गई है। इसकी लागत लगभग ₹650 करोड़ है।

इससे पहले मार्च 2023 में भारत ने 220 ब्रह्मोस मिसाइलों के लिए ₹19,519 करोड़ का सौदा किया था। अब तक इस मिसाइल प्रणाली पर कुल ₹58,000 करोड़ से अधिक खर्च हो चुका है।

ब्रह्मोस क्यों है इतना ज़रूरी?

ब्रह्मोस मिसाइल भारत और रूस ने साथ मिलकर तैयार किया है। ये दुनिया की सबसे तेज सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइलों में से एक है। इसकी गति Mach 2.8 (ध्वनि की गति से लगभग तीन गुना) है और यह 450 किलोमीटर तक सटीक निशाना साध सकती है। इसे थल, जल और वायु – तीनों माध्यमों से लॉन्च किया जा सकता है। इसकी ये क्षमता इसे बहुआयामी बनाते हैं।

हालिया समय में ब्रह्मोस मिसाइल भारत की डिटरेंस रणनीति का केंद्र बिंदु भी रहा है। हाल ही में हुए ऑपरेशन सिंदूर में इस मिसाइल ने पाकिस्तान के सैन्य ठिकानों, एयरबेस और आतंकी कैंपों पर सटीक हमले किए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इसकी सराहना करते हुए कहा कि यह ‘आत्मनिर्भर भारत’ की ताकत का प्रतीक है।

ब्रह्मोस की खरीद केवल एक तकनीकी अपग्रेड नहीं है, बल्कि यह भारत की सुरक्षा नीति में एक निर्णायक मोड़ भी है। यह मिसाइल प्रणाली न केवल दुश्मन की गहराई में सटीक हमला करने की क्षमता देती है, बल्कि भारत को क्षेत्रीय सैन्य शक्ति के रूप में स्थापित करने में भी मदद करती है।

चीन और पाकिस्तान जैसे पड़ोसियों के लिहाज से यह एक शक्तिशाली जवाबी हथियार है जो भारत की सीमाओं को सुरक्षित रखने में अहम भूमिका निभा रहा है।

ऑपरेशन सिंदूर में काम आए शस्त्र भी होंगे अपग्रेड

ऑपरेशन सिंदूर में जिन हथियारों का प्रयोग किया गया, वे भारत की सटीक और बहुआयामी युद्धक क्षमता का प्रतीक बने। इस ऑपरेशन में सबसे प्रमुख भूमिका निभाने वाले ब्रह्मोस एयर-लॉन्च सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल की खरीद के साथ ऑपरेशन में राफेल विमानों से लॉन्च होने वाले SCALP क्रूज़ मिसाइल का भी उपयोग हुआ था। ये दुश्मन के भीतर गुप्त ठिकानों को नष्ट करने में सक्षम है। इसे बी अपग्रेड किया जाएगा।

इसके अलावा ऑपरेशन सिंदूर में Loitering Munition यानी कामिकाज़े ड्रोन का भी प्रयोग हुआ। इसने दुश्मन के रडार और वायु रक्षा प्रणाली को भेदने का काम किया था। रक्षा परिषद ने MALE ड्रोन की खरीद को मंजूरी देकर आधुनिक शस्त्रों की संख्या में इजाफा किया है।

इसके अलावा जिस आकाश मिसाइल प्रणाली का प्रयोग पाकिस्तानी ड्रोन और मिसाइलों को रोकने के लिए किया गया, उसके नए वर्ज़न की खरीद भी इस प्रस्ताव में शामिल है। एल–70 एंटी–एयरक्राफ्ट गन और ZSU-23-4 शिल्का सिस्टम जैसे हथियारों ने ड्रोन हमलों को रोकने में अहम भूमिका निभाई थी। इन प्रणालियों के अपग्रेड को भी मंजूरी दी गई है।

इन सभी हथियारों की खरीद और अपग्रेड से भारत ने ये साफ कर दिया है कि सरकार ऑपरेशन सिंदूर जैसी रणनीतिक कार्रवाइयों के लिए कमर कस चुका है और बेहतर तैयारी में है। यह न केवल सशस्त्र बलों की ताकत को बढ़ाता है, बल्कि भारत की सुरक्षा नीति को भी एक निर्णायक दिशा देता है।

भारत की सुरक्षा रणनीति में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। खास तौर पर अगर चीन और पाकिस्तान से उत्पन्न होने वाली चुनौतियों को देखा जाए तो ये रक्षा उपकरण आधुनिक होने के साथ बेहतर मारक और सुरक्षा प्रणाली से लैस होंगे। इस खरीद से भारतीय सेनाओं को आधुनिक हथियार तो मिलेंगे ही, पर साथ ही उनकी जवाबी कार्रवाई की क्षमता भी कई गुना बढ़ जाएगी।

महात्मा गाँधी की मूर्ति को अपमानित करना अनैतिक, पर अपराध नहीं: केरल हाई कोर्ट, छात्र के खिलाफ केस रद्द; जानिए क्या है मामला

केरल हाई कोर्ट ने महात्मा गाँधी की प्रतिमा के साथ अभद्रता करने वाले शख्स के खिलाफ कार्रवाई रद्द कर दी। हाई कोर्ट ने कहा कि ऐसा करना कोई अपराध नहीं था। ऐसा करने वाला एक छात्र था, जिसने महात्मा गाँधी के ऊपर एक क्रिसमस वाला श्रद्धांजलि माला भी रख दिया था।

केरल हाई कोर्ट ने कहा कि छात्र का कृत्य भले ही निंदनीय है, लेकिन उसे कानूनन अपराध नहीं माना जा सकता। हाई कोर्ट ने कहा कि ऐसे कृत्य को दंडित करने के लिए कोई स्पष्ट कानूनी प्रावधान मौजूद नहीं है।

कोर्ट का क्या कहना था?

