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‘चर्बी वाले कारतूस’ को मंगल पांडे ने बनाया 1857 के स्वतंत्रता संग्राम का हथियार, डरे अंग्रेजों ने क्रान्तिकारी को 10 दिन पहले ही दे दी फाँसी: बैरकपुर से निकली चिंगारी ने हिलाई ब्रितानी हुकूमत, खत्म हो गया ‘कंपनी राज’

भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के नायक मंगल पांडे की जयंती के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित की है। पीएम मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, “महान स्वतंत्रता सेनानी मंगल पांडे को उनकी जयंती पर आदरपूर्ण श्रद्धांजलि। वे ब्रिटिश हुकूमत को चुनौती देने वाले देश के अग्रणी योद्धा थे। उनके साहस और पराक्रम की कहानी देशवासियों के लिए प्रेरणास्रोत बनी रहेगी।”

इस ट्वीट के जरिए पीएम ने न सिर्फ मंगल पांडे की बहादुरी को याद किया, बल्कि देशवासियों को उनके बलिदान से प्रेरणा लेने का आह्वान भी किया। मंगल पांडे के बलिदान ने 1857 में अंग्रेजों के खिलाफ पहले बड़े विद्रोह की चिंगारी जलाई थी, जिसे आज हम भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम कहते हैं। आइए, इस खास रिपोर्ट में जानते हैं मंगल पांडे के जीवन, उनके विद्रोह की कहानी, कैसे अंग्रेजों ने उन्हें पकड़ा, क्यों 10 दिन पहले दी गई फाँसी और अंग्रेजों को क्या डर सता रहा था।

मंगल पांडे: एक साधारण सिपाही से क्रांतिवीर तक

मंगल पांडे का जन्म 19 जुलाई 1827 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के नगवा गाँव में एक साधारण ब्राह्मण परिवार में हुआ था। कुछ इतिहासकारों के अनुसार, उनका जन्म अयोध्या के पास सुरुरपुर गाँव में हुआ, लेकिन उनका परिवार बलिया से ही था। उनके पिता का नाम दिवाकर पांडे था और परिवार की आर्थिक स्थिति ज्यादा अच्छी नहीं थी। फिर भी मंगल में बचपन से ही देशभक्ति और अन्याय के खिलाफ लड़ने का जज्बा था।

साल 1849 में सिर्फ 18 साल की उम्र में वे ईस्ट इंडिया कंपनी की 34वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री में सिपाही बन गए। उस समय ब्रिटिश सेना में भारतीय सिपाहियों की संख्या ज्यादा थी, लेकिन उन्हें हमेशा कमतर आँका जाता था। कम वेतन, भेदभाव और अंग्रेजों की मनमानी से सिपाही नाराज थे। मंगल पांडे भी इस गुस्से का हिस्सा थे, जो बाद में उनके विद्रोह का कारण बना।

1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम और मंगल पांडे की भूमिका

1857 का विद्रोह जिसे भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम कहा जाता है, कोई एक दिन की घटना नहीं थी। यह सालों से जमा हुए गुस्से का विस्फोट था। अंग्रेजों ने भारतीय राजाओं की रियासतें छीन लीं, किसानों पर भारी टैक्स लाद दिए और भारतीय सिपाहियों के साथ बुरा बर्ताव किया। लेकिन विद्रोह की असली चिंगारी थी नई एनफील्ड राइफल के कारतूस

1850 के दशक में अंग्रेजों ने यह राइफल भारतीय सिपाहियों को दी, लेकिन इसके कारतूस में गाय और सुअर की चर्बी होने की अफवाह फैल गई। इन कारतूसों को मुँह से काटकर राइफल में लोड करना पड़ता था, जो हिंदू और मुस्लिम सिपाहियों की धार्मिक भावनाओं के खिलाफ था। यह बात जंगल की आग की तरह फैली और सिपाहियों में बेचैनी बढ़ गई।

मंगल पांडे ने इस बेचैनी को आवाज दी। 29 मार्च 1857 को जब वे पश्चिम बंगाल के बैरकपुर छावनी में तैनात थे, उन्होंने विद्रोह का बिगुल बजा दिया। मंगल ने कारतूस इस्तेमाल करने से मना कर दिया और अपने साथी सिपाहियों को भी अंग्रेजों के खिलाफ खड़ा होने को कहा। उन्होंने जोरदार नारा लगाया, “मारो फिरंगी को!” और दो ब्रिटिश अफसरों लेफ्टिनेंट बौघ और सार्जेंट-मेजर ह्यूसन पर हमला कर दिया।

मंगल ने बौघ को घायल किया और ह्यूसन को मार डाला। यह घटना पूरे देश में क्रांति की शुरुआत बन गई। मंगल पांडे की इस हिम्मत ने सिपाहियों और आम लोगों में अंग्रेजों के खिलाफ गुस्सा भड़का दिया। इतिहासकार मानते हैं कि मंगल पांडे का यह कदम 1857 के संग्राम का पहला बड़ा कदम था, जिसने अंग्रेजों को डरा दिया।

अंग्रेजों ने कैसे पकड़ा मंगल पांडे को?

मंगल पांडे का विद्रोह देखकर बैरकपुर छावनी में हड़कंप मच गया। उनके हमले के बाद कुछ सिपाहियों ने उनका साथ दिया, लेकिन पूरी रेजिमेंट एकजुट नहीं हो सकी। मंगल ने खुद को गोली मारने की कोशिश की ताकि अंग्रेजों के हाथ न लगें। उन्होंने अपनी बंदूक की नाल छाती पर रखी और पैर से ट्रिगर दबाया, लेकिन गोली सिर्फ उन्हें घायल कर सकी। इसके बाद ब्रिटिश जनरल जॉन हर्सी ने स्थिति को संभाला।

हर्सी ने सिपाहियों को धमकी दी कि जो मंगल को नहीं रोकेगा, उसे गोली मार दी जाएगी। आखिरकार एक सिपाही ने मंगल पांडे को पकड़ लिया। मंगल को गिरफ्तार कर लिया गया और उनके खिलाफ कोर्ट मार्शल में मुकदमा चला। मंगल ने खुलकर कबूल किया कि उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह किया। कोर्ट ने उन्हें फाँसी की सजा सुनाई और तारीख तय की 18 अप्रैल 1857।

10 दिन पहले फाँसी क्यों?

अंग्रेजों ने तय तारीख से 10 दिन पहले यानी 8 अप्रैल 1857 को बैरकपुर में चुपके से मंगल पांडे को फाँसी दे दी। इसका कारण था अंग्रेजों का डर। मंगल पांडे की बहादुरी की खबर तेजी से फैल रही थी। बैरकपुर के सिपाही ही नहीं, आसपास की छावनियों में भी विद्रोह की सुगबुगाहट शुरू हो गई थी। अंग्रेजों को डर था कि अगर मंगल को जिंदा रखा गया या फाँसी में देरी हुई, तो उनकी चिंगारी पूरे देश में आग लगा देगी। इसलिए उन्होंने जल्दबाजी में 8 अप्रैल को फाँसी दे दी ताकि विद्रोह को कुचला जा सके। लेकिन यह उनकी भूल थी। मंगल पांडे के बलिदान ने उल्टा विद्रोह को और भड़का दिया।

अंग्रेजों को क्या डर था?

अंग्रेजों का सबसे बड़ा डर था कि मंगल पांडे का विद्रोह एक बड़े स्वतंत्रता आंदोलन में बदल जाएगा। उस समय ईस्ट इंडिया कंपनी की फौज में लाखों भारतीय सिपाही थे और अगर वे एकजुट हो जाते, तो अंग्रेजों का राज खत्म हो सकता था। मंगल की कार्रवाई के बाद मेरठ, दिल्ली, कानपुर, लखनऊ जैसे शहरों में विद्रोह की चिंगारी फैल गई। 20 अप्रैल को हिमाचल प्रदेश के कसौली में सिपाहियों ने एक पुलिस चौकी जला दी। 10 मई 1857 को मेरठ में सिपाहियों ने ब्रिटिश अफसरों को मार डाला और दिल्ली की ओर कूच किया।

वहाँ उन्होंने मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर को अपना नेता घोषित किया। लखनऊ में 30 मई को चिनहट और इस्माइलगंज में किसानों, मजदूरों और सिपाहियों ने अंग्रेजों के खिलाफ हथियार उठाए। कानपुर में नाना साहब, झाँसी में रानी लक्ष्मीबाई और लखनऊ में बेगम हजरत महल ने विद्रोह की कमान संभाली। अंग्रेजों को डर था कि अगर मंगल पांडे को जल्द खत्म न किया गया, तो यह विद्रोह पूरे भारत को आजादी की राह पर ले जाएगा।

मंगल पांडे की विरासत

मंगल पांडे के बलिदान ने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम को नई ताकत दी। भले ही अंग्रेजों ने इस विद्रोह को दबा दिया, लेकिन इसने उनकी कमजोरी उजागर कर दी। 1858 में ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन खत्म हुआ और ब्रिटिश क्राउन ने भारत पर सीधा शासन शुरू किया। मंगल पांडे की शहादत ने भारतीयों में आजादी की चाह जगाई, जो 1947 में पूरी हुई। उनकी याद में 1984 में भारत सरकार ने डाक टिकट जारी किया। 2005 में उनके जीवन पर ‘मंगल पांडे: द राइजिंग’ नाम की फिल्म भी बनी थी, जिसमें आमिर खान ने उनकी भूमिका निभाई।

मंगल पांडे सिर्फ एक सिपाही नहीं, बल्कि भारत की आजादी की पहली चिंगारी थे। उनकी जयंती पर हम सब उन्हें सलाम करते हैं। जय हिंद!

