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राहुल गाँधी रोस्ट: कौन जिम्मेदार है | Rahul Gandhi roast as he questions Indian Army

कल राहुल गाँधी 50 साल के हो जाएँगे। आज उन्होंने 20 सेकंड का वीडियो बनाया, हम 8 मिनट तक लेंगे, क्लास।

पूरा वीडियो देखने के लिए यहाँ क्लिक करें

चुनाव जीतने के लिए पुलवामा, बिहार चुनाव के लिए गलवान: डीयू के प्रोफेसर देव कुमार ने बलिदानी सैनिकों का उड़ाया मजाक

हमारे देश में एक पूरी जमात है जो सरकार के विरोध के नाम पर राष्ट्र के खिलाफ खड़ी हो जाती है। आम जनता की भावनाओं को कुचल कर अभिव्यक्ति की आजादी का हुंकार भरती है। अपने प्रोपेगेंडा में सैनिकों के बलिदान को घसीटकर उसका अपमान करती है।

ऐसे ही एक शख्स देव कुमार (Deo Kumar)। फेसबुक प्रोफाइल पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार देव कुमार दिल्ली यूनिवर्सिटी (डीयू) के राजधानी कॉलेज में सहायक प्रोफेसर हैं। एक फेसबुक पोस्ट में उन्होंने दावा किया है कि गलवान घाटी में चीनी सैनिकों के साथ हुई हिंसक झड़प बिहार चुनाव को ध्यान में रखकर में हुई है। बीते साल पुलवामा में हुए आतंकी हमलों को उन्होंने 2019 के आम चुनाव से जोड़ा है।

देव कुमार ने लिखा है, “केंद्रीय चुनाव जीतने के लिए पुलवामा किया गया। गलवान बिहार का चुनाव है। बिहार बटालियन को उभारा गया। झूलने वाले दोस्तों ने यह रचा। देश का भूभाग कब्जा करवाया। बिहार जीतना है। दोहन किया जाएगा। देखना है बिहारी जनता कैसे रिस्पॉन्स करती है?”

देव कुमार ने यह कॉमेंट ऐसे समय में किया है जब चीनी सै​निकों के धोखे से किए वार में भारत के 20 जवान बलिदान हुए हैं। 43 चीनी सैनिकों के मारे जाने की भी खबर है।

पुलवामा में हुई आतंकी घटना के साथ ही देव कुमार ने चीन के साथ हुई झड़प को जोड़ते हुए कहा है कि ये दोनों घटनाएँ केंद्र सरकार द्वारा चुनाव जीतने के लिए करवाई गईं और अब बिहार में आने वाले चुनाव के लिए यह करवाया गया है।

देव कुमार की फेसबुक टाइमलाइन तमाम ऐसे पोस्ट से भरी हुई है, जिनमें सत्ता ही नहीं बल्कि बहुसंख्यकों पर भी कटाक्ष किए गए हैं।

देव कुमार आजकल कोरोना संकट, जाति और पूँजी पर ‘ऑनलाइन ज्ञान’ भी दे रहे हैं –

वहीं एक पोस्ट में देव कुमार ने लिखा है – “फ़ासीवाद का उग्र रूप। अब भी किसी को डाउट है तो फिर उसकी समझ में कुछ गड़बड़ी है। #सॉलिसिटर जेनरल, सुप्रीम कोर्ट, लेफ्ट-लिबरल ,डेमोक्रेट्स और बहुजन तबके का दमन/जेल।”

अमेरिका ने चीन की बढ़ाई टेंशन, उइगर मुस्लिमों की प्रताड़ना के खिलाफ बिल पर ट्रंप ने लगाई मुहर

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक ऐसे बिल को मँजूरी दे दी है जिससे चीन की की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। चीन के द्वारा उइगर मुस्लिमों और अन्य अल्पसंख्यकों पर बरपाए जा रहे कहर के खिलाफ अमेरिका में लाए गए एक विधेयक पर राष्ट्रपति ट्रंप ने हस्ताक्षर कर दिए हैं।

अमेरिकी कॉन्ग्रेस के विधेयक पारित करने के बाद बुधवार (17 जून, 2020) को ट्रंप ने इस विधेयक पर हस्ताक्षर कर दिए। मामले में राष्ट्रपति ट्रंप ने अपना एक बयान जारी करते हुए कहा कि 2020 उइगर मानवाधिकार नीति अधिनियम ‘मानवाधिकारों के उल्लंघन के अपराधियों’ को जवाबदेह ठहराएगा। वहीं इस बिल में पश्चिमी शिनजियांग क्षेत्र में उइगर और अन्य जातीय समूहों की व्यापक निगरानी और हिरासत में लेने वाले चीनी अधिकारियों पर प्रतिबंध भी शामिल है।

इसके बाद उइगरों के अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे वकील नुरी टर्केल ने सोशल मीडिया पर राष्ट्रपति ट्रंप का शुक्रिया अदा करते हुए लिखा,”यह अमेरिका और उइगर लोगों के लिए एक महान दिन है।” चीन उइगर मुस्लिम को अपने लिए खतरा मानता है। चीन ने इन पर दाढ़ी बढ़ाने और नकाब पहनने के कारण भी ऐक्शन लिया है और उन्हें अज्ञात जगह पर हिरासत में भेज दिया गया है।

दरअसल चीन में एक लाख से अधिक लोगों को बदतर हालात में शिविरों में हिरासत में रखने के खिलाफ और उसे दंडित करने के लिए किसी भी देश द्वारा उठाया गया यह एक बड़ा कदम है। संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि शिविरों में दस लाख से अधिक उइगर मुस्लिमों को हिरासत में लिया गया है।