यह मामला केरल हाई कोर्ट की जस्टिस वी जी अरुण की बेंच ने सुना। उन्होंने यह कहते हुए मामला रद्द कर दिया कि याचिकाकर्ता का आचरण भले ही सामाजिक रूप से अस्वीकार्य और निंदनीय हो लेकिन कानून के अनुसार उसे गैर-कानूनी नहीं कहा जा सकता। कोर्ट ने साफ किया कि हर अनैतिक कार्य, अवैध कार्य नहीं होता।

कोर्ट ने ‘nullum crimen sine lege’ यानी ‘बिना कानून के कोई अपराध नहीं’ के सिद्धांत का हवाला देते हुए कहा कि जब तक किसी कृत्य को किसी कानून में अपराध के रूप में परिभाषित नहीं किया गया हो, तब तक उसे अपराध नहीं माना जा सकता।

कोर्ट ने यह भी कहा कि राष्ट्रीय सम्मान अपमान निवारण अधिनियम, 1971 में भी राष्ट्रीय नेताओं की प्रतिमाओं को अपवित्र करने के खिलाफ कोई प्रावधान नहीं है।

वकीलों की दलीलें और कोर्ट की टिप्पणी

छात्र के वकील एडवोकेट एस राजीव ने दलील दी कि भले ही छात्र का तरीका गलत था, लेकिन उसे अपराध नहीं कहा जा सकता। वकील ने दलील दी कि न तो कोई कानून टूटा है और न ही किसी की संपत्ति को नुकसान पहुँचाया गया है।

वहीं, सरकारी पक्ष की ओर से एडवोकेट हाशिम के एम ने तर्क दिया कि यह कृत्य समाज में असंतोष फैलाने वाला था। कोर्ट ने यह भी कहा कि भारत के नागरिकों को संविधान द्वारा दिए गए अधिकारों के साथ-साथ अपने मौलिक कर्तव्यों का भी पालन करना चाहिए।

कोर्ट ने माना कि स्वतंत्रता सेनानियों का सम्मान करना भी एक नैतिक कर्तव्य है, भले ही संविधान में उसका स्पष्ट रूप से जिक्र नहीं किया गया हो।

क्या था मामला?

यह मामला एक लॉ छात्र से जुड़ा है, जिस पर आरोप था कि उसने महात्मा गाँधी की प्रतिमा पर चशमा और क्रिसमस की माला रखी और फिर कहा कि गाँधी जी का निधन बहुत पहले हो चुका है।

इस पूरे कृत्य की वीडियो रिकॉर्डिंग की गई और उसे छात्रों के व्हाट्सएप ग्रुप में शेयर किया गया। इससे कॉलेज में तनाव फैल गया और प्रिंसिपल ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। इसके बाद छात्र को पाँच दिन के लिए कॉलेज से निलंबित कर दिया गया और उसे ₹5000 का जुर्माना भी भरना पड़ा।

छात्र के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 153 (दंगा भड़काने के इरादे से जानबूझकर उकसाना) और धारा 426 (शरारत के लिए दंड) के तहत केस दर्ज किया गया था। अब यह केस रद्द हो गया है।

ब्रह्मोस की ताकत से बदला ‘एशिया पैसिफिक’, फिलीपींस के राष्ट्रपति ने बताया ‘इंडो पैसिफिक’: भारतीयों के लिए वीजा फ्री एक्सेस, जानिए कैसे बदली रिश्तों की धुरी

चीन के लगातार बढ़ते खतरे के बीच भारत ने एक बड़ी कूटनीतिक बढ़त हासिल की है। भारत की यात्रा पर आए फिलिपींस के राष्ट्रपति फ़र्डिनेंड मार्कोस जूनियर ने भारत के आसपास के समुद्री क्षेत्र को एशिया पैसिफिक के बजाय इंडो पैसिफिक कह कर संबोधित किया है। उनके कहने का सीधा अर्थ है कि एशिया पैसिफिक का अभिभावक और रक्षक भारत है। उनकी यह यात्रा भारत और फिलिपींस सम्बन्धों में एक नया अध्याय है। इस दौरान रक्षा सहयोग मजबूत करने की बात भी हुई है।

भारत की यात्रा पर आए फिलीपींस के राष्ट्रपति फर्डिनेंड आर मार्कोस जूनियर का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार (5 अगस्त 2025) को राष्ट्रपति भवन में स्वागत किया। राष्ट्रपति मार्कोस भारत की 5 दिवसीय राजकीय यात्रा पर आए हैं।

यह दौरा भारत और फिलीपींस के बीच कूटनीतिक संबंधों के 75 साल पूरे होने के अवसर पर हो रहा है। इसे दोनों देशों के बीच रणनीतिक और आर्थिक सहयोग को मजबूत करने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।

स्वागत समारोह के बाद मीडिया को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति मार्कोस ने इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की बदलती स्थिति पर बात की। उन्होंने कहा कि अब इसे एशिया-प्रशांत क्षेत्र की बजाय इंडो-पैसिफिक क्षेत्र कहा जा रहा है और यह आज की वैश्विक राजनीति, व्यापार और अर्थव्यवस्था को बेहतर तरीके से दर्शाता है।

उन्होंने कहा कि नई तकनीकों और बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था और भू-राजनीति के कारण दोनों देशों के लिए कई नए अवसर उभरे हैं। उन्होंने जोर देते हुए कहा, “यह यात्रा नई संभावनाओं की खोज और हमारे मौजूदा संबंधों को मजबूत करने के लिए है।”

मार्कोस ने याद दिलाए अपने पारिवारिक संबंध

फिलीपींस के राष्ट्रपति मार्कोस ने भारत में होने पर खुशी जताई और हाल के वर्षों में भारत के तेज विकास की सराहना की। उन्होंने अपने पिता और पूर्व राष्ट्रपति फर्डिनैंड मार्कोस सीनियर को याद करते हुए कहा कि वे 1976 में भारत की यात्रा करने वाले पहले फिलीपीनी राष्ट्रपति थे।

राष्ट्रपति मार्कोस ने कहा, “यह मेरे लिए बहुत सम्मान की बात है कि मैं अपने चार पूर्ववर्ती राष्ट्रपतियों के नक्शेकदम पर चलते हुए भारत आया हूँ। मैं भारत की आपकी अगुवाई में हुई शानदार उपलब्धियों के लिए बधाई देता हूँ। जब मैंने दिल्ली में कदम रखा, तो भारत के तेज बदलाव और दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था की ऊर्जा मुझे साफ महसूस हुई।”

उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आतिथ्य और सहयोग के लिए भी धन्यवाद किया और हाल ही में भारत द्वारा फिलीपींस को चावल के निर्यात प्रतिबंध से छूट देने पर आभार जताया। गौरतलब है कि चावल फिलीपींस के खाने का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। फिलीपींस ने 2024 में भारत से 20 हजार+ टन चावल का निर्यात किया था।

राष्ट्रपति मार्कोस ने कहा, “हाल के वर्षों में हमारे बीच सहयोग काफी बढ़ा है। मुझे खुशी है कि अब हम इस मित्रता को एक पूर्ण रणनीतिक साझेदारी में बदल रहे हैं।”

