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मॉनसून सत्र में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ पर होगी चर्चा, विपक्ष की माँग पर मोदी सरकार तैयार: 17 बिल लाने की है तैयारी, केन्द्रीय मंत्री रिजीजू बोले- संसद चलाना सरकार-विपक्ष दोनों की जिम्मेदारी

संसद का मानसून सत्र सोमवार (21 जुलाई 2025) से शुरू हो रहा है। केंद्र सरकार ने साफ कर दिया है कि वो ऑपरेशन सिंदूर जैसे बड़े मुद्दों पर खुलकर बहस करने को तैयार है। केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू ने रविवार (20 जुलाई 2025) को ऑल-पार्टी मीटिंग के बाद मीडिया से बात की।

किरेन रिजिजू ने कहा, “हम ऑपरेशन सिंदूर जैसे अहम मुद्दों पर संसद में चर्चा के लिए पूरी तरह तैयार हैं। सरकार और विपक्ष को मिलकर सदन को सुचारू रूप से चलाना चाहिए।” रिजिजू ने भरोसा दिलाया कि केंद्र किसी भी मुद्दे से नहीं भागेगा और संसद को सुगमता से चलाने के लिए प्रतिबद्ध है।

ऑल-पार्टी मीटिंग में 51 दलों के 54 सदस्य शामिल हुए। रिजिजू ने इसे सकारात्मक बताया और कहा कि एनडीए, यूपीए (इंडिया ब्लॉक) और निर्दलीयों ने अपने-अपने मुद्दे उठाए। सभी ने अलग-अलग टॉपिक्स पर बहस की माँग की, जिन्हें सरकार ने गंभीरता से लिया है।

रिजिजू ने कहा, “हमारी विचारधाराएँ अलग हो सकती हैं, लेकिन संसद को ठीक से चलाना सरकार और विपक्ष दोनों की जिम्मेदारी है।” उन्होंने ये भी कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हमेशा अहम मुद्दों पर संसद में मौजूद रहते हैं और रचनात्मक बहस को बढ़ावा देते हैं।

विपक्ष ने अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के सीजफायर दावों को उठाने की बात कही, जिस पर रिजिजू ने जवाब दिया कि सरकार बाहर नहीं, बल्कि संसद में सभी सवालों का जवाब देगी। उन्होंने कहा, “हम संसद में सही समय पर जवाब देंगे।” सरकार इस सत्र में 17 विधेयक पेश करने की तैयारी में है और हर सवाल का जवाब देने को तैयार है। रिजिजू ने कहा, “हम खुले मन से बहस के लिए तैयार हैं। संसदीय परंपराओं और नियमों का पूरा सम्मान करेंगे।”

जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ भी बड़ा कदम उठने वाला है। रिजिजू ने बताया कि 100 से ज्यादा सांसदों ने उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए हैं। सरकार इसे मौजूदा सत्र में पेश करेगी, लेकिन इसका समय अभी तय नहीं हुआ है। रिजिजू ने कहा, “हम जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाएँगे। सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं, टाइमलाइन बाद में बताएँगे।”

रिजिजू ने छोटे दलों के सांसदों को कम बोलने का समय मिलने की शिकायत पर भी ध्यान दिया। उन्होंने कहा कि सरकार इस मुद्दे को लोकसभा स्पीकर और राज्यसभा चेयरमैन के सामने उठाएगी। बिजनेस एडवाइजरी कमिटी (बीएसी) में इसे चर्चा के लिए लाया जाएगा ताकि सभी को उचित समय मिले।

कुल मिलाकर ये सत्र काफी गहमागहमी भरा होने वाला है। ऑपरेशन सिंदूर, ट्रंप के दावे और महाभियोग जैसे मुद्दे संसद में छाए रह सकते हैं। रिजिजू ने विपक्ष से सहयोग की अपील की है ताकि संसद की गरिमा बनी रहे। सरकार का जोर रचनात्मक बहस और सदन के सुचारू संचालन पर है।

उड़ने से पहले ही तो नहीं लग गई थी एअर इंडिया के प्लेन में आग, ‘गड़बड़ सेंसर’ पर अब जाँच का फोकस: ब्लैक बॉक्स का डाटा भी नहीं हो पाया डाउनलोड, पायलटों को दोषी बता रहा था मीडिया

अहमदाबाद में हादसे का शिकार हुए एअर इंडिया के 787 ड्रीमलाइनर के पीछे के हिस्से यानी ‘टेल’ में अन्दर आग के निशान मिले हैं। जाँच एजेंसी वायुयान दुर्घटना अन्वेषण ब्यूरो (AAIB) अब इस टेल वाले हिस्से की जाँच कर रही है। इसके अलावा जिन गड़बड़ियों को विमान के उड़ने से पहले रिकॉर्ड किया गया था, उन पर भी जाँच एजेंसी अब फोकस कर रही है। AAIB अभी तक यह बता पाई है कि एअर इंडिया का विमान फ्यूल कंट्रोल स्विच के बंद होने के चलते हादसे का शिकार हुआ।

क्या विमान के पीछे के हिस्से में लगी थी आग

इंडियन एक्सप्रेस में रविवार (20 जुलाई, 2025) को प्रकाशित एक रिपोर्ट में बताया गया है कि जाँचकर्ताओं को विमान के पीछे के हिस्से में एक छोटी आग लगने का संकेत मिला है। हालाँकि, यह आग फैली नहीं थी। रिपोर्ट में बताया गया है कि आग संभवतः कुछ ही पुर्जों तक सीमित थी। उन्हें यह पता इसलिए लग पाया है क्योंकि विमान का यह हिस्सा हादसे में क्षतिग्रस्त होने से बच गया। यह हिस्सा हॉस्टल की छत पर जाकर फंस गया जबकि बाकी हिस्सा हादसे के समय आग लगने के चलते जल गया।

विमान के पीछे के हिस्से को हादसे के कुछ दिन बाद उठा लिया गया था और इसके भीतर से जो भी पुर्जे निकले हैं, उन्हें अहमदाबाद में एक सुरक्षित स्थान पर रखा गया है। इंडियन एक्सप्रेस से जाँच में जुड़े एक अधिकारी ने बताया है कि इन पुर्जों में विमान के इलेक्ट्रिकल सिस्टम में हुई गड़बड़ के विषय में जरूरी सूचना हो सकती है। यह इलेक्ट्रिकल गड़बड़ विमान के टेक-ऑफ के समय हुई थी, यह भी सामने आया है।

इंडियन एक्सप्रेस से अधिकारी ने बताया, “इस बात की जाँच करनी पड़ेगी कि क्या विमान की पूँछ में लगी आग उड़ान के दौरान उसके किसी पुर्जे में आई खराबी के कारण लगी थी, जब विमान उड़ान भरने के लिए चलने लगा था, या फिर यह टक्कर के बाद लगी।” यह भी अधिकारी ने बताया कि आग इस दौरान फैली नहीं जबकि यह हिस्सा भी हॉस्टल स जा टकराया था। यह भी कहा गया है कि कहीं आग की ही बझ से तो विमान को आईएएस सिग्नल्स नहीं गए जिससे फ्यूल कंट्रोल स्विच गड़बड़ कर गए हों।

एक ब्लैक बॉक्स का डाटा भी नहीं निकला

AAIB की जाँच के दौरान विमान के दोनों ब्लैक बॉक्स तो बरामद हो गए हैं लेकिन उनमें से एक केवल ही से डाटा डाउनलोड हो सका है। यह डाटा पीछे के हिस्से में रखे जाने वाले ब्लैक बॉक्स से मिला है। रिपोर्ट में बताया गया है कि पीछे के हिस्से वाला ब्लैक बॉक्स क्षतिग्रस्त हुआ है और उससे डाटा अभी तक नहीं डाउनलोड किया जा सका है। यह भी सामने आया है कि जब पीछे के हिस्से को ब्लैक बॉक्स को डाटा डाउनलोड करने के लिए खोला गया तो उसका मेमोरी कार्ड जला हुआ मिला।

