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हर दिन मंदिर में काटी गाय, गिराए दसियों मंदिर: मोइनुद्दीन चिश्ती और उसके शागिर्दों का सच

अधिकांश सूफी संत या तो इस्लामिक आक्रांताओं की आक्रमणकारी सेनाओं के साथ भारत आए थे, या इस्लाम के सैनिकों द्वारा की गई कुछ व्यापक विजय के बाद। लेकिन इन सबके भारत आने के पीछे सिर्फ एक ही लक्ष्य था और वह था इस्लाम का प्रचार। इसके लिए उलेमाओं के क्रूरतम आदेशों के साथ गाने-बजाने की आड़ में हिन्दुओं की आस्था पर चोट करने वाले ‘संतों’ से बेहतर और क्या हो सकता था?

‘शांतिपूर्ण सूफीवाद’ का मिथक, कई सदियों तक इस्लामिक ‘विचारकों’ और वामपंथी इतिहासकारों द्वारा खूब फैलाया गया है। वास्तविकता इन दावों से कहीं अलग और विपरीत है। वास्तविकता यह है कि इन सूफी संतों को भारत में इस्लामिक जिहाद को बढ़ावा देने, ‘काफिरों’ के धर्मांतरण और इस्लाम को स्थापित करने के उद्देश्य से लाया गया था।

इसी में एक सबसे प्रसिद्ध नाम आता है ‘सूफी संत’ मोइनुद्दीन चिश्ती (Khwaja Moinuddin Chishti) का, जिन्हें कि हज़रत ख्वाजा गरीब नवाज़ के नाम से भी पुकारा जाता है। सूफी संत मोइनुद्दीन चिश्ती का जन्म ईरान में हुआ था, लेकिन उन्हें राजस्थान के अजमेर में दफनाया गया था।

‘काफिरों’ को लेकर सूफीवाद के महानतम विद्वानों का दृष्टिकोण ISIS के दृष्टिकोण से अलग है, यह कहना एकदम गलत है। इसका उदाहरण सूफी विचारधारा के सबसे बड़े प्रतीक माने जाने वाले मोइनुद्दीन चिश्ती और औलिया हैं, जिन्होंने वो काम सदियों पहले कर दिया था, जिसे ISIS और कट्टर इस्लामिक संगठन आज की सदी में कर रहे हैं।

इतिहासकार एमए खान ने अपनी पुस्तक ‘इस्लामिक जिहाद: एक जबरन धर्मांतरण, साम्राज्यवाद और दासता की विरासत’ (Islamic Jihad: A Legacy of Forced Conversion, Imperialism, and Slavery) में इस बारे में विस्तार से लिखा है कि मोइनुद्दीन चिश्ती, निज़ामुद्दीन औलिया, नसीरुद्दीन चिराग और शाह जलाल जैसे सूफी संत जब इस्लाम के मुख्य सिद्धांतों की बात करते थे, तो वे वास्तव में रूढ़िवादी और असहिष्णु विचार रखते थे, जो कि मुख्यधारा के जनमत के विपरीत था।

एमए खान की पुस्तक का अंश

उदाहरण के लिए, सूफी संत मोईनुद्दीन चिश्ती और औलिया इस्लाम के कुछ पहलुओं जैसे- नाच (रक़) और संगीत (सामा) को लेकर उदार थे, जो कि उन्होंने रूढ़िवादी उलेमा के धर्मगुरु से अपनाया, लेकिन एक बार भी उन्होंने कभी हिंदुओं के उत्पीड़न के खिलाफ कोई कदम नहीं उठाया। औलिया ने अपने शिष्य शाह जलाल को बंगाल के हिंदू राजा के खिलाफ जिहाद छेड़ने के लिए 360 अन्य शागिर्दों के साथ बंगाल भेजा था।

इस पुस्तक में इस बात का भी जिक्र किया है गया है कि वास्तव में, हिंदुओं के उत्पीड़न का विरोध करने की बात तो दूर, इन सूफी संतों ने बलपूर्वक हिंदुओं के इस्लाम में धर्म परिवर्तन में भी बहुत बड़ी भूमिका निभाई थी। यही नहीं, ‘सूफी संत’ मोइनुद्दीन चिश्ती के शागिर्दों ने हिंदू रानियों का अपहरण किया और उन्हें मोईनुद्दीन चिश्ती को उपहार के रूप में प्रस्तुत किया।

गौरी के साथ भारत आकर अजमेर में लगाया था डेरा

यह भी एक ऐतिहासिक तथ्य है कि चिश्ती, शाह जलाल और औलिया जैसे सूफी ‘काफिरों’ के खिलाफ जिहाद छेड़ने के लिए भारत आए थे। उदाहरण के लिए- मोइनुद्दीन चिश्ती, मुइज़-दीन मुहम्मद ग़ोरी की सेना के साथ भारत आए और गोरी द्वारा अजमेर को जीतने से पहले वहाँ गोरी की तरफ से अजमेर के राजा पृथ्वीराज चौहान की जासूसी करने के लिए अजमेर में बस गए थे। यहाँ उन्होंने पुष्कर झील के पास अपने ठिकाने स्थापित किए।

प्रतिदिन गाय का वध और मंदिरों को अपवित्र करते थे चिश्ती के शागिर्द

मध्ययुगीन लेख ‘जवाहर-ए-फरीदी’ में इस बात का उल्लेख किया गया है कि किस तरह चिश्ती ने अजमेर की आना सागर झील, जो कि हिन्दुओं का एक पवित्र तीर्थ स्थल है, पर बड़ी संख्या में गायों का क़त्ल किया, और इस क्षेत्र में गायों के खून से मंदिरों को अपवित्र करने का काम किया था। मोइनुद्दीन चिश्ती के शागिर्द प्रतिदिन एक गाय का वध करते थे और मंदिर परिसर में बैठकर गोमांस खाते थे।

इस अना सागर झील का निर्माण ‘राजा अरणो रा आनाजी’ ने 1135 से 1150 के बीच करवाया था। ‘राजा अरणो रा आनाजी’ सम्राट पृथ्वीराज चौहान के पिता थे। आज इतिहास की किताबों में अजमेर को हिन्दू-मुस्लिम’ समन्वय के पाठ के रूप में तो पढ़ाया जाता है, लेकिन यह जिक्र नहीं किया जाता है कि यह सूफी संत भारत में जिहाद को बढ़ावा देने और इस्लाम के प्रचार के लिए आए थे, जिसके लिए उन्होंने हिन्दुओं के साथ हर प्रकार का उत्पीड़न स्वीकार किया।

मोइनुद्दीन चिश्ती अजमेर

यहाँ तक कि आज भी इन सूफी संतों की वास्तविकता से उलट यह बताया जाता है कि ये क़व्वाली, समाख्वानी, और उपन्यासों द्वारा लोगों को ईश्वर के बारे में बताकर उन्हें मुक्ति मार्ग दर्शन करवाते थे। लेकिन तत्कालीन हिन्दू राजाओं के साथ इनकी झड़प और उनके कारणों का जिक्र शायद ही किसी इतिहास की किताब में मिलता हो।