फिलिपींस के लिए भारतीयों को नहीं लेना पड़ेगा वीजा

राष्ट्रपति मार्कोस ने लोगों के बीच बेहतर संबंधों को बढ़ावा देने के लिए उठाए गए कदमों पर एक भाषण दिया। उन्होंने इस दौरान ऐलान किया कि भारतीय पर्यटकों के लिए फिलीपींस में वीजा-फ्री प्रवेश की सुविधा होगी। उन्होंने और अधिक संख्या में भारतीयों को फिलीपींस घूमने का निमंत्रण दिया।

उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी का आभार जताया कि भारत ने फिलीपींस के पर्यटकों के लिए वीजा की फीस माफ़ कर दी है। इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा, “हम इस साल अक्टूबर से सीधी उड़ानों की दोबारा शुरुआत का स्वागत करते हैं और इस तरह की सीधी हवाई कनेक्टिविटी को आगे भी बनाए रखने और बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध हैं।”

रक्षा और समुद्री सहयोग पर फोकस

भारत और फिलीपींस के नेताओं के बीच बातचीत में रक्षा और समुद्री सहयोग पर खास जोर दिया गया। राष्ट्रपति मार्कोस ने भारत को रक्षा उद्योग में सहयोग खासकर भारत से ब्रह्मोस मिसाइल जैसे रक्षा प्लेटफॉर्म के निर्यात के लिए धन्यवाद दिया। उन्होंने इस क्षेत्र में और अधिक सहयोग की बात भी कही।

बातचीत में संयुक्त सैन्य अभ्यास, समुद्री गतिविधियों में सहयोग, अधिकारियों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आदान-प्रदान और अन्य रक्षा सहयोग के पहलुओं पर भी चर्चा हुई।

भारत ने यह भी कहा कि वह कई देशों को रक्षा प्लेटफॉर्म निर्यात कर रहा है और फिलीपींस भी इन प्लेटफॉर्म्स में रुचि दिखा रहा है। दोनों देशों के बीच जहाजों के दौरे और बहुपक्षीय मंचों के तहत सहयोग पर भी चर्चा हुई।

यह सहयोग आपसी समझ, समुद्री क्षेत्र की निगरानी बढ़ाने, इंटरऑपरेबिलिटी बेहतर बनाने और आपदा प्रबंधन में तैयारियों को मजबूत करने पर केंद्रित है।

इसके अलावा, भारत ने अपनी अंतरिक्ष क्षमताओं और कम लागत वाले स्पेस प्रोग्राम के बारे में भी बताया। राष्ट्रपति मार्कोस ने माना कि उन्होंने भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम की लागत प्रभावशीलता का अध्ययन किया है और वे भारत की तकनीक का उपयोग मौसम की सटीक भविष्यवाणी, कृषि सुधार और आपदा राहत जैसे सामाजिक क्षेत्रों में करना चाहते हैं।

भारत-फिलीपींस रक्षा संबंध: ब्रह्मोस समझौता

भारत और फिलीपींस ने रक्षा क्षेत्र में एक अहम कदम उठाया है। अप्रैल 2024 में भारत ने फिलीपींस को ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलें डिलीवर की थी। यह मिसाइलें 2022 में हुए 375 मिलियन अमेरिकी डॉलर (लगभग ₹3100 करोड़) के समझौते के तहत दी गई हैं।

इन मिसाइलों को भारतीय वायुसेना के C-17 ग्लोबमास्टर विमान के जरिए भेजा गया था। यह भारत की ओर से दक्षिण-पूर्वी एशियाई देश फिलीपींस को किया गया पहला बड़ा रक्षा निर्यात है।

इधर जमीनों को ‘मुक्त’ करा रही असम की BJP सरकार, उधर सत्ता में आने पर ‘अवैध’ कब्जों वाली जमीनों को फिर से बाँटने का वादा कर रहे गौरव गोगोई

असम में हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व वाली BJP सरकार लगातार अवैध कब्जों के खिलाफ अभियान चला रही है। इससे बड़ी संख्या में बांग्लादेशी घुसपैठिए प्रभावित हुए हैं। इससे चिढ़ी कॉन्ग्रेस ने सत्ता में लौटने पर उन जमीनों को बाँटने का वादा किया है जो कथित तौर पर गलत तरीके से मौजूदा सरकार से जुड़े लोगों ने हड़पी है।

असम प्रदेश कांग्रेस समिति के अध्यक्ष गौरव गोगोई ने 3 अगस्त को मुख्यमंत्री सरमा पर एक हमला करते हुए घोषणा की, “अगर अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों में विपक्षी पार्टी राज्य में सत्ता पर काबिज होती है तो मुख्यमंत्री और उनके मंत्रिमंडल द्वारा ‘अवैध रूप से’ कब्जा की गई भूमि को वंचित लोगों को आवंटित किया जाएगा।”

जोरहाट से लोकसभा सांसद गोगोई ने कहा, “मुख्यमंत्री और उनके मंत्रियों द्वारा भूमि सुधार के नाम पर अवैध रूप से अर्जित की गई जमीनों को नई कॉन्ग्रेस सरकार की पहली कैबिनेट बैठक में ही गरीबों में बाँटने का फैसला लिया जाएगा।” उन्होंने बताया कि उनकी पार्टी जनता की मदद के लिए भूमि और आर्थिक नीति दोनों में बदलाव लाएगी।

जेल जाने को लेकर सीएम हिमंत ने दिया मुँहतोड़ जवाब

कॉन्ग्रेस नेता ने आगे कहा, “हिमंत बिस्वा सरमा के शासनकाल में हुई लूट और अन्याय पर रोक लगाई जाएगी। कांग्रेस प्रगतिशील भूमि नीतियों और आर्थिक विकास पर आधारित एक नई सरकार बनाएगी।” उन्होंने जोर देकर कहा कि लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गाँधी के इस वादे को पूरा करना उनकी जिम्मेदारी है कि असम के लोग मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा को जेल में देखेंगे।

इसका जवाब देते हुए मुख्यमंत्री सरमा ने कहा, ” क्या गारंटी है कि मुझसे पहले राहुल गाँधी जेल नहीं जाएँगे।” उन्होंने कहा कि एक राष्ट्रीय नेता का इस तरह का बयान देना काफी अपमानजनक है और तब जब नेता अपनी माँ सोनिया गाँधी के साथ नेशनल हेराल्ड केस में पहले ही जमानत पर है।