किराना हिल्स पर भारत के हमले का असर अब तक, पहाड़ी पर बने हुए हैं ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के निशान: गवाह बनीं गूगल अर्थ वाली सैटेलाइट इमेज, विशेषज्ञ ने दिखाया

भारत ने मई 2025 में ऑपरेशन सिंदूर के तहत पाकिस्तान के आतंकी ठिकानों और एयरबेस पर हमले किए। इसमें पाकिस्तान को काफी नुकसान हुआ लेकिन पाक अधिकारी यही कहते रहे कि ‘सबकुछ ठीक’ है। अब गूगल अर्थ ने पाकिस्तान के सरगोधा इलाके की कुछ सेटेलाइट तस्वीरें जारी की हैं। इनमें किराना हिल्स पर हुए हमले के प्रभाव को दिखाया गया है।

ये सेटेलाइट तस्वीरें सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही हैं। तस्वीरों में साफ तौर पर देखा जा सकता है कि मई 2025 में किराना हिल्स पर हुए हमले का असर अब तक है। तस्वीरों में सरगोधा के मुशाफ एयरबेस के रनवे पर भी मरम्मत के बाद का नजारा देखा जा सकता है।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर तस्वीर साझा करने वाले एक विश्लेषक और सेटेलाइट इमेज विशेषज्ञ डेमियन साइमन का कहना है कि भारत की ओर से किए गए हमले का असर साफ तौर पर किराना हिल्स में देखा जा सकता है। साथ ही सरगोधा एयरबेस पर भी स्ट्राइक के बाद रनवे की मरम्मत होने की तस्वीर भी देखी जा सकती है।

एक यूजर की प्रतिक्रिया के जवाब में डेमियन ने कहा कि ये तस्वीरें किसी भी तरह से भूमिगत प्रभाव देखने को नहीं मिल रहा है। ये पहाड़ी का एक हिस्सा है जिसके आसपास कुछ महत्वपूर्ण स्थान नहीं हैं।

डेमियन ने साथ ही ये संभावना भी जताई कि हमले के आस पास कोई भी सुरंगें या परमाणु सुविधा जैसी चीजें नहीं हैं तो ऐसे में ये भारत की ओर से एक चेतावनी रही होगी। अगर भारत इस जगह तक पहुँच सकता है तो परमाणु सुविधा या सुरंगों तक पहुँचना कोई बड़ी बात नहीं है।

गौरतलब है कि पाकिस्तान ने किराना हिल्स पर हमले की बात को आधिकारिक तौर पर मना कर दिया था। पाकिस्तान की इंटर-सर्विस पब्लिक रिलेशंस (ISPR) ने भारत की ओर से किए गए हमलों के के बाद हुए नुकसान की बात को ‘पूरी तरह से झूठा और निराधार’ बताया था।

पाक विदेश मंत्रालय ने भी नुकसान के दावों को ‘गैर-जिम्मेगदाराना और उकसाने वाली हरकत’ बताकर ये कहा था कि पाकिस्तानी फौज हर इंच की रक्षा करने में सक्षम है। अब ये तस्वीरें कुछ और कहानी ही बयाँ कर करही हैं।

क्यों जरूरी हैं किराना हिल्स?

पाकिस्तान के लिए किराना हिल्स और सरगोधा एयबेस काफी अहम जगहें हैं। किराना हिल्स में ही पाकिस्तान के परमाणु हथियारों का जखीरा है। यहाँ पर मिसाइल बनने से लेकर परमाणु सुविधा की हर तैयारी की जाती है।

इसके अलावा सरगोधा में मुशाफ एयरबेस भी पाकिस्तान की फौज के लिए काफी अहमियत रखता है। भारत की सीमा से मात्र 150 किमी दूर इस अयरबेस पर पाकिस्तान के F-16, JF-17 और मिराज समेत कई महत्वपूर्ण विमान तैनात रहते हैं।

किराना हिल्स पाकिस्तान के पंजाब राज्य में एक श्रृंखला है। यह पाकिस्तान के सरगोधा जिले में स्थित है। यह पहाड़ी श्रृंखला लगभग 80 किलोमीटर लम्बी है। किराना हिल्स को लेकर ब्रिटिश सरकार के दौरान भी काफी रिसर्च हुई थी। किराना हिल्स को 1970 के बाद पाकिस्तान ने अपने काम में लेना चालू किया। पाकिस्तान यहाँ यूरेनियम की खोज को लेकर भी खुदाई की थी।

किराना हिल्स का सैटेलाईट व्यू (फोटो साभार:Jaidev Jamwal/X)

रिपोर्ट्स बताती है कि किराना हिल्स का इस्तेमाल 1978-79 के आसपास पाकिस्तान ने अपने परमाणु मिशन के लिए करना चालू किया था। किराना हिल्स में पाकिस्तान ने अपना परमाणु बम तैयार करने से पहले कई प्रयोग किए थे। यह भी कुछ रिपोर्ट्स में बताया गया है कि पाकिस्तान ने परमाणु हथियार बनाने के लिए कई चीजें छुपाई थी, जिन्हें अमेरिका के दबाव हटा दिया गया था।

किराना हिल्स को लेकर 2023 में आई एक रिपोर्ट बताती है कि किराना हिल्स में हथियार रखने की जगह के साथ ही मिसाइल लांचर लान्चर खड़े करने के लिए गैरेज भी बनाए गए हैं।इन लॉन्चर के माध्यम से ही परमाणु हथियार रखने वाली मिसाइल को लॉन्च किया जाता है।

यह लॉन्चर ट्रक पर लगाए जाते हैं। इन्हें अलग-अलग जगह भी ले जाया जा सकता है। पाकिस्तान के परमाणु हथियार ले जानी वाली शाहीन और गौरी जैसी मिसाइलें हैं।

क्यों हुआ हमला?

जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में 22 अप्रैल को पाकिस्तानी आतंकियों ने बैसारन घाटी में घूम रहे पर्यटकों से उनका धर्म पूछकर और हिंदू होने की पुष्टि कर मौत बरसाई थी। इस हमले में 20 से ज्यादा हिंदू पर्यटकों समेत 26 लोगों की मौत हो गई थी और कई अन्य घायल हुए थे।

इसके जवाब में भारत ने 7 मई 2025 को ऑपरेशन सिंदूर लॉन्च किया। इसमें पाकिस्तान के कई आतंकी ठिकाने तबाह किए गए। जब पाकिस्तान ने जवाबी हमले शुरू किए तो उनको विफल करते हुए भारत ने पाकिस्तान के 11 एयरबेस उड़ा दिए।

हमलों के बाद कई विश्लेषकों ने दावा किया था कि भारत ने सिर्फ एयरबेस ही नहीं ध्वस्त किए बल्कि पाकिस्तान की एक परमाणु स्टोरेज फैसिलिटी ‘किराना हिल्स’ को भी उड़ाया। हालाँकि, एयरफोर्स के DG ऑपरेशंस ने इस बात से इनकार किया था कि किसी भी न्यूक्लियर फैसिलिटी पर हमला किया गया है।

लक्षद्वीप के आइलैंड को रक्षा कामों में लेगी मोदी सरकार, पूरा द्वीप किया ट्रांसफर: कॉन्ग्रेस MP हमदुल्ला सईद कर रहा विरोध, जानिए क्यों हिन्द महासागर में स्थित जमीन का यह टुकड़ा इतना महत्वपूर्ण

भारत सरकार लक्षद्वीप समूह के एक द्वीप का रक्षा उद्देश्यों के लिए अधिग्रहण करने जा रहा है। इसके लिए भारत सरकार ने नोटिफिकेशन जारी कर दी है। यह द्वीप राष्ट्रीय सुरक्षा के नजरिए से बेहद महत्वपूर्ण है। हालाँकि, कॉन्ग्रेस का एक सांसद अब इस प्रोजेक्ट के विरोध में उतर आया है।

टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत सरकार जिस द्वीप का अधिग्रहण करने जा रही है उसका नाम बित्रा है। यह लक्षद्वीप द्वीप समूह के 10 बसे हुए आबादी वाले द्वीपों में से एक है। इसको लेकर लक्षद्वीप प्रशासन ने 11 जुलाई 2025 को एक नोटिफिकेशन जारी किया है।

राजस्व विभाग ने बताया है कि बित्रा द्वीप को रक्षा उद्देश्यों के लिए अधिग्रहित किया जा रहा है। सरकार अब सोशल इम्पैक्ट असेसमेंट (SIA) करेगी, ताकि इस अधिग्रहण के प्रभावों का पता चल सके।

लक्षद्वीप के 10 बसे हुए द्वीपों में से एक बित्रा द्वीप को सरकार रक्षा उद्देश्यों के लिए अपने इस्तेमाल में लेगी। इस छोटे से द्वीप पर करीब 105 परिवार रहते हैं। नोटिफिकेशन के मुताबिक, बित्रा द्वीप की रणनीतिक अहमियत और राष्ट्रीय सुरक्षा के कारण यह फैसला लिया गया है।

लक्षद्वीप के कॉन्ग्रेसी सांसद हामदुल्ला सईद ने सरकार के इस कदम का विरोध कर आरोप लगाया कि सरकार ने स्थानीय लोगों से कोई सलाह नहीं ली और यह इलाके में शांति भंग करने की कोशिश है। हामदुल्ला सईद इस फैसले के खिलाफ राजनीतिक और कानूनी लड़ाई लड़ने की बात कह रहा है।

बित्रा द्वीप महत्वपूर्ण क्यों?

