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असम सरकार कर रही घुसपैठियों पर कार्रवाई, ममता दीदी ने लगा दिया ‘बंग भाषियों पर अत्याचार’ का आरोप: हिमंता सरमा ने दिखाया आईना – हमें बंगालियों से नहीं, सीमा पार की ‘आबादी’ से दिक्कत

असम में हिमंता बिस्वा सरमा की सरकार घुसपैठियों और अवैध कब्जे से लोगों को हटाने के लिए अतिक्रमण विरोधी अभियान चला रही है। हालाँकि इसमें ममता दीदी ने ‘बंगालियों पर अत्याचार’ होने का झूठा दावा शुरू कर दिया है। इसके चलते शनिवार (19 जून 2025) को पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और असम सीएम सरमा के बीच सोशल मीडिया पर वाकयुद्ध शुरू हो गया है।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर TMC सुप्रीमो ने लिखा कि देश की दूसरी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा बांग्ला असम में भी सबसे ज्यादा बोली जाती है। वहाँ की बंगाली जनसंख्या को निशाना बनाने के लिए हिमंता सरकार उत्पीड़न कर रही है। यह भेदभावपूर्ण और असंवैधानिक है।

उन्होंने आगे कहा कि बीजेपी का यह विभाजन का एजेंडा अपनी सभी सीमाओं को पर कर चुका है और असम के लोग इसके लिए लड़ेंगे।

ममता की इस ट्वीट पर प्रतिक्रिया देते हुए असम सीएम ने कहा, “दीदी मैं आपको याद दिला दूँ- असम में हम अपने लोगों से नहीं लड़ रहे। बिना डरे उन मुस्लिम घुसपैठियों को हटा रहे हैं जो हमारी आबादी में बढ़ते चले जा रहे हैं। कई जिलों में अब हिंदू अल्पसंख्यक बन गए हैं।”

हिमंता सरमा ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने भी घुसपैठ को बाहरी आक्रमण कहा है। ऐसे में जब हम अपनी जमीन, संस्कृति, पहचान की रक्षा के लिए कदम उठा रहे हैं तो आप इसे राजनीति का रंग दे रही हैं।

गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल में 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले ममता बनर्जी बांग्ला भाषियों के लिए खुद को मसीहा साबित करने में तुली है ताकि बंगाली हिंदू वोट को भी अपनी ओर खींच सके। इस चक्कर में वह बिना सच्चाई जानें किसी भी आरोप को बेतरतीबी से लोगों के सामने परोस दे रही हैं।

बांग्लादेशी फौज ने गोपालगंज में हिंदुओं का नहीं, धर्मनिरपेक्ष पहचान का किया नरसंहार: मोहम्मद यूनुस की सरकार ने फैलाया जिहादी एजेंडा, खत्म कर रहे शांति और सांस्कृतिक विरासत

बांग्लादेश के इतिहास में बुधवार (16 जुलाई 2025) का ये दिन हमेशा एक ‘काले दिन’ के रूप में याद किया जाएगा। जिस फौज को कभी संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों में अपनी भूमिका के लिए विश्व स्तर पर सराहा गया था, उसी बांग्लादेशी फौज ने उस दिन वहाँ के गोपालगंज जिले में जो किया, उसने मानवता को झकझोर कर रख दिया।

‘कानून-व्यवस्था बनाए रखने’ के नाम पर, फौज ने प्रधानमंत्री शेख हसीना के गृहनगर में निहत्थे नागरिकों पर अंधाधुंध गोलियाँ चलाई, जिसमें दर्जनों लोगों की जान चली गई और सैकड़ों घायल हुए।

अंतर्राष्ट्रीय अपराध अनुसंधान प्रतिष्ठान (ICRF) द्वारा संयुक्त राष्ट्र नैतिकता कार्यालय (UNEO) को सौंपे गए दस्तावेजों में इस घटना को ‘नरसंहार के बराबर’ बताया गया है। ICRF की रिपोर्टों में न केवल गोपालगंज की भयावह घटना का ब्योरा है, बल्कि बांग्लादेश में लगातार बढ़ रही राजनीतिक हिंसा, सांस्कृतिक विरासत के संगठित विनाश और मानवाधिकारों के घोर उल्लंघन के एक खतरनाक पैटर्न की ओर भी इशारा किया गया है।

यह घटना न सिर्फ बांग्लादेश की लोकतांत्रिक अस्मिता पर एक गहरा धब्बा है, बल्कि वैश्विक समुदाय के लिए भी एक चेतावनी है कि अगर सत्ता की आड़ में ऐसी बर्बरता पर मौन साधा गया, तो मानवाधिकारों का विचार ही खतरे में पड़ सकता है।

बांग्लादेश फौज के दावे बनाम जमीनी सच्चाई – एक डरावनी तस्वीर

गोपालगंज में हुई हिंसा के बाद, बांग्लादेश फौज ने एक आधिकारिक बयान में दावा किया कि उसने ‘आत्मरक्षा’ में गोलीबारी की। फौज का कहना है कि हालात इतने खराब थे कि घातक हथियारों का इस्तेमाल करना उनकी मजबूरी बन गई।

यह बयान तेजी से सरकारी मीडिया और यूनुस शासन के समर्थकों द्वारा फैलाया जा रहा है। इनमें कई ऐसे चेहरे भी शामिल हैं जिनका पहले अंतरराष्ट्रीय संस्थानों जैसे एएफपी से जुड़ाव रहा है, जिससे वे विदेशी मीडिया में भी प्रभाव रखते हैं। लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों से बिल्कुल अलग है।

सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो और प्रत्यक्षदर्शियों के बयान बताते हैं कि नागरिकों ने किसी तरह का विरोध नहीं किया था। इसके बजाय, फौज की तरफ से रात के अंधेरे में घर-घर छापेमारी की जा रही है। पुरुषों, महिलाओं और यहाँ तक कि बच्चों को भी जबरन उठा लिया जा रहा है।

सबसे परेशान करने वाली बात यह है कि अब तक चार लोगों की मौत की पुष्टि हुई है। इनके नाम दीप्टो साहा, रमजान काजी, सोहेल राणा और इमोन तालुकदार हैं। इनके शवों का पोस्टमार्टम तक नहीं हुआ। कुछ ही घंटों के अंदर या तो उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया या उन्हें गुपचुप तरीके से दफना दिया गया, बिना किसी फोरेंसिक जाँच के। यह सिर्फ एक सच्चाई को छुपाने की कोशिश नहीं थी। यह एक राज्य प्रायोजित हत्या थी, जिसका मकसद सबूत मिटाना और सच्चाई को दबा देना था।

मुहम्मद यूनुस का इस्लामी शासन

गोपालगंज की घटना कोई अकेली या अचानक हुई हिंसा नहीं थी, बल्कि यह बांग्लादेश में जारी एक सुनियोजित और गहरी साजिश का हिस्सा है। इस साजिश के पीछे कट्टरपंथी इस्लामवादी और जिहादी ताकतें हैं, जिन्हें नोबेल पुरस्कार विजेता से इस्लामी राजनीति के आकांक्षी बने मुहम्मद यूनुस का संरक्षण प्राप्त है।

2024 में हुए राजनीतिक बदलाव को अब कई लोग जिहादी तख्तापलट कह रहे हैं, जिसके जरिए इन ताकतों ने बांग्लादेश की सत्ता पर कब्जा कर लिया। इस नई इस्लामी शासन व्यवस्था के तहत हिंदू समुदाय पर अत्याचार तेजी से बढ़ गए हैं।

मंदिरों को जलाया जा रहा है, हिंदुओं के घरों को ढहाया जा रहा है और जिन जिलों में हिंदुओं की आबादी अधिक है, उनके ऐतिहासिक नाम तक मिटाने की कोशिश की जा रही है। गोपालगंज जिला, जो शेख हसीना का गृहनगर है और जहाँ हिंदू समुदाय की बड़ी उपस्थिति है, लंबे समय से इस्लामी चरमपंथियों के निशाने पर रहा है।

2014 में बीएनपी नेता खालिदा ज़िया ने इस जिले का नाम बदलने की माँग की थी और इसके निवासियों को ‘गोपाली’ जैसे अपमानजनक शब्दों से संबोधित किया था। आज वही नफरत खुलकर हिंसा का रूप ले चुकी है। इस्लामी भीड़ खुलेआम अल-कायदा, आईएसआईएस, तालिबान और हमास के झंडे लहरा रही है और उग्रवादी नारे लगा रही है। ‘इस्लामी शशोन्तोंत्रो’ आंदोलन के एक प्रमुख नेता मुफ़्ती फैज़ुल करीम ने तो बांग्लादेश को ‘अगला अफगानिस्तान’ बनाने की खुली धमकी दी है।