असम के भूमि सुधार अभियान का सच

कॉन्ग्रेस असम में अतिक्रमण हटाने के अभियान का शुरू से विरोध कर रही है और इसे कोर्ट के आदेशों की अवमानना बता रही है। जबकि तथ्य ये है कि गुवाहाटी हाईकोर्ट ने असम, अरुणाचल प्रदेश, नगालैंड और मिजोरम जैसे 4 पूर्वोत्तर राज्यों की सीमाओं पर मौजूद वन क्षेत्रों में अतिक्रमण से निपटने के लिए एक उच्च स्तरीय समिति का गठन करने का आदेश दिया है।

एनजीटी को केन्द्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने एक रिपोर्ट सौंपी है जिसमें बताया गया है कि मार्च 2024 तक राज्य में कुल अतिक्रमणग्रस्त वन क्षेत्र 3,620.9 वर्ग किलोमीटर (3,62,090 हेक्टेयर) था, जो देश में मध्य प्रदेश के बाद दूसरे स्थान पर आता है।

अतिक्रमण के खिलाफ दायर याचिका में ये भी बताया गया था कि इसका वन्यजीवों और वन संरक्षण पर काफी बुरा असर पड़ा है। इस पर गुवाहाटी हाईकोर्ट ने असम सरकार को वन संरक्षित क्षेत्रों से अतिक्रमण हटाने का आदेश दिया था। इससे पहले भी गुवाहाटी हाईकोर्ट वन क्षेत्रों को अतिक्रमण से मुक्त कराने का आदेश कई बार दे चुका है।

अतिक्रमण ने जानवरों को बेदखल किया

गौरतलब है कि राज्य में दशकों से चल रहे वन क्षेत्र में अतिक्रमण का असर जीव-जन्तुओं पर पड़ा है। ये लोग अक्सर गाँवों की ओर भागने के लिए विवश होते हैं। खास कर हाथियों के गाँव के खेतों में घुसने और लोगों पर हमला करने की कई घटनाएँ सामने आई है।

असम के विशेष रूप से ग्वालपाड़ा जैसे जिलों में आम लोगों और हाथियों के बीच संघर्ष की खबरें आती रहती हैं। अतिक्रमण से जैव विविधता पर भी असर पड़ा है। लेकिन कॉन्ग्रेस राजनीतिक फायदे के लिए इसका इस्तेमाल कर रही है। यहाँ तक कि पिछले साल सोनापुर के कोसुटोली इलाके में अवैध रूप से घुसे बांग्लादेशी घुसपैठियों को उकसाने के आरोप भी कॉन्ग्रेस पर सीएम सरमा ने लगाया था।

उन्होंने कहा, “कांग्रेस और अन्य कट्टरपंथी ताकतों ने अतिक्रमणकारियों को उकसाया। उन्होंने पुलिस पर हमला किया। बांग्लादेश में जो नारा लगाया जा रहा था, वही नारा अब यहाँ भी लगाया जा रहा है। असम पुलिस की कार्रवाई के बाद इलाका फिर से शांत हो गया है और बेदखली का काम जारी है।”

ग्वालपाड़ा में सरकार की कार्रवाई के दौरान हिंसा भड़क गई थी, जिसमें 21 पुलिसकर्मी घायल हुए थे। इसके बाद सरमा ने आरोप लगाया कि कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने चायगाँव में पार्टी कार्यकर्ताओं को ‘अतिक्रमणकारियों’ और ‘भूमि जिहादियों’ को सरकारी जमीन पर कब्जा करने के लिए उकसाया।

सरमा ने गोगोई पर लगाए आरोप

सीएम सरमा ने कॉन्ग्रेस नेता गौरव गोगोई पर पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी से संबंध होने के आरोप लगाते रहे हैं। गोगोई की ब्रिटिश पत्नी एलिजाबेथ कूलबर्न जब दिल्ली के क्लाइमेट एंड डेवलपमेंट नॉलेज नेटवर्क में प्रोजेक्ट मैनेजर थी, उस वक्त उनके एक पाकिस्तानी से संबंध थे। पाकिस्तानी मूल के अली तौकीर शेख और एलिजाबेथ एक ही ऑफिस में काम करते थे। शेख एशिया क्षेत्रीय निदेशक थे। उनपर भारत के खिलाफ सोशल मीडिया में गलत जानकारी देने का रिकॉर्ड रहा है। उन्होंने दिल्ली दंगों को लेकर संसद में दिए गोगोई के बयान का समर्थन किया था।

फरवरी में सीएम सरमा ने आरोप लगाया था, “आईएसआई से संबंध, युवाओं का ब्रेनवॉश और पिछले 12 सालों से भारतीय नागरिकता लेने से इनकार करने के आरोपों से जुड़े गंभीर सवालों के जवाब दिए जाने की जरूरत है। इसके अलावा, धर्मांतरण गिरोह में शामिल होना और राष्ट्रीय सुरक्षा को अस्थिर करने के लिए जॉर्ज सोरोस समेत बाहरी लोगों से धन लेना गंभीर चिंता का विषय है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।”

गृह मंत्री अमित शाह ने हाल ही में यही बात कही थी। उन्होंने गोगोई की ओर मुखातिब होते हुए कहा था, “आप कई बार पाकिस्तान गए हैं, लेकिन क्या कभी बॉर्डर वाले इलाकों में गए हैं। क्या आप समझते हैं कि हमारे सैनिक किस परिस्थितियों में काम करते हैं।”

असम सरकार ने कई अवैध मदरसों पर भी कार्रवाई की। इन मदरसों को शिक्षा देने के नाम पर कट्टरपंथी धार्मिक प्रशिक्षण दिया जा रहा था। यहाँ तक कि ये भी पता चला कि कई मदरसे के कनेक्शन पाकिस्तान के आतंकवादियों से हैं। इन मदरसों को ध्वस्त करने का कॉन्ग्रेस ने विरोध किया था।

गौर करने की बात ये भी है कि गोगोई जब असम कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष चुने गए, तो बराक घाटी जाकर कट्टरपंथी मौलाना अहमद सईद गोविंदपुरी से मुलाकात की थी। ये कार्यक्रम गुप्त था और इसे बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों का दौरा करने के बहाने रात में अंजाम दिया गया।

अतिक्रमण के खिलाफ एक्शन जारी

विपक्ष और कट्टरपंथियों के तमाम विरोध के बावजूद असम में अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई जारी है। प्रशासन ने पिछले 5 दिनों में गोलाघाट जिले के रेंगा रिजर्व वन से करीब 8900 बीघा भूमि खाली कराई और 4000 से अधिक अवैध ढाँचों को ध्वस्त किया।

