इजरायल और ईरान के बीच में तनाव हमलों का रूप ले चुका है। एक ओर इजरायल ने ‘ऑपरेशन राइजिंग लॉयन’ नाम से मिशन शुरू कर हमले शुरू किए। इसके बाद ईरान ने भी ‘टू प्रॉमिस थ्री’ इसराइल पर जवाबी हमले शुरू कर दिए। तनाव बढ़ने के साथ अब ईरान ने जामकारन मस्जिद पर लाल झंडा भी फहरा दिया है। इस लाल झंडा का महत्व ऐतिहासिक भी है और धार्मिक भी। लाल झंडे से ईरान दुनिया को स्पष्ट रूप से अपना संदेश देना चाहता है।
जामकारन पर लाल झंडा
जनवरी 2020 में अमेरिका ने बगदाद में एक एयर स्ट्राइक में ईरान के इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के कमांडर कासिम सुलेमानी को मार गिराया था। इसके बाद ईरान के कोम शहर की जमकारन मस्जिद के गुंबद पर पहली बार लाल झंडा लहराया गया। इसे अमेरिका के खिलाफ ईरान के जंग के ऐलान के तौर पर देखा जा रहा था। इसके बाद इजरायल के खिलाफ अप्रैल 2024 में और हमास नेता इस्माइल हानियेह की तेहरान में हत्या के बाद 31 जुलाई 2024 को भी ये लाल झंडा फहराया गया।
इस लाल झंडे का ईरान के लिए जितना महत्व है, उसकी ऐतिहासिकता उतनी ही भारत से भी जुड़ी हुई है। भारत की बात करें तो 1739 में पर्सिया से आए नादिरशाह ने चाँदनी चौक की सुनहरी मस्जिद पर लाल झंडा फहराया। वहीं से खड़े होकर वह अपनी फौज को दिल्ली की गलियों को खून से रंगते निहार रहा था। असल में लाल झंडा शिया परंपरा में खूनी प्रतिशोध का प्रतीक होता है। झंडे पर लिखा था, ‘जो लोग हुसैन के ख़ून का बदला लेना चाहते हैं’। शिया परंपरा के अनुसार, लाल झंडे पर लगे खून के छींटे मारे गए व्यक्तियों का बदला लेने का प्रतीक है।
अब आते हैं ईरान पर, यही लाल झंडा अब ईरान के कोम शहर की जमकारन मस्जिद के गुंबद पर लहरा रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, कोम शहर से कुछ 6 किलोमीटर पूर्व में जामकारन गाँव में कोम-काशान मार्ग पर ये मस्जिद स्थित है। इस मस्जिद का निर्माण 393 हिजरी यानी 1003 ईसवीं में शिया इस्लाम के 12वें इमाम, इमाम महदी के आदेश पर बनाया गया था।
कब शुरू हुए हमले
शुक्रवार (13 जून 2025) और शनिवार (14 जून 2025) को इजरायल और ईरान के बीच हमले चरम पर पहुँच गए हैं। जहाँ एक ओर इजरायल ने ईरान के सैन्य और परमाणु ठिकानों पर जोरदार हमले किए हैं तो उसके जवाब में ईरान ने भी इजरायल पर 100 से अधिक ड्रोन्स और मिसाइलें दागी हैं।
इजरायल ने शुक्रवार (13 जून 2025) की सुबह 5:30 बजे ईरान पर अपना सबसे बड़ा हवाई हमला शुरू किया था। ‘ऑपरेशन राइजिंग लायन’ नाम से शुरू किए गए मिशन के तहत इजरायली फाइटर जेट्स और ड्रोन्स के जरिए 100 से अधिक जगहों पर हमले किए गए।
शुक्रवार की ही देर रात इजरायल ने फिर से ईरान पर हमला कर उसके परमाणु ठिकानों को निशाना बनाया। इन हमलों में अब तक 78 लोग मारे गए हैं और 350 से ज्यादा घायल हुए हैं। असल में इजरायल और अमेरिका नहीं चाहते कि ईरान परमाणु शक्ति बने, इसलिए ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर ये हमले किए गए हैं। इन हमलों से ईरान के परमाणु ठिकानों के साथ मिसाइल और सैन्य ठिकानों को काफी नुकसान पहुँचा है।
इन हमलों के जवाब में ईरान ने ‘ट्रू प्रॉमिस थ्री’ नाम से ऑपरेशन चलाया और इजरायल पर 150 से ज़्यादा बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं। इनमें से 6 मिसाइलें राजधानी तेल अवीव में गिरीं, जिसमें 1 महिला की मौत हो गई और 63 लोग घायल हो गए।
ईरान का जामकारन मस्जिद पर लाल झंडा फहराने के पीछे राजनीतिक महत्व भी है। इसके जरिए ईरान ने हमले का बदला लेने का ऐलान कर दिया है। अब ये देखना होगा कि इजरायल और अमेरिका ईरान के इस संदेश को समझ कर क्या कोई नई रणनीति तैयार करेंगे या फिर ईरान का ये ऐलान मूर्त रूप लेने में कामयाब होगा।
असम के धुबरी ज़िले में बढ़ते सांप्रदायिक तनाव को देखते हुए मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने शुक्रवार (13 जून 2025) को शाम 6 बजे के बाद शूट-एट-साइट यानी देखते ही गोली मारने का आदेश जारी कर दिया।
बांग्लादेश सीमा से सटे मुस्लिम-बहुल इस कस्बे में हाल ही में एक समूह ने भड़काऊ पोस्टर लगाने और धार्मिक स्थलों के पास गोमांस के टुकड़े फेंके थे, जिसके बाद माहौल गरमा गया। हालात को काबू में करने के लिए रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) और CRPF की तैनाती की जा रही है।
सीएम हिमंता बिस्वा सरमा ने जानकारी दी है कि धुबरी में हनुमान मंदिर के पास फेंके गए गोमांस के टुकड़े पर कार्रवाई करते हुए रात भर में 38 लोग गिरफ्तार किए गए है।
धार्मिक स्थल के पास मिला गोमांस
सीएम हिमंता बिस्वा सरमा के अनुसार, नबीन बांग्ला नामक एक समूह ने धुबरी को बांग्लादेश में मिलाने की माँग करते हुए भड़काऊ पोस्टर लगाए। यह कार्य ‘सांप्रदायिक उकसावे’ के रूप में देखा गया है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार ईद के अगले दिन, हनुमान मंदिर के सामने एक गाय का कटा हुआ सर मिला था, जिसके बाद शहर में तनाव बढ़ गया। रात में पथराव की घटनाएँ भी हुईं। मुख्यमंत्री ने इसे ‘गंदे हथकंडों से माहौल बिगाड़ने’ की साजिश बताया।
सीएम का सख्त संदेश
सीएम सरमा खुद शुक्रवार (13 जून 2025) को धुबरी पहुँचे और कहा, “जो कोई भी धार्मिक स्थलों को नुकसान पहुँचाएगा या पथराव करेगा, उसे तुरंत गोली मारी जाएगी।”
सीएम सरमा ने घोषणा की कि वे अगले साल (2026) ईद पर खुद धुबरी में रहेंगे और ज़रूरत पड़ी तो मंदिर की पहरेदारी भी करेंगे।
इस बार ईद पर कुछ असामाजिक तत्वों ने धुबरी के हनुमान मंदिर में गौ मांस फेंककर घृणित और निंदनीय अपराध किया!
आगामी ईद पर अगर आवश्यकता पड़ी, तो मैं खुद रात भर हनुमान बाबा के मंदिर में पहरेदारी करूंगा। pic.twitter.com/Cbxen8Blws
सरमा ने दावा किया कि पश्चिम बंगाल से बड़ी संख्या में मवेशी अवैध रूप से धुबरी लाए गए है। सीएम ने इसे भी तनाव की वजह बताते हुए जाँच और गिरफ्तारी के आदेश दिए हैं।
वहीं मामले को देखते हुए RAF, CRPF, और स्थानीय पुलिस की बड़ी तैनाती की जा रही है। व्यापारियों और धार्मिक स्थलों पर CCTV लगाने को कहा गया है। सरकार ज़रूरतमंद मंदिरों और मस्जिदों को कैमरे मुहैया कराएगी।
क्यों है धुबरी संवेदनशील?