जिस ब्लैक बॉक्स से डाटा बरामद हुआ, उसमें हादसे वाली उड़ान समेत 6 फ्लाइट की जानकारी है। यह पूरा 49 घंटे का डाटा है। इसकी जाँच लगातार चल रही है। जिस ब्लैक बॉक्स से डाटा नहीं निकाला जा सका है, अब उसके लिए विशेषज्ञों की मदद ली जाएगी क्योंकि हादसे की वजह पता चलने में वह भी अहम रोल निभा सकता है। दोनों ब्लैक बॉक्स में अलग-अलग डाटा होता है, ऐसे में हादसे के बारे में कोई महत्वपूर्ण जानकारी उसमें छुपी हो सकती है, जिसका डाटा डाउनलोड नहीं हो सका है।

विमान के उड़ान से पहले मिली थी गड़बड़

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में बताया गया है कि हादसे का शिकार होने वाले विमान के पिछले हिस्से में लगे एक सेंसर में गड़बड़ी पायलट ने दर्ज की थी। यह गड़बड़ी दिल्ली से अहमदाबाद जाने के दौरान दर्ज की गई थी और इसे एअर इंडिया के इंजीनियरों ने सुधार दिया था। हालाँकि, पिछले हिस्से में लगी आग का रोल इस सेंसर को लेकर क्या था, यह अब जाँच की जा रही है। फ्लाइट के सेंसर गड़बड़ होना हादसे का कारण बन सकता है।

मामले से जुड़े अधिकारी ने कहा कि विमान के हवा में उड़ने से पहले इलेक्ट्रिकल गड़बड़ी उड़ान सेंसरों में दिक्कत कर सकती है और इससे विमान के ECU (इंजन नियंत्रण इकाई) को गलत डेटा मिल सकता है। अधिकारी ने कहा कि इसके फलस्वरूप इंजन को तेल की सप्लाई भी बंद हो सकती है। इस रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि विमान को ज्यादा पॉवर देने के लिए APU (औक्सिलरी पॉवर यूनिट) भी चालू किया था। विमान के APU (औक्सिलरी पॉवर यूनिट) को भी बरामद करके जाँच की जा रही है।

मीडिया ने चलाई पायलट के दोष वाली थ्योरी

जहाँ यह हालिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि ना अभी AAIB को दूसरे ब्लैक बॉक्स का डाटा मिला है और ना ही जाँच पूरी हुई है वहीं विदेशी मीडिया संस्थानों ने लगातार पायलटों की गलती वाली थ्योरी चलाई थी। उनकी इस रिपोर्ट्स को अमेरिका के ट्रांसपोर्ट विभाग NTSB ने इन रिपोर्ट्स को नकारा है। हालाँकि, WSJ जैसे संस्थानों ने लगातार कैप्टन सुमीत सभरवाल को दोषी ठहराया था। इस पर उन्हें भारतीय पायलट फेडरेशन (FIP) ने नोटिस भेजा है।

राहुल गाँधी ने वैचारिक दिवालियेपन में RSS-वामपंथियों की कर दी तुलना, INDI गठबंधन में पड़ गई दरार: बिहार चुनाव से पहले कॉन्ग्रेस डुबाने को आतुर हैं कन्फ्यूज आइडियोलॉजी वाले युवराज

बिहार में विधानसभा चुनाव की सुगबुगाहट शुरू होते ही सियासी हलचल तेज हो गई है। लेकिन इस बार चर्चा का केंद्र कोई नीतिगत मुद्दा या विकास का एजेंडा नहीं, बल्कि कॉन्ग्रेस सांसद और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गाँधी का एक बयान है।

केरल के कोट्टायम में एक कार्यक्रम में राहुल ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) यानी CPM को एक ही तराजू में तौलते हुए कहा, “मैं RSS और CPM दोनों से वैचारिक रूप से लड़ता हूँ। मेरी सबसे बड़ी शिकायत यह है कि इन दोनों में लोगों के लिए भावनाएँ नहीं हैं।” इस बयान ने न सिर्फ सत्तारूढ़ बीजेपी को हमला करने का मौका दिया, बल्कि इंडी गठबंधन के सहयोगी वामपंथी दलों को भी नाराज कर दिया।

यह बयान बिहार जैसे संवेदनशील राज्य में… जहाँ वामपंथी पार्टियाँ इंडी गठबंधन का हिस्सा हैं, एक बड़े सियासी तूफान का कारण बन सकता है। इस लेख में हम राहुल गाँधी के इस बयान के बिहार में इंडी गठबंधन पर प्रभाव, उनकी वैचारिक उलझन और भारतीय राजनीति में विचारधाराओं के टकराव को समझने की कोशिश करेंगे। साथ ही यह भी देखेंगे कि राहुल गाँधी की राजनीतिक सोच आखिर है क्या और क्यों वह बार-बार ऐसी स्थिति में फँस जाते हैं, जहाँ उनकी अपनी पॉलिटिकल अप्रोच को ही नुकसान पहुँचता है।

सोचने की बात तो ये भी है कि आखिर वो क्या वजह है कि राहुल गाँधी अक्सर वैचारिक सोच के मुद्दे पर मतिभ्रम का शिकार हो जाते हैं और ऐसी उल-जलूल हरकत कर बैठते हैं कि उन्हें पूरे देश में कोई गंभीरता से नहीं लेता… बस, राजनीतिक कार्यकर्ताओं को छोड़ दें तो, क्योंकि वो पार्टी चीफ अगर गधा है, तब भी उसे ‘सुप्रीम हाई कमान’ ही मानते हैं। फिर चाहे वो 52 साल का युवा हो, या 10वीं फेल ‘उत्तराधिकारी’…

भारतीय राजनीति में विचारधाराओं का बारीक विभाजन

भारतीय राजनीति को समझने के लिए पहले हमें विचारधाराओं का मूल ढांचा समझना होगा। दुनिया भर में और खास तौर पर भारत में, राजनीति मुख्य रूप से दो धुरियों पर टिकी होती है: दक्षिणपंथ और वामपंथ। इसके अलावा तीसरा रास्ता है मध्यमार्गी या समाजवादी विचारधारा, जो दोनों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करती है। और चौथी धारा है पॉपुलिस्ट या अवसरवादी, जो जाति, धर्म, क्षेत्र जैसे मुद्दों पर आधारित होती है। आइए, पहले तो यही बात समझते हैं-

  1. दक्षिणपंथ (Right-Wing): यह विचारधारा राष्ट्रीयता, सांस्कृतिक गौरव और परंपराओं को बढ़ावा देती है। भारत में बीजेपी, शिवसेना जैसी पार्टियाँ और RSS जैसे राष्ट्रवादी संगठन इस विचारधारा के प्रमुख प्रतीक हैं। ये दल राष्ट्रवाद, आर्थिक उदारीकरण और मजबूत केंद्रीकृत शासन की वकालत करते हैं। हालाँकि शिवसेना जैसी पार्टियाँ अतीत में दक्षिणपंथी भले ही रही हों, लेकिन वो स्थान विशेष, राज्य विशेष, भाषा विशेष जैसे एजेंडे में बंधकर भी खुद को सीमित करती रही हैं। फिर भी, ये आम तौर पर दक्षिणपंथी अंब्रेला संगठनों में गिने जाते रहे हैं।
  2. वामपंथ (Left-Wing): वामपंथी विचारधारा सामाजिक समानता, मजदूरों और किसानों के अधिकार और धर्मनिरपेक्षता पर जोर देती है। भारत में CPM, CPI और CPIML जैसे दल इस विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते हैं। ये दल पूंजीवाद और साम्राज्यवाद के खिलाफ हैं और समाजवादी ढाँचे की वकालत करते हैं। इनके कई सहयोगी चरमपंथी भी रहे हैं और वो सशस्त विद्रोह का रास्ता अपना कर देश विरोधी कार्यों में लगे हुए हैं। प्रतिबंधित माओवादी-नक्सलवादी संगठन इसके उदाहरण हैं।
  3. मध्यमार्गी या समाजवादी (Centrist/Socialist): यह विचारधारा दक्षिणपंथ और वामपंथ के बीच संतुलन बनाती है। भारत में कॉन्ग्रेस पार्टी ने ऐतिहासिक रूप से इस मध्यमार्गी रास्ते को अपनाया है, जिसमें धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक कल्याण और आर्थिक सुधारों का मिश्रण शामिल है। एनसीपी जैसी पार्टियाँ, जिनके नेता कॉन्ग्रेस से ही निकले रहे हैं, वो भी इसी मार्ग पर चलने के लिए जानी जाती हैं, हालाँकि एनसीपी जैसी पार्टियाँ पूँजीवाद की समर्थक रही हैं।
  4. पॉपुलिस्ट या अवसरवादी: यह धारा किसी ठोस विचारधारा पर नहीं टिकी होती। यह जाति, धर्म, क्षेत्रीय अस्मिता जैसे मुद्दों पर आधारित होती है और तात्कालिक लाभ के लिए नीतियाँ बनाती है। भारत में कई क्षेत्रीय दल जैसे DMK, RJD, SP, BSP और कुछ हद तक AAP इस श्रेणी में आते हैं।