स्थिति और भी चिंताजनक तब हो गई जब अंतरराष्ट्रीय जिहादी नेटवर्क के कई शीर्ष नेता हाल के महीनों में बांग्लादेश पहुँचे। गेटस्टोन इंस्टीट्यूट की एक रिपोर्ट के मुताबिक, तख्तापलट के बाद से हमास के खालिद कुद्दूमी और खालिद मिशाल, पाकिस्तानी इस्लामी नेता मुफ़्ती तकी उस्मानी और मौलाना फ़ज़लुर रहमान सहित कई जिहादी नेता बांग्लादेश का दौरा कर चुके हैं।

खुफिया सूत्रों का कहना है कि इन यात्राओं का उद्देश्य रोहिंग्या शरणार्थियों और ‘फंसे हुए पाकिस्तानियों’ (बिहारियों) को कट्टरपंथी बनाना है, ताकि उन्हें भारत, इजराइल, अमेरिका और यहाँ तक कि सऊदी अरब और बहरीन जैसे देशों के खिलाफ आतंकी गतिविधियों में इस्तेमाल किया जा सके। यह स्पष्ट है कि बांग्लादेश अब न केवल एक राजनीतिक संकट का सामना कर रहा है, बल्कि एक उभरते हुए आतंकवादी और इस्लामी कट्टरपंथी केंद्र में बदलता जा रहा है।

बांग्लादेश की बहुलवादी पहचान को एक-एक करके मिटाना

बांग्लादेश में इस्लामवादी ताकतों का मकसद सिर्फ शारीरिक हिंसा फैलाना नहीं है, बल्कि वे देश की धर्मनिरपेक्ष और बहुलतावादी पहचान को जड़ से मिटाना चाहते हैं। रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा रचित बांग्लादेश के राष्ट्रगान को ‘हिंदू गीत’ कहकर हटाने की माँग जोर पकड़ रही है।

साथ ही, गोपालगंज का नाम बदलने की कोशिशें भी तेज हो गई हैं। उनका दावा है कि यह नाम मुस्लिम भावनाओं को ठेस पहुँचाता है। लेकिन ये माँगें धार्मिक भावनाओं से नहीं, बल्कि एक कट्टर और फासीवादी सोच से निकली हैं।

ऐतिहासिक तौर पर, गोपालगंज का विकास हिंदू ज़मींदारों ने किया था और यह क्षेत्र रानी रासमोनी जैसी बंगाली संस्कृति की प्रतिष्ठित शख्सियत की विरासत से जुड़ा हुआ है। यह इलाका हमेशा से सांप्रदायिक सौहार्द और साझा संस्कृति का प्रतीक रहा है।

मगर मौजूदा इस्लामी शासन इसे मिटाना चाहता है। सांस्कृतिक सफाई की एक खतरनाक मुहिम के तहत बंगाली कला और संस्कृति को निशाना बनाया जा रहा है। प्रसिद्ध फिल्म निर्माता सत्यजीत रे के पैतृक घर को मैमनसिंह जिले में गिरा दिया गया।

भले ही दशकों से वह घर सत्यजीत रे के परिवार से जुड़ा रहा हो, अधिकारियों ने इस रिश्ते को झूठ कहकर नकार दिया। यह कोई सामान्य हादसा नहीं था, बल्कि बंगाली और हिंदू विरासत को खत्म करने की एक सुनियोजित कार्रवाई थी।

इसी तरह, बांग्लादेश के संस्थापक शेख मुजीबुर रहमान और नोबेल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ टैगोर से जुड़े स्थलों को भी निशाना बनाया जा रहा है। जहाँ एक ओर भौतिक विरासत को मिटाया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर एक मनोवैज्ञानिक युद्ध भी चल रहा है, जिसका मकसद लोगों की सोच और आत्मसम्मान को तोड़ना है।

गोपालगंज में जो हुआ, वह सिर्फ एक दर्दनाक घटना नहीं थी, बल्कि एक बड़ी साजिश का संकेत है। इस नरसंहार में कम से कम पाँच लोगों की जान गई। मारे गए लोगों को पोस्टमार्टम जैसी बुनियादी गरिमा तक नहीं दी गई।

इसके बाद पूरे इलाके में फौज का कब्जा हो गया और मीडिया को पूरी तरह चुप करा दिया गया। यह साफ दिखाता है कि बांग्लादेश सिर्फ राजनीतिक संकट में नहीं, बल्कि अपनी संस्कृति, इतिहास और आत्मा को बचाने की लड़ाई में फँसा हुआ है।

बांग्लादेश की आत्मा पर हमला

इतिहास में गोपालगंज को हमेशा सांप्रदायिक शांति और सौहार्द का प्रतीक माना गया है। यहाँ तक कि जमात-ए-इस्लामी और बीएनपी जैसी विवादित पार्टियों ने भी कभी वहाँ शांतिपूर्वक रैलियाँ की थी। लेकिन इस बार, नेशनल सिटिजन पार्टी (NCP) की रैली के दौरान कुछ अलग ही हुआ।

इस रैली की आड़ में जानबूझकर हिंसा फैलाई गई और जब फौज आई, तो उसने हालात संभालने की जगह और ज्यादा खून-खराबा किया। इस घटना के बाद पूरे गोपालगंज जिले में कर्फ्यू लगा दिया गया। लेकिन यह लोगों की सुरक्षा के लिए नहीं था। इसका असली मकसद था सच्चाई को छुपाना, इलाके को बाकी देश से अलग-थलग करना और आम लोगों को चुप कराना।

यूनुस शासन ने इस रैली को एक युद्धक्षेत्र में बदलकर ये साफ कर दिया कि अब बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के लिए कोई जगह सुरक्षित नहीं है। आज बांग्लादेश में सिनेमा हॉल, सूफी दरगाहें, हिंदू मंदिर और सांस्कृतिक संस्थान लगातार हमलों का शिकार हो रहे हैं।

ये सब संकेत हैं कि देश की वर्तमान सरकार एक सुनियोजित कोशिश कर रही है जिससे बांग्लादेश की धर्मनिरपेक्ष और विविध पहचान को खत्म किया जा सके। यह किसी लापरवाही का नतीजा नहीं, बल्कि  सोची-समझी साजिश है, बांग्लादेश की आत्मा पर सीधा हमला।

जहाँ कभी यह देश अपने संस्थापक शेख मुजीबुर रहमान के सपनों के अनुसार एक धर्मनिरपेक्ष और समावेशी राष्ट्र था, वहाँ अब एक बिखरा हुआ, डरा हुआ और कट्टरता की गिरफ्त में फंसा बांग्लादेश खड़ा है, जिसे उसके अपने ही नेता और संस्थाएँ धोखा दे रही हैं।

बुधवार (16 जुलाई 2025) को गोपालगंज में जो हुआ, वह सिर्फ एक त्रासदी नहीं थी, वह एक युद्ध अपराध था। यह नरसंहार, देश में व्यवस्था बहाल करने के नाम पर चल रहे एक बड़े और खतरनाक अभियान का हिस्सा है।

इस अभियान का निशाना हैं, देश के अल्पसंख्यक, उसकी सांस्कृतिक विरासत और उसका इतिहास। दुनिया को अब चुप नहीं रहना चाहिए। अगर संयुक्त राष्ट्र और पश्चिमी देश आंखें मूंदे बैठे रहे, तो वे उसी तख्तापलट का हिस्सा माने जाएँगे जिसने इन जिहादी ताकतों को सत्ता में लाने में मदद की।

अगर आज गोपालगंज को भुला दिया गया, तो कल यही त्रासदी फरीदपुर, नारायणगंज, ब्राह्मणबरिया और देश के बाकी हिस्सों में दोहराई जाएगी। अब चुप्पी की कोई गुंजाइश नहीं बची है, हर बीतते मिनट के साथ एक और जान जा रही है, एक और सच्चाई दफन हो रही है और बांग्लादेश का एक और हिस्सा मारा जा रहा है। दुनिया को बाद में नहीं बल्कि अभी ही बोलना होगा।

मूल रूप से अंग्रेजी भाषा में ये रिपोर्ट सलाह उद्दीन शोएब चौधरी ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

भोपाल के मुस्लिम गैंग के सरगना फरहान ने रेप का वीडियो दिखाकर धमकाया, कहा- तेरे साथ भी ऐसा ही करूँगा: चार्जशीट में पुलिस ने दिए जबरन दोस्ती-रेप-ब्लैकमेलिंग से जुड़े कई सबूत