बित्रा द्वीप लक्षद्वीप का सबसे छोटा बसा हुआ द्वीप है। बित्रा द्वीप का कुल एरिया केवल 0.105 वर्ग किलोमीटर है। यह 0.57 किलोमीटर लंबा और सबसे चौड़े हिस्से में 0.28 किलोमीटर चौड़ा है। यह द्वीप कोच्चि से 483 किलोमीटर (261 नॉटिकल मील) दूर है।

बिट्रा द्वीप 1835 तक समुद्री पक्षियों के लिए एक प्रजनन स्थल था। किलटन और चेटलाट के लोग यहाँ शिकार करने आते थे। आश्चर्य की बात यह है कि बित्रा द्वीप पहले एक विरान और बंजर था। 1945 के आसपास यहाँ एक महिला अपने बेटे के साथ आई थी, जिसके बाद धीरे-धीरे यहाँ की आबादी बढ़ने लगी।

मिनिकॉय द्वीप पर नया ‘दोहरे उद्देश्य वाला’ एयरपोर्ट

भारत सरकार ने 18 जुलाई 2024 को लक्षद्वीप के मिनिकॉय द्वीप पर नया एयरपोर्ट बनाने की मंजूरी दी थी। यह एयरपोर्ट सेना (वायुसेना, नौसेना, कोस्ट गार्ड) और आम नागरिकों दोनों के लिए इस्तेमाल होगा।

मिनिकॉय द्वीप की लोकेशन बहुत खास है, क्योंकि यह मालदीव से सिर्फ 50 मील दूर है। इससे भारतीय सेना को अरब सागर और हिंद महासागर पर निगरानी रखने में मदद मिलेगी। अभी लक्षद्वीप में सिर्फ अगत्ती द्वीप पर ही एयरपोर्ट है।

नया एयरपोर्ट बनने से टूरिज्म को बढ़ावा मिलेगा और स्थानीय लोगों को बेहतर कनेक्टिविटी और नौकरियाँ मिलेंगी।

₹3 लाख करोड़ के घाटे, ₹4 लाख करोड़ का कर्ज और एयरबस से मिलती पटखनी: बोइंग के ताबूत में आखिरी कील बन सकता है एअर इंडिया हादसा, क्या इसीलिए पायलट के खिलाफ चल रहा ‘प्रोपेगेंडा’

अहमदाबाद में 12 जून, 2025 को हुए एअर इंडिया विमान हादसे में विदेशी मीडिया अपनी प्लेबुक पूरी कर चुका है। बोइंग को क्लीन चिट और भारतीय पायलट सुमीत सभरवाल को दोषी ठहराए जाने की कहानी को मूर्त रूप दिया जा चुका है। भले ही इस मामले में अभी अंतिम जाँच रिपोर्ट ना आई हो, लेकिन अमेरिकी मीडिया संस्थानों के लिए इस हादसे के दोषी कैप्टन सभरवाल हैं। 

बोइंग को अमेरिकी विमानन नियामक FAA ने भी शुरुआती तौर पर क्लीन चिट दी है और उसके विमान 787 ड्रीमलाइनर पर किसी जाँच या निर्देश जारी करने से इनकार किया है। हादसे की भारत में जाँच कर रही एजेंसी AAIB की अंतिम रिपोर्ट में अभी लम्बा समय लगने के कयास हैं। इस बीच सवाल उठे हैं कि क्या बोइंग को क्लीन चिट देने का प्रयास जल्दबाजी में इसलिए तो नहीं किया गया है कि उसकी पहले से जारी मुश्किलों में इजाफा ना हो और वह ड्रीमलाइनर की कोई गड़बड़ी उसके लिए और मुश्किलें ना खड़ी करे।

इस तर्क के पीछे कई कारण हैं। बोइंग की आर्थिक फ्रंट पर समस्याएँ, उसका वर्तमान में 787 ड्रीमलाइनर पर निर्भरता और एयरबस के मुकाबले में उसका पिछड़ता रिकॉर्ड इसी तरफ इशारा करते हैं। यह ट्रेंड स्पष्ट तौर पर दर्शाता है कि यदि 787 ड्रीमलाइनर शक के दायरे में आता है तो यह बोइंग के ताबूत में आखिरी कील होगी।

787 ही है इस समय बोइंग की लाइफलाइन 

787 ड्रीमलाइनर मॉडल इस समय बोइंग के लिए सबसे महत्वपूर्ण है। बोइंग वर्तमान में 737 मैक्स, 787 और 777X की बिक्री करती है। जहाँ 737 मैक्स पहले से समस्याओं से जूझता रहा है, तो वहीं 777X की असल उड़ान में अभी समय है। इसके 2026 से बाजार में आने की संभावना है। 

787 अकेला बोइंग का ऐसा मॉडल है जो समस्याओं से नहीं घिरा है और जिसकी बाजार में माँग भी काफी अधिक है। एअर इंडिया हादसे में 787 ही शिकार बना है और अगर इसमें कोई तकनीकी दिक्कत सामने आई तो बोइंग के लिए अकेला कमाऊ मॉडल जमीन पर खड़ा हो जाएगा। 

रिपोर्ट्स बताती हैं कि जहाँ एक 737 मैक्स से बोइंग को 10-15 मिलियन डॉलर (लगभग ₹85-₹120 करोड़) तक का फायदा होता है तो वहीं एक 787 ड्रीमलाइनर की बिक्री पर बोइंग 30 मिलियन डॉलर (₹250 करोड़-₹500 करोड़) तक का मुनाफा कमाती है। 

बोइंग का 787-8 ड्रीमलाइनर मॉडल (फोटो साभार: Boeing)

787 ड्रीमलाइनर में तकनीकी खराबी निकलने पर बोइंग को इसका उत्पादन रोकना पड़ सकता है या फिर इनकी ग्राउंडिंग तक की नौबत आ सकती है। इससे बोइंग का घाटा कई गुना बढ़ जाएगा और साथ ही उससे विमान खरीदने वाली एयरलाइंस का विश्वास भी घटेगा। 

बोइंग के पास वर्तमान में लगभग 950 ड्रीमलाइनर डिलीवर करने के ऑर्डर हैं। एअर इंडिया हादसे में जो बोइंग 787 दुर्घटना ग्रस्त हुआ था, उसके फ्यूल कंट्रोल स्विच के मूवमेंट में समस्या बताई गई थी। इसका दोष पायलट सुमीत सभरवाल पर भले ही डाला गया हो, लेकिन अंतिम जाँच रिपोर्ट आना बाकी है।

यदि अंतिम जाँच रिपोर्ट में कहीं भी यह बात सामने आती है कि 787 ड्रीमलाइनर में तकनीकी खामियाँ हैं और उसके फ्यूल कंट्रोल स्विच या फिर अन्य किसी पुर्जे में खराबी है तो बोइंग को डिलीवरी रोकने के साथ उत्पादन तक रोकना पड़ सकता है जो बोइंग के लिए घातक सिद्ध होगा।

पहले से समस्याओं से घिरा है 787

ऐसा नहीं है कि बोइंग को 787 ड्रीमलाइनर को लेकर अब तक कोई समस्याएँ नहीं झेलनी पड़ रही हैं। इसके ऑर्डर की संख्या भले बड़ी हो लेकिन इसका उत्पादन बीते कुछ समय में धीमा रहा है क्योंकि कोविड की वजह से सप्लाई चेन में समस्याएँ आती रही हैं।

दूसरी तरफ से 787 को एयरबस का A350 कड़ी टक्कर दे रहा है। अभी तक बिक्री के मामले में भले ही 787 की संख्या A350 से अधिक रही हो लेकिन बीते 5 वर्षों में यह लगातार पिछड़ रहा है। 2020-25 के बीच जहाँ बोइंग ने लगभग 250 ड्रीमलाइनर बेचे हैं तो वहीं इस दौरान एयरबस 300 से अधिक A350 अपने ग्राहकों को देने में सफल रही है।

एअरबस A350 (फोटो साभार: Airbus)

ऐसे में बोइंग पर दबाव बढ़ ही रहा है। 787 की छवि बिगड़ना इसकी बिक्री को गर्त में पहुँचाने के लिए एक उत्प्रेरक की तरह काम करेगा और बोइंग को तगड़ा नुकसान झेलना पड़ सकता है और साथ ही उसके हाथ से भविष्य के ऑर्डर भी छूट सकते हैं।

पाँच बरस से घाटा झेल रही है बोइंग

बोइंग ने अपना लेटेस्ट विमान मॉडल 737 मैक्स 2017 में एयरलाइंस को देना चालू किया था। बोइंग ने यह विमान पुराने 737 के डिजाइन पर बनाया था और इसे एयरबस के A320 नियो श्रेणी विमानों से प्रतिस्पर्धा के लिए डिजाइन किया गया था। बोइंग का वादा था कि यह विमान पुराने के मुकाबले कम तेल खपत करेगा और इसमें उससे सुविधाएं भी अधिक होंगी। 

बोइंग को इस विमान के हजारों ऑर्डर मिले थे। लेकिन 2018 और 2019 में दो नए नवेले बोइंग 737 मैक्स हादसे का शिकार हुए। यह हादसे इंडोनेशिया की लायन एयर और इथियोपिया की इथियोपियन एयरलाइंस के साथ हुए। इन हादसों में लगभग 350 लोग मारे गए। 

बोइंग ने पहले इन हादसों में पायलटों को दोषी बताने का प्रयास किया लेकिन जाँच में पता चला कि उसने इनमें एक नया MCAS नाम का सॉफ्टवेयर लगाया था, जिसके चलते यह हादसे हुए। इस सॉफ्टवेयर में गड़बड़ी के चलते विमान नीचे की तरफ गोता लगाता रहा और हादसे का शिकार हुआ। 

बोइंग ने पायलटों को भी इस विषय में नहीं बताया था, इसलिए उसकी चोरी और संगीन हो गई। इन हादसों के चलते बोइंग को 737 मैक्स का 2019 में उत्पादन रोकना पड़ा। इसके अलावा जितने बोइंग 737 मैक्स डिलीवर हो चुके थे, उन्हें भी उड़ाने पर रोक लग गई। 