पृथ्वीराज चौहान की जासूसी और उन्हें पकड़वाने में चिश्ती की भूमिका

खुद मोइनुद्दीन चिश्ती ने तराइन की लड़ाई में पृथ्वीराज चौहान को पकड़ लिया था और उन्हें ‘इस्लाम की सेना’ को सौंप दिया। लेख में इस बात का प्रमाण है कि चिश्ती ने चेतावनी भी जारी की थी, जिसमें उन्होंने दावा किया था – “हमने पिथौरा (पृथ्वीराज) को जिंदा पकड़ लिया है और उसे इस्लाम की सेना को सौंप दिया है।”

हिन्दू राजा की बेटी ‘बीबी उमिया’ का अपहरण और निकाह

मोइनुद्दीन चिश्ती का एक शागिर्द था मलिक ख़ितब। उसने एक हिंदू राजा की बेटी का अपहरण कर लिया और उसे चिश्ती को निकाह के लिए ‘उपहार’ के रूप में प्रस्तुत किया। चिश्ती ने खुशी से ‘उपहार’ स्वीकार किया और उसे ‘बीबी उमिया’ नाम दिया।

लेकिन संयोगवश ‘सूफी संत’ मोईनुद्दीन चिश्ती के बारे में इतिहास में दर्ज ये तथ्य बॉलीवुड की फिल्मों, गानों, सूफी संगीत और वामपंथी इतिहास से एकदम अलग हैं।

सिर्फ इस्लाम की स्थापना था उलेमा और सूफी संतों का लक्ष्य

अपनी पुस्तक ‘भारत में मुस्लिम शासन की विरासत’ (Legacy of Muslim Rule in India) में इतिहासकार केएस लाल ने लिखा है, “मुस्लिम मुशाहिक (सूफी आध्यात्मिक नेता) उलेमाओं की तरह ही धर्मांतरण को लेकर उत्सुक थे, और सूफी ‘संतों’ को लेकर आम धारणा के विपरीत, हिंदुओं के प्रति दयालु होने के स्थान पर, वे चाहते थे कि यदि इस्लाम अपनाने से इनकार करते हैं तो उन्हें दूसरे दर्जे के नागरिक के तौर पर रखा जाए।”

‘द सिनिस्टर साइड ऑफ सूफीवाद’ में, लेखक राम ओहरी ने लिखा है, “कोई भी मुगल, न ही कोई सूफी, कभी भी हिंदू मंदिर में पूजा करने के लिए सहमत नहीं हुआ है, और न ही हिंदू देवी-देवताओं की छवियों के सामने कोई सम्मानपूर्वक तरीके से पेश आया है।”

भारतीय सेना पर जिस कँटीले तारों वाले हथियार से हमला हुआ, जिसने कर्नल संतोष की जान ली…

गलवान घाटी पर चीन की सेना ने जो धोखा किया, उसके कारण भारतीय सेना ने अपने कम से कम 20 जवान खोए। लेकिन सीमा पर खड़े चीनी सैनिकों को इस दौरान भारत की ओर से मुँहतोड़ जवाब मिला। नतीजतन उनके कमांडिग ऑफिसर समेत 43 सैनिक मारे गए। हालाँकि, पहले इस झड़प को लेकर मीडिया में स्पष्ट सूचना नहीं आ रही थी। मगर, अब धीरे-धीरे सब साफ हो रहा है।

इस बीच एक हथियार की तस्वीर भी सोशल मीडिया पर वायरल हुई। जिसे लेकर दावा किया जा रहा था कि इन्हीं हथियारों से चीनी सैनिकों ने भारतीय सैनिकों पर हमला किया। लेकिन आर्मी ने यह स्पष्ट किया कि ये हथियार वो नहीं है, जिससे हमला हुआ। लेकिन ये इस बात की तरफ भी इशारा किया गया कि इसी तरह के हथियारों से चीन ने भारतीय सैनिकों पर वार किया।

गौरतलब है कि लद्दाख के गलवान घाटी में जो हुआ वो संक्षेप में कुछ यूँ है कि जब दोनों ही सेनाओं के सीनियर अफसरों के बीच, सेना को पीछे ले जाने पर समझौता हो गया, तो कुछ भारतीय सेना के जवान और अफसरों ने, बिना किसी हथियार के चीनी सैनिकों द्वारा बनाए गए कैंप की तरफ जा कर हटने को कहा।

चीनी सैनिकों ने इस बात पर पत्थरबाजी कर दी और कमाडिंग ऑफिसर, कर्नल संतोष समेत भारतीय पार्टी पर कँटीले तारों से लिपटे डंडे आदि से बुरी तरह हमला किया। जब तक भारतीय खेमे तक बात पहुँचती, भारतीय सैनिकों को चीनी सेना के दूसरे कैंप से आए सैनिकों ने घेर लिया था। कर्नल संतोष वीरगति को प्राप्त हो चुके थे।

दोनों तरफ से झड़प होती रही और यह बड़े इलाके में फैल गई। घाटी के नीचे तेज बहती नदी में कई जवान गिरे और दोनों ही तरफ से सैनिक बलिदान हुए। बाद में 17 घायल सैनिकों ने भयावह ठंड और ऑक्सीजन की कमी वाली इस ऊँचाई पर अपने जख्मों से लड़ते हुए अंतिम साँस ली।

चीन ने अभी तक आधिकारिक आँकड़ा नहीं दिया है और उसकी प्रोपेगेंडा साइट यह बताने में लगी हुई है कि भारत ही उनके इलाके में घुस आया था और चीन की सेना डरपोक नहीं है, मुँहतोड़ जवाब देगी। अलग-अलग सूत्रों से पता लगा है कि चीन के कम से कम 43 जवान मरे हैं और यह संख्या बढ़ भी सकती है।

‘ईद, रमजान पर कुछ नहीं कहा’: सुप्रीम कोर्ट द्वारा रथयात्रा रोकने पर सोशल मीडिया में बवाल

सुप्रीम कोर्ट ने एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए फैसला दिया है कि कोरोना महामारी के फैलने के डर और लोगों के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए जगन्नाथ मंदिर में होने वाली वार्षिक रथयात्रा ना निकाली जाए।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर सोशल मीडिया में लोगों ने अपनी नाराजगी व्यक्त की है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अगर हमने इस साल रथयात्रा की इजाजत दे दी तो भगवान जगन्नाथ हमें माफ नहीं करेंगे।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए इस फैसले के बाद लोगों में भिन्न-भिन्न प्रतिक्रियाएँ सामने आ रही हैं। माइक्रोब्लॉगिंग वेबसाइट ट्विटर पर कुछ लोगों ने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले की तुलना ईद और रमजान से करते हुए आपत्ति जताई है।

संदीप सिंह ने ट्विटर पर इस फैसले पर नाराजगी व्यक्त करते हुए लिखा – “सुप्रीम कोर्ट ने रमजान और ईद के लिए कुछ नहीं कहा। अगर सुप्रीम कोर्ट पक्षपाती है तो उसका पालन क्यों?”