दरअसल कोरोना वायरस के चलते चीन और अमेरिका पहले से ही आमने-सामने हैं। इसी बीच अमेरिका के इस कदम से चीन और भी भड़क सकता है। अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने 27 मई को उइगर मुस्लिमों का उत्पीड़न करने के जिम्मेदार चीनी अधिकारियों पर प्रतिबंध लगाने वाले कानून को भारी बहुमत से मँजूरी दी थी।

जानकारी के मुताबिक इस्लाम को मानने वाले उइगर समुदाय के लोग चीन के सबसे बड़े और पश्चिमी क्षेत्र शिंजियांग प्रांत में रहते हैं। इस प्रांत की सीमा मंगोलिया और रूस सहित आठ देशों के साथ मिलती है। इनकी आबादी की बात की जाए तो तुर्क मूल के उइगर मुस्लिमों की इस क्षेत्र में आबादी एक करोड़ से अधिक है।

वहीं इस क्षेत्र में रहने वाले उइगर मुस्लिमों की धार्मिक स्वतंत्रता पर भी चीन सरकार ने अंकुश लगा रखा है। 2014 में शिनजियांग की सरकार ने रमजान के महीने में मुस्लिम कर्मचारियों के रोजा रखने और मुस्लिम नागरिकों के दाढ़ी बढ़ाने पर पाबंदी लगा दी थी। 2014 में ही राष्ट्रपति जिनपिंग के सख्त आदेशों के बाद यहाँ की कई मस्जिदें और मदरसे ढहा दिए गए थे।

भारतीय रेलवे ने चीनी कंपनी से छीना ₹471 करोड़ का ठेका, ट्रैक पर सिग्नल सिस्टम लगाने का दिया था काम

भारतीय रेलवे ने चीनी कंपनी से 471 करोड़ रुपए के ठेके वापस ले लिए हैं। रेलवे के मुताबिक, कॉन्ट्रैक्ट दिए जाने के 4 साल बीत जाने पर भी अभी तक सिर्फ 20% काम ही चीनी कंपनी कर पाई थी। इसके अलावा चीनी कंपनी टेक्निकल दस्तावेजों को साझा करने से बच रही थी, जबकि यह बात करार का हिस्सा थी।

वर्ष 2016 में चीनी कंपनी से 471 करोड़ रुपए का करार हुआ था, जिसमें उसे 417 किलोमीटर लंबे रेल ट्रैक पर सिग्नल सिस्टम लगाना था। यह काम बेहद धीमी गति से किया जा रहा था।

रिपोर्ट्स के अनुसार, भारतीय रेलवे द्वारा संचालित एक सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम ‘डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर कारपोरेशन लिमिटेड’ (DFCCIL) ने चायनीज फर्म ‘बीजिंग नेशनल रेलवे रिसर्च एंड डिज़ाइन इंस्टीट्यूट ऑफ सिग्नल एंड कम्युनिकेशन कंपनी लिमिटेड’ के साथ चल रहे 471 करोड़ रुपए के कॉन्ट्रैक्ट को रद्द कर दिया है।

कॉन्ट्रैक्ट पत्र

इस चीनी कंपनी को कानपुर से दीन दयाल उपाध्याय रेलवे सेक्शन के बीच 417 किमी के सेक्शन में सिग्नलिंग और टेलीकॉम का काम दिया गया था। ये काम 471 करोड़ रुपए का था। हालाँकि, रेलवे ने अपने इस फैसले को लेकर कहा गया है कि चीन के साथ एलएसी पर जारी तनाव के चलते यह फैसला नहीं लिया गया है।

चीनी कम्पनी के साथ यह करार रद्द करने का मामला ऐसे समय में सामने आया है जब लद्दाख में भारत और चीन के सैनिकों के बीच हिंसक संघर्ष के बाद देश में चीनी उत्‍पादों के बहिष्‍कार की माँग जोर पकड़ती जा रही है।

गौरतलब है कि दोनों देशों के सैनिकों के बीच लद्दाख क्षेत्र में हुई हिंसक झड़प में भारत के 20 सैनिकों को जान गंवानी पड़ी है, जबकि चीन के भी करीब 43 सैनिकों की इस संघर्ष में मौत हुई है।

कल ही सरकार ने सरकारी टेलिकॉम कंपनियों बीएसएनएल और एमटीएनएल के अलावा निजी कंपनियों को भी आदेश दिया है कि वे चीनी उपकरणों का इस्तेमाल करना बंद कर दें। सरकार ने सिक्योरिटी के खतरे का हवाला देते हुए कहा कि 4G के अपग्रेडेशन में चीनी उपकरणों का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।

चीनी माल के बहिष्कार की तेजी होती माँग के बीच ओप्पो का लाइव लॉन्च इवेंट कैंसल

चीन की हरकतों को मद्देनजर उसके उत्पादों के बहिष्कार की माँग तेज़ होती जा रही है। चाइनीज स्मार्टफोन निर्माता कंपनी ओप्पो को अपने फ्लैगशिप स्मार्टफोन की भारत में होने वाली लाइव लॉन्चिंग कैंसल करनी पड़ी।

बता दें ओप्पो कंपनी द्वारा यूट्यूब पर अपने X2 स्मार्टफ़ोन को बुधवार एक लाइव इवेंट में लॉन्च किया जाना था।
हालाँकि, लॉन्च की लाइवस्ट्रीमिंग को रद्द कर उसकी जगह प्री-रिकॉर्डेड वीडियो अपलोड किया गया।