कंपनी को दोबारा इस विमान के लिए प्रमाणन लेने पड़े और मुकदमे झेलने पड़े और उसकी प्रतिष्ठा मिट्टी में मिल गई। इसके चलते उसके नए ऑर्डर भी रुके और पुराने ऑर्डर्स पर भी असर पड़ा। बोइंग 2019 में ही नुकसान में चली गई। 2019 के बाद से एक डॉलर का मुनाफा कमाने में असफल रही है।

737 मैक्स पर हुए बवाल के अलावा बोइंग को कोविड महामारी और फिर सप्लाई चेन में समस्या के चलते उत्पादन पर असर के कारण भी मोटा नुकसान हुआ है जिससे वह अभी तक उबर नहीं पाई है। उसका उत्पादन भी वापस पटरी पर नहीं आ रहा। 

2019 से 2024 के बीच बोइंग लगभग 36 बिलियन डॉलर (₹3.09 लाख करोड़) का घाटा झेल चुकी है। उसे सबसे तगड़ा घाटा 2020 और 2024 में उठाना पड़ा है। इन दोनों वर्ष में उसने लगभग 12 बिलियन डॉलर (₹1 लाख करोड़) का घाटा उठाया है। यह सिलसिला 2025 में जारी है। 

अगर 787 को लेकर कोई बुरी खबर आती है तो बोइंग को और भी नुकसान झेलना पड़ेगा और उसका बचा खुचा राजस्व का रास्ता बंद होगा। ऐसे में उस पर दबाव और बढ़ जाएगा। 

कर्ज के पहाड़ में भी दबी है बोइंग 

बोइंग सिर्फ घाटे का ही पर्याय नहीं बनी है बल्कि उस पर लगातार कर्ज भी बढ़ता जा रहा है। बोइंग का यह कर्ज भी 2019 के बाद से लगातार बढ़ता गया है और बोइंग इसे चुकाने में भी असफल होती नजर आती है। बोइंग पर वर्तमान में 50 बिलियन डॉलर (₹4.25 लाख करोड़) से अधिक का कर्ज है। 

बोइंग लगातार अपनी सप्लाई चेन सुधार और नए ऑर्डर्स के जरिए इस कर्ज को कम करने का प्रयास कर रही है लेकिन इससे कोई फायदा नहीं हो रहा है। यह 2019 के बाद एक दो बार कम हुआ है लेकिन 2023 के बाद यह दोबारा बढ़ गया था 50 बिलियन डॉलर के पार पहुँच गया। 

एयरबस से पहले ही खा चुकी पटखनी

बोइंग की मुश्किलें कोई आज की नहीं हैं। वह बीते लगभग 15 वर्षों से प्रतिस्पर्धी एयरबस से दबाव झेल रही है। एयरबस एक के बाद एक उसका बाजार निगलती जा रही है। यूरोप से निकली एयरबस ने पहले A320 विमानों के जरिए बोइंग से नैरो बॉडी एयरक्राफ्ट्स का बाजार हथियाया। 

इसके बाद एयरबस ने A380 और A330 के जरिए बोइंग से वाइड बॉडी यानी बड़े एयरक्राफ्ट्स का बाजार भी हथिया लिया। एयरबस बीते कुछ वर्षों से बोइंग के 787 ड्रीमलाइनर को पछाड़ने के प्रयास में है। इसके लिए उसने A350 विकसित किया है जो बोइंग के मुकाबले कहीं अधिक यात्री ले जा सकता है। 

बोइंग के एयरबस के मुकाबले पिछड़ने का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि वर्ष 2010 तक लगभग दोनों ही कंपनियां 700-800 विमान की डिलीवरी प्रति वर्ष कर रहीं थी लेकिन 2010 के बाद यह खेल पलट गया और एयरबस ने बोइंग को पीछे छोड़ दिया।

रिपोर्ट्स बताती हैं कि 2010 के बाद से बोइंग जहां लगभग 9600 एयरक्राफ्ट बेच पाई है, तो वहीं एयरबस इसी दौरान 10,700 से अधिक एयरक्राफ्ट अलग अलग एयरलाइंस को बेच चुकी है। एयरबस ने सबसे बड़ी बढ़त उसी दौर में हासिल की है जब बोइंग के साथ 737 मैक्स वाली समस्याएं चल रही थीं। 

बोइंग सिर्फ इसी मामले में नहीं पिछड़ी है। वह एयरबस से ऑर्डर्स के मामले में भी दबाव महसूस कर रही है। बोइंग को 2015 से 2024 के बीच लगभग 5000 विमानों के ऑर्डर मिले हैं जबकि इसी दौरान एयरबस को 8900 से अधिक एयरक्राफ्ट के ऑर्डर मिले हैं। ऐसे में वह बोइंग से लगभग दोगुना व्यापार कर रही है। 

787 में गड़बड़ी से ठप हो जाएगी कंपनी 

कर्ज, घाटा, 737 मैक्स प्रोग्राम के साथ समस्या और 777X प्रोग्राम में देरी के साथ ही यह स्पष्ट है कि बोइंग वर्तमान में 787 ड्रीमलाइनर पर ही निर्भर है। उसके राजस्व का बड़ा हिस्सा वर्तमान में 787 ड्रीमलाइनर से ही आता है। इसके अलावा वह एयरबस से लगातार मात खा रही है।

इन सब कारणों के चलते साफ़ हो जाता है कि एअर इंडिया हादसे में पायलट सुमीत सभरवाल को दोषी बताने का सिलसिला पहले दिन से क्यों चालू किया गया है। इसके लिए पटकथा हादसे के दिन से ही लिखी जा चुकी थी। 787 को साफ़ तौर बचाया जाए और बोइंग का धंधा चलता रहे, इसके लिए लगातार विदेशी मीडिया में पायलट पर खबरें चलती रहीं, इस आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

₹60 करोड़ की मनी लॉन्ड्रिंग, विदेशी फंडिंग और फर्जी रजिस्ट्री: छांगुर पीर के 22 अकाउंट खंगालने के बाद खुली सारी पोल; ‘रशीद शाह’ को सौंपी गई थी ‘मिशन धर्मांतरण’ की जिम्मेदारी

उत्तर प्रदेश के बलरामपुर में छांगुर पीर उर्फ जलालुद्दीन शाह के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय (ED) की जाँच में कई बड़े खुलासे हुए हैं। छांगुर पीर ने विदेशों से आए पैसे को जमीनों के सौदों में लगाकर काले धन को सफेद किया।

अब तक की जाँच में ₹60 करोड़ की मनी लॉन्ड्रिंग के प्रमाण मिल चुके हैं। ED को विदेशी संस्थाओं से संबंध, विदेशी मुद्रा, फर्जी रजिस्ट्री और संपत्तियों की खरीद के कई सबूत मिले हैं। जाँच अब कई राज्यों और इंटरनेशनल कनेक्शन की तरफ बढ़ रही है।

अवैध फंडिंग और मनी लॉन्ड्रिंग के सबूत

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ED की जाँच में पता चला है कि छांगुर पीर को विदेशों से फंडिंग मिलती थी। इन पैसों को जमीन की खरीद-फरोख्त में इस्तेमाल करके सफेद किया जाता था। वे रजिस्ट्री में सही कीमत नहीं दिखाते थे, बल्कि पहले से तय की गई कीमत लिखते थे। इस तरीके से बैंकों से आसानी से पैसा निकाला जाता था और काले धन को वैध दिखाया जाता था।

ED ने छांगुर पीर और उसके करीबियों के 22 बैंक खातों की जाँच की। इसमें करीब ₹60 करोड़ की मनी लॉन्ड्रिंग के प्रमाण मिले। इनमें छांगुर पीर के अलावा नवीन रोहरा और उसकी बीवी नीतू उर्फ नसरीन की भी भूमिका पाई गई है।

छापों में क्या मिला?

जानकारी के मुताबिक, जाँच में खुलासा हुआ कि छांगुर पीर को मिले पैसों से यूपी और महाराष्ट्र में कई प्रॉपर्टी खरीदी गई। ज्यादातर संपत्तियाँ नवीन और नसरीन के नाम पर हैं। एक आलीशान कोठी बलरामपुर में भी बनाई गई, जहाँ से धर्मांतरण का पूरा नेटवर्क चलाया जा रहा था।

ED ने बलरामपुर, लखनऊ और मुंबई में कुल 15 ठिकानों पर छापे मारे। जाँच में कई संपत्ति दस्तावेज, फर्जी रजिस्ट्री, विदेशी खातों और छांगुर की विदेश यात्रा से जुड़े कागजात मिले। बलरामपुर के एक बुटीक में छिपाए गए दस्तावेज भी मिले, जिसे सील कर दिया गया है।

‘मिशन धर्मांतरण’ की जिम्मेदारी रशीद को

नवीन रोहरा के सहयोगी शहजाद शेख के फोन से क्रोएशिया की मुद्रा ‘कुना‘ की तस्वीर मिली है। ED को शक है कि धर्मांतरण रैकेट में विदेशी मुद्रा का इस्तेमाल हुआ। इसके पीछे क्रोएशिया, पनामा और अन्य विदेशी नेटवर्क से लिंक होने की आशंका है।

छांगुर पीर की गिरफ्तारी से पहले ही उसने अपने साथी रशीद शाह को ‘मिशन धर्मांतरण‘ की जिम्मेदारी सौंप दी थी। रशीद शाह ने छांगुर के भतीजे के साथ मिलकर दोबारा नेटवर्क खड़ा करने की कोशिश की। STF ने इसे समय रहते पकड़ा और रशीद शाह को गिरफ्तार कर लिया।

पुराने साथियों को जोड़ने की कोशिश

रशीद शाह ने छांगुर पीर की कोठी में रह चुके 55 लोगों से फिर से संपर्क साधा। माना जा रहा है कि ये सभी पहले भी धर्मांतरण अभियान में शामिल रहे थे। छांगुर का प्रभाव अब भी कमजोर नहीं हुआ है।