भोपाल रेप केस के मामले में पुलिस ने कोर्ट में चार्जशीट दाखिल की। कोर्ट में इस केस की सुनवाई 22 जुलाई 2025 को होगी। केस के मुख्य आरोपित फरहान और उसके साथियों से जुड़ी कई अहम जानकारियों का खुलासा इस चार्जशीट में किया गया है।

मुख्य आरोपित फरहान लड़कियों के साथ रेप करने वाले वीडियो दिखलाकर धमकी देता था कि वह पीड़िताओं के साथ भी वैसा ही करेगा। इसके अलावा सबसे पहले जिस पीड़िता ने FIR करवाई थी, उसे फरहान ने शिकायत करने से मना किया था। वह उसे कागज पर लिखकर देने को तैयार था कि उसके साथ वह दोबारा दुष्कर्म नहीं करेगा। हालाँकि पीड़िता उसके बहकावे में नहीं आई।

क्या था मामला

भोपाल के पिपलानी थाना क्षेत्र के कोकता स्थित निजी कॉलेज में ‘मुस्लिम गैंग’ ने कई छात्राओं से रेप किया। छात्राओं को दोस्ती का झाँसा देकर फँसाया गया। आरोपितों ने पहले लड़कियों को अपने प्रेम जाल में उलझाया, फिर उनके साथ जबरदस्ती शारीरिक संबंध बनाए। इतना ही नहीं, उन्होंने पीड़िताओं पर धर्म बदलने का दबाव डाला और हिंदू धर्म के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणियाँ कीं।

रेप कर उनका वीडियो बनाया गया। वायरल करने की धमकी दी गई। इसके बाद 12 अप्रैल 2025 को भोपाल के बागसेवनिया थाने में दो लड़कियों ने एफआईआर लिखवाई कि फरहान और उसके साथियों ने मिलकर उसके साथ रेप और ब्लैकमेलिंग समेत कई घटनाओं को अंजाम दिया है। इसके बाद पुलिस ने कार्रवाई करते हुए 13 अप्रैल को फरहान को गिरफ्तार किया।

एक शिकायत के बाद 5 अन्य पीड़िताओं ने भी हिम्मत दिखाई और FIR दर्ज करवाई। मामले की तह खुलती गई तो फरहान के अलावा 6 और आरोपित भी पुलिस के हत्थे चढ़े। इसके बाद पुलिस ने मामले की गहन पड़ताल की और मामले की चार्जशीट दाखिल की। इसमें मेडिकल रिपोर्ट, डिजिटल सुबूत और गवाहों के बयान आदि को शामिल किया गया।

कब कौन हुआ गिरफ्तार

दो बहनों की ओर से पहली प्राथमिकी दर्ज होने के बाद 13 अप्रैल 2025 को फरहान को गिरफ्तार किया गया। इसके बाद 20 अप्रैल 2025 को दूसरे आरोपित साद को पुलिस ने गिरफ्तार किया। इसके बाद लगातार FIR दर्ज होने के साथ साथ आरोपितों के पकड़े जाने की कड़ी चलती रही।

तीसरे आरोपित साहिल पन्ना को पुलिस ने 27 अप्रैल तो वहीं चौथे आरोपित अली को 28 अप्रैल को गिरफ्तार किया गया। इसी के दो दिन बाद 1 मई 2025 को पाँचवा आरोपित नबील भी पुलिस के हत्थे चढ़ गया। हालाँकि छठा आरोपित अबरार काफी दिनों की पुलिस की गिरफ्त से फरार रहा। 30 जून 2025 को इटारसी से पुलिस ने अबरार को पकड़ा

दोस्ती, रेप और ब्लैकमेल

रिपोर्ट्स के अनुसार, पूरे मामले में 57 गवाहों की सूची के साथ 240 पन्नों का चालान तैयार कर जिला न्यायालय में जज नीलम मिश्रा की कोर्ट में पेश किया गया। पीड़िताओं ने जाँच के दौरान अपने बयान में ये भी बताया कि उन्हें जबरन मटन-चिकन खिलाया गया। इसके अलावा उनके वीडियो बनाए गए और ब्लैकमेल किया गया। आरोपितों ने उन पर इस्लाम कबूलने के लिए दबाव डाला।

एक पीड़िता ने बताया कि फरहान से उसकी मुलाकात बहन के कॉलेज में हुई थी। उसने जबरदस्ती दोस्ती की। पीड़िता ने बताया कि इसके बाद अप्रैल 2023 में मुझे बाहर घुमाने के बहाने फरहान अशोका गार्डन स्थित अपने घर लेकर गया। वहाँ उसने मेरे साथ रेप किया।

साथ ही उसने मोबाइल में लड़कियों के साथ रेप के वीडियो दिखलाकर कहा था कि तेरे साथ भी ऐसे ही करूँगा। फरहान ने पीड़िता को धमकी भी दी थी कि अगली बार सेक्स नहीं किया तो पापा-भाई को मार देगा।

इसके बाद घरवालों को हिम्मत करके उसने सारी बात बताई तो परिवार ने शिकायत दर्ज करवाने का साहस दिया। हालाँकि शिकायत से एक दिन पहले फरहान ने पीड़िता को धमकी भरा कॉल किया और कहा कि वह फरार हो जाएगा। पुलिस उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाएगी।

इसी तरह दूसरी FIR करवाने वाली पीड़िता को भी फरहान ने अपने रिश्ते में मामा लगने वाले अली से मिलवाया। उसके बाद 2024 में अली उसे अबरार के घर पर लेकर गया। वहाँ फरहान और अली ने रेप कर वीडियो बनाई। साथ ही पीड़िता के घरवालों को बताने की धमकी के साथ लगातार मिलने की बात कही।

पुलिस के सामने दिया बयान- कोई पछतावा नहीं

फरहान ने पुलिस पूछताछ में बताया कि उसे हिन्दू लड़कियों का रेप करने, उन्हें फँसाने और ब्लैकमेल करने का कोई भी पछतावा नहीं है। इस्लाम के हिसाब से ये सब उसके लिए सवाब का काम है।

फरहान ने यह भी बताया है ‘मुस्लिम गैंग’ हिन्दू लड़कियों का जीवन बर्बाद करना चाहता था और इस काम को जिहाद मानता था, इसलिए हिंदू लड़कियों को ही निशाना बनाया जाता था। फरहान ने तो पुलिस से ये तक कहा कि हिन्दू लड़कियों को फँसा कर रेप करने का उसे गर्व है।

सलमान शेख ने हिन्दू युवती को फँसाया, फिर मजार-दरगाह की बातें कर बहन और भांजी को भी भगा ले गया: सोना-चाँदी और ₹1.65 लाख भी गायब किए, लखनऊ में पुलिस ने दर्ज की FIR

लखनऊ में हिंदू युवक के पूरे परिवार को धर्म परिवर्तन के लिए भगाने का मामला सामने आया है। परिवार के घर पर मुस्लिम युवक सलमान ने घर पर आवाजाही शुरू की। घर की महिलाओं को इस्लाम का पाठ पढ़ाने लगा और फिर पीड़ित युवक की पत्नी, साली और 5 साल की बेटी को धर्मांतरण के इरादे से घर से भगा ले गया। घर में रखे आभूषण और लाखों रुपए भी चुरा कर ले गया।

ऑपइंडिया के पास उपलब्ध FIR के अनुसार, पीड़ित हिंदू युवक लखनऊ के मड़ियाँ थाना क्षेत्र में रहता है। वह एक निजी कंपनी में काम करता है। दो महीने पहले उसकी पत्नी की तबियत खराब हुई तो देखरेख के लिए उसने अपनी साली को सीतापुर से लखनऊ बुला लिया। यहाँ पर उससे मिलने के लिए आशिक सलमान शेख भी आने लगा। घर पर आकर वह ज्यादातर इस्लाम संबंधित बातें ही करता था।

ऑपइंडिया के पास मामले से संबंधित FIR कॉपी उपलब्ध है

जब पीड़ित ने इस पर आपत्ति जताई तो वह उसकी अनुपस्थिति में घर पर आने लगा। उसने पीड़ित की पत्नी और साली को इस्लाम स्वीकार करने के लिए बरगलाने लगा। उनसे मजार, दरगाह समेत कई बातें करने लगा। घर पर भी पत्नी और साली इन्हीं विषयों पर चर्चा करने लगीं। जब इस बात पर पीड़ित ने दोनों को फटकारा तो उन्होंने पीड़ित पर नाराजगी जाहिर की।