धुबरी जिला असम का मुस्लिम-बहुल इलाका है, जहाँ लगभग 90% आबादी मुस्लिम है। बांग्लादेश की सीमा से सटा होने के कारण लंबे समय से यह इलाका अवैध घुसपैठ, पहचान और राजनीतिक विवादों का केंद्र रहा है।
सरमा ने सभी समुदायों से शांति बनाए रखने की अपील की और कहा कि जो भी सांप्रदायिकता फैलाएगा, उसे बख्शा नहीं जाएगा। कानून-व्यवस्था बनाए रखना हमारी प्राथमिकता है।
पिछले 48 घंटों में, यानी शुक्रवार (13 जून 2025) और शनिवार (14 जून 2025) को इजरायल और ईरान के बीच तनाव बहुत बढ़ गया है। इजरायल ने ईरान के सैन्य और परमाणु ठिकानों पर लगातार दूसरे दिन जोरदार हमले किए हैं, जिसके जवाब में ईरान ने भी मिसाइलें दागी हैं।
इजरायल ने शुक्रवार (13 जून 2025) सुबह 5:30 बजे ईरान पर अपना सबसे बड़ा हवाई हमला शुरू किया। इजरायली फाइटर जेट्स और ड्रोनों ने 100 से ज़्यादा ठिकानों को निशाना बनाया। इन हमलों को ‘ऑपरेशन राइजिंग लायन’ नाम दिया गया है।
वहीं, शुक्रवार (13 जून 2025) देर रात को भी इजरायल ने ईरान के परमाणु ठिकानों को दोबारा निशाना बनाया। इन हमलों में अब तक 78 लोग मारे गए हैं और 350 से ज्यादा घायल हुए हैं।
प्रमुख ठिकाने और अधिकारियों की मौत
इजरायली हमले से ईरान के नतांज और फोर्डो जैसे महत्वपूर्ण परमाणु ठिकानों को भारी नुकसान पहुँचा है। इजरायल और अमेरिका नहीं चाहते कि ईरान परमाणु शक्ति बने, इसलिए ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर ये हमले किए गए हैं।
वहीं ईरान के इस्फहान, तेहरान, तबरीज, अराक और करमनशाह जैसे शहरों में मौजूद सैन्य और मिसाइल ठिकानों को पूरी तरह से तबाह कर दिया गया है।
इजरायल ने पुष्टि की है कि उसके हमलों में 9 ईरानी परमाणु वैज्ञानिक और लगभग 6 शीर्ष IRGC कमांडर मारे गए हैं। इनमें ईरान के चीफ ऑफ स्टाफ मोहम्मद बाघेरी, IRGC प्रमुख हुसैन सलामी, खतम-अल अंबिया सेंट्रल मुख्यालय के प्रमुख घोलम अली राशिद, IRGC वायु सेना प्रमुख ब्रिगेडियर जनरल अमीर अली हाजीजादेह, IRGC वायु सेना ड्रोन यूनिट कमांडर ताहिर पोर और IRGC वायु सेना वायु रक्षा यूनिट कमांडर दावूद शेखियन शामिल हैं। ईरान के सुप्रीम लीडर खामेनेई के शीर्ष सलाहकार अली शमखानी को भी निशाना बनाया गया।
इजरायली खुफिया एजेंसी मोसाद ने इस ऑपरेशन में अहम भूमिका निभाई। मोसाद के एजेंटों ने महीनों पहले ही ईरान के अंदर ड्रोन और हथियार छिपा दिए थे। हमले के पहले चरण में, ईरान के रडार और हवाई सुरक्षा सिस्टम को निष्क्रिय कर दिया गया ताकि इजरायली लड़ाकू विमानों को हमला करने में आसानी हो।
ईरान का जवाब: ‘ट्रू प्रॉमिस थ्री’ का सीमित असर
जवाब में, ईरान ने ‘ट्रू प्रॉमिस थ्री‘ नाम से ऑपरेशन चलाया और इजरायल पर 150 से ज़्यादा बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं। इनमें से 6 मिसाइलें राजधानी तेल अवीव में गिरीं, जिसमें 1 महिला की मौत हो गई और 63 लोग घायल हो गए। ईरानी मीडिया ने दावा किया कि इजरायली रक्षा मंत्रालय को भी निशाना बनाया गया था।
जानकारी के मुताबिक, ईरान ने शनिवार (14 जून 2025) को सेंट्रल इजराइल में बैलिस्टिक मिसाइल हमला किया, जिसके बाद कई घरों को नुकसान पहुँचा है। हमलों में कम से कम 10 लोग घायल बताए जा रहे हैं।
Footage from the Iranian ballistic missile impact in central Israel. Medics say they're treating at least 10 wounded. pic.twitter.com/iZtMAh8IlD
— Emanuel (Mannie) Fabian (@manniefabian) June 14, 2025
हालाँकि, इजरायल ने अमेरिका के THAAD (टर्मिनल हाई-एल्टिट्यूड एरिया डिफेंस) सिस्टम की मदद से ज्यादातर मिसाइलों को आसमान में ही रोक दिया, जिससे ईरान का हमला उतना कामयाब नहीं हो पाया जितना वह चाहता था। अमेरिका ने अक्टूबर 2024 में इजरायल में THAAD को तैनात किया था।
नेतन्याहू की पीएम मोदी से बातचीत
ईरान की ओर से हमले की आशंका को देखते हुए इजरायली पीएम बेंजामिन नेतन्याहू को सुरक्षित जगह पर भेज दिया गया था। नेतन्याहू ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बात कर उन्हें हालात की जानकारी दी।
Received a phone call from PM @netanyahu of Israel. He briefed me on the evolving situation. I shared India's concerns and emphasized the need for early restoration of peace and stability in the region.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा, “अभी भी वक्त है, समझौता करो वरना कुछ नहीं बचेगा।”
वहीं, संयुक्त राष्ट्र (UN) में चीन के डिप्लोमैट फू कांग ने इजरायली हमले की निंदा की और सैन्य कार्रवाई रोकने की माँग की। फू कांग ने कहा कि चीन इजरायल की तरफ से ईरान की संप्रभुता और सुरक्षा के उल्लंघन को लेकर बहुत चिंतित है।
संघर्ष निर्णायक मोड़ पर
‘ऑपरेशन राइजिंग लायन’ ने साफ कर दिया है कि इजरायल ईरान के परमाणु खतरे को लेकर चुप नहीं बैठेगा। इस ऑपरेशन ने न केवल ईरान की सैन्य ताकत को कमजोर किया है, बल्कि दुनिया को यह संदेश भी दिया है कि इजरायल अपनी सुरक्षा के लिए किसी भी हद तक जा सकता है।
ईरान का जवाब भले ही तेज था, लेकिन वह इजरायल की मजबूत सुरक्षा दीवारों को भेदने में नाकाम रहा। आने वाले दिनों में यह देखना होगा कि क्या यह लड़ाई किसी बड़े युद्ध में बदलती है या बातचीत से कोई रास्ता निकलता है।
गुजरात का द्वारकाधीश मंदिर भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित है, जिन्हें द्वारकाधीश यानी ‘द्वारका का राजा’ के रूप में पूजा जाता है। समुद्र में डूबी द्वारका नगरी स्थित श्रीकृष्ण का ये प्राचीन मंदिर चार धामों में से एक है और करोड़ों भक्तों के लिए आस्था का केंद्र है। कहा जाता है कि भगवान कृष्ण ने अपने जीवन के अंतिम वर्षों में द्वारका को अपनी राजधानी बनाया था। मंदिर श्रीकृष्ण के जीवन से जुड़ी स्मृतियों को जीवंत करता है।
द्वारकाधीश मंदिर में रोज़ाना सैंकड़ों भक्तों का जनसैलाब दर्शन के लिए उमड़ता है। मंदिर सुबह 6 बजे से दोपहर 1 बजे तक और शाम 5 बजे से रात 9:30 बजे तक श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए खुलता है।
मंदिर का इतिहास
द्वारका शहर और द्वारकाधीश मंदिर का इतिहास लगभग 2500 वर्षों पुराना है। हिन्दू मान्यता के अनुसार, महाभारत काल में भगवान कृष्ण ने जब मथुरा छोड़ने का निर्णय लिया तब उन्होंने समुद्र से भूमि प्राप्त कर द्वारका नामक एक नगर बसाया। यह नगर अत्यंत सुंदर और समृद्ध था और इसे भगवान कृष्ण की राजधानी माना गया।
माना जाता है कि मंदिर की मूल संरचना 200 ईसा पूर्व में बनाई गई थी। हालाँकि, समय के साथ-साथ इसे कई बार नष्ट किया गया और पुनर्निर्मित किया गया। 15वीं शताब्दी में महमूद बेगड़ा ने मंदिर को नष्ट कर दिया था लेकिन 16वीं शताब्दी में इसे फिर से बनाया गया। मंदिर की वर्तमान मूर्ति 1559 में अनिरुद्धाश्रम शंकराचार्य द्वारा स्थापित की गई थी।
इतिहास में एक समय ऐसा भी आया जब वाघेर समुद्री डाकुओं ने एक मौलाना के जहाज पर हमला किया, जिसके कारण सुल्तान महमूद ने द्वारका पर आक्रमण कर दिया। उन्होंने द्वारका सहित पूरे क्षेत्र को लूट लिया था। उस समय के राजा भीम द्वारका छोड़कर बेट द्वीप चले गए थे।
गुजरात के द्वारका स्थित द्वारकाधीश मंदिर (साभाऱ : sailana place)
मंदिर की संरचना
द्वारकाधीश मंदिर एक भव्य और विशाल पाँच मंजिला इमारत है जो 72 मजबूत स्तंभों पर टिकी हुई है। यह इमारत चूना पत्थर से बनी है और इसकी दीवारों पर सुंदर नक्काशी की गई है। मंदिर की लंबाई 29 मीटर और चौड़ाई 23 मीटर है।
मंदिर के दो मुख्य द्वार हैं – मोक्ष द्वार (प्रवेश द्वार) और स्वर्ग द्वार (निर्गमन द्वार)। स्वर्ग द्वार से नीचे उतरने पर 56 सीढ़ियाँ गोमती नदी की ओर जाती हैं जहाँ श्रद्धालु स्नान करते हैं।
मंदिर का शिखर लगभग 78.3 मीटर ऊँचा है और इसके शीर्ष पर एक त्रिकोणीय झंडा फहराया जाता है, जिसमें सूर्य और चंद्रमा के प्रतीक होते हैं। यह झंडा दिन में चार बार बदला जाता है और इसे चढ़ाने का सौभाग्य भक्तों को दान के रूप में प्राप्त होता है। माना जाता है कि जब तक सूर्य और चंद्रमा पृथ्वी पर हैं तब तक भगवान कृष्ण इस स्थान पर विराजमान रहेंगे।
मंदिर परिसर में एक गर्भगृह (निज मंदिर) और अंतराल (ड्योढ़ी) है। गर्भगृह में भगवान कृष्ण की काले पत्थर की मूर्ति स्थापित है जो भक्तों के लिए दर्शन का प्रमुख केंद्र है।
गुजराक के द्वारका स्थित द्वारकाधीश मंदिर (साभार : xplro)
कैसे पहुँचें ?