ED और STF दोनों मिलकर जांँच कर रहे हैं कि विदेशों से आए पैसे का इस्तेमाल किन-किन कार्यों में हुआ। बैंक दस्तावेजों, जमीन के सौदों और डिजिटल डेटा से और भी बड़े खुलासे हो सकते हैं। जाँच अब सिर्फ यूपी तक नहीं, महाराष्ट्र और दूसरे राज्यों तक फैल चुकी है।

‘TMC विकास के आगे दीवार है’- बंगाल में गरजे पीएम मोदी, अपराधियों पर दीदी की ‘ममता’ पर भी साधा निशाना: सड़क-बिजली-गैस-रेल समेत ₹5,400 करोड़ की विकास परियोजनाओं का किया उद्घाटन

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार (18 जुलाई 2025) को पश्चिम बंगाल के दुर्गापुर में एक जनसभा को संबोधित किया। इसमें उन्होंने ममता बनर्जी की सरकार पर तीखा हमला बोला और कई सवाल खड़े किए। साथ ही राज्य में महिलाओं की सुरक्षा, भ्रष्टाचार और तुष्टिकरण की राजनीति जैसे मुद्दों को उठाया।

अपने दौरे में प्रधानमंत्री ने ₹5,400 करोड़ की विकास परियोजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास भी किया। इसमें प्रधानमंत्री ऊर्जा गंगा योजना के तहत गैस पाइपलाइन का विस्तार, दुर्गापुर-कोलकाता गैस पाइपलाइन का उद्घाटन, स्टील और थर्मल पावर प्लांट्स में प्रदूषण नियंत्रण प्रणाली का आधुनिकीकरण, रेलवे लाइन डबलिंग और वंदे भारत ट्रेनों का विस्तार शामिल रहे।

बंगाली भाषा BJP की प्रेरणा

पीएम मोदी ने संबोधन की शुरुआत बंगाली में “बड़ोरा आमार प्रणाम नेबेन, छोटोरा भालोबाशा। जय माँ काली, जय माँ दुर्गा” कहकर की। उन्होंने कहा कि बंगाली भाषा और संस्कृति बीजेपी के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।

भाषण में पीएम मोदी ने TMC की मनमानी और अराजक रवैये पर हमला बोला। उन्होंने मुर्शिदाबाद की घटना याद करते हुए कहा कि शहर में हत्या हो जाती हाँ और पुलिस कुछ भी नहीं करती। अगर राज्य सरकार किसी की जान और दुकान की रक्षा नहीं कर सकती तो निवेशकों को भी चिंता होती है।

इसके साथ ही उन्होंने आरजी कर मेडिकल कॉलेज में ट्रेनी डॉक्टर के साथ हुए बलात्कार और हत्या की घटना का भी जिक्र किया। उन्होंने आरोप लगाया कि TMC सरकार ने दोषियों को बचाने की कोशिश की। इससे देश उबर भी नहीं पाया था कि एक और कॉलेज में एक बेटी के साथ दुर्व्यवहार हुआ। इसमें भी TMC नेता आरोपित को बचाने में लगे हुए हैं।

घुसपैठियों पर होगी कार्रवाई

पश्चिम बंगाल के जरिए अवैध घुसपैठ पर सख्ती जताते हुए पीएम मोदी ने कहा कि जो भारत के नागरिक नहीं हैं और घुसपैठ करके देश में आए हैं, उनके खिलाफ संविधान के तहत न्यायसंगत कार्रवाई जारी रहेगी। बंगाल के खिलाफ किसी भी तरह की साजिश बीजेपी सफल नहीं होने देगी।

पीएम मोदी ने आरोप लगाया कि TMC ने बंगाल की पहचान को खतरे में डाल दिया है। TMC ने घुसपैठ को बढ़ावा दिया जा रहा है। पूरा ईकोसिस्टम बनाया गया है। घुसपैठियों के फर्जी कागज बनाए जा रहे हैं। राज्य में भ्रष्टाचार और अराजकता फैली हुई है। TMC घुसपैठियों के समर्थन में खुलकर उतर आई है।

विकास के आगे दीवार

प्रधानमंत्री ने TMC पर जमकर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि TMC ने अपने स्वार्थ के लिए पश्चिम बंगाल की पहचान को भी दाँव पर लगा दिया है। TMC विकास के आगे दीवार बनकर खड़ी है। जिस दिन ये दीवार गिरेगी, बंगाल विकास की गति पकड़ लेगा। हम बंगाल में अवसर माँग रहे हैं।

ममता दीदी की नीतियों पर तंज कसते हुए पीएम मोदी ने कहा कि तुष्टिकरण के लिए TMC हर हद पार कर रही है। TMC की ये नीतियाँ भष्टाचार बढ़ाने के लिए बनाई जाती हैं। युवाओं की शिक्षा और कौशल के साथ जो कुछ यहाँ हो रहा है, वह चिंता बढ़ाने वाला है।

महिलाओं की सुरक्षा पर पीएम मोदी ने अपनी बात रखते हुए कहा कि केंद्र सरकार बेटियों और महिलाओं की शिक्षा, रोजगार, स्वरोजगार से जुड़ी कई योजनाएं चला रही है। गर्भवतियों को सहायता दी जा रही है। पर TMC महिला सशक्तिकरण की राह में भी रुकावट बनी है।

पीएम मोदी ने पड़ोस के राज्यों का उदाहरण देते हुए कहा कि असम में बीजेपी को मौका मिला तो वह राज्या तेजी से आगे बढ़ रहा है। त्रिपुरा भी तेजी से आगे बढ़ रहा है। विकास की गति में ओडिशा भी बीजेपी के साथ जुड़ चुका है। इसीलिए मैं आग्रह करता हूँ कि यहाँ भी बीजेपी को एक बार मौका दें।

उपलब्धियों का खाका

पीएम ने कहा कि जिस बंगाल ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी, बिपिन चंद्र पाल, रास बिहारी बोसे जैसे राष्ट्रभक्त दिए, वह बंगाल आज तुष्टिकरण की राजनीति में झुलस रहा है। यहीं से वंदे मातरम का उद्घोष हुआ, यहीं से आजादी की अलख जगी और उस बंगाल को TMC ने तुष्टिकरण की राजनीति के चलते गढ्ढे में ढकेल दिया है।

पीएम मोदी ने कहा कि पश्चिम बंगाल की धरती प्रेरणा से भरी है। श्यामा प्रसाद मुखर्जी देश के पहले उद्योग मंत्री रहे। उन्होंने देश में इंडस्ट्रीज की नींव रखी। विरेंद्र मुखर्जी ने अपने विजन से स्टील इंडस्ट्री की नींव रखी। ऐसे लोगों ने बंगाल और देस को आगे बढ़ाया है।

5 नई परियोजनाओं की शुरुआत

प्रधानमंत्री ने कहा कि बंगाल में रेल कनेक्टिविटी सुधारने के लिए काफी काम हुआ है। बंगाल उन राज्यों में से है जहाँ सबसे ज्यादा वंदे भारत ट्रेनें चलती हैं। मेट्रों का विस्तार हो रहा है। 2 नए पुल बंगाल को आज मिले हैं। रेलवे स्टेशनों का आधुनिकीकरण किया जा रहा है।

इस अवसर पर पीएम मोदी ने 5 नए प्रोजेक्ट्स का भी उद्घाटन किया। इसमें बांकुरा और परुलिया में 1950 करोड़ रुपए की BPCL सिटी गैस वितरण परियोजना, दुर्गापुर-हल्दिया नेचुरल गैस पाइपलाइन के दुर्गापुर से कोलकाता खंड (132 किलोमीटर) की 1190 करोड़ रुपए के प्रोजेक्ट जिसे प्रधानमंत्री ऊर्जा गंगा प्रोजेक्ट भी कहा जाता है, उसकी शुरुआत की गई।

इसके अलावा 1457 करोड़ रुपए के लागत वाली दुर्गापुर स्टील और रघुनाथपुर थर्मल पावर स्टेशन में फ्लू-गैस डी-सल्फराइजेशन यूनिट, 390 करोड़ रुपए के पुरुलिया-कोटशिला की 36 किमी लंबी रेल लाइन का दोहरीकरण और 380 करोड़ रुपए के तोपसी और पांडबेश्वर में दो रोड ओवर ब्रिज (ROB) का उद्घाटन शामिल रहा।

पश्चिम बंगाल में अगले साल विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। 2025 में मोदी की यह दूसरी पश्चिम बंगाल यात्रा है। इससे पहले उन्होंने 29 और 30 मई 2025 को दौरा किया था। उस दौरान उन्होंने अलिपुरद्वार और कूच विहार में परियोजनाओं का शिलान्यास किया था।

हालाँकि दुर्गापुर में पीएम मोदी की 2019 के बाद यह दूसरी रैली है। इससे पहले वह 2 फरवरी 2019 को लोकसभा प्रचार के लिए दुर्गापुर गए थे।

गुजरात की जिस रिफायनरी से रोशन होता है यूरोप, उसी पर EU ने लगा दिया बैन: रूसी तेल को बनाया बहाना, रोसनेफ्ट की हिस्सेदारी बनी मुख्य कारण

यूरोपीय संघ ने यूक्रेन में चल रहे युद्ध को लेकर रूस पर 18वें दौर के प्रतिबंधों की घोषणा की है। इसी कड़ी में गुजरात के वडिनार में स्थित वडिनार तेल रिफाइनरी को निशाना बनाया गया है। हालाँकि अब तक यूरोपीय देश इसी रिफायनरी से निकले तेल से अपनी गाड़ियाँ चला रहा थे और अब इस पर बैन लगा दिया गया। ये EU के दोहरे रवैये को भी दिखाता है।