इसके बाद 15 जुलाई 2025 को पीड़ित काम के बाद घर लौटा तो पत्नी, साली और 5 साल की बेटी घर पर नहीं मिले। घर में सामान भी बिखरा था। सोने की चेन, करधनी, पायजेब समेत सभी गहने और 1,65,000 से अधिक की रकम भी घर से गायब थी। पीड़ित ने दो दिनों तक खोजबीन करने के बाद पुलिस को शिकायत दी।

सलमान शेख पत्नी, साली और बेटी को फुसला कर भगा ले गया है। साथ ही उसने बहन की शादी के लिए पैसे और आभूषण जमा किए थे। उन्हें भी चुराया है। पीड़ित ने बताया कि सभी के फोन उसी दिन से बंद हैं।

पुलिस के अनुसार, सर्विलांस की मदद से आरोपी की लोकेशन का पता लगाया जा रहा है। आरोपी के साथ और कितने लोग मिले हैं, इसकी जानकारी भी की जा रही है। पुलिस सलमान क तलाश में कई जगहों पर दबिश भी दे रही है। पुलिस का कहना है कि जल्दी ही आरोपित को गिरफ्तार कर लिया जाएगा।

रथ यात्रा से लौटी हिंदू नाबालिग का BNP नेताओं ने किया रेप, Video बनाकर धमकाया भी: बच्ची के जहर खाने पर खुला मामला, बांग्लादेश में 6 अरेस्ट

बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के छह गुंडों ने 27 जून, 2025 को एक नाबालिग हिन्दू जनजातीय लड़की के साथ रेप किया। यह घटना बांग्लादेश के चटगाँव डिवीजन के खगराछारी में हुई थी।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, पीड़िता कक्षा आठ की छात्रा है। घटना वाले दिन वह रथ यात्रा मेले में गई थी और फिर एक रिश्तेदार के घर रुकी थी। आरोपित जबरन घर में घुस गए और पीड़िता के साथ सामूहिक बलात्कार किया। आरोपितों की पहचान अरमान हुसैन, इमोन हुसैन, इनायत हुसैन, सद्दाम हुसैन, मोहम्मद सोहेल इस्लाम और मोहम्मद मुनीर इस्लाम के रूप में हुई है।

आरोपितों ने रेप के दौरान उसका वीडियो भी बनाया और पीड़िता को चुप रहने के लिए धमकाया। चारो आरोपित BNP की छात्र शाखा, छात्र दल, युवा शाखा और जुबो दल के नेता हैं। डर और लोक-लाज के कारण नाबालिग हिंदू लड़की ने अपने साथ हुई घटना के बारे में परिवार वालों को नहीं बताया।

इसके चलते वह जल्द ही डिप्रेशन में आ गई। 12 जुलाई 2025 को उसने आत्महत्या का प्रयास किया। पीड़िता ने खुद को जान से मारने के लिए जहर पी लिया। परिजनों ने उसे खगराछारी सदर अस्पताल में भर्ती कराया। यहाँ अस्पताल में इलाज के बाद उसकी जान बचा ली गई।

मामले पर बात करते हुए अस्पताल के रेजिडेंट डॉक्टर रिपोल बप्पी चकमा ने कहा, “छात्रा की हालत गंभीर है और वह मानसिक रूप से अवसादग्रस्त है। उसे आवश्यक उपचार दिया जा रहा है।” होश में आने पर पीड़िता ने अपने परिजनों को सच्चाई बताई।

16 जुलाई 2025 की रात को लड़की के पिता ने खगराछारी सदर थाने में BNP के छः नेताओं के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। खगरछारी के एसपी आरोफिन ज्वेल ने बताया कि गुरुवार (17 जुलाई 2025) को पुलिस ने छापेमारी कर आरोपित अरमान हुसैन, इमोन हुसैन, इनायत हुसैन और सद्दाम हुसैन को गिरफ्तार कर लिया गया है।  

BNP नेता फजोर अली ने भी किया था हिन्दू महिला से रेप

इससे पहले 26 जून 2025 को BNP के एक प्रमुख नेता फजोर अली ने एक हिंदू महिला के घर में जबरन घुसकर उसका रेप किया था। उसने अपनी साथियों संग मिलकर महिला का चाकू की नोंक पर रेप किया था। इतना ही नहीं उसने उसकी वीडियो भी बनाकर वायरल कर दी थी।

पीड़िता 21 साल की थी और उसके दो बच्चे भी हैं। उसका पति दुबई में रहकर नौकरी करता था । घटना के 15 दिन पहले ही वह मुरादनगर अपने पिता के घर रहने आई थी। तब से ही 38 वर्षीय फजोर अली उसके पीछे पड़ा था। बाद में उसने घर

आगरा की ‘द केरल स्टोरी’ में इब्राहिम, रहमान और हसन समेत 6 का गैंग पकड़ाया, हिन्दू बहनों का किया था धर्मांतरण: J&K, बंगाल, राजस्थान समेत 7 राज्यों में है नेटवर्क, पढ़े-लिखे युवा थे टारगेट

उत्तर प्रदेश के आगरा में एक सनसनीखेज मामला सामने आया है, जिसमें दो सगी बहनों के अपहरण और धर्मांतरण की कहानी ने पूरे देश का ध्यान खींच लिया है। आगरा पुलिस ने इस मामले में तेजी दिखाते हुए सात राज्यों में छापेमारी की और कई आरोपितों को गिरफ्तार किया।

इस रैकेट की जड़ें इतनी गहरी हैं कि इसके तार विदेशी फंडिंग से भी जुड़े होने का शक है। यह मामला फिल्म ‘द केरल स्टोरी’ की तर्ज पर सामने आया है, जिसमें लालच, लग्जरी लाइफ का वादा और ब्रेनवॉश का कॉकटेल इस्तेमाल कर युवाओं को धर्मांतरण के लिए फँसाया जाता है। आइए ये पूरा मामला समझते हैं।

क्या है पूरा मामला?

रिपोर्ट्स के मुताबिक, ये घटना शुरू होती है आगरा के सदर थाना क्षेत्र से, जहाँ पंजाबी समाज की दो सगी बहनें रहती थीं। ये बहनें 24 मार्च 2025 को अचानक अपने घर से गायब हो गईं। परिवार वालों ने पहले तो खुद तलाश की, लेकिन जब कोई सुराग नहीं मिला तो उन्होंने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। 4 मई 2025 को सदर थाने में अपहरण की धारा में मुकदमा दर्ज हुआ। परिवार का आरोप था कि उनकी बेटियों को जम्मू-कश्मीर के ऊधमपुर की रहने वाली एक युवती सायमा उर्फ खुशबू ने बहला-फुसलाकर ले गई है।

पुलिस की जाँच में जो खुलासा हुआ, वो चौंकाने वाला था। ये कोई साधारण अपहरण का मामला नहीं था, बल्कि एक बड़े धर्मांतरण रैकेट का हिस्सा था। पुलिस को पता चला कि इन बहनों का ब्रेनवॉश कर उनका धर्म परिवर्तन कराया गया है और अब वो खुद इस रैकेट का हिस्सा बन चुकी हैं।

कैसे शुरू हुई कहानी?

यह कहानी 2021 से शुरू होती है। उस वक्त बड़ी बहन, जो आगरा के दयालबाग एजुकेशनल इंस्टीट्यूट में पढ़ती थी, सायमा उर्फ खुशबू नाम की एक युवती के संपर्क में आई। सायमा ने धीरे-धीरे उसका ब्रेनवॉश शुरू किया। उसे लग्जरी लाइफ और बड़े-बड़े वादों का लालच दिया गया। नतीजा ये हुआ कि 2021 में बड़ी बहन सायमा के साथ चली गई। परिवार वालों ने पुलिस को सूचना दी और रास्ते में लैंडस्लाइड होने की वजह से पुलिस और परिवार वाले उसे वापस घर ले आए।

लेकिन घर आने के बाद भी बड़ी बहन की हरकतें बदल चुकी थीं। वो पूजा-पाठ का विरोध करने लगी और इस्लाम की पैरवी करने लगी। परिवार वालों के लिए ये किसी सदमे से कम नहीं था। धीरे-धीरे उसने अपनी छोटी बहन को भी अपने प्रभाव में ले लिया। बड़ी बहन ने छोटी बहन का भी ब्रेनवॉश किया और दोनों 24 मार्च 2025 को घर से गायब हो गईं।

पुलिस ने कैसे पकड़ा?