रिपोर्ट के अनुसार, ओप्पो कंपनी की तरफ से इस संबंध में कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया गया। लेकिन, कुछ रिपोर्ट्स बताते हैं कि सोशल मीडिया पर हंगामे से बचने के लिए शायद कंपनी ने ऐसा किया। सोशल मीडिया यूज़र्स ने ऑनलाइन प्रदर्शन के माध्यम से चीन के सारे उत्पादों खासकर मोबाइल फ़ोन का पूर्ण बहिष्कार करने के लिए लोगों से आह्वान किया था।

बुधवार को नेटीज़न्स ने ट्विटर के जरिए भारतीय नागरिकों से चाइनीज प्रोडक्ट, मुख्य रूप से मोबाइल फ़ोन को बहिष्कार करने की माँग की थी।

लद्दाख में तनावपूर्ण माहौल

गौरतलब हैं कि गुरुवार को आई एक रिपोर्ट के अनुसार गलवान घाटी पर चीन की सेना ने कँटीले तारों से लिपटे डंडे से भारतीय सेना पर धोखे से प्रहार किया था। जिसमें भारत ने अपने कम से कम 20 जवान खोए। जब तक भारतीय खेमे तक बात पहुँचती, भारतीय सैनिकों को चीनी सेना के दूसरे कैंप से आए सैनिकों ने घेर लिया था।

चीनी सेना ने पहले से ही अपने पास लाठी-डंडे, रॉड, हॉकी स्टिक, बेसबॉल क्लब, ड्रैगन पंच, पाइप, पत्थर, कीलें, बूट की नोक जमा कर लिया था। इनका इस्तेमाल वे हिंसा के दौरान कर रहे थे। पहाड़ी पॉइंट 14 पर पहले से मौजूद चीनी सैनिकों ने भारतीय सैनिकों को निशाना बनाते हुए उनके ऊपर बड़े-बड़े पत्थरों को फ़ेंक कर भी हमला किया। बिना किसी हथियार के भारतीयों सैनिकों ने उनका डटकर मुकाबला किया।

रूस से लेंगे 12 सुखोई और 21 मिग-29: लड़ाकू विमानों की आपातकालीन खरीददारी को लेकर वायुसेना का प्रस्ताव

आपातकालीन खरीद के तहत रूस से 12 सुखोई और 21 मिग-29 खरीदने पर भारत विचार कर रहा है। भारतीय वायु सेना (IAF) ने रूस से 33 नए लड़ाकू विमान लेने के लिए सरकार के एक प्रस्ताव को आगे बढ़ाया है। यह माँग ऐसे समय में की जा रही है, जब सीमा पर भारत और चीन के बीच सामरिक सम्बन्ध ठीक नहीं चल रहे हैं।

भारतीय वायुसेना (IAF) जिन 21 मिग-29 विमानों को खरीदने पर विचार कर रही है, वे रूस के हैं, जिन्होंने वायु सेना को नए लड़ाकू विमानों की आवश्यकता को पूरा करने में मदद करने के लिए इन विमानों को बेचने की पेशकश की है। यह माँग ऐसे समय पर की जा रही है, जब लद्दाख क्षेत्र में सीमा विवाद को लेकर भारत और चीन के सैनिकों के बीच माहौल संवेदनशील है।

न्यूज एजेंसी ANI के अनुसार, सरकारी सूत्रों का कहना है कि वायु सेना कुछ समय से इस योजना पर काम कर रही है, लेकिन वो अब इस प्रक्रिया पर तत्परता से नजर रख रही है और 6,000 करोड़ रुपए से अधिक के प्रस्तावों की उम्मीद की जा रही है, जिसे अगले सप्ताह उच्च स्तर पर अंतिम मंजूरी के लिए रक्षा मंत्रालय के समक्ष रखा जाएगा।

इस प्रस्ताव में 12 एसयू -30 एमकेआई का अधिग्रहण शामिल है, जिनकी आवश्यकता विभिन्न दुर्घटनाओं में वायु सेना द्वारा खोए गए विमानों की संख्या को बदलने के लिए होगी। भारत ने अलग-अलग बैचों में 10 से 15 साल की अवधि में 272 Su-30 फाइटर जेट्स के ऑर्डर दिए थे।

गौरतलब है कि हाल ही में गलवान घाटी पर चीन की सेना ने जो धोखा किया, उसके कारण भारतीय सेना ने अपने कम से कम 20 जवान खोए। सीमा पर खड़े चीनी सैनिकों को इस दौरान भारत की ओर से मुँहतोड़ जवाब मिला। नतीजतन उनके कमांडिग ऑफिसर समेत 43 सैनिक मारे गए।

हालाँकि, पहले इस झड़प को लेकर मीडिया में स्पष्ट सूचना नहीं आ रही थी। मगर, अब धीरे-धीरे सब साफ हो रहा है। ऐसे में भारतीय वायुसेना द्वारा नए लड़ाकू विमानों के अधिग्रहण का प्रस्ताव कई तरह की संभावनाओं को जन्म दे रहा है।

लॉकडाउन में समुदाय विशेष पर ही ज्यादा मुकदमे क्यों, जज साहब पूछ रहे… हम पूछते हैं इसमें समस्या क्या है, मुकदमे झूठे हैं?