यह प्रतिबंध रूस की अर्थव्यवस्था, खासकर उसके ऊर्जा और सैन्य क्षेत्र को कमजोर करने के उद्देश्य से लगाए गए हैं। यूरोपीय आयोग का कहना है कि यह अब तक का सबसे सख्त प्रतिबंध पैकेज है, जिससे रूस के युद्ध बजट पर सीधा असर पड़ेगा।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस नए प्रतिबंध पैकेज में यूरोपीय संघ ने रूसी तेल निर्यात को खास तौर पर निशाना बनाया है। अब ऐसे रूसी तेल पर भी प्रतिबंध लगाया गया है जो अन्य देशों, खासकर भारत जैसी जगहों पर जाकर रिफाइन होता है।

इसमें भारत की सबसे बड़ी रोसनेफ्ट रिफाइनरी और भारतीय झंडे के तहत पंजीकृत जहाजों को भी शामिल किया गया है। इसके अलावा, यूरोपीय संघ ने रूसी तेल की कीमत की सीमा को घटाकर बाजार मूल्य से 15% कम कर दिया है, जिससे रूस को मिलने वाला तेल राजस्व और घट जाएगा।

इस बार यूरोपीय संघ ने 105 ‘छाया बेड़े’ (Shadow Fleet) के जहाजों और उनके सहायकों पर भी प्रतिबंध लगाए हैं, जो चुपचाप रूस के लिए तेल ढोने का काम करते हैं। रूस से यूरोप तक गैस पहुँचाने वाली नॉर्ड स्ट्रीम गैस पाइपलाइनों पर भी प्रतिबंध लगाया जाएगा।

रूसी बैंकों की वित्तीय पहुँच को भी सीमित किया गया है ताकि वे अंतरराष्ट्रीय लेन-देन में भाग न ले सकें। इसके साथ-साथ रूस के सैन्य उद्योग पर दबाव बढ़ाने के लिए वहाँ इस्तेमाल होने वाली तकनीकों और उपकरणों के निर्यात को और सीमित किया गया है।

यूरोपीय संघ ने उन चीनी बैंकों पर भी ध्यान केंद्रित किया है जो रूस को इन प्रतिबंधों से बचने में मदद करते हैं। साथ ही, ड्रोन निर्माण में इस्तेमाल होने वाली संवेदनशील तकनीक के निर्यात पर भी नियंत्रण और सख्ती बढ़ाई गई है।

यूरोपीय आयोग की उपाध्यक्ष और विदेश मामलों की प्रमुख काजा कल्लास ने इन सभी कदमों को रूस के खिलाफ सबसे सख्त कार्रवाई बताया। उन्होंने कहा, “हम क्रेमलिन के युद्ध बजट को कमजोर कर रहे हैं और रूस की सैन्य ताकत को सीमित करने की दिशा में बड़ा कदम उठा रहे हैं।”

यूरोपीय संघ ने रूस के खिलाफ नए और कड़े प्रतिबंधों की घोषणा की है। इस बार कई नए क्षेत्रों को निशाना बनाया गया है, जिनमें भारत से जुड़ी कुछ संस्थाएँ और जहाज भी शामिल हैं। यूरोपीय आयोग की उपाध्यक्ष काजा कल्लास ने कहा कि पहली बार, भारत में एक ध्वज रजिस्ट्री और सबसे बड़ी रोसनेफ्ट रिफाइनरी को इन प्रतिबंधों में शामिल किया गया है।

उन्होंने यह भी कहा कि ये प्रतिबंध उन लोगों को भी प्रभावित करेंगे जो यूक्रेनी बच्चों को गुमराह कर रहे हैं। कल्लास ने साफ कहा कि यूरोपीय संघ रूस के खिलाफ दबाव लगातार बढ़ाता रहेगा ताकि मॉस्को को अपनी आक्रामक नीतियाँ रोकनी पड़ें।

इस नए प्रतिबंध पैकेज में 20 और रूसी बैंकों को SWIFT प्रणाली से बाहर कर दिया गया है, जिससे उनकी अंतरराष्ट्रीय लेन-देन की क्षमता और सीमित हो जाएगी। हालाँकि यूरोपीय संघ ने सीधे उस रिफाइनरी का नाम नहीं लिया जो रूसी तेल का प्रोसेसिंग करती है।

लेकिन यह साफ हो गया है कि गुजरात के वडिनार में स्थित वडिनार तेल रिफाइनरी को निशाना बनाया गया है। यह रिफाइनरी पहले एस्सार ऑयल द्वारा बनाई गई थी और अब नायरा एनर्जी लिमिटेड द्वारा चलाई जा रही है, जिसमें रूसी कंपनी रोसनेफ्ट की 49.13% हिस्सेदारी है।

भारत की जिस ध्वज रजिस्ट्री पर प्रतिबंध लगाया गया है, वह उन जहाजों की सूची होती है जो भारतीय झंडे के नीचे पंजीकृत होते हैं। इस प्रतिबंध के जरिए यूरोपीय संघ को यह अधिकार मिल गया है कि वह ऐसे जहाजों के खिलाफ कार्रवाई कर सके जो रूस के तेल व्यापार में मदद कर रहे हैं।

ध्यान देने वाली बात यह है कि यूरोपीय संघ ने रूसी तेल की बिक्री पर पूरी तरह प्रतिबंध नहीं लगाया है, बल्कि यह तय किया है कि रूसी तेल को अब बाजार कीमत से 15% कम मूल्य पर ही बेचा जा सकेगा, ताकि रूस को मिलने वाली कमाई घटाई जा सके।

इन सब कदमों से यूरोपीय संघ रूस की आर्थिक और सैन्य ताकत को कमजोर करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। जिसके कारण भारत से जुड़े कुछ व्यापारिक रास्ते भी अब इस दबाव का हिस्सा बन चुके हैं।

नाम हिंदू, दिल से ईसाई… क्रिप्टो क्रिश्चियन्स पर फडणवीस सरकार ने कसा शिंकजा: गरीबों का हक बचाने के लिए बनेगा सख्त कानून, महाराष्ट्र विधान परिषद में हुआ ऐलान

महाराष्ट्र सरकार अब धर्मांतरण पर कानून लाने की तैयारी कर रही है। विधान परिषद में सीएम देवेन्द्र फडणवीस ने इसकी घोषणा की है। बहस के दौरान ये सामने आया कि लोग हिन्दू नहीं होते हुए भी हिन्दू जातियों के नाम पर जॉब, शिक्षा और दूसरी सरकारी सुविधा का फायदा उठा रहे हैं।

महाराष्ट्र विधान परिषद में एमएलसी अमित गोरखे के इस ओर ध्यान दिलाने पर सीएम देवेन्द्र फडणवीस ने धर्मांतरण पर सख्ती के संकेत दिए।

जातिगत आरक्षण का फायदा सिर्फ हिन्दू-बौद्ध और सिख को

उन्होंने कहा कि हिन्दू, बौद्ध और सिख के अनुसूचित जाति के लोगों को ही सिर्फ आरक्षण का फायदा मिलेगा। बाकी लोगों की ये सुविधा रद्द कर दी जाएगी।

राज्य में छिप कर धर्म परिवर्तन करने वाले ‘क्रिप्टो क्रिश्चियन’ पर सरकार कार्रवाई करेगी। ये लोग सरकारी कागजों में हिन्दू हैं लेकिन ईसाइयत को मानते हैं। इससे सही लोगों तक आरक्षण और सरकारी सुविधाओं का फायदा नहीं पहुँच पाता है।

सीएम फडणवीस के मुताबिक, “ये लोग आरक्षण का गलत फायदा उठाकर सरकारी नौकरी में हैं। यहाँ तक कि जो अनुसूचित जाति की सीट से चुनाव जीते हैं और पात्र नहीं हैं। उनकी जीत को अमान्य कर दिया जाएगा।”

मुखौटा हिन्दू का लगा कर उठाते हैं फायदा

महाराष्ट्र विधानपरिषद के सदस्य अमित गोरखे ने आरोप लगाया कि कई क्रिप्टो क्रिश्चियनअनुसूचित जाति- जनजाति, खानाबदोश और दूसरी जनजातियों से हैं। ये लोग चुपके से ईसाइयत अपना लेते हैं। उनके रीति-रिवाजों को मानते हैं लेकिन कागज में खुद को हिन्दू ही दिखाते हैं। इसके आधार पर जातिगत आरक्षण का लाभ लेते हैं। उनकी पहचान अक्सर अंतिम संस्कार के वक्त होती है।

राज्य में हिन्दू जनजातीय आबादी ज्यादातर सांगली, नंदुरबार और अहमदनगर जैसे क्षेत्रों में है। यहाँ जागरुकता के अभाव में ये लोग सरकारी सुविधाओं का लाभ नहीं उठा पाते हैं।

धर्मांतरण पर महाराष्ट्र में बनेगा कानून

विधान परिषद में सीएम देवेन्द्र फडणवीस ने कहा कि महाराष्ट्र में ‘क्रिप्टो क्रिश्चियन’ को सरकारी सुविधाओं का लाभ नहीं मिले, इसके लिए कानून लेकर आएगी। सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि सिर्फ तीन धर्मों के पिछड़े, दलित और जनजातीय समुदाय के लोगों को आरक्षण और दूसरी सरकारी सुविधाओं का लाभ मिलेगा।

इसके अलावा किसी को सरकारी सुविधाओं का लाभ नहीं मिलेगा। अगर किसी ने गलत तरीके से सरकारी नौकरी पाने की कोशिश की तो उस पर एक्शन होगा। जाति प्रमाण पत्र रद्द कर दिया जाएगा।

सीएम फडणवीस ने कहा कि राज्य में धर्मांतरण विरोधी विधेयक लाने पर सरकार विचार कर रही है। हालाँकि उन्होंने साफ किया कि अपनी इच्छा से धर्मांतरण करने वालों को सरकार नहीं रोकेगी।