रिपोर्ट्स के मुताबिक, जब परिवार ने पुलिस से गुहार लगाई, तो आगरा पुलिस ने फौरन हरकत में आते हुए सात टीमें बनाईं। इनमें साइबर सेल, सर्विलांस और स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप (एसओजी) की टीमें शामिल थीं। डीजीपी राजीव कृष्ण के निर्देश पर पुलिस कमिश्नर दीपक कुमार ने इस मामले को गंभीरता से लिया।

पुलिस ने सर्विलांस और साइबर सेल की मदद से दोनों बहनों का सुराग तलाशा। उनकी लोकेशन पश्चिम बंगाल के बैरकपुर में मिली। पुलिस ने तुरंत वहाँ छापेमारी की और दोनों बहनों को सुरक्षित बरामद कर लिया। इसके साथ ही बैरकपुर से दो लोगों, शेखर रॉय उर्फ हसन अली और रीत बनिक उर्फ मोहम्मद इब्राहिम को गिरफ्तार किया गया। हसन अली बारासात कोर्ट में कर्मचारी है।

पुलिस यहीं नहीं रुकी। उसने सात राज्यों – पश्चिम बंगाल, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, जम्मू-कश्मीर, दिल्ली-एनसीआर और बिहार में एक साथ छापेमारी की। उत्तराखंड के ऋषिकेश से रहमान नाम के एक शख्स को पकड़ा गया। बरेली और राजस्थान से भी एक-एक आरोपित को गिरफ्तार किया गया। सभी आरोपितों को ट्रांजिट रिमांड पर आगरा लाया जा रहा है।

धर्मांतरण गैंग का हाईटेक तरीका

पुलिस की जाँच में पता चला कि ये धर्मांतरण गैंग कोई छोटा-मोटा गिरोह नहीं है। ये एक हाईटेक नेटवर्क है, जो 2015 से सक्रिय है। ये गैंग पहले पढ़े-लिखे युवक-युवतियों को टारगेट करता है। उन्हें लग्जरी लाइफ, पैसे और बड़े-बड़े वादों का लालच दिया जाता है। फिर सोशल मीडिया के जरिए हाईटेक तरीके से ब्रेनवॉश किया जाता है। जो लोग इनके जाल में फँस जाते हैं, उनका धर्म परिवर्तन कराया जाता है और फिर उन्हें गैंग का हिस्सा बना लिया जाता है।

ये गैंग इतना शातिर है कि धर्मांतरण के बाद लोग खुद इसके लिए काम करने लगते हैं। वे सोशल मीडिया पर इस्लाम के पक्ष में मुहिम चलाते हैं और नए लोगों को फंसाने का काम करते हैं। पुलिस को कुछ ऐसे सोशल मीडिया अकाउंट्स मिले हैं, जिनकी गतिविधियाँ संदिग्ध हैं और धर्मांतरण से जुड़ी हुई हैं।

विदेशी फंडिंग का शक

पुलिस की शुरुआती जाँच में ये भी खुलासा हुआ कि इस गैंग के तार विदेशों से जुड़े हो सकते हैं। ठीक वैसे ही, जैसे बलरामपुर के छांगुर पीर उर्फ जलालुद्दीन के मामले में विदेशी फंडिंग की बात सामने आई थी। छांगुर पीर का मामला इन दिनों चर्चा में है, जहाँ ईडी, एटीएस और एसटीएफ ने छापेमारी की थी। हालाँकि, आगरा पुलिस कमिश्नर दीपक कुमार ने साफ किया कि इस मामले का छांगुर पीर से कोई सीधा कनेक्शन नहीं है। फिर भी विदेशी फंडिंग की जाँच चल रही है और जल्द ही बड़ा खुलासा होने की उम्मीद है।

क्या कह रहा है पीड़ित परिवार?

पीड़ित परिवार का कहना है कि उनकी बेटियों को सायमा उर्फ खुशबू ने अपने जाल में फँसाया। सायमा ने पहले बड़ी बेटी को ब्रेनवॉश किया और फिर उसने अपनी छोटी बहन को भी उसी रास्ते पर ले गई। परिवार का आरोप है कि सायमा उनकी बेटियों को शादी के बहाने ले गई। पिता ने पुलिस को बताया कि उनकी बेटी सायमा के प्रभाव में आकर दूसरे मजहब की बात करने लगी थी। परिवार ने पुलिस से जल्द से जल्द कार्रवाई की गुहार लगाई थी।

‘द केरल स्टोरी’ जैसी है ये कहानी भी…

लोगों का कहना है कि ये मामला फिल्म ‘द केरल स्टोरी’ से मिलता-जुलता है। इस फिल्म में दिखाया गया था कि कैसे युवतियों को प्रलोभन और ब्रेनवॉश के जरिए धर्मांतरण के लिए फँसाया जाता है। ठीक उसी तरह इस मामले में भी सायमा ने पहले बड़ी बहन को अपने जाल में फँसाया और फिर उसने छोटी बहन को भी उसी रास्ते पर ले गई।

आगरा पुलिस इस मामले में और गहराई से जाँच कर रही है। पुलिस कमिश्नर दीपक कुमार ने बताया कि बाकी आरोपितों की तलाश में छापेमारी जारी है। साइबर सेल सोशल मीडिया अकाउंट्स और आरोपियों के मूवमेंट की बारीकी से जाँच कर रही है। पुलिस का कहना है कि जल्द ही इस रैकेट का और बड़ा खुलासा होगा।

ये मामला न सिर्फ आगरा बल्कि पूरे देश के लिए एक चेतावनी है। धर्मांतरण का ये हाईटेक रैकेट पढ़े-लिखे युवाओं को टारगेट कर रहा है। सोशल मीडिया के इस दौर में ऐसे गैंग आसानी से लोगों को अपने जाल में फँसा लेते हैं। परिवार वालों को अपने बच्चों की गतिविधियों पर नजर रखनी होगी और पुलिस को भी ऐसे मामलों में और तेजी से कार्रवाई करनी होगी। आगरा पुलिस की इस कार्रवाई से एक बात तो साफ है कि कानून का शिकंजा अब इन गैंगों पर कस रहा है। लेकिन सवाल ये है कि क्या ये रैकेट पूरी तरह खत्म हो पाएगा?

एअर इंडिया हादसे पर प्रोपगेंडा देख भड़का पायलट संगठन, ‘रायटर्स और WSJ’ को नोटिस भेजा: खबरों में कैप्टन सभरवाल को लिख रहे थे ‘दोषी’, NTSB ने भी मीडिया को लताड़ा

एअर इंडिया हादसे को लेकर अमेरिकी विमानन जाँच एजेंसी नेशनल ट्रांसपोर्ट सेफ्टी बोर्ड (NTSB) ने बयान जारी किया है। NTSB ने एअर इंडिया हादसे का जिम्मेदार पायलट को बताने पर मीडिया संस्थानों को लताड़ा है। अमेरिकी जाँच एजेंसी NTSB ने भारतीय विमानन जाँच एजेंसी AAIB का पूरा सहयोग देने की बात कही है।

NTSB ने WSJ को लताड़ा

एअर इंडिया हादसे को लेकर NTSB प्रमुख जेनिफर होमेंडी ने शनिवार (19 जुलाई, 2025) को यह बयान जारी किया है। NTSB प्रमुख ने कहा,”एअर इंडिया 171 दुर्घटना पर हालिया मीडिया रिपोर्टें अपरिपक्व और कयास लगाने वाली हैं। भारत के विमान दुर्घटना जाँच ब्यूरो ने हाल ही में अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट जारी की है।”

NTSB प्रमुख ने आगे कहा,”इस तरह की जाँच में समय लगता है। हम AAIB की सार्वजनिक अपील का पूरा समर्थन करते हैं, जो गुरुवार को जारी की गई थी, और इसकी जाँच का सहयोग करते रहेंगे। इस मामले में जाँच सम्बन्धित सभी प्रश्न AAIB से पूछे जाने चाहिए।”

NTSB के इस बयान हाल ही में वह हालिया मीडिया रिपोर्ट्स खारिज हो गईं हैं, जिनमें हादसे का जिम्मेदार सीधे तौर पर दुर्घटनाग्रस्त विमान AI-171 के कैप्टन सुमीत सभरवाल को ठहराया गया था। ऐसी रिपोर्ट्स वॉल स्ट्रीट जनरल ने प्रकाशित की थी।

WSJ की रिपोर्ट में AAIB की प्रारम्भिक जाँच रिपोर्ट को तोड़ मरोड़ के पेश किया गया था। WSJ ने दावा किया था कि विमान के अहमदाबाद से उड़ने के बाद कॉकपिट में फर्स्ट ऑफिसर क्लाइव कुंदर ने कैप्टन सभरवाल से फ्यूल कंट्रोल स्विच बंद करने को लेकर पूछा था।