एक अन्य ट्विटर यूजर ने लिखा है – सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रसिद्ध जगन्नाथ यात्रा को रद्द किया जाना बहुत दुखद समाचार है। जब मंदिर, मस्जिद, चर्च आदि खुल सकते हैं तो इसे रद्द क्यों किया गया। कृपया इसकी समीक्षा करें। हम सोशल डिस्टेंसिंग के साथ उत्सव मनाना चाहते हैं। 40 से 50 ही रथ यात्रा में जुट सकते हैं।

जगन्नाथ मंदिर रथ यात्रा को स्थगित करने के फैसले से लोग निराश हैं। कुछ लोगों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट को इस मामले से दूर रहना चाहिए वहीं कुछ ट्विटर यूजर्स ने लिखा है कि इस मामले पर एक पुनर्विचार याचिका दायर की जानी चाहिए।

दरअसल, मंदिर प्रशासन ने राज्य सरकार से बिना भक्तों के रथयात्रा निकालने की अनुमति भी माँगी थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगने के बाद से सरकार ने कोई गाइड लाइन जारी नहीं की थी।

गौरतलब है कि भुवनेश्वर के ओडिशा विकास परिषद एनजीओ ने सुप्रीम कोर्ट में पिटीशन दायर कर कहा कि रथयात्रा से कोरोना फैलने का खतरा हो सकता है। इसमें कहा गया था कि अगर लोगों की सेहत को ध्यान में रखकर कोर्ट दीपावली पर पटाखे जलाने पर रोक लगा सकता है तो फिर रथयात्रा पर रोक क्यों नहीं लगाई जा सकती?

चायनीज ‘धोखेबाजी वार’ से बचाव के लिए भारतीय सैनिकों को सुरक्षा कवच, पहला खेप पहुँचा लेह

15 जून को पीएलए के साथ गालवान घाटी में हुई हिंसक झड़प में 20 सैनिक वीरगति को प्राप्त हो गए। इनमें से अधिकतर सैनिकों पर स्पाइक-स्टडेड क्लबों (ऐसे डंडे जिनमें कीलें धँसी थीं या कंटीली तारों से बँधे थे) से हमला किया गया था।

इस झड़प को देखते हुए सेना के उत्तरी कमान ने अपने सैनिकों को हल्के दंगा गियर से लैस करना शुरू कर दिया है। इन बॉडी प्रोटेक्टर्स में गद्देदार पॉली कार्बोनेट मटीरियल होते हैं और यह पहनने वालों को धारदार चीजों और पत्थरों से बचाता है।

इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक फुल-बॉडी प्रोटेक्टर्स के 500 सेट की पहली खेप हवाई जहाज से लेह के लिए ले जाया गया। मुंबई के सप्लायर से लिए गए यह सूट एलएसी पर तैनात सैनिकों के बीच वितरित किया जाना है।

संदीप उन्नीथन की रिपोर्ट के मुताबिक एक वरिष्ठ सैन्य विश्लेषक ने यह जानकारी दी। सैनिकों के वीरगति को प्राप्त होने पर चिंता व्यक्त करते हुए सैन्य विश्लेषक ने अपना नाम न छापने की शर्त पर पर बताया कि सैनिकों को दंगा नियंत्रण वाली किट दी जा रही है। ऐसा करके जवानों की मानसिकता को पुलिसकर्मियों की तरह बनाया जा रहा है।

सेना की योजना एलएसी पर तैनात अपने सैनिकों को नुकीले क्लबों से लैस करने की भी है। इससे LAC पर तैनात सैनिक आगे से और भी सतर्क रहेंगे और धोखा नहीं खाएँगे।

15 जून को भारतीय सैनिकों पर धोखे से किए गए हमले के दौरान भी पीएलए (चीन) के सैनिक स्पाइक्स (ऐसे डंडे जिनमें कीलें धँसी थीं या कंटीली तारों से बँधे थे) से लैस थे। भारतीय सैनिक तब हैरान रह गए थे, जब पिछले महीने पीएलए के सैनिकों ने पैंगोंग झील के किनारे हुई झड़पों में भारतीय सैनिकों को निशाना बनाने के लिए कंटीले तारों से लिपटे क्लबों का इस्तेमाल किया था। उस दौरान कई भारतीय सैनिक घायल और कुछ गंभीर रूप से घायल हो गए थे।

वैसे देखा जाए तो आधुनिक युद्ध में मध्यकालीन हथियारों का उपयोग कोई नया नहीं है। पिछली शताब्दी में हुए प्रथम विश्व युद्ध के दौरान इस्तेमाल किए गए तात्कालिक हथियारों में विशेष प्रकार के चाकू भी शामिल थे। इन्हें एक जड़े हुए धातु के हैंडगार्ड में लंबा चाकू और काँटेदार तार लगाकर गंभीर रूप से नुकसान पहुँचाने के लिए डिज़ाइन किया गया था।

भारत और चीन के बीच हुए कई समझौतों में से एक प्रमुख प्रावधान को दरकिनार करते हुए पीएलए के सैनिकों ने बिना किसी गोली के भारतीय सैनिकों की जान ले ली। सीमाओं पर शांति कायम रखने के लिए दोनों पक्षों की ओर से फायरिंग करने वाले हथियारों को न रखने पर सहमति बनी थी। आखिरी बार भारत-चीन सीमा पर 45 साल पहले गोली चली थी। तब पीएल के एक गश्ती दल ने असम राइफल्स की एक टुकड़ी पर घात लगाकर हमला कर चार सैनिकों की हत्या कर दी थी।

1993 में भारत-चीन सीमा समझौते के बाद से सीमा पर हथियारों को नहीं दिखाया जाता है। इतना ही नहीं, अभ्यास के दौरान भी राइफल की नाल को जमीन की ओर झुकाकर पीठ पीछे रखा जाता है। इसके बाद भी सीमा पर हुए गतिरोधों के दौरान धक्का-मुक्की के साथ सैनिकों के बीच झड़पें तो देखने को मिलती रही हैं, लेकिन किसी ने भी अपने हथियार से गोलीबारी नहीं की।

इन सब के बीच 15 जून को हुई घटना ने सारी सीमाओं को लाँघ दिया। 16 जून को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वीडियो-कॉन्फ्रेंस के जरिए राज्य के मुख्यमंत्रियों को संबोधित करते हुए एक तरह से पूरे देश को संबोधित कर कहा, “हमारे जवानों का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा।”

चीन के साथ कॉन्ग्रेस ने किया था ‘गुप्त’ समझौता… 2008 से लेकर कई बार हुई गुपचुप मुलाकात: पढ़ें खुलासा

भारत और चीन सेना के बीच हुई आपसी झड़प में भारत के 20 सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए। वहीं चीन ने भी कमांडिग ऑफिसर समेत अपने 40 से ज्यादा सैनिकों को खोया। इस बीच भारत सरकार लगातार तनाव को खत्म करने की कोशिशों में जुटी रही। लेकिन विपक्ष ने राष्ट्रीय सुरक्षा मामले पर केवल राजनीति खेली और चीन पर बिलकुल मौन रहीं। ऐसा क्यों?