कॉन्ग्रेस पार्टी अपनी स्थापना से लेकर अब तक मध्यमार्गी और पॉपुलिस्ट विचारधारा का मिश्रण रही है। यह कभी समाजवादी नीतियों (जैसे इंदिरा गाँधी के दौर में राष्ट्रीयकरण) तो कभी आर्थिक उदारीकरण (1991 के सुधार) की वकालत करती रही है। लेकिन राहुल गाँधी की व्यक्तिगत विचारधारा इस मिश्रण को और जटिल बनाती है, क्योंकि वह न तो पूरी तरह समाजवादी हैं, न दक्षिणपंथी और न ही वामपंथी। उनकी सोच एक ऐसी उलझन में फँसी है, जो बार-बार उनके बयानों में झलकती है।

राहुल गाँधी का वैचारिक भटकाव

राहुल गाँधी की राजनीति को समझना आसान नहीं है, क्योंकि उनकी कोई स्पष्ट वैचारिक लाइन नहीं दिखती। वह एक तरफ RSS और बीजेपी को निशाना बनाते हैं, दूसरी तरफ अपने ही गठबंधन के सहयोगियों जैसे वामपंथी दलों को उसी श्रेणी में रख देते हैं। यह बयानबाजी उनकी वैचारिक अस्पष्टता को उजागर करती है। आइए, इसे कुछ बिंदुओं के जरिए समझें-

RSS और CPM की तुलना: राहुल गाँधी का यह कहना कि RSS और CPM में लोगों के प्रति भावनाओं की कमी है, न सिर्फ तथ्यात्मक रूप से गलत है, बल्कि सियासी तौर पर भी आत्मघाती है। RSS और CPM की विचारधाराएँ ध्रुवीय रूप से विपरीत हैं। RSS जहाँ हिंदू राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक एकरूपता की बात करता है, वहीं CPM की कम्युनिष्ट विचारधारा मूल रूप से भारत भूमि की है ही नहीं। ये आर्थिक बराबरी और धर्म विरोध की वकालत करता है। हालाँकि भारत में ये इस्लामी तुष्टिकरण में शामिल रहता है।

दोनों को एक ही खाँचे में रखना न सिर्फ वैचारिक अज्ञानता को दर्शाता है, बल्कि गठबंधन की एकता को भी कमजोर करता है। केरल में कम्युनिष्टों और संघ में लंबा संघर्ष चला है और सहयोगी होने के नाते राहुल का बयान वामपंथियों के लिए बेहद अपमानजनक है।

AI जनित प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो साभार: Dall-E)

केरल और बिहार का विरोधाभास: केरल में कॉन्ग्रेस और CPM प्रतिद्वंद्वी हैं। वहाँ कॉन्ग्रेस UDF (यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट) का नेतृत्व करती है, जबकि CPM LDF (लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट) की अगुवाई करता है। लेकिन बिहार में दोनों इंडी गठबंधन में साथ हैं। राहुल का केरल में दिया गया बयान बिहार के संदर्भ में गलत संदेश देता है, जहाँ वामपंथी पार्टियों का ग्रामीण इलाकों में प्रभाव है। यह बयान गठबंधन के कार्यकर्ताओं में भ्रम पैदा कर सकता है और वोटों के बँटवारे का खतरा बढ़ा सकता है।

पॉपुलिस्ट बयानबाजी: राहुल गाँधी की बयानबाजी अक्सर पॉपुलिस्ट होती है, जिसमें वह बड़े-बड़े दावे करते हैं, लेकिन उनमें ठोस वैचारिक आधार नहीं होता। उदाहरण के लिए – राहुल गाँधी “नफरत के बाजार में मोहब्बत की दुकान” की बात करते हैं, लेकिन यह नारा भावनात्मक होने के बावजूद कोई स्पष्ट नीतिगत दिशा नहीं देता। उनकी यह सोच कि “लोगों की भावनाएँ” ही नेतृत्व का आधार हैं, राजनीति को एक सतही स्तर पर ले जाती है, जहाँ ठोस नीतियों और योजनाओं की जगह भावनात्मक नारे ले लेते हैं।

गठबंधन के साथ अवसरवाद: राहुल गाँधी और कॉन्ग्रेस का गठबंधन रणनीति भी उनकी वैचारिक उलझन को दर्शाती है। महाराष्ट्र में वह शिवसेना (UBT) के साथ गठबंधन में हैं, जो कभी बीजेपी की सहयोगी थी और अब भी कई मायनों में दक्षिणपंथी विचारधारा से प्रेरित है। वहीं बिहार में वह RJD और वामपंथी दलों के साथ हैं, जो समाजवादी और वामपंथी विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते हैं। पश्चिम बंगाल में कॉन्ग्रेस ने पहले CPM के साथ गठबंधन किया, फिर तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के खिलाफ लड़ा। यह अवसरवादी रवैया उनकी वैचारिक अस्पष्टता को और उजागर करता है।

बिहार में इंडी गठबंधन पर प्रभाव

बिहार में विधानसभा चुनाव 2025 में होने वाले हैं और यह चुनाव इंडी गठबंधन के लिए एक बड़ा इम्तिहान है। बिहार में गठबंधन में RJD, कॉन्ग्रेस और वामपंथी दलों (CPI, CPM, CPIML) के साथ कई छोटे-मोटे जातीय-क्षेत्रीय दल शामिल हैं। लेकिन राहुल गाँधी के बयान ने गठबंधन की एकता पर सवाल उठा दिए हैं। आइए- इसके प्रभावों को विस्तार से समझते हैं…

वामपंथी दलों की नाराजगी: CPM और CPI के नेताओं ने राहुल के बयान की कड़ी आलोचना की है। CPM महासचिव एम.ए. बेबी ने इसे ‘दुर्भाग्यपूर्ण’ बताया और कहा कि यह बयान केरल और भारत की राजनीतिक वास्तविकताओं की समझ की कमी को दर्शाता है।

CPI नेता डी. राजा ने भी गठबंधन की वर्चुअल बैठक में इस मुद्दे को उठाया और कहा कि ऐसी टिप्पणियाँ कार्यकर्ताओं में भ्रम पैदा करती हैं। बिहार में वामपंथी दलों का वोट बैंक भले ही सीमित हो, लेकिन ग्रामीण इलाकों, खासकर सीमांचल और मगध क्षेत्र में, उनकी संगठनात्मक ताकत अहम है। अगर यह नाराजगी बढ़ती है, तो गठबंधन के लिए सीट-बँटवारे और संयुक्त रणनीति में मुश्किलें आ सकती हैं।