द्वारका नगरी भारत के गुजरात राज्य के पश्चिमी छोर पर स्थित है और यहाँ पहुंचना आज के समय में बहुत आसान हो गया है। सबसे नज़दीकी हवाई अड्डा जामनागर है जो लगभग 130 किलोमीटर दूर है। जामनगर से टैक्सी या बस से द्वारका पहुँचा जा सकता है।
इसके अलावा द्वारका रेलवे स्टेशन कई प्रमुख शहरों से जुड़ा हुआ है। अहमदाबाद, राजकोट, सूरत, मुंबई और दिल्ली से कई सीधी ट्रेनें द्वारका के लिए जाती हैं।
सड़क मार्ग से द्वारका पहुँचना अलग अनुभव है। गुजरात राज्य परिवहन की बसें और निजी वाहन द्वारका के लिए चलते हैं। समुद्र के अद्भुत दृश्यों को निहारते हुए सड़क यात्रा भी की जा सकती है।
भारत इस समय अपनी सेना को और ताकतवर बनाने के लिए बड़े कदम उठा रहा है। खबरों के मुताबिक, भारत रूस के सुखोई Su-57E जो पाँचवीं पीढ़ी का एक शानदार लड़ाकू विमान है, उसे खरीदने और भारत में बनाने की सोच रहा है।
दूसरी तरफ अमेरिका का F-35 विमान भी है, जिसे पश्चिमी देशों का सबसे उन्नत विमान माना जाता है। लेकिन भारत का इसकी तरफ ज्यादा ध्यान न देने के कई बड़े कारण हैं।
भारत और रूस का रक्षा साझेदारी का रिश्ता दशकों पुराना और भरोसेमंद है। रूस न सिर्फ विमान बेचने की बात कर रहा है, बल्कि तकनीक देने और भारत में ही विमान बनाने का ऑफर भी दे रहा है। वहीं, अमेरिका तकनीक देने में कंजूसी करता है और उसके हथियारों की डिलीवरी में देरी की शिकायतें भी रही हैं। भारत अपनी रक्षा नीति में आत्मनिर्भरता और आजादी को बहुत अहम मानता है। ऐसे में रूस का प्रस्ताव भारत की ‘मेक इन इंडिया’ नीति और लंबे समय की रणनीति के ज्यादा करीब है।
पाकिस्तान और उसका दोस्त चीन लगातार अपनी सेना को मजबूत कर रहे हैं, खासकर भारत के ‘ऑपरेशन सिंदूर’ जैसे सफल अभियान के बाद। ऐसे हालात में भारत का Su-57 जैसे उन्नत स्टील्थ विमान की तरफ झुकाव सिर्फ हवाई सुरक्षा के लिए नहीं, बल्कि दुनिया में बदलते हालात में आत्मनिर्भर बनने की कोशिश का भी हिस्सा है। लेकिन यह तय करने से पहले कि भारत को Su-57 लेना चाहिए या F-35, यह समझना जरूरी है कि भारत को अपनी वायुसेना को तुरंत आधुनिक बनाने की जरूरत क्यों है।
रूसी Su-57
भारत को अपनी वायुसेना को आधुनिक क्यों करना चाहिए?
भारत को चीन और पाकिस्तान, दोनों मोर्चों पर खतरे का सामना है। पुराने पड़ते लड़ाकू विमानों को बदलने के लिए नई और उन्नत तकनीक वाले विमानों की जरूरत है। भारतीय वायुसेना को भविष्य की लड़ाइयों के लिए तैयार करना और देश की सुरक्षा को मजबूत करना अब बहुत जरूरी है।
भारतीय वायुसेना ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ जैसे मिशनों में अपनी ताकत दिखाई है, लेकिन अभी उसके पास सिर्फ 31 स्क्वाड्रन हैं, जबकि कम से कम 42 स्क्वाड्रन चाहिए। यह कमी तब और गंभीर हो जाती है, जब पाकिस्तान, जो आर्थिक तंगी में है, फिर भी चीन से J-35 जैसे स्टील्थ विमान खरीदने की तैयारी कर रहा है। भारत अपने पुराने मिग-21, जगुआर और मिराज 2000 जैसे विमानों को धीरे-धीरे हटा रहा है। सिर्फ फ्रांस के राफेल विमानों पर निर्भर रहना ठीक नहीं। भारत को अपने विमानों में विविधता लानी होगी।
स्वदेशी तेजस और AMCA जैसे प्रोजेक्ट अभी पूरी तरह तैयार नहीं हैं और इनमें देरी हो रही है। इसलिए भारत को अपनी रक्षा जरूरतों को पूरा करने के लिए पाँचवीं पीढ़ी के स्टील्थ विमानों पर विचार करना पड़ रहा है। भारत की रक्षा अनुसंधान संस्था DRDO, AMCA स्टील्थ विमान पर काम कर रही है, लेकिन यह 2035 से पहले तैयार नहीं होगा। दूसरी तरफ, पाकिस्तान को इस साल से ही चीन से J-35A जैसे उन्नत विमान मिलने शुरू हो जाएँगे। ऐसे में 10 साल तक इंतजार करना भारत के लिए जोखिम भरा हो सकता है।
पाकिस्तान की सेना ने अपने रक्षा बजट में 18-20% की बढ़ोतरी की है, भले ही उसकी अर्थव्यवस्था कमजोर है और वह IMF से कर्ज ले रहा है। फिर भी, वह भारत के खिलाफ टकराव की तैयारी कर रहा है। यह भारत के लिए साफ चेतावनी है कि उसे अपनी वायुसेना को जल्दी मजबूत करना होगा।
एक अहम बात यह है कि डीआरडीओ ने एएमसीए (AMCA) फाइटर जेट का विकास शुरू कर दिया है, लेकिन पहला विमान 2035 से पहले मिलने की उम्मीद नहीं है।
तेजस मार्क-1 का ऑर्डर पूरा होने के बाद, HAL 2028-29 में तेजस मार्क-2 बनाना शुरू करेगा। इसके बाद ही AMCA का उत्पादन शुरू होगा। किसी भी आधुनिक विमान को बनाने में 10-15 साल लगते हैं। चूँकि AMCA प्रोजेक्ट को पिछले साल ही मँजूरी मिली है, इसलिए अभी इसमें काफी समय लगेगा। इसीलिए भारत को अभी विदेशी पाँचवीं पीढ़ी के विमानों पर विचार करना पड़ रहा है।
अमेरिकी F-35 भारत के लिए क्यों ठीक नहीं?
भारत उन गिने-चुने देशों में है जो रूस और अमेरिका, दोनों से रक्षा उपकरण खरीदता है। रूस लंबे समय से भारत का भरोसेमंद साथी रहा है, जबकि अमेरिका अक्सर रक्षा सौदों का इस्तेमाल भारत पर दबाव बनाने के लिए करता है।
अमेरिका से खरीदे उपकरणों में भारत को कई बार मुश्किलें आई हैं। मिसाल के तौर पर, तेजस MK-1A के लिए अमेरिका की जनरल इलेक्ट्रिक (GE) के F404 इंजन की डिलीवरी में देरी हुई है। तेजस MK-2 के लिए GE F414 इंजन का सौदा भी दो साल पहले हुए समझौते के बावजूद रुका हुआ है।
इस सौदे में भारत में इंजन बनाने और तकनीक हस्तांतरण की बात थी, लेकिन अमेरिका इसमें अड़चन डाल रहा है। पहले राष्ट्रपति ट्रंप ने ‘Make in America’ नीति पर जोर दिया और एप्पल को भी भारत में उत्पादन न करने को कहा था। ऐसे में यह साफ नहीं कि अमेरिका भारत को इंजन बनाने की इजाजत देगा या नहीं।
इसलिए भारत के लिए चिंता की बात है कि अमेरिका से रक्षा उपकरणों की डिलीवरी समय पर नहीं हो रही और न ही तकनीक देने का भरोसा है।
अमेरिका भारतीय सेना के लिए बोइंग के अपाचे हेलीकॉप्टरों की डिलीवरी में भी देरी कर रहा है। मार्च 2024 में भारतीय सेना ने जोधपुर के पास 451 आर्मी एविएशन स्क्वाड्रन तैयार किया था, ताकि अपाचे तैनात किए जा सकें। इनकी डिलीवरी मई-जून 2024 में होनी थी, लेकिन अमेरिका ने सप्लाई-चेन और तकनीकी समस्याओं का बहाना बनाकर इसे दिसंबर 2024 तक टाल दिया। अब वह इस नई समय-सीमा को भी पूरा नहीं कर पाया है।
रूस का Su-57 और अमेरिका का F-35, दोनों ही पाँचवी पीढ़ी के लड़ाकू विमान हैं (फोटो साभार: रायटर्स)
साल 2020 में भारत ने अमेरिका के साथ 600 मिलियन डॉलर का सौदा किया था, जिसमें 6 अपाचे हेलीकॉप्टर खरीदे जाने थे। लेकिन अब तक पहले बैच के तीन हेलीकॉप्टरों की डिलीवरी के लिए अमेरिका दो बार समय-सीमा टाल चुका है। अमेरिका ने साफ नहीं किया कि ये हेलीकॉप्टर कब मिलेंगे और देरी क्यों हो रही है।
अमेरिका इसे सप्लाई-चेन की दिक्कतें और तकनीकी समस्याएँ बता रहा है, लेकिन यह उसकी पुरानी चाल मानी जाती है, जिसमें वह जानबूझकर देरी करता है ताकि भारत पर दबाव बनाए। यह देरी ऐसे समय हो रही है, जब भारत अपनी हवाई ताकत को तेजी से बढ़ा रहा है और चीन-पाकिस्तान के साथ तनाव के चलते युद्ध की तैयारी को प्राथमिकता दे रहा है। अपाचे हेलीकॉप्टर जरूरी हैं, क्योंकि ये आधुनिक हथियारों और टारगेटिंग सिस्टम से लैस हैं। फिर भी अमेरिका इसे प्राथमिकता नहीं दे रहा।
दूसरी तरफ, रूस ने भू-राजनीतिक मुश्किलों के बावजूद भारत को समय पर रक्षा उपकरण देने का अच्छा रिकॉर्ड रखा है। यही कारण है कि Su-57 जैसे विमान को समय पर भारतीय वायुसेना में शामिल करने के लिए रूस ज्यादा भरोसेमंद और अनुमानित विकल्प है।
अमेरिका की डिलीवरी में देरी कोई नई बात नहीं। उसकी विदेश नीति अक्सर दबाव बनाने, धमकाने, प्रतिबंध लगाने और न मानने वाले देशों में शासन बदलने की कोशिशों पर टिकी रही है। जैसा कि पूर्व अमेरिकी विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर ने कहा था, “अमेरिका का दुश्मन होना खतरनाक हो सकता है, लेकिन उसका दोस्त होना जानलेवा भी हो सकता है।” यह बात आज भी सही लगती है।
दिलचस्प है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कई बार ‘व्यापार समझौतों’ को संघर्ष सुलझाने का हथियार बताया, लेकिन यूक्रेन-रूस युद्ध और भारत-पाकिस्तान तनाव जैसे मामलों में यह रणनीति नाकाम रही, जैसे संयुक्त राष्ट्र इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष को रोकने में नाकाम रहा।
रूस का Su-57 क्यों बेहतर है?