पूरे मामले पर यदि गौर करें। तो पता चलता है वह कॉन्ग्रेस पार्टी जो भारत-चीन मामले पर लगातार मोदी सरकार की आलोचना कर रही थी। उसी कॉन्ग्रेस पार्टी के चीन की कम्यूनिस्ट पार्टी के साथ गहरे संबंध हैं। जो स्पष्ट बताते हैं कि कॉग्रेस ने आखिर हमेशा चीन के प्रति अपना रवैया इतना नरम क्यों रखा? और क्यों भारतीय सेना पर हमला करने के बावजूद कॉन्ग्रेस ने कभी चीन को लेकर एक शब्द नहीं बोला? जबकि दूसरी ओर अपने देश की सरकार पर सवाल उठाते रहे।

कॉन्ग्रेस ने ‘महत्वपूर्ण मुद्दों’ पर परामर्श के लिए CCP के साथ एक समझौते पर किए थे हस्ताक्षर

7 अगस्त 2008 को सोनिया गाँधी की अगुवाई वाली कॉन्ग्रेस और चीन की कम्यूनिस्ट पार्टी के बीच एक समझौता हुआ था। शायद आज वही वजह है कि कॉन्ग्रेस चीन की नापाक हरकतों पर भी चुप्पी साधे हुए है। यूपीए के अपने पहले कार्यकाल के दौरान कॉन्ग्रेस पार्टी और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना ने उच्च स्तरीय सूचनाओं और उनके बीच सहयोग करने के लिए बीजिंग में एक समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। 

इस समझौता ज्ञापन ने दोनों पक्षों को महत्वपूर्ण द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय विकास पर एक-दूसरे से परामर्श करने का अवसर प्रदान किया। लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि 2008 में CCP और कॉन्ग्रेस के बीच समझौता ज्ञापन उस समय आया जब भारत में वामपंथी दलों ने कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाली UPA-1 सरकार में विश्वास की कमी व्यक्त की थी।

खासबात यह है कि इस समझौता ज्ञापन को तत्कालीन कॉन्ग्रेस पार्टी के मुख्य सचिव राहुल गाँधी ने सोनिया गाँधी की उपस्थिति में साइन किया था। जबकि चीन की ओर से इसे स्वयं वहाँ के वर्तमान प्रधानमंत्री शी जिनपिंग ने हस्ताक्षर किया था। उस समय जिनपिंग पार्टी के उपाध्यक्ष थे। 

इस समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर करने से पहले सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी की शी जिंनपिंग के साथ आपसी हित के मुद्दों पर चर्चा करने के लिए लंबी बैठक हुई थी।

साल 2008 में सोनिया गाँधी अपने बेटे राहुल, बेटी प्रियंका, दामाद रॉबर्ट वाड्रा और दोनों के बच्चों को साथ लेकर ओलंपिक खेल देखने पहुँची थीं। इसके अलावा उन्होंने और राहुल गाँधी ने चीन में कॉन्ग्रेस पार्टी के प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व भी किया था।

राहुल गाँधी और चीन के संबंध

बात सिर्फ़ इस समझौते ज्ञापन की नहीं है। राहुल के संबंध चीन के साथ कुछ समय पहले डोकलाम विवाद पर भी उजागर हुए थे। जब उन्होंने चीन के साथ एक नहीं दो बार गुप्त बैठकें की थी।

पहली मीटिंग 2017 में हुई थी, जब उन्होंने चीनी राजदूत लुओ झाओहुई के साथ उस समय बैठक की थी, जब भारत और चीन के बीच डोकलाम विवाद छिड़ा था।

इस बैठक के संबंध में पहले तो कॉन्ग्रेस ने साफ इंकार कर दिया था। लेकिन जब चीन की एंबेसी ने खुद इसका खुलासा किया, तो कॉन्ग्रेस को इस मुद्दे पर काफी जिल्लत झेलनी पड़ी थी। यह बैठक विशेष रूप से संदिग्ध इसलिए भी थी, क्योंकि उस समय कॉन्ग्रेस पार्टी और राहुल गाँधी, चीन के साथ चल रहे सैन्य गतिरोध पर अपने रुख पर कायम रहते हुए भारत सरकार पर तीखे हमले कर रहे थे।

इसके बाद कैलाश मानसरोवर मामले पर चीन के नेताओं से हुई गुप्त बैठक के बारे में तो राहुल गाँधी ने खुद ही खुलासा कर दिया था। राहुल उस समय पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे। जिसके कारण उनका इस तरह चीन अधिकारियों व नेताओं से बैठक करने ने कई सवाल खड़े कर दिए थे।

एक अन्य दिलचस्प कोण कॉन्ग्रेस और चीन के बीच का और देखिए। LAC पर भारतीय सेना पर आक्रमक रवैया रखने के कारण पार्टी नेता अधीर रंजन चौधरी ने चीन को लेकर लोकसभा में अपना गुस्सा जाहिर किया था। साथ ही भारतीय नेताओं को सराहते हुए चीन को चुनौती भी दी थी।

मगर, कुछ समय बाद अधीर रंजन चौधरी को चीन के ख़िलाफ़ अपने रवैया हल्का करना पड़ा और चीन पर किया अपना ट्वीट भी डिलीट करना पड़ा। ये शायद इसलिए हुआ क्योंकि चीन के ख़िलाफ़ अपने नेता के बोल कॉन्ग्रेस पार्टी को ही नहीं पसंद आए। जिसके मद्देनजर  राज्य सभा सदस्य और वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेता आनंद शर्मा ने सोशल मीडिया पर यह सफाई तक दी।

उन्होंने लिखा, “भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस भारत और चीन के बीच विशेष रणनीतिक साझेदारी को मान्यता और महत्व देती है। दुनिया की दो प्राचीन सभ्यताओं और बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के रूप में, दोनों देशों को 21 वीं शताब्दी में एक महत्वपूर्ण योगदान देने के लिए नियत किया गया है।”

कॉन्ग्रेस नेता ने आगे सफाई में लिखा, “चीन के बारे में कॉन्ग्रेस के लोकसभा नेता अधीर रंजन चौधरी के विचार उनके अपने हैं और पार्टी की स्थिति को प्रतिबिंबित नहीं करते हैं।”

सुशांत सिंह राजपूत ने आत्महत्या से 3 दिन पहले दी थी सभी हाउस स्टाफ को सैलरी, कहा था- आगे ये भी नहीं दे पाउँगा

बॉलीवुड के जाने-माने एक्टर सुशांत सिंह राजपूत बीते रविवार यानी 14 जून को इस दुनिया को अलविदा कह गए। उन्होंने अपने घर के एक कमरे में फाँसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। यह खबर सुनकर पूरा देश सदमे में आ गया हैं। उनके अंतिम संस्कार के बाद अब पटना में उनकी अस्थियाँ भी गंगा में विसर्जित हो चुकी हैं। इस बीच मुंबई पुलिस उनकी मौत से जुड़ी हर कड़ी की जाँच कर रहीं है।

पुलिस जाँच में सुशांत को लेकर कई नई बातें सामने आई हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस सूत्रों ने बताया, सुशांत ने तीन दिन पहले ही घर में काम कर रहें सभी लोगों को पूरी सैलरी दे दिया था। साथ ही सुशांत ने यह भी कहा था, कि अब वे आगे की सैलरी उन्हें नहीं दे पाएँगे। जिस पर स्टाफ ने उनसे कहा था कि, “आप ने हमें इतना सम्भाला है, आगे हम कुछ न कुछ कर लेंगे।”

सुशांत की एक्स मैनेजर दिशा ने भी हाल ही सुसाइड कर लिया था। उसको लेकर भी एक बात पुलिस जाँच में सामने आई हैं। जहाँ सुशांत के एक मैनेजर ने पुलिस को बताया कि वह एक्स-मैनेजर दिशा से 14 करोड़ के एक वेब सीरीज में रोल करने के लिए टच में थे। हालाँकि, इससे कुछ खास बात सामने नहीं आई। रिपोर्ट के मुताबिक, सुशांत और दिशा ने वॉट्सऐप से मार्च में आख़िरी बार कॉन्टेक्ट किया था।