कार्यकर्ताओं में भ्रम: बिहार में गठबंधन के कार्यकर्ताओं के बीच पहले से ही समन्वय की कमी रही है। RJD और कॉन्ग्रेस के कार्यकर्ता अक्सर एक-दूसरे के खिलाफ काम करते देखे गए हैं। अब राहुल के बयान से वामपंथी कार्यकर्ताओं में भी असंतोष फैल सकता है। यह जमीनी स्तर पर गठबंधन की एकजुटता को कमजोर कर सकता है, जिसका फायदा NDA को मिल सकता है।

AAP की दूरी और गठबंधन की कमजोरी: आम आदमी पार्टी (AAP) पहले ही इंडी गठबंधन से बाहर हो चुकी है। इससे गठबंधन पहले से ही कमजोर स्थिति में है। अब अगर वामपंथी दल भी दूरी बनाते हैं, तो बिहार में गठबंधन की संभावनाएँ और कम हो जाएंगी। बिहार में RJD और कॉन्ग्रेस की ताकत सीमित है और वामपंथी दलों की संगठनात्मक क्षमता गठबंधन के लिए महत्वपूर्ण है।

BJP को हमला करने का मौका: राहुल के बयान ने बीजेपी को एक नया हथियार दे दिया है। बीजेपी पहले से ही राहुल को ‘अपरिपक्व’ और ‘वैचारिक रूप से खाली’ बताती रही है। अब वह इस बयान का इस्तेमाल करके यह साबित करने की कोशिश करेगी कि राहुल न तो अपने सहयोगियों को संभाल सकते हैं और न ही एक मजबूत विपक्षी नेतृत्व दे सकते हैं। खैर, ये अब कहने की भी जरूरत नहीं है, क्योंकि राहुल गाँधी अपनी हरकतों से ये बात बार-बार साबित भी कर रहे हैं।

राहुल गाँधी की वैचारिक उलझन की पड़ताल

राहुल गाँधी की वैचारिक अस्पष्टता कोई नई बात नहीं है। उनकी राजनीति में कई बार ऐसे बयान और कदम देखे गए हैं, जो उनकी समझ और रणनीति पर सवाल उठाते हैं। आइए, इसे कुछ उदाहरणों के जरिए समझते हैं-

संस्थानों पर हमला: राहुल गाँधी ने कई बार कहा है कि वह न सिर्फ बीजेपी और RSS से लड़ रहे हैं, बल्कि ‘भारतीय राज्य‘ (Indian State) से भी लड़ रहे हैं। यह बयान उनकी समझ की कमी को दर्शाता है। भारतीय राज्य यानी संवैधानिक संस्थाएँ जैसे चुनाव आयोग, न्यायपालिका और प्रशासन, लोकतंत्र का आधार हैं। इन्हें सीधे निशाना बनाना न सिर्फ खतरनाक है, बल्कि यह भी दिखाता है कि राहुल की सोच में स्पष्टता का अभाव है।

आर्थिक नीतियों में भटकाव: राहुल एक तरफ पूँजीपतियों जैसे अंबानी और अडानी पर हमला करते हैं, लेकिन उनकी पार्टी की सरकारें (जैसे तेलंगाना में) इन्हीं पूँजीपतियों के साथ बड़े सौदे करती हैं। यह दोहरा रवैया उनकी आर्थिक सोच की उलझन को दर्शाता है। वह न तो पूरी तरह समाजवादी हैं और न ही उदारीकरण के समर्थक। क्योंकि एक तरफ वो देश में इंडस्ट्री की बात करते हैं, चीनी सामानों पर बोलते हैं, तो दूसरी तरफ वो गिग वर्कर्स के पास पहुँचते हैं। कभी खलासी बन जाते हैं, कभी किसान तो कभी मैकेनिक।

जाति और सामाजिक मुद्दों पर अस्पष्टता: राहुल गाँधी जातिगत जनगणना की वकालत करते हैं, लेकिन उनकी पार्टी की कर्नाटक सरकार इस मुद्दे पर टालमटोल करती रही है। यह दिखाता है कि उनकी बातें और कदम एक-दूसरे से मेल नहीं खाते। फिर, कॉन्ग्रेस ने सत्ता में रहते हुए जो जनगणना कराई थी, जिसमें जाति आधारित डाटा भी अलग से सर्वे के तौर पर जुटाया गया था, लेकिन उसे सार्वजनिक ही नहीं किया गया।

वैचारिक विरोधियों की पहचान में फेल: राहुल की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह अपने वैचारिक विरोधियों को ठीक से परिभाषित नहीं कर पाते। वह एक तरफ RSS जैसे स्वदेशीय राष्ट्रवादी संगठनों को निशाना बनाते हैं, दूसरी तरफ अंतर्राष्ट्रीय विचारधारा आधारिक वामपंथियों को भी उसी श्रेणी में रख देते हैं। यह न सिर्फ गठबंधन की एकता को नुकसान पहुँचाता है, बल्कि उनकी विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाता है।

बिहार में इंडी गठबंधन की चुनौतियाँ

बिहार में 2025 के विधानसभा चुनाव से पहले इंडी गठबंधन कई चुनौतियों का सामना कर रहा है। 2020 के चुनाव में गठबंधन का प्रदर्शन निराशाजनक रहा था, जब RJD, कॉन्ग्रेस और वामपंथी दलों ने मिलकर भी NDA को सत्ता से हटा नहीं पाए। इस बार भी कई मुश्किलें सामने हैं, खासकर राहुल गाँधी के हालिया बयान के बाद, जिसने गठबंधन की एकता पर सवाल उठा दिए हैं।

सीट बँटवारे को लेकर बढ़ेगा तनाव: बिहार में गठबंधन के भीतर सीट बंटवारा हमेशा से एक विवादास्पद मुद्दा रहा है। इंडी गठबंधन का सबसे बड़ा दल RJD अधिकांश सीटों पर दावा करता है। 2020 में कॉन्ग्रेस को 70 सीटें मिली थीं, लेकिन उसका प्रदर्शन कमजोर रहा, जिससे RJD और अन्य सहयोगी नाराज हुए।

इस बार वामपंथी दलों (CPI, CPM, CPIML) की माँग है कि उन्हें उनकी संगठनात्मक ताकत के आधार पर अधिक सीटें दी जाएँ। राहुल गाँधी के CPM और RSS को एक समान बताने वाले बयान ने वामपंथी दलों में नाराजगी पैदा की है, जिससे सीट बँटवारे की बातचीत और जटिल हो सकती है। अगर वामपंथी दल गठबंधन से अलग होने का फैसला करते हैं, तो यह गठबंधन की रणनीति को बड़ा झटका देगा।

बिहार के गठबंध में RJD का दबदबा: बिहार में RJD गठबंधन का नेतृत्व करता है और तेजस्वी यादव की लोकप्रियता और संगठनात्मक क्षमता इसे मजबूत बनाती है। लेकिन कॉन्ग्रेस की सीमित लोकप्रियता और राहुल के बयानों से उत्पन्न तनाव RJD के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकते हैं। RJD चाहता है कि गठबंधन में एकजुटता बनी रहे, लेकिन वामपंथी दलों की नाराजगी और कॉन्ग्रेस की कमजोर स्थिति इसे मुश्किल बना रही है।

NDA की मजबूत स्थिति: बीजेपी और जेडीयू की अगुवाई वाली NDA बिहार में मजबूत स्थिति में है। नीतीश कुमार की प्रशासनिक क्षमता और बीजेपी की संगठनात्मक ताकत गठबंधन के लिए बड़ी चुनौती है। नीतीश की सामाजिक समीकरणों को साधने की क्षमता और बीजेपी का हिंदुत्व कार्ड विपक्ष के लिए मुश्किलें पैदा करता है। राहुल का बयान गठबंधन की एकता को कमजोर करता है, जिससे NDA को और मजबूती मिल सकती है।