भारत और रूस का रक्षा रिश्ता लंबे समय से भरोसे और सम्मान पर टिका है। रूस का Su-57 ऑफर भारत के लिए खास है, क्योंकि यह ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसी योजनाओं से मेल खाता है। रूस ने Su-57 के भारत में गहरे निर्माण का प्रस्ताव दिया है, जिसमें हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) की उन फैक्ट्रियों में सह-उत्पादन शामिल है, जहां पहले से Su-30MKI विमान बन रहे हैं। यह भारत को उन्नत तकनीक देगा और घरेलू रक्षा उद्योग को मजबूत करेगा।
रूस ने Su-57 की पूरी तकनीक देने और भारत को GaN-आधारित AESA रडार, भारतीय मिशन कंप्यूटर और स्वदेशी हथियार जैसे अस्त्र और रुद्रम मिसाइल जोड़ने की छूट देने का वादा किया है।
सबसे खास बात ये है कि 4 जून 2025 को रूस की यूनाइटेड एयरक्राफ्ट कॉरपोरेशन ने कहा कि भारत को Su-57 के सोर्स कोड तक पूरी पहुँच मिलेगी। यह बहुत बड़ा ऑफर है, क्योंकि इससे भारत को विमान में अपनी जरूरत के हिसाब से बदलाव करने की आजादी मिलेगी। ऐसी पारदर्शिता और नियंत्रण शायद ही कोई और देश दे।
वहीं, अमेरिका का F-35 सिर्फ चुनिंदा सहयोगी देशों जैसे इजरायल, जापान, ऑस्ट्रेलिया और इटली को मिलता है। इसके सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर पर अमेरिका का सख्त नियंत्रण है। खरीदार देशों को F-35 बनाने या उसमें गैर-NATO हथियार जोड़ने की इजाजत नहीं मिलती, जब तक अमेरिका मंजूरी न दे। यह भारत के लिए मुश्किल है, क्योंकि भारत अपने हिसाब से विमान में बदलाव और स्वदेशी हथियार जोड़ना चाहता है।
भारत की नीति विदेशी रक्षा आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भरता कम करने की है। अमेरिका का सख्त रवैया भारत के लिए चिंता का सबब है। ट्रंप के समय यह और साफ हुआ, जब अमेरिका ने तकनीक देने से मना किया, यह कहकर कि इससे उसकी तकनीकी बढ़त कमजोर हो सकती है।
कीमत की बात करें तो अमेरिकी F-35A की लागत लगभग 80 से 110 मिलियन डॉलर प्रति यूनिट है, जबकि रूस का Su-57 कहीं ज्यादा सस्ता है, करीब 35 से 40 मिलियन डॉलर प्रति यूनिट। इसके अलावा, Su-57 की रखरखाव लागत भी F-35 की तुलना में काफी कम है। इसलिए, सिर्फ रणनीतिक और तकनीकी कारणों से ही नहीं, बल्कि आर्थिक नजरिए से भी Su-57 भारत के लिए एक ज्यादा व्यावहारिक और लचीला विकल्प बन जाता है।
रूस का Su-57 और अमेरिका का F-35 – दो पाँचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान (फोटो: रॉयटर्स)
लागत और तकनीकी दिक्कतें
F-35 की कीमत 80 से 110 मिलियन डॉलर प्रति विमान है, जबकि Su-57 सिर्फ 35 से 40 मिलियन डॉलर में मिलता है। Su-57 की रखरखाव लागत भी F-35 से कम है। यानी आर्थिक, तकनीकी और रणनीतिक नजरिए से Su-57 भारत के लिए ज्यादा फायदेमंद है।
साल 2023 की एक बिजनेस इनसाइडर रिपोर्ट के मुताबिक, F-35 में कई तकनीकी समस्याएँ हैं, जैसे स्टील्थ कोटिंग, सुपरसोनिक उड़ान, हेलमेट डिस्प्ले और तोप में कंपन। इसे बिजली गिरने से भी खतरा है।
सिर्फ तकनीकी नहीं, बल्कि साइबर सुरक्षा को लेकर भी चिंता है। F-35 को हैकिंग के लिए असुरक्षित माना गया है। 2015 में एक जर्मन पत्रिका ने खुलासा किया था कि एडवर्ड स्नोडेन द्वारा लीक किए गए दस्तावेजों के अनुसार, चीनी हैकर्स ने ऑस्ट्रेलिया के US-निर्मित F-35 से लगभग 50 टेराबाइट डेटा चुरा लिया था। इसमें विमान के रडार सिस्टम, इंजन डिज़ाइन और टारगेट ट्रैकिंग तकनीक जैसी संवेदनशील जानकारी शामिल थी।
यही कारण है कि विशेषज्ञों का मानना है कि चीन के J-35A और अमेरिका के F-35 में कई डिजाइन और तकनीकी समानताएँ दिखती हैं। ये सभी बातें F-35 की विश्वसनीयता और सुरक्षा पर सवाल खड़े करती हैं, खासकर उन देशों के लिए जो इसे अपनाने पर विचार कर रहे हैं।
अगर भारत F-35 फाइटर जेट को तैनात करना चाहता है, तो उसे अमेरिका से AIM-120 एडवांस मीडियम-रेंज एयर-टू-एयर मिसाइल (AAM) भी खरीदनी पड़ेगी। ऐसा इसलिए क्योंकि F-35 में भारत की अपनी मिसाइलें या गैर-NATO हथियार तभी लगाए जा सकते हैं जब अमेरिका इसकी इजाजत दे, जो आसान नहीं है।
इसके अलावा, भारतीय वायुसेना (IAF) के पास पहले से ही सात अलग-अलग तरह के फाइटर जेट हैं। तेजस, राफेल, मिग-21, मिग-29, सुखोई Su-30MKI, मिराज 2000 और जगुआर। इन सभी की मेंटेनेंस, स्पेयर पार्ट्स, ओवरहाल और ट्रेनिंग पर भारी खर्च आता है। अगर भारत अब एक और अलग और महंगा फाइटर जेट F-35 शामिल करता है, तो यह एक बड़ा लॉजिस्टिक सिरदर्द बन सकता है और संचालन में और भी जटिलता जोड़ देगा।
हालाँकि Su-57 भी एक नया फाइटर जेट है, लेकिन चूँकि यह सुखोई परिवार से है, और भारत पहले से ही Su-30MKI जैसे सुखोई विमानों का इस्तेमाल कर रहा है, इसलिए Su-57 को अपनाना ज्यादा आसान, सस्ता, और IAF के लिए बेहतर फिट हो सकता है। इससे रखरखाव और ट्रेनिंग में भी आसानी होगी।
तकनीकी बातों के अलावा, भारत के रक्षा खरीद फैसले भू-राजनीतिक कारणों से भी बहुत प्रभावित होते हैं। खासकर अमेरिका द्वारा लगाए जाने वाले प्रतिबंधों के डर से, जिन्हें काउंटरिंग अमेरिकाज एडवर्सरीज थ्रू सैंक्शन्स एक्ट (CAATSA) कहा जाता है।
उदाहरण के लिए, भारत ने 2021 में रूस से S-400 एयर डिफेंस सिस्टम खरीदा था, जिससे अमेरिका नाराज़ हो गया था। इसके बावजूद भारत ने अमेरिका की धमकियों और हथियारों की सप्लाई में देरी की चेतावनियों को नजरअंदाज किया और S-400 खरीदने का अपना फैसला कायम रखा।
इसके बाद रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान, अमेरिका ने भारत के रूस से तेल खरीदने पर भी आपत्ति जताई और फिर से प्रतिबंधों की धमकी दी। इन सब घटनाओं से साफ होता है कि भारत अपने रक्षा और ऊर्जा जरूरतों के लिए अमेरिका के दबावों के बावजूद अपने रणनीतिक फैसले खुद ले रहा है।
संयुक्त राज्य अमेरिका ने हमेशा अपनी रक्षा तकनीकों को सुरक्षित रखने के लिए निर्यात नियंत्रण और प्रतिबंध लगाए हैं। इससे भारत के लिए F-35 के पुर्जों और रखरखाव में दिक्कतें आ सकती हैं, खासकर संकट के समय। अमेरिका पहले भी उन देशों को हथियारों की सप्लाई में देरी करता रहा है या रोक लगाता है, जिन्हें वह अपनी रणनीतिक प्राथमिकताओं के खिलाफ समझता है।
जैसा कि पहले बताया गया है, अमेरिका इस तरह की देरी रणनीतिक दबाव बनाने के लिए करता है ताकि दूसरे देश उसके अनुसार चलें। अमेरिका की विश्वसनीयता इस बात से भी सवाल उठती है कि वह पाकिस्तानी नागरिकों को अमेरिका में आतंकवादी गतिविधियों के आरोप में गिरफ्तार करता है, लेकिन फिर भी पाकिस्तान को ‘अभूतपूर्व भागीदार’ कहकर समर्थन देता रहता है। वह भारत को परेशान करने के बावजूद पाकिस्तान के साथ अपने रिश्ते खत्म नहीं करता।