मैनेजर ने यह भी बताया कि दिशा के आत्महत्या कर लेने के बाद सुशांत पूरी तरह टूट चुके थे। वो लोगों से खुद को दूर रख एक कमरे में अपने आप को बंद रखते थे। सुशांत पहले से ही डिप्रेशन का शिकार थे, और वहीं दिशा की मौत के बाद वो और सदमे आ गए थे।

आपको बता दें सुशांत की आत्महत्या ने बॉलीवुड के पर्दे के पीछे की सच्चाई को सामने ला दिया हैं। कई बड़े एक्टर, फेमस सेलेब्रिटीज़ से जुड़ी कई बातें सामने आ रही हैं। आए दिन लोग नेपोटिज्म को लेकर भी खुलकर बात कर रहे हैं। जहाँ पहले सुसाइड किए कई एक्टर्स के मौत के पीछे करण जौहर, संजय लीला भंसाली, दिनेश विजान, एकता कपूर और कई नामी चेहरे का हाथ बताया जा रहा हैं। कहा जा रहा है इन लोगों ने काबिलियत को दरकिनार कर लोगों को मेंटली टॉर्चर किया है।

वहीं एक रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि सुशांत और भंसाली की आपस में काफ़ी बॉन्डिंग थी। जयपुर में संजय पर हुए अटैक के बाद सुशांत ने अपने नाम से राजपूत तक हटा लिया था। भंसाली ने 4 फिल्में ऑफर की थी सुशांत को, जिसकी डेट फिक्स नहीं होने की वजह से वो फिल्में सुशांत के हाथ से निकल गई थी। अब इस खबर में कितनी सच्चाई हैं ये तो समय आने पर ही पता चलेगा।

सुशांत की आत्महत्या के पीछे कंगना रनौत ने नेपोटिज्म को बताया वजह

एक्ट्रेस कंगना रनौत ने एक वीडियो जारी करते हुए बोला, “सुशांत सिंह की मौत ने हम सबको झकझोर के रख दिया है। लेकिन वे लोग, जो इस चीज में माहिर हैं कि कैसे समानांतर नैरेटिव चलाया जाए, वो ये कहने लगे हैं कि जिनका दिमाग कमजोर होता है, वे डिप्रेशन में आते हैं और सुसाइड कर लेते हैं।”

“बॉलीवुड के लिए सुशांत ने इतनी अच्छी फिल्में कीं। मगर उन्हें कभी कोई अवॉर्ड नहीं मिला। उन्होंने काय पो छे से डेब्यू किया। उन्हें डेब्यू तक का अवॉर्ड नहीं मिला। उन्होंने 6-7 साल के अंतराल में केदारनाथ, धोनी और छिछोरे जैसी अच्छी फिल्में बनाईं। मगर, फिर भी उन्हें कोई अवॉर्ड नहीं मिला। कोई सराहना नहीं मिली। वहीं, गली बॉय जैसी वाहियात फिल्म को अवॉर्ड मिल जाते हैं।”

उल्लेखनीय है कि बॉलीवुड अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत ने रविवार (जून 14, 2020) को मुंबई के अपने घर में आत्महत्या कर ली थी। उनकी मौत उनके साथियों व प्रशंसकों के लिए किसी सदमें से कम नहीं है। आज भी सुशांत की आत्महत्या से हर कोई हैरान, स्तब्ध है। ऐसे में सोशल मीडिया पर कई तरह के पोस्ट देखने को मिले, जिसमें बिना सच्चाई को जाने-समझे लोगों ने उन्हें कोसा।

कोरोना वायरस के कारण नहीं होगी जगन्नाथ रथ यात्रा: सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक

कोरोना वायरस की महामारी को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 23 जून को पुरी (ओडिशा) के जगन्नाथ मंदिर में होने वाली वार्षिक रथ यात्रा पर रोक लगा दी है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अगर हमने इस साल रथयात्रा की इजाजत दे दी तो भगवान जगन्नाथ हमें माफ नहीं करेंगे।

महामारी के खतरों के मद्देनजर, सुप्रीम कोर्ट ने 23 जून को होने वाली वार्षिक रथ यात्रा को रोक दिया। CJI ने आदेश दिया कि रथ यात्रा से जुड़ी कोई भी धर्मनिरपेक्ष या धार्मिक गतिविधि इस साल नहीं होगी।

CJI SA Bobde की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने COVID-19 महामारी के मद्देनजर 23 जून को ओडिशा में होने वाली जगन्नाथ रथ यात्रा को स्थगित करने की माँग वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए यह फैसला लिया है।

CJI ने आदेश में कहा – “हम इस वर्ष रथ यात्रा आयोजित करने से रोकना सार्वजनिक स्वास्थ्य और नागरिकों की सुरक्षा के हित में उचित मानते हैं। हम निर्देश देते हैं कि ओडिशा के मंदिर क्षेत्र में कोई रथ यात्रा आयोजित नहीं की जाएगी।”

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद जगन्नाथ रथयात्रा को लेकर चल रही सम्भवनाओं को विराम लग गया है। साथ ही, लगभग दो महीने से पुरी में चल रही रथयात्रा की तैयारियों को भी बड़ा धक्का लगा है। इस बीच मंदिर परिसर में रथ का निर्माण जारी है।

सुप्रीम कोर्ट ने जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए फैसला दिया है कि कोरोना महामारी के फैलने के डर और लोगों के स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए रथयात्रा ना निकाली जाए। मंदिर प्रशासन ने राज्य सरकार से बिना भक्तों के रथयात्रा निकालने की अनुमति भी माँगी थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगने के बाद से सरकार ने कोई गाइड लाइन जारी नहीं की थी।

गौरतलब है कि भुवनेश्वर के ओडिशा विकास परिषद एनजीओ ने सुप्रीम कोर्ट में पिटीशन दायर कर कहा कि रथयात्रा से कोरोना फैलने का खतरा हो सकता है। इसमें कहा गया था कि अगर लोगों की सेहत को ध्यान में रखकर कोर्ट दीपावली पर पटाखे जलाने पर रोक लगा सकता है तो फिर रथयात्रा पर रोक क्यों नहीं लगाई जा सकती?