आधिकारिक जानकारी के मुताबिक, “पिछले 5 दिनों के दौरान वन भूमि अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई की गई और उसपर अवैध कब्जा हटाया गया। ये अभियान बिद्यापुर, पीठाघाट,सोनारीबील, दोयालपुर, डोलोनीपाथर, खेरबारी, आनंदपुर और मधुपुर जैसे सघन आबादी वाले क्षेत्रों में चलाया गया। “

गोलाघाट जिले के दोयांग रिजर्व फॉरेस्ट के मेरापानी में 205 घरों को भी 8 अगस्त को खाली करने का नोटिस दिया गया है। मुख्यमंत्री ने बताया, ‘बांग्लादेशी घुसपैठिए और संदिग्ध नागरिक’ कथित तौर पर असम के 29 लाख बीघा अर्थात 10 लाख एकड़ जमीन पर कब्जा किए हुए हैं। उन्होंने 21 जुलाई को दारंग ज़िले के गरुखुटी में बहुउद्देशीय कृषि परियोजना की चौथी वर्षगांठ के अवसर पर ये चौंकाने वाले खुलासे किए। 2021 में परियोजना की शुरुआत के बाद से 77,420 बीघा (25,500 एकड़) ज़मीन को अतिक्रमण से मुक्त कराया जा चुका है।

उन्होंने बताया, “दारंग जिले में बेदखल अभियान के सफल होने के बाद इसे बोरसोला, लुमडिंग, बुरहापहाड़, पाभा, बटाद्रवा, चापर और पैकान तक बढ़ाया गया है। पिछले चार वर्षों सरकार ने 1.29 लाख बीघा (करीब 43,000 एकड़) जमीन से अवैध कब्जा हटाया गया है। इसका एक बड़ा हिस्सा अब वन विकास और राज्य के नागरिकों के लिए आवंटित किया जा रहा है।”

मुख्यमंत्री ने कहा, “असम सरकार ने अतिक्रमणकारियों से 182 वर्ग किलोमीटर जमीन वापस ले ली है। अब यही घुसपैठिए एक अलग ‘मिया लैंड’ राज्य की माँग कर रहे हैं। उनका सपना जरूर पूरा होगा। लेकिन भारत में नहीं, बल्कि बांग्लादेश या अफगानिस्तान में। मैं उन्हें वहाँ पहुँचने में जरूर मदद करूँगा।”

यहाँ तक कि हिंदू स्थलों पर भी कब्जा कर लिया गया है। राज्य के वैष्णव मठों के 15,288.52 बीघा क्षेत्र पर अभी भी अवैध अतिक्रमण है। हालाँकि वर्तमान सरकार इस भूमि को मुक्त कराने के लिए एक अभियान चला रही है।

मुख्यमंत्री के अनुसार , “सभी प्रशासनिक अधिकारियों को वन क्षेत्रों से अवैध कब्जा हटाने के निर्देश दिए गए हैं। उन्हें यह सुनिश्चित करने के लिए कहा गया है कि मूल निवासी माने जाने वाले जनजातीय समुदायों के लिए वन अधिकार अधिनियम के तहत सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।” सीएम के मुताबिक इस अभियान को पूरा होने में कम से कम 10 साल लगेंगे

10 साल में हट जाएगा अतिक्रमण- सीएम

कॉन्ग्रेस पार्टी सरमा और उनके मंत्रियों पर हमला करने में व्यस्त है, जबकि असम सरकार राज्य और उसके निवासियों के लाभ के लिए अवैध अतिक्रमण हटाने में लगी हुई है। कॉन्ग्रेस का नजरिया ऐसा है जिसमें वह भारतीय और बांग्लादेशी मुस्लिमों के बीच भी अंतर करना भूल गई है। साथ ही हाईकोर्ट के आदेश को नजरअंदाज कर चुनावी फायदे के लिए भूमि सुधार अभियान का विरोध कर रही है।

( मूल रूप से ये लेख अंग्रेजी में लिखी गई है। इसे देखने के लिए यहाँ क्लिक करें)

’24 घंटे में बढ़ा देंगे टैरिफ’: रूस के साथ तेल कारोबार रोकने के लिए ट्रंप की नई गीदड़भभकी, भारत ने कहा- राष्ट्रीय हित के लिए सभी आवश्यक कदम उठाएँगे

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मंगलवार (5 अगस्त 2025) को कहा कि अगले 24 घंटे में ही भारत पर टैरिफ की दरों में बढ़ोतरी की जाएगी। इस दौरान ट्रंप ने यह भी दावा किया कि भारत ने अमेरिका को शून्य टैरिफ का प्रस्ताव दिया था, लेकिन उन्होंने इसे ठुकरा दिया क्योंकि भारत रूस से तेल खरीदना जारी रखे हुए है।

इस दौरान ट्रंप भारत के लिए ये कहने से भी नहीं चूके कि भारत एक अच्छा व्यापारिक साझेदार नहीं है और भारत के टैरिफ दुनिया में सबसे अधिक हैं। ट्रंप असल में मंगलवार को CNBC के शो स्क्वॉक बॉक्स के लिए इंटरव्यू दे रहे थे।

भारत के लेकर ट्रंप का ये बयान तब आया है जब महज एक दिन पहले ही वह भारत को रूस से तेल खरीदने के एवज में टैरिफ की दर बढ़ाने की धमकी दे चुके हैं। उनका कहना था कि भारत रूस से किफायती दरों पर तेल लेकर वैश्विक बाजार में महँगे दामों पर बेचता है और मुनाफा कमाता है। इसके साथ ट्रंप ने भारत-रूस के व्यापार को यूक्रेन युद्ध से भी जोड़ दिया था और कहा था कि भारत के कारण यूक्रेन में लोग मारे जा रहे हैं।

इसके जवाब में भारत के विदेश मंत्रालय ने ट्रंप और यूरोपियन यूनियन के लिए आँकड़ों के साथ जवाब दिया था। विदेश मंत्रालय ने कहा कि अमेरिका खुद भी रीस के साथ कई क्षेत्रों में व्यापार करता है। ऐसे में भारत के लिए ट्रंप का तंज कसना न केवल अनैतिक है बल्कि अकारण भी है।

विदेश मंत्रालय ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, “अमेरिका भी रूस से परमाणु उद्योग के लिए यूरेनियम हेक्साफ्लोराइड, ईवी उद्योग के लिएपैलेडियम के साथ उर्वरक और रसायन आयात करता है। ऐसे में भारत को निशाना बनाना न केवल अनुचित है, बल्कि गलत भी है। भारत हर बड़ी अर्थव्यवस्था की तरह अपने राष्ट्रीय हित और आर्थिक सुरक्षा की रक्षा के लिए सभी आवश्यक कदम उठाएगा।”