झाँसा देकर शादी और फिर ईसाईयत के लिए दबाव

विधानपरिषद की सदस्य और बीजेपी नेता चित्रा वाघ ने एक घटना का जिक्र करते हुए कहा कि एक हिन्दू महिला की शादी धोखे से ऐसे व्यक्ति से कर दी गई जो छिप कर ईसाइयत को मानता था। उसके घरवालों ने महिला को हिन्दू धर्म छोड़ने के लिए दबाव बनाया। उसे प्रताड़ित किया जाने लगा। यहाँ तक कि 7 महीने की गर्भवती होने के बाद उसकी मौत हो गई।

इस पर सीएम फडणवीस ने कहा कि कोई भी व्यक्ति किसी भी धर्म का पालन कर सकता है लेकिन उसके साथ जबरदस्ती नहीं की जा सकती। सरकार राज्य में धर्मांतरण के लिए जबरदस्ती या लालच देने की शिकायतों की जाँच करेगी। इसमें जो भी संगठन जुड़ा होगा, उसके खिलाफ कार्रवाई करेगी।

सीएम ने कहा, ” “ऐसे मामलों में कानूनी कार्रवाई की जाएगी। कानून को और सख्त बनाने के लिए एक पैनल का गठन किया गया था। राज्य सरकार ऐसे मामलों से निपटने के लिए कड़े कानून बनाने का इरादा रखती है।”

कौन हैं क्रिप्टो क्रिश्चियन ?

क्रिप्टो क्रिश्चियन ऐसे लोग हैं जिनका नाम और पहचान हिन्दू, बौद्ध और सिख है, लेकिन छिप कर ये लोग ईसाइयत को मानते हैं। भारत में दिए गए जातिगत आरक्षण का लाभ उठाते हैं और सरकारी नौकरियाँ करते हैं। आरक्षित सीट से चुनाव लड़कर जीत जाते हैं। ये लोग ऐसे गरीब एससी-एसटी और दूसरी जातियों का हक मारते हैं जिन्हें आरक्षण की सख्त आवश्यकता है।

L&T ने HAL को सौंपा तेजस MK1A का पहला विंग असेंबली सेट, रक्षा सचिव बोले- आत्मनिर्भर भारत की दिशा में महत्वपूर्ण कदम: तेजी से तैयार होंगे इंडियन एयरफोर्स के फाइटर जेट

लार्सन एंड टुब्रो (L&T) ने हल्के लड़ाकू विमान (LCA) तेजस Mk1A के लिए तैयार किया गया पहला विंग असेंबली सेट हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) को सौंप दिया है। यह असेंबली तमिलनाडु के कोयंबटूर स्थित L&T की यूनिट में तैयार की गई और इसे गुरुवार (17 जुलाई 2025) को HAL के तेजस डिवीजन को दे दिया गया।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस मौके पर रक्षा उत्पादन विभाग के सचिव संजीव कुमार वर्चुअल तरीके से जुड़े थे। HAL की तरफ से महाप्रबंधक एम अब्दुल सलाम ने ये असेंबली ली। संजीव कुमार ने HAL और L&T की टीम की तारीफ की और कहा कि ये साझेदारी देश को रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने का बड़ा कदम है। उन्होंने ये भी जोर दिया कि ऐसी निजी कंपनियों के साथ और ज्यादा सहयोग बढ़ाना चाहिए। साथ ही, उन्होंने भरोसा जताया कि तेजस विमानों के उत्पादन के लक्ष्य को समय पर पूरा किया जाएगा।

HAL के CMD डीके सुनील ने इस सहयोग को दोनों कंपनियों की सालों की मेहनत का नतीजा बताया। उन्होंने कहा कि HAL बड़े और छोटे सभी सप्लायर्स के साथ मिलकर काम कर रहा है, ताकि भारत एयरोस्पेस और रक्षा क्षेत्र में खुद पर निर्भर हो सके।

L&T के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट अरुण रामचंदानी ने बताया कि अभी कंपनी हर साल 4 ऐसे विंग असेंबली सेट बनाएगी, लेकिन आगे चलकर इसे बढ़ाकर 12 सेट प्रति साल करने की प्लानिंग है। इसमें सबसे आधुनिक असेंबली तरीके और ऑटोमेटेड तकनीकें इस्तेमाल होंगी, जो काम को तेज और बेहतर बनाएँगी।

अब तक HAL के तेजस डिवीजन को कई प्राइवेट कंपनियों से महत्वपूर्ण पार्ट्स मिल चुके हैं। जैसे कि एयर इनटेक असेंबली लक्ष्मी मशीन वर्क्स से आई है, रियर फ्यूजलेज अल्फा टोकोल से, लूम असेंबली एम्फेनॉल से, फिन और रडर टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स से और सेंटर फ्यूजलेज वीईएम टेक्नोलॉजीज से मिली है।

L&T का ये विंग असेंबली सेट तेजस MK1A प्रोग्राम को नई स्पीड देगा। ये सब भारत की ‘मेक इन इंडिया’ पहल का हिस्सा है, जहाँ घरेलू कंपनियाँ मिलकर विदेशी निर्भरता कम कर रही हैं। तेजस MK1A भारतीय वायुसेना के लिए एक महत्वपूर्ण फाइटर जेट है, जो पुराने विमानों की जगह लेगा।

इस प्रोजेक्ट में HAL मुख्य कंपनी है, लेकिन L&T जैसी प्राइवेट फर्म्स का योगदान बढ़ रहा है। इससे न सिर्फ उत्पादन तेज होगा, बल्कि नौकरियाँ भी बढ़ेंगी और तकनीक का ट्रांसफर होगा। रक्षा मंत्रालय का कहना है कि ऐसे कदम से भारत रक्षा निर्यात भी बढ़ा सकता है।

PM मोदी और सरकार की कोशिशें ला रही रंग, दुनिया में आठवें नंबर पर पहुँचा भारत का टूरिज्म: फ्रांस-जर्मनी को छोड़ा पीछे, ₹19+ लाख करोड़ हुई कमाई

भारत ने विश्व पर्यटन की दुनिया में एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है। विश्व यात्रा और पर्यटन परिषद (डब्ल्यूटीटीसी) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, 2024-25 में भारत दुनिया की आठवीं सबसे बड़ी पर्यटन अर्थव्यवस्था बन गया है। देश की पर्यटन से होने वाली कमाई 231.6 अरब अमेरिकी डॉलर (लगभग 19.4 लाख करोड़ रुपये) तक पहुँच गई है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, पिछले साल भारत 10वें स्थान पर था, लेकिन इस बार दो पायदान की छलांग लगाकर जापान और फ्रांस जैसे देशों को पीछे छोड़ दिया। अमेरिका पहले स्थान पर है 2,360 अरब डॉलर के साथ, उसके बाद चीन, जर्मनी, जापान, ब्रिटेन, फ्रांस और मैक्सिको हैं। यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं है। इसके पीछे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारत सरकार की दूरदर्शी नीतियों, मेहनत और लगातार प्रयासों का बड़ा हाथ है।

पिछले एक दशक से पहले भारत की पर्यटन अर्थव्यवस्था की स्थिति ज्यादा मजबूत नहीं थी। 2013 में डब्ल्यूटीटीसी की रिपोर्ट के अनुसार, पर्यटन की विकास दर 6-7 प्रतिशत के आसपास थी, लेकिन वैश्विक रैंकिंग में भारत 24वें स्थान या उससे नीचे था। विदेशी पर्यटकों की संख्या 2013 में लगभग 6.97 मिलियन थी, जो 2019 तक बढ़कर 10.93 मिलियन हो गई। जीडीपी में योगदान 5-6 प्रतिशत था।

इन सबके पीछे कई समस्याएँ भी थीं, जैसे – एयरपोर्ट कम थे (2014 में सिर्फ 74), सड़कें खराब, होटल की कमी और जटिल वीजा प्रक्रिया।

इन सबके बीच 2020 में कोविड-19 महामारी ने पर्यटन उद्योग को और बड़ा झटका दिया। विदेशी पर्यटकों की संख्या घटकर 2.74 मिलियन रह गई, और जीडीपी में योगदान 4 प्रतिशत तक गिर गया। होटल, टूर ऑपरेटर, गाइड्स, और छोटे-मोटे दुकानदार सब परेशान थे। लेकिन इसके बाद जो हुआ, वह भारत की मेहनत और जज्बे की मिसाल है।

कोविड के बाद तेज रिकवरी हुई। 2023 में विदेशी पर्यटक 9.52 मिलियन पहुँच गए, जो 2019 के 87 प्रतिशत के बराबर था। घरेलू पर्यटन भी बढ़ा – 2023 में 2.5 अरब से ज्यादा घरेलू यात्राएँ हुईं। यह सब सरकार की नीतियों से हुआ।

दरअसल, यह सफलता सालों की मेहनत का परिणाम है। 2014 से पर्यटन को प्राथमिकता दी गई। बजट आवंटन 2014 में 500 करोड़ रुपये था, जो अब 2,400 करोड़ से ज्यादा हो गया है। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार द्वारा साल 2002 में चलाए गए ‘अतुल्य भारत’ अभियान को और मजबूत किया गया। सोशल मीडिया, फिल्मों और व्लॉग्स के जरिए प्रमोशन बढ़ा। ट्रैवल कंटेंट ने भारत को वैश्विक स्तर पर चमकाया।