कोल सेक्टर में होगा ₹20 हजार करोड़ का निवेश, आयात पर निर्भरता होगी कम, युवाओं को देंगे रोजगार: PM मोदी

प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी ने गुरुवार को 41 कोयला खदानों की नीलामी की प्रक्रिया को लॉन्च किया। इस लॉन्चिंग कार्यक्रम को संबोधित करते हुए पीएम ने कहा, “इतने चुनौतिपूर्ण समय में इस तरह के इवेंट का होना, और आप सभी का उसमें शामिल होना एक बड़ी आशा जगाता है और विश्वास का एक बड़ा संदेश लेकर आता है। भारत कोरोना से लड़ेगा भी और आगे बढ़ेगा भी। भारत के लिए आपदा कितनी भी बड़ी क्यों ना हो, वह उसे अवसर में बदलने के लिए कृतसंकल्प है।

बता दें, प्रधानमंत्री इस नीलामी प्रक्रिया के उद्घाटन कार्यक्रम को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से संबोधित कर रहे हैं। कोरोना संकट के मद्देनजर गुरुवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए मंत्र दिया।

उन्होंने कहा कि भारत आपदा में रोने वाला देश नहीं है, बल्कि संकट को अवसर में बदलने के लिए गंभीर है। उन्होंने बताया कि कैसे हम आयात पर निर्भरता कम करेंगे और युवाओं को रोजगार देकर भारत को मजबूत बनाएँगे।

पीएम मोदी ने कोल ब्लॉक्स पर अपनी बात शुरू करने से पहले कहा, “भारत कोरोना से लड़ेगा भी और आगे भी बढ़ेगा। भारत इस बड़ी आपदा को अवसर में बदलेगा। कोरोना के इस संकट ने भारत को आत्मनिर्भर भारत- Self Reliant होने का सबक दिया है।”

पीएम नरेंद्र मोदी ने कहा कि आज एनर्जी सेक्टर में भारत को आत्मनिर्भर बनाने के लिए एक बड़ा कदम उठाया जा रहा है। महीने भर के भीतर ही, हर घोषणा, हर रिफॉर्म्स, चाहे वो कृषि सेक्टर में हो, चाहे सूक्ष्म, लघु और मझोले उद्योग के सेक्टर में हो या फिर अब कोल और खनन के सेक्टर में हो, तेजी से जमीन पर उतर रहे हैं।

पीएम नरेंद्र मोदी ने कहा कि ये दिखाता है कि भारत इस आपदा को अवसर में बदलने के लिए कितना गंभीर है। आज हम सिर्फ निजी क्षेत्रों के लिए कोल ब्लॉक के लिए नीलामी की शुरुआत नहीं कर रहे हैं, बल्कि कोल सेक्टर को दशकों के लॉकडाउन से भी बाहर निकाल रहे हैं।

पीएम नरेंद्र मोदी ने कहा कि एक मजबूत माइनिंग और मिनरल सेक्टर के बिना आत्मनिर्भर भारत संभव नहीं है, क्योंकि मिनरल्स और माइनिंग हमारी अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण पिलर्स हैं। इन रिफॉर्म्स के बाद अब कोल प्रोडक्शन, पूरा कोल सेक्टर भी एक प्रकार से आत्मनिर्भर हो पाएगा।

पीएम ने बताया जब हम कोल प्रोडक्शन बढ़ाते हैं तो पॉवर जेनेरेशन बढ़ने के साथ ही Steel, Aluminum, फर्टिलाइजर, सीमेंट जैसे तमाम दूसरे सेक्टर्स में Production और Processing पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है

पीएम नरेंद्र मोदी ने कहा कि देश में 16 जिले ऐसे हैं, जहाँ कोयले के बड़े-बड़े भंडार हैं, लेकिन इनका लाभ वहाँ के लोगों को उतना नहीं हुआ, जितना होना चाहिए था। यहाँ से बड़ी संख्या में हमारे साथी दूर, बड़े शहरों में रोजगार के लिए पलायन करते हैं। इन कोल ब्लॉक्स से इन लोगों को रोजगार मिलेगा और वहाँ रहने वाले लोगों को अधिक सुविधाएँ मिलेंगी।

पीएम के मुताबिक, साल 2030 तक करीब 100 मिलियन टन Coal को Gasify किए जाने का लक्ष्य रखा गया है। उन्होंने कहा, “मुझे बताया गया है कि इसके लिए 4 प्रोजेक्ट्स की पहचान हो चुकी है और इन पर करीब-करीब 20 हज़ार करोड़ रुपए निवेश किए जाएँगे।”

पीएम ने कहा, “कोल सेक्टर में हो रहे रीफॉर्म, इस सेक्टर में हो रहा निवेश, लोगों के जीवन को, विशेषकर हमारे गरीब और आदिवासी भाई-बहनों के जीवन को आसान बनाने में बहुत बड़ी भूमिका निभाएगा।”

गौरतलब है कि कोरोना संकट में प्रवासी मजदूरों के लिए मोदी सरकार द्वारा एक मेगा प्लान तैयार किया जा रहा है। इसके तहत मोदी सरकार गरीब कल्याण रोजगार अभियान को 20 जून को लॉन्च करेगी। इस अभियान के दौरान लॉकडाउन में अपने राज्यों और गाँव वापस लौटने वाले लाखों लोगों के रोजगार और पुनर्वास के लिए पूरा खाका तैयार किया गया है।

प्रधानमंत्री कार्यालय के मुताबिक 6 राज्यों के 116 जिलों में 125 दिनों तक यह अभियान चलेगा। अभियान के सरकारी तंत्र प्रवासी श्रमिकों की सहायता के लिए मिशन मोड में काम करेंगे।

PM नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार गरीबों, मजदूरों, किसानों के हितों के लिए कदम उठा रही है। चाहे वह 1.70 लाख करोड़ का गरीब कल्याण पैकेज प्रदान करना हो या, 20 लाख करोड़ के पैकेज से आत्मनिर्भर भारत बनाने का संकल्प हो। अब इस नई योजना से सरकार का उद्देश्य कोरोना संकटकाल में भी ग्रामीण भारत में रोजगार को बनाए रखना है।

2.5 लाख का वेंटिलेटर 4 लाख में… PM CARES का ‘वेंटिलेटर घोटाला’: कॉन्ग्रेसियों की फैलाई फर्जी खबर का फैक्ट चेक

भारत इस वक़्त चीन के द्वारा फैलाए गए कोरोना वायरस को निपटाने की पुरजोर कोशिश में लगा है। दूसरी ओर हमारे सैनिक सीमा पर दुश्मनों का मुकाबला कर रहे हैं। इसके बावजूद कॉन्ग्रेस अपनी घटिया राजनीति से बाज नहीं आ रहा।

कोरोना वायरस के बढ़ते प्रकोप को देखते हुए पीएम केअर फंड से अस्पतालों में पहले बैच के वेंटिलेटर उपलब्ध कराए गए। जिसके बाद मंगलवार (16 जून, 2020) को कॉन्ग्रेस समर्थकों ने ट्विटर पर एक झूठी साजिश के तहत लाए गए वेंटिल्टर्स पर आरोप लगाते हुए इसे ‘वेंटिलेटर घोटाला’ बता कर वायरल कर दिया।

इस फर्जी खबर को फैलाने वाले साकेत गोखले पहले शख्स थे। उन्होंने ट्वीट कर पूछा, पीएम केयर्स फंड के तहत वेंटिलेटर खरीदने के लिए अलॉट किए गए फंड से 750 करोड़ से अधिक रुपए कैसे गायब हो गए?