तेलंगाना हाईकोर्ट में एक बड़ा अजीब वाकया सामने आया है। वहाँ अदालत ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए हैदराबाद पुलिस को सिर्फ़ इसलिए फटकार लगा दी, क्योंकि राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन के दौरान सबसे अधिक मामले समुदाय विशेष के लोगों के ख़िलाफ़ दर्ज किए गए थे।

चीफ जस्टिस राघवेंद्र सिंह चौहान और जस्टिस बी विजयसेन रेड्डी की पीठ ने सामाजिक कार्यकर्ता शीला सारा मैथ्यूज की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए पुलिस कार्रवाई पर नाराजगी जताई। कोर्ट ने हैदराबाद पुलिस को फटकारते हुए पूछा कि क्या इसका मतलब यह है कि दूसरे समुदायों से किसी ने लॉकडाउन का उल्लंघन ही नहीं किया?

गौरतलब हो कि इस याचिका के जरिए शीला सारा मैथ्यूज नाम की सामाजिक कार्यकर्ता ने कोर्ट के समक्ष पुलिस के बर्ताव के ख़िलाफ़ शिकायत की थी। उन्होंने याचिका में उन घटनाओं का ही उल्लेख किया था, जब पुलिस ने मजहब विशेष के युवकों के साथ सख्त बर्ताव किया।

सारा मैथ्यूज ने अपनी याचिका में जुनैद नाम के लड़के के केस का हवाला दिया और बताया कि पुलिस की पिटाई के बाद उसे 35 टाँके आए। इसके अलावा एक मोहम्मद असगर नाम के लड़के का जिक्र किया। जिसे लेकर बताया गया कि असगर किराने का सामान लेने गया था। लेकिन पुलिस ने लाठीचार्ज शुरू कर दिया और टॉप फ्लोर से गिरने के कारण उसके दोनों पैर टूट गए।

हालाँकि, इस याचिका की सुनवाई के दौरान पुलिस की ओर से बहुत दलीलें पेश की गईं- जैसे मो. असगर को चोट छत से गिरने से आई है न कि पिटाई से। मगर, कोर्ट ने पुलिस की ओर से दी गई दलीलों को खारिज कर दिया।

साथ ही सारा मैथ्यूज की याचिका के आधार पर डीजीपी से मामले में एक्शन लेने को कह दिया। कोर्ट ने अब इस मामले में निर्देश दिया है कि 20 जून तक पुलिस अधिकारी आरोपित कॉन्स्टेबल पर अपनी कार्रवाई करें और कोर्ट में हलफनामा दाखिल करें।

अब आखिर ऐसी सोच का कारण क्या है?

वामपंथियों और इस्लामी कट्टरपंथियों को समर्थन देने वाली एक लॉबी हमेशा एक आँकड़ा ले कर आती है, और उसके द्वारा यह साबित करना चाहती है कि पुलिस और प्रशासन, और शायद कोर्ट भी, समुदाय विशेष के अपराधी साबित होने में पक्षपाती रवैया अपनाती है।

यदि ‘फाइनेंशियल एक्सप्रेस’ की इस खबर को देखें तो यहाँ पर इन्होंने वही बात दोहराने की कोशिश की है जिसमें अखिल भारतीय स्तर पर समुदाय विशेष के अपराधी होने का प्रतिशत 15.8 रहा, जबकि उनकी जनसंख्या 14.2% तक ही जाती है। उसके बाद इन्होंने लिखा कि ‘अंडरट्रायल’, यानी वैसे आरोपित जो न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं, उनका प्रतिशत और भी ज्यादा है, जो कि 20.9% है।

अब सवाल यह उठता है कि प्रतिशत में थोड़ा सा अंतर (1.6) यह साबित कर देता है कि पुलिस और प्रशासन समुदाय विशेष को लेकर पक्षपाती है? ऐसे सर्वे में यह क्यों नहीं देखा जाता कि इसी देश में 20-20 साल मुकदमा चलने के बाद आतंकियों को फाँसी दी गई है। अगर पक्षपात होता तो ऐसे लोगों पर इतना समय कैसे जाता?

साथ ही, जिसे यहाँ अल्पसंख्यक कहा जाता है, वो वाकई में अल्पसंख्यक है भी नहीं। दूसरी सबसे बड़ी आबादी है और एक-डेढ़ प्रतिशत के अंतर को ऐसे भुनाना जैसे उनकी जनसंख्या 14% हो और अपराधों में उनका हिस्सा 74% का हो रहा है। चाहे अपराधी हों, या अंडरट्रायल, प्रतिशत का अंतर इतना नहीं है कि इसमें पक्षपात ढूँढ लिया जाए।

यहाँ एक और बात आती है कि हम यह क्यों नहीं मानते कि समुचित न्यायिक प्रक्रिया के बाद 80% हिन्दुओं को भी तो सजा मिलती है? वहाँ पर ये सही हो जाता है? यह मानने में क्या समस्या है कि जो अपराध करता है, वो सजा पा रहा है। और हाँ, जो लोग खुला घूमते हैं, उनमें से ऐसा भी तो नहीं है कि एक ही धर्म के लोग न्यायिक प्रक्रिया को बंधक बनाकर बाहर हैं। जिसके भी पास पैसा और सत्ता है, वो तो आज भी बाहर है।

तीसरी बात, ये किस स्टडी में साबित हो गया किसी भी समाज के अपराध में अपराधियों का अनुपात उनकी जनसंख्या के अनुपात के समानांतर होगा? ऐसा नहीं होता। इसके उलट कुछ मजहबों के नुमाइंदों ने आतंकी वारदातों में अपनी एक्सक्लूसिविटी बनाए रखी है और वहाँ तो उनकी मोनोपॉली भी है।

तो क्या ऐसे समयों में हम यह कहते फिरें कि आतंकी घटनाओं में जो नाम आ रहे हैं, उससे लगता है कि पुलिस और प्रशासन एक खास मजहब के लोगों को पकड़ने में ज्यादा रुचि दिखाती है? या फिर हम ये मानेंगे कि ऐसी घटनाएँ लगातार एक मजहबी उन्माद के वश में आकर एक ही तरह के नाम वाले लोग कर रहे हैं?