विदेश मंत्रालय की ओर से इस जानकारी के साझा करने के बाद व्हाइट हाउस में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में ट्रंप से रूस- अमेरिका के मुद्दे पर सवाल किया गया तो ट्रंप ने इस बारे में कोई जानकारी न होने की बात कह डाली। ट्रंप ने कहा कि रूस के साथ किन किन चीजों का व्यापार और आयात किया जाता है, उन्हें इसकी कोई जानकारी नहीं है।

खीझे तो बोले ट्रंप- बढ़ाएँगे शुल्क

ट्रंप ने कहा कि अगले 24 घंटों में भारत से आने वाले सामानों पर लगने वाले टैरिफ को 25% की दर से बढ़ा दी जाएगी। बताते चलें कि 30 जुलाई 2025 को भारत के सामान पर 25% टैरिफ लगाने की घोषणा की थी। साथ ही भारत पर रूस के साथ व्यापार करने पर अतिरिक्त कर लगाने की बात कही थी।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ट्रंप ने फार्मास्यूटिकल्स के आयात पर 250% तक करने के संकेत भी दिए हैं। इंटरव्यू में ट्रंप ने कहा कि हम चाहते हैं कि फार्मास्यूटिकल्स अमेरिका में बने इसलिए जो टैरिफ 150% था वह 250% तक भी जा सकता है।

ट्रंप पहले भी ब्रिक्स देशों पर 10% अतिरिक्त टैरिफ लगाने की धमकी दे चुके हैं। अगर ऐसा होता है, तो भारतीय सामानों के आयात पर प्रभावी टैरिफ 35% होगा। अमेरिका में एक विधेयक भी पारित होने वाला है। इसके तहत रूस के साथ भारत, चीन और ब्राजील के लेन-देन पर 500% अतिरिक्त टैरिफ लगाया जा सकता है।

कनाडा में SFJ ने बनाया ‘दूतावास’, टैक्स पेयर के पैसे से बने गुरूद्वारे का हिस्सा कब्जाया: ‘डिप्लोमेटिक पोस्ट’ पर ‘रिपब्लिक ऑफ़ खालिस्तान’ लिखा

कनाडा के सरे में प्रतिबंधित आतंकी संगठन सिख फॉर जस्टिस (SFJ) ने ‘एंबेसी ऑफ द रिपब्लिक खालिस्तान’ के नाम से कथित ‘दूतावास’ स्थापित कर दिया है। सुरक्षा एजेंसियों की इस पर कड़ी नजर है क्योंकि प्रतिबंधित संगठन एसएफजे वहाँ सिख जनमत संग्रह यानी सिख रेफेरेंडम से पहले एक बार फिर इस रूप में सामने आया है।

गुरुद्वारे में खोला गया कथित खालिस्तानी दूतावास

‘सिख फॉर जस्टिस’ ने गुरु नानक सिख गुरुद्वारे के साथ मिलकर कथित ‘खालिस्तान दूतावास’ खोला है। गुरुद्वारा परिसर में मौजूद एक इमारत में ‘खालिस्तान गणराज्य’ के बोर्ड के साथ यह अस्थायी डिप्लोमेटिक पोस्ट भी स्थापित की गई है।

गौर करने वाली बात यह है कि जिस इमारत में कथित दूतावास खोला गया है, वह टैक्स पेयर्स के पैसे से बना था। स्थानीय लोगों ने CNN-News18 को बताया गया है कि ब्रिटिश कोलंबिया सरकार ने हाल ही में उसी इमारत में एक लिफ्ट लगाने के लिए 150,000 डॉलर यानी 1,31,73,225 रुपए आवंटित किए।

खालिस्तानियों का घर बना कनाडा

इससे पहले कनाडा की खुफिया एजेंसी कैनेडियन सिक्योरिटी इंटेलिजेंस सर्विस ने सार्वजनिक तौर पर ये माना था कि खालिस्तानी कनाडा की धरती का इस्तेमाल हिंसा को बढ़ावा देने, धन जुटाने और योजना बनाने के लिए कर रहे हैं। ये लोग भारत को निशाना बनाना चाहते हैं। यह पहली बार हुआ है जब कनाडा की खुफिया एजेंसी ने अपनी सालाना रिपोर्ट में खास तौर पर कहा है कि खालिस्तानी संगठन हिंसा फैलाने की कोशिश कर रहे हैं।

भारत लगातार जताता रहा है विरोध

भारत पहले से कहता आ रहा है कि कनाडा खालिस्तानियों की शरणस्थली बन गया है। 1980 से कनाडा में मौजूद खालिस्तानी चरमपंथी भारत में पंजाब को ‘एक स्वतंत्र खालिस्तान’ बनाने की माँग करते रहे हैं। अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए हिंसा का सहारा लिया गया। पंजाब सालों तक हिंसा की आग में जलता रहा।

भारत ने खालिस्तानी उग्रवादियों के प्रति ढिलाई बरतने पर बार-बार कनाडा से आपत्ति दर्ज कराई है। लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आड़ में कनाडा में आतंकवाद को पनपने दिया गया और अब कनाडा की धरती पर टैक्सपेयर के पैसे से कथित “खालिस्तानी दूतावास” का निर्माण भारत के साथ में और खटास पैदा करेगा।

जहाँ प्रकट हुईं जानकी, उसे भव्य बनाएँगे ‘लव (नीतीश कुमार)-कुश (अमित शाह)’: घर-घर पहुँच रहा आमंत्रण का अक्षत, जानिए कैसे ‘पुनौरा धाम’ का होगा कायाकल्प

इस्लामी आक्रांताओं ने राम जन्मभूमि पर ढाँचा खड़ा कर दिया, भारत माता गुलाम रहीं, स्वतंत्र भारत में मामला न्यायालय में चला गया, इसलिए हिंदुओं को अपने ही अराध्य को भव्य मंदिर में देखने के लिए 5 सदी की प्रतीक्षा करनी पड़ी। पर हिंदुओं का उससे भी बड़ा दुर्भाग्य यह रहा कि ऐसा कोई संकट नहीं होने के बाद भी मिथिला की वह पवित्र भूमि दशकों उपेक्षित रही, जहाँ से जगत जननी जानकी सीता प्रकट हुईं। अब इस प्राकट्य स्थल को नव जीवन देने का बीड़ा उनके ‘लव (नीतीश कुमार)-कुश (अमित शाह)’ ने उठाया है।