वेंटिलेटर मॉडल skanray CV200 को मैसूर स्थित स्कैनरे टेक्नोलॉजिज से खरीदा गया है। गोखले ने आरोप लगाते हुए कहा कि स्कैनरे टेक्नोलॉजिज फिलिप्स वेंटिलेटर के निर्माण का लाइसेंस पार्टनर है, इसलिए स्कैनरे उसी फिलिप्स CV200 मॉडल को दे रहा है, जैसा कि भारत में बनाया गया है।

इसके बाद उन्होंने ‘फिलिप्स CV200’ मॉडल के लिए एक ई-कॉमर्स पोर्टल इंडिया मार्ट से इसकी प्राइस लिस्ट निकाली। इसमें दावा किया गया कि यह 2.5 लाख रुपए प्रति पीस पर इंडिया मार्ट पर बेचा जा रहा है।

गोखले इसके बाद हाई स्कूल स्तर का गणित लगाते हुए कहते हैं कि 50,000 वेंटीलेटर की खरीद के लिए पीएम केअर फंड के 3,100 करोड़ रुपए में से अलॉट किए गए 2,000 करोड़ रुपए में से सरकार 2.5 लाख रुपए के बजाय 4,00,000 रुपए प्रति वेंटिलेटर का भुगतान कर रही है।

इस खबर को देखते ही कॉन्ग्रेस के अन्य समर्थकों ने आँख बंद कर इस मनगढ़ंत सच्चाई को फैलाने में जुट गए। साथ यह भी दावा किया कि किस तरह वेंटिलेटर की आड़ में घोटाले को अंजाम दिया जा रहा है।

आम आदमी पार्टी को समर्थन देने वाले कुछ लेखकों ने भी इसे महत्वपूर्ण सूचना के तौर पर लिया। बता दें कि कोठारी ‘द लॉजिकल इंडियन’ की मैनेजिंग एडिटर हैं। ये वही हैं, जिन्होंने फेसबुक पर अरविंद केजरीवाल के फैन पेज के रूप में शुरुआत की थी।

कुछ लोगों ने तो गोखले की मनगढ़ंत कहानी को तथ्य मान लिया।

इससे पहले हम खबर की सच्चाई के बारे में आपको बताए, हम साकेत गोखले की कुछ मामूली बातें जान लेते हैं।

जिस “फिलिप्स सीवी 200” को लेकर गोखले का दावा था, वास्तव में वह इंडिया मार्ट पर 11 लाख रुपए में बिक रहा है।

और तो और, गोखले के ट्विटर थ्रेड को भारत इलेक्ट्रॉनिक लिमिटेड के सीएमडी द्वारा खंडन किया गया। बीइएल भारत की एक प्रॉफेशनल डिफेंस इलेक्ट्रॉनिक कंपनी है, जो भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय के नवरत्न डिफेंस पब्लिक सेक्टर के अधीन है।

बीईएल के सीएमडी ने कहा कि ट्वीट्स में इतनी सारी फर्जी जानकारी कैसे गढ़ी गई। क्योंकि उनकी जानकारी के अनुसार फिलिप्स ऐसे किसी भी मॉडल का निर्माण नहीं करता है। उन्होंने कहा कि इन ट्वीट्स को देख कर ऐसा लग रहा जैसे फिलिप्स के ब्रांड नाम के तहत एक काल्पनिक प्रोडक्ट को वर्चुअल मार्केटप्लेस पर प्रचारित किया जा रहा है।

ऐसे समय में पीएसयू के सीएमडी सोशल मीडिया पर इन मनगढ़ंत खबरों पर रिप्लाई दे कर इसे फर्जी साबित कर रहे हैं। जबकि उनके पास करने के लिए और भी कई जरूरी काम हैं। उन्होंने बताया कि कैसे CV200, 2 घंटे की बैटरी बैकअप के साथ एक उच्च कोटि का वेंटिलेटर है। साथ ही इसमें कई अन्य सुरक्षा विशेषताएँ भी हैं।

उन्होंने कहा, “निर्माण के लिए उपयोग किए जाने वाले कॉम्पोनेन्ट प्रतिष्ठित वैश्विक मेडिकल ग्रेड कंपोनेंट्स के सप्लाई चैन पार्टनर हैं। CV200 वेंटिलेटर की कीमत इसके विन्यास, विशेषताओं और प्रदर्शन को देखते हुए विचार विमर्श करके किया जाता है।”

सीएमडी ने आगे कहा कि वेंटिलेटर पर पीएम केअर फंड का लोगो इसलिए लगा है, क्योंकि वेंटिलेटर अलॉट किए गए फंड के तहत ही खरीदे जा रहे हैं। और इस पर लगाया गया लोगो इसकी पहचान और जवाबदेही सुनिश्चित करता है।

सीएमडी ने बताया कि कैसे डीआरडीओ ने कोरोनो वायरस प्रकोप के बीच वैश्विक लॉकडाउन स्थिति के बीच बड़ी संख्या में वेंटिलेटर के निर्माण के लिए आवश्यक व महत्वपूर्ण कंपोनेंटस के विकास और स्वदेशीकरण में सहयोग किया है।

आखिरकार इन मनगढ़ंत कहानियों का पर्दाफाश होने के बाद गोखले को विश्वास ही नहीं हुआ कि उसे जवाब देने वाला शख्स बीईएल का सीएमडी है।

इन तथ्यों से यह बात साबित होती है कि भारत सरकार ने 2.5 लाख रुपए में बिकने वाले वेंटिलेटर को 4 लाख रुपए में नहीं खरीदा है।

सुशांत को नापसंद करने वाला बॉलीवुड-माफिया कौन? क्यों चुप है शत्रुघ्न सिन्हा से लेकर बिहारी कलाकारों की लॉबी?

सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद बिहार के सबसे लोकप्रिय फिल्म कलाकार शत्रुघ्न सिन्हा से सवाल पूछने का मन करता है कि आपने कितने बिहारी युवाओं को बॉलीवुड में प्रोमोट किया और संरक्षण दिया? सोचता हूँ कभी शत्रुघ्न सिन्हा ने सुशांत की फिल्में देखकर, उसकी सफलता के बारे में सुनकर फोन पर शाबासी दिया होगा या फिर उसे बुलाकर मिले होंगे!

बिहार के बॉलीवुड में स्थापित अन्य लोग मसलन मनोज बाजपेयी, पंकज त्रिपाठी, शेखर सुमन, प्रकाश झा, संजय मिश्रा आदि से भी यह स्वाभाविक सवाल उठता है कि सुशांत जैसे युवा कलाकारों के प्रति इन लोगों का क्या रूख होता होगा! यह सब इसलिए जानना चाहता हूँ क्योंकि ये सभी लोग अपने-अपने वक्त के सुशांत रहे हैं, जिन्होंने बॉलीवुड में बड़ा वजूद बनाया। फिर इन सबसे यह प्रश्न भी उठता है कि मुम्बई में अपने बिहारी भाई सुशांत के दाह संस्कार के वक्त ये सभी लोग क्या नैतिक तौर पर वहाँ उपस्थित होने या परिवार से मिलने का फर्ज नहीं निभा सकते थे? इन सबके बीच शुक्र है कि सुशांत के अंतिम यात्रा में पार्श्व गायक उदित नारायण न सिर्फ बहुत भावुक दिखे बल्कि पूरे तौर पर मौजूद भी रहे।

क्या मायानगरी में इतनी जानलेवा स्पर्धा है कि अपने ही जड़-जमीन से जुड़े दूसरे भाई के लिए आप खड़े तक नहीं हो सकते हैं! अगर ऐसा है तो फिर ये रंगीन पर्दे की शोहरत महज झूठ और छल- प्रपंच की बुनियाद पर खड़ी एक मायाजाल है।

प्रतिभाशाली सुशांत की लोकप्रियता और अहमियत का अंदाजा इससे भी लगा सकते हैं कि बिहार के बेटे की मृत्यु पर भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी गहरी संवेदना प्रकट करते हुए दुख व्यक्त किया है। लेकिन आश्चर्य होता है जब सुशांत की मौत के बाद दुख, पीड़ा, आक्रोश का इज़हार करने वालों को सोनाक्षी सिन्हा राजनीति न करने की सलाह देकर चुप रहने को कहती हैं। क्या वो अप्रत्यक्ष तौर पर खास बॉलीवुड ब्रिगेड के आकाओं का प्रवक्ता होने का संदेश देना चाहती हैं?