आतंकी घटनाओं के बाद कुछ समुदायों की चुप्पी बताती है कि वो इन्हें लेकर स्वयं कितना पक्षपाती हैं। उसी तरह, ऐसी घटनाओं की जड़ में जो सोच है, वह इतनी कुत्सित है कि हम चाह कर भी उसकी उपेक्षा कर ही नहीं सकते।

अब अगर वर्तमान मामले की बात करें जहाँ कोर्ट ने लॉकडाउन में ऐसे मामलों में समुदाय विशेष के खिलाफ ज्यादा मुकदमे दर्ज क्यों हुए हैं, तो यह भी तो हो सकता है कि समुदाय विशेष ने ज्यादा बार नमाज के नाम पर, रमजान के नाम पर और ईद के नाम पर लॉकडाउन का उल्लंघन किया हो?

हमने तबलीगी जमात वाले समय से ही देखा कि कैसे कई इमाम, मौलवी आदि लगातार नमाज करने की सलाह दे रहे थे, और पुलिस की चेतावनियों के बाद भी मस्जिद न सही तो घरों की छतों पर इकट्ठा हो कर नमाज पढ़ रहे थे। तो क्या पुलिस भी अब हाथ में कैलकुलेटर ले कर चले कि जिसकी जितनी जनसंख्या है, उसी अनुपात में मुकदमे दर्ज होंगे?

यह भी तो हो सकता है कि कोई समुदाय शांतिप्रिय हो, और कोई समुदाय सिर्फ शांतिप्रिय कहलाता हो, लेकिन उपद्रव करने में अग्रणी हो? अगर किसी को झूठे मामले में फँसाया गया हो तो वो तो कोर्ट में साबित हो ही जाएगा, लेकिन न्यायाधीश द्वारा इस पर सवाल उठाने से पहले बेहतर होता कि वे बताते कि उनकी टिप्पणी का आधार क्या है? क्या पुलिस ऐसे मामलों में मजहब के आधार पर भेदभाव करना शुरू कर दे कि ये आदमी फलाँ मजहब का है, और इसके ज्यादा लोग हो रहे हैं, तो इसको न पकड़ा जाए?

मोदी सरकार ने लॉन्च की मोबाइल लैब: अब सुदूर गाँव-कस्बों में भी होगी कोरोना सहित TB और HIV की जाँच

पूरे देश भर में कोरोना के बढ़ते मामलों के मद्देनजर मोदी सरकार ने आज कोरोना टेस्टिंग की रफ्तार को तेजी देने के लिए एक मोबाइल लैब लॉन्च की है। ये मोबाइल लैब कोरोना टेस्टिंग में काम आएगी। गुरुवार को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ हर्षवर्धन ने इसे लॉन्च किया है।

अपने ट्विटर पर इसकी जानकारी साझा करते हुए डॉ हर्षवर्धन ने लिखा, “भारत के ग्रामीण और दुर्गम क्षेत्रों में अंतिम मील परीक्षण को बढ़ावा देने के लिए कोविड-19 के लिए भारत की पहली मोबाइल लैब शुरू की गई।”

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ये दूर-दराज के इलाकों में तैनात होगी। ये मोबाइल लैब प्रतिदिन 25 RT-PCR टेस्ट, 300 ELISA टेस्ट कर सकती है। खास बात ये है कि यह लैब टीबी और एचआईवी की जाँच भी कर सकती है।

इस लैब के लॉन्च के बाद स्वास्थ्य मंत्री ने मीडिया से बातचीत में कहा, “हमारे देश में फरवरी में कोरोना जाँच के लिए सिर्फ 2 ही लैब थी, लेकिन आज हमारे पास 953 लैब हैं। इनमें से करीब 700 लैब सरकारी हैं, ऐसे में अब देश में कोरोना वायरस के टेस्ट ज्यादा होंगे। वहीं इस मोबाइल लैब को लेकर केंद्रीय मंत्री ने कहा कि दूर-सुदूर के इलाकों में टेस्टिंग के लिए इनका इस्तेमाल किया जाएगा।”

सरकार के मुताबिक, इन लैब का इस्तेमाल ऐसी जगहों के लिए किया जाएगा जहाँ पर लैब की सुविधा नहीं है। यानी गाँव-कस्बों में भी इसका इस्तेमाल किया जा सकेगा।

ICMR की ओर से लक्ष्य रखा गया है कि जून के अंत तक देश में रोज करीब 3 लाख टेस्ट किए जाएँ। अभी रोज करीब डेढ़ लाख टेस्ट ही हो रहे हैं। इससे पहले पीएम ने भी टेस्टिंग पर जोर देने की बात कही थी।

जानकारी के लिए बता दें, थर्मल स्क्रीनिंग, वेंटिलेटर, कोविड-19 टेस्ट डिवाइस, 3 डी मास्क वगैरह बनाने वाली आंध्र प्रदेश की कंपनी एएमटीजे ने इसे आई-लैब का नाम दिया है।