अपनी खबर में WSJ ने यह दिखाने का प्रयास किया था कि जैसे कैप्टन सभरवाल ने ही यह फ्यूल कंट्रोल स्विच बंद किया था और इसी के चलते हादसा हुआ। WSJ ने दावा किया था कि अब पूरी जाँच का केंद्र बिंदु पायलट सुमीत सभरवाल ही हैं।

WSJ के ही सुर में सुर मिलाते हुए रायटर्स, CNN समेत तमाम विदेशी मीडिया संस्थानों ने यही बातें लिखी थीं। पायलटों को दोषी ठहराने वाली रिपोर्ट AAIB की जाँच रिपोर्ट सामने आने से पहले से आने लगी थीं। इसमें सबसे आगे WSJ रहा था।

पहले से तय कर ली थी कहानी

WSJ ने गुरुवार (10 जुलाई,2025) को इसी संबंध में एक खबर प्रकाशित की थी। इस खबर में दावा किया गया था कि जाँचकर्ता अब एअर इंडिया हादसे की जाँच इंजन या अन्य फेलियर के एंगल से नहीं परंतु पायलटों की ‘भूल’ के एंगल से कर रहे हैं। 

यह खबर तब प्रकाशित की गई थी जब AAIB की जाँच रिपोर्ट सामने नहीं आई थी। बाद में जब AAIB की रिपोर्ट सामने आई तो इसमें पायलटों की भूल की बात तक नहीं की गई। यह प्रयास सिर्फ वॉल स्ट्रीट जनरल ने ही नहीं किया था। वॉल

स्ट्रीट जनरल के अलावा ब्लूमबर्ग, रॉयटर्स, ABC न्यूज और विमानन पर रिपोर्ट करने वाली वेबसाइट एयर करेंट ने भी विमान हादसे का कारण इंजन को ईंधन पहुंचाने वाले फ्यूल स्विच के ‘गलती से बंद होना’ बताने का प्रयास किया था।

इन सभी मीडिया पोर्टल में यह खबरें 8 जुलाई से 10 जुलाई के बीच प्रकाशित हुई थी जबकि AAIB की जाँच रिपोर्ट 12 जुलाई को प्रकाशित हुई थी। यह प्रयास AAIB रिपोर्ट के बाद रुके नहीं थे। AAIB रिपोर्ट को भी विदेशी मीडिया संस्थानों जैसे रॉयटर्स, बीबीसी, डेली मेल आदि ने इस रिपोर्ट को जानबूझकर गलत तरीके पेश किया।

AAIB रिपोर्ट में पायलटों की गलती को लेकर कोई बात नहीं कही गई थी। फिर भी इन मीडिया संस्थानों ने पायलटों को ही को दोषी ठहराने की कोशिश की। इस कड़ी में FAA की वह नोटिफिकेशन भी सामने आई थी जिसमे बोइंग को क्लीन चिट दी गई।

इसी कहानी के अंतिम अध्याय में पायलटों को दोषी ठहराते हुए कैप्टन सुमीत सभरवाल को फ्यूल कंट्रोल स्विच बंद करने का दोषी बता दिया गया। यह सब तब हुआ जब AAIB ने स्वयं कहा है कि इस हादसे की जाँच अभी पूरी नहीं हुई है और जो भी रिपोर्ट सामने आई है वह प्रारम्भिक है। अब NTSB ने भी WSJ समेत बाकी न्यूज संस्थानों की बात को झुठला दिया है।

पायलट यूनियन ने अब मीडिया से माँगा जवाब

NTSB के इस मामले में WSJ समेत बाकी रिपोर्ट्स को खारिज करने के बाद भारतीय पायलट फेडरेशन (FIP) ने भी जवाब माँगे हैं। FIP ने कैप्टन सुमीत सभरवाल को बिन जाँच पूरी हुए दोषी बताने पर WSJ और रायटर्स से जवाब माँगा है। उन्होंने इस सबंध में दोनों मीडिया संस्थानों को कानूनी नोटिस भेजी है। पायलट फेडरेशन ने कैप्टन सभरवाल को दोषी ठहराने वाली खबरों को वापस लिए जाने की बात नोटिस में कही है। इसके अलावा उन्होंने कहा है कि कैप्टन सभरवाल की छवि ख़राब करने के लिए दोनों संस्थानों को माफी माँगनी चाहिए।

‘रूपेंद्र प्रताप’ मुस्लिम लड़की से निकाह कर बना ‘अब्दुल रहमान’, छांगुर पीर से जुड़ चलाने लगा धर्मांतरण गैंग: 21 साल की हिन्दू लड़की को इस्लाम कबूल करने को फँसाया, देहरादून से गैंग समेत गिरफ्तार

उत्तर प्रदेश से संदिग्ध धर्मांतरण रैकेट के तार देहरादून तक जुड़े पाए गए हैं। यूपी ATS की जाँच के बाद देहरादून पुलिस ने रानीपोखरी की एक 21 वर्षीय युवती को धर्म परिवर्तन के लिए प्रलोभित करने के मामले में 5 आरोपितों के खिलाफ मामला दर्ज किया। इनमें अब्दुल रहमान, अबु तालिब, अयान, अमन, और श्वेता (गोवा निवासी) शामिल हैं।

यूपी ATS ने अब्दुल रहमान को शंकरपुर से हिरासत में लिया। पूछताछ में पता चला कि अब्दुल रहमान इस धर्मांतरण गैंग से जुड़ा है और उसने अपने साथियों के साथ मिलकर रानीपोखरी की एक युवती को भी निशाना बनाया था।

जानकारी के अनुसार, आरोपित इंस्टाग्राम के जरिए युवतियों से संपर्क करते थे। आरोपित हिंदू लड़कियों को इस्लाम अपनाने के लिए पैसों का लालच देते थे। इसके अलावा उन्हें कलमा-नमाज पढ़ने और बुर्का पहनने पर भी दबाव बनाया जाता था।

युवती ने बताया कि आरोपित उसे ‘रानी’ बनाने और पैसों की बरसात का लालच देते थे। आरोपित ने ऑनलाइन छोटे-छोटे अमाउंट (500 से 3000 रुपए तक) भी भेजे गए थे।

अब्दुल रहमान का छांगुर से कनेक्शन

पुलिस जाँच में सामने आया है कि अब्दुल रहमान का असली नाम ‘रूपेंद्र प्रताप सिंह’ है। उसने 2015 में एक मुस्लिम युवती से शादी करने के लिए धर्म और नाम बदला।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, अब्दुल रहमान 2012 में धर्मांतरण का साजिशकर्ता जलालुद्दीन उर्फ छांगुर पीर के संपर्क में आया था। छांगुर पीर ने उसे हिंदू युवतियों का धर्म परिवर्तन कराने के बदले मुनाफे का लालच दिया था।

अब्दुल रहमान ने धर्मांतरण के बाद देहरादून और लखनऊ में दो शादियाँ की हैं और उसके 8 बच्चे हैं। छांगुर पीर के संपर्क में रहने के बाद अब्दुल रहमान ने उत्तराखंड में इस गिरोह की कमान संभाली।

छांगुर पीर का फर्जी RSS कनेक्शन

छांगुर पीर अधिकारियों और नेताओं से मिलते समय खुद को RSS से जुड़ी संस्था का बड़ा पदाधिकारी बताता था। छांगुर पीर ने अपनी संस्था के लेटरहेड पर प्रधानमंत्री मोदी की फोटो भी लगा रखी थी।

छांगुर को भारत प्रतिकार्थ सेवा संघ नाम की संस्था का महासचिव बनाया गया था। इस संस्था को ‘ईद उल इस्लाम’ नाम का दूसरा आरोपित ईदुल इस्लाम चला रहा था। जाँचकर्ताओं का कहना है कि संस्था का नाम जानबूझकर ऐसा रखा गया था, ताकि लोग इसे RSS से जुड़ा हुआ मानें।

अपनी संस्था को असली दिखाने के लिए इस्लाम ने RSS के मुख्यालय नागपुर में एक फर्जी केंद्र भी खोल रखा था। छांगुर पीर और इस्लाम अधिकारियों से मिलते समय RSS के कई बड़े नेताओं का नाम लेते थे, ताकि उनकी बातों पर विश्वास किया जा सके।

देह व्यापार का भी एंगल

आगरा पुलिस ने बताया कि धर्मांतरण के बाद कुछ युवतियाँ इस्लाम के पक्ष में सोशल मीडिया पर मुहिम चलाती थीं। इस गिरोह के चंगुल से निकलने की कोशिश करने वाली युवतियों को देह व्यापार में धकेलने की बात भी सामने आई है।