भारत अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता पर जोर देता है और किसी का कठपुतली बनने से मना करता है। इसलिए, वह किसी एक देश पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहना चाहता। ऐसे में रूस का Su-57 जेट भारत के लिए एक बेहतर विकल्प है क्योंकि इसमें भू-राजनीतिक बंधन कम हैं और यह भारत की स्वतंत्रता और सुरक्षा की जरूरतों के अनुसार बेहतर फिट बैठता है।
इस बात में कोई शक नहीं कि भारत को अपनी रक्षा जरूरतों के लिए विदेशी निर्भरता कम करनी चाहिए। लेकिन रूस के साथ भारत की रक्षा साझेदारी ने समय की कसौटी पर अच्छा प्रदर्शन किया है।
भारत का लगभग 60 प्रतिशत सैन्य उपकरण जैसे ब्रह्मोस मिसाइल, Su-30MKI लड़ाकू जेट, S-400 सिस्टम और T-72 टैंक रूसी हैं। जब प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, समर्थन और सह-उत्पादन की बात आती है, तो रूस काफी लचीला रहता है, जबकि अमेरिका इसे ‘सुरक्षा कारणों’ का हवाला देकर मना कर देता है।
Su-30MKI, रूसी Su-30 का एक खास रूप है, जो भारतीय वायु सेना का मुख्य हिस्सा है और इसके 260 से ज्यादा विमान सेवा में हैं। HAL की नासिक फैक्ट्री में इसका सफल निर्माण भारत-रूस रक्षा सहयोग की ताकत दिखाता है।
रूस ने भारत में मौजूदा सुविधाओं का इस्तेमाल करने का भी प्रस्ताव दिया है, जिससे Su-57 को अपनाना आसान होगा। इसके मुकाबले, अमेरिका का F-35 जेट भारत के लिए नया होगा, जिससे नए प्रशिक्षण और रखरखाव की जरूरत पड़ेगी और रसद की परेशानियां बढ़ेंगी। इस वजह से रूस का विकल्प भारत के लिए ज्यादा सुविधाजनक और सही माना जा रहा है।
जैसा कि ऊपर बताया गया है, रूस की विश्वसनीयता भारत के लिए महत्वपूर्ण समय पर साबित हुई है, जैसे 1971 के भारत-पाक युद्ध में, जबकि अमेरिका के साथ ऐसा भरोसा कम है। अमेरिका ने भारत को C-17 ग्लोबमास्टर और अपाचे हेलीकॉप्टर दिए हैं, लेकिन महत्वपूर्ण हिस्सों की डिलीवरी में जानबूझकर देरी और सख्त निर्यात नियम भारत के लिए चिंता का कारण बने हैं।
रूसी Su-57 पाँचवीं पीढ़ी का स्टील्थ लड़ाकू विमान न केवल F-35 से सस्ता है, बल्कि भारत के रक्षा बजट के हिसाब से भी बेहतर है और भारत को बड़े बेड़े खरीदने की सुविधा देता है। Su-57 का डिजाइन खासतौर पर तेज़ गति, सुपरक्रूज़ (लगातार तेज उड़ान) और बहु-भूमिका क्षमता पर केंद्रित है, जो चीन की सीमा जैसे उच्च और चुनौतीपूर्ण इलाकों में लड़ने के लिए भारत की जरूरतों के लिए बेहतर है।
वहीं, F-35 नेटवर्क-आधारित युद्ध के लिए ज्यादा अनुकूलित है और यह अकेले ऑपरेशन के लिए भारत की जरूरतों को पूरी तरह पूरा नहीं कर सकता। इसलिए, Su-57 भारत के लिए ज्यादा सही विकल्प माना जा रहा है।
बदलते वैश्विक रिश्तों में भारत नाटो के ज्यादा करीब नहीं रहना चाहेगा, खासकर जब रूस, नाटो समर्थित यूक्रेन से युद्ध कर रहा है। रूस का Su-57 सह-उत्पादन का ऑफर भारत को उन्नत विमान बनाने और क्षेत्रीय निर्यात का मौका देगा। इससे भारतीय रक्षा उद्योग को फायदा होगा, क्योंकि दुनिया भारत के हथियारों में रुचि दिखा रही है। F-35 में निर्यात पर सख्त पाबंदी है, इसलिए भारत को ऐसी आजादी नहीं मिलेगी।
इससे भारतीय रक्षा उद्योग को बड़ा फायदा होगा, क्योंकि दुनिया भारत के युद्ध-परीक्षणित हथियारों में तेजी से रुचि दिखा रही है। वहीं, अमेरिका के F-35 में निर्यात पर सख्त रोक के कारण भारत को ऐसी आज़ादी नहीं मिलेगी। इसलिए, Su-57 भारत के लिए बेहतर विकल्प है।
निष्कर्ष
जब तक AMCA जैसे स्वदेशी विमान तैयार नहीं हो जाते, भारत को पाँचवीं पीढ़ी के विदेशी विमानों पर विचार करना होगा। इस दौरान लागत, आसानी और समय पर डिलीवरी महत्वपूर्ण है, जो रूस बेहतर दे सकता है। रूस का भारत के साथ पुराना भरोसा, तकनीक देने की इच्छा और भारत की रणनीतिक आजादी का सम्मान उसे बेहतर विकल्प बनाता है।
रक्षा में आयात कम करना चाहिए, लेकिन AMCA तैयार होने तक भारत को रूस जैसे भरोसेमंद साथी पर भरोसा करना चाहिए, न कि अमेरिका पर। खासकर जब अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप पाकिस्तान के पक्ष में रहे हैं और अपनी निजी योजनाओं में व्यस्त हैं। भारत कब तक अपनी रक्षा और रणनीतिक आजादी को छोड़कर अमेरिका के स्वार्थों का बोझ उठाएगा?
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शुक्रवार को ईरान को चेतावनी दी है कि वह परमाणु समझौते को स्वीकार करे, वरना परिणाम भुगते। उन्होंने कहा कि इजरायल के पास दुनिया में सबसे बेहतरीन अमेरिकी हथियार हैं और दावा किया कि इजरायल का अगला हमला और भी घातक होगा।
ट्रंप ने कहा कि ईरान को इससे पहले समझौता कर लेना चाहिए, जब तक कि कुछ भी न बचे। उन्होंने कहा- “बस करो, इससे पहले कि बहुत देर हो जाए”
60 दिन का ईरान को ट्रंप ने दिया था वक्त
सोशल मीडिया पोस्ट पर डोनाल्ड ट्रंप ने लिखा है कि उन्होंने ईरान को समझौता करने के कई मौके दिए, लेकिन वे इसे पूरा नहीं कर पाए। उन्होंने कहा कि उन्होंने चेतावनी दी थी कि हमला उनकी अपेक्षा से कहीं अधिक भयानक होगा, लेकिन कुछ ईरानी कट्टरपंथियों ने समझौते को अस्वीकार कर दिया। ट्रंप ने कहा कि ऐसे कट्टरपंथी अब मर चुके हैं। ट्रंप के मुताबिक उन्होंने ईरान को 60 दिन का वक्त दिया था लेकिन ईरान ने गँवा दिया और समझौता नहीं किया।
ट्रंप ने कहा, “मैंने ईरान को समझौता करने के लिए कई मौके दिए। मैंने उन्हें सख्त शब्दों में कहा, “बस करो”, लेकिन चाहे उन्होंने कितनी भी कोशिश की हो, चाहे वे कितने भी करीब क्यों न पहुँचे हों, वे इसे पूरा नहीं कर पाए। संयुक्त राज्य अमेरिका दुनिया में अब तक का सबसे बेहतरीन और सबसे घातक सैन्य उपकरण बनाता है। इजरायल के पास इसका भंडार है। वे जानते हैं कि इसका इस्तेमाल कैसे करना है? कुछ ईरानी कट्टरपंथी बहादुरी से बोलते थे, लेकिन उन्हें नहीं पता था कि क्या होने वाला है। वे सभी अब मर चुके हैं, और स्थिति और भी बदतर होगी!”
नरसंहार को रोकने का अभी भी है वक्त-ट्रंप
अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि इजरायली हमले को रोकने के लिए समय है। इसके लिए ईरान को एक समझौता करना होगा। उन्होंने कहा, “पहले से ही बहुत अधिक मौतें और विनाश हो चुके हैं, लेकिन इस नरसंहार को समाप्त करने के लिए अभी भी समय है। ईरान को परमाणु समझौता करना चाहिए, इससे पहले कि कुछ भी न बचे, और जिसे कभी ईरानी साम्राज्य के रूप में जाना जाता था उसे बचाओ।”
डोनाल्ड ट्रम्प ने ट्रुथ पोस्ट में कहा, “अब और मौत नहीं, अब और विनाश नहीं, बस करो, इससे पहले कि बहुत देर हो जाए। भगवान आप सभी का भला करे!”