‘मीरजाफर’ मिलते गए और चाओ-माओ बढ़ते गए: 1949 तक भारत से लगती भी नहीं थी चीन की सीमा

अमेरिकी लेखक जेम्स बाल्डिवन ने कहा है,

लोग इतिहास में उलझे हैं और इतिहास उनमें कैद है।

गूगल में मीरजाफर सर्च करते ही सबसे ऊपर लिखा आता है- गद्दारी की सबसे बड़ी मिसाल “मीरजाफर” है। असल में मीरजाफर बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला का सेनापति था। ये वो वक्त था जब ब्रिटिश, पुर्तगाली, डच, फ्रेंच सबकी कंपनियॉं भारतीय जमीन पर ठौर तलाश रहीं थीं। सिराजुद्दौला ने सभी कंपनियों को सर्शत व्यापार की अनुमति दी। नियम तोड़ने पर सबको दंड भी एक जैसा ही देता था। अंग्रेजों को ये बर्दाश्त नहीं हुआ।

1757 में प्लासी की लड़ाई हुई। अंग्रेजों की शह पर मीरजाफर ने गद्दारी की और सिराजुद्दौला हार गया। इसके बाद मीरजाफर बंगाल का नवाब बना और अंग्रेजों को मिली ज्यादा से ज्यादा व्यापारिक रियायतें। फिर अंग्रेज कैसे बढ़े और हम गुलाम हुए, इससे हम सब परिचित हैं।

आज के वक्त में किसी भी देश के लिए किसी अन्य राष्ट्र को राजनीतिक तौर पर गुलाम बनाना संभव नहीं रहा। इसलिए अर्थतंत्र के जरिए इस मंसूबे को आगे बढ़ाया जाता है। चीन सालाना भारत को करीब 70 अरब डॉलर का निर्यात करता है। लेकिन ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसे अभियानों से उसके व्यापारिक हितों को नुकसान पहुँचना तय है।

भारत ने सभी 61 सीमा सड़क 2022 तक पूरा करने का लक्ष्य तय कर रखा है। वह लद्दाख में सबसे ऊँचा पुल बना रहा है। केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख का जो नक्शा जारी किया गया है, उसमें पाकिस्तान के कब्जे वाला पीओके और चीनी कब्जे वाला अक्साई चीन भी शामिल है।

ये सब चीन की चिंताएँ बढ़ाने वाली हैं। भारत जैसे बड़े बाजार में संभावनाएँ सीमित होने का मतलब है, अरबों डॉलर का नुकसान और लाखों लोगों का बेरोजगार होना।

भारत के बाजार में चीन कैसे पैर पसार रहा है इसे आप नीचे दिए गए ग्राफ से समझ सकते हैं;

साभार: पीएचडी चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री

जिस तरह मोदी सरकार ने पाकिस्तान के साथ रिश्तों को सुधारने के लिए लीक से हटकर प्रयास किए थे, वैसा ही चीन के साथ भी किया। बतौर पीएम मोदी पॉंच बार चीन की यात्रा पर गए। यह किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री की सर्वाधिक चीनी यात्रा है। वे चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से 18 बार मुलाकात भी कर चुके हैं।

लेकिन, मोदी सरकार ने सत्ता में आते ही बाजार को लेकर अपने इरादे भी स्पष्ट कर दिए। इसी कड़ी में सितंबर 2014 में भारतीय कंपनियों को प्रोत्साहित करने के लिए ‘मेक इन इंडिया’ की पहल की गई। पिछले दिनों कोरोना संकट को अवसर में बदलने के लिए ‘आत्मनिर्भर भारत’ की शुरुआत की गई। ये सब पहले सीधे चीन के व्यापारिक हितों को चोट पहुॅंचाते हैं। दुनिया का साहूकार बनने के फेर में चीन ने इतने कर्जे बाँटे हैं कि यदि भारत का बाजार हाथ से निकल गया तो उसकी अर्थव्यवस्था का बुलबुला झटके में फूट जाएगा।

इन सबसे अपनी जनता का ध्यान बँटाने के लिए चीन के पास दो ही विकल्प बचते हैं। पहला, भारत को सीमा विवाद में उलझाकर रखा जाए, जिसकी कुव्वत उसे भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की दरियादिली से मिली है। दूसरी, अंग्रेजों की तरह मीरजाफर खड़े किए जाएँ।

ऐसे में ताज्जुब नहीं होता कि गालवन में चीनी धूर्तता के बाद राहुल गाँधी ने भारत सरकार से ही सवाल पूछ लिए।

असल में चीन जैसी छटपटाहट सत्ता सुख की आदी कॉन्ग्रेस में भी दिखती है। 2014 के बाद से वह लगातार सिकुड़ती, कमजोर होती जा रही है। इसी छटपटाहट में राहुल गाँधी गुपचुप चीनी दूतावास तब चले जाते हैं, जब डोकलाम में भारत और चीन के बीच गतिरोध चल रहा होता है। पहले इस मुलाकात से इनकार किया जाता है, लेकिन सबूत सामने आते हैं तो सफाई दी जाती है।

अगस्त 2008 में कॉन्ग्रेस ने चीन की कम्युनिस्ट पार्टी से सूचनाओं के लेन-देन को लेकर बकायदा एक समझौता किया था। उस समय कॉन्ग्रेस की कमान सोनिया गॉंधी के हाथ में थी और मनमोहन सिंह देश के प्रधानमंत्री हुआ करते थे। यह समझौता तब किया गया था जब वामपंथी वैसाखी के सहारे चल रही UPA-1 की सरकार में भारत की कम्युनिस्ट पार्टियों ने विश्वास की कमी व्यक्त की थी।