हालाँकि, पुलिस ने बताया कि आरोपितों ने छांगुर से किसी भी तरह के कोई संपर्क की बात नहीं कबूली है। लेकिन अब्दुल रहमान के माध्यम से यह जुड़ाव सामने आया है।

जाँच के दौरान, पुलिस को पता चला कि आगरा की दो लापता बहनें कोलकाता में मिली और ‘द केरला स्टोरी’ फिल्म की तरह धर्मांतरण कराने वाले गैंग के जाल में फँस गई थीं।

पुलिस अभी भी इस गिरोह से जुड़े अन्य लोगों को गिरफ्तार करने की कोशिश कर रही है और आरोपितों के सोशल मीडिया अकाउंट्स की भी जाँच कर रही है।

नॉन-वेज होता है दूध भी? भारत ने खरीदने से किया इनकार: जानें अमेरिका के साथ क्यों नहीं बन रही बात, ट्रेड डील पर पड़ेगा क्या असर

भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौता अंतिम चरण में पहुँच गया है, लेकिन ऐन मौके पर एक अनचाही समस्या सामने आ गई है। ये है- मांसाहारी दूध, जो सौदे की राह में अड़चन बनकर उभरा है।

भारत ने अमेरिकी डेयरी उत्पादों के आयात को यह कह कर खारिज कर दिया है कि उनमें ऐसी गायों का दूध होता है जिन्हें मांसाहारी या पशुओं के अवशेष युक्त आहार खिलाया जाता है। ये भारत के धार्मिक और सांस्कृतिक मूल्यों के विरुद्ध है।

नॉन-वेज दूध क्या है?

मांसाहारी दूध से का मतलब उन गायों का दूध और डेयरी उत्पाद है, जिन्हें माँस, खून या चर्बी जैसे पशु-आधारित चारे खिलाए जाते हैं। 2004 में प्रकाशित हुई सिएटल पोस्ट-इंटेलिजेंसर की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका में गायों को ऐसा चारा दिया जा सकता है, जिसमें सूअर, मछली, मुर्गी, घोड़े, यहाँ तक कि बिल्ली और कुत्ते के अंग भी शामिल हो सकते हैं।

इसके अलावा, उन्हें सूअर और घोड़े का खून और मवेशियों के अंगों से बनी चर्बी भी खिलाई जा सकती है। हालाँकि गायें स्वभाव से शाकाहारी होती हैं, फिर भी अमेरिकी नियमों के अनुसार, उन्हें जानवरों से बनी चीजें खिलाने की अनुमति होती है। चाहे वे मांस के लिए पाली जा रही हों या दूध के लिए।

भारत में ऐसा बिल्कुल नहीं होता। यहाँ गायों को पौधों पर आधारित आहार ही दिया जाता है और जानवरों या मांस से बनी कोई चीज नहीं खिलाई जाती। इसी वजह से भारत ने अमेरिका से डेयरी उत्पादों के आयात पर पूरी तरह से रोक लगा दी है।

भारत का इनकार: धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताएँ

वर्ल्ड एटलस की 2023 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत की लगभग 38% जनसंख्या शाकाहारी है। यहाँ दूध और घी को पवित्र माना जाता है। ये हिंदू और जैन धर्म में दैनिक पूजा और प्रसाद में इस्तेमाल किए जाते हैं।

इन धार्मिक कार्यों में इस्तेमाल होने वाले दूध से बने उत्पाद शुद्ध (सात्विक) होने चाहिए। लेकिन अगर गाय को ऐसा चारा खिलाया गया हो जिसमें जानवरों के अंग, खून या मांस शामिल हों, तो उस गाय से प्राप्त दूध और उससे बने उत्पाद धार्मिक रूप से अशुद्ध और अस्वीकार्य माने जाते हैं।

नई दिल्ली स्थित थिंक टैंक GTRI के अजय श्रीवास्तव ने एक उदाहरण देते हुए कहा, “कल्पना कीजिए, आप उस गाय का मक्खन खा रहे हैं जिसे किसी दूसरी गाय का मांस और खून खिलाया गया हो। भारत शायद ऐसा दूध उत्पाद कभी स्वीकार नहीं करेगा।”

भारत का पशुपालन और डेयरी विभाग विदेशों से आने वाले दूध और खाद्य उत्पादों के लिए पशु चिकित्सा प्रमाणपत्र (Veterinary Certificate) अनिवार्य करता है। इस प्रमाणपत्र की एक जरूरी शर्त है कि- “ऐसे पशुओं को कभी भी मांस, हड्डी, खून, अंगों या सूअर से बने किसी भी पदार्थ वाला चारा नहीं खिलाया गया हो।” यह नियम यह सुनिश्चित करता है कि भारत में केवल शाकाहारी आहार पर पली हुई गायों से प्राप्त दूध उत्पाद ही आयात किए जा सकें।

भारत का इनकार: सिर्फ संस्कृति नहीं, अर्थव्यवस्था भी है वजह

भारत का अमेरिका से डेयरी उत्पादों का विरोध केवल धार्मिक या सांस्कृतिक कारणों से नहीं है, बल्कि इसका एक बड़ा कारण देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रक्षा करना भी है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश है।

2023-24 में भारत ने 239 मिलियन मीट्रिक टन दूध का उत्पादन किया, जिससे 7.5 से 9 लाख करोड़ रुपये की कमाई हुई। यह देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का लगभग 2.5% से 3% है। भारत का डेयरी सेक्टर 8 करोड़ से ज्यादा लोगों को रोजगार देता है।

इनमें से ज्यादातर छोटे किसान हैं जिनके पास सिर्फ 2 या 3 गाय/भैंस होती हैं। उनके लिए यही आमदनी का मुख्य जरिया है। अगर भारत ने अमेरिका जैसे देशों से सस्ते, सब्सिडी वाले डेयरी उत्पादों को आने की इजाजत दे दी, तो भारतीय बाजार में सस्ती विदेशी चीजें भर जाएँगी।

2024 में अमेरिका ने 8.22 बिलियन डॉलर का डेयरी निर्यात किया और अगर उसका भारत में आयात हुआ तो इसका भारी असर भी होगा। भारतीय स्टेट बैंक के एक विश्लेषण के अनुसार, इससे घरेलू दूध की कीमतों में कम से कम 15% गिरावट आ सकती है। इससे किसानों को हर साल लगभग 1.03 लाख करोड़ रुपये का नुकसान होगा।

महाराष्ट्र के किसान महेश सकुंडे ने कहा, “सरकार को यह देखना होगा कि हम सस्ते विदेशी दूध से प्रभावित न हों। अगर ऐसा हुआ तो पूरे डेयरी उद्योग को और हम जैसे छोटे किसानों को बड़ा नुकसान होगा।”

बातचीत में रुकावट

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की तय समय सीमा 1 अगस्त नजदीक आ रही है। अगर तब तक कोई समझौता नहीं हुआ, तो अमेरिका भारतीय वस्तुओं पर टैरिफ (शुल्क) बढ़ा सकता है। डेयरी क्षेत्र को लेकर जारी विवाद भारत और अमेरिका के बीच 2030 तक व्यापार को 500 अरब डॉलर तक पहुँचाने के बड़े लक्ष्य पर भी असर डाल सकता है।

हालाँकि बातचीत चल रही है, लेकिन भारतीय पक्ष अब भी अपने रुख पर अडिग है। एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने साफ कहा, “डेयरी के मुद्दे पर कोई समझौता नहीं होगा। यह हमारे लिए एक स्पष्ट सीमा है।” इस बीच, अमेरिका ने यह मामला विश्व व्यापार संगठन (WTO) में भी उठाया है।

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका ने कहा कि नवंबर 2024 से लागू होने वाला भारत का नया डेयरी सर्टिफिकेशन नियम उनकी समस्याओं को पूरी तरह हल नहीं करता।

कौन हैं ड्रूज? जिनकी हिफाजत के लिए सीरिया पर बम बरसा रहा इजरायल: क्या बदल जाएँगी यहूदी राष्ट्र की सीमाएँ? घुटनों पर आया जिहादी अल-शुरा

पश्चिम एशिया एक बार फिर संकट के मुहाने पर है। दक्षिणी सीरिया के सुवेदा में दो समुदायों ड्रूज (Druze) और बेडौइन के बीच स्थानीय संघर्ष के रूप में शुरू हुआ विवाद अब क्षेत्रीय तनाव का केंद्र बन गया है। इजरायली फाइटर प्लेन ने सीरियाई क्षेत्र में 160 से ज्यादा हवाई हमले किए हैं।