ईरान नहीं करेगा अब अमेरिका के साथ परमाणु वार्ता
ईरान ने आधिकारिक तौर पर संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ परमाणु वार्ता से हटने की घोषणा की है। यह निर्णय इजरायल द्वारा ईरानी परमाणु और सैन्य स्थलों पर हमला और तेहरान द्वारा जवाबी ड्रोन हमले के बाद लिया गया है।
इस वार्ता का उद्देश्य 2015 के परमाणु समझौते को फिर से लागू करना था। उस वक्त प्रतिबंधों में राहत के बदले ईरान की परमाणु गतिविधि को सीमित कर दिया गया था।
इस बीच ईरान ने अपने परमाणु स्थलों पर हमले और तेहरान में अपने वरिष्ठ सैन्य नेतृत्व की हत्या का बदला लेने की कसम खाई है और कहा कि वह जोरदार तरीके से जवाब देगा और “इस कहानी का अंत ईरान के हाथों से लिखा जाएगा”।
भोपाल ‘लव जिहाद’ केस में पुलिस ने पॉक्सो एक्ट के तहत भोपाल की विशेष अदालत में 250 पन्नों का चालान (चार्जशीट) दाखिल कर दिया है। यह चालान गुरुवार (12 जून 2025) को जिला न्यायालय में जज नीलम मिश्रा की कोर्ट में पेश किया गया। इस केस में मुख्य आरोपित फरहान खान और उसका साथी साहिल खान हैं। पुलिस ने 57 गवाहों की सूची के साथ यह चालान तैयार किया है।
कोर्ट को दिए गए चालान के साथ पीड़िताओं की मेडिकल रिपोर्ट और महत्वपूर्ण दस्तावेज भी पेश किए गए हैं।
क्या है मामला?
यह घटनाक्रम भोपाल के पिपलानी थाना क्षेत्र के कोकता इलाके में हुई। यहाँ एक निजी कॉलेज की छात्राओं को दोस्ती का झाँसा देकर फँसाया गया। आरोपितों ने पहले लड़कियों को अपने प्रेम जाल में उलझाया, फिर उनके साथ जबरदस्ती शारीरिक संबंध बनाए। इतना ही नहीं, उन्होंने पीड़िताओं पर धर्म बदलने का दबाव डाला और हिंदू धर्म के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणियाँ कीं।
पुलिस की जाँच के अनुसार, फरहान खान ने पहले एक कॉलेज छात्रा (बड़ी बहन) को अपने दोस्त हामिद के घर ले जाकर उसके साथ बलात्कार किया। इसके बाद साहिल खान ने इस घटना का वीडियो बनाकर लड़की को ब्लैकमेल करना शुरू किया। वह उससे बार-बार मिलने के लिए दबाव डालता था। चूँकि लड़की किराए के मकान में रहती थी, इसलिए उसे डर था कि यह बात मकान मालिक या परिवार तक पहुँच जाएगी। इस डर का फायदा उठाकर आरोपित लगातार उसका शोषण करते रहे।
छोटी बहन भी नहीं बची
एक दिन जब बड़ी बहन अपने कमरे पर नहीं थी, तब उसकी छोटी बहन, जो स्कूल में पढ़ती है, वहाँ अकेली थी। आरोपितों ने मौके का फायदा उठाया और नाबालिग लड़की के साथ भी बलात्कार किया।
धर्मपरिवर्तन का डाला दबाव
साहिल ने बड़ी बहन को शादी का लालच देकर उस पर धर्म बदलने का दबाव बनाया। उससे जबरदस्ती मांस खिलाया गया और बुर्का पहनने के लिए मजबूर किया गया। इसके अलावा, पीड़िता के साथ मारपीट भी की गई। उसे लगातार धमकियाँ दी जाती थीं ताकि वह इस बारे में किसी से बात न करे।
और लड़कियाँ भी थीं निशाने पर
पुलिस ने फरहान के फोन की जाँच की तो उसमें आठ अन्य लड़कियों के वीडियो मिले। जब पुलिस ने इन लड़कियों से संपर्क किया, तो पता चला कि ज्यादातर पीड़िताएँ उसी टीआईटी कॉलेज की छात्राएँ थीं। जाँच में खुलासा हुआ कि फरहान और साहिल एक बड़े ‘लव जिहाद’ गिरोह का हिस्सा थे, जिसमें नबील, अली, साद और अबरार जैसे अन्य लोग भी शामिल थे।
पुलिस की चार्जशीट में यह भी खुलासा हुआ है कि फरहान और साहिल दोनों बारी-बारी से आए दिन कॉलेज छात्राओँ से दुष्कर्म करते थे। इस गिरोह के लोग कॉलेज की छात्राओं को निशाना बनाते और उनका शोषण करते थे।
पुलिस ने फरहान और साहिल को गिरफ्तार कर लिया और उन्हें वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए कोर्ट में पेश किया। चालान के साथ पीड़िताओं की मेडिकल रिपोर्ट और अन्य जरूरी दस्तावेज भी कोर्ट में जमा किए गए। पुलिस ने मध्यप्रदेश धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम के तहत भी आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई की, क्योंकि इस मामले में धर्मांतरण का दबाव डालने का आरोप भी है।
इस मामले में पॉक्सो एक्ट के तहत भी केस चल रहा है। बता दें कि पॉक्सो एक्ट (प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्शुअल ऑफेंसेज एक्ट) बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों से बचाने के लिए बनाया गया कानून है। इस मामले में एक नाबालिग लड़की भी पीड़िता है, इसलिए इस कानून के तहत कार्रवाई हो रही है।
गुरुवार (12 जून 2025) को अहमदाबाद में हुए भीषण प्लेन क्रैश में 265 लोगों ने अपनी जान गँवा दी। कई अन्य लोग घायल भी हैं जिनका अहमदाबाद के सिविल अस्पताल में इलाज चल रहा है। इस दुर्घटना के बाद देश ही नहीं दुनिया भर के लोग शोक व्यक्त कर रहे हैं, पर इसी बीच देश के ‘लिबरल समुदाय’ के कुछ ऐसे लोग भी हैं जो इस आपदा को अपने लिए ‘अवसर’ में तब्दील करने की कोशिश कर रहे हैं। यह कोशिश भी देश के अंदर के लोगों के लिए नहीं बल्कि गाजा के लोगों के लिए ‘विक्टिम कार्ड’ खेलने की है।
इस लिबरल समुदाय ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर अहमदाबाद प्लेन क्रैश को भी गाजा के लोगों से तुलना करनी शुरू कर दी। मुस्लिम समुदाय के कई लोग लिख रहे हैं कि अगर अहमदाबाद के विमान दुर्घटना पर लोग इतनी संवेदना जाताई रही है तो गाजा के लिए यह संवेदना क्यों नहीं है।
इस ‘विक्टिम कार्ड’ के पैंतरे को खेलने के चक्कर में लोगों ने बॉलीवुड के अभिनेताओं को भी नहीं बख्शा। बॉलीवुड के कई सितारों ने प्लेन क्रैश दुर्घटना पर शोक व्यक्त किया और पीड़ित परिवारों को साहस रखने के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर पोस्ट साझा की। बॉलीवुड के अभिनेता शाहरुख खान ने भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर अपनी संवेदना प्रकट की तो इस पर कुछ यूजर्स गाजा के लिए विक्टिम कार्ड खेलने से नहीं चूके।
Shah Rukh Khan ne Ahmedabad plane crash par apna dukh vyakt kiya, jo ek achhi baat hai. Lekin insaniyat sirf mulkon tak seemit nahi. Gaza ke mazloom aur beqasoor log bhi hamare intezar mein hain – kya unke liye bhi SRK jaise aawaz uthayenge?"#GazaUnderAttack#ShahRukhKhan#crashhttps://t.co/Cn3J0abuhU
यूजर्स ने शाहरुख को इस बात का ताना दिया कि उन्होंने अहमदाबाद प्लेन क्रैश की संवेदना की तरह गाजा के लोगों के लिए कुछ क्यों नहीं लिखा।
इस प्लेन क्रैश में अभिनेता विक्रांत मेसी के चचेरे भाई की भी मौत हुई है। इस घटना पर शाहरुख खान के साथ-साथ सलमान खान, अनुपम खेर, सुनील शेट्टी, आमिर खान के प्रोडक्शन हाउस, अक्षय कुमार, अजय देवगन, अनुष्का शर्मा, रितेश देशमुख, सोनू सूद, परिणीति चोपड़ा, सारा अली खान, अल्लू अर्जुन, सोनाक्षी सिन्हा, करिश्मा कपूर, अभिषेक बच्चन, जूनियर NTR, आलिया भट्ट, करण जौहर समेत कई सितारों ने संवेदना प्रकट की है।
एक पाकिस्तानी नागरिक ने लिखा कि अहमदाबाद की दुर्घटना पर पाकिस्तानियों को दुख है, लेकिन इससे पहले गाजा के विषय पर भारतीयों ने जश्न मनाया था।
We Pakistanis are heartbroken and deeply saddened by the plane crash and the loss of lives in India. Although people in India previously made insensitive remarks about the destruction of Gaza and even mocked a past plane crash in Pakistan, I urge my fellow Pakistanis not to… pic.twitter.com/zrVWJem5ix
असल में तो इस ‘उदारवादी समुदाय’ को अपना प्रोपेगेंडा चलाने के लिए सिर्फ एक सहारे की आवश्यकता होती है। प्लेन क्रैश में मरे किसी भी व्यक्ति की जात-पात धर्म से किसी को कोई मतलब नहीं रहा।
अन्य लोगों ने सिर्फ पीड़ितों की मदद और मृतकों के परिवार के लिए दुख जताया, लेकिन मुस्लिम समुदाय के लोगों ने यहाँ पर भी गाजा के लिए विक्टिम कार्ड का पैंतरा खोज ही लिया। एक दुर्घटना को दो देशों के बीच की अनबन से कैसे जोड़ा जा सकता है, यह भला कोई इन जैसे यूजर्स से सीखे।
लोगों की मौत पर हँसने की प्रतिक्रिया
बात यहीं पर खत्म भी नहीं होती, दुर्घटना के बाद जब कई मीडिया हाउसेज ने इस बात की जानकारी अपने सोशल मीडिया पेज पर दी तो वहाँ पर भी सिर्फ मुस्लिम समुदाय के लोगों ने ही जश्न मनाने और हँसने वाली प्रतिक्रियाएँ दीं। इन प्रतिक्रियाओं पर भी लोगों का आक्रोश सामने आया है।
Heartbreaking to see Islamists ghoulishly laughing over the Air India #planecrash tragedy in Ahmedabad.