ऐसा नहीं है कि चीन की मक्कारी से कॉन्ग्रेस परिचित नहीं है। या फिर चीन से नरमी उसका नया दृष्टिकोण है। यह नेहरू के जमाने से ही है।

1 अक्टूबर 1959 को मु​ख्यमंत्रियों को लिखे पत्र में नेहरू ने कहा था, “भारत और चीन के बीच जो तनाव पैदा हो गया है, वह निश्चित तौर पर हमारे लिए बड़ी चिंता का विषय है। इसका मतलब यह नहीं कि हम बहुत अलार्म हो जाएँ या फिर बहुत गंभीर खतरों के बारे में सोचने लगें। मुझे निकट भविष्य में ऐसी कोई गतिविधि नजर नहीं आती, लेकिन बुनियादी तथ्य यही है कि भारत और चीन अलग हो गए हैं। और भले ही सरहद पर अपेक्षाकृत शांति बनी रहे, यह एक तरह की फौजी शांति ही होगी और भविष्य में लगातार तनाव बने रहने की आशंका दिखाई देती है। असल में यह भविष्य ही है जो मुझे ज्यादा परेशान कर रहा है, क्योंकि इसके कारण हमारे देश को मानसिक और भौतिक दोनों तरह के तनाव में रहना पड़ेगा।”

बावजूद 1962 हुआ। लेकिन इसके बाद भी चीन को लेकर कॉन्ग्रेस का ममत्व कम नहीं हुआ। यह नेहरू ही थे जिसके कारण भारत की सीमा तक चीन पहुॅंचा। वरना 1949 तक तो उसकी सीमाएँ भी भारत से नहीं लगती थीं।

1949 में कम्युनिस्टों का शासन स्थापित होने के बाद चीन ने ताइवान से समाजवादियों को खदेड़ दिया। 1950 में तिब्बत पर चढ़ाई कर दी। वह तिब्ब्त जो भारत और चीन के बीच बफर स्टेट था। वह तिब्बत जो 1000 साल से भी ज्यादा लंबे वक्त से भारत का सांस्कृतिक, धार्मिक और ऐतिहासिक पड़ोसी था।

इतने अहम तिब्ब्त पर जब चीन ने चढ़ाई की तो भारत क्या कर रहा था?

फ्रांसीसी मूल के लेखक, पत्रकार और तिब्बत की इतिहास के जानकार क्लाउडे अर्पी (Claude Arpi) ने ‘विल तिब्बत एवर फाइंड हर सोल अगेन (Will Tibet ever find her soul again)’ में लिखा है कि उस वक्त नेहरू का भारत तिब्बत में घुसी चीनी सेना के लिए चावल का सप्लाई कर रहा था। भारतीय चावल खाकर चीनी सेना ने तिब्बत पर कब्जा कर लिया।

गौर करने वाली बात यह है कि तिब्बत से एशिया की 9 बड़ी नदियों का उद्गम होता है। इस पर कब्जे से नदियों के जल पर कम्युनिस्टों का नियंत्रण हो गया। लेकिन, कॉन्ग्रेस का चीन से ममत्व कमजोर नहीं पड़ा।

उसने UNSC (संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद) की स्थायी सदस्यता चीन को उपहार में दी। असल में 1953 में स्थायी सदस्यता की पेशकश भारत को ही हुई थी। लेकिन नेहरू ने इसे अस्वीकार करते हुए चीन को UNSC की स्थायी सदस्यता की वकालत की थी।

इस बारे में सेलेक्टेड वर्क्स ऑफ़ नेहरू में सर्वपल्ली गोपाल, खंड 11 के पेज संख्या 248 में लिखा है, “नेहरू ने सोवियत संघ की भारत को UNSC के छठे स्थायी सदस्य के रूप में प्रस्तावित करने की पेशकश को ठुकराते हुए कहा था कि भारत की जगह इसमें चीन को स्थान मिलना चाहिए।”

कॉन्ग्रेस की ऐतिहासिक भूलों का वह सिलसिला आज भी जारी है। इसका क्या कारण हो सकता है?

जब ऊपर जिक्र किए गए कड़ियों को हम जोड़ने की कोशिश करते हैं, तो ऐसा प्रतीत होता है कि कॉन्ग्रेस और चीन के बीच एक अघोषित साँठगाँठ है। तुम सत्ता दोबारा हासिल करने में हमारी मदद करो और हम तुम्हें और बड़ा बजार भुनाने का मौका देंगे। कुछ-कुछ वैसा ही जिस तरह की डील मीरजाफर और अंग्रेजों के बीच हुई थी।

यह चीन के लिए भी फायदे का सौदा है, क्योंकि वह बखूबी जानता है कि लद्दाख में भारत के साथ परंपरागत युद्ध छिड़ने पर सप्लाई लाइन के हिसाब से भारतीय थल सेना और वायु सेना को उस पर बढ़त हासिल है। यह बढ़त तब और मजबूत होगी, जब सीमाई इलाकों में भारतीय परियोजनाएँ समय से पूरी हो जाएँगी। जब भारत के बाजार में चीन भरभरा कर गिरेगा, तो वह अपने ही लोगों के असंतोष से कुचला जाएगा।

यह असंतोष न चीन के कम्युनिस्टों के हक में होगा और न भारत के वामपंथियों और उनके पोषक कॉन्ग्रेस के हित में। इसलिए, नानजिंग के प्रेसिडेंशियल पैलेस और जनपथ की बेचैनियाँ आज एक सी दिख रहीं।