वोटों का बँटवारा: बिहार में वामपंथी दलों का वोट बैंक भले ही सीमित हो, लेकिन सीमांचल और मगध जैसे क्षेत्रों में उनकी गहरी पैठ है। अगर राहुल के बयान से वामपंथी कार्यकर्ताओं में असंतोष बढ़ता है या वे गठबंधन से अलग होते हैं, तो विपक्षी वोटों का बँटवारा तय है। यह NDA के लिए फायदेमंद होगा, क्योंकि विपक्ष का बिखरा वोट उनकी जीत को आसान बना सकता है।

बिहार में कॉन्ग्रेस का बेड़ा गर्क करेंगे राहुल गाँधी

राहुल गाँधी का ताजा बयान उनकी वैचारिक अस्पष्टता और सियासी अपरिपक्वता को उजागर करता है। उनकी सोच में स्पष्टता का अभाव न सिर्फ उनकी व्यक्तिगत छवि को नुकसान पहुँचाता है, बल्कि इंडी गठबंधन की एकता को भी कमजोर करता है। बिहार जैसे महत्वपूर्ण राज्य में, जहाँ गठबंधन को पहले से ही कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, यह बयान एक बड़ा झटका साबित हो सकता है।

राहुल गाँधी को अगर विपक्ष का नेतृत्व करना है, तो उन्हें अपनी वैचारिक स्थिति स्पष्ट करनी होगी। उन्हें यह तय करना होगा कि वह किस विचारधारा के साथ खड़े हैं और किसके खिलाफ। बिना किसी ठोस वैचारिक आधार के उनकी बयानबाजी केवल भ्रम और विवाद पैदा करती है। बिहार चुनाव में अगर इंडी गठबंधन को सफल होना है, तो उसे एकजुट होकर एक स्पष्ट रणनीति के साथ मैदान में उतरना होगा। लेकिन राहुल के बयानों से यह एकजुटता खतरे में पड़ रही है।

कुल मिलाकर राहुल गाँधी का बयान गठबंधन की पहले से ही नाजुक स्थिति को और कमजोर कर रहा है। अगर गठबंधन को बिहार में NDA को टक्कर देनी है, तो उसे तुरंत आपसी मतभेदों को सुलझाना होगा और एकजुट रणनीति बनानी होगी। आने वाले दिन यह तय करेंगे कि क्या गठबंधन इस संकट से उबर पाएगा, या राहुल गाँधी का वैचारिक भटकाव बिहार में विपक्ष की हार का कारण बनेगा।

AMU में तिलक लगाने पर हिन्दू कर्मचारी को प्रताड़ित कर रहा समीर खान, इन्क्रीमेंट-प्रमोशन रोका… हत्या की धमकी भी दी: आशीष शर्मा ने कहा- नौकरी छोड़ने का बनाया जा रहा दबाव

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) के जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज में एक हिंदू कर्मचारी ने मुस्लिम फाइनेंस ऑफिसर पर धार्मिक उत्पीड़न का आरोप लगाया है। आशीष शर्मा नाम के इस कर्मचारी का कहना है कि उन्हें तिलक लगाने के कारण परेशान किया जा रहा है।

आशीष शर्मा कॉलेज के परचेज सेक्शन में काम करते हैं। उन्होंने असिस्टेंट फाइनेंस ऑफिसर समीर मुर्सिल खान पर आरोप लगाया है कि खान उन्हें एक साल से धार्मिक आधार पर परेशान कर रहे हैं। आशीष शर्मा के मुताबिक, समीर मुर्सिल खान उन्हें तिलक लगाने पर ताना मारते हैं।

शर्मा ने मीडिया को बताया, “समीर मुर्सिल खान मुझे एक साल से परेशान कर रहा है। कभी कहते हैं ‘वापस जाओ’ और कभी दूसरों के सामने पूछते हैं ‘ये तिलक वाला कौन है?’ समीर मुर्सिल खान यह भी कहते हैं कि तिलक हर दिन बड़ा होता जा रहा है।” आशीष शर्मा ने यह भी कहा कि समीर मुर्सिल खान उनके ऑफिस के काम में बेवजह दखल देते हैं।

जान का डर और धमकी

आशीष शर्मा ने बताया कि खान उन्हें धमकी देकर कहते हैं कि तुम मेरे बैकग्राउंड नहीं जानते। मुझे हल्के में मत लेना, मेरे अब्बू कॉलेज के प्रेसिडेंट रह चुके हैं। आशीष शर्मा ने आगे बताया कि जब भी वे खान के ऑफिस कोई पार्सल देने जाते हैं तो उन्हें अंदर नहीं जाने दिया जाता।

आशीष शर्मा ने बताया कि उन्हें जान जाने का डर है और परिवार भी डरा हुआ है। नौकरी से निकालने का दवाब भी बनाया जा रहा है।

शिकायत और कार्रवाई की माँग

आशीष शर्मा पिछले 7 साल से कॉलेज में पढ़ा रहे हैं। उन्होंने कहा कि धार्मिक भेदभाव के कारण उन्हें सैलरी इंक्रीमेंट और प्रमोशन नहीं मिल रहा है। इसके अलावा उन पर कई तरह की पाबंदियाँ भी लगाई गई है।

आशीष शर्मा ने अपनी धार्मिक स्वतंत्रता का हवाला देते हुए यूनिवर्सिटी के वाइस-चांसलर और रजिस्ट्रार से शिकायत की है। आशीष शर्मा ने कहा कि जरूरत पड़ने पर वे स्थानीय सांसद से भी इस मामले पर बात करेंगे।

कॉलेज के कुछ छात्र नेताओं ने आशीष शर्मा का समर्थन किया है। AMU के प्रॉक्टर प्रोफेसर वसीम अली ने पुष्टि करते हुए कहा कि उन्हें आशीष शर्मा की शिकायत मिली है। प्रोफेसर वसीम अली का कहना है कि दोनों पक्षों को सुनने के बाद मामले को सुलझाया जाएगा।

‘शिवाजी महाराज ने बंगाल पर किया था हमला’: राजदीप सरदेसाई ने पहले बोला झूठ, पोल खुलने पर माफी माँगने की जगह दिया बेशर्मी भरा ‘करेक्शन’… लेकिन मुगलों की तरफदारी में नहीं की कोई कमी

पत्रकारिता के नाम पर प्रोपेगेंडा फैलाने वाले राजदीप सरदेसाई ने एक बार फिर इतिहास से छेड़छाड़ की है। हाल ही में राजदीप सरदेसाई ने एक पोस्ट में कहा कि छत्रपति शिवाजी महाराज ने पश्चिम बंगाल पर हमला किया था। यह बयान तब आया जब केंद्र सरकार ने NCERT की किताबों में मुगल शासकों की क्रूरता को उजागर करने के लिए कुछ बदलाव किए।

लेकिन राजदीप सरदेसाई को यह सब सहन नहीं हुआ और उन्होंने मुगलों की पैरवी करते हुए छत्रपति शिवाजी महाराज पर विवादित बयान दिया। प्रोपेंगेडा पत्रकार ने अपने शो ‘डेमोक्रेटिक न्यूज़रूम’ पर ना केवल मुगलों का बचाव किया, बल्कि शिवाजी महाराज को ‘डाकू’ कहा और उनकी सेना ने बंगाल पर हमला कर तबाही मचाने की बता कहीं।

फिर क्या… लोगों ने प्रोपेगेंडा फैलाने वाले पत्रकार को घेरा और इस विवादित बयान का विरोध किया। इसके बाद जनाब सरदेसाई ने X (पहले ट्वीटर) पर पोस्ट में ‘करेक्शन’ चिपका दिया। ‘करेक्शन’ में लिखा कि ‘अरे नहीं, बंगाल नहीं, छत्रपति शिवाजी महाराज ने सूरत पर हमला किया था।’ लेकिन प्रोपेगेंडा पत्रकार ने अपनी गलती नहीं मानी, बस हमले की जगह बंगाल से सूरत कर दी।

राजदीप सरदेसाई ने पहले क्या कहा?