Over 240 lives lost, and their mockery is a shameful display of inhumanity.
आतंकी हमला हो, प्राकृतिक आपदा हो या अब विमान दुर्घटना, एक परेशान करने वाला पैटर्न ये है कि जब असल में आम जनता की मदद करने या एकजुटता दिखाने की बात आती है तो इन ‘लिबरल’ वामपंथियों और उनके इस्लामी कट्टरपंथी साथी गायब हो जाते हैं। ये तब अपना फन उठाते हैं जब घटना को अवसर के रूप में इस्तेमाल करना हो- वो भी एकता या सहानुभूति के लिए नहीं, बल्कि राजनीतिक लाभ के लिए।
इस प्लेन क्रैश के बाद भी इन लिबरल्स ने लोगों की मदद करने नाम पर चुप्पी साध ली। न तो कोई रक्तदान करने के लिए सामने आया, न ही किसी ने पीड़ितों या मृतकों की सुध लेने की कोशिश की, रेस्क्यू के लिए भी इनमें से कोई सामने नहीं दिखा, न ही अस्पताल में परेशान भटक रहे परिजनों को ढाँढस बंधाने के लिए कोई दिखा। लेकिन सरकार से दुर्घटना पर जवाब माँगना ये लिबरल कतई नहीं भूले।
सैकड़ों लोग अपनी जान बचाने की जिद्दोजहद कर रहे थे तब मदद के लिए वे लोग सामने आए जिन्हें ये ‘उदारवादी’ समुदाय गालियाँ देता है। ये है- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, जिन्हें ये लिबरल्स राजनीतिक लाभ के भूखे लगते हैं, वे कार्यकर्ता बिना किसी लाग लपेट के घटना के आधे घंटे के भीतर पीड़ितों की मदद के लिए पहुँच गए।
इस मदद के एवज में RSS कार्यकर्ताओं ने किसी तरह की नुमाइश या स्वयं को महान बताने की चेष्ठा नहीं की, बस चुपचाप लोगों का सहारा बने रहे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस/RSS) ने अहमदाबाद में ही नहीं बल्कि अपनी स्थापना से बाद से आज तक कई आपदाओं और संकटों के दौरान पीड़ितों की मदद की है।
कई सामाजिक सेवा कार्य भी किए हैं, जिनमें शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्रामीण विकास शामिल हैं। आरएसएस ने विभिन्न आपदाओं और आपात स्थितियों के दौरान पीड़ितों को आश्रय, भोजन, कपड़े और चिकित्सा सहायता प्रदान की है।
संकटकाल में ढाल बन कर खड़े रहे RSS कार्यकर्ता
देश में आई आपदाओं और संकटकाल के समय RSS कार्यकर्ता जी जान से सेवा में जुटते हैं और लोगों के लिए संकट के सामने ढाल बनकर कड़े रहते हैं। इनमें 1971 का ओडिशा चक्रवात, 1977 का आंध्र प्रदेश चक्रवात, 2004 का हिंद महासागर भूकंप और 2004 का सुमात्रा-अंडमान भूकंप समेत कई अन्य विपदाएँ शामिल हैं।
किसी दुर्घटना-आपदा में केवल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ @RSSorg के कार्यकर्ता ही मदद के लिए आगे आते हैं कोई मुस्लिम संगठन,या ईसाई मिशनरी के लोग क्यों नहीं आते ?मरने वालो में सभी धर्मों के लोग हैं.पत्रकार के रूप में जहाँ दुर्घटना कवर करने गया,हर जगह मुझे संघ कार्यकर्ता सेवा करते मिले pic.twitter.com/HV0BVZTAkf
युद्ध और संघर्षों की बात करें तो आरएसएस ने 1962 के भारत-चीन युद्ध, 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध, 1999 के कारगिल युद्ध के साथ कश्मीर में आतंकवाद के कारण प्रभावित लोगों की कई बार मदद की है। इसके अलावा आरएसएस ने 1984 के सिख विरोधी दंगों के दौरान सिख समुदाय के लोगों की मदद की। 1971 में आए ओडिशा चक्रवात को याद करें तो उस समय आरएसएस कार्यकर्ताओं ने चक्रवात पीड़ितों को भोजन, पानी, कपड़े और चिकित्सा सहायता प्रदान की थी।
इसके बाद 1984 में हुई भोपाल गैस त्रासदी में भी कार्यकर्ताओं ने पीड़ितों को चिकित्सा सहायता दिलाई। साथ ही त्रासदी के पीड़ितों के पुनर्वास में भी मदद की। इसके बाद 1999 में कारगिल युद्ध के समय भी आरएसएस ने युद्ध से प्रभावित परिवारों की मदद करने के साथ बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक जरूरतों को पूरा किया।
गुजरात में 2001 में आए विनाशकारी भूकंप में सैकड़ों लोगों की जान गई। इस दौरान भी आरएसएस कार्यकर्ता सड़कों पर उतरे और भूकंप पीड़ितों को आश्रय, भोजन, कपड़े और चिकित्सा सहायता समेत अन्य जरूरतों का प्रबंधन किया। यही नहीं, 2004 में अंडमान के सुमात्रा में आए भूकंप और सुनामी में भी कार्यकर्ताओं ने पीड़ितों के लिए राहत कार्यों में जी जान से जुटे और उनके भी पुनर्वास में मदद की।
इसके अलावा 2020 में कोरोना महामारी, 2023 में दिल्ली में आई बाढ़ या फिर कोई अन्य परेशानी हो, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपनी लाठी और मजबूत कंधों के साथ हर पल लोगों की हरसंभव मदद के लिए खड़ा रहा है।
असल में इन लिबरल्स और उदारवादी लोगों को हर मुद्दे पर सिर्फ अपना हित साधना आता है। लोगों की परेशानी से इन्हें कभी कोई मतलब नहीं होता। राजनीतिक लाभ के लिए ये किसी भी हद तक जा सकते हैं। फिर अगर कोई इस समुदाय को बेपर्दा करने की कोशिश करे तो पूरी जमात ‘देशभक्ति’ का दावा ठोकने लगती है। इससे परे किसी विपदा के समय खुद तो कभी मदद के लिए हाथ नहीं बढ़ाते लेकिन दूसरे लोगों की मदद को प्रोपेगेंडा बताने से भी नहीं चूकते।
मेघालय हनीमून मर्डर केस ने देश भर में सनसनी मचा दी है। इंदौर की नवविवाहित सोनम रघुवंशी पर अपने पति राजा रघुवंशी की हत्या का आरोप है। हत्या में शामिल सोनम का प्रेमी राज कुशवाहा भी है। इस जघन्य अपराध को लेकर विभिन्न मंचों पर बहस छिड़ी हुई है।
द प्रिंट की लेखिका अमाना बेगम ने इस हत्या और धोखे मामले को जातिगत भेदभाव और महिलाओं की स्वतंत्रता के अभाव पर एक लेख लिख दिया है।
द प्रिंट की लेखिका अमाना बेगम के अनुसार, भारत में आज भी अलग जाति में प्यार करना एक विद्रोह है, और महिलाओं को अपनी पसंद के साथी से शादी करने से रोका जाता है, जिससे वे ऐसे कदम उठाने पर मजबूर होती हैं।
‘द प्रिंट’ की लेखिका यह भी कहती है, कि अगर महिला नौकरी नहीं करती, तो उसके पास बिना मर्जी के शादी करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता। अमाना बेगम यह मानती हैं कि परिवार बच्चों को ब्लैकमेल करके ज़बरदस्ती शादी करवाते हैं, जहाँ समाज में दिखावा भावनाओं से ज़्यादा ज़रूरी होता है।
लेकिन यह सोच इस पेचीदा मामले को सिर्फ़ एक छोटे दायरे में बाँध देती है। सोनम-राजा हत्याकांड को जातिवाद या फेमिनिज्म के नज़रिए से देखना सच से भटकना है। यह एक गंभीर अपराध को किसी सामाजिक मुद्दे की चादर ओढ़ाने जैसा है। इस केस में न कोई जातिवाद है और न ही यह फेमिनिज्म का मामला है। यह तो व्यक्तिगत धोखे, लालच और अपराधी सोच का नतीजा है।
सबसे पहले, द प्रिंट का यह दावा कि यह ‘नीची जाति’ के आधार पर देखा गया मामला है, पूरी तरह से गलत है। रघुवंशी और कुशवाहा दोनों ही समाज में स्थापित समुदाय हैं। सोनम के पिता ने अपनी बेटी के भविष्य को देखकर ही उसकी शादी एक अच्छे परिवार में करवाई होगी। यह किसी भी माता-पिता का फर्ज है कि वे अपनी संतान के लिए सबसे अच्छा जीवनसाथी चुनें, ख़ासकर जब उनकी बेटी पढ़ी-लिखी और अच्छे परिवार से हो।
सवाल यह भी उठता है कि क्या कोई पिता अपनी बेटी को उस व्यक्ति के हवाले करेगा, जो उसकी ही फैक्ट्री में एक कर्मचारी के तौर पर काम करता हो? सामाजिक और आर्थिक स्तर में यह अंतर अक्सर परिवारों को ऐसे रिश्तों को स्वीकार करने से रोकता है।
यह कोई ‘जातिगत भेदभाव’ नहीं, बल्कि भविष्य में स्थिरता और बराबरी लाने की एक प्रेक्टिकल सोच है। एक पिता हमेशा अपनी बेटी के लिए सुरक्षित, खुशहाल और सामाजिक रूप से स्वीकार्य परिवार चाहता है। यह कोई पुरानी सोच नहीं, बल्कि हर इंसान की स्वाभाविक इच्छा है।