CSK के निलंबित टीम डॉक्टर ने माँगी माफी, बलिदानी सैनिकों पर किया था घटिया ट्वीट

बलिदानी सैनिकों पर घटिया ट्वीट के लिए डॉक्टर डॉ. मधु थोट्टापपिल्लई (Dr. Madhu Thottappillil) ने माफी मॉंगी है। इस ट्वीट के बाद आईपीएल फ्रेंचाइजी चेन्नई सुपरकिंग्स (CSK) ने टीम डॉक्टर को निलंबित कर दिया था।

डॉ. मधु ने लद्दाख क्षेत्र में 20 भारतीय सैनिक के बलिदान की खबरों के सामने आने के बाद ‘पीएम केयर्स’ पर कटाक्ष करते हुए अपने ट्वीट में लिखा था, “मैं ये जानने को उत्सुक हूँ कि जो ताबूत वापस आएँगे क्या उस पर ‘पीएम केयर’ का स्टीकर लगा होगा?”

अब माफ़ी माँगते हुए कहा है, “16 जून को, मैंने एक ट्वीट किया था, जिसके बाद मैंने यह महसूस किया कि मेरे द्वारा इस्तेमाल किए गए शब्द अनुचित और अनपेक्षित थे। मैंने उस ट्वीट को डिलीट कर दिया। लेकिन तब तक मेरे ट्वीट के स्क्रीनशॉट सोशल मीडिया में सर्कुलेट और शेयर किए जा चुके थे।”

उन्होंने लिखा है, “मेरा इरादा सेना और हमारे साहसी शहीदों और इस महान देश के सभी नागरिकों का ध्यान रखने में वाले माननीय प्रधानमंत्री मोदी और सरकार के प्रयासों को विफल करने का नहीं था।”

थोट्टापपिल्लई ने कहा है कि वह समझ सकते हैं कि उनकी पोस्ट ने हजारों लोगों की भावनाओं को चोट पहुँचाई है। उन्होंने लिखा, ‘‘मुझे खेद है कि मेरे ट्वीट को पढ़ने वाले लोगों को मैंने पीड़ा पहुँचाई और नाराज किया और इसके लिए तहेदिल से माफी माँगता हूँ। मैंने अनजाने में और गलती से ट्वीट किया। इसका किसी व्यक्ति या संगठन से मेरे जुड़ाव का कोई लेना-देना नहीं है।’’

उन्होंने आगे कहा, ” मैं यह बात जानती हूँ कि प्रधनमंत्री हमारे देश के बलिदानी सैनिकों की देखभाल का पूरा ध्यान रख रहे हैं। जिन्होंने देश की सेवा में अपनी जान न्यौछावर कर दिया हैं। जिनके बिना हम नागरिक सुरक्षित जीवन नहीं गुजार सकते हैं।”

क्या था मामला

दरअसल आईपीएल की टीम चेन्नई सुपर किंग्स (CSK) की टीम के डॉक्टर डॉ मधु थोट्टापपिल्लई ने अपने आधिकारिक ट्विटर एकाउंट से भारतीय सेना की चीनी सैनिकों से झड़प में बलिदानी भारतीय सैनिकों के बारे में ‘पीएम केयर्स फंड’ (PM CARES Fund) पर कटाक्ष करते हुए ट्वीट किया था। इस ट्वीट को लेकर सोशल मीडिया में लोगों ने नाराजगी दिखाई थी। जिसके बाद डॉ मधु ने यह ट्वीट डिलीट कर दिया था। हालाँकि, उसके स्क्रीनशॉट सोशल मीडिया में वायरल हो गए थे।

ट्वीट पर विवाद बढ़ता देख मधु ने अपना ट्विटर अकाउंट लॉक कर दिया था। इस ट्वीट को लेकर कई ट्विटर यूजर्स ने चेन्नई सुपरकिंग्स से शिकायत की और कहा कि ये शर्म की बात है कि मेडिकल पेशे से जुड़ा एक शख्स इतना असंवेदनशील हो सकता है और भारतीय सेना के जवानों की मौत पर मजाक बना रहा है।

विवाद बढ़ने के बाद आईपीएल की टीम चेन्नई सुपरकिंग्स ने इसका जवाब देते हुए कहा था कि – “चेन्नई सुपर किंग्स प्रबंधन को डॉ मधु थोट्टापपिल्लई के व्यक्तिगत ट्वीट की जानकारी नहीं थी। उन्हें टीम डॉक्टर के रूप में उनके पद से निलंबित कर दिया गया। चेन्नई सुपरकिंग्स को उनके ट्वीट पर खेद है जो प्रबंधन की जानकारी के बिना किया गया और यह दुर्भावनापूर्ण था।”

उल्लेखनीय है कि अक्साई चीन क्षेत्र के गलवान घाटी में भारतीय सेना और चीनी सेना के बीच हुई हिंसक झड़प में 20 भारतीय सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए, जबकि 43 चीनी सैनिकों के मरने की खबर भी सामने आई हैं।

ऐसे में डॉ. मधु ने उस फंड पर निशाना साधने का प्रयास किया था, जिस ‘पीएम केयर्स फंड’ (PM CARES Fund) कोरोना वायरस महामारी के खिलाफ लड़ाई में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से दान करने की अपील की थी, इसमें कई लोगों ने बड़ी मात्रा में अपना सहयोग दिया है जो कि विपक्ष के साथ ही मीडिया के लिए भी बड़ा सरदर्द बनकर उभरा है।