अक्षत-तुलसीदल से लोगों को किया जा रहा आमंत्रित

जानकी मंदिर और कॉरिडोर के शिलान्यास को भव्य बनाने के लिए पुनौरा धाम में तैयारियाँ जोर-शोर से चल रही हैं। अमित शाह और नीतीश कुमार समेत कई बड़े नेता और साधु-संत व आम लोग इस कार्यक्रम में शामिल होंगे। इस कार्यक्रम में लाखों लोगों को पहुँचने का अनुमान लगाया जा रहा है।

इस शिलान्यास समारोह के लिए घर-घर आमंत्रण का अभियान भी चलाया जा रहा है। घर-घर जाकर लोगों को पीले अक्षत और तुलसी दल देकर कार्यक्रम के लिए आमंत्रित किया जा रहा है। साथ ही, नगर से गुजरने वाले राहगीरों को भी कार्यक्रम में बुलाने के लिए न्योता दिया जा रहा है।

जानकारी के अनुसार, इस शिलान्यास कार्यक्रम को तीन दिवसीय भव्य उत्सव के तौर पर मनाया जाएगा। माता जानकी के दिव्य मंदिर की नींव के लिए 11 नदियों का पवित्र जल लाया जाएगा। इनमें गंगा, यमुना, भागीरथी, अलकनंदा, मंदाकिनी, पिंडर, धौलीगंगा, लक्ष्मणा गंगा, सरस्वती, कमला और सरयू नदियाँ शामिल हैं।

मंदिर प्रबंधन ने शिलान्यास कार्यक्रम की शाम मंदिर पर दीपोत्सव का आयोजन करने करने का फैसला भी लिया है। इसे लेकर शिलान्यास के दिन लोगों से एक दीपक के साथ आने की अपील की जा रही है। उस दिन मंदिर के साथ-साथ सीताकुंड परिसर को 51,000 दीपों से सजाने की योजना है।

क्या है पुनौरा धाम के विकास की योजना?

बीते 1 जुलाई को बिहार कैबिनेट ने पुनौरा धाम में मंदिर निर्माण के लिए 882.87 करोड़ रुपए के बजट को मंजूरी दी थी। इस राशि में से 137 करोड़ रुपए से जानकी मंदिर का निर्माण किया जाएगा, 728 करोड़ रुपए से पर्यटन से जुड़े इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकास होना है। 10 वर्षों तक इसके रख-रखाव पर 16.62 करोड़ रुपए खर्च करने का प्रावधान किया गया है।

इस तीर्थ के विकास के लिए 50 एकड़ भूमि का अधिग्रहण किया जाना है। विकास परियोजना में पारंपरिक वास्तुकला के अनुरूप एक विशाल मंदिर का निर्माण और इसका संरक्षण व सौंदर्यीकरण शामिल है। साथ ही, मंदिर परिसर के चारों तरफ प्रवेश द्वार, विश्राम गृह, यज्ञशाला, भोजनालय, मेडिटेशन सेंटर और प्रवचन हॉल का निर्माण भी किया जाएगा।

पर्यटन सुविधाओं के विकास के तहत परिसर में होटल, रेस्टहाउस, संग्रहालय, स्मृति द्वार और स्मारक भवन का निर्माण किया जाएगा। मंदिर के आस-पास के क्षेत्र में हरियाली बनाए रखने के लिए सुंदर जलाशय और फव्वारे लगाए जाएँगे और बगीचों का निर्माण भी किया जाएगा। साथ ही, ‘सीता-वाटिका’ और ‘लव-कुश वाटिका’ का भी विकास किया जाएगा।

श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए बस टर्मिनल का निर्माण किया जाएगा और मंदिर तक पहुँचने और ठहरने के लिए भी इन्फ्रास्ट्रक्चर विकसित किया जाएगा। साथ ही, आधुनिक पार्किंग स्थल, चौड़ी सड़कें और स्ट्रीट लाइट्स के साथ फुटपाथ बनाए जाएँगे। इसके अलावा क्षेत्र में डिजिटल सूचना केंद्र और सुरक्षा के लिए कैमरे लगाए जाएँगे।

दशकों से उपेक्षित रहे जानकी जन्मस्थान की नीतीश कुमार ने ली सुध

अयोध्या की राम जन्मभूमि की तरह ही माता सीता का जन्मस्थान भी वर्षों तक उपेक्षा और अनदेखी का शिकार रहा है। अयोध्या में तो विवाद का बहाना बनाकर दशकों तक मंदिर निर्माण को टाल दिया गया लेकिन मिथिला की इस पवित्र पर किसी तरह का विवाद भी नहीं था फिर भी यह पावन स्थल अनदेखी के अँधेरे में डूबा रहा। ना भव्य मंदिर बनाया गया और ना ही किसी तरह के बड़े स्तर के विकास कार्य किए गए।

वर्षों तक ना केवल स्थानीय लोग बल्कि दूर-दराज के श्रद्धालु यहाँ एक भव्य मंदिर का इंतजार करते रहे लेकिन अब इन हालातों को बदलने की जिम्मेदारी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने उठाई है। उनके प्रयासों के बाद माता जानकी का भव्य मंदिर आकार लेने जा रहा है। यह भव्य मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र तो बनेगा है, साथ ही साथ बिहार के धार्मिक-सांस्कृतिक गौरव का प्रतीक भी होगा।

अयोध्या में श्रीराम मंदिर के निर्माण के बाद माता सीता के जन्मस्थान को भी संजीवनी मिली है। सीएम नीतीश कुमार कहते हैं कि यहाँ भव्य मंदिर बनने से पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा और बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहाँ माँ जानकी की पूजा-अर्चना करने आएँगे। साथ ही, वे कहते हैं कि पर्यटकों के आगमन से रोजगार का भी सृजन भी किया होगा।

नीतीश कुमार लगातार पुनौरा धाम जाकर तैयारियों को जायजा ले रहे हैं। बीते 26 जुलाई को सीएम नीतीश और उप-मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी पुनौरा धाम पहुँचे थे और वहाँ उन्होंने पूजा-अर्चना करने के अलावा तैयारियों की समीक्षा की भी की थी। कुछ दिनों पहले केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने भी इस पवित्र स्थल का दौरा किया था।

पुनौरा धाम में तैयारियों का जायजा लेते सीएम नीतीश कुमार

कैसा होगा माता जानकी का मंदिर?