दूसरा अहम मुद्दा राज कुशवाहा और सोनम के रिश्ते का दिखावा है। जानकारी के अनुसार, राज कुशवाहा लोगों के सामने सोनम को ‘दीदी’ बुलाता था और अपनी कलाई पर ‘राखी भी बँधवाता’ था। यह भाई-बहन के रिश्ते का संकेत है, जिसे समाज में सम्मान मिलता है।
लेकिन पर्दे के पीछे, वे प्रेमी-प्रेमिका की भूमिका निभा रहे थे और राज कुशवाहा सोनम को ‘पत्नी’ की तरह ट्रीट करता था। यह दोहरा व्यवहार न केवल धोखे का प्रतीक है, बल्कि समाज के बनाए गए नियमों और मर्यादाओं को भी तोड़ता है।
इससे साफ पता चलता है कि उनके रिश्ते में पारदर्शिता नहीं थी और वे जानते थे कि उनका रिश्ता समाज में स्वीकार नहीं होगा। ऐसे में, इस आपराधिक घटना का इल्जाम ‘समाज’ पर डालना या इसे ‘जातिवाद’ का नतीजा बताना पूरी तरह से गलत है।
द प्रिंट का यह तर्क कि ‘अगर महिला नौकरी नहीं करती तो उसके पास शादी के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता’ और उसे ज़बरदस्ती शादी करनी पड़ती है, यह भी हर स्थिति पर लागू नहीं होता। सोनम का परिवार आर्थिक रूप से मज़बूत था। उसके पिता और भाई बड़े ट्राँसपोर्ट कारोबारी हैं। वह खुद भी अपने भाई के काम में शामिल थी और हवाला कारोबार से जुड़ी थी, जहाँ उसने राज के खातों में बड़ी रकम भी भेजी थी।
यह बताता है कि वह किसी भी तरह से ‘कमज़ोर’ या ‘लाचार’ नहीं थी। अगर वह अपनी शादी से नाखुश थी या राज से शादी करना चाहती थी, तो उसके पास और भी कई रास्ते थे। लेकिन उसने हत्या का रास्ता चुना, जिसे किसी भी तर्क से सही नहीं ठहराया जा सकता।
समाज में दिखावे को महत्व देने की बात द प्रिंट ने कही है। हाँ, समाज में दिखावा होता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि परिवार के हर फ़ैसले सिर्फ दिखावे के लिए होते हैं। ज़्यादातर माता-पिता अपनी संतानों की खुशी और भविष्य की परवाह करते हैं।
अगर सोनम और राज कुशवाहा का रिश्ता इतना गहरा और सच्चा था, तो उन्हें खुलकर इसका सामना करना चाहिए था, न कि धोखाधड़ी और हत्या की योजना बनानी चाहिए थी। यह ‘समाज के दिखावे’ का नहीं, बल्कि व्यक्तिगत स्वार्थ और आपराधिक सोच का परिणाम है।
आखिर में यही कहेंगे कि सोनम-राजा रघुवंशी मामला जाति या फेमिनिज्म का मुद्दा नहीं है। यह एक पहले से सोची-समझी हत्या का मामला है, जहाँ प्यार के नाम पर एक बेकसूर की जान ले ली गई।
ऐसे अपराधों को सामाजिक मुद्दों का रंग देकर अपराधियों के कामों को हल्का करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। सोनम और राज, अगर दोषी पाए जाते हैं, तो उन्हें कानून के हिसाब से सज़ा मिलनी चाहिए, और किसी भी सामाजिक या वैचारिक आधार पर उनके अपराध को सही ठहराने की कोशिश निंदनीय है।
अहमदाबाद एयर इंडिया प्लेन क्रैश जैसी दुखद आपदा ने सभी को झकझोर दिया। चारों तरफ अफरा-तफरी थी और लोगों के दिलों में दुख की आग जल रही थी। हवाई अड्डे से लेकर देश के कोने-कोने तक मरने वालों के परिवारों के लिए हमदर्दी थी। इस दुखद खबर के बीच कुछ अच्छी खबरें भी थीं, जो लोगों के दिलों को थोड़ा सुकून दे रही थीं। हजारों की चीख-पुकार के बीच लोगों की सेवा भावना भी दिखी।
अहमदाबाद में प्लेन क्रैश की न्यूज बाहर आते ही सरकारी मशीनरी काम में जुट गई और लोगों को बचाने का ऑपरेशन शुरू हो गया। स्थानीय लोग भी बचाव कार्य में मदद के लिए आगे आए। तभी खबर आई कि घायलों के लिए खून की जरूरत है। कई एनजीओ ने लोगों से रक्तदान करने की अपील की। इसके बाद जो नजारा दिखा, वो गुजरातियों की हिम्मत और जज्बे को साबित करने के लिए काफी था। रक्तदान का एक आवाज उठा और अहमदाबादी सारे काम छोड़कर कैंप में पहुँच गए। सोशल मीडिया पर इसके कई फोटो और वीडियो भी सामने आए।
रक्तदान के लिए लंबी कतारें, NGO बोले- दिखा अहमदाबादियों का सेवा भाव
अहमदाबाद में रक्तदान की घोषणा के बाद लोग ब्लड डोनेशन कैंप में पहुँच गए और खून देने के लिए आगे आए। कैंप के बाहर लंबी-लंबी कतारें दिखीं। लोग अपने आप घायलों की जान बचाने के लिए मैदान में उतर आए। सारे काम छोड़कर रक्तदान करने पहुँच गए। सोशल मीडिया पर खबरें आईं कि कुछ ही घंटों में अहमदाबादियों ने इतना खून दान किया कि सिविल ब्लड बैंक की डॉ. संगीता को कहना पड़ा कि जरूरत से ज्यादा रक्तदाता तैयार खड़े हैं।
सोशल मीडिया पर कई तस्वीरें भी सामने आईं, जिनमें लोग घंटों तक रक्तदान के लिए इंतजार करते दिखे। ‘सहाय फाउंडेशन’ के संस्थापक जील शाह ने ऑपइंडिया से बातचीत में कहा, “हमारे शहर में जो हुआ, वो बहुत दुखद था। जैसे-जैसे इस घटना की खबरें बाहर आईं, वैसे-वैसे अहमदाबादियों का सेवा भाव सामने आने लगा। हमारे सहाय फाउंडेशन और कई अन्य एनजीओ ने सोशल मीडिया पर रक्तदान की पोस्ट डालीं, और अहमदाबादियों ने तुरंत इसे हाथों-हाथ लिया।”
जील शाह ने आगे कहा, “हमारे एनजीओ के कार्यकर्ता रेड क्रॉस पहुँचे और वहाँ सेवा भाव से भरे अहमदाबादी जमा होने लगे। पहले दो घंटे में ही करीब 300 लोगों ने हमसे संपर्क किया और वहाँ पहुँच गए। रेड क्रॉस में स्टाफ कम पड़ रहा था, तो हमारे कार्यकर्ता सागर और पार्थिल ने उनकी मदद की। देखते-देखते शाम तक हमने 900 से ज्यादा यूनिट खून जमा कर लिया। यही हाल हर लैब और ब्लड बैंक का था।”
जील शाह ने यह भी कहा, “लोग हमेशा ‘मुंबई स्पिरिट’ की बात करते हैं, लेकिन हम कई सालों से इस क्षेत्र में काम कर रहे हैं, इसलिए जानते हैं कि ‘अहमदाबाद स्पिरिट’ भी उतनी ही मजबूत है।” जानकारी के मुताबिक, सिविल हॉस्पिटल में 600 यूनिट खून था। फिर रेड क्रॉस से 500 यूनिट भेजे गए। इसके अलावा, सिर्फ 2 घंटे में 350 लोग सिविल हॉस्पिटल में रक्तदान के लिए पहुँच गए। घंटों इंतजार के बाद उन्होंने रक्तदान किया।
24 घंटे डटे रहे संघ के स्वयंसेवक
इस दुखद घटना में एक और अच्छी खबर यह थी कि RSS के स्वयंसेवक 24 घंटे सेवा में डटे रहे। अहमदाबाद के एक RSS अधिकारी ने ऑपइंडिया से बातचीत में बताया कि प्लेन क्रैश की खबर आते ही संघ के स्वयंसेवक सेवा के लिए पहुँच गए। उनके मुताबिक, दो चरणों में RSS के स्वयंसेवकों ने सेवा कार्य किया। उन्होंने यह भी कहा कि 176 स्वयंसेवकों ने सीधे तौर पर सेवा की, जबकि 250 से ज्यादा स्वयंसेवक हर समय तैयार रहे।
RSS के स्वयंसेवकों ने क्रैश साइट पर लोगों को बचाने के लिए रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया। इसके अलावा ट्रैफिक मैनेजमेंट की जिम्मेदारी भी उन्होंने संभाली। पोस्टमॉर्टम रूम में डॉक्टरों और पीड़ित परिवारों की सेवा की। DNA सैंपल इकट्ठा करने में भी मदद की।
इसके अलावा ब्लड डोनेशन कैंप भी लगाए गए। सबसे खास बात यह थी कि संघ के स्वयंसेवकों ने पीड़ित परिवारों के लिए चाय-पानी और 2000 से ज्यादा लोगों के लिए खाने का इंतजाम भी किया। RSS पदाधिकारी ने बताया कि कालूपुर स्वामीनारायण मंदिर के सहयोग से लोगों के लिए खाने की व्यवस्था की गई। इसके अलावा स्थानीय प्रशासन और पुलिस के साथ मिलकर भी सेवा की गई।
RSS के अलावा अनंत अंबानी के वनतारा की ओर से भी तुरंत मदद शुरू की गई। वनतारा ने खबर मिलते ही सहायता भेज दी और डॉक्टरों की एक टीम को अहमदाबाद के लिए रवाना कर दिया। वनतारा की एम्बुलेंस सेवा भी अहमदाबाद के लिए खोल दी गई। घटनास्थल पर घायल हुए पशु-पक्षियों को बचाने का काम भी किया गया।