इसके अलावा स्वदेश दर्शन योजना 2014-15 में शुरू हुई, जिसमें थीम-आधारित पर्यटन सर्किट विकसित किए गए, जैसे बौद्ध सर्किट, रामायण सर्किट, वन्यजीव सर्किट। लेकिन शुरुआत में यह कई राज्यों में फैली हुई थी, इसलिए प्रभाव कम पड़ा। 2022 में स्वदेश दर्शन 2.0 लॉन्च हुई, जो एक-एक जगह पर केंद्रित है। इसमें सतत पर्यटन पर जोर – पर्यावरण को नुकसान न पहुँचे, स्थानीय अर्थव्यवस्था मजबूत हो। पायलट प्रोजेक्ट में ओरछा (मध्य प्रदेश), गाँडीकोटा (आंध्र प्रदेश), बोधगया (बिहार) जैसी सात जगहें शामिल हैं।

एक और महत्वपूर्ण योजना है प्रसाद (तीर्थयात्रा पुनरुद्धार और आध्यात्मिक विरासत संवर्धन अभियान)। यह धार्मिक स्थलों को सुधारने के लिए है। जैसे – काशी विश्वनाथ कॉरिडोर, अयोध्या का विकास, केदारनाथ का पुनर्निर्माण। इनसे धार्मिक पर्यटन बढ़ा और रोजगार मिला। 2024 तक प्रसाद के तहत 73 परियोजनाओं पर काम हुआ, जिसमें 1,400 करोड़ रुपये खर्च हुए। बुनियादी ढाँचे में बदलाव जबरदस्त है।

साल 2014 से 2025 तक राष्ट्रीय राजमार्ग 91,000 किलोमीटर से बढ़कर 1.46 लाख किलोमीटर हो गए। रेल विद्युतीकरण 98 प्रतिशत पहुँच गया। बंदरगाह क्षमता दोगुनी हुई। उड़ान योजना से 88 एयरपोर्ट चालू हुए, छोटे शहरों में उड़ानें बढ़ीं। वंदे भारत ट्रेनों से आरामदायक और तेज यात्रा संभव हुई। होटलों में निवेश बढ़ा – 2024 में 3,295 करोड़ रुपये के 40 प्रोजेक्ट मंजूर हुए, 23 राज्यों में प्रतिष्ठित पर्यटन केंद्र बनाने के लिए।

वीजा नीति आसान हुई। ई-वीजा अब 167 देशों के लिए उपलब्ध है, ऑनलाइन आवेदन से विदेशी पर्यटक बढ़े। चिकित्सा पर्यटन को प्रोत्साहन – भारत की सस्ती और गुणवत्ता वाली चिकित्सा सुविधाएँ, जैसे आयुर्वेद और योग, ने लाखों विदेशी रोगियों को आकर्षित किया। 2024 में विदेशी पर्यटकों ने 3.10 लाख करोड़ रुपये खर्च किए, जो 2019 से ज्यादा है। सौंदर्यीकरण प्रयास भी बड़े हैं। स्वच्छ भारत अभियान से जगहें साफ हुईं – ताजमहल के आसपास सफाई, गंगा घाटों का सुधार। यूनेस्को विश्व धरोहर स्थलों की संख्या 43 हो गई, दुनिया में छठा स्थान। प्राकृतिक, सांस्कृतिक और एडवेंचर पर्यटन पर फोकस – हिमालय, समुद्र तट, वन्यजीव।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने व्यक्तिगत रूप से कई जगहों को बढ़ावा दिया। उनका मानना है कि पर्यटन से रोजगार बढ़ता है और संस्कृति फैलती है। 2024 में लक्षद्वीप का दौरा किया और सोशल मीडिया पर तस्वीरें-वीडियो साझा किए। कहा, “लक्षद्वीप की सुंदरता देखिए, यह मालदीव से कम नहीं।”

इसका प्रभाव? लक्षद्वीप में पर्यटकों की संख्या दोगुनी हो गई – 2023 में एक लाख से कम, 2024 में दो लाख से ज्यादा। उड़ानें 88 प्रतिशत बढ़ीं। एक्स पर उनके पोस्ट ने लाखों को आकर्षित किया।

काशी विश्वनाथ कॉरिडोर का उद्घाटन भी पीएम मोदी ने किया। इसका प्रभाव ये हुआ कि वाराणसी में पर्यटक 2014 के पाँच करोड़ से बढ़कर 2022 में 7.2 करोड़ हो गए। कॉरिडोर में 10 करोड़ विजिटर्स आए, दैनिक 1.5-2 लाख भक्त। होटल बुकिंग दोगुनी हुई।

गुजरात में स्टैच्यू ऑफ यूनिटी को दुनिया की सबसे ऊंची मूर्ति बताकर प्रमोट किया। अब वहाँ सालाना 50 लाख पर्यटक आते हैं, स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिली।

कश्मीर का प्रचार करते हुए पीएम मोदी ने अनुच्छेद 370 हटने के बाद कहा, “कश्मीर स्वर्ग है, घूमिए।” इसके बाद फिल्मों की शूटिंग बढ़ी, पर्यटक बढ़े। 2024 में कश्मीर में दो करोड़ से ज्यादा पर्यटक आए। मणिपुर, पूर्वोत्तर की जगहों को भी बढ़ावा दिया, जैसे लोकटक झील। अकेले पूर्वोत्तर में पर्यटन 30 प्रतिशत बढ़ गया।

पीएम मोदी और भारत सरकार ने विदेश यात्राओं में भी भारत को प्रमोट किया। जी20 शिखर सम्मेलन में दिल्ली और वाराणसी दिखाए। योग दिवस को वैश्विक बनाया, जो स्वास्थ्य पर्यटन बढ़ाता है। एक्स पर पोस्ट्स, जैसे क्रोएशिया, साइप्रस, कुवैत के दौरे भारत की जगहों से जोड़ते हैं।

चिकित्सा और सांस्कृतिक पर्यटन: भारत की सस्ती और गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा सुविधाएँ विदेशी पर्यटकों को खींच रही हैं। आयुर्वेद, योग, और मॉडर्न मेडिसिन ने भारत को मेडिकल टूरिज्म का हब बनाया। 2024 में लाखों विदेशी मरीज भारत आए। इसके अलावा, यूनेस्को विश्व धरोहर स्थलों की संख्या 43 हो गई, जो दुनिया में छठा स्थान है। प्राकृतिक सुंदरता (हिमालय, गोवा के समुद्र तट), सांस्कृतिक धरोहर (अजंता-एलोरा, ताजमहल), और एडवेंचर टूरिज्म (राफ्टिंग, ट्रेकिंग) ने भी पर्यटकों को आकर्षित किया।

कुल मिलाकर पीएम मोदी के प्रचार से घरेलू पर्यटन 95 प्रतिशत बढ़ा, जीडीपी में योगदान 6.6 प्रतिशत पहुँच गया, यानी 21 लाख करोड़ रुपये। 2024 में अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों का खर्च रिकॉर्ड 3.1 ट्रिलियन रुपये (36.8 अरब डॉलर) रहा, 2019 से नौ प्रतिशत ज्यादा। घरेलू खर्च 15.5 लाख करोड़ रुपये, 2019 से 22 प्रतिशत अधिक। डब्ल्यूटीटीसी का अनुमान है कि 2025 में यह 3.2 लाख करोड़ रुपये तक पहुँचेगा।

यह रिपोर्ट कोई आकस्मिक परिणाम नहीं है। 2014 से नीतिगत बदलाव – निजी निवेश को प्रोत्साहन, सार्वजनिक-निजी भागीदारी मॉडल। कोविड में टीकाकरण तेज किया, रिकवरी में मदद मिली। डब्ल्यूटीटीसी कहता है कि 2034 तक भारत दुनिया में चौथे नंबर पर पहुँच जाएगा। अर्थव्यवस्था में 42 लाख करोड़ रुपये का योगदान होगा और करीब 6.4 करोड़ नौकरियाँ सृजित होंगी।

भारत में पर्यटन के क्षेत्र में अब भी काफी चुनौतियाँ

डब्ल्यूटीटीसी की सीईओ जूलिया सिम्पसन कहती हैं, “भारत में सब कुछ है, लेकिन बेहतर प्रचार चाहिए।” ओवरटूरिज्म से बचना भी जरूरी है, जैसे गोवा में अक्सर ओवर-टूरिज्म की वजह से कई तरह की दिक्कतें सामने आने लगी हैं।

भविष्य में सरकार 2047 तक तीन ट्रिलियन डॉलर की पर्यटन अर्थव्यवस्था का लक्ष्य रखती है। डिजिटल पर्यटन – ऐप्स, वर्चुअल टूर्स। ग्रामीण पर्यटन से गाँवों में रोजगार बढ़ेगा। इसके लिए सरकार ने अभी से तैयारियाँ शुरू कर दी है। इसके लिए सरकार ने बजट 2025 में 20,000 करोड़ रुपये पर्यटन विकास के लिए आवंटित किया। वहीं, 23 राज्यों में 3,300 करोड़ की परियोजनाएँ चल रही हैं, जिसमें सड़कें, एयरपोर्ट, डिजिटल एकीकरण शामिल हैं।

भारत का टॉप 10 में पहुँचना कोई छोटी बात नहीं है। यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दूरदर्शिता, सरकार की नीतियों और स्थानीय लोगों की मेहनत का नतीजा है। पर्यटन सिर्फ पैसे की बात नहीं है; यह देश की संस्कृति, इतिहास, और विविधता को दुनिया तक ले जाने का जरिया है।

काशी के घाटों से लेकर लक्षद्वीप के समुद्र तटों तक भारत हर कोने में खूबसूरत है। अगर हम इसे सही तरीके से प्रमोट करें, पर्यावरण का ध्यान रखें और बुनियादी ढाँचे को और मजबूत करें, तो वह दिन दूर नहीं जब भारत दुनिया की टॉप 5 पर्यटन अर्थव्यवस्थाओं में शुमार होगा। यह क्षण हर भारतीय के लिए गर्व की बात है। आइए, अपने देश की इस खूबसूरती को और चमकाएँ और दुनिया को बुलाएँ – ‘आइए, भारत देखिए!’