प्रोपेगेंडा पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने अपने एक कार्यक्रम ‘डेमोक्रेटिक न्यूज़रूम’ में यह आरोप लगाया था कि छत्रपति शिवाजी महाराज ने बंगाल पर हमला किया था और उनकी सेना ने वहाँ खूब लूटपाट की थी।

राजदीप सरदेसाई ने यह बात मुगलों के अत्याचारों को कम दिखाने और शिवाजी महाराज को मुगलों से क्रूर दिखाने की कोशिश में कही थी।

लोगों के विरोध के बाद राजदीप सरदेसाई का दूसरा पोस्ट

छत्रपति शिवाजी महाराज पर विवादित बयान के बाद लोगों के राजदीप सरदेसाई का जमकर विरोध और आलोचना की। फिर राजदीप सरदेसाई ने अपनी बात में सुधार करते हुए एक नया पोस्ट ‘करेक्शन’ के नाप पर चिपका डाला।

प्रोपेगेंडा पत्रकार ने ‘करेक्शन’ पोस्ट में लिखा कि शिवाजी महाराज ने बंगाल पर नहीं बल्कि सूरत पर हमले किए थे, जो मुगलों की ताकत पर हमला था। इसके अलावा राजदीप सरदेसाई ने शिवाजी महाराज को ‘इस पूरे दौर का सबसे बढ़िया शासक’ बताया।

राजदीप सरदेसाई ने अपने ‘करेक्शन’ पोस्ट में छत्रपति शिवाजी महाराज के सैन्य कौशल और लोगों के कल्याण के प्रति लिए गए फैसलों’ की तारीफ की। हालाँकि, प्रोपेगेंडा पत्रकार ने अपने झूठ के लिए सीधे तौर पर माफी माँगने की बजाय इसे ‘सुधार’ दिखाया।

सच्चाई क्या है?

ऐतिहासिक रिकॉर्ड्स बताते हैं कि छत्रपति शिवाजी महाराज ने कभी भी बंगाल पर हमला नहीं किया था। उनके सैन्य अभियान मुख्य रूप से दक्कन और पश्चिमी भारत को मुगलों और अन्य सल्तनतों के चंगुल से मुक्त कराने पर केंद्रित थे।

शिवाजी महाराज अपनी शूरवीरता के लिए जाने जाते थे, है और रहेंगे खासकर महिलाओं के प्रति। शिवाजी महाराज ने युद्ध के दौरान अगवा की गई महिलाओं के आत्मसम्मान की रक्षा की थी।

मुगलों की क्रूरता की सच्चाई

मुगलों ने भारत पर हमला किया और यहाँ अपनी सत्ता जमाई। मुगलों ने अपने शासन में बहुत खून-खराबा, मंदिरों को तोड़ा और हिंदुओं का जबरन धर्मांतरण करवाया। औरंगजेब जैसे कुछ मुगल शासक भारत को पूरी तरह इस्लामिक देश बनाना चाहते थे।

मुगलों ने मंदिरों पर कब्जा कर उन्हें धवस्त किया। महिलाओं को कर हरम में रखा। हिंदुओं पर भारी टैक्स लगाया। जिन हिंदुओं ने इस्लाम कबूल नहीं किया उन्हें मार डाला। इसके उलट,

शिवाजी महाराज ने जो भी लड़ाई लड़ी वो अपने लोगों की रक्षा के लिए थी। शिवाजी महाराज केवल और केवल ‘हिंदवी स्वराज्य’ कायम करना था।

प्रोपेगेंडा पत्रकार राजदीप सरदेसाई का ये कोई नया रवैया नहीं है। पहले बयान फेंको, फिर विरोध पर ‘करेक्शन’ डालो, लेकिन माफी न माँगो। यह सिर्फ पत्रकारिता की गिरावट नहीं, बल्कि इतिहास से जानबूझकर छेड़छाड़ की शर्मनाक मिसाल है। जब ऐतिहासिक सच्चाई इतनी स्पष्ट है तो फिर यह ‘गलती’ नहीं, एजेंडा है।

प्रयागराज में काँवड़ पर हमले का पहले से प्लान बना चुके थे इस्लामी कट्टरपंथी, हिन्दुओं से ली थी टाइम की जानकारी: रिपोर्ट, जुमे की नमाज के समय बनाया निशाना; पुलिस के एक्शन से गाँव छोड़ भागे

प्रयागराज में काँवड़ यात्रा पर इस्लामी कट्टरपंथियों पर हमला किया। डीजे बजाने को लेकर काँवड़ियों से मारपीट की। अब सामने आया है कि इस हमले की प्लानिंग पहले से ही हो गई थी। गाँव के मुस्लिम पक्ष ने काँवड़ यात्रा ले जाने की सारी जानकारी ली, फिर जैसे ही निकले तो हमला कर दिया।

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार, ग्रामीणों ने बताया कि गाँव में 60 प्रतिशत मुस्लिम आबादी रहती है, जो कि हिंदुओं को दबाव में रखने की कोशिश रखते हैं। आए दिन गाँव में किसी न किसी बात को लेकर बवाल मचाते हैं। 18 जुलाई 2025 को काँवड़ यात्रा पर भी उन्होंने यही किया।

हिंदू पीड़िता गाँव की निवासी उस्मिला ने दैनिक भास्कर से कहा, “यह सब प्लानिंग के तहत हुआ, तभी तो वह (मुस्लिम भीड़) तलवार और लाठियाँ लेकर पहले से ही तैयार थे।” उन्होंने बताया, “जानबूझकर विवाद किया गया था। हमें भी चोट आई हैं। हमारे दामाद ने किसी तरह बचा लिया। हमारे हर धार्मिक कार्य में बाधा डाली जाती है।”

वहीं, गाँव में ही रहने वाली सुनीता देवी ने बताया कि कुछ दिन पहले गाँव में बिजली नहीं थी, ठीक करने पर वो लोग (मुस्लिम पक्ष) विवाद करने लगे थे। उन्होंने बताया कि उनकी बेटी को भी उठाकर ले गए और बुरी तरह पीटा।

घटना वाले दिन काँवड़ यात्रा में शामिल राजेंद्र कुमार ने दैनिक भास्कर से कहा, “हमारा घर मुस्लिम लोगों के बीच में है। वहीं पर हमारी पान की दुकान भी है। पिछले एक हफ्ते से अयान, जिशान, मोहम्मद राजू, तौफीक हमसे जानकारी ले रहे थे कि तुम लोग काँवड़ लेकर कब जाओगे? कितने बजे जाओगे?”

उन्होंने आगे कहा, “इन लोगों (मुस्लिम पक्ष) की पहले से ही प्लानिंग थी। तभी जैसे ही हम लोग डीजे के साथ निकले। उसे बंद कराने लगे। फिर हम लोगों पर हमला कर दिया। हम लोगों ने भागकर अपनी जान बचाई।”

ग्रामीण सोनू पासी ने बताया कि मुहर्रम पर 4 से 5 दिन लगातार हॉर्न और डीजे बजाए जाते हैं। गाँव में मुहर्रम के नाम पर 4-5 दिन तक स्कूल बंद कर दिए जाते हैं, जबकि सरकारी छुट्टी सिर्फ एक दिन की होती है। सोनू कहते हैं के लेकिन जब भी हिंदुओं का त्योहार आता है, तो यह लोग (मुस्लिम पक्ष) हंगामा करने का प्रयास करते हैं।

जानें पूरा मामला ?