इस तीर्थ स्थल के विकास के लिए डिजाइन सलाहकार के तौर पर उसकी कंपनी को नियुक्त किया गया है जो अयोध्या में राम मंदिर की मास्टर प्लानिंग और वास्तुकला सेवाओं के लिए नियुक्त की गई थी। पिछले 22 जून को नीतीश कुमार ने सीएम नीतीश ने मंदिर सहित अन्य संरचनाओं का डिजाइन शेयर किया था।

राम मंदिर के वास्तुकार रहे आशीष सोमपुरा ही इस मंदिर के आर्किटेक्ट हैं। उनका कहना है कि माँ जानकी के मंदिर का आर्किटेक्चर राम मंदिर के जैसा ही भव्य हो इसका पूरी कोशिश रहेगी। माता जानकी का यह मंदिर दशकों-सदियों तक मजबूती से टिका रहे इसके लिए खास तैयारियाँ की गई हैं।

इस मंदिर का निर्माण राजस्थान के बंसी पहाड़पुर के लाल बलुआपत्थरों (रेड सैंडस्टोन) से किया जाएगा जिसके चलते पूरे मंदिर का स्वरूप एक तरह से दिखेगा। यह पत्थर सदियों तक बिना टूटे या क्षतिग्रस्त हुए संरचना को मजबूती देता है। इस मंदिर की ऊँचाई 151 फीट होगी।

मंदिर परिसर निर्माण की परियोजना

क्या है सीतामढ़ी का ऐतिहासिक महत्व?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, राजा जनक को भूमि में हल चलाते समय सोने के घड़े में सीता मिली थीं। भूमि से मिलने के कारण माता सीता को भूमिपुत्री या भूसुता भी कहा जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, महाराजा जनक के राज्य जनकपुर में भयंकर अकाल पड़ने के बाद एक ऋषि ने उन्हें यज्ञ करने की सलाह दी थी और बंजर जमीन जोतने को कहा था।

जिले की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक, भगवान इंद्र को वर्षा करने हेतु मनाने के लिए जब राजा जनक सीतामढ़ी के पास कहीं हल चला रहे थे। ऐसा कहा जाता है कि राजा जनक ने उस स्थान पर एक कुंड खुदवाया था जहाँ सीता प्रकट हुई थीं और उनके विवाह के बाद उस स्थान को चिह्नित करने के लिए राम, सीता और लक्ष्मण की पत्थर की मूर्तियाँ स्थापित की थीं।

इस कुंड को अब जानकी कुंड के नाम से जाना जाता है और जानकी मंदिर के दक्षिण में स्थित है। वेबसाइट के मुताबिक, समय के साथ-साथ यह स्थान जंगल में तब्दील हो गया और करीब 500 वर्ष पहले बीरबल दास नामक एक हिंदू तपस्वी को ईश्वरीय प्रेरणा से उस स्थान का पता चला था।

वे जब अयोध्या से आए तो उन्होंने जंगल साफ किया और उन्हें राजा जनक द्वारा स्थापित मूर्तियाँ मिलीं और उन्हें वहाँ मंदिर बनवाकर माता जानकी की पूजा शुरू कर दी। इस स्थान पर मौजूदा मंदिर को करीब 100 वर्ष पुराना माना गया है।

वृन्दावन के बाँके बिहारी मंदिर के प्रबन्धन के लिए बनेगी समिति, रिटायर्ड जज होंगे मुखिया: सुप्रीम कोर्ट में UP सरकार बोली- भक्तों के भले के लिए बनाया है कानून

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने स्पष्ट किया है कि वृंदावन में बाँके बिहारी मंदिर ट्रस्ट के लिए बनाया जा रहा कानून भक्तों के भले के लिए है। योगी सरकार ने स्पष्ट किया है कि वह मंदिर में आने वाले भक्तों के लिए सुविधाएँ बढ़ाना चाहती है। योगी सरकार ने यह बातें सुप्रीम कोर्ट में कहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस बीच मंदिर के प्रबन्धन के लिए एक अंतरिम समिति बनाने की बात कही है। सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों से अब समिति के लिए नाम माँगे हैं। यह पूरा मामला बाँके बिहारी कॉरिडोर से जुड़ा हुआ है।

मंगलवार (5 अगस्त, 2025) को बाँके बिहारी कॉरिडोर पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई है। इस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जब तक राज्य सरकार और गोस्वामियों के बीच का विवाद नहीं सुलझता, तब तक मंदिर के प्रबन्धन के लिए एक समिति का गठन किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इसके मुखिया कोई हाई कोर्ट के रिटायर्ड जज होंगे। सुप्रीम कोर्ट ने अब इस मामले को 8 अगस्त, 2025 को सुनने को कहा है। तब तक दोनों पक्षों को जज का नाम देना होगा।

इस सुनवाई में उत्तर प्रदेश सरकार ने बताया कि मंदिर में प्रबन्धन के लिए ट्रस्ट बनाया जाना है, और इसके लिए एक अध्यादेश लाया गया है। राज्य सरकार ने स्पष्ट किया कि वह मंदिर के कामकाज में कोई दखल नहीं देने वाली है और अध्यादेश का उद्देश्य श्रद्धालुओं की भलाई है। राज्य ने बताया, “उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की गई थी और कुछ निर्देश जारी किए गए थे। राज्य का धार्मिक गतिविधियों में हस्तक्षेप करने का कभी इरादा नहीं था, न ही है।”

इस मामले में 4 अगस्त को भी सुनवाई हुई थी। 4 अगस्त, 2025 को उत्तर प्रदेश ने सुप्रीम कोर्ट स्पष्ट तौर पर बताया था कि मंदिर के खातों में जमा ₹500 करोड़ का इस्तेमाल केवल मंदिर के ही कामों के लिए किया जाएगा। वहीं उत्तर प्रदेश सरकार के खिलाफ पहुँचे याचिकाकर्ताओं ने कहा है कि उत्तर प्रदेश सरकार का अध्यादेश मंदिर के प्रबन्धन से गोस्वामियों को हटा देता है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि मंदिर में अभी तक कोई प्रबन्धन समिति ही नहीं है।

यह पूरा मामला उत्तर प्रदेश सरकार के वृंदावन में बाँके बिहारी मंदिर का कॉरिडोर बनाने से जुड़ा हुआ है। राज्य सरकार यहाँ कॉरिडोर बना कर भीड़ का प्रबन्धन ठीक करना चाहती है। इसका विरोध कुछ परिवार कर रहे हैं। विरोध का एक पॉइंट यह भी है कि मंदिर ट्रस्ट का पैसा, यहाँ कॉरिडोर की जमीन खरीदने में क्यों लगाया जाए। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को इस पैसे के इस्तेमाल की अनुमति दे दी थी। हालाँकि, अब फिर से इसमें कानूनी लड़ाई चालू हो गई है।