इस हमले का कारण सीरिया की नई सरकार द्वारा ड्रूज अल्पसंख्यकों के विरुद्ध की गई क्रूर कार्रवाई थी। इसके तहत कई ड्रूज नागरिकों की सामूहिक हत्या की गई। इसके वीडियो सोशल मीडिया पर भी हैं। ड्रूज समुदाय का इजरायल से ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रिश्ता है।

इन्हीं घटनाओं के बाद इजरायली वायुसेना ने सीरिया पर 160 से ज्यादा हवाई हमले किए। इजरायल ने यह कार्रवाई सिर्फ आत्म-रक्षा के लिए नहीं, बल्कि मानवीय सहायता के तहत भी की ताकि ड्रूज समुदाय को बचाया जा सके। हालाँकि यह हमला केवल ड्रूज की सुरक्षा तक सीमित नहीं था। इजरायल ने इस मौके का इस्तेमाल सीरियाई सेना को नुकसान पहुँचाने और इजरायल व सीरिया के बीच एक बफर जोन बनाए रखने के लिए भी किया।

गौर करने वाली बात यह है कि इजरायल ने राजनीतिक कारणों से सीरिया में एक पूर्व जिहादी को राष्ट्रपति के रूप में स्वीकार किया था। लेकिन इस हमले के जरिए इजरायल ने साफ कर दिया कि वह सीरियाई सरकार द्वारा धार्मिक और जातीय हिंसा को बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करेगा।

कौन हैं ड्रूज और क्यों है इजरायल को उनकी परवाह ?

ड्रूज एक छोटा लेकिन एकजुट मजहबी समुदाय हैं। इनकी शुरुआत 10वीं सदी में इस्माइली शिया इस्लाम से हुई थी। हालाँकि समय के साथ यह समुदाय एक अलग मजहबी और जातीय पहचान बन गया है। ये लोग मुख्य रूप से सीरिया, लेबनान और इजरायल के पहाड़ी इलाकों में रहते हैं।

वे इजरायली डिफेंस फोर्स (IDF) में सेवा करते हैं, समाज में सक्रिय भूमिका निभाते हैं और देश के प्रति वफादार नागरिक माने जाते हैं। उनकी पहचान इजरायल की सुरक्षा व्यवस्था से जुड़ी हुई है। दक्षिणी सीरिया में, खासकर स्वैदा (Suwayda) नामक इलाके में ड्रूज लोग रहते हैं।

यह इलाका इजरायल के गोलान हाइट्स के पास है और लंबे समय से इजरायल और सीरियाई जिहादी समूहों के बीच एक बफर जोन का काम करता रहा है। यहाँ अस्थिरता इजरायल के लिए सिर्फ एक मानवीय संकट नहीं, बल्कि एक रणनीतिक खतरा भी है। अगर इस इलाके से बेडुइन (Bedouin) जनजाति के लोगों के रुप एक और दुश्मन मोर्चा खुलता है तो यह इजरायल के लिए अस्वीकार्य है।

हाल ही में जब एक बेडुइन जनजाति ने स्वैदा में एक चेकपोस्ट बनाई और एक ड्रूज व्यक्ति पर हमला किया, तो जवाबी कार्रवाई शुरू हो गई। इसके बाद अपहरण, हत्या और बदले की कार्रवाइयों का सिलसिला चल पड़ा। सीरियाई सरकार ने इस मामले में हस्तक्षेप किया, लेकिन वो तटस्थ नहीं रही। स्थानीय रिपोर्ट्स के अनुसार, सीरियाई सेना ने बेडुइन पक्ष का साथ दिया, जिससे हिंसा और बढ़ गई। कुछ ही दिनों में 300 से अधिक लोगों की मौत हो गई, जिनमें 27 ड्रूज नागरिकों को बेरहमी से मारने की खबरें सामने आईं।

इजरायल ने कई बार दमिश्क (सीरियाई सरकार) को चेतावनी दी कि वे ड्रूज लोगों को निशाना बनाना बंद करें, लेकिन उनकी बात अनसुनी कर दी गई। जब ड्रूज लोगों की हत्याओं के वीडियो सामने आने लगे और इजरायल के अंदर से ड्रूज स्वयंसेवक अपने लोगों की मदद के लिए सीमा पार करने लगे, तब IDF ने हस्तक्षेप किया।

पूर्व जिहादी के हाथ से निकल रही सीरिया की व्यवस्था

सीरिया के वर्तमान राष्ट्रपति और पूर्व जिहादी अल-शरा के पास अपने देश के लिए एक सुनहरा मौका था। वे लंबे समय से प्रतिबंधों का सामना कर रहे सीरियाई समाज को शांति, समृद्धि और निवेश के साथ एक नई दिशा दे सकते थे।

सऊदी अरब, तुर्की, और कुछ हद तक इजरायल और अमेरिका जैसे देश किसी न किसी कारण से उनके प्रति सकारात्मक रुख रखते हैं। उन्हें यह परिस्थिति समझनी चाहिए और अपने लोगों की रक्षा करनी चाहिए थी, न कि समाज में हिंसा को बढ़ावा देना चाहिए था। लेकिन जो कुछ ड्रूज अल्पसंख्यकों पर हो रहा है, वह कुछ और ही कहानी बताता है।

इजरायल की कई चेतावनियों के बावजूद अल-शरा ने इन हमलों के खिलाफ कोई ठोस कदम नहीं उठाया। उल्टा उनकी सेनाएँ इस हिंसा का समर्थन करती दिखीं। इसके बाद इजरायल ने जवाबी कार्रवाई की।

अमेरिका ने किया हस्तक्षेप लेकिन यह इतना भी आसान नहीं

अमेरिका ने अब हस्तक्षेप करते हुए सभी पक्षों से संयम बरतने की अपील की है। लेकिन उसकी स्थिति थोड़ी जटिल है। सीरिया अमेरिका के खेमे में नहीं आता। फिर भी हाल के वर्षों में तुर्की और सऊदी अरब के कहने पर अमेरिका ने सीरिया के राष्ट्रपति अल-शरा से बातचीत की थी।

उस समय ट्रंप पश्चिम एशिया के दौरे पर थे। तुर्की की चिंता थी कि शरणार्थियों की आमद कम हो, जबकि सऊदी अरब चाहता था कि सीरिया को एक बड़े सुन्नी गठबंधन में शामिल किया जाए। हालाँकि इसका मतलब यह नहीं है कि अब सीरिया अमेरिका का मित्र बन गया है। दरअसल  यहीं पर ‘ब्लॉक थ्योरी’ काम नहीं करती। आज की दुनिया में गठबंधन वैचारिक नहीं बल्कि लेन-देन के हिसाब से बनते हैं।

उदाहरण के तौर पर भारत अगर चीन से बातचीत कर रहा है, तो इसका ये मतलब नहीं कि वो चीन के साथ हो गया है। वैसे ही अमेरिका का सीरिया से संपर्क भी भरोसे पर नहीं बल्कि अस्थायी जरूरतों पर आधारित है।

‘ग्रेटर इजरायल’ की तरफ बढ़ रहा यहूदी राष्ट्र

कुछ विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम इजरायल की एक बड़ी रणनीति का हिस्सा हो सकता है। इसे कुछ लोग ‘ग्रेटर इजरायल’ की सोच कहते हैं। हालाँकि यह सिद्धांत अक्सर बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है।

हालाँकि मौजूदा हकीकत यह है कि इजरायल अपनी सीमाओं के आस-पास स्थिर और सुरक्षित बफर जोन बनाना चाहता है, खासकर उन इलाकों में जहाँ उसकी अपनी अल्पसंख्यक आबादी, जैसे कि ड्रूज समुदाय रहता है। ड्रूज समुदाय की रक्षा कर के इजरायल न सिर्फ नैतिक बढ़त हासिल करता है, बल्कि सीरिया के एक रणनीतिक क्षेत्र में अपना प्रभाव भी बढ़ाता है।

इजरायल का मकसद कोई क्षेत्र छीनना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि उसके दुश्मन इन इलाकों पर प्रभावी न हों। फिलहाल अमेरिका के राजदूत टॉम बैरक ने जानकारी दी है कि इजरायल और सीरिया ने युद्ध विराम पर सहमति जताई है। लेकिन इजरायल ने साफ कहा है कि अगर ड्रूज समुदाय पर दोबारा हमला हुआ, चाहे वो हमला उसकी सीमाओं के बाहर ही क्यों न हो तो वह सैन्य कार्रवाई करेगा।

मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में अनमोल कुमार ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।