दरअसल, 18 जुलाई 2025 को प्रयागराज के मऊआइमा के सराय ख्वाजा गाँव में काँवड़िये डीजे बजाते हुए काँवड़ यात्रा निकाल रहे थे। इसी दौरान जुमे की नमाज भी हो रही थी। तभी नमाजियों ने डीजे बजाने का विरोध लाठी-डंडों से हमला किया। काँवड़यों को तलवार लेकर दौड़ा दिया। घटना में कई काँवड़िये घायल हुए। जबरदस्ती डीजे भी बंद करवा दिया। घटना के बाद से इस्लामी कट्टरपंथी फरार हैं।

मामले में पुलिस ने 15 नामजद समेत 65 अज्ञात के खिलाफ केस दर्ज किया। रविवार (20 जुलाई 2025) को पुलिस ने मामले में आरोपित बेलाल उर्फ बब्बू, तुफैल अहमद, मोहम्मद तस्लीम, मोहम्मद आरिफ, शाहबे आलम, गुड्डू उर्फ अहमद अली समेत 7 को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है। पुलिस अन्य आरोपितों के ठिकाने पर भी छापेमारी कर रही है। फिलहाल गाँव में भारी पुलिस बल और PAC के जवान तैनात हैं।

पायलट ने रोड पर लैंड करने का किया था प्रयास, लेकिन रोटर फँसा केबल में: AAIB ने केदारनाथ जा रहे हेलीकॉप्टर के क्रैश पर जारी की रिपोर्ट, 6 की हुई थी मौत

वायुयान दुर्घटना अन्वेषण ब्यूरो (AAIB) ने मई, 2025 में केदारनाथ जा रहे हेलीकॉप्टर के क्रैश मामले में जाँच रिपोर्ट जारी कर दी है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि हेलीकॉप्टर का रोटर ब्लेड एक फाइबर केबल में फँस गया था। इसकी वजह से आपातकालीन लैंडिंग नहीं हो पाई और हादसा हो गया। AAIB ने कहा है कि मामले में जाँच अभी जारी है।

यह हादसा उत्तराखंड के उत्तरकाशी में गंगनानी के पास 8 मई, 2025 को हुआ था। AAIB की इस मामले में जाँच रिपोर्ट हादसे के लगभग ढाई महीने के बाद 20 जुलाई, 2025 को जारी की गई है। AAIB ने इस मामले में पाँच पन्नों की यह प्रारम्भिक जाँच रिपोर्ट जारी की है, जिसमें हेलीकॉप्टर के मेंटेनेंस और दुर्घटना के पहले क्या हुआ, यह बताया गया है।

AAIB की जाँच रिपोर्ट के अनुसार, दुर्घटना एयरो ट्रांस सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड का यह एक बेल 407 हेलीकॉप्टर था जो एकदम फिट था। AAIB ने यह भी बताया है कि इस हेलीकॉप्टर ने दुर्घटना वाली उड़ान से पहले दो और उड़ान उसी दिन भरी थीं, जिनमें कोई समस्या नहीं आई थी।

यह हेलीकॉप्टर देहरादून के सहस्त्रधारा हेलीपैड से उड़ा था। AAIB ने बताया है कि केदारनाथ जाने के रूट में इसे खरसाली और झाला हेलीपैड पर उतरना था। इसके बाद यह केदारनाथ वाले हेलीपैड फाटा पर उतरता। AAIB ने बताया है कि हेलीकॉप्टर ने सहस्त्रधारा से खरसाली तक की उड़ान बिना किसी समस्या के भर ली थी।

AAIB की रिपोर्ट के अनुसार, यह उड़ान भरने के बाद खरसाली से इसमें 6 यात्री सवार हुए थे, यहाँ से हेलीकॉप्टर उड़ने के 20 मिनट बाद इसमें खराबी आ गई। AAIB रिपोर्ट में बताया गया है कि इसके बाद पायलट ने इमरजेंसी लैंडिंग के लिए प्रयास किया।

AAIB की जाँच रिपोर्ट के अनुसार,”हेलीकॉप्टर अपनी निर्धारित ऊँचाई से नीचे उतरने से पहले 20 मिनट तक उड़ान भरता रहा। शुरुआत में, पायलट ने उत्तरकाशी में गंगनानी के पास उत्तरकाशी-गंगोत्री मार्ग (NH 34) पर उतरने का प्रयास किया।”

रिपोर्ट में आगे बताया गया है, “लैंडिंग के प्रयास के दौरान, हेलीकॉप्टर का मुख्य रोटर ब्लेड सड़क के समानांतर चल रही एक ओवरहेड फाइबर केबल से टकरा गया। इससे सड़क किनारे लगे कुछ मेटल बैरिकेड भी क्षतिग्रस्त हो गए। हालाँकि, हेलीकॉप्टर लैंड नहीं कर सका और पहाड़ी से नीचे खिसक कर गिर गया।”

AAIB की रिपोर्ट कहती है कि इसके बाद यह हेलीकॉप्टर लुढकते हुए नीचे गया और 250 फीट नीचे जा कर एक पेड़ से टकरा कर रुक गया। AAIB ने बताया है कि इसके चलते ही इस हादसे में लोग घायल हुए। गौरतलब है कि इस हादसे में पायलट समेत 6 लोग मारे गए थे।

AAIB ने कहा है कि हादसे की जाँच के लिए अमेरिका की NTSB और कनाडा कीई TSB ने अपने तकनीकी सलाहकार नियुक्त किए हैं। AAIB ने कहा है कि जाँच टीम मूल कारणों का पता लगाने के लिए आवश्यक आगे की कार्रवाई के लिए उनके साथ बातचीत में जुटी हुई है।

आगरा का धर्मांतरण गिरोह निकला ‘छांगुर पीर’ से भी ज्यादा खतरनाक, ISIS के पैटर्न पर करता था ब्रेनवॉश: PFI से लेकर PAK तक कनेक्शन, 6 राज्यों में छापे के बाद 10 गिरफ्तार

उत्तर प्रदेश पुलिस ने हाल ही में ‘ऑपरेशन अस्मिता’ चलाया। इसमें एक बड़ा धर्मांतरण गिरोह पकड़ा गया। इस ऑपरेशन में छह राज्यों से 10 लोग गिरफ्तार हुए। यह नेटवर्क लव जिहाद के जरिए धर्मांतरण कराने, विदेशों से फंडिंग हासिल करने और कट्टरता फैलाने का काम कर रहा था। पुलिस मानती है कि यह तरीका ISIS जैसे आतंकी संगठन इस्तेमाल करते हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस गिरोह के तार पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI), सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) और पाकिस्तान के आतंकी संगठनों से जुड़े हैं। इन्हें कनाडा, UAE और अमेरिका से फंडिंग मिलती थी। यह मामला आगरा की दो लापता बहनों की जाँच से सामने आया।

जाँच में 7 लोगों के खिलाफ सबूत मिले। उनके खिलाफ वारंट जारी हुए। फिर पुलिस ने 11 टीमें छह राज्यों में भेजीं। आगरा पुलिस ने यूपी, गोवा, पश्चिम बंगाल, उत्तराखंड, दिल्ली और राजस्थान में छापे मारे। यह गिरोह बलरामपुर के छांगुर पीर वाले गैंग से भी खतरनाक बताया जा रहा है।

आगरा पुलिस कमिश्नर ने जानकारी दी कि इस गिरोह में हर सदस्य का काम तय था। कुछ लोग ब्रेनवॉश करते थे। कुछ पैसा जमा करते थे और विदेशों से आए फंड को दूसरों तक पहुँचाते थे। कुछ सदस्य गिरोह के लोगों को छिपने की जगह देते थे। कुछ कानूनी सलाह देते थे और कुछ नए फोन व सिम का इंतजाम करते थे।

कैसे शुरू हुई जाँच?