स्पष्ट है कि संघर्ष करके बड़े स्टार बने लोगों के मुम्बईया सिल्वर स्पून लॉलीपॉप बेटे-बेटी एक आम संघर्षशील बिहारी की भावना से नावाकिफ हैं, जिसका सोनाक्षी भी एक उदाहरण है। माफियाओं की चमचागिरी कर, उनके आगे नतमस्तक होकर बॉलीवुड में सफल होना अलग बात है लेकिन सुशांत सिंह राजपूत होना अलग बात है।

बिहार के छोटे से शहर का लड़का सुशांत आज के हर संघर्षशील बिहारी और पूर्वांचली युवाओं का प्रतिनिधि था, जिसके पाँव जमीन पर होते हैं और वो आसमान छूने के सपने देखता है। अपने सपने को पूरा करने का जज़्बा लिए वो किसी भी हद तक जा सकता है। इस पूरे उपर्युक्त संदर्भ में सुशांत सिंह राजपूत की मौत एक संघर्षशील बिहारीयत की मौत भी कहें तो अतिश्योक्ति नहीं होनी चाहिए।

सुशांत सिंह राजपूत के पास 7 फिल्में थीं लेकिन साजिश के तहत संबंधित डायरेक्टर-प्रोड्यूसरों ने अपनी फिल्मों से उन्हें निकाल दिया। सुशांत को माफियाओं के दबाव में फिल्मों से निकाल बाहर करने वाले लोगों की पहचान भी सार्वजनिक होनी चाहिए। आखिर ये कौन लोग हैं, जो बॉलीवुड में स्टारडम और सफलता-असफलता को तय करते हैं!

दिलचस्प तो यह है कि बड़े नाम वाले अभिनेता भी डर से बॉलीवुड माफियाओं के खिलाफ नहीं बोलते हैं बल्कि उन्हें प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष मान्यता प्रदान करते हैं।

बॉलीवुड आत्म-केंद्रित लोगों का जमावड़ा है। यहाँ माफिया सफलता-असफलता और भविष्य तय करते हैं। हकीकत है कि बॉलीवुड में सफलता सिर्फ मेहनत और संघर्ष के बूते ही तय नहीं होती है। बॉलीवुड में इंट्री बहुत मुश्किल है, घुस गए तो टिकना नामुमकिन है। जीवनयापन या गुजारा करने के लिए दाल-रोटी का जुगाड़ है लेकिन स्टारडम तक पहुँचना, फिर स्थापित होकर टिक जाना किसी के बूते की बात नहीं है।

यहाँ माफियाओं का खेमा काम करता है, जिनके चेले-चमचे बनकर और फिर मोहरे बन भी लोग सफल होते हैं। कुछ संघर्ष की राह में साजिशन मार दिए जाते हैं और कुछ धीरे-धीरे मर जाते हैं। सुशांत सिंह राजपूत बॉलीवुड के बने-बनाए किसी खाँचे में फिट नहीं बैठता था, जिसने बॉलीवुड माफियाओं के गिरोह को जाने-अनजाने चुनौती देने की हिमाकत कर दी थी।

सुशांत ने यह दिखलाने की कोशिश की कि वो बॉलीवुड में सफलता के मानकों से अलग है और विशुद्ध मेहनत, संघर्ष, जज़्बे की बदौलत स्थापित हो सकता है। सवाल तो यही है कि बिहार की धूल-माटी में खेलकर मुम्बई की फिल्म नगरी में अपने बूते वजूद बनाने वाले सुशांत सिंह राजपूत को नापसंद करने वाला माफिया कौन था?

शर्मनाक पहलू यह है कि सुशांत की मृत्यु के बाद भी शातिर माफियाओं ने उसे न बख्शने की कसम खा ली है। मृत्यु उपरांत प्रोफेशनली मीडिया के सहयोग से पब्लिसिटी एवं प्रोपेगेंडा करके सुशांत का चरित्र हनन कर पूरे मामले को भटका कर दूसरा रंग देने का प्रयास भी जारी है।

आज तक बॉलीवुड में जितने भी आत्महत्या के शक्ल में संदेहास्पद मौतें हुई हैं, किसी के निष्कर्ष के तौर पर सजा की बात तो दूर, कोई दोषी तक साबित नहीं हुआ है। क्या सचमुच बॉलीवुड एक माफिया गिरोह है, जो लाभ-हानि, सफलता-असफलता और फ्लॉप-हिट के कारोबार से ज्यादा कुछ नहीं। यहाँ मौतों पर संवेदना की हल्की ज्वार तो उठती है लेकिन थोड़ी हलचल के बाद माहौल फिर से यथावत पूरी तरह प्रोफेशनल हो जाता है।

बॉलीवुड की रंगीन गलियों में सुशांत की मौत का सच घूम रहा है, जिसके बारे में कंगना रनौत ने बेबाक कहा, अभिनव कश्यप ने खुलकर लिखा और शेखर कपूर ने दिल से महसूस किया लेकिन तथाकथित बड़े नाम वाले लोगों ने जान या करियर खत्म होने के डर से चुप्पी साध रखी है।

सुशांत की मृत्यु पर देश भर से प्रतिक्रिया आई, जिसे सोशल मीडिया पर एक स्वाभाविक स्वत:स्फूर्त आक्रोश के तौर पर देखा जा सकता है। बॉलीवुड माफियाओं ने सुशांत को नहीं बख्शा लेकिन सुशांत की मौत ने उन सभी का चेहरा पब्लिक डोमेन के आम चर्चे में ला दिया है।

मायानगरी के बेबी-बाबा एवं माफिया ब्रिगेड से हाथ जोड़कर गुजारिश है कि सुशांत सिंह राजपूत के निधन पर फोटो-ऑप एवं खबरों में सुर्खियाँ बटोरने के लिए घड़ियाली आँसू न बहाएँ और न दाँत निपोर कर फर्जी इमोशन की पब्लिसिटी कराएँ।

सुशांत के खिलाफ प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष साजिश करने वाले सभी लोगों का और उनकी फिल्मों का बहिष्कार करने की बिहार एवं पूर्वांचलवासियों से अपील भी करता हूँ।

सुशांत के परिवार सहित हर संवेदनशील व्यक्ति और खासकर बिहार के लोगों की माँग है कि सुशांत की मृत्यु की निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए। इस साजिश का खुलासा भी बेहद जरूरी है ताकि मायानगरी के रौनकदार खुशबूदार कपड़ों और रंगीन चश्मे में छिपे बदनाम चेहरे बेनकाब हों और कोई दूसरा सुशांत साजिश की मौत न मरे।