मार्च 2025 में आगरा के सदर बाजार थाने में दो सगी बहनों के गायब होने की शिकायत दर्ज की गई थी। इनमें एक की उम्र 33 और एक की 18 साल थी। शुरुआत में यह गुमशुदगी का मामला था, लेकिन बाद में इसे अपहरण में बदल दिया गया।

जानकारी के मुताबिक, दोनों बहनें अपना फोन नहीं ले गई थीं और सोशल मीडिया पर अपने असली नामों से एक्टिव नहीं थी, इसलिए पुलिस के लिए उनका पता लगाना मुश्किल था। पुलिस आयुक्त के निर्देश पर अपर पुलिस उपायुक्त ने इस ऑपरेशन की कमान संभाली।

I’D से खुली धर्मांतरण की पोल

पुलिस को परिवार से जो भी जानकारी प्राप्त थी उसी के आधार पर साइबर सेल ने काम करना शुरू किया था। उन्हें इंस्टाग्राम पर एक ‘कनेक्टिंग रिवर्ट आईडी‘ मिली। आईडी की जब जाँच की गई, तब कोलकाता लोकेशन का पता चला।

इस आईडी से जो भी लोग जुड़े थे उनकी जाँच की गई। पुलिस की एक महिला दारोगा ने फेक नाम बताकर खुद का धर्मांतरण के लिए संपर्क किया। फिर महिला दरोगा को आईडी से जवाब आता है। जवाब देने वाली एक महिला होती है। यहीं से पुलिस को आयशा का सुराग मिलता है। इसके बाद बैंक खातों की जानकारी भी हाथ लगती है।

छह राज्यों में एक साथ छापेमारी

लापता बहनों को खोजने के लिए पुलिस ने ‘ऑपरेशन अस्मिता’ चलाया। कोलकाता में बहनों के होने का मजबूत सुराग था। इसलिए वहाँ एसीपी के साथ चार टीमें भेजी गईं। दिल्ली, राजस्थान, गोवा, उत्तराखंड और यूपी के बाकी इलाकों में भी टीमें भेजी गईं, जिनमें चार से पाँच पुलिसकर्मी थे।

गोवा के लिए पुलिस एयरप्लेन से भी गई। एक ही समय पर पुलिस ने सभी 6 राज्यों में छापा मारा। 50 पुलिसकर्मियों ने चार दिन तक दिन-रात काम किया और आखिरकार बहनें मिल गईं, साथ ही इस गिरोह के लोग भी पकड़े गए।

कैसे काम करता था यह गिरोह?

पुलिस ने बताया कि यह गिरोह बहुत ही व्यवस्थित था। ये लोग लव जिहाद करते थे। यानी, लड़कियों को प्रेमजाल में फँसाते थे। फिर उन्हें धर्म बदलने के लिए उकसाते थे। वे धर्म बदलने के कागजात भी बनाते थे। लड़कियों को कट्टर भी बनाते थे।

इन्हें विदेशों से पैसा मिलता था। ये पैसे को सही जगह लगाते थे। छिपने के लिए सुरक्षित घर भी देते थे। कानूनी सलाह भी देते थे। नए फोन और सिम का भी इंतजाम करते थे। यह गिरोह दिल्ली, जयपुर, कोलकाता, गोवा, देहरादून और यूपी के कई शहरों में फैला था।

‘लव जिहाद देश के लिए खतरा’: हरियाणा की अदालत ने शहबाज को सुनाई 7 साल की जेल, हिन्दू नाबालिग पर मुस्लिम लड़के से दोस्ती करने का बनाता था दबाव

हरियाणा की एक अदालत ने लव जिहाद को देश के लिए खतरा करार दिया है। अदालत ने कहा है कि भले ही कानून में इसको लेकर कुछ ना कहा गया हो लेकिन यह एक षड्यंत्र है। यह टिप्पणियाँ अदालत ने एक नाबालिग हिन्दू लड़की की FIR पर दायर मुकदमे में सुनाई है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, हरियाणा के यमुनानगर में जगाधरी की एक अदालत ने 17 जुलाई, 2025 को यह फैसला सुनाया। अदालत ने कहा कि उसके सामने आया मामला लव जिहाद है। अदालत ने लव जिहाद को देश की एकता और अखंडता के लिए खतरा बताया।

अदालत ने कहा कि भले ही भारतीय न्याय संहिता (BNS) और POCSO में लव जिहाद को लेकर कोई परिभाषा नहीं दी गई है लेकिन यह असल में मुस्लिम पुरुषों का गैर-मुस्लिम महिलाओं के साथ प्रेम में होकर उन्हें इस्लाम में धर्मांतरित करने का एक षड्यंत्र है।

यह फैसला जज रंजना अग्रवाल ने सुनाया। उन्होंने इस मामले में दोषी शहबाज को कुल 7 साल की सजा सुनाई। उसे एक मामले में 4 साल, एक में 2 साल और एक में 1 साल की सजा सुनाई गई है। उस पर POCSO समेत बाकी धाराओं में लगाए गए आरोप में यह सजाए सुनाई गईं।

अदालत ने उस पर ₹1 लाख का जुर्माना भी ठोंका। शहबाज एक 14 वर्षीय हिन्दू बच्ची को स्कूल जाते समय परेशान करता था। वह हिन्दू बच्ची पर दबाव बनाता था कि वह एक मुस्लिम नाबालिग के साथ रिश्ते में आ जाए।

वह इसके लिए लगातार बच्ची का पीछा करता था और उसका उत्पीड़न करता था। बच्ची ने इस मामले में नवम्बर, 2024 में मामला दर्ज करवाया था। अब कोर्ट ने इस मामले में अंतिम फैसला सुनाया है।

गौरतलब है कि लम्बे समय से मुस्लिम युवक, हिन्दू युवतियों को फँसाने के लिए पहचान बदल कर, कलावा पहन और तिलक आदि लगा कर भ्रमित करते रहे हैं। ऐसे मामलों में पहचान तब सामने आती है जब हिन्दू पीड़िता पूरी तरह से फँस चुकी होती है। केरल में ईसाई युवतियाँ भी इसकी शिकार हुई हैं।

असम सरकार कर रही घुसपैठियों पर कार्रवाई, ममता दीदी ने लगा दिया ‘बंग भाषियों पर अत्याचार’ का आरोप: हिमंता सरमा ने दिखाया आईना – हमें बंगालियों से नहीं, सीमा पार की ‘आबादी’ से दिक्कत

असम में हिमंता बिस्वा सरमा की सरकार घुसपैठियों और अवैध कब्जे से लोगों को हटाने के लिए अतिक्रमण विरोधी अभियान चला रही है। हालाँकि इसमें ममता दीदी ने ‘बंगालियों पर अत्याचार’ होने का झूठा दावा शुरू कर दिया है। इसके चलते शनिवार (19 जून 2025) को पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और असम सीएम सरमा के बीच सोशल मीडिया पर वाकयुद्ध शुरू हो गया है।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर TMC सुप्रीमो ने लिखा कि देश की दूसरी सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा बांग्ला असम में भी सबसे ज्यादा बोली जाती है। वहाँ की बंगाली जनसंख्या को निशाना बनाने के लिए हिमंता सरकार उत्पीड़न कर रही है। यह भेदभावपूर्ण और असंवैधानिक है।

उन्होंने आगे कहा कि बीजेपी का यह विभाजन का एजेंडा अपनी सभी सीमाओं को पर कर चुका है और असम के लोग इसके लिए लड़ेंगे।

ममता की इस ट्वीट पर प्रतिक्रिया देते हुए असम सीएम ने कहा, “दीदी मैं आपको याद दिला दूँ- असम में हम अपने लोगों से नहीं लड़ रहे। बिना डरे उन मुस्लिम घुसपैठियों को हटा रहे हैं जो हमारी आबादी में बढ़ते चले जा रहे हैं। कई जिलों में अब हिंदू अल्पसंख्यक बन गए हैं।”

हिमंता सरमा ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने भी घुसपैठ को बाहरी आक्रमण कहा है। ऐसे में जब हम अपनी जमीन, संस्कृति, पहचान की रक्षा के लिए कदम उठा रहे हैं तो आप इसे राजनीति का रंग दे रही हैं।

गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल में 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले ममता बनर्जी बांग्ला भाषियों के लिए खुद को मसीहा साबित करने में तुली है ताकि बंगाली हिंदू वोट को भी अपनी ओर खींच सके। इस चक्कर में वह बिना सच्चाई जानें किसी भी आरोप को बेतरतीबी से लोगों के सामने परोस दे